मुक्ति


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एक ख़ुशी का पल: मुझे बेहद गर्व हो रहा इस कहानी को प्रस्तुत करते हुए. इस कहानी की लेखिका देविका सेन है जिन्होंने यह कहानी हमारे First expression challenge के जवाब में लिखी थी. जब बात होती है एक क्रॉस-ड्रेसर के रूप में हमारे अपने आत्म-विश्लेषण की और हमारे अन्दर छुपे हुए पुरुष और स्त्री को समझने की, तो इस विषय में यह कहानी इस ब्लॉग की सभी कहानियों में सर्वश्रेष्ट है. इस विषय पर मेरी एक और पसंदीदा कहानी है जिसका नाम है ‘दूसरी औरत‘  (लेखिका: अंकिता शर्मा). जहाँ  दूसरी औरत कहानी अपनी परिस्थिति को स्वीकार करने की है, वहीँ यह कहानी मुक्ति पर आधारित है जो हमारी बाहर आने की तीव्र इच्छा को दर्शाती है. इस कहानी ने मेरे दिल को छुआ है, पर मुझे यकीन नहीं है कि मैं इसका हिंदी अनुवाद इतने बेहतर तरीके से कर सकुंगी जैसी यह कहानी इंग्लिश में है. फिर भी मेरा यह प्रयास शायद आपको पसंद आये.

अनुपमा त्रिवेदी


सालो की प्रैक्टिस और तपस्या ने आखिर इस साहसिक कदम के लिए रास्ता बना ही दिया. इस बारे में निर्णय लेने के लिए मैं काफी समय से सोच रही थी, पर अब सालो से अपने कमरे में बंद रहने के बाद, अब जब मुझे बाहर आना था तो मैं इसे छोटे मोटे तरीके से नहीं करना चाहती थी. मेरे लिए यह एक बड़ा पल होने वाला था और उतने ही शानदार तरीके से मैं अब बाहर आने को आतुर थी. अब जब निर्णय ले ही लिया था, तो अब सवाल यह था कि आखिर किसके सामने सबसे पहले आऊँ मैं? कोई ऐसा व्यक्ति जो न सिर्फ आपको स्वीकार करे बल्कि कोई ऐसा जो आप को औरत के रुप में देख कर खुद उस पल की खुशियों को संजोये. आखिर किसी अनजान बिना चेहरे वाले लोगो के सामने आना भी कोई बड़ा पल हुआ? वो तो केवल एक मजबूरी होगी.  और मैं किसी मजबूरी में बाहर नहीं आना चाहती थी, मैं आना चाहती थी क्योंकि मुक्ति मेरे दिल की ख्वाहिश थी.

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हम दोनों न कभी मिले थे और न कभी एक दुसरे को देखा था

मैंने अपना स्त्री रूप दिखाने के लिए सबसे पहले उसको चुना. इसलिए नहीं कि मैं उसे पहले से जानती थी. बल्कि इसलिए क्योंकि उसका मुझमे इंटरेस्ट था और मेरा उसमे. हम दोनों कई रातें बातें करते थे. उसकी बातें प्रेरित करने वाली होती थी, कभी सेक्सी भी और कभी कभी नीरस सांसारिक भी. उसने मुझे कभी देखा नहीं था और न ही मैंने उसे. एक दुसरे के लिए हम दोनों फ़ोन के टेक्स्ट मेसेज और स्माइली बस थे. जब मैंने उससे मिलने के बारे में पूछा तो वो थोडा संशय में था, हम दोनों ने एक दुसरे की अपने मन में एक प्रतिमा बना ली थी, और हम दोनों को डर था कि जो खुबसूरत बिम्ब हमारे मन में है वो कहीं सच्चाई को देख कर टूट न जाए. मुझे मन ही मन लग रहा था कि वो कोई नीरस आदमी होगा, जबकि मेरे दिल में उसकी तस्वीर में एक आकर्षक आदमी था वो. पर वो नीरस नहीं था.

मेरा पुरुषो में न तो कभी इंटरेस्ट था, और न है. पर फिर भी, जिस दिन मैं किसी की नजरो में बाहर आने वाली थी, मेरे अन्दर की औरत की यह चाहत थी कि कोई गबरू नौजवान मेरे लिए दीवाना बन जाए. किसी और दिन तो मैं औरतो के कपडे बस पहनती थी, पर आज ये ख़ास दिन था, आज मैं खुद को संवार रही थी एक आदमी के लिए! और इस पल के लिए मैंने मेरा ब्लाउज एक टेलर से सिलवाई थी. शुरू में टेलर के पास अपने ब्लाउज के लिए अपना नाप करवाने में मुझे डर और शर्म दोनों आती थी, पर एक बार उस हकीकत को स्वीकार करने के बाद, मेरे लिए ब्लाउज का नाप देना बहुत सहज और ख़ुशी का पल होने लगा था. जब जब दरजी का टेप मेरे सीने, बांहों और वक्ष के ऊपर से जाता, मेरे शरीर में उत्तेजना का एक कम्पन होता था. बहुत ध्यान देकर मैं टेलर को ब्लाउज का डिजाईन और कट बताती थी, और उससे वो ब्लाउज बार बार सिलवाती जब तक वो परफेक्ट न हो जाए. ऐसा ब्लाउज जो मेरे कोमल सीने से मेरी त्वचा की तरह लग जाए, मेरे अंग का हिस्सा बन जाए और मेरी बांहों में कस के मुझे पकड़ ले, पर ज़रुरत से ज्यादा भी नहीं. ब्लाउज पहनना मेरे लिए केवल पहनना भर नहीं है बल्कि आनंददाई संस्कार है. मैं जब भी ब्लाउज को धीरे धीरे पहनती, मैं उसके कपडे को अपनी त्वचा पर  चढ़ते हुए मेरे शरीर का हिस्सा बनते देखती थी. जैसे जैसे वो सरक कर मेरे सीने से लग जाता, मेरे ख़ुशी बढती चली जाती और मैं औरत बनने की ओर कदम बढाती. और इस ख़ास पल के लिए मैंने अपना फेवरेट ब्लाउज चुना था, एक लम्बी आस्तीन वाला! मैंने नहीं चाहती थी कि पहली मुलाक़ात में ही “मेरे” आदमी को लगे कि मैं बहुत मॉडर्न किस्म की औरत हूँ जो उसे आसानी से मिल जायेगी. उसे मुझे और मेरे तन को पाने के लिए  मेहनत करनी होगी.

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आज मैं एक आदमी के लिए संवर रही थी. और उसे मुझे पाने के लिए मेहनत करना पड़ेगा!

“मेरा आदमी” या “मेरा डेट” कहने में थोड़ी हँसी आ रही है मुझे!! मुझे यह आदमी पसंद तो है पर जैसे मैंने कहा, मेरा उसकी तरफ कोई शारीरिक आकर्षण नहीं है. बल्कि उसका मेरी तरफ जो आकर्षण है बस उसी के सहारे मैं इसके लिए आगे बढ़ रही हूँ. उससे मिलने के पहले तक तो मुझे पता भी नहीं था वो मुझे चाहेगा भी या नहीं. मुझे पता था कि मैं अपनी नज़रो में तो हमेशा ही आकर्षक रही थी पर उसकी नज़रो में? थोड़ी घमंड भरी बात लगेगी पर मैं खुद को ऐसी औरत मानती हूँ जिसे कोई भी आदमी मना कर ही नहीं सकता! थोडा विचित्र है पर जब मैं औरत बनती हूँ तो मेरे ही अन्दर का पुरुष मेरे स्त्रीरूप का दीवाना हो जाता है, तो दुसरे को तो होना ही पड़ेगा!

 

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वैसे किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि मैं ऐसी हूँ. आखिर मैंने सालो की मेहनत से खुद को वो बनाया है जो आज मैं हूँ. आज जो मैं परी की तरह खिलती हूँ उसके पीछे कड़ी मेहनत और कई असफल प्रयोग भी रहे है. और इसी का नतीजा है कि आज मैं एक परफेक्ट औरत हूँ! वैसे मुझे आज के इस ख़ास पल के लिए थोड़ी सी चिंता इस बात की भी थी मेरे अंग जो स्त्री के अंगो से थोड़े अलग थे उसकी वजह से कोई परेशानी न हो. वैसे तो मैंने उस आदमी को शुरू से ही सब कुछ बताया हुआ था, फिर भी मिलने पर न जाने क्या हो. पर ऐसी कोई परेशानी आई नहीं.. मैं भी न, यूँ ही चिंता कर रही थी.

वो तो मुझे देखते ही बस मदहोश सा हो गया था, मुझे देख कर पलकें झपकाना भूल गया था वो! शायद उसने सोचा न था कि मैं इतनी खुबसूरत लगूंगी! खैर हम सब को कुछ बातो का मन में डर या संशय रहता है, पर वो डर गलत साबित भी होते है. न सिर्फ दिखने में उसकी कल्पना से कहीं ज्यादा खुबसूरत थी, बल्कि मैं एक कॉंफिडेंट औरत भी थी. वो तो मुझे देख कर जैसे बातें करना भी भूल गया था. पूरे डिनर के वक़्त वो सिर्फ मुझे देखते रह गया और कुछ शब्द ही कह सका. एक कॉंफिडेंट औरत के सामने कभी कभी आदमी लड़खड़ा जाते है. मुझे पता नहीं कि मुझे डिनर के बाद अपने घर बुलाते हुए उसने अपने मन में पहले से कुछ सोच रखा था हमारे आकर्षण के बारे में, या फिर यह वाइन का असर था या फिर घर की चारदीवारी के बीच सुरक्षित होने के एहसास का.

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पर आखिर में हमारे आकर्षण को मुकाम हमने बिस्तर पर पहुँचाया. उसका नाम तो नहीं लूंगी, पर सचमुच जेंटलमैन था वो! उसे लगातार चिंता थी कि मुझे क्या बात ख़ुशी देगी या मैं किस तरह से प्यार पाना चाहती हूँ. पर यह तो मुझे भी नहीं पता था. आखिर मैं उसकी तरफ आकर्षित नहीं थी. सच कहूं तो वो सिर्फ एक मोहरा था मेरे इस खेल का. मैं चाहती थी कि वो मेरी तरफ आकर्षित हो, एक बेहद सेक्सी और खुबसूरत औरत की ओर जो मैं बन चुकी थी. उसका “मेरे रूप” के तरफ आकर्षण ही था जिसके सहारे मैं भी उत्तेजना महसूस कर रही थी. और सच में तो मुझे प्यार तो मेरे अन्दर छुपे हुए मेरे द्वि-रूप से था. मुझे तो खुद के अन्दर की औरत से प्रेम था बस. और यह प्रेम अपनी परम सीमा पर तब पहुचता था जब भी मैं अपनी साड़ी का पल्लू अपने कंधो पर चढाती, या मैं अपनी कमर लचकाती, या जब भी मैं आईने के सामने आगे झुक कर खुद के लबो पर लिपस्टिक लगाती. और इस वक़्त, मेरे साथ जो आदमी था वो तो केवल मेरी अन्दर की उस अदृश्य औरत को एक रूप मात्र दे रहा था. पर प्यार तो मैं उस औरत को ही करती थी.

ऐसा न था कि मुझे उस आदमी के साथ पल ख़ुशी नहीं दे रहे थे. वो मुझे बेइंतहा ख़ुशी दे रहा था. आखिर मेरे लिए वो किसी सपनो के राजकुमार से कम भी नहीं था, और आगे रहेगा भी. उस रात के बाद की सुबह, यानी आज, उसने मुझे एहसास कराया कि जो रात में हुआ था वो बस शराब के नशे में की हुई गलती नहीं थी. उसने सुबह मेरी खूब सारी तसवीरें खिंची और मेरे लिए नाश्ता भी बनाया. मुझे पता नहीं था कि सुबह मैं कितनी सुन्दर दिख रही थी, आखिर ये रात के बाद वाला रूप था जिससे सभी औरतों को डर लगता है. पर शायद मैं ठीक ही लग रही थी. मुझे थोड़ी चिंता होनी चाहिए थी कि अब उसके पास मेरी तसवीरें थी, क्योंकि कोई मेरे बारे में जानता न था, पर न जाने क्यों मैं निश्चिन्त थी.

z4aवो मुझे घर छोड़ना चाहता था, पर मैंने उसे मना कर दिया. उसे डर था कि मुझे लोग देख लेंगे, पर मुझे डर न था. मैं चाहती तो आसानी से देर रात को ही अपने घर जा सकती थी और किसी को पता भी न चलता पर यह मेरा निर्णय था रात को रुकने का.  और आज जब मैं सड़क पर चल कर अपने अपार्टमेंट जाऊंगी, उसी दुकान के सामने से जहाँ से मैं किराना खरीदती हूँ, उन्ही आंटी के सामने से जिन्हें देख कर मैं हमेशा मुस्कुराती हूँ, मैं चाहती हूँ कि आज मैं गर्व से अपनी गुलाबी साड़ी पहन कर जाऊ, एक सही फिटिंग वाले ब्लाउज में और थोड़ी बिखरी हुई लिपस्टिक और साड़ी की प्लेट के साथ. मेरे अन्दर की औरत के बाहर आने का भव्य पल तो पहले ही रात को आ चूका था, अब समय था उन बिना नाम के बोरिंग लोगो के सामने आने का जो बस भीड़ का हिस्सा मात्र है. इस बार मेरा सामने आना एक नयी परिभाषा तैयार करेगा, जहाँ मैं एक स्त्री के छरहरे बदन वाले रूप में सबके सामने होउंगी और सभी की नज़र मुझ पर होगी. अब लोगो की हँसी और नज़रो से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता. मैं घर की अँधेरी दीवारों के बीच अकेले अपनी कमर मटकाते उब चुकी थी, अब समय आ गया था कि दुनिया भी मुझे वैसे देखे जैसे मैं खुद को देखती हूँ. अब समय आ गया था कि वो इस शहर में आई एक नयी सेक्सी लड़की के बारे में बात करे. आखिर वही बातें तो मेरे अन्दर की चिंगारी को शोला बना देती है!

समाप्त

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5 thoughts on “मुक्ति

    1. bhumika aapko internet par sahi logo ko dhoondh kar sahi advice leni chahiye. ladki banne ke pehle aur baad me bahut mushkilo ka saamna karna padta hai. aapko soch samajhkar kadam lena chahiye. is baare mein ham koi advice nahi de sakte.

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