मैं परिणिता: भाग १


भूल नहीं सकती मैं वो शाम। एक ही दिन में हम पति-पत्नी का जीवन हमेशा के लिए बदल गया था। उस वक़्त तो बिलकुल समझ नहीं आ रहा था कि ये अच्छा हुआ है या बुरा। पर समय के साथ और कई सुख दुःख भरे पलों के बाद आज हम दोनों पहले से बहुत ज्यादा करीब है। आज भी यकीं नहीं होता कि ऐसा कुछ भी किसी के साथ हो सकता है। मेरी कहानी को सच मानना आपके लिए तो क्या मेरे लिए भी मुश्किल है। एक लंबे सपने की तरह है।

गुलाबी ठण्ड वाली दिसंबर की शाम थी वो। आज से ३ साल पहले। खिड़की से सूरज मानो जाते जाते थोड़ी और गर्मी देकर जाना चाहता था कि हम ठंडी रात बर्दाश्त कर सके।

डूबते सूरज को देखना मुझे अच्छा लगता था। और वो खिड़की जैसे मेरे लिए बाहर की दुनिया देखने का बस एकमात्र जरिया। खिड़की के पास पहुची तो ठण्ड महसूस होना शुरू हो गयी। अपनी साड़ी के आँचल को पकड़ कर दायें कंधे पर से ओढ़ कर अपने हाथ उसमे छुपाते ही थोड़ी गर्मी आ गयी। गर्मी हो या ठण्ड, सही मटेरियल की साड़ी पहनो तो मौसम आपको कभी परेशान नहीं कर सकता। मैं अपनी साड़ी की चॉइस से बड़ी खुश थी मैं। आज ही दोपहर में कोरियर से आयी थी ये साड़ी। इसे देखने और पहनने को इतनी उतावली थी मैं कि आज काम से तबियत का बहाना बना कर समय से पहले ही छुट्टी लेकर आ गयी थी।

वैसे तो हर औरत अपनी नयी साड़ी को लेकर उत्साहित रहती है पर मेरे लिए और भी कारण थे। एक तो साड़ी मुझे अपने देश भारत और वहां की परम्पराओं से जुड़ने का मौका देती। दूसरा, मुझे यह मौका महीने में २-३ बार ही मिलता था जब मैं अपनी साड़ी पहनने की तमन्ना पूरी कर सकूं। कुछ घंटे के लिए ही सही, खूब अच्छी तरह सजती संवारती थी मैं। पर सिर्फ उस चारदीवारी के बीच में। दिल में हमेशा एक कसक रह जाती थी कि काश! कोई मेरी ओर देखे और मुझसे कहे कि मैं कितनी सुन्दर लग रही हूँ या कोई सहेली मेरी चॉइस की तारीफ़ करते हुए कहे कि हाय! नज़र न लगे तुझे इतनी अच्छी तरह साड़ी पहनी है तूने! कहाँ से खरीदी? मुझे भी बताना ज़रा!

अब इतना ही प्यार था इस परिधान से तो क्यों मैं चारदीवारी में बंद होकर पहनती थी ? क्यों नहीं किसी से मिलती? इन्टरनेट पे मेरी कई सहेलियाँ मुझसे ये सवाल करती थी। ऑनलाइन ही सही वहां कोई मेरी चिंता करती थी और मेरी तारीफ़ भी। इन सवालों के जवाब सोच कर कभी कभी मन थोड़ा उदास भी हो जाता था। वजह समझना ज्यादा मुश्किल भी नहीं है। मेरी पत्नी, परिणिता, को पसंद नहीं था कि मैं साडी पहनूँ या कोई भी औरतों वाले काम करूँ। उसकी नज़र में उसने एक आदमी से शादी की थी और वो आदमी ही चाहती थी। दुनिया की नज़र में मैं प्रतीक, एक आदमी, हूँ। लोग मेरी तरह के लोगो को क्रोसड्रेसर भी कहते है पर मैं सिर्फ एक ड्रेसर नहीं हूँ। मेरे अंदर एक औरत भी है और एक आदमी भी। एक को दबा दूँ कहीं तो मैं अधूरी रह जाऊंगी और कोई मुझे पूरी तरह समझ नहीं सकेगा।

परिणिता और मैं, US में अपनी MD की पढाई के वक़्त मिले थे। एक ही साथ थे हम दोनों और समय ने हम दोनों के बीच प्यार भी जगा दिया। काफी लिबरल माइंडसेट की थी वो। sexuality, gender, इन सब विषयों में काफी खुला मन था उसका। डॉक्टरों से ऐसी उम्मीद वैसे भी की जा सकती है। तब हमारे प्यार की शुरुआत ही हुई थी, तभी मैंने अपने बारे में उसे बताया था। मन में एक बड़ी आशा थी कि यह लड़की मुझे समझकर स्वीकार कर सकेगी। पर ये बात सुनकर तो उसे मानो सदमा लग गया था और साथ ही साथ मुझे भी। लिबरल परिणिता का खुला मन मानो अचानक से बंद हो गया। पर मैं भी उसे प्यार करती थी और उसे खोना नहीं चाहती थी। तो थोड़ा समझौता किया गया। उसने मुझसे कहा कि वो नहीं चाहती की मैं कभी उसके सामने स्त्रीरूप में आऊं। पर महीने में २-३ बार जब वो घर पे न रहे तब मैं घर की चारदीवारियों में जो करना है, वह कर सकती हूँ। तब से फिर यूँ ही छुप छुप कर कभी कभी मैं अपनी दिल के अरमानों को पूरा करती थी।

पर उस गुलाबी शाम को नयी साडी की ख़ुशी में मैं इतनी मशगूल हो गयी थी कि समय का एहसास ही नहीं रह गया था। परिणिता को आने में १५ मिनट रह गए थे। मैंने झटपट कपडे बदल कर मेकअप उतारना शुरू की। साड़ी फोल्ड करने में तो मैं एक्सपर्ट थी। ज्यादा समय नहीं लगा था। पर मेकअप उतारना और ऑय लाइनर साफ़ करने में बड़ा समय लग जाता था। किसी तरह परिणिता के पहुचने के पहले मैं रेडी थी या यूँ कहो कि मैं रेडी “था” ।

उसने आते ही मुझे गले लगा लिया। पति पत्नी के बीच ऐसे पल बड़े प्यारे होते है। पत्नी को गले लगाने पर जब उसके स्तन सीने से लग जाते है तब एक मीठा सा सुकून महसूस होता है। और पत्नी जब पति की बाहों में अपना सर छुपा लेती है तो उसके मन की भी सभी परेशानियाँ छू मंतर हो जाती है। फिर उसने सर उठा कर मुस्कुरा कर कहा, “कैसे हो तुम? मेरे इंतज़ार में क्या किये तुम?” परिणिता को पता न था कि मैं आज जल्दी आकर क्या करने वाली हूँ। पर अचानक ही उसके चेहरे के तेवर बदल गए। मैं समझ न सकी कि ऐसा क्या हो गया। वो मुझसे नाराज़ हो गयी और किचन की ओर बढ़ गयी। उसकी ओर जाते हुए मैंने खुद को शीशे में देखा और तब पता चला की मेरे होंठो पर थोड़ी लिपस्टिक रह गयी थी। आज तो अब मूड उखड़ा उखड़ा रहने वाला है, यह एहसास हो गया था।

किचन से बर्तन के उठापटक की आवाज़ आ रही थी। अब समय था कि मैं एक अच्छे पति का कर्त्तव्य निभाऊँ। जल्दी से लिपस्टिक पोंछ कर मैं किचन की ओर चल पड़ी। और जाकर बिना मौका दिए, झट से पीछे से परिणिता को गले लगा लिया। मैंने उससे कहा, “तुम थक गयी होगी। मैंने तुम्हारे लिए पहले ही खाना बना रखा है। तुम टेबल पर बैठो मैं खाना गरम करके लाता हूँ।” उसकी आँखों में अभी भी थोड़ी नाराज़गी थी पर कम होने के आसार दिख रहे थे। परिणिता की नज़रो में तो मैंने एक अच्छे पति होने का एक काम तो किया था। पर सच तो यह था कि दोपहर में साड़ी पहनकर घर के काम और खाना बनाने में जो ख़ुशी मुझे मिली थी, मैं उसको समझा नहीं सकती थी। मैंने टेबल पे प्लेट और कैंडल पहले ही लगा रखी थी। यह सब घर के काम करके औरत होने का सुख वो ही समझ सकता है जिसे यह मौका कम मिलता हो। इन्टरनेट पे मेरी सभी सहेलियां ऐसे मौके की तलाश में रहती है। हम तो रेसिपीज भी एक्सचेंज करती है जो शायद असली जीवन में कभी न करें।

अब टेबल पर खाना लग चूका था और खुशबूदार कैंडल भी जल रही थी। कैंडललाइट में परिणिता नाराज़ ही सही पर बेहद खूबसूरत लग रही थी। उसने गुस्से से मेरी तरफ देखा और कहा, “मैं तुमसे कई बार कह चुकी हूँ कि तुम जब भी यह करते हो….”। उसके पूरा कहने के पहले ही मैंने उसके होठो पे पहले हाथ रख दिया और फिर उसे एक प्यार भरा किस दिया। मेरे होंठो पर एक बार फिर लिपस्टिक लग चुकी थी। “मेरे होंठो पर जब तुम्हारी लिपस्टिक लगती है, वही मेरी फेवरेट है।”, मैंने कहा। मेरी और देख कर फिर वो हँसने लगी। चलो एक मुश्किल तो दूर हुई थी। फिर खाना खाकर और थोड़ी देर बातें कर हम दोनों सोने चले गए।

बिस्तर पर सोने से पहले मन में बस एक ही विचार चल रहा था कि काश, परिणिता मेरी भावनाओं को स्वीकार कर पाती। मेरे अंदर की स्त्री को भी जीने का उतना ही हक़ है। कुछ देर ऐसा सोच कर मैंने परिणिता की और देखा और उसे अपनी बाहों में ले लिया। स्पूनिंग करते वक़्त हाथ पत्नी के स्तनों पर चले गए। मैंने उसकी lingerie से हाथ डालकर उसके स्तनों को प्यार से छूना शुरू किया। वो अब मेरे और पास आ गयी थी। तब यह एहसास हुआ कि पति पत्नी के जीवन से जुड़े पहलूओं में यह भी कितना प्यारा पहलू है। कम से कम इस वक़्त मैं पति बन कर परिणिता को उसकी सब परेशानियों से दूर कर उसे सुरक्षित अनुभव कराना चाहता था। यदि मुझमे एक प्यार से भरी स्त्री है जो मेरे लिए ख़ास मायने रखती है तो मेरा सुरक्षा देने वाला पुरुषरूप भी उतना ही महत्वपूर्ण है मेरे लिए। यह सोचकर मैं भी सो गया।

पर उस रात को जो होने वाला था वो हमारे जीवन को हमेशा के लिए बदल देने वाला था। रात गहरी हो चुकी थी और नया सवेरा एक अद्भुत घटना के साथ आने वाला था जो आज तक हमारी समझ से बाहर है।
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