A night to remember

रूममेट: भाग २


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मेरी कैलिफ़ोर्निया की हवाई यात्रा अब भी काफी लम्बी बाकी थी. मुझे अब भी सालो पुरानी वो रात याद आ रही थी जब चेतना से मेरी पहली मुलाकात हुई थी. सचमुच अद्भुत रात थी वो! पहली रात जब मैंने पहली बार किसी औरत को प्यार दिया था, और मेरी किस्मत ऐसी की वो औरत औरत होकर भी औरत न थी. चेतना मेरा ख़ास दोस्त चेतन था जो साड़ी में लिपटा हुआ किसी औरत से कम नहीं था. “पर क्या इस बात से फर्क पड़ता है कि चेतना वास्तविकता में औरत नहीं थी?” जब दो दिल मिलते है तब ऐसे सवाल का कोई तुक नहीं बनता. आखिर में मैंने जिसे प्यार किया था वो दिखने और व्यवहार में तो औरत ही थी.  प्यार में कोई सीमा नहीं होती और उसका जेंडर से कोई लेना देना नहीं होना चाहिए.  पर यह बोलना आसान है. उस वक़्त तक चेतना से मुझे दिल से प्यार नहीं हुआ था, हम दोनों तो केवल जिस्म की आग में तड़पते दो बदन थे जो एक दुसरे को आलिंगन किये हुए थे. इसलिए यह सवाल मुझे अगले दिन झकझोरता रहा.

अगली सुबह  जब नींद खुली तो देखा कि चेतना अब भी मेरी बांहों में थी. सुबह सुबह उठने पर एक औरत का तन जब आपकी बांहों में आपके तन से लगकर हो, उसकी फीलिंग ही कुछ ख़ास होती है. साड़ी में लिपटी नींद में आँखें बंद की हुई चेतना अब भी सुन्दर लग रही थी. मुझसे बिलकुल चिपक कर सोयी हुई थी वो. मेरी बांहों में ऐसे जैसे सारी दुनिया की चिंता से मुक्त हो निश्चिन्त थी वो. पर चेतना एक साधारण औरत नहीं थी, वो मेरा ख़ास दोस्त चेतन था, जो एक क्रॉस-ड्रेसर था. कल रात मैंने पहली बार चेतन का यह रूप देखा था. और मैंने एक ऐसी औरत के साथ शारीरिक सम्बन्ध स्थापित किया था जो औरत ही नहीं थी. उस रात के बाद की सुबह होश आया तो मेरा दिमाग सोचने पर मजबूर हो गया था कि जो रात के अँधेरे में हमने किया क्या वो सही था?

सुबह उठने पर मेरा नशा उतर गया था. अब हॉर्मोन भी मुझे उत्तेजित नहीं कर रहे थे. चेतना अब भी मेरी बगल में थी, या था? टाइट ब्लाउज में उफ़ कितनी आकर्षक लग रही थी वो. उसकी नग्न पीठ देख कर मेरा मन उसे चूमने को होने लगा था. साड़ी में लिपटी हुई बेहद सेक्सी लग रही थी और चाहकर भी मैं उसे छूने से खुद को रोक नहीं पाया. मेरे स्पर्श से शायद उसकी नींद खुल रही थी. मैं कुछ देर रूककर उस औरत को एक टक देखता रहा. कितनी सुन्दर थी वो!

मेरा दिल दिमाग तो एक सवाल से विचलित था. क्या मैं गे हूँ? आप मेरी जगह होते तो आपको भी ऐसा ही लगता, खासतौर पर यदि आप जीवन भर स्त्रियों की तरफ आकर्षित रहे हो. यह सवाल मन में आते ही मेरा बिस्तर से उठकर भागने का मन हुआ.

इसी विचार में मैं बिस्तर से उठ खड़ा हुआ. चेतना की भी मेरी हलचल से नींद खुल गयी थी. उसकी आँखों में अब भी नींद थी. वो अब भी बहुत आकर्षक लग रही थी. उसने एक प्यारी सी अंगडाई ली. सुबह सुबह जब एक औरत उठती है और उसके बाल और कपडे बिखरे हुए होते है, तब भी उसमे एक ख़ास आकर्षण होता है. उसका यह रूप दर्शाता है जैसे वो सिर्फ आपकी है. उसने अपना सर्वस्व आप पर न्योंछावर किया है, तो उसका हक़ बनता है कि पुरुष उसे ख़ास महसूस कराये. चेतना की आँखों से भी यही पता चल रहा था कि वो मुझे एक बार फिर गले लगाना चाहती है, सुबह सुबह एक गुड मोर्निंग किस चाहती है मुझसे. उसकी आँखें मेरे प्यार को, मेरे स्पर्श को तरस रही थी, सेक्स की वजह से नहीं, बल्कि प्यार की चाहत में.

चेतना सुबह सोते हुए भी बेहद आकर्षक लग रही थी. मैं तो उसे चूम लेना चाहता था.

पर उसकी नशीली आँखों को अनदेखा कर मैंने कहा, “मुझे अब चलना चाहिए. जल्दी नहाकर ऑफिस निकलना होगा मुझे”. मेरे मन में क्या चल रहा है मैं चेतना को बताना नहीं चाहता था.

“ऐसी भी क्या जल्दी है निशांत?”, चेतना ने मुझसे कहा. “प्लीज़ कुछ देर मेरे पास आकर बैठो. मेरे साथ सुबह का थोडा भी समय नहीं बिताओगे?”, चेतना ने मेरी ओर पलट कर कहा. उसकी साड़ी उसके स्तन पर फिसल रही थी. उसने अपने ब्लाउज को साड़ी से छिपाने की कोशिश की, पर उसकी रेशमी साड़ी टिकती न थी. मैं उसके ब्लाउज की ओर देखता रह गया. बहुत मादक लग रही थी चेतना. उसने मुझे घूरते हुए देखा तो वो थोड़ी शर्मा सी गयी.

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जब मैं उठा तो चेतना भी जाग गयी थी. उसने मेरी ओर हसरत भरी निगाहों से देखा जैसे एक गुड मोर्निंग किस चाहती हो.

पर मैंने अपना मन बना लिया था. मैं अपनी पेंट चढाते हुए वहां से निकलना चाह रहा था. उसे भी एहसास हो गया था की मैं अब रुकने वाला नहीं हूँ. वो भी बिस्तर पर उठ बैठी. चेतना अपनी साड़ी से अपने पैरो को ढंकने लगी.रात को हमारे प्यार करने के बाद उसकी साड़ी बेतरतीब हो गयी थी. अपने पैरो को ढंकने के बाद उसने अपने आँचल से अपने सुन्दर वक्ष और ब्लाउज को ढंका. सुबह सुबह उसकी इस अदा के साथ किसी परी की तरह लग रही थी वो, जिसकी आँखें नशीली थी और मुस्कान बेहद मोहक. “अच्छा, कम से कम यह तो बता दो कि कल रात कैसा लगा तुम्हे?”, उसने फिर अपने नशीले अंदाज़ में कहा. उसे कुछ प्यार भरे शब्द चाहिए थे ताकि वो महसूस कर सके की वो एक ख़ास औरत है, न कि एक सेक्स ऑब्जेक्ट.

मैं उसकी ओर कुछ देर देखता रह गया. और फिर खुद को संभालते हुए उससे कहा, “बहुत सुन्दर रात थी चेतना. पर अब हमें ऑफिस के लिए देर नहीं करनी चाहिए”, मैं बात बदलना चाहता था.

वो मेरी आँखों में अब भी देख रही थी. उसकी आँखों में एक तड़प थी मेरे एक प्यार भरे चुम्बन के लिए. जिस औरत ने रात भर अपना जिस्म आप पर न्योछावर किया हो, उसका इतना हक़ तो बनता है. पर मैं उसके तरसते होंठो को यूँ ही तड़पता छोड़ कर उस कमरे से निकल आया. और वो मुझ निष्ठुर को असहाय ही जाते हुए देखती रह गयी.

मैं अपने कमरे में आकर नहाने चला गया और फिर ऑफिस जाने के लिए तैयार होने लगा. पर मेरा दिमाग विचलित था. कल कहाँ मैं अपने दोस्त चेतन को मनाने की सोच कर आया था, और कहाँ मैं चेतना के साथ सेक्स कर बैठा. कहाँ मैं अपने दोस्त के क्रॉस-ड्रेसर होने की वजह समझना चाह रहा था और कहाँ मेरा खुद पर ही डाउट होने लगा. क्या मैं गे हूँ? यह सवाल मेरे मन में मुझे परेशान किये जा रहा था. मैंने तो कभी किसी पुरुष के बारे में ऐसा सोचा न था, मुझे हमेशा औरतें अच्छी लगती थी और लगती है. पर कल मैं जिस औरत के साथ शारीरिक सम्बन्ध स्थापित किया था, वो औरत ही नहीं थी. पर किसी औरत से कहीं से कम भी तो नहीं थी चेतना? उसकी लचकती कमर और कातिल अदाएं मेरी आँखों के सामने घुमने लगी. मैं इस रात को भूल जाना चाहता था. इतना आसान नहीं था इस रात को समझना.

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जब मैं घर से निकला, चेतना किचन में कुछ कर रही थी.

किसी तरह तैयार होकर मैं चेतन के बगैर ही ऑफिस के लिए निकल गया. वैसे भी ऑफिस में मुझे बहुत काम था. दिन भर एक ही ऑफिस में होते हुए भी मैं चेतन से मिला नहीं, और मेरी उससे मिलने की इच्छा भी न थी. पर शाम को चेतन खुद ही मेरे पास आया. कहने की ज़रुरत नहीं है पर हम दोनों के बीच एक सेक्सुअल टेंशन थी.

“निशांत यार. बहुत हुआ काम. अब घर चला जाए?”, चेतन ने मुझसे कहा. “सॉरी यार, आज काफी काम बचा है. मैं आधे घंटे और ऑफिस में रुक कर कुछ काम निपटाता हूँ. तू आज अकेले ही निकल जा घर.”, मैंने कहा. मैं चेतन की ओर देख नहीं सका. मुझे अब भी उसकी जगह चेतना दिखाई दे रही थी. चेतना का साड़ी में लिपटा हुआ लहराता शरीर मेरे दिमाग से बाहर जा ही न रहा था. और मैं चेतन से बात करके अपने मन के द्वन्द को और उलझाना नहीं चाहता था. बहुत अजीब अवस्था थी. मेरा दोस्त मेरी नज़रो में एक आकर्षक औरत बन चूका था.

“कोई बात नहीं, घर में मिलकर बात करते है हम”, चेतन ने मुझसे कहा. उसने एक मुस्कान दी. मुझे ऐसा लगा जैसे उसकी मुस्कान में कोई एक सन्देश था. क्या चेतन फिर से कल की तरह रात बिताना चाहता है? चेतन आखिर कल की रात को इतनी आसानी से कैसे भुला सकता है? क्या चेतन गे है? क्या मैं गे हूँ? मेरा सर घुमा जा रहा था इन सवालों में. पिछले २४ घंटो में कितना कुछ बदल गया था. मुझे न सिर्फ पता चला कि मेरा दोस्त क्रॉस-ड्रेसर है, बल्कि मैंने उसके साथ शारीरिक सम्बन्ध भी स्थापित कर लिए थे. मैं अपने दिमाग से सब कुछ भुलाना चाहता था पर इतना आसान भी तो नहीं था यह सब.

मैं ऑफिस में और आधे घंटे रुक कर काम करता रहा. उसके बाद निकल कर मैंने एक सिगरेट जलाई और घर की ओर चल पड़ा. करीब ४५ मिनट लगे होंगे मुझे उस रास्ते पर सब सोचते हुए समय न जाने कैसे निकल गया था. मैं चेतन से मिलना नहीं चाहता था पर अपने रूममेट से मिले बगैर कैसे रहता मैं?


मैं घर पहुच कर सीधे किचन की ओर बढ़ गया. मैंने सोचा की आज रात कुछ खाना बना लेता हूँ. मैं किचन में एक प्याज और कुछ आलू निकाले. सोचा कुछ देर ही सही, खाना बनने के बहाने मैं चेतन से बात करने से बच सकता हूँ.

“निशांत, तुम आ गए?”, मुझे दूर से एक आवाज़ आई. “निशांत”, एक बार फिर आवाज़ आई. मैंने पीछे मुड़कर देखा इस उम्मीद में कि शायद चेतन होगा पर वहां चेतन न था. मैंने चेतन के कमरे में झाँककर देखा जहाँ दरवाज़ा खुला हुआ था.

मैं उस कमरे में देख कर आश्चर्यचकित रह गया, मुझे ऐसा अनुभव तो नहीं होना चाहिए था. पर चेतन वहां एक नयी साड़ी पहन कर इठला रहा था. किसी हाउसवाइफ की तरह, वो भी बेहद आकर्षक. एक औरत की तरह शीशे में खुद को निहार रहा था वो. उसने अपने ब्लाउज को साड़ी से ढंककर देखा, पर साड़ी फिसलती जा रही थी. वो कितनी भी कोशिश करता, उसका ब्लाउज खुला ही रहता. One open One closed या O3C मैं ऐसी औरतों के बारे में मज़ाक में कहता था जिनका एक स्तन साड़ी के बाहर दिखा करता था.

किसी औरत को संजते सवारते देखना बेहद सुखद होता है. औरतें जितनी प्यार से अलग अलग तरह से पोस कर खुद को निहारती है, बेहद आकर्षक होता है वो पल. चेतना भी वोही कर रही थी. कभी पल्लू को कमर पर लपेटती, तो कभी खुला पल्लू रखती, वो तय नहीं कर पा रही थी कि वो क्या चाहती है. कभी बालों को खुला रखती, कभी लम्बे बालो को एक ओर करके खुद को निहारती, कभी पीछे खुले छोड़ देती. उसकी एक एक अदा दिल को उकसाने वाली थी. उसकी बड़ी सी नितम्ब उस मखमली साड़ी में लिपट कर चमकती हुई मुझे उतावला कर रही थी. एक घरेलु साड़ी में भी चेतना बहुत आकर्षक औरत थी.

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चेतना एक औरत की तरह शीशे के सामने कई तरह से खुद को निहारती रही. [Image Credit: Nikkie Dominoes]
मैं उसे कुछ देर तक यूँ ही देखता रहा. अचानक चेतना को अहसास हुआ कि मैं कुछ देर से उसे यूँ ही देख रहा हूँ. उसे शायद पता चल गया था कि वो मुझे कितनी आकर्षक लग रही है. वो मुझे देख कर तुरंत खुद को साड़ी में लपेट कर ढंकने लगी. पल्लू खुला कर उसने पल्लू को सामने खिंच अपनी कमर में ठोंस्ते हुए उसने कहा, “माफ़ करना, यह साड़ी मुझसे संभल ही नहीं रही. मैं नहीं चाहती थी कि तुम मुझे इस तरह देखो जब मैं अच्छे से तैयार भी नहीं हूँ. मैं तुम्हारे लिए परफेक्ट दिखना चाहती थी.” पर मेरी नज़रो में तो वो परफेक्ट थी. घर आकर एक औरत को अपने लिए सजते संवारते देख कर मुझे एक ख़ुशी महसूस हो रही थी. पर उसे देख कर हॉर्मोन भी उतावले होने लगे थे. मैं चेतना को कसकर सीने से लगा लेना चाहता था. पर खुद पे काबू करना ज़रूरी था. मैंने चेतना से कुछ न कहा.

चेतना मेरे करीब आने लगी. उसे पास आते देख कर मेरे दिल की धड़कने तेज़ होने लगी थी. उसे बांहों में पकड़ने की ललक बढती जा रही थी. उसे सीने से लगाकर उसके स्तनों को मसल देने को मेरे दिल उतावला होने लगा. पर मैं कुछ करने की हिम्मत न कर सका. वो मेरे बहुत करीब आ गयी. इतने करीब की वो मेरी साँसों को महसूस कर सकती थी. उसने आकर मेरा हाथ अपने नाज़ुक हाथो से पकड़ा और कहा, “आज मैं हम दोनों के लिए खाना बनाती हूँ. क्यों न तुम बाहर जाकर टीवी देखो और कुछ देर आराम कर लो? तुम इतनी मेहनत करते हो, तुम्हे थोडा आराम करना चाहिए. खाना बनाना मुझ पर छोड़ दो.” खाना बनने की तयारी के लिए उसने पहले ही अपनी साड़ी का पल्लू कमर में ठोंस रखी थी, और अब उसने अपने बालो का जुड़ा भी बना लिया था. बिलकुल हाउसवाइफ बन चुकी थी चेतना. उसके कसे हुए ब्लाउज में उभरे हुए उसके स्तन मुझे चूमने के लिए लालायित कर रहे थे. मैं सेक्स के बारे में सोचना तो नहीं चाहता था पर चेतना का आकर्षक शरीर मुझे उत्तेजित किये जा रहा था.

“तुम चिंता मत करो,मैं आज खाना बना सकता हूँ …. चेतना”, मैंने कहा. मैं चेतना का नाम नहीं लेना चाहता था. “तो क्या तुम मेरे साथ खाना बनाना पसंद करोगे?”, चेतना ने मुस्कुराते हुए मेरे करीब आकर कहा. क्या वो मुझे छेड़ रही थी? चाहती क्या थी वो? मुझे यह आईडिया ठीक नहीं लगा कि वो और मैं एक ही कमरे में रहे जब मैं उसकी तरफ इतना आकर्षित हो रहा था. “नहीं… आज तुम ही खाना बना लो. मैं. … मैं …. जाकर टीवी देखता हूँ. मैं फिर कभी बना लूँगा.”, मेरे होंठो से जैसे शब्द गायब हो गए थे. चेतना की सुन्दरता से मेरे होश उड़ रहे थे. वो भी शायद मेरी स्थिति समझ रही थी. वो हँस पड़ी मेरी अवस्था पर जैसे वो मुझे तडपाना चाहती थी. पर मैं आज हॉर्मोन के उन्माद में और कुछ गलत नहीं करना चाहता था.

मैं बाहर के कमरे में आकर टीवी देखने लगा. वहां से मुझे किचन में चेतन/चेतना खाना बनाते दिख रहा था. साड़ी पहने और सर पे जूडा बाँध कर वो बिलकुल गृहिणी लग रहा था. रोटी बेलते हुए उसके हाथो की चूड़ियों की खनक मेरे कानो पर पड़ रही थी. गैस की गर्मी में बीच बीच में वो अपने बालो को पीछे करते हुए अपने पल्लू से जब वो अपना पसीना पोछता तो बिलकुल औरत की तरह लगता. सच कहूं तो साड़ी में लिपटे उसके गोल मुलायम कुल्हे(hips) मुझे उसकी तरफ आकर्षित कर रहे थे. पर मेरे मन में वैसे भी बहुत कुछ चल रहा था. मैं टीवी पर ध्यान लगाने की कोशिश करता रहा पर नज़रे बार बार किचन की उस औरत पर पड़ रही थी, जो साड़ी पहना हुआ मेरा दोस्त चेतन था, या चेतना नाम की लड़की, मेरा दिमाग तय नहीं कर पा रहा था. उसकी चूड़ियों की खनक मुझे बहुत प्यारी लग रही थी. मैं तो बस इतना जानता था कि वो लड़की मुझे बहुत आकर्षक लग रही थी. मैं तो बस उसे अपनी बांहों में ले लेना चाहता था.

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जब चेतना ने देखा की मैं उसकी तरफ घुर कर देख रहा हूँ, उसने झट से पलट कर खुद को अपनी साड़ी में लपेटने लगी.

कुछ देर बाद चेतना किचन से बाहर आयी. उसके चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान थी. आज फिर उसने गहरी रंग की लिपस्टिक लगाया हुआ थी. पर मेरा ध्यान उसकी नग्न कमर पर चला गया. खाना बनाते वक़्त गर्मी से उस पर पसीने की कुछ बूँदें आ गयी थी. यह भी भला आकर्षक लग सकता है, कभी मैंने सोचा नहीं था. मैं उसकी कमर को चूमना चाहता था.

चेतना ने अपनी साड़ी के पल्लू को आगे करते हुए अपनी कमर पर लपेट दिया और फिर मुझसे कहा, “सुनो निशांत, खाना तैयार हो गया है. मैं टेबल पर लगा देती हूँ. तुम भी आ जाओ” साड़ी में उस औरत के चेहरे पर अब भी बड़ी सी मुस्कान थी, जैसे अपने पति और बच्चो के लिए खाना बनाकर बहुत खुश हो.

मैं कमरे से आकर टेबल पर बैठ गया. चेतना ने आकर मेरे लिए प्लेट लगायी और फिर खाना परोसने लगी. उसके स्तनों से भरा हुआ उसका ब्लाउज ठीक मेरी आँखों के सामने था. उसकी मांसल बाँहें उस ब्लाउज में बड़ी सेक्सी लग रही थी. “मैंने तुम्हारी पसंद की सब्जी बनायीं है आज. तुम्हे गोभी पसंद है न?”, उसने नाटकीयता से कहा जैसे मेरी पत्नी कह रही हो. मैंने हाँ में सर हिला दिया.

खाना परोस कर वह मेरे सामने बैठ गयी. अपने हाथो पर अपना सर रख कर वो मुझे देख कर मुस्कुराने लगी. “खाकर बताओ कैसी बनी है सब्जी?”, उसने फिर बड़ी सी मुस्कान के साथ कहा. बहुत प्यारी औरत थी चेतना. मन ही मन मैं खुश भी हुआ कि इतनी प्यारी औरत मेरे जीवन में आई थी.

“अच्छी बनी है, तुम भी साथ में खाना खा लो.”, मैंने कहा. “हाँ, खाती हूँ. एक बार तुम शुरू कर लो अच्छे से.”, चेतना ने कहा. मेरे दिमाग में एक बार फिर चेतना हावी हो गयी थी. अब मैं फिर से भूल रहा था कि सामने चेतन है. उसने अपने लिए भी थाली लगनी शुरू की. “सच बताओ तुम्हे सब्जी अच्छी लगी न? बड़ी प्यार से बनायीं है तुम्हारे लिए.”, चेतना ने फिर कहा. चेतन एक बार साड़ी क्या पहन ले, पूरी तरह गृहिणी बन जाता है, मेरे दिमाग ने मुझसे कहा.

हम दोनों चुपचाप खाना खाते रहे. वो बीच बीच में मुस्कुरा कर मेरी तरफ देखती. खाना खाने में चेतन और चेतना में बड़ा फर्क था. चेतना बहुत थोडा थोडा खाना खा रही थी, और खाते वक़्त मुंह बिलकुल बंद रखती, बिलकुल लड़कियों की तरह. पता नहीं चेतन ने लड़कियों के यह अंदाज़ सीखे थे या उसके अन्दर हमेशा से ही थे. एक पल को मेरी नज़र चेतना के ब्लाउज पर पड़ी, साड़ी से बाहर निकल कर एक तरफ का उसका स्तन से भरा हुआ ब्लाउज मुझे बेहद सेक्सी लगा. उसने मेरी नज़र को पढ़ लिया था. किसी औरत की तरह उसने अपनी साड़ी को खींचते हुए अपने ब्लाउज को ढँक लिया. फिर मेरी तरफ ऐसे देखने लगी जैसे मुझसे गुस्सा हो. मैं वापस खाना खाने पर ध्यान लगाने लगा. तभी मेरे पैरो पर चेतना के पैरो का स्पर्श महसूस हुआ. शायद वो मुझे छेड़ रही थी. पर मैंने अपने पैर पीछे खींच लिए.

“निशांत, एक बात बोलू?”, चेतना ने कहा. “हाँ, कहो.”, मैंने जवाब दिया.

“तुमने कल कहा था कि मेरी क्रॉस-ड्रेसिंग से हमारी दोस्ती में कोई फर्क नहीं पड़ेगा. पर तुम तो मुझसे बात तक नहीं कर रहे हो.”, चेतना ने कहा. “हाँ, चेतन से मेरी दोस्ती पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा. पर चेतन तो यहाँ है नहीं न?”, मैंने थोड़े से गुस्से में कहा. मैं इस स्थिति को संभाल नहीं पा रहा था.

“ठीक है, चेतन यहाँ न सही. पर मेरे यानी चेतना के बारे में तो बात कर सकते हो न? पता है आज सुबह मुझे कितना बुरा लगा जब तुम मुझे बिस्तर पर यूँ ही छोड़ कर चले गए. एक बार प्यार से गले लगाकर गुड मोर्निंग तो कह देते. मुझे लगा जैसे तुम्हारे तन की भूख क्या शांत हुई, तुमने मेरी परवाह करना ही छोड़ दिया. मैं तुम्हारे लिए जैसे सिर्फ …”

चेतना बोल ही रही थी कि मैंने तमतमाते हुए उसकी बात काट दी. “बस करो चेतना! मैं गे नहीं हूँ. मैं किसी लड़के के साथ सम्बन्ध नहीं बना सकता. हम दोनों के बीच सम्बन्ध नहीं हो सकते.” मैं अपने दिल के अन्दर चलते द्वन्द से थक चूका था. मैंने बेहद ही गुस्से में अपनी बात चेतना से कहा था. पर चेतना के चेहरे पर कोई शिकन तक नहीं थी.

“मुझे लग ही रहा था कि तुम ऐसा ही कुछ सोचोगे. निशांत तुम गे नहीं हो. तुमने कल रात जिसे प्यार किया था वो एक औरत थी, एक ख़ास औरत. तुमने मुझमें औरत को देखा था आदमी को नहीं”, चेतना ने मुझे समझाने की कोशिश की. उसने अपना एक हाथ बढाकर मेरा हाथ पकड़ कर समझाना चाहा.

“पर तुम चेतन? तुमने तो कल आदमी से प्यार किया न? तुम तो गे न थे? फिर ये कैसे? ये कैसा सम्बन्ध है?”, मैंने चेतना से पूछा.

चेतना की आँखें आंसूओं से डबडबाने लगी. “मुझे नहीं पता निशांत!”, वो चीख पड़ी. वो रोने लगी. “मुझे नहीं पता निशांत. कल जिसने तुमसे प्यार किया था वो चेतन तुम्हारा दोस्त नहीं था. वो चेतना थी, एक औरत! जिसको एक पुरुष से प्यार मिला, एक औरत के रूप में पहचान मिली जो उसे कल रात के पहले कभी नहीं मिली थी. और वो उस औरत के रूप में उस पुरुष की तरफ समर्पित हो गयी. मैं कैसे समझाऊँ कि चेतन को लड़कियां पसंद है, और चेतना को…. शायद एक पुरुष”

“अब बस भी करो चेतना. मुझे तो पता भी नहीं कि इस वक़्त मैं चेतन से बात कर रहा हूँ या चेतना से!”, मैंने ऐसे कहा जैसे मुझे उसकी परवाह ही न थी.

“तुम नहीं समझोगे मेरी दुविधा निशांत”, चेतना ने नज़रे झुककर रोते रोते कहा.

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मैं एक निष्ठुर की तरह चेतना को वहां अकेली छोड़ अपने कमरे की ओर चला गया

मैंने जल्दी ही अपना खाना ख़तम किया और प्लेट किचन में ले जाकर रख दिया. चेतना नज़रे झुकाए आंसू बहती रही. बड़ा बेरहम था मैं. मुझे इस तरह लापरवाह बर्ताव करते देख, चेतना उठ कर रोते रोते दौड़ते हुए अपने कमरे में चली गयी. अपने बिस्तर पर लेट कर सर बिस्तर पर गडाए वो सिसकियाँ भरने लगी. मुझे तो अब भी यकीन नहीं हो रहा था कि वो औरत मेरा दोस्त चेतन है. वो इतना इमोशनल हो सकता है? मुझे यकीन नहीं हुआ. पर मुझे अपनी गलती का एह्सास हो रहा था.

शायद मुझे अन्दर जाकर चेतना को समझाना चाहिए. उसे ऐसे रोते हुए नहीं छोड़ सकता था मैं. मैं अन्दर गया तो चेतना बिस्तर पर लेटी हुई थी, बिस्तर पर अब भी चेहरा छुपाये शायद अब भी सुबक रही थी वो. मुझे इस स्थिति में यह कहना तो नहीं चाहिए पर बहुत सेक्सी लग रही थी वो. मुझे इस स्थिति में भी ऐसे विचार आने के लिए शर्म महसूस होने लगी. मैं उसकी बगल में आकर बैठ गया. उसकी भरी-भरी पीठ उस सैटिन कि तरह मुलायम ब्लाउज में बहुत लुभा रही थी मुझे. उसकी नग्न पीठ हो या उसकी गोल गोल बड़ी सी नितम्ब जो साड़ी में लिपटी हुई थी, मुझे बहुत उकसा रही थी. पर इस हालत में कुछ हो नहीं सकता था हम दोनों के बीच, और दिमाग भी यही कह रहा था कि ये सही नहीं है.

मैंने चेतना को दिलासा देने के लिए उसकी पीठ पर हाथ रख कर कहा, “चेतना आई ऍम सॉरी. पर इस बात को सुलझाने के लिए मुझे कुछ वक़्त चाहिए. तुम्हारे दिल में क्या है मैं समझ नहीं सकता. और मेरे दिल में क्या है ये मैं भी नहीं जानता. मुझे समय दो हम दोनों फिर से अच्छे दोस्त होंगे और सब ठीक होगा. शायद तुम्हे भी समय की ज़रुरत है.”

चेतना अब भी मुंह मोड़कर सुबकती रही. वो कुछ न बोली. मेरा दिल कह रहा था कि मुझे जल्दी से कुछ करना चाहिए. पर दिमाग को कोई हल नहीं सूझ रहा था. अचानक ही मेरी नज़र चेतना के कमरे में एक चीज़ पर पड़ी. और मुझे एक तरकीब सूझी. मैं उठ कर वापस अपने कमरे में आ गया.

जो मैं अब करना चाहता था वो बड़ी ही मेहनत का काम था. बड़ा कठिन भी था. करीब १ घंटे की प्लानिंग के बाद मैं वापस चेतना के कमरे में आ गया था. कमरे की लाइट बंद थी, शायद चेतना अब तक रोते रोते सो गयी थी. मैंने कमरे की लाइट चालु किया.

मैंने अपने हाथो  से चेतना के पैरो को हिलाकर उसे जगाना चाहा. “चेतना, चेतना, उठो तो”, मैंने कहा. चेतना न उठी. अब मैं कूद कर उसके बिस्तर पर खड़ा हो गया. मैं उत्साहित था. मुझे पता था मेरी तरकीब काम करेगी बस चेतना एक बार उठ जाए. “अब उठ भी जाओ चेतना मैडम”, मैंने फिर कहा. वो अब भी न उठी. नाराज़ जो थी. औरतों की तरह ही नाराजगी थी चेतना की भी. फिर मैंने अपने पैरो की उँगलियों से उसकी हिप को छूना शुरू किया. मुझे पता था कि इसका असर तो चेतना पर होगा ही. पर वो हिली नहीं. मैंने अब अपनी उँगलियों से उसकी नितम्ब को ज़रा जोर से दबाया. अब तो चेतना उछलकर उठ बैठ गयी.

“क्या बात है?”, उसने जोरो से कहा जैसे वो मेरी हरकत से नाराज़ है. पर मुझे देखते ही उसकी नाराज़गी एक हँसी में बदल गयी. “यह क्या है निशांत?”, चेतना मुझे ऊपर से निचे तक देखती रह गयी. और मैं? मैं किसी तरह चेतना की साड़ी पहन कर खड़ा था, अपना चेहरा छुपाते हुए.

“तुमने कहा था न कि मैं तुम्हे नहीं समझ सकता. तो मैंने सोचा क्यों न तुम्हारी तरह मैं भी औरत के कपडे पहन कर देखू और तुम्हे समझने की कोशिश करू”, मैंने कहा. चेतना हँसने लगी.

“पता है बड़ा कठिन काम था! बड़ी मुश्किल से कुछ वेबसाइट से देख कर साड़ी लपेटना सीखा है. मैं तुमसे चौड़ा हूँ तो मुझे लग रहा था कि तुम्हारा ब्लाउज मुझे फिट नहीं आएगा, पर देखो किसी तरह मैंने पहन ही लिया. २ हुक रह गए है निचे के जो लगे नहीं! अब सांस नहीं लिया जा रहा है चेतना!”, मैं भी अब हँस रहा था अपने करतब पर.

“निशांत तुम भी न हद्द करते हो!”, चेतना अब मुस्कुरा रही थी, “पता है वो साड़ी मेरी नहीं है, वो सच में मैंने माँ के लिए खरीदी थी और ब्लाउज भी उनके साइज़ का रेडीमेड है! मेरे ब्लाउज में तो तुम्हारी बाँहें तक नहीं जा पाती”, चेतना ने कहा.

“ओह! तभी यह साड़ी ब्लाउज ऐसे पैक था जैसे नयी की नयी है. आई ऍम सॉरी चेतना. तुम्हारी माँ के लिए नयी साड़ी खरीदना पड़ेगा”, मैंने कहा.

“कोई बात नहीं निशांत. अब यह साड़ी माँ को तो नहीं दे सकती. तुम्हे इसमें देखने के बाद मुझे माँ को देते हुए बड़ा अजीब लगेगा. मैं इसे अपने लिए रख लूंगी. ब्लाउज ज़रा फिट करवाना पड़ेगा बस”, चेतना बोली. उसको मुस्कुराते देख मुझे अच्छा लग रहा था.

“अच्छा वो सब ठीक है. तुम बताई नहीं कि मैं कैसा लग रहा हूँ? मेरा मतलब है कि मैं कैसी लग रही हूँ इस साड़ी में?”, मैंने किसी लड़की की तरह नाटक करते हुए कहा. मैं जानता था कि मैं बेहद ही ख़राब दिख रहा था. एक तो मुझे साड़ी पहनना नहीं आता था, दूसरा मेरी चौड़ी बाँहें और उस पर भी खूब सारे बाल, मुझे तो मैं खुद ही ख़राब लग रहा था. और मुझे चेतना की तरह मेकअप भी नहीं आता था. पर मेरा इरादा कोई खुबसूरत औरत बनने का न था. मैं तो बस चेतना को कहना चाहता था कि उसे समझने के लिए मैं कुछ भी करूंगा. मैंने एक बार फिर नाटक करते हुए चेतना से पूछा, “ओहो, अब बता भी दो मैं कैसी लग रही हूँ?”

पर खुश होने के बजाये चेतना का चेहरा गुस्से में आ गया. “मैं जानती थी कि तुम मुझे समझ ही नहीं सकते निशांत. तुम्हारे लिए ये सिर्फ मज़ाक है. तुम जताना चाहते हो कि मैं एक अजीब लड़का हूँ जो लड़कियों की तरह नाटक कर रहा है.”, चेतना बोली.

अब यह क्या हो गया? क्या सोचा था और नतीजा क्या निकला. मेरे चेहरे की ख़ुशी भी चली गयी. मैं निराश हो गया था अब. थोडा सोचकर मैंने चेतना से कुछ कहा जो शायद वो समझ पाती. “यार सच में यह लड़कियों को समझना बड़ा मुश्किल है. पता नहीं क्या चाहती है लड़कियां. उनके लिए कुछ भी करो कभी काफी नहीं होता. मैं यहाँ एक अजूबे की तरह साड़ी पहना हुआ हूँ कि इस खुबसूरत लड़की के दिल की बात समझ सकूं, पर बात और बिगड़ गयी. अब तो मैं तौबा कर लेता हूँ लड़कियों के दिल को समझने की कोशिश से भी. तुम लड़कियों को समझना मेरे बस की बात नहीं है.”, मैंने कहा.

मैंने जो अभी कहा, ऐसी शिकायत मैं अक्सर चेतन के साथ किया करता था. जितनी भी लड़कियों से जीवन में मेरी मुलाक़ात हुई थी, अंत में किसी न किसी वजह से बात ख़तम हो जाती थी. और तब यही बात आकर मैं चेतन से कहता था कि मैं लड़कियों को समझ ही नहीं सकता. चेतना मेरी इस शिकायत से परिचित थी.

“तुम सच कह रहे हो निशांत? तुम इस लड़की के दिल को नहीं समझ सके? तुमने मेरे लिए ये साड़ी पहनी?”, चेतना का दिल अब पिघलने लगा. आखिर मैंने अभी अभी उसे एहसास दिलाया कि मेरी नज़र में वो लड़की ही है, दूसरी लड़कियों की तरह उसको भी समझना मुश्किल है. उसके चेहरे पर धीरे धीरे मुस्कान आने लगी.

“हाँ, सच कह रहा हूँ. तुममे और दूसरी लड़कियों में कोई फर्क नहीं है. बड़े नाटक होते है तुम लड़कियों के!”, मैंने कहा.

मेरी बात सुनकर चेतना मेरे पास आकर मुझे गले लगा ली. “अब तुमने साड़ी पहन ही ली है तो तुम्हे कुछ और सिखाती हूँ लड़कियों के बारे में. आओ ज़रा तुम्हे नचा कर दिखाती हूँ”, कहते हुए चेतना ने मेरा एक हाथ पकड़ कर मुझे गोल गोल घुमाना शुरू कर दिया जैसे लड़के लड़की डांस करते वक़्त करते है. उस विग और साड़ी में तो मुझे चक्कर आने लगा. पर इसी बहाने मुझे चेतना के चेहरे पर ख़ुशी देखने को मिली. वो हँसने लगी.

“अच्छा चेतना, अब मैं जाकर सोता हूँ. तुम भी सो जाओ. रात बहुत हो रही है.”, मैंने उसे गले लगाकर सोच विचार कर कहा.

“निशांत, तुम चाहो तो मेरे साथ सो सकते हो?”, चेतना ने झूकी हुई नजरो के साथ कहा. “हम्म … मुझे ज़रा सोचना पड़ेगा. मैं यहाँ तभी सोऊंगा जब तुम कहो कि तुम मुझे अपनी बगल में चाहती हो”, मैं चेतना को छेड़ने के मूड में आ गया था. उसने धीमी आवाज़ में शर्माते हुए हाँ कर दी. मैं उसे एक बार फिर प्यार से गले लगा लिया.

“पर चेतना, इस साड़ी में तो मैं चैन से सो नहीं पाऊँगा.”, मैंने जवाब दिया. “तुम उसकी चिंता मत करो. तुम भी आज समझ लो कि हम औरतों को क्या क्या करना पड़ता है”, चेतना फिर हँसने लगी.

“चेतना मुझे तुमसे और भी कुछ कहना है. देखो बुरा मत मानना. पर मुझे लगता है कि हमें तब तक शारीरिक सम्बन्ध फिर से नहीं बनाने चाहिए जब तक हम एक दुसरे के प्रति अपनी भावनाओं को समझ नहीं लेते”, मैंने कहा. चेतना ने भी हामी भर दी. “ठीक है. तुम रात को मुझे कुछ करना नहीं जैसे तुम कल रात कर रहे थे”, चेतना ने नटखट तरीके से आँख घुमाते हुए कहा.

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वो पहली और आखिरी रात थी जब मैंने लड़कियों के कपडे पहने थे.

चेतना ने मुझे कुछ देर बाद बिस्तर पर लिटाया. मुझे उसकी मदद की ज़रुरत थी. आखिर मुझे भारी भरकम साड़ी संभालना नहीं आता था. शुक्र है कि मैं क्रॉस-ड्रेसर नहीं हूँ, मैंने सोचा. यह साड़ी संभालना मेरे बस की बात नहीं थी. उस रात के बाद मैंने कभी लड़कियों के कपडे नहीं पहने थे.

चेतना फिर मेरी बांहों में आकर सो गयी. उसकी नितम्ब मेरे तन से लगी हुई थी. चेतना को बांहों में पकड़ कर मेरे अन्दर हलचल तो बढ़ गयी थी जिसका असर मेरे लिंग पर भी हो रहा था. और चेतना को भी वो महसूस हो रहा था. “उसे आज रात काबू में रखना निशांत”, चेतना ने मुझे छेड़ते हुए कहा. मेरा दिल तो किया कि चेतना को एक किस कर दू पर मैं अपनी बात पर कायम रहा. और मुझे ख़ुशी है कि मैं उस रात कुछ न किया था, आखिर वो रात एक सुन्दर प्यार भरे रिश्ते की शुरुआत होने वाली थी, जिसके खिलने का समय अब आ रहा था.

क्रमशः …

Author’s note: इस प्रेम-कहानी में और भी बहुत कुछ है. आशा है कि आप सब आगे क्या हुआ जानने को उत्सुक है. थोडा इंतज़ार करिए! हम कोशिश करेंगे कि अगले भाग जल्दी ही आये. कृपया कहानी को इस पेज के सबसे ऊपर दिए आप्शन से अपनी स्टार रेटिंग देना न भूले. और हमको ज़रूर बताये की यह कहानी आपको अब तक कैसी लगी?

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