देवदास: अंतिम भाग


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अपने घर में मैं देवदास बना हमेशा की तरह शाम को अपनी शराब के साथ बातें कर रहा था. “तुझसे मिलने मर्सिडीज़ से मिलने आऊंगी बोली थी वो! ३ साल हो गए और आज तक नहीं आई वो”, मैंने अपनी पसंद की व्हिस्की की बोतल से कहा.

“पर तूने भी तो उसके फोन का कभी जवाब नहीं दिया”, बोतल ने मुझसे कहा. आज के पहले कभी मेरी बोतल ने मुझसे पलट कर जवाब नहीं दी थी. वो तो हमेशा मेरे दिल की बात शान्ति से सुना करती थी. ये क्या हुआ?

मैंने बगल की खिड़की से देखा तो मेरे घर के बाहर मर्सिडीज़ खड़ी थी. और मैं पीछे पलटा तो समझ आया कि जवाब देने वाली कोई और नहीं शिखा थी. अपनी मम्मी की तरह अब भरे पूरे शरीर की मालकिन हो गयी थी वो. बड़ी महँगी सी साड़ी पहने किसी अमीर घर की औरत लग रही थी वो. मुझे अपनी आँखों पे यकीन नहीं हो रहा था. वैसे भी ४ पेग के बाद इंसान को किसी बात का यकीन नहीं करना चाहिए. मैंने पहले भी शिखा को देखा था पर बाद में पता चलता था कि वो हमेशा एक सपना होता था. तो मैं इस बार भी इसको सपना मान के चल रहा था.

“मोनू, ज्यादा देवदास बनने की ज़रुरत नहीं है. ये कार्ड है जिसमे एड्रेस है होटल का. कल दोपहर में ३ बजे वहां आ जाना. और रिसेप्शन से कमरे की चाबी लेकर कमरे में मेरा इंतज़ार करना. और शेव करके आना, ऐसे जंगली लग रहे हो दाढ़ी बढाकर”, मुझे जो शायद सपने में शिखा दिख रही थी उसने कहा. और फिर जिस तेज़ी से वो आई थी उसी तेज़ी से गायब भी हो गयी वो. अब तो यकीन हो गया था कि ये सपना ही था.

पर मेरे हाथ में वो कार्ड अब तक था. मैं कार्ड को उलट-पलट कर बार बार पास लाकर देखता कि वो असली है या सपना है. पर मैं अपनी शराब पीता रहा.

सुबह जब आँख खुली तो कार्ड तब भी वहीँ था. तो यह सब सच था! मन खुश हो या उदास समझ नहीं आ रहा था. पर जो भी हो मैंने शेव कर अपनी दाढ़ी साफ़ कर ली. ऑफिस से जल्दी छुट्टी लेकर होटल पहुच गया. वहां मेरे लिए रिसेप्शन पर चाबी भी रखी थी. चाबी लेकर मैं कमरे में चला गया. पता नहीं आज क्या होने वाला था. अपनी पनौती भरी ज़िन्दगी से मुझे कुछ ख़ास ज्यादा उम्मीद भी नहीं थी! आखिर ज़िन्दगी भर का अनुभव यही बताता है.

और थोड़ी देर बाद, मेरे कमरे का दरवाज़ा खुला. और मेरी आँखों के सामने दरवाज़ा धीमे से बंद करती हुई शिखा थी. सुनहरी साड़ी में शिखा का भरापूरा बदन देख कर जो मेरे दिल में ख्याल आये उसको न ही कहूं तो अच्छा रहेगा. पर यदि सार बताना हो तो यह है कि उसको मुस्कुराता खुश देख कर मन में बड़ी जलन सी हो रही थी. मेरे बगैर आखिर वो इतनी आसानी से खुश कैसे थी वो?

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शिखा का भरा हुआ बदन देख कर दिल में जलन महसूस होने लगी. मेरे बगैर इतनी खुश इतनी आसानी से कैसे रह सकती थी वो?

इसके पहले शिखा को साड़ी में बहुत कम बार देखा था मैंने. स्कूल और कॉलेज के दिनों में तो वो चूड़ीदार और कुर्ती ज्यादा पहना करती थी. वोही पुराने दिन याद आ रहे थे जब स्कूल के बाद पार्क में मिलने पर जब भी मैं उसे पहले छूता तो मुझे तुरंत थप्पड़ मिलता. उसे देख कर थप्पड़ खाने का मन कर रहा था. पर इस बार थप्पड़ ज्यादा जोर से पड़ सकता था आखिर उसकी शादी जो हो गयी थी. पर फिर उसने मुझे यूँ होटल के कमरे में क्यों बुलाया? इस लड़की का कोई ठिकाना न होता था कि उसके दिल में क्या चल रहा है. वो जो चाहती थी वो पाकर ही रहती थी.

और आज भी कुछ वैसे ही हुआ. इससे पहले की मैं कुछ बोल पाता या कर पाता, वो तुरंत मेरे पास आकर मेरा शर्ट खोलने लगी. मुझे तो कुछ सोचने का मौका ही नहीं मिला. अभी भी पहले की ही तरह है वो. जो मन में आता है पहले करती है, दुसरे को मौका नहीं देती.

“यह क्या कर रही है?”, मैंने थोडा सँभलते हुए कहा.

“क्या लग रहा है तुझे? समय नहीं है ज्यादा मेरे पास समझाने का. जल्दी से अपने पूरे कपडे उतार.”, शिखा अब मेरी पेंट उतार रही थी.

“कितनी बेशर्म है तू शिखा”, मैंने पीछे होते हुए कहा.

“अरे इतना क्यों शर्मा रहा है? कोई पहली बार थोड़ी कर रही हूँ. तुझे साड़ी पहननी है या नहीं? तेरे लिए नयी सिल्क साड़ी लेकर आई हूँ.”, शिखा बोली.

“क्या बकवास है ये? तू यहाँ मुझे साड़ी पहनाने आई है?”

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न तो कोई बात हुई, न हाय हेल्लो. शिखा मुझे साड़ी पहनाने में जुट गयी.

“अब तू यूँही बहस करता रहेगा या ये पेंटी पहनेगा?”, शिखा बोली. इस औरत को समझना सचमुच मुश्किल था. पर उसके मन में जो है वो करके ही रहेगी. ज्यादा बहस करने का कोई फायदा नहीं था. इतने सालो बाद मिलने के बाद भी न तो कोई दिल की बात हुई न तो उसने मेरा हालचाल पूछा. बस लग गयी मुझे साड़ी पहना कर औरत बनाने. अब तो पहले से भी ज्यादा तेज़ हो गयी थी वो साड़ी पहनाने में. कोई और समय होता तो शायद मैं इस मौके से बड़ा खुश होता. पर यह शिखा थी. मेरा दिल तोड़कर कहीं और शादी करने वाली शिखा. यदि पिछली बातों से मैंने कुछ सीखा है तो इस वक़्त मुझे थोडा घबराने की ज़रुरत थी क्योंकि शिखा यह क्यों कर रही है, उसके पीछे कुछ और ही होगा यह पक्का है. क्या है? यह पता नहीं. मैं यह सब सोच ही रहा था कि वो मेरे लम्बे बालो को खिंच कर चोटी बनाने लगी.

“तेरे बाल तो और लम्बे घने हो गए है मोनू! काश मेरे बाल भी ऐसे होते”, शिखा बोली.

“तू मेरे बालो की तारीफ़ करने तो नहीं आई है. सच बता दे कि क्या इरादा है तेरा?”, मैंने कहा.

“बस थोडा सा मेकअप करना बाकी है.”, शिखा ने मेरी बात अनसुनी करते हुए मेरा मेकअप भी शुरू कर दी.

“अब बता भी दे कि क्यों आयी है तू?”

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“अरे… अपने दोस्त की मदद करने आई हूँ. और क्या? देवदास बनकर दिन रात शराब पीता रहता है. सुधर जा अब.”, शिखा बोली.

मैं नहीं मान सकता था कि उसको मेरी शराब की चिंता थी. यदि होती तो इतने सालो में पहले आ गयी होती.

मेरे माथे पर बिंदी लगाकर शिखा बोली, “यह हुई न बात! पक्की सुन्दर औरत लग रहा है मोनू!” मैंने खुद को आईने में देखा. सचमुच बहुत सुन्दर लग रहा था मैं.

मैं ज्यादा देर खुश होता उसके पहले शिखा ने मुझे सरप्राइज देते हुए मेरे होंठो को चूमने लगी. अब यह क्या था! शादीशुदा औरत मुझे चूम रही थी. न जाने मेरे मन में क्या हुआ और मैं उसे धक्का देते हुए बोला, “क्या कर रही है तू? पागल हो गयी है?”

“वही कर रही हूँ जिसकी मुझे ज़रुरत है. मेरे पास समय कम है, थोडा जल्दी करते है. अब तरसा मत!”

“तू पागल हो गयी है शिखा. ये नहीं हो सकता!”, मैंने कहा.

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अपनी अदा से शिखा मुझे रिझाने लगी

“मेरे पति के पास मेरे लिए समय नहीं है. पर तू तो मुझे प्यार करता है न? मेरी मदद नहीं करेगा तू? या साड़ी पहनने के बाद तेरे अन्दर का आदमी मर जाता है? “, शिखा बोली. किसी को उकसाकर अपना काम करवाना कोई शिखा से सीखे. और फिर अपने ब्लाउज से अपनी ब्रा का स्ट्रेप दिखा कर जैसे मुझे रिझाने लगी. उसकी अदाओं के आगे खुद पर काबू रखना मुश्किल था.

 

मैं शिखा को पाना चाहता था. पर ऐसे नहीं. वो मुझे चाहती है तो उसे अपने पति को तलाक देकर मेरे पास आना होगा. मुझे इस पल इस चक्कर से निकलने के लिए कोई बहाना चाहिए था. पर मेरा दिमाग का तो दही हो रखा था. और मेरे मुंह से निकला, “सिल्क साड़ी में कोई किसी को शारीरिक प्यार करता है क्या?” इससे ख़राब कारण नहीं सोच सकता था मैं मना करने के लिए.

“ठीक है. अगले हफ्ते फिर यहीं मिलेंगे इसी समय. मैं तेरे लिए शिफॉन साड़ी लेकर आऊंगी. तब तो मुझे प्यार करेगा न? मुझे यकीन नहीं होता कि मैं अपना तन तुझे दे रही हूँ और तू मुझे मना कर रहा है”, शिखा गुस्से में बोली और तेज़ी से कमरे से चली भी गयी.

और मैं कमरे में सिर पकड़ कर सोच रहा था कि क्या हुआ ये सब? मैं तो सोचकर आया था कि बहुत सारी बातें करूंगा शिखा से. और हुआ क्या? पर चलो इस बहाने मुझे एक महँगी सिल्क साड़ी तो मिल गयी. कम से कम २५,००० की तो होगी. थोड़ी देर खुद को कमरे में निहारने के बाद मैं वो साड़ी लेकर घर आ गया.


एक हफ्ता फिर शराब पीते निकल गया. और फिर वो दिन भी आ गया जब मैं शिखा से मिलने वाला था. जो मेरा थोडा बचा हुआ दिमाग था उसने मुझे समझाया कि मत मिलना शिखा से , पर दिल कह रहा था कि मुझे शिखा से बात करनी चाहिए. मुझे अपने दिमाग की सुननी चाहिए थी.

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मेरी शिफॉन साड़ी!

अब होना क्या था. थोड़ी देर बाद मैं होटल के कमरे में शिफॉन साड़ी पहने दुल्हन की तरह बिस्तर पर सज कर बैठा हुआ था. और वही हुआ जिसका डर था. मैं शिखा को मना नहीं कर सका. शिखा मुझे बिस्तर पर लिटा कर चूमने लगी. और मेरा दिमाग सोच में लगा रहा कि क्यों कर रही है शिखा ये सब और मैं उसे रोकू कैसे? पर मुझे रोकने की ज़रुरत नहीं पड़ी. शिखा को उसके घर से फोन आ गया. वो किसी कारण से घबराकर मुझे वहां छोड़ कर तुरंत निकलने लगी. “मुझे जाना पड़ेगा मोनू. मेरे पति जल्दी घर आ गए है आज. पर अगले हफ्ते हम पक्का फिर से मिलेंगे. अगली बार तू वोही गुलाबी साड़ी लेकर आना जो सबसे पहले पहना था तू. पुरानी यादें ताज़ा करेंगे. और तू पहले से तैयार रहना मेरे लिए.” वो मुस्कुरायी और फिर दरवाज़ा खोल कर गायब हो गयी.और मैं? मैं अपनी किस्मत पर इठलाता अपने लिए नयी शिफॉन साड़ी लेकर घर आ गया. पता नहीं क्यों मुझे अपनी फूटी किस्मत पर फिर भरोसा होने लगा था.

एक हफ्ता फिर गुज़र गया. इस बार मुझे पुरानी गुलाबी साड़ी लेकर जाना था. मेरे लिए अब तक वह साड़ी मनहूस ही साबित हुई थी. उसे लेकर मेरे मन में चिंता तो थी. पर देखते है इस बार वो साड़ी क्या रंग लेकर आती है.

एक बार फिर मैं वही होटल के कमरे में था. इस बार मैं पहले से ही खुद साड़ी पहनकर तैयार बैठा था. और थोड़ी देर में दरवाज़ा खुला और शिखा मेरी आँखों के सामने थी. मुझे देखते ही वो ख़ुश हो गयी.

“वाह मोनू! तुझे इस साड़ी में देखकर मुझे फिर से हमारे प्यार भरे दिन याद आ गये. कितना क्यूट लगा था तू अखबार की उस फोटो में जब चोर तुझे साड़ी पहना कर गए थे”, शिखा जोर से हँसते हुए मुझसे गले लग गयी. वो तो जानती थी कि यह काम चोरो का नहीं था. पर मेरे मन में विचार आ रहा था कि मैं ही बेवकूफ हूँ जो हर हफ्ते यहाँ आ जाता हूँ. शायद हम दोनों के बीच जो था मैं उसको ख़त्म करके अब अपनी ज़िन्दगी आगे बढ़ाना चाहता था. बहुत हुई ये देवदास की ज़िन्दगी. पर कैसे? कैसे करूं मैं यह? आज भी शिखा मुझे पसंद तो थी? या नहीं?

मैंने सोचा नहीं था पर फिर वोही मनहूस गुलाबी साड़ी अपना रंग दिखाने वाली थी. मेरी किस्मत फिर फूटने वाली थी. शिखा मुझे गले लगा ही रही थी कि दरवाज़े पर जोर से दस्तक हुई. कोई दरवाज़े को जोर जोर से खटखटा रहा था.

“दरवाज़ा खोलो”, एक बुलंद आवाज़ बाहर से आई.

लो जी! मैं एक बार फिर इस साड़ी में पकड़ा जाने वाला था. मैं अपनी किस्मत को कोसने लगा.

“मोनू, जल्दी बता तेरे लड़के वाले कपडे कहाँ है?”, शिखा ने घबराहट में मुझसे पूछी.

“यहाँ बिस्तर पर रखे है. पर क्यों? कौन है बाहर?”, मैं सवाल पूछ ही रहा था कि शिखा ने मेरे कपडे उठाये और खिड़की से बाहर फेंक दिए. लो , अब तो मेरी न पकडाने की जो थोड़ी सी उम्मीद थी वो भी चली गयी. मैं अपना सर पकड़ कर बिस्तर पर बैठ गया.

“दरवाज़ा खोलो नहीं तो हम तोड़ कर अन्दर आयेंगे”, बाहर से फिर बुलंद आवाज़ आई.

अब ये क्या ड्रामा था? मैं कुछ सोचता उसके पहले शिखा दौड़कर दरवाज़ा खोलने चली गयी. दरवाज़ा खोलते ही एक आदमी उसको धक्का देकर अन्दर आया और उसके पीछे ४-५ पहलवान किस्म के आदमी हॉकी और डंडे लिए अन्दर आये. मेरी तो हालत ख़राब हो गयी.

शिखा धक्के से ज़मीन पर गिर गयी. फिर भी उसने उन आदमियों में सबसे आगे वाले आदमी से कहा, “क्या बात है विशाल?” विशाल शिखा का पति था!

“देखो साले को यहीं कमरे में होगा. आज तो पीट पीट कर उसका ऐसा हाल करना कि कभी किसी और की पत्नी और किसी औरत की ओर नज़र उठा कर देखने की हिम्मत न कर सके”, विशाल ने बाकी आदमियों से कहा.

“मर गया मोनू आज तो तू! कुछ किया न धरा और उल्टा आज तेरी हड्डियां टूटने वाली है!”, मैंने मन ही मन सोचा. घबराहट में अपना पल्लू पकड़ कर मैं बैठा रहा.

“कौन आदमी विशाल? मैं तो यहाँ अपनी कॉलेज की सहेली मोना से मिलने आई हूँ. वो यहाँ इस महीने काम के सिलसिले में मुंबई से हर हफ्ते यहाँ दिल्ली आ रही है. तो हम बस बातें करने यहाँ मिलते है.  वो देखो बैठी है.”, शिखा ने मेरी ओर इशारा करते हुए कहा. “मरवाएगी मुझे शिखा”, मैंने मन ही मन सोचा.

आज मेरी वोही डरी हुई हालत थी जो उस रात चोरो को देख कर हुई थी. और डर में मेरी आवाज़ फिर पतली हो गयी थी. और मैंने कहा, “जी … जी.. मैं मोना हूँ ” मेरी आवाज़ पूरी तरह औरत की तरह तो नहीं थी पर शायद सबको लगा कि डर की वजह से मेरी आवाज़ ऐसी हो गयी है.

“तुम्हारी सहेली? तो तुमने मुझे बताया क्यों नहीं पहले?”, विशाल ने शिखा से पूछा.

“यहाँ कोई आदमी नहीं है सर.”, एक हॉकी पकडे आदमी ने विशाल से कहा.

“तुमको बताने का कोई फायदा है? तुम्हारे पास मेरे लिए समय भी है. अब चलो यहाँ से. मेरी सहेली के सामने मेरी बेईज्ज़ती कर रहे हो तुम. चलो निकलो तुम सब भी. बाय मोना. सॉरी तुमको यह सब देखना पड़ा.”, शिखा ने विशाल और फिर बाकी आदमियों से कहा. और मैं बस डर में हाथ हिलाकर बाय कर सका.

विशाल शर्मिंदा होकर शिखा के साथ कमरे से बाहर निकल गया. जैसे ही कमरे से सब चले गए, मैंने दरवाज़ा बंद किया और चैन की सांस ली.

सब जा चुके थे और मैं उस कमरे में अब बस अकेला बैठा था. “बच गया बेटा मोनू आज! अब तो सुधर जा! भूल जा उस औरत को और अपनी ज़िन्दगी सुधार ले.”, आज तो जैसे मेरी आँखें खुल गयी.

एक बार फिर मैं उसी गुलाबी साड़ी में था. और मेरे पास मेरे कपडे भी न थे. मुझे फिर बाहर दुनिया में ऐसे ही जाना होगा औरत बनकर. जिस साड़ी को मैं मनहूस मानता था शायद मेरे लिए वो भाग्यशाली थी. पहली बार जब पहना था तब चोरो ने मुझे औरत समझ कर सिर्फ मेरे हाथ पैर बाँध कर छोड़ दिया था. लड़का देखते तो मुझे ज़रूर पीटते. और आज एक बार फिर इसी साड़ी की वजह से बच गया. बस, अब किसी औरत की तरह ऑटो लेकर मुझे अपने घर तक सबसे नज़रे मिलकर जाना था. थोड़ी शर्मिंदगी तो होगी अपने पड़ोसियों के बीच ऐसे जाते. पर जान बची तो लाखो पाए. शर्म का क्या है? दो दिन रहती है. और मेरे पास तो इसका पहले से अनुभव था. कॉलेज में ४ साल मोना डार्लिंग नाम से जाना गया था मैं आखिर. पर जो भी हो, उस दिन से मैं देवदास नहीं रहा.

समाप्त

 

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