मैं परिणिता: भाग १२


अब तक आपने मेरी कहानी में पढ़ा: जब से होश संभाला है, मैं जानती हूँ कि मेरे अंदर एक औरत बसी हुई है। पर दुनिया की नज़र में मैं हमेशा प्रतीक, एक लड़का बनकर रही। कुछ साल पहले जब मेरी शादी परिणीता से हुई, तो उसे भी मेरे अंदर की औरत कभी पसंद न आयी। हम दोनों पति-पत्नी US में डॉक्टर बन गए। पर मेरे अंदर की औरत हमेशा बाहर आने को तरसती रही। किसी तरह मैं अपने अरमानों को घर की चारदीवारियों के बीच सज संवर कर पूरा करती थी। पर आज से ३ साल पहले ऐसा कुछ हुआ जो हम दोनों को हमेशा के लिए बदल देने वाला था। उस सुबह जब हम सोकर उठे तो हम एक दूसरे में बदल चुके थे। मैं परिणीता के शरीर में एक औरत बन चुकी थी और परिणीता मेरे शरीर में एक आदमी। हमारा पहला दिन अपने नए रूप को  समझने में बीत गया। और हमारी पहली रात, हमारी सुहागरात उसके बारे में तो पहले ही बहुत बातें कर चुकी हूँ| अब मैं रिश्ते में पत्नी बन चुकी थी और परिणीता पति| इसके बाद, अगला दिन शुरू हुआ जब हमें काम पर हॉस्पिटल जाना था| अब आगे –

हम दोनों घर से निकल कर हॉस्पिटल काम पर जाने को तैयार थे| हम दोनों एक दुसरे का हाथ पकडे कार की ओर चल पड़े| मेरे कंधे पर मैंने लेडीज पर्स टंगा रखा था| यूँ तो मैंने यह कल भी किया था पर आज मैं कल से ज्यादा कॉंफिडेंट औरत थी| सच कहूं तो मुझे अब तक पता नहीं था कि उस पर्स में आखिर परिणीता क्या क्या रखा करती थी| पर अब वो मेरा पर्स हो गया था! और परिणीता मेरा पुरुष वाला बटुआ पैंट की जेब में रख कर चल रही थी? या चल रहे थे? चल रहे थे ज्यादा सही होगा। क्योंकि वो अब आखिर पति है मेरे! मैं तो अपने स्त्री वाले तन में बेहद खुश थी| किसी नाज़ुक कली की तरह महसूस कर रही थी खुद को! अच्छा हुआ जो कल हम दोनों ने अपनी सुहागरात मना ली थी| उस वजह से आज चलते वक़्त मन में कामुकता थोड़ी कम थी और मैं अपने तन और सौंदर्य को प्यार से अनुभव कर पा रही थी| सालो से औरत बन कर बाहर खुली हवा में घुमने की तमन्ना थी पर वो ऐसी पूरी होगी मैं कभी सोची भी नहीं थी| यदि मेरी तरह किसी का लिंग अचानक ही बदल जाए तो उनके जीवन में कई परेशानियाँ आएँगी, पर उन सबसे निश्चिन्त मैं तो बेहद खुश थी इस परिवर्तन से| मेरे पति परिणीता भी खुश लग रहे थे| पर शायद मैं अपने स्वार्थ में खो गयी थी जो उनके मन को उस वक़्त पढ़ न सकी थी| यह सब बाद में बताऊंगी|

पहले पति होने की वजह से मेरी आदत थी कि कार हमेशा मैं ही चलाती थी| आज भी वही करने वाली थी पर परिणीता ने मुझे रोका और कहा, “रुको ज़रा| आज मैं पति हूँ तुम्हारा, कार मुझे चलाने दो”| हाय, मैं कितनी खुश हुई यह बात सुनकर आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते| परिणीता मुझे पत्नी होने का सुख दे रहे थे| मैं ख़ुशी से पैसेंजर सीट पर बैठ गयी| चलने के पहले मैंने कहा, “सुनो जी! पति सिर्फ कार ही नहीं चलाते, अपनी पत्नी की तारीफ़ भी करते है! लगता है आपको पति की जिम्मेदारी सिखने में थोडा समय लगेगा|” वो मुस्कुराये और कहा, “तुम बेहद खुबसूरत लग रही हो!” मैंने कहा, “चलो झूठे, सच्ची तारीफ़ करो तो माने!” मेरी बात सुनकर वो बोले, “हम्म, शायद मुझे पति होना क्या होता है सिखने में समय लगेगा, पर तुम पहले ही परफेक्ट पत्नी बन चुकी हो!” उनकी बात सुनकर हम दोनों हंस पड़े और अपनी मंजिल की ओर चल दिए| सुहानी सुबह में बाहर सब कुछ सुन्दर लग रहा था| शायद सब कुछ पहले से ही था बस मैं एक नयी नज़र से दुनिया को देख रही थी| आखिर अब मैं आज़ाद थी, एक आदमी एक पति होने के बंधन से मुक्त जो हो गयी थी |

जल्दी ही हॉस्पिटल आ गया| पहले जब मैं पति थी तो कार से निकल कर काम पर जाने के पहले हमेशा परिणीता को किस करती थी| पर अब तो मैं औरत थी, अब भला मैं कैसे आगे बढ़कर अपने पति को चुमू? पर मेरे होंठ तो तरस रहे थे| शायद परिणीता ने मेरे मन को भांप लिया था, वो मेरी ओर पलते, मेरे चेहरे को अपने हांथो में लेकर उन्होंने मुझे बड़ा प्यार भरा चुम्बन दिया| अब मैं भला कहाँ रुकने वाली थी? मैंने भी बढ़कर अच्छे से उन्हें ज़ोरो से चुम्बन दिया| औरत के होंठो पे जो गज़ब सी अनुभूति होती है मैं तो उसको एक बार फिर अनुभव करना चाहती थी| क्या कहूँ मैं अपने पति से एक पल भी दूर नहीं रहना चाहती थी। उनके तन से लगकर हमेशा एक बने रहने की ख्वाहिश थी।

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काम पर जाने के पहले मैंने भी उन्हें बड़े प्यार से चुम्बन दिया । मैं उनसे एक पल भी दूर नहीं रहना चाहती थी

उसके बाद उन्होंने मुझसे कहा, “प्रतीक, आज हॉस्पिटल में तुम्हे सभी परिणीता कहेंगे और मुझे डॉ प्रतीक| दिल में एक डर भी है। प्रतीक, आज सब ठीक होगा न?” वो शायद थोड़े से इस नयी परिस्थिति से घबराये हुए थे, और शायद उनके अन्दर की परिणीता कह रही थी जो अपने पति प्रतीक का सहारा चाहती थी| मुझे इस बात का अहसास हो गया था| कुछ देर के लिए मेरे अन्दर का आदमी जाग गया जो अपनी पत्नी को सहारा देना चाहता था| मैंने कहा, “परी, तुम तो बेहद हिम्मतवाले हो| मुझे यकिन है कि सब ठीक होगा|” मैंने उन्हें गले लगाया| उसके बाद उन्हें अच्छा लगा और वो अपने (यानि डॉ प्रतीक) के कैबिन की तरफ चल दिए| मेरा नया केबिन (यानि डॉ परिणीता का केबिन), उनके यहाँ से ज्यादा दूर नहीं था| मैं भी वहां चल दी| अब ज़रा परिस्थिति का अहसास हुआ| और मेरे पैर डर से कांपने लगे|

मेरे कैबिन पहुँचते ही मुझे मेरी असिस्टेंट नतालिया मिली| मुझे तो उसका नाम तक पता नहीं था पर परिणीता की याददाश्त मेरे पास थी इसलिए उसका नाम याद आ गया| हमारी बातें इंग्लिश में हुई पर मैं हिंदी में बताती हूँ|

“हाय नतालिया| गुड मोर्निंग”, मैंने मुस्कुराकर कहा|

“गुड मोर्निंग डॉ. परिणीता| वाह आज तो आपके चेहरे पे नयी दमक दिख रही है!”, नतालिया बोली| मैं मन ही मन खुश हुई और बोली, “कैसी दमक?” “डॉक्टर, वही दमक जो सुहानी रात के बाद चेहरे पे दिखती है| लगता है डॉ. प्रतीक की किस्मत कल काफी अच्छी रही”, नतालिया मसखरी कर रही थी| औरतें ऐसी बातें आपस में करती है मुझे अंदाज़ा न था| मैंने जवाब में कहा, “डॉ. प्रतीक से ज्यादा मैं किस्मत वाली रही, अगर तुम समझ रही हो मेरी बात?” कहकर मैं हँस दी| नतालिया मेरी ओर आश्चर्य से देखती रह गयी| मैं सोच में पड़ गयी कि वह मेरी ओर ऐसे क्यों देख रही थी| तब मेरे दिमाग से आवाज़ आई, “इडियट, अपनी असिस्टेंट को यह कहने की क्या ज़रुरत थी? वो तो मसखरी करती ही रहती है|” पर वो आवाज़ मेरी नहीं थी| वो आवाज़ इस शरीर में चल रहे परिणीता के दिमाग की थी! आखिर यह शरीर यह दिमाग और उसमे सारी यादें परिणीता की ही थी, जिसमे अब मैं अपनी नयी यादें जोड़ रही थी| इसी कारण अब मैं जब भी कुछ करती तो पहले परिणीता का दिमाग कुछ कहता जिसमे सालो की कुछ आदतें थी, और मेरा मन कुछ और कहता| कभी परिणीता का दिमाग जीत जाता तो कभी मेरा मन| पर धीरे धीरे मेरा मन परिणीता के दिमाग को बदल रहा था| पर फिलहाल तो यह बस दूसरा दिन था इस बदन में| और अब तक परिणीता का दिमाग पूरी तरह मेरे वश में न था।

दिन में कई मरीज़ आये मेरे ऑफिस में| मुझे कई बार एहसास हुआ कि कुछ पुरुष मरीज़ मेरे स्तनों की ओर घूरने लगते| मुझे थोड़ी शर्म सी आ रही थी| अच्छा हुआ मेरी ड्रेस से मेरा उपरी हिस्सा गले तक ढंका हुआ था और बाकी का तन डॉक्टर के सफ़ेद कोट से| पर फिर भी स्तनों का आकार ड्रेस में अच्छी तरह से उभर कर आ रहा था। शायद मेरी ब्रा का असर था कि मेरे स्तन काफी बड़े लग रहे थे। यदि आदमियों की निर्लज्जता परेशान करने वाली थी तो औरतें भी कम नहीं थी। औरतें जब आती तो वो तो अपनी पूरी जीवन की कहानी सुनाने बैठ जाती| जब तक मैं आदमी थी, ऐसा कुछ नहीं होता था| मरीज़ काम की बात करते थे, और मैं भी| जल्दी जल्दी सब कुछ हो जाता था| पर मुझे औरत देख कर न जाने क्यों औरतें लम्बी कहानियाँ सुनाने लगती|

एक औरत जो अपनी बेटी को दिखाने आई थी वह  मुझसे बोली, “तीन तीन बच्चे सँभालने में मेरा दिन निकल जाता है, पर माँ होने का सुख भी तो बहुत है| आप भी तो माँ होंगी न?” मैंने कहा, “नहीं, अब तक नहीं|” मैं इस बारे में बात नहीं करना चाहती थी पर वो मुझसे कहती है, “क्यों? कितनी उम्र है आपकी?” मैं बोली, “३०| आप ये दवाई अपनी बेटी को दिन में दो बार दीजियेगा। ” मैंने उन्हें दवाई के नाम लिख कर दिए| “आप ३० साल की है? और अब तक बच्चे नहीं? कोई परेशानी?”, औरत ने पूछा| मुझे बेहद गुस्सा आने लगा पर किसी तरह काबू करके बोली, “मेरे अगले मरीज़ का समय हो गया है| धन्यवाद्|” उफ़ क्या चिपकू औरत थी जैसे औरत का काम सिर्फ बच्चे पैदा करना है| हम्म कुछ देर सोचने पर मुझे माँ बनने का ख्याल थोडा अच्छा लगा पर अभी मैंने औरत का जीवन जीया ही कितना था| और यह भी नहीं पता था कि कब मैं दोबारा पुरुष बन जाऊंगी| हम पति पत्नी का शरीर परिवर्तन अब तक एक अनसुलझी पहेली था|

कुछ और मरीज़ देखने के बाद लंच का समय हो गया| जैसे ही समय हुआ मैं पतिदेव के कैबिन चली गयी और वहां जाते ही कैबिन का दरवाज़ा अन्दर से बंद कर दी| उनको देख कर उन्हें गले लगाऊं या अपने दिल की भड़ास निकालू, समझ नहीं आया।

“ओह माय गॉड| इतना ख़राब दिन जा रहा है मेरा! जाहिल आदमी मुझे, तुम्हारी पत्नी, को घूरते है और औरतें अपनी बेकार की बातें बंद ही नहीं करती| उनकी वजह से मेरा काम इतना धीरे हो रहा है|”, मैं अपनी भड़ास परिणीता यानी मेरे पति पर निकाल रही थी| वो मुस्काए और बोले, “मेरा दिन तो बहुत अच्छा रहा| इतने सारे मरीज़ मैंने पहले कभी इतने कम समय में पूरे नहीं किये थे|” हम दोनों को अब कुछ समझ आ रहा था| मैं एक औरत होने का चैलेंज देख रही थी और परिणीता एक आदमी होने का फायदा देख पा रही थी| यह तो सिर्फ शुरुआत थी, मुझे और भी कई सारी बातें सीखनी थी औरत होने के बारे में| वहीँ परिणीता तो खुश लग रहे थे| उन्होंने मुझे अपनी गोद में बैठा लिया| उनकी गोद में बैठ कर मैंने कहा, “परी प्लीज़ बोलो तुम मुझे प्यार करते हो? और मुझे खुश करो प्लीज़! आखिर पत्नी हूँ तुम्हारी! ” यह क्या कर रही थी मैं? मैं ऐसी तो नहीं थी? शायद परिणीता वाला दिमाग मुझ पर हावी था| उन्होंने मुझे कहा कि वो मुझसे बेहद प्यार करते है| उनकी बात सुनकर मैं खुश हो गयी|

“पता है आज एक औरत मुझसे कहती है कि मेरे अब तक बच्चे क्यों नहीं है? मैं माँ क्यों नहीं बनी? तुम सोच सकते हो?”, मैं उनसे बोली| “हाहा”, वो हँस दिए और बोले, “अरे ये औरतें यह सब कहती रहेंगी| तुम उनकी बातों को अनसुना कर देना या कह देना कि तुम प्लान कर रही हो| यकीन करो जल्दी ही ये बातें सुनने की तुमको आदत हो जायेगी| ये औरतें तो ठीक है पर जब तुमसे मेरी माँ या अपनी माँ से बात करोगी और वो तुमसे यह कहेंगी, तब क्या करोगी?”, उन्होंने कहा| हाय, मेरी माँ तो मुझे अब अपना बेटा नहीं अपनी बहु समझ कर यह बोलेगी| मुझे तो सोच कर ही बेहद अजीब लग रहा था| सोचते सोचते मैं अपनी उँगलियों से अपने मंगलसूत्र के साथ खेल रही थी। औरतें नर्वस हो जाए तो ऐसा करती है, और मैं भी बिना सोचे ही यह कर रही थी।

“क्या कभी मेरी या तुम्हारी माँ ने  तुमसे बच्चो के बारे में कुछ कहा था? जब तुम औरत थे?”, मैंने परिणीता से  पूछा| “कभी? अरे जब भी बात करो तब| तुम्हारी माँ से ज्यादा मेरी माँ पीछे पड़ी थी कि मेरी उम्र बीती जा रही है| जल्द से जल्द उन्हें नाती चाहिए।  चलो अब तुम्हे यह सुनने को मिलेगा! अब तुम निपटो!”, परिणीता ने कहा| “मैं क्या करूंगी?”, मैं सोचने लगी| पर उन्होंने मेरा हाथ पकड़ कर लंच के लिए बाहर ले गए| वो भी अब जेंटलमैन बन रहे थे| मुझे बेहद प्यार से रख रहे थे वो|

किसी तरह फिर दिन का काम ख़त्म हुआ| और घर पहुँचते ही मैंने ड्रेस बदल कर एक घरेलु साड़ी पहन ली| परिणीता तो मुझे ऐसे झट से साड़ी पहनते देखते ही रह गए| वो खुद जब औरत थे तब तो वो साल में २ या ३ बार ही साड़ी पहनते थे और वो भी बहुत समय लगा कर! मुझे साड़ी में देख कर उनकी आँखों में प्यार तो था पर कुछ और विचार भी थे, जो उस वक़्त मैं पढ़ न सकी थी| मैं तो ख़ुशी ख़ुशी उनके लिए खाना बना रही थी| मेरे हाथ का बना खाना खाकर वो बेहद खुश हुए| सच में पत्नी को जब पति को संतुष्ट देखने का अवसर मिलता है तो खुद पत्नी का मन भी संतोष अनुभव करता है| खाने के बाद हम सोफे पर बैठ गए| मैं  उनके सीने पे सर रख कर बैठी हुई थी| और  हमने साथ टीवी में एक प्रोग्राम देखा| कुछ देर बातें की| हँसे खेले| उनको मौका मिलने पर मेरे स्तनों को छेड़ना न भूलते थे| पत्नी होने का भरपूर मज़ा ले रही थी मैं| और वो भी बेहद अच्छे पति होने का रोल अदा कर रहे थे| उन्होंने हर पल मुझे बेहद प्यार दिया|

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घर आकर मैंने साडी पहन ली और एक अच्छी पत्नी की तरह खाना बनाने लग गयी। मैं परिणीता को इस बदलाव की वजह से कोई दिक्कत नहीं आने देना चाहती बल्कि उन्हें सारे सुख और आराम देना चाहती थी।

और इन सबके बाद, मैं एक लम्बी सी सैटिन नाईटी जो की स्लीवेलेस थी, वह पहन कर उनकी बांहों में सोने आ गयी| मखमली बदन पे सैटिन का अहसास, वो भी पति की बांहों में, अद्वितीय है| आश्चर्य था कि पूरे जीवन औरतों की तरह आकर्षित रहने के बाद मैं इतनी आसानी से एक पुरुष के इतने करीब आ चुकी थी| मैं एक पुरुष से प्यार करने लगी थी| पर पुरुष का तो सिर्फ तन था, आखिर अन्दर तो मेरी परिणीता ही थी| काश कि मैं उसके दिल की बात पहले पढ़ सकी होती, तो आगे जो होने वाला था उस बारे में मैं पहले ही कुछ कर पाती| पर उस वक़्त तो मैं अपने पति की बांहों में एक सुखी पत्नी की नींद सो गयी|

To be continued …

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