मैं परिणिता: अंतिम भाग


अब तक आपने मेरी कहानी में पढ़ा: यह कहानी है मेरी भावनाओं की, एक आदमी से औरत बनकर जो भी मैंने अपने बारे में समझा| मेरे दिल से निकली इस कहानी में प्यार है, सुकून है, सेक्स भी है, और औरत होना क्या होता उसकी सीख भी| जब से होश संभाला है, मैं जानती हूँ कि मेरे अंदर एक औरत बसी हुई है। पर दुनिया की नज़र में मैं हमेशा प्रतीक, एक लड़का बनकर रही। कुछ साल पहले जब मेरी शादी परिणीता से हुई, तो उसे भी मेरे अंदर की औरत कभी पसंद न आयी। हम दोनों पति-पत्नी US में डॉक्टर बन गए। पर मेरे अंदर की औरत हमेशा बाहर आने को तरसती रही। किसी तरह मैं अपने अरमानों को घर की चारदीवारियों के बीच सज संवर कर पूरा करती थी। पर आज से ३ साल पहले ऐसा कुछ हुआ जो हम दोनों को हमेशा के लिए बदल देने वाला था। उस सुबह जब हम सोकर उठे तो हम एक दूसरे में बदल चुके थे। मैं परिणीता के शरीर में एक औरत बन चुकी थी और परिणीता मेरे शरीर में एक आदमी। हमारे नए रूप में सुहागरात मनाने के बाद हमारा जीवन अच्छा ही चल रहा था, और एक औरत के बदन में मैं बेहद खुश थी| पर परिणीता, जो अब मेरी पति थे, वो तो पुरुष के तन में एक औरत ही थी| और उसी औरत की तलाश में अब मेरे पति क्रॉस ड्रेसर बन गए थे और उन्होंने अपने लिए नाम रखा था ‘अलका’! अब मेरी कहानी का अंतिम भाग –

६ महीने बाद

रात हो चुकी थी| हम पति-पत्नी खाना खा चुके थे और मैं बर्तन धोकर अब बस सोने के लिए तैयार थी| मैं जैसे ही अपने बेडरूम पहुंची उन्होंने मुझे कस के सीने से लगा लिया| मैं जानती थी कि वो क्या चाहते थे|

“नहीं, अल्का! प्लीज़ अभी नहीं”, मैंने कहा|

हाँ, पिछले ६ महीने में काफी कुछ बदल चूका था| अब मेरे पति जैसे ही घर लौटते, वह तुरंत स्त्री के कपडे पहनकर अल्का बन जाते| अब तो उन्होंने अपने बाल भी लम्बे कर लिए थे और तन को पूरी तरह से वैक्स करके उनकी त्वचा बेहद स्मूथ हो गयी थी| वो अब बेहद ही आकर्षक स्त्री बन चुके थे| और आज तो उन्होंने रात के लिए सैटिन की सेक्सी स्लिप पहन रखी थी| मैं जानती थी कि आज रात उनका इरादा क्या था| इसलिए तो उन्होंने एक बार फिर मुझे अपनी बांहों में जोर से पकड़ लिया|

मैंने धीरे से दर्द में आंह भरी और कहा, “कम से कम मुझे साड़ी तो बदल लेने दो|” मैं नखरे करने लगी| आखिर पत्नी जो ठहरी, एक बार यूँ ही थोड़ी मान जाती चाहे मेरा भी दिल मचल रहा हो|

“परिणीता, तुम तो जानती हो कि तुम मुझे साड़ी में कितनी सेक्सी लगती हो”, अलका ने कहा और मुझे जोरो का चुम्बन दिया| उफ्फ, उनके सेक्सी तन पर वो सैटिन नाईटी का स्पर्श और उनका चुम्बन मुझे उत्तेजित कर गया| अब तो अल्का मुझे प्रतीक नहीं परिणीता कहती थी, जो मुझे और भी सेक्सी लगता था| इन ६ महीनो में मैं तो लगभग भूल ही गयी थी कि मैं कभी प्रतीक एक आदमी हुआ करती थी|

अल्का ने मुझे दीवार से लगाकर पलटा और मेरी पीठ पर किस करने लगी और मेरे स्तनों को अपने दोनों हाथो से मसलने लगी| मैं आँखें बंद करके आंहे भरने लगी| आखिर क्यों न करती मैं ऐसा? मेरे ब्लाउज पर उनके हाथ जो कर रहे थे मुझे मदहोश कर रहे थे| मेरे ब्लाउज से झांकती नंगी पीठ पर उनकी सैटिन नाईटी/स्लिप  का स्पर्श और चुम्बन मुझे उकसा रहा था|

उनकी स्लिप उनकी कमर से थोड़ी ही नीचे तक आती थी| और उसके अन्दर पहनी हुई सुन्दर सैटिन की पैंटी में उनका तना हुआ पुरुष लिंग मेरे नितम्ब पर मेरी साड़ी पर से जोर लगा रहा था| अलका आकर्षक स्त्री होते हुए भी आखिर एक पुरुष थी| मैं अपनी साड़ी पर उनका लिंग महसूस करके मचल उठी| मैंने अपने हाथ से उनकी स्लिप को उठा कर उनकी पैंटी में उनके लिंग को पकड़ लिया| सैटिन में लिपटा हुआ वो  बड़ा तना हुआ लिंग बहुत ही सेक्सी महसूस हो रहा था|और उनकी नाज़ुक पैंटी उस मजबूत तने हुए लिंग को अन्दर अब रोक नहीं पा रही थी| फिर  मैंने भी अपने हाथो से उसे पैंटी से बाहर निकाल कर आजाद कर दिया|

“अल्का, तुम तो पूरी तरह तैयार लग रही हो|”, मैंने आंहे भरते हुए कहा| पर अल्का तो मदहोशी से मेरी गर्दन को चूम रही थी| उसने मेरी बात का जवाब एक बार फिर मेरे स्तनों को ज़ोर से दबा कर दिया| आह, उसके मेरे स्तन को दबाने से होने वाले दर्द में भी एक मिठास थी|

अल्का ने मुझे फिर ज़ोरों से जकड लिया, अब उसके स्तन मेरी पीठ पर दबने लगे| मैं तो बताना ही भूल गयी थी कि अल्का की औरत बनने की चाहत में उसने ३४ बी साइज़ के ब्रेस्ट इम्प्लांट ऑपरेशन द्वारा लगवा लिए थे| अब तो वह भी बेहद सुन्दर सुडौल स्तनों वाली औरत थी| मेरे लिए तो मानो एक सुन्दर सपना था यह| अल्का के स्तन और उसका पुरुष लिंग, मुझे एक साथ एक औरत और एक पुरुष से प्रेम करने का सौभाग्य मिलने लगा था|

कामोत्तेजना में अल्का ने अपनी पैंटी उतार दी और मुझे बिस्तर के किनारे ले जाकर झुका दी| और तुरंत ही मेरी साड़ी और पेटीकोट को उठाकर मेरी पैंटी उतारने लगी| कामोत्तेजित अल्का अब रुकने न वाली थी और मैं भी उतावली थी कि कब उसका लिंग मुझमे प्रवेश करेगा| अल्का ने मेरी पैंटी उतार कर अपनी उँगलियों से मेरी योनी को छुआ| उसके लम्बे नाख़ून और लाल रंग की नेल पोलिश में बेहद सेक्सी लग रहे थे| मुझे छेड़ते छेड़ते उसने अपनी ऊँगली मेरी योनी में डाल दी| मैं उत्तेजना में उन्माद से चीख उठी| “अब और न तरसाओ मुझे अल्का!”, मैं मदहोशी में उससे कहने लगी|

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जहाँ मैं साड़ी में खिल रही थी वहीँ अल्का अपनी सैटिन की स्लिप में गहरे रंग की लिपस्टिक के साथ बेहद सेक्सी लग रही थी| अल्का कोई और नहीं मेरे पति थे! और हम दोनों एक दुसरे के साथ रात बिताने को आतुर थे|

अल्का भी बिलकुल तैयार थी और देखते ही देखते उसका लिंग मेरी योनी को चुमते हुए मुझमे पूरा प्रवेश कर गया| मैं तो जैसे परम आनंद को महसूस कर रही थी| वो मेरी नितम्ब को अपने हाथो में पकड़ कर आगे पीछे करती तो मैं भी अपनी कमर को लहराते हुए और जोरो से आंहे भरती| और उसके हर स्ट्रोक के साथ हम दोनों के स्तन झूम उठते| मेरे स्तन तो अब भी ब्लाउज में कैद थे पर अल्का के स्तन उसकी सैटिन स्लिप में उछल रहे थे| अब अल्का खुद अपने एक हाथ से अपने ही स्तनों को मसलने लगी| और अपने ही होंठो को काटने लगी| गहरी लाल रंग की लिपस्टिक में उसके होंठ बेहद कामुक हो गए थे| वहीँ मैं अपनी साड़ी में लिपटी हुई इस पल का आँख बंद करके आनंद ले रही थी|

मैंने पलट कर देखा तो अल्का अब भी अपने स्तनों को मसल रही थी| उसे देख कर मेरा भी मन उसके स्तनों को चूमने को मचल उठा| मैं अब उठ कर अपनी साड़ी से अपने पैरो को ढककर अपने घुटनों पर खड़ी हो गयी और उसकी ओर चंचल नजरो से देखने लगी| शायद वो भी इंतजार कर रही थी कि कब मैं उसके स्तनों को चुमुंगी| फिर क्या था? मैं  उसके एक स्तन को अपने हाथो से पकड़ कर छूने लगी और उसे तरसाने लगी| उसके मुलायम सुडौल स्तन पर फिसलती हुई सैटिन स्लिप पर छूने का आनंद ही कुछ और था| उसने भी अपने दोनों हाथो से मेरे स्तनों को पकड़ लिया| मैंने उसका एक स्तन उसकी स्लिप से बाहर निकाला और फिर अपने होंठो से चूम ली| आनंद में अल्का ने अब अपनी आँखें बंद कर ली थी| मुझे एहसास था कि उसे बेहद मज़ा आ रहा है क्योंकि वो उस आनंद में मेरे स्तनों को और जोर से दबाने लगी| फिर अपनी जीभ से मैंने उसके निप्पल को थोडी देर चूमने के बाद, अपने दांतों से उसके निप्पल को काट दिया| अल्का अब दीवानी हो कर कहने लगी, “ज़रा और ज़ोर से कांटो”| फिर उसने मेरे सर को पूरी ताकत से अपने सीने से लगा लिया| मैंने अपने दुसरे हाथ से उसका लिंग पकड़ लिया| कहने की ज़रुरत नहीं है पर हम दोनों मदहोश हो रही थी| मैं तो सालो से एक स्त्री के साथ सेक्स करने में सहज थी और इस नए रूप में अब पुरुष तन का आनंद लेना भी सिख गयी थी मैं|और अल्का तो एक ही शरीर में स्त्री और पुरुष दोनों ही थी|

उसी उन्माद में फिर हम दोनों एक दुसरे को चूमने लगी| अल्का ने मेरा सर अपने हाथो में पकड़ कर मुझे चूमना शुरू कर दिया था| उसकी सैटिन स्लिप का मखमली स्पर्श मुझे उतावला कर रहा था और वहीँ मेरी नाज़ुक काया पर लिपटी हुई साड़ी उसे दीवाना कर रही थी| और हम दोनों के स्तन एक दुसरे को दबाते हुए मानो खुद खुश हो रहे थे| अल्का ने मेरे सीने से मेरी साड़ी को उठा कर मेरे ब्लाउज के अन्दर हाथ डाल लिया| वह जो भी कर रही थी वो मेरे अंग अंग में आग लगा रहा था| और उसका लिंग मेरे हाथो में मानो और कठोर होता जा रहा था|

अल्का ने एक बार फिर मेरी साड़ी को कमर तक उठा लिया| उसका इरादा स्पष्ट था| अब उसका लिंग मेरी योनी में सामने से प्रवेश करने वाला था| मैं भी बस उसी पल के इंतजार में थी| मैंने अपना पेतीकोट उठा कर उसके लिए रास्ता भी आसान कर दिया था| साड़ी की यही तो ख़ास बात है, बिना उतारे ही आप झट से प्यार कर सकते है| यह मैं भी जानती थी और अल्का भी| अल्का ने फिर धीरे से अपना लिंग मेरी योनी से लगाया| और  मैंने उस बड़े से लिंग को अपने अन्दर समा लिया| उसके अन्दर आते ही मैं और जोर जोर से आवाजें निकालने लगी| इस दौरान हम दोनों एक दुसरे के स्तन दबाकर उन्मादित थे| धीरे धीरे हमारी उत्तेजना बढती गयी, दोनों की आवाजें तेज़ होती गयी, हवा में अल्का के स्तन उसकी स्लिप से बाहर आकार झुमने लगे, और दोनों की आँखें बंद हो गयी| और उस उत्तेजना की परम सीमा पर पहुच कर हम दोनों ने एक दुसरे का हाथ कस कर पकड़ लिया| और फिर अल्का का एक आखिरी स्ट्रोक और हम दोनों एक ही पल में … बस मुझे कहने की ज़रुरत है क्या? यह वो रात थी जब मेरे तन में एक नए जीवन का प्रवेश हुआ| हाँ, उस रात के बाद अब मैं माँ बनने वाली थी!

पिछले ६ महीने

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अल्का और मैं, हम दोनों बहुत अच्छी सहेलियाँ बन गयी थी!

पिछले ६ महीने हम पति पत्नी के जीवन में नयी खुशियाँ और नई परीक्षा लेकर आया था| मेरे पति अब घर आकर तुरंत स्त्री के कपडे पहनते, मेकअप करते और अल्का बन जाते| मेरे पति अब क्रॉस ड्रेसर बन चुके थे और मैं इस स्थिति से खुश थी| मुझे एक सहेली मिल गयी थी| जब भी मौका मिलता हम दोनों सहेलियाँ बाहर शौपिंग करने या घुमने फिरने निकल पड़ती| दोनों को एक बार फिर जैसे नए सिरे से प्यार हो गया था| हम दोनों के कद काठी अलग अलग थी तो ड्रेस अलग अलग ही खरीदते पर साड़ियां अब साथ मिल कर लेते थे| पर ब्लाउज हमें अलग अलग सिलवाने पड़ते थे| जहाँ मैं अब एक औरत बन कर थोड़े पारंपरिक से ब्लाउज कट सिलवाने लगी थी, वहीँ वो ज्यादा सेक्सी ब्लाउज सिलवाने लगे थे| पुरुष तन को स्त्री के रूप में निखारने में वो कोई कमी नहीं रहने देना चाहते थे|

पर समय के साथ उनकी स्त्री बनने की इच्छा तीव्र होती जा रही थी| उन्होंने बाल भी बढ़ाना शुरू कर दिया था| पर मुझे शॉक उस दिन लगा जब उन्होंने घर लौट कर कहा कि अब वो ऑपरेशन करा कर पूरी तरह स्त्री बनना चाहते है| मैं तो एक पल के लिए अन्दर ही अन्दर टूट गयी थी क्योंकि चाहे जो भी हो, अब मैं एक स्त्री थी और मुझे सम्पूर्ण करने वाले पति यानी पुरुष का साथ चाहिए था| पर उन्होंने बेहद प्यार से मुझे गले लगाया और फिर मुझसे इस बारे में और बात की| फिर हमने मिलकर निर्णय लिया कि वह ब्रेस्ट इम्प्लांट करवाएंगे पर पूरी तरह लिंग परिवर्तन नहीं कराएँगे| मैं नहीं चाहती थी की वो अपना पूरा पुरुषत्व ख़त्म कर दे| ऑपरेशन के बाद ३४ बी साइज़ के उनके स्तन इतने बड़े भी नहीं थे कि दिन में अपनी नौकरी में वो पुरुष रूप में जाए तो छुप न सके| पर इतने छोटे भी न थे उनका आनंद न लिया जा सके| मेरा जीवन अब बेहद सुखी था| और उनका भी| अब मुझे पूरी तरह औरत होने का अनुभव करने में बस एक ही कमी रह गयी थी, मैं माँ बनना चाहती थी| मुझे उन्हें मनाने में थोडा समय लगा पर एक दिन वो मान ही गए|

अगले ९ महीने

अपने शरीर में पलती हुई एक नयी जान को लेकर चलने के वो ९ महीने का अनुभव शायद मेरे जीवन का अब तक सबसे प्यारा अनुभव रहा| इस दौरान मुझे अल्का के रूप में मुझे समझने वाली सहेली मिली तो पति के रूप में सहारा बनने वाला पुरुष भी| पर धीरे धीरे उन्होंने अल्का बनना कम कर दिया था, क्योंकि वो जानते थे कि अब मुझे एक पुरुष का सहारा चाहिए था| आखिर वो प्यार भरे ९ महीनो में ,अपने अन्दर पलते हुए जीवन को अब बाहर लाने का वक़्त आ गया था| बड़े प्यार से ९ महीने पाला था उसे, पर अब मैं हॉस्पिटल में प्रसव पीड़ा में थी| उस दर्द में तड़पते हुए तो मानो एक पछतावा हो रहा था कि क्यों मैंने माँ बनने का निर्णय लिया| पर उस पीड़ा को तो सहना ही था|अब उससे पीछे नहीं पलट सकती थी|

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9 महीने अपनी कोख में एक जान को पालना मेरे जीवन का सबसे प्यारा अनुभव था

मेरी प्रसव पीड़ा पूरे १४ घंटे रही| पर उसके बाद जब डॉक्टर ने मेरे हाथो में एक नन्ही सी जान को सौंपा तो मेरी आँखों में ख़ुशी के आंसू आ गए| मैं एक बेटी की माँ बन गयी थी| माँ, सबसे प्यारा अनुभव| औरत होने के सारे सुख दुःख इस अनुभव के सामने फीके है! मैंने अपनी बेटी को प्यार से गले से लगा लिया| मैं भावुक होकर सारा दर्द भूल चुकी थी| इसके बाद मुझे नर्स ने सिखाया कि बच्चे को दूध कैसे पिलाना है| उस बच्ची ने जब मेरे स्तन से दूध पीया तो जैसे मेरे अन्दर से प्यार की अनंत प्रेम धारा बह  निकली| मैं आँखें बंद करके उस प्यार को महसूस करने लगी| जब यह सब हो रहा था तब मेरे पति मेरे साथ ही थे| वो बहुत खुश थे पर उनकी आँखों में मैं एक बात देख सकती थी| उनके अन्दर हमारा शरीर बदलने के पहले वाली पत्नी परिणीता थी, जो सोच रही थी कि वो भी कभी माँ बन सकती थी और यह सुख वो भी पा सकती थी| पर किस्मत ने उनको अब आदमी बना दिया था| मैंने उनके दिल की बात सुनकर उन्हें पास बुलाकर कहा, “सुनो, अपनी बेटी को नहीं देखोगे?” उन्होंने प्यार से बेटी को गले लगा लिया| फिर मैंने उनके कान में धीमे से कहा, “हमारी बेटी भाग्यशाली है कि उसके पास एक पिता और दो माँ है!” मेरी बातें सुनकर उनकी आँखे भी नम हो गयी| उन्होंने कहा, “हाँ! और हमारी भाग्यशाली बेटी का नाम होगा प्रतीक और परिणीता की दुलारी “प्रणिता”!”

कुछ दिनों बाद

अब हम पति पत्नी घर आ गए थे| प्रणिता को दूध पिलाकर मैं उसे अपनी बगल में सुलाकर सोने को तैयार थी| वो भी आज बड़े दिनों बाद अल्का बन कर मेरी बगल में सोने आ गए| उन्होंने एक मुलायम सा गाउन पहना हुआ था उन्होंने मुझे प्यार से गले लगाकर गुड नाईट कहा और हमारा तीन सदस्यों का परिवार चैन की नींद सो गया|

अगली सुबह जब मैं उठी तो मेरे चेहरे पर खिड़की से सुनहरी धुप आ रही थी| लगता है मैं ज्यादा देर सो गयी थी| इतनी गहरी नींद लगी थी उस रात कि सुबह होने का अहसास ही न रहा| आज कुछ बदला बदला सा लग रहा था| अब तक मैंने अपनी आँखे नहीं खोली थी| पर मेरे स्तन आज हलके लग रहे थे जबकि उन्हें दूध से भरा होना चाहिए था| फिर भी अंगडाई लेती हुई जब मैंने आँखे खोली तो जो द्रिश्य था उसको देख कर आश्चर्य तो था पर ख़ुशी भी| मेरी आँखों के सामने मेरी पत्नी परिणीता बैठी हुई थी और उसकी गोद में हमारी बेटी प्रणिता सो रही थी| परिणीता ने ख़ुशी से मेरी ओर पलट कर देखा और चहकते हुए बोली, “हम फिर से अपने अपने रूप में आ गए प्रतीक! मैं फिर से परिणीता बन गयी हूँ और तुम मेरे पति प्रतीक!”

मैंने खुद को देखा तो मैंने वो गाउन पहना हुआ था जो कल रात मेरे पति पहन कर सोये थे| मैं फिर से आदमी बन गयी थी| मुझे एक पल को तो यकीन ही नहीं हुआ| इस नए बदलाव का मुझ पर क्या असर हुआ? क्या मुझे इस बात का दुख था कि अब मैं औरत नहीं थी? बिलकुल नहीं, मुझे बल्कि बेहद ख़ुशी थी| परिणीता की ख़ुशी देख कर स्त्रि का तन खोने का मुझे कोई दुख नहीं था| अब मैं फिर से एक क्रॉस ड्रेसर आदमी बनने को तैयार थी| पर अब मेरे पास वो कुछ था जो पहले न हुआ करता था| अब मेरे पास ऐसी पत्नी थी जो मेरे जीवन के क्रॉस ड्रेसिंग वाले इस पहलू को समझ सकती थी, एक ऐसी पत्नी जो मेरा सहयोग करने को तैयार थी| और तो और अब मेरे बाल लम्बे थे और मेरे पास स्तन भी थे! ज़रा सोच कर देखिये एक क्रॉस ड्रेसर को और क्या चाहिए इससे ज्यादा?

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अब तो सोच कर यकीन ही नहीं होता कि मैं कभी संपूर्ण औरत बन कर एक बच्ची को जन्म भी दी थी या कभी किसी पुरुष से शारीरिक प्यार भी किया था| सब कुछ सपने की तरह है!

परिशिष्ट

आज लगभग २ साल हो चुके है उस रात से जब मैं प्रतीक से परिणीता बन गयी थी| और अब कुछ महीने बीत चुके है मुझे फिर से प्रतीक बने| आज भी हम दोनों पति-पत्नी को यकीन नहीं होता कि हमारे साथ ऐसा भी हुआ था| सोच कर ही अजीब लगता है कि मैं एक पुरुष से प्रेम करने लगी थी! या एक स्त्री के तन में मैं कभी थी भी| मैंने एक बच्चे को माँ बनकर जन्म दिया था, एक सपने सा लगता है| पर ऐसा सब हमारे साथ क्यों हुआ था? इसका जवाब हमारे पास नहीं है|पर जो हुआ उसने हमारा जीवन हमेशा के लिए बदल दिया था| हम दोनों के बीच अब बहुत प्यार है| हम दोनों एक दुसरे की परेशानियों को और दिल को बेहद अच्छे तरह से समझ सकते है, जो समझ हम दोनों में पहले न थी|अब मैं जानती हूँ कि औरत के रूप में परिणीता कितनी मुश्किलों का सामना करती है, और अब वो समझती है कि एक पुरुष होकर औरत बनने की लालसा क्या होती है| इसी समझ की वजह से अब मैं जब मन चाहे स्त्री रूप में अल्का बन सकती हूँ| पर इन सबसे ज्यादा, अब हमारे जीवन को पूरा करने वाली बेटी प्रणिता है जिसकी दो मांए है!

यह मेरी कहानी का अंतिम भाग था| फिर भी पिछले २ सालो में और भी बहुत कुछ हुआ था जिसके बारे में मैंने लिखा नहीं है| जैसे जब मैं परिणीता के शरीर में थी तब मेरी माँ के साथ मेरा रिश्ता कैसे बदल गया? उनकी नजरो में अब मैं उनका बेटा प्रतीक नहीं बल्कि बहु परिणीता थी? या मेरे सास ससुर के साथ मेरा रिश्ता जो अब मुझे अपनी बेटी की तरह देखते थे? या मेरी बहन के साथ उसकी शादी के समय मेरा समय कैसा बीता जब मैं उसका भैया न होकर प्यारी भी थी?  इन सब के बारे में समय मिला तो ज़रूर लिखूंगी| उसके लिए आपका सब्र, प्यार और कमेन्ट भी चाहिए| आखिर आपको मेरी कहानी कैसी लगी थी ज़रूर बताना| चाहे तो ब्लॉग पर या फिर फेसबुक पर कमेंट करे| मैं इंतज़ार करूंगी आपके प्यार भरे सन्देश का!

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मैं परिणिता: भाग १४


अब तक आपने मेरी कहानी में पढ़ा: यह कहानी है मेरी भावनाओं की, एक आदमी से औरत बनकर जो भी मैंने अपने बारे में समझा| मेरे दिल से निकली इस कहानी में प्यार है, सुकून है, सेक्स भी है, और औरत होना क्या होता उसकी सीख भी| जब से होश संभाला है, मैं जानती हूँ कि मेरे अंदर एक औरत बसी हुई है। पर दुनिया की नज़र में मैं हमेशा प्रतीक, एक लड़का बनकर रही। कुछ साल पहले जब मेरी शादी परिणीता से हुई, तो उसे भी मेरे अंदर की औरत कभी पसंद न आयी। हम दोनों पति-पत्नी US में डॉक्टर बन गए। पर मेरे अंदर की औरत हमेशा बाहर आने को तरसती रही। किसी तरह मैं अपने अरमानों को घर की चारदीवारियों के बीच सज संवर कर पूरा करती थी। पर आज से ३ साल पहले ऐसा कुछ हुआ जो हम दोनों को हमेशा के लिए बदल देने वाला था। उस सुबह जब हम सोकर उठे तो हम एक दूसरे में बदल चुके थे। मैं परिणीता के शरीर में एक औरत बन चुकी थी और परिणीता मेरे शरीर में एक आदमी। हमारे नए रूप में सुहागरात मनाने के बाद हमारा जीवन अच्छा ही चल रहा था, और एक औरत के बदन में मैं बेहद खुश थी| पर परिणीता, जो अब मेरी पति थे? अब आगे –

“साड़ी के पल्ले को ऐसे अपने कंधे पर यूँ फैलाते है और बाकी की साड़ी से अपने पूरे तन को ऐसे फैलाकर ढँककर देखने से आपको बिना साड़ी को पहने ही बेहतर अंदाज़ा हो जाता है कि ये साड़ी पहनने के बाद आप पर कैसी लगेगी| अब बताओ मुझ पर कैसी लगेगी ये साड़ी?” मेरे पतिदेव बड़ी ही ख़ुशी से खुद पर साड़ी लगाकर प्रदर्शन कर रहे थे और मैं उनकी ख़ुशी देख कर हँस हँस कर पागल हो रही थी| अपने पति के तन पर साड़ी देख कर किसी भी औरत को अटपटा ज़रूर लगता पर मैं सामान्य औरत न थी| आज से तीन हफ्ते पहले तक मैं एक क्रॉस ड्रेस करने वाला आदमी थी और मेरे पति तब एक औरत होने के साथ साथ मेरी पत्नी परिणीता थे|

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मैंने ठान लिया था कि मैं अपने पति को साड़ी पहनने में सहयोग करूंगी| जिस स्थिति से मैं खुद गुज़र चुकी थी मैं नहीं चाहती थी की वो भी उस दुःख से गुज़रे|

हाँ जी, मेरे पति, परिणीता, को मैं साड़ी पहनने वाली थी!  ज़िन्दगी भी कैसे कैसे खेल खेलती है| “पत्नी ने पहनाई पति को साड़ी”, जब मैं क्रॉस-ड्रेसर थी, तब न जाने क्यों, कितनी ही बार मैं इन्टरनेट पर यह गूगल में खोजा करती थी| तब मेरी पत्नी परिणीता ने मुझे साड़ी पहनाना तो दूर, वह तो मुझे साड़ी में देखना तक नहीं चाहती थी| मैं सोचती थी कि दुनिया में क्या कोई भाग्यशाली क्रॉस-ड्रेसर है जिनकी पत्नियाँ उनको सहयोग करती है और अपने हाथो से साड़ी पहनाती है? तब मुझे क्या पता था कि एक दिन मैं खुद ही औरत बन जाऊंगी और मेरी तब की पत्नी परिणीता, मेरे पति बन जायेंगे| आदमी बनने के बाद भी परिणीता के अन्दर दिल तो औरत का ही था! और वो फिर से औरत की तरह से सजना संवरना चाहता था| पर उनके दिल में यह चिंता थी कि जब उन्होंने पहले मुझे हमेशा औरतों के कपडे  पहनने से मना किया था तो अब जब वह खुद आदमी बन चुके है तो कैसे वह अब औरतों के कपडे पहने? इसी बात से मेरे पति दुखी थे| अब एक औरत के रुप में मुझे वह करना था जो मैं पहले एक आदमी होते हुए अपनी पत्नी से उम्मीद करती थी| मुझे एक सहयोगी पत्नी बनना था! मैं नहीं चाहती थी कि मेरे पति उस दुःख से गुज़रे जो मैंने सहा था| मैंने ठान लिया था कि मैं उनकी पत्नी, उन्हें अपने हाथो से एक बेहद खुबसूरत औरत बनाऊँगी!

और इसीलिए मैं अपना पुराना क्रॉसड्रेसिंग का बक्सा लेकर उनके सामने बैठी थी| और वो, मेरी खरीदी हुई मखमली साड़ियों को खोल खोलकर अपने हाथो से छूकर अपने तन पर लगा कर देख रहे थे कि वो कौनसी साड़ी पहनेंगे| मैंने उन्हें अपनी ड्रेस्सेस भी दिखाई थी पर उन्हें कोई पसंद नहीं आई थी| उनके विचार में मेरी ड्रेस की चॉइस बड़ी ख़राब थी| पर ६ फूट की औरत के कद के लिए अच्छी ड्रेस मिलना आसान भी तो नहीं होता! पर फिर भी आज बड़े दिनों बाद उनकी आँखों में मैं ख़ुशी की चमक देख रही थी|

“प्रतीक, मानना पड़ेगा कि तुम्हारी साड़ियों की चॉइस बड़ी है|”, उन्होंने कहा| वो अब भी मुझे प्रतीक कहते है| आखिर में मैं प्रतीक ही हूँ भले अब एक औरत के शरीर में हूँ| मैं मुस्कुरा दी| उन्हें साड़ियों को खोलते हुए देख कर मुझे बेहद ख़ुशी मिल रही थी| वो एक एक साड़ी को खोल कर पल्ले को अपने कंधे पर लगाकर देखते, जैसे औरतें करती है| यह भी ज़िन्दगी का अजीब पल था, परिणीता जब औरत थे, तब उनका साड़ियों में कम और ड्रेस में ज्यादा इंटरेस्ट था पर अब इस नए जीवन में साड़ियों के लिए कितने उत्साहित लग रहे थे| वैसे सच कहूँ तो शायद उन्हें ज्यादा ख़ुशी इस बात की थी कि वह फिर से औरत होना महसूस करने वाले थे|

जहाँ मैं उन्हें खुश देखने में खोयी हुई थी, मेरा ध्यान ही न रहा कि मेरे पास उस बक्से में कुछ ऐसे कपडे भी थे जो मुझे सेक्सी औरत की तरह महसूस करने में मदद करते थे| मैं  नहीं चाहती थी कि उनकी नज़र उन पर पड़े| पर अब तो देर हो चुकी थी|उन्ही में से एक था मेरा ब्लाउज जो कि सच कहू तो बेहद सेक्सी था| उसमे पीठ काफी खुली रहती थी और पीछे से हुक लगती थी|उन्होंने उसे उठा कर कहा, “हम्म तो तुम्हे सेक्सी ब्लाउज पसंद है! इतना एक्स्पोस तो मैं औरत होकर भी नहीं करता था! और ब्लाउज की कटोरियों को देख कर तो लगता है कि तुम्हे बड़े बूब्स बहुत पसंद है|” वो मसखरी कर रहे थे|

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अपने पति को साड़ी पसंद करते देख मुझे बेहद ख़ुशी हो रही थी| अब वो मेरे जीवन का क्रॉस ड्रेसर वाला पहलु समझ सकते थे

“पतिदेव! जब मैंने वो ब्लाउज सिलवाई थी तब मैं एक ६ फूट की आदमी थी| और जब ६ फूट की औरत बनना हो तो स्वाभाविक दिखने के लिए बड़े बूब्स ही चाहिए|”, मैंने थोडा शरमाते हुए कहा| मुझे थोड़ी लाज तो आ ही रही थी क्योंकि मेरे क्रॉस ड्रेसर जीवन का पहलु मैं उनके साथ पहली बार इस तरह खुलकर शेयर कर रही थी| और यह सच था कि परिणीता से कहीं अधिक सेक्सी ब्लाउज थे मेरे पास|

“चलो पतिदेव, अब तुमने साड़ी पसंद कर ली हो तो मैं तुम्हे तैयार कर दूं|”, मैंने कहा| मैं भी अपनी पहनी हुई साड़ी की प्लेट ठीक करते हुए उठी और उनसे बोली की चलो अब कपडे उतारो|

“मुझे तैयार करना है? मैडम मैं तुम्हारे सामने कपडे नहीं उतारूंगा|”, उन्होंने कहा| “मेरे प्यारे पतिदेव, आपको याद न हो तो पिछले तीन हफ्तों में आपकी पत्नी बन कर रातों को मैंने आपको कई बार नग्न देखा है| तब तो आपको कोई परेशानी न थी|”, मैंने उनके चेहरे के बेहद करीब आकर कहा और उनके शर्ट के बटन खोलने लगी| भला वो उन हसीं रातों को कैसे भूल सकते थे जब मैंने पत्नी बन कर उनको सुख दिया था| मेरी सेक्सी मुस्कान से वो थोडा शर्मा गए|

“सुनिए मैडम, तुम भूल रही हो कि तुम्हे सिर्फ तीन हफ्ते हुए है औरत बने, जबकि मैं सालो तक औरत था| मुझे साड़ी पहनना आता है| मैं खुद पहन लूँगा| तुम्हे सिखाने की ज़रुरत नहीं है|”, उन्होंने कहा| मैं देख सकती थी कि उनमे अभी भी एक झिझक थी| एक सुन्दर औरत से आदमी बन जाना और फिर आदमी होते हुए पत्नी के सामने साड़ी पहनना उनके लिए आसान नहीं था| वो मुझसे और इस स्थिति से थोडा बौखला गए थे|

पर मैं भी एक प्यारी पत्नी थी| मैंने उन्हें अपने गले से लगा लिया और उनका सर अपने सीने पे रख दिया| मेरे स्तनों के बीच उन्हें ज़रूर प्यार महसूस हुआ होगा| फिर मैंने कहा, “मैं जानती हूँ कि तुम एक सुन्दर औरत थे| मैं जानती हूँ कि तुम खुद तैयार हो सकते हो| पर मैं भी जानती हूँ कि आदमी के शरीर को स्त्री रूप में सँवारने में क्या क्या दिक्कत आती है| मुझ पर भरोसा करो|”

मेरी बात मानते हुए उन्होंने अपने कपडे उतार लिए| जब तक वे साड़ियां खुद पर लगा लगा कर पसंद कर रहे थे, मैं उन्हें देख कर मुस्कुराती हुई उनके पहनने के लिए पॉकेट ब्रा और हिप पैड लेकर आई| आखिर में उन्होंने एक लाल रंग की मखमली साड़ी अपने कंधे पर लगायी और उससे अपने तन को ढंकते हुए मेरी ओर देख कर उत्साहित होकर बोले, “यह कैसी लगेगी मुझ पर?” उनका चेहरा खिल गया था|

उन्हें देख कर मेरी आँखें भर आई| वो आज मेरी उन भावनाओं को महसूस कर रहे थे जो मैं पहले क्रॉस ड्रेस करते वक़्त महसूस करती थी| वो साड़ी से अपने पूरे तन को ढकने की कोशिश कर रहे थे, पर एक चीज़ थी जो छुप न पा रही थी| मखमली साड़ी के स्पर्श से उनका पुरुष लिंग तन गया था और साड़ी में वह उभर कर दिख रहा था| वो थोडा शर्मा गए| अपने अनुभव से मैं जानती थी कि एक क्रॉस ड्रेस करने वाले पुरुष के लिए कई बार ऐसा होना स्वाभाविक है| मैंने उसे नज़रंदाज़ करते हुए उन्हें अपने हाथो से उन्हें हिप पैड वाली पैंटी पहनाई| पर एक औरत होते हुए तना हुआ लिंग ऐसे ही नज़रंदाज़ नहीं हो जाता| उस लिंग को पैंटी के अन्दर करते हुए मेरे तन में कुछ कुछ होने लगा| पर इस वक़्त मुझे मेरे पति, परिणीता, को औरत बनाना था| न कि उन्हें पुरुष होने का शारीरिक सुख देना था|

और फिर मैंने उन्हें बड़े प्यार से तैयार करना शुरू किया। मैं चाहती थी कि आज वो अपने पुरुष तन में वही नज़ाकत महसूस कर सके जो एक स्त्री महसूस करती है। इसलिए आज मैंने उन्हें साटिन की पेंटी और ब्रा पहनाई। और फिर मैचिंग पेटीकोट। और फिर धीरे धीरे प्यार से उनके तन पर साडी लपेट कर प्लेट बनाने लगी। मेरे नाज़ुक हाथों का स्पर्श शायद उन्हें स्त्री होने का सुख भी दे रहा था। और वैसे भी कोई भी औरत आपको बता सकती है कि कितनी प्यारी भावना है जब कोई और औरत आपको प्रेम से साड़ी पहना रही हो। मैंने उनके ब्लाउज पर साड़ी चढ़ाते हुए पूछा, “आप खुला पल्ला पसंद करेंगे या प्लेट किया हुआ?” उन्होंने मेरी आँखों में देखा पर कुछ न बोल सके। मैंने ही निश्चय किया कि वो खुला पल्ला पहनेंगे। खुला पल्ला जब प्यार से आपके हाथो पर स्पर्श करता है , वह जो स्त्रीत्व की भावना जगाता है वह एक पल में ही एक क्रॉस ड्रेसर को बेहद ही भावुक स्त्री बना सकता है। जब मैं पल्ले को उनके ब्लाउज पर पिन से लगा रही थी, उन्होंने अपने हाथों से मखमली पल्ले को छूते हुए अपनी आँखें बंद कर ली। मैं जानती थी कि वह क्या अनुभव कर रहे थे। आखिर मैं भी पहले एक क्रॉस ड्रेसर रह चुकी थी।

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हमने तय किया कि आज वो खुले पल्ला रखेंगे| स्त्रीत्व महसूस करना हो तो खुले पल्ले से बेहतर कुछ नहीं है| आखिर गिरते हुए पल्लू को सँभालने की नजाकत ही कुछ और होती है|

फिर मैंने उन्हें एक कुर्सी पर बैठाया ताकि मैं उनका मेकअप कर सकूँ। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ कर कहा, “थैंक यू प्रतिक! पर मैं मेकअप खुद कर सकता हूँ। मुझे  मेकअप करना आता है।”

“पतिदेव, पहले तो कहिये कि मैं मेकअप कर सकती हूँ! अब आप एक औरत है!” मेरी बात सुनकर उन्होंने एक औरत की तरह शर्मा कर नज़रे झुका ली। “पर आज मैं आपको मेकअप करने नहीं दूँगी। पुरुष के चेहरे को स्त्री की तरह निखारना एक अलग कला है जो अभी आपको आती नहीं है।  पर मैं अच्छी तरह जानती हूँ। मेरा भरोसा करिये मैं आपको बेहद सुन्दर औरत बनाउंगी!”

हम दोनों मुस्कुराये| और जल्द ही मैंने उनका मेकअप भी कर दिया।  मेकअप के बाद वो उस साड़ी में बेहद ही आकर्षक औरत में तब्दील हो गए थे। आखिर क्यों न होते, मैंने वह साड़ी बहुत सोच समझकर खरीदी थी उस तन के लिए। और आज मुझे खुद पर बड़ा गर्व था कि मैंने बहुत सलीके से उन्हें साडी पहनाई थी और मेकअप भी बहुत अच्छा कर सकी थी।

मैं फिर उनकी कुर्सी के पीछे से आकर अपने हाथों को उनके गले पर रख कर कुर्सी को शीशे की ओर घुमाया। परिणीता अब खुद को देख सकते थे। उन्हें यकीन ही न हुआ कि उनका पुरुष तन इतनी सुन्दर औरत में तब्दील हो सकता था। एक हाथ से उन्होंने अपने ब्लाउज की ऊपर की साड़ी की बॉर्डर के ऊपर फेर कर देखा। और फिर अपने चेहरे को हाथ लगाने लगे। उनकी आँखों में आज ख़ुशी के आंसू थे।

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परिणीता अब एक औरत बन चुके थे और औरत बनने की ख़ुशी उनके चेहरे पर साफ़ झलक रही थी|

“जानू, आज मैं एक भी आंसू और नहीं देखना चाहती।”, मैंने उन्हें प्यार से गले लगाते हुए कहा। वो भावुक होते हुए मुस्कुरा दिए। “थैंक यू प्रतिक। पर मेरे बालों का क्या होगा?”, उन्होंने अपने सर के छोटे छोटे बालों को हाथ लगाते हुए कहा।

मैं तो इसी पल के इंतज़ार में थी। सभी क्रॉस ड्रेसर जानते है कि जब तैयार होने के बाद अंत में आप लंबे बालो का विग लगाते है तो मानो एक पल में ही जादू हो जाता है। और मैं चाहती थी कि यह जादुई पल वह खुद अनुभव करे। और जैसे ही मैंने उन पर विग लगाया, वो ख़ुशी के मारे उठ खड़े हुए और अपने हाथों को हवा में फैलाकर अपनी साड़ी के पल्लू को लहराते हुए गोल गोल घूमने लगे। उनके शरीर में छुपी हुई मेरी पत्नी परिणीता वापस आ गयी थी। उनको ख़ुशी में झूमते देख मेरी आँखों में भी ख़ुशी थी।  और फिर हमने एक दुसरे को गले लगा लिया। उनके सीने से लग कर मैं भी बेहद खुश थी।

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आपका शरीर चाहे जैसा हो, साड़ी आपके तन की सभी कमियों को छुपा देती है, यह तो क्रॉस ड्रेसर बड़े अच्छे से जानते है| मेरे पति भी अब आकर्षक औरत लग रहे थे, बस उन्हें मेरी तरह खुला पल्लू सँभालने का अनुभव न था|

“सुनिये, क्योंकि आपका नाम परिणीता तो अब मेरा हो चूका है। क्या आपने अपने स्त्रीरूप के लिए कोई नया नाम सोचा है?”

“हाँ। वही नाम जिस नाम से तुम इस रूप में रहा करती थी। ‘अल्का’ ”

अल्का, यही नाम मैं उपयोग करती थी जब मैं प्रतिक से औरत बन जाया करती थी। अल्का का मतलब होता है खूबसूरत बालों वाली लड़की, और वही तो बनती थी मैं। और अब मेरे पति, मेरी सहेली अल्का बन चुके थे। आज हम दोनों के बीच एक नए रिश्ते की शुरुआत हो रही थी।  सच कहूँ तो हमारे तन एक दुसरे में बदलने का सबसे बड़ा फायदा यही हुआ था। भले औरत का तन पाने की मुझे बहुत ख़ुशी थी पर सबसे ज्यादा ख़ुशी इस बात की थी कि मुझे अब एक सहेली मिल गयी थी जिसके साथ मैं औरत होने का पूरा आनंद ले सकती थी! मैं परिणीता और मेरी प्यारी सहेली अलका! अगले भाग में हम दो सहेलियोँ की हॉट रात के बारे में पढना मत भूलियेगा, जब हम दो सहेलियाँ दो जिस्म एक जान हो गयी थी| अगला भाग मेरी इस कहानी का अंतिम भाग होगा,  तो पढ़ते रहिये और फेसबुक पर हमारे पेज को पसंद करना न भूलियेगा!

To be continued …

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मैं परिणिता: भाग १३


अब तक आपने मेरी कहानी में पढ़ा: जब से होश संभाला है, मैं जानती हूँ कि मेरे अंदर एक औरत बसी हुई है। पर दुनिया की नज़र में मैं हमेशा प्रतीक, एक लड़का बनकर रही। कुछ साल पहले जब मेरी शादी परिणीता से हुई, तो उसे भी मेरे अंदर की औरत कभी पसंद न आयी। हम दोनों पति-पत्नी US में डॉक्टर बन गए। पर मेरे अंदर की औरत हमेशा बाहर आने को तरसती रही। किसी तरह मैं अपने अरमानों को घर की चारदीवारियों के बीच सज संवर कर पूरा करती थी। पर आज से ३ साल पहले ऐसा कुछ हुआ जो हम दोनों को हमेशा के लिए बदल देने वाला था। उस सुबह जब हम सोकर उठे तो हम एक दूसरे में बदल चुके थे। मैं परिणीता के शरीर में एक औरत बन चुकी थी और परिणीता मेरे शरीर में एक आदमी। हमारा पहला दिन अपने नए रूप को  समझने में बीत गया। और हमारी पहली रात, हमारी सुहागरात उसके बारे में तो पहले ही बहुत बातें कर चुकी हूँ| अब मैं रिश्ते में पत्नी बन चुकी थी और परिणीता पति|  अब आगे –

तीन हफ्ते बाद

अब तक करीब तीन हफ्ते बीत चुके थे जबसे हम पति-पत्नी के तन बदल गए थे| इन तीन हफ्तों में कुछ दिक्कतें भी आई, औरत होने में कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, मैं वह सीख रही थी जो कभी प्रतीक, एक आदमी रहकर मुझे पता भी न चलता| परिणीता, जो अब मेरे पतिदेव है, उन्हें भी शायद कुछ दिक्कतों का सामना करना पड़ा पर उन्हें देखकर मुझे कभी ऐसा महसूस न हुआ| वो पहले से ही मुश्किलों का सामना हिम्मत से कर लेते थे, जब वो औरत थे तब भी| पर इन तीन हफ्तों में हमें अब तक ज़रा भी अंदाजा न था कि आखिर हमारे तन क्यों और कैसे बदल गए? रोज़ हम इस बारे में सोचते थे| लगता था कि भगवान हमें कुछ सिखाना चाहते है और यदि हम ख़ुशी ख़ुशी वह बात जल्दी से सीख जाए तो हम शायद वापस अपने पहले वाले रूप में आ जाए| इसके बावजूद हमारा जीवन ख़ुशी से चल रहा था| जब भी कोई नयी परिस्थिति आती जिसमे मुझे पता न होता कि क्या करना है, तब मेरे इस तन में चल रहे परिणीता के दिमाग में बसी यादों को थोडा जोर लगाकर पढ़ लेती कि परिणीता ऐसी स्थिति में क्या करती| ऐसा ही कुछ आज भी हुआ पर मुझे ध्यान ही न रहा कि मैं अपने दिमाग में बसी परिणीता की यादों का सहारा ले सकती हूँ| आज मेरे पेट में जोरो का दर्द हो रहा था| उस दर्द से परेशान होकर मैं आज काम से जल्दी ही घर वापस आ गयी|

मैं कार लेकर घर आ गयी थी| घर पहुच कर मैंने इन्हें फ़ोन लगाया कि आज वो टैक्सी लेकर वापस आये| पर मुझे उनके फ़ोन की घंटी अन्दर बेडरूम से सुनाई दे रही थी| क्या वो आज फोन घर पर ही भूल गए? मैं अन्दर कमरे में जाकर देखती हूँ तो वो वहीँ थे| वो बिस्तर पे बैठे रो रहे थे और उनके बगल में कुछ मेरी ड्रेसेज, जो पहले उनकी हुआ करती थी, बिखरी पड़ी हुई थी| मेरी अलमारी भी खुली हुई थी और सब कुछ बिखरा हुआ था| मैं समझ नहीं सकी कि आखिर हुआ क्या था| चिंतित होकर  मैं तुरंत उनके पास गयी और उन्हें गले लगा ली| उनका सिर अपने सीने पे रख कर मैं उन्हें चुप कराने की कोशिश करने लगी| मैं जानती थी कि एक औरत के सीने में सर रख कर हर किसी को प्यार अनुभव होता जो किसी की भी परेशानियों को दूर करने में मदद करता है| मेरे दिल से सच में चिंता और प्यार के बीच यह सवाल आ रहा था कि आखिर वह रो क्यों रहे है? आखिर क्या हुआ? सच तो यह था कि उनके दिल में बहुत समय से कुछ बातें चल रही थी| परिणीता ने एक हफ्ते पहले उन बातों को अपनी प्राइवेट डायरी में लिखा भी था| पर न मैं उनकी दिल की बातें न समझ सकी थी और न ही मैंने उनकी डायरी पढ़ी थी| आप ही पढ़ के देखे तो आपको समझ आ जाएगा|

प्रिय डायरी,

तुमसे बातें किये न जाने कितना समय हो गया. पिछली बार जब तुमसे बात की थी तब मैं कितनी ख़ुशी थी. तब मैं एक औरत थी, परिणीता थी. पर आज मैं एक आदमी के तन में हूँ, और दुनिया मुझे प्रतीक कहती है, पर मैं हूँ तो परिणीता! जब से आदमी बनी हूँ, हमेशा मन में सवाल आता रहता है कि आखिर ऐसा क्यों और कैसे हो गया मेरे साथ? पर  इस सवाल का कोई जवाब नहीं है मेरे पास .

इस दौरान मैं आदमी होने के फायदे भी देख रही हूँ. लोग मेरी बात एक ही बार में सुन लेते है. मुझे  तैयार होने में ज्यादा समय नहीं लगता. कपडे मैचिंग करने का झंझट नहीं और न ही सैंडल पहन कर  दिन भर अपने पैर दुखाने का झंझट. साथ ही पति बनने के फायदे भी है. मेरी पत्नी मेरी खूब सेवा करती है!

मेरी तरह प्रतीक भी बदल कर अब औरत हो चुके है. एक औरत के रूप में वो कितने खिल गए है. बातूनी, कॉंफिडेंट, उनकी पर्सनालिटी में ज़बरदस्त बदलाव आया है. जैसे उन्हें दुनिया में अब कोई कुछ करने से रोक नहीं सकता. बहुत खुश है वो औरत बन कर. पारंपरिक पत्नी के सारे गुण है उनमे, और इतनी ख़ुशी से मेरी सेवा करते है जैसे हमेशा से ही वो औरत ही बनना चाहते थे. और यह सच भी है. मैं जानती हूँ कि वो औरतों की तरह पहले से ही सजना संवरना पसंद करते थे, पर मैं उन्हें मौका नहीं देती थी. और अब जब उन्हें मौका मिला है तो वो खुलकर जी रहे है. मैं भी अब उनका साथ दे रही हूँ. उनको खुश देखकर मुझे भी अच्छा लगता है. और उनके लिए मुझे पति बनकर उन्हें प्यार से ट्रीट करना भी बड़ा आसान है. आखिर मेरे दिमाग में उनकी यादें भी तो है, जो मुझे याद दिला देती है कि यदि वो होते तो अपनी पत्नी के साथ कैसे सलूक करते. तो अब मैं भी समय समय पर उनकी खूबसूरती की तारीफ़ कर देती हूँ, समय समय पर किस देती हूँ, अपनी बांहों में भर लेती हूँ. और इन छोटी छोटी बातों से ही वो खुश हो जाते है. या ख़ुशी हो जाती है? न जाने क्या कहूँ मैं?

वैसे मेरे मना करने पर भी उन्होंने आखिर हॉस्पिटल में साड़ी पहनकर जाना शुरू कर दिया है.  US में काम करते हुए भला कौन साड़ी पहन कर जाता है ? पर वो मेरी बात सुनते ही नहीं . कहते है कि  ड्रेस में उन्हें ठण्ड लगती है . हाँ मुझे भी लगती थी पर इस देश के पहनावे  को अपनाना भी ज़रूरी है . खैर, कई बार ड्रेस भी पहन कर जाते है बाहर. पर घर में तो बस पक्की भारतीय नारी . न जाने कैसे इतनी आसानी से साड़ी पहन लेते है वो. और हॉस्पिटल में सभी उनकी तारीफ़ करते है. डॉ परिणीता हॉस्पिटल में इतनी पोपुलर हो गयी है कि लोग मुझे आकर बधाई देते ही कि बहुत खुबसूरत पत्नी पाई है आपने! मैं मन ही मन सोच कर हँस लेती हूँ कि डॉ. परिणीता के अन्दर अब परिणीता ही नहीं है, बल्कि प्रतीक है, जिसने परिणीता को इतना पोपुलर बना दिया! पर कहाँ है परिणीता? मैं हूँ परिणीता? अब एक आदमी बन कर …

याद आता है मुझे वह सब कुछ, कैसे मैंने प्यार से ढेरो ड्रेसेस अपने लिए खरीदी थी और उनसे मैचिंग सैंडल, आज जिनमे प्रतीक घूमते है. उन्हें साड़ी में देख कर मेरा भी मन करने लगा है कि मैं भी अपना औरत वाला जीवन फिर से जी सकू. जितनी आसानी से वो पत्नी बन चुके हैं, मैं वैसी तो नहीं थी, पर वैसी होने की तमन्ना है मेरी| मैं भी पति की सेवा करना चाहती हूँ. मैं भी चहकना चाहती हूँ. फिर से ड्रेस पहनकर बाहर घूमना चाहती हूँ, एक फूल की तरह नाज़ुक राजकुमारी जैसे फिर से महसूस करना चाहती हूँ मैं. पर अब मैं इस आदमी के तन में कैद हो गयी हूँ. मैं तो शायद अब अपनी ड्रेस में फिट भी न आऊंगी और इस मर्दाने शरीर में न जाने कैसी लगूंगी मैं.  मेरे शरीर पर इतने बालों से नफरत सी हो रही है मुझे . और रोज़ रोज़ शेव करके तंग आ चुकी हूँ. क्या मैं फिर से औरतों के कपडे पहन कर स्त्री होने का अनुभव कर सकती हूँ? पर प्रतीक से क्या कहूँगी मैं? जब वो आदमी थे, मैं उन्हें यह करने से रोकती थी. अब मैं खुद आदमी होकर यह कैसे कर सकती हूँ? मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है. क्या अब मैं पहले वाले प्रतीक की तरह क्रोस्ड्रेसर बन चुकी हूँ? मेरे दिमाग में प्रतीक की याद है और मैं जानती हूँ कि उसका एक क्रोस्ड्रेसर के रूप में एक फेसबुक अकाउंट है, जिसका पासवर्ड मुझे याद है. क्या मुझे वहां जाकर देखना चाहिए कि इस आदमी के तन में मैं औरत कैसे बनू? पर न जाने प्रतीक की कैसी कैसी बातें मुझे जानने को मिलेगी. क्या मैं उनको जानने को तैयार हूँ? वैसे भी मेरे दिमाग में उनकी क्रोस्ड्रेसिंग से जूडी यादें थोड़ी थोड़ी आती रहती है जिनको मैं दबाती रहती हूँ पर अब मैं खुद वैसा ही महसूस करने लगी हूँ. क्या करूँ मैं ?

भगवान यदि मेरी आवाज़ सुन रहे हो तो प्लीज़ मुझे वापस औरत बना दो. यदि तुम यही चाहते थे कि मैं एक अच्छी पत्नी बनू तो मैं उसके लिए तैयार हूँ. प्लीज़ मुझे फिर से औरत बना दो.

अब तो आप समझ ही गए होंगे की परिणीता के दिमाग में क्या चल रहा था| काश कि परिणीता ने मुझसे यह बातें पहले ही बता दी होती| मैं भी अपनी नयी ज़िन्दगी की ख़ुशी में मगन थी| और मेरा ध्यान उनकी ओर कभी गया ही नहीं| आखिर उस दिन परिणीता ने मुझे सब कुछ बताया| उन्होंने कहा कि कैसे वो मेरी अपनी ड्रेसेज पहन कर फिर से औरत बनना चाह रहे थे पर उनके बड़े से तन में एक भी ड्रेस नहीं गयी| और तो और उन्हें लग रहा था कि वो औरतों के कपडे पहन कर बड़े ख़राब लगेंगे| परिणीता उन्ही बातों से गुज़र रहे थे जो मैंने सालो तक महसूस किया था| कैसी अजीब सी स्थिति थी हमारी| वो कुछ देर तक मुझसे गले लग कर रोते रहे| मुझे पता था आगे क्या करना है| पर मेरे पेट में दर्द और मरोड़े मुझे बेहद तकलीफ दे रही थी| मैं अपने पेट को पकड़ कर दबाने की कोशिश करने लगी|

“प्रतीक, क्या हुआ तुम्हे?”, परिणीता ने मुझसे पूछा| “तुम चिंता मत करो परी, बस पेट में बड़ा दर्द हो रहा है| शायद मैंने कुछ ज्यादा खाना खा लिया था| जल्दी ठीक हो जाएगा| पर ऐसा पेट दर्द पहले कभी नहीं हुआ”, मैंने परिणीता की चिंता दूर करने की कोशिश की|

परिणीता ने अपना फोन चेक किया| फिर मेरी ओर देख कर बोले, “पगली, तुम्हारे पीरियड शुरू होने वाले है! ये दर्द ऐसे बैठे बैठे नहीं जाएगा|”

“क्या? मेरे … मेरे पीरियड?”, मैं तो यकीन ही नहीं कर पा रही थी| अब तक औरत बनना तो बस सब हँसने खेलने जैसा था| पीरियड के बारे में तो मैं कभी सोची भी नहीं थी| हम क्रोस्ड्रेसर बस सोचते है कि औरत बन कर जीवन बस सुन्दर होगा पर यह भी हकीकत है और आसान नहीं! मेरा दर्द बढ़ता जा रहा था|

“तुम यहाँ बैठो, मैं एक मिनट में आता हूँ”, ऐसा कहकर परिणीता बाथरूम चले गए और फिर किचन| वापस आये तो उनके हाथ में कुछ गोलियां थी और एक पैड| “ये ३ गोली खा लो, कुछ देर बाद तुम्हे दर्द से आराम मिलेगा|” उन्होंने मुझे पानी भी दिया| “क्या पीरियड के लिए गोलियां भी आती है?”, मैंने अंजान होंते हुए मासूमियत से  पूछा| “नहीं पगली, यह दवा सिर्फ दर्द कम करने के लिए है”, उन्होंने कहा| मैंने गोलियां खा ली|

फिर वो नीचे झुके और मेरे पैरो के पास आकर बैठ गए| फिर अचानक ही वो मेरी साड़ी पैरो पर से सरकाकर हाथों  से उठाने लगे| “यह क्या कर रहे हो तुम?”, मैंने झट से वापस अपनी साड़ी को नीचे करते हुए उनसे कहा| “मुझे करने दो जो मैं कर रहा हूँ|”, वो भी बेहद तेज़ी से मेरी साड़ी उठाकर मेरी पैंटी तक अपना हाथ ले गए| मैं गुस्से में आकर बोली, “ये कोई तरीका है परी? मैं यहाँ दर्द में हूँ और तुम यह कर रहे हो?” मैंने गुस्से में उनका हाथ हटाया| मुझे शर्म सी भी आ रही थी|

वो मेरी ओर देखे और बोले, “देखो, क्या तुम्हे सेनेटरी पैड लगाना आता है? जल्दी से न लगाया तो कुछ देर बाद, तुम्हारी साड़ी में दाग लग जाएगा| चाहोगी तुम कि ऐसा हो? तुम्हारी साड़ी ख़राब हो जाए?” मैं अब थोड़ी शांत हो गयी| वो मेरे बारे में ही सोच रहे थे| फिर उन्होंने मेरी पैंटी नीचे घुटनों तक उतारकर उसमे पैड फिट किया और मुझे बताया की उसे कैसे एडजस्ट करना है| मुझे उनके सामने पैड पहन कर एडजस्ट करने में शर्म तो आ रही थी पर अगले कुछ दिनों तक दाग धब्बे का डर तो था ही| फिर उन्होंने मेरे पैरो को उठाकर मुझे लिटा दिया और बोले, ” तुम कुछ देर आराम करो| जल्दी ही दर्द कम होगा|” मैंने उनका हाथ पकड़ कर उन्हें रोका| उनके हाथ को प्यार से चूमा और बोली, “मैं क्षमा चाहती हूँ कि मैं तुमसे नाराज़ हो गयी थी जबकि तुम मेरे मदद कर रहे थे|” वो मुस्कुरा दिए|

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दवाई लेकर कुछ देर मैंने लेटकर आराम किया| आधे घंटे के बाद दर्द कुछ कम हुआ| यदि आज परिणीता न होती तो पीरियड के दाग मेरी साड़ी में लग गए होते|

करीब आधे घंटे दवाई के असर से मेरा दर्द कम होने लगा| तो मैं उठ कर उस कमरे में गयी जहाँ मैं पहले प्रतीक के रूप में जाकर छुप छुप कर औरत बना करती थी| मैंने अपना वो बॉक्स उठाया जिसे परिणीता ने कभी नहीं उठाया था| अब मुझे परिणीता के दिल का दर्द दूर करना था| मैं बॉक्स लेकर उनके पास गयी|

“मेरी प्यारी धरमपतनी, तुम उठ क्यों गयी? अभी तो दर्द ख़त्म भी नहीं हुआ होगा तुम्हारा”, वो मेरी चिंता करते हुए बोले|

“क्योंकि जानू, मुझे तुम्हे कुछ दिखाना है”, मैंने कहा|

वो जानते थे कि वह बॉक्स मैं किस लिए उपयोग लाती थी पर परिणीता ने कभी उसके अन्दर झांककर भी नहीं देखा था| मैंने बॉक्स खोलकर उन्हें एक तस्वीर दिखाते हुए बोली, “ज़रा इस औरत को देख कर बताओ कि कैसी लग रही है? सच सच बताना|”

उन्हें वह तस्वीर देख कर जैसे यकीं ही नहीं हुआ| वो तस्वीर को पकड़ कर देखते ही रह गए| मैंने फिर कहा, “तुम्हे चिंता थी न कि उस तन में तुम औरत की तरह नहीं लगोगे| इस तस्वीर को देख कर बताओ, यह औरत कैसी लग रही है?”

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मैंने उन्हें अपने पुराने बक्से से निकाल कर अपनी तस्वीर दिखाई जब मैं प्रतीक से एक औरत बना करती थी| वो मेरी तस्वीर को देखते ही रह गए| उन्हें यकीं ही नहीं हुआ कि मैं एक खुबसूरत औरत लग सकती थी

वो थोड़ी देर रूककर मेरी आँखों में देखते रहे और फिर मुझे गले लगाकर बोले, “बहुत सुन्दर औरत है| मुझे यकीन नहीं होता कि तुम पहले खुद को इतनी सुन्दर औरत के रूप में तब्दील कर लेते थे| मुझे माफ़ कर दो प्रतीक कि मैंने तुम्हे कभी खुलकर जीने नहीं दिया|”

मैं मुस्कुराते हुए बोली, “पतिदेव, उस बक्से में तुम्हारी साइज़ की ड्रेस भी है और साड़ियां भी, और उनसे मैच करते ब्लाउज भी| पर तुम्हे सिर्फ उन्ही कपड़ो को पहनना ज़रूरी नहीं है| फिलहाल तुम उसमे से कोई एक साड़ी सेलेक्ट कर लो, मैं तुम्हे तैयार करूंगी, और हम साथ में तुम्हारी पसंद के कपडे खरीदने जायेंगे|”

“क्या सच में? तुम ऐसा करोगी मेरे लिए? मैं ऐसे कैसे साड़ी पहन कर बाहर जाऊँगा?”, उनकी आवाज़ में ख़ुशी भी थी और एक डर भी|

“मेरे पति के लिए कुछ भी करूंगी मैं| और साड़ी पहन कर तुम वैसे ही जाओगे जैसे तुम पहले जाया करती थी| एक बार फिर उस तस्वीर की औरत को देखो और बताओ, वो बाहर जायेगी तो लोग उसकी खूबसूरती को देखते रह जायेंगे या नहीं?” मैं खुश थी| हमारे रिश्ते में वो मोड़ जो आ गया था जहाँ परिणीता अब मेरे जीवन के उस पहलू को समझने वाली थी जिसे मैंने सालों तक दबा कर रखा था| इत्तेफाक देखिये, मैं औरत बन गयी और मुझे पति मिला, वह भी क्रोस्ड्रेसर!

To be continued …

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मैं परिणिता: भाग १२


अब तक आपने मेरी कहानी में पढ़ा: जब से होश संभाला है, मैं जानती हूँ कि मेरे अंदर एक औरत बसी हुई है। पर दुनिया की नज़र में मैं हमेशा प्रतीक, एक लड़का बनकर रही। कुछ साल पहले जब मेरी शादी परिणीता से हुई, तो उसे भी मेरे अंदर की औरत कभी पसंद न आयी। हम दोनों पति-पत्नी US में डॉक्टर बन गए। पर मेरे अंदर की औरत हमेशा बाहर आने को तरसती रही। किसी तरह मैं अपने अरमानों को घर की चारदीवारियों के बीच सज संवर कर पूरा करती थी। पर आज से ३ साल पहले ऐसा कुछ हुआ जो हम दोनों को हमेशा के लिए बदल देने वाला था। उस सुबह जब हम सोकर उठे तो हम एक दूसरे में बदल चुके थे। मैं परिणीता के शरीर में एक औरत बन चुकी थी और परिणीता मेरे शरीर में एक आदमी। हमारा पहला दिन अपने नए रूप को  समझने में बीत गया। और हमारी पहली रात, हमारी सुहागरात उसके बारे में तो पहले ही बहुत बातें कर चुकी हूँ| अब मैं रिश्ते में पत्नी बन चुकी थी और परिणीता पति| इसके बाद, अगला दिन शुरू हुआ जब हमें काम पर हॉस्पिटल जाना था| अब आगे –

हम दोनों घर से निकल कर हॉस्पिटल काम पर जाने को तैयार थे| हम दोनों एक दुसरे का हाथ पकडे कार की ओर चल पड़े| मेरे कंधे पर मैंने लेडीज पर्स टंगा रखा था| यूँ तो मैंने यह कल भी किया था पर आज मैं कल से ज्यादा कॉंफिडेंट औरत थी| सच कहूं तो मुझे अब तक पता नहीं था कि उस पर्स में आखिर परिणीता क्या क्या रखा करती थी| पर अब वो मेरा पर्स हो गया था! और परिणीता मेरा पुरुष वाला बटुआ पैंट की जेब में रख कर चल रही थी? या चल रहे थे? चल रहे थे ज्यादा सही होगा। क्योंकि वो अब आखिर पति है मेरे! मैं तो अपने स्त्री वाले तन में बेहद खुश थी| किसी नाज़ुक कली की तरह महसूस कर रही थी खुद को! अच्छा हुआ जो कल हम दोनों ने अपनी सुहागरात मना ली थी| उस वजह से आज चलते वक़्त मन में कामुकता थोड़ी कम थी और मैं अपने तन और सौंदर्य को प्यार से अनुभव कर पा रही थी| सालो से औरत बन कर बाहर खुली हवा में घुमने की तमन्ना थी पर वो ऐसी पूरी होगी मैं कभी सोची भी नहीं थी| यदि मेरी तरह किसी का लिंग अचानक ही बदल जाए तो उनके जीवन में कई परेशानियाँ आएँगी, पर उन सबसे निश्चिन्त मैं तो बेहद खुश थी इस परिवर्तन से| मेरे पति परिणीता भी खुश लग रहे थे| पर शायद मैं अपने स्वार्थ में खो गयी थी जो उनके मन को उस वक़्त पढ़ न सकी थी| यह सब बाद में बताऊंगी|

पहले पति होने की वजह से मेरी आदत थी कि कार हमेशा मैं ही चलाती थी| आज भी वही करने वाली थी पर परिणीता ने मुझे रोका और कहा, “रुको ज़रा| आज मैं पति हूँ तुम्हारा, कार मुझे चलाने दो”| हाय, मैं कितनी खुश हुई यह बात सुनकर आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते| परिणीता मुझे पत्नी होने का सुख दे रहे थे| मैं ख़ुशी से पैसेंजर सीट पर बैठ गयी| चलने के पहले मैंने कहा, “सुनो जी! पति सिर्फ कार ही नहीं चलाते, अपनी पत्नी की तारीफ़ भी करते है! लगता है आपको पति की जिम्मेदारी सिखने में थोडा समय लगेगा|” वो मुस्कुराये और कहा, “तुम बेहद खुबसूरत लग रही हो!” मैंने कहा, “चलो झूठे, सच्ची तारीफ़ करो तो माने!” मेरी बात सुनकर वो बोले, “हम्म, शायद मुझे पति होना क्या होता है सिखने में समय लगेगा, पर तुम पहले ही परफेक्ट पत्नी बन चुकी हो!” उनकी बात सुनकर हम दोनों हंस पड़े और अपनी मंजिल की ओर चल दिए| सुहानी सुबह में बाहर सब कुछ सुन्दर लग रहा था| शायद सब कुछ पहले से ही था बस मैं एक नयी नज़र से दुनिया को देख रही थी| आखिर अब मैं आज़ाद थी, एक आदमी एक पति होने के बंधन से मुक्त जो हो गयी थी |

जल्दी ही हॉस्पिटल आ गया| पहले जब मैं पति थी तो कार से निकल कर काम पर जाने के पहले हमेशा परिणीता को किस करती थी| पर अब तो मैं औरत थी, अब भला मैं कैसे आगे बढ़कर अपने पति को चुमू? पर मेरे होंठ तो तरस रहे थे| शायद परिणीता ने मेरे मन को भांप लिया था, वो मेरी ओर पलते, मेरे चेहरे को अपने हांथो में लेकर उन्होंने मुझे बड़ा प्यार भरा चुम्बन दिया| अब मैं भला कहाँ रुकने वाली थी? मैंने भी बढ़कर अच्छे से उन्हें ज़ोरो से चुम्बन दिया| औरत के होंठो पे जो गज़ब सी अनुभूति होती है मैं तो उसको एक बार फिर अनुभव करना चाहती थी| क्या कहूँ मैं अपने पति से एक पल भी दूर नहीं रहना चाहती थी। उनके तन से लगकर हमेशा एक बने रहने की ख्वाहिश थी।

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काम पर जाने के पहले मैंने भी उन्हें बड़े प्यार से चुम्बन दिया । मैं उनसे एक पल भी दूर नहीं रहना चाहती थी

उसके बाद उन्होंने मुझसे कहा, “प्रतीक, आज हॉस्पिटल में तुम्हे सभी परिणीता कहेंगे और मुझे डॉ प्रतीक| दिल में एक डर भी है। प्रतीक, आज सब ठीक होगा न?” वो शायद थोड़े से इस नयी परिस्थिति से घबराये हुए थे, और शायद उनके अन्दर की परिणीता कह रही थी जो अपने पति प्रतीक का सहारा चाहती थी| मुझे इस बात का अहसास हो गया था| कुछ देर के लिए मेरे अन्दर का आदमी जाग गया जो अपनी पत्नी को सहारा देना चाहता था| मैंने कहा, “परी, तुम तो बेहद हिम्मतवाले हो| मुझे यकिन है कि सब ठीक होगा|” मैंने उन्हें गले लगाया| उसके बाद उन्हें अच्छा लगा और वो अपने (यानि डॉ प्रतीक) के कैबिन की तरफ चल दिए| मेरा नया केबिन (यानि डॉ परिणीता का केबिन), उनके यहाँ से ज्यादा दूर नहीं था| मैं भी वहां चल दी| अब ज़रा परिस्थिति का अहसास हुआ| और मेरे पैर डर से कांपने लगे|

मेरे कैबिन पहुँचते ही मुझे मेरी असिस्टेंट नतालिया मिली| मुझे तो उसका नाम तक पता नहीं था पर परिणीता की याददाश्त मेरे पास थी इसलिए उसका नाम याद आ गया| हमारी बातें इंग्लिश में हुई पर मैं हिंदी में बताती हूँ|

“हाय नतालिया| गुड मोर्निंग”, मैंने मुस्कुराकर कहा|

“गुड मोर्निंग डॉ. परिणीता| वाह आज तो आपके चेहरे पे नयी दमक दिख रही है!”, नतालिया बोली| मैं मन ही मन खुश हुई और बोली, “कैसी दमक?” “डॉक्टर, वही दमक जो सुहानी रात के बाद चेहरे पे दिखती है| लगता है डॉ. प्रतीक की किस्मत कल काफी अच्छी रही”, नतालिया मसखरी कर रही थी| औरतें ऐसी बातें आपस में करती है मुझे अंदाज़ा न था| मैंने जवाब में कहा, “डॉ. प्रतीक से ज्यादा मैं किस्मत वाली रही, अगर तुम समझ रही हो मेरी बात?” कहकर मैं हँस दी| नतालिया मेरी ओर आश्चर्य से देखती रह गयी| मैं सोच में पड़ गयी कि वह मेरी ओर ऐसे क्यों देख रही थी| तब मेरे दिमाग से आवाज़ आई, “इडियट, अपनी असिस्टेंट को यह कहने की क्या ज़रुरत थी? वो तो मसखरी करती ही रहती है|” पर वो आवाज़ मेरी नहीं थी| वो आवाज़ इस शरीर में चल रहे परिणीता के दिमाग की थी! आखिर यह शरीर यह दिमाग और उसमे सारी यादें परिणीता की ही थी, जिसमे अब मैं अपनी नयी यादें जोड़ रही थी| इसी कारण अब मैं जब भी कुछ करती तो पहले परिणीता का दिमाग कुछ कहता जिसमे सालो की कुछ आदतें थी, और मेरा मन कुछ और कहता| कभी परिणीता का दिमाग जीत जाता तो कभी मेरा मन| पर धीरे धीरे मेरा मन परिणीता के दिमाग को बदल रहा था| पर फिलहाल तो यह बस दूसरा दिन था इस बदन में| और अब तक परिणीता का दिमाग पूरी तरह मेरे वश में न था।

दिन में कई मरीज़ आये मेरे ऑफिस में| मुझे कई बार एहसास हुआ कि कुछ पुरुष मरीज़ मेरे स्तनों की ओर घूरने लगते| मुझे थोड़ी शर्म सी आ रही थी| अच्छा हुआ मेरी ड्रेस से मेरा उपरी हिस्सा गले तक ढंका हुआ था और बाकी का तन डॉक्टर के सफ़ेद कोट से| पर फिर भी स्तनों का आकार ड्रेस में अच्छी तरह से उभर कर आ रहा था। शायद मेरी ब्रा का असर था कि मेरे स्तन काफी बड़े लग रहे थे। यदि आदमियों की निर्लज्जता परेशान करने वाली थी तो औरतें भी कम नहीं थी। औरतें जब आती तो वो तो अपनी पूरी जीवन की कहानी सुनाने बैठ जाती| जब तक मैं आदमी थी, ऐसा कुछ नहीं होता था| मरीज़ काम की बात करते थे, और मैं भी| जल्दी जल्दी सब कुछ हो जाता था| पर मुझे औरत देख कर न जाने क्यों औरतें लम्बी कहानियाँ सुनाने लगती|

एक औरत जो अपनी बेटी को दिखाने आई थी वह  मुझसे बोली, “तीन तीन बच्चे सँभालने में मेरा दिन निकल जाता है, पर माँ होने का सुख भी तो बहुत है| आप भी तो माँ होंगी न?” मैंने कहा, “नहीं, अब तक नहीं|” मैं इस बारे में बात नहीं करना चाहती थी पर वो मुझसे कहती है, “क्यों? कितनी उम्र है आपकी?” मैं बोली, “३०| आप ये दवाई अपनी बेटी को दिन में दो बार दीजियेगा। ” मैंने उन्हें दवाई के नाम लिख कर दिए| “आप ३० साल की है? और अब तक बच्चे नहीं? कोई परेशानी?”, औरत ने पूछा| मुझे बेहद गुस्सा आने लगा पर किसी तरह काबू करके बोली, “मेरे अगले मरीज़ का समय हो गया है| धन्यवाद्|” उफ़ क्या चिपकू औरत थी जैसे औरत का काम सिर्फ बच्चे पैदा करना है| हम्म कुछ देर सोचने पर मुझे माँ बनने का ख्याल थोडा अच्छा लगा पर अभी मैंने औरत का जीवन जीया ही कितना था| और यह भी नहीं पता था कि कब मैं दोबारा पुरुष बन जाऊंगी| हम पति पत्नी का शरीर परिवर्तन अब तक एक अनसुलझी पहेली था|

कुछ और मरीज़ देखने के बाद लंच का समय हो गया| जैसे ही समय हुआ मैं पतिदेव के कैबिन चली गयी और वहां जाते ही कैबिन का दरवाज़ा अन्दर से बंद कर दी| उनको देख कर उन्हें गले लगाऊं या अपने दिल की भड़ास निकालू, समझ नहीं आया।

“ओह माय गॉड| इतना ख़राब दिन जा रहा है मेरा! जाहिल आदमी मुझे, तुम्हारी पत्नी, को घूरते है और औरतें अपनी बेकार की बातें बंद ही नहीं करती| उनकी वजह से मेरा काम इतना धीरे हो रहा है|”, मैं अपनी भड़ास परिणीता यानी मेरे पति पर निकाल रही थी| वो मुस्काए और बोले, “मेरा दिन तो बहुत अच्छा रहा| इतने सारे मरीज़ मैंने पहले कभी इतने कम समय में पूरे नहीं किये थे|” हम दोनों को अब कुछ समझ आ रहा था| मैं एक औरत होने का चैलेंज देख रही थी और परिणीता एक आदमी होने का फायदा देख पा रही थी| यह तो सिर्फ शुरुआत थी, मुझे और भी कई सारी बातें सीखनी थी औरत होने के बारे में| वहीँ परिणीता तो खुश लग रहे थे| उन्होंने मुझे अपनी गोद में बैठा लिया| उनकी गोद में बैठ कर मैंने कहा, “परी प्लीज़ बोलो तुम मुझे प्यार करते हो? और मुझे खुश करो प्लीज़! आखिर पत्नी हूँ तुम्हारी! ” यह क्या कर रही थी मैं? मैं ऐसी तो नहीं थी? शायद परिणीता वाला दिमाग मुझ पर हावी था| उन्होंने मुझे कहा कि वो मुझसे बेहद प्यार करते है| उनकी बात सुनकर मैं खुश हो गयी|

“पता है आज एक औरत मुझसे कहती है कि मेरे अब तक बच्चे क्यों नहीं है? मैं माँ क्यों नहीं बनी? तुम सोच सकते हो?”, मैं उनसे बोली| “हाहा”, वो हँस दिए और बोले, “अरे ये औरतें यह सब कहती रहेंगी| तुम उनकी बातों को अनसुना कर देना या कह देना कि तुम प्लान कर रही हो| यकीन करो जल्दी ही ये बातें सुनने की तुमको आदत हो जायेगी| ये औरतें तो ठीक है पर जब तुमसे मेरी माँ या अपनी माँ से बात करोगी और वो तुमसे यह कहेंगी, तब क्या करोगी?”, उन्होंने कहा| हाय, मेरी माँ तो मुझे अब अपना बेटा नहीं अपनी बहु समझ कर यह बोलेगी| मुझे तो सोच कर ही बेहद अजीब लग रहा था| सोचते सोचते मैं अपनी उँगलियों से अपने मंगलसूत्र के साथ खेल रही थी। औरतें नर्वस हो जाए तो ऐसा करती है, और मैं भी बिना सोचे ही यह कर रही थी।

“क्या कभी मेरी या तुम्हारी माँ ने  तुमसे बच्चो के बारे में कुछ कहा था? जब तुम औरत थे?”, मैंने परिणीता से  पूछा| “कभी? अरे जब भी बात करो तब| तुम्हारी माँ से ज्यादा मेरी माँ पीछे पड़ी थी कि मेरी उम्र बीती जा रही है| जल्द से जल्द उन्हें नाती चाहिए।  चलो अब तुम्हे यह सुनने को मिलेगा! अब तुम निपटो!”, परिणीता ने कहा| “मैं क्या करूंगी?”, मैं सोचने लगी| पर उन्होंने मेरा हाथ पकड़ कर लंच के लिए बाहर ले गए| वो भी अब जेंटलमैन बन रहे थे| मुझे बेहद प्यार से रख रहे थे वो|

किसी तरह फिर दिन का काम ख़त्म हुआ| और घर पहुँचते ही मैंने ड्रेस बदल कर एक घरेलु साड़ी पहन ली| परिणीता तो मुझे ऐसे झट से साड़ी पहनते देखते ही रह गए| वो खुद जब औरत थे तब तो वो साल में २ या ३ बार ही साड़ी पहनते थे और वो भी बहुत समय लगा कर! मुझे साड़ी में देख कर उनकी आँखों में प्यार तो था पर कुछ और विचार भी थे, जो उस वक़्त मैं पढ़ न सकी थी| मैं तो ख़ुशी ख़ुशी उनके लिए खाना बना रही थी| मेरे हाथ का बना खाना खाकर वो बेहद खुश हुए| सच में पत्नी को जब पति को संतुष्ट देखने का अवसर मिलता है तो खुद पत्नी का मन भी संतोष अनुभव करता है| खाने के बाद हम सोफे पर बैठ गए| मैं  उनके सीने पे सर रख कर बैठी हुई थी| और  हमने साथ टीवी में एक प्रोग्राम देखा| कुछ देर बातें की| हँसे खेले| उनको मौका मिलने पर मेरे स्तनों को छेड़ना न भूलते थे| पत्नी होने का भरपूर मज़ा ले रही थी मैं| और वो भी बेहद अच्छे पति होने का रोल अदा कर रहे थे| उन्होंने हर पल मुझे बेहद प्यार दिया|

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घर आकर मैंने साडी पहन ली और एक अच्छी पत्नी की तरह खाना बनाने लग गयी। मैं परिणीता को इस बदलाव की वजह से कोई दिक्कत नहीं आने देना चाहती बल्कि उन्हें सारे सुख और आराम देना चाहती थी।

और इन सबके बाद, मैं एक लम्बी सी सैटिन नाईटी जो की स्लीवेलेस थी, वह पहन कर उनकी बांहों में सोने आ गयी| मखमली बदन पे सैटिन का अहसास, वो भी पति की बांहों में, अद्वितीय है| आश्चर्य था कि पूरे जीवन औरतों की तरह आकर्षित रहने के बाद मैं इतनी आसानी से एक पुरुष के इतने करीब आ चुकी थी| मैं एक पुरुष से प्यार करने लगी थी| पर पुरुष का तो सिर्फ तन था, आखिर अन्दर तो मेरी परिणीता ही थी| काश कि मैं उसके दिल की बात पहले पढ़ सकी होती, तो आगे जो होने वाला था उस बारे में मैं पहले ही कुछ कर पाती| पर उस वक़्त तो मैं अपने पति की बांहों में एक सुखी पत्नी की नींद सो गयी|

To be continued …

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मैं परिणिता: भाग ११


अब तक आपने मेरी कहानी में पढ़ा: जब से होश संभाला है, मैं जानती हूँ कि मेरे अंदर एक औरत बसी हुई है। पर दुनिया की नज़र में मैं हमेशा प्रतीक, एक लड़का बनकर रही। कुछ साल पहले जब मेरी शादी परिणीता से हुई, तो उसे भी मेरे अंदर की औरत कभी पसंद न आयी। हम दोनों पति-पत्नी US में डॉक्टर बन गए। पर मेरे अंदर की औरत हमेशा बाहर आने को तरसती रही। किसी तरह मैं अपने अरमानों को घर की चारदीवारियों के बीच सज संवर कर पूरा करती थी। पर आज से ३ साल पहले ऐसा कुछ हुआ जो हम दोनों को हमेशा के लिए बदल देने वाला था। उस सुबह जब हम सोकर उठे तो हम एक दूसरे में बदल चुके थे। मैं परिणीता के शरीर में एक औरत बन चुकी थी और परिणीता मेरे शरीर में एक आदमी। हमारा पहला दिन अपने नए रूप को  समझने में बीत गया। अब रात हो चुकी थी। हमारे नए रूप हमारी पहली रात, जिसमे मैं एक औरत थी जिसके तन बदन में कामुकता भरी आग लगी हुई थी, और परिणीता एक आदमी। मैंने अब अपनी सुहागरात की सेज की ओर कदम बढ़ा दिए थे। अब आगे –

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छम छम। मेरे पैरों की पायल की यह मधुर आवाज़ सुनकर मैं खुद ही शरमा रही थी। नयी दुल्हन की पायल की छमक किसे अच्छी नहीं लगती? आज तो मैं भी एक नयी दुल्हन थी। और दरवाज़ा खोल कर धीरे धीरे कदम बढ़ाते हुए मैं अपने पति परिणीता और अपनी सुहागरात की सेज की ओर बढ़ चली। मुझे बेहद शर्म भी आ रही थी। कोई भी नयी नवेली दुल्हन शर्माती है। और मैं तो पहली बार परिणीता के सामने साड़ी पहन कर आ रही थी। इसके पहले जब भी क्रोसड्रेस करते हुए मैं साड़ी पहनती तो हमेशा परिणीता से छुप छुप कर पहना करती थी। पर आज वो बदलने वाला था। परिणीता अब मेरे आदमी वाले शरीर में थी जिसमे एक आदमी वाला दिमाग चल रहा था। मैं भलीभांति जानती थी कि कल तक जब मैं पुरुष थी, मैं कितना चाहती थी कि मेरी तब की पत्नी परिणीता मेरे सामने आसमानी रंग की साड़ी पहन कर आये। बड़े शौक से खरीदी थी मैंने उसके लिए। तब एक पति के रूप में मैं जानती थी कि मुझे मेरी पत्नी के तन पर क्या आकर्षित करेगा। पर कभी परिणीता ने उसे पहना नहीं। और मैंने कभी सपने में भी न सोचा था कि वही साड़ी एक दिन मैं खुद पहनकर सुहागरात मनाऊंगी। उफ़, मेरा दिल कितना मचल रहा था। वह मेरी साड़ी का ब्लाउज जिस तरह मेरे स्तनों को कस कर चुम रहा था, वह अनुभूति शब्दों में कहना नामुमकिन है। मेरा ब्लाउज मेरे शरीर का ही अंग बन गया था और मुझसे प्यार से चिपक गया था।

मुझे आसमानी साड़ी में आते देख परिणीता मुझे एकटक अपनी बड़ी बड़ी आँखों से देखते ही रह गयी थी। मेरा अंदाज़ा सही था। मुझे इस साड़ी में देख कर परिणीता मंत्रमुग्ध थी। मैं बिस्तर में आकर परिणीता के बगल में आकर बैठ गयी। मेरे हाथों की चूड़ियों की खनक कमरे के उस वक़्त को और रोमांटिक बना रही थी। मेरे पति परिणीता ने मेरा हाथ पकड़ा, और मेरे गालों पे हाथ फेरते हुए कहा, “तुम बेहद खूबसूरत लग रही हो।” परिणीता ने मुझे अकेले में पहली बार एक औरत की तरह संबोधित किया। वरना अब तक वह मुझे एक औरत के शरीर में अपने पति प्रतिक के रूप में ही संबोधित कर रही थी।

मैं अपनी आसमानी नीली साड़ी में आकर उनके बगल में बैठ गयी। एक नयी नवेली दुल्हन की तरह मैं भी बेहद शरमा रही थी। 

“खूबसूरत लग रही हो”, यह शब्द सुनकर ही मैं शर्मा गयी और शर्म से अपनी  आँखें झुका ली। परिणीता ने अपने हाथो से मेरे चेहरे को उठाते हुए कहा, “मुझे नहीं पता था कि तुम इतने अच्छे से साड़ी पहनना जानती हो! मैं तो तुम्हारी सुंदरता पे दीवाना हो रहा हूँ।” परिणीता अब न सिर्फ मुझे एक औरत की तरह संबोधित कर रही थी बल्कि खुद भी अब अपने पुरुष रूप को स्वीकार कर रही थी। “आज मुझे समझ आ रहा है कि तुम मेरे लिए यह साड़ी क्यों खरीद कर लायी थी और क्यों मेरे पीछे पड़ी हुई थी कि मैं इसे पहनूँ। पर किस्मत को देखो यह साड़ी शायद तुम्हारे लिए ही बनी थी। सचमुच अद्भुत लग रही हो!”, परिणीता ने आगे कहा। “अब बस भी करो!”, कहते कहते मैं और शर्माने लगी।

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उनकी प्यार भरी बातें सुनकर मैं भावुक होकर उनके गले लग गयी। इस औरत के तन में मेरी भावुकता बेहद बढ़ गयी थी।

“सुनो, मुझे पता नहीं कि कब तक हम दोनों इस नए रूप में रहेंगे। शायद कल सुबह सब पहले की तरह बदल जाए और मैं फिर औरत बन जाऊं। पर जब तक मैं तुम्हारे पति के रूप में हूँ, मैं तुमसे कहना चाहता हूँ कि मैं तुम्हे बेहद प्यार करूंगा। मैं तुम्हे सुरक्षित रखूँगा और तुम्हे कोई परेशानी नहीं होने दूंगा। मैं हर पल तुम्हारा साथ दूंगा।”, परिणीता ने मुझसे बेहद प्यार के साथ कहा। यह सुनकर मैं भावुक हो गयी। मेरे अंदर जो औरत हमेशा से थी, वह भावनात्मक तो थी ही पर स्त्री के शरीर में वह भावुकता बहुत ही बढ़ गयी थी। सच बताऊँ तो मेरे दिल की यही इच्छा थी कि मेरी सुहागरात इसलिए हो कि हम दोनों पति पत्नी एक दुसरे के लिए प्यार अनुभव करे, न कि इसलिए की हमारे जिस्म के हार्मोन हमारे अंदर वासना जगा रहे थे। यही कारण था कि बेहद कामोत्तेजित और उतावली होने के बावजूद मैंने अपनी नाईटी छोड़कर साड़ी पहन कर आने का निर्णय लिया था। मैं जानती थी कि साड़ी में एक औरत एक भारतीय आदमी को सेक्सी तो ज़रूर लगती है पर प्यार भी बहुत जगाती है। कुछ तो जादू है साड़ी में, और आज साड़ी ने अपना काम बखूबी निभाया। मैं भावुक होकर अपने पति के गले लग गयी और कहा, “मैं भी वचन देती हूँ कि एक पत्नी के रूप में मैं अपना तन, मन, धन सब कुछ सिर्फ तुम पर न्योंछावर करूंगी।” उन्होंने भी मुझे गले लगा लिया और फिर मेरे गालो पर प्यार भरा चुम्बन दिया। मेरे चेहरे पर २ बूँद आंसू के साथ मुस्कान भी आ गयी।

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उनके हाथो का स्पर्श अपनी कोमल कमर पर महसूस कर और उनके मुंह से अपनी तारीफ़ सुनकर मैंने शर्म से अपनी आँखे निचे झुका ली।

उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और कहा,”आओ मेरे साथ”। “कहाँ ले जा रहे हो मुझे?”, मैंने कहा। “मेरे साथ आओ तो सही! पति की बात नहीं मानोगी?”, उन्होंने कहा। “आपकी आज्ञा सर आँखों पर!”, मैंने भी नखरे करते हुए कहा।

वो मुझे कमरे की बड़ी सी खिड़की के पास ले गए। मेरी कमर पर अपना  हाथ फेरते हुए उन्होंने मेरे कानों के पास आकर कहा, “फ़िल्मी डायलॉग है पर तुमसे आज तक किसी ने कहा न होगा। वो चाँद देख रही हो? यदि वह सुन्दर है तो मेरी पत्नी हज़ारो चाँद से भी  ज्यादा खूबसूरत है।” अब यह उनके शब्दों का असर था या उनकी गर्म साँसों का जो मेरी गर्दन पर महसूस हो रही थी, पर मैं फिर थोड़ा शर्मा गयी। तारीफ़ से भी और मेरे जिस्म में जो हो रहा था उसकी वजह से भी। वो मेरी कमर को जैसे छू रहे थे, मेरे अंग अंग में बिजली दौड़ रही थी।

“तुम तो बिलकुल नयी नवेली दुल्हन की तरह शर्मा रही हो!”, उन्होंने हँसते हुए कहा। “आखिर मैं नयी नवेली दुल्हन ही हूँ।”, मैंने कहा। वो मेरी ओर देखते रहे। “… और अब तक कुंवारी भी हूँ। यदि आप मेरा इशारा समझ रहे है।”, मैंने कहा और आँखों से नटखट इशारा किया। मेरी बात सुनते ही जैसे उनका खुद पर से वश ख़तम हो गया। उन्होंने झट से मुझे अपनी ओर पलटाया और मेरे नाज़ुक से तन को अपनी मजबूत बांहों में जकड़ लिया। मेरे स्तन और मेरा तन पूरी तरह से उनके आगोश में थे। मैं नज़ाकत के साथ  मुस्कुरा दी। एक औरत के स्तन जब पुरुष के सीने से लगकर दबते है तो जो महसूस होता है वह एक औरत ही समझ सकती है। और मैं बड़ी भाग्यशाली थी कि मुझे इस जन्म में यह मौका मिला। मैं उनकी आँखों में देखती रही और मेरी धड़कने तेज़ हो गयी। मेरी आँखों में देखते हुए उन्होंने आगे बढ़कर मुझे ऐसा चुम्बन दिया जो शायद मेरे जीवन का सबसे लंबा और सबसे नशीला चुम्बन था। उसके बाद तो जैसे मेरे होश ही उड़ गए।  मेरा मुंह खुला रह गया और कुछ पल को यह सोचती रह गयी कि यह क्या अनुभव किया मैंने। यदि औरत के जिस्म में चुम्बन इतना मदहोश करने वाला हो सकता है तो पुरुष रूप में तो मैंने इसका एक तुच्छ सा हिस्सा भी महसूस न किया था।

चुम्बन तो एक शुरुआत थी। उन्होंने फिर मुझे दीवार से टिकाया। मेरे पल्लू को मेरे कंधे से उतारा। उनका औरत के रूप में अपना पुराना अनुभव था जो उन्हें पता था कि मेरे आँचल को उतारने के लिए पिन कहाँ से खोलना है। फिर नीचे झुक कर उन्होंने मेरी नाभि को अपनी उँगलियों से छेड़ना शुरू किया। मेरे कोमल से पेट को वह चूमने लगे। हाय, मैं तो कुछ करने के काबिल ही न बची थी। बस जो हो रहा था उसे ही महसूस करके दीवानी हो रही थी। एक एक चुम्बन से मेरा पेट कांपने लगा। मेरे पेटीकोट और योनि के बेहद करीब चुम रहे थे वो। मैं तो बस आँहें भरती रह गयी। मेरी सांसें इतनी गहरी हो गयी कि मेरे स्तन हर सांस के साथ आगे बढ़ आते, और सांस छूटते ही पीछे हो जाते। बेहद कोशिश करके मैंने आँखें खोली तो कमरे के दूसरी दिवार पर शीशे में खुद को देख सकी। कितनी मादक लग रही थी मैं। मैं सोच रही थी अब वो मेरे पेटीकोट के अंदर हाथ डालकर मेरे पैरों को छूते हुए मुझे और छेड़ेंगे। पर उनका इरादा कुछ और ही था। उन्होंने मुझे फिर से पलट कर अब मेरी पीठ को चूमने लगे। मांसल पीठ पर चुम्बन इतना असर किया कि मेरी मदहोशी बढ़ती ही चली गयी। मैं आँखें बंद कर अपने रोम रोम में महसूस होने वाले रोमांच का अनुभव करने लगी। ऐसा रोमांच की मैं कुछ बोलने की हालत में ही न थी। मैं तो सोच कर आयी थी कि अपने पति को उसके जीवन का सबसे अद्भुत अनुभव दूँगी जो वो कभी भूल न सके पर आज तो मैं खुद ही होश खो चुकी थी। इतनी रोमांचित होने के बाद भी जब उनका लिंग पीछे से मेरे नितम्ब को छूता तो लगता न जाने और कितना ज्यादा उत्तेजित महसूस करूंगी मैं जब वो मेरे तन में प्रवेश करेगा। मैं जानने को आतुर थी पर मुझे यकीन न हो रहा था कि जो मैं महसूस कर रही हूँ, उससे भी ज्यादा आनंद कुछ हो सकता है।

उन्होंने फिर मेरा हाथ पकड़ा, और मेरे कानों को अपने दांतो से कांटते हुए कहा, “आओ हमारी सेज पर चले। आज तुम्हें औरत बनने का ऐसा अनुभव दूंगा जिसे तुम कभी भूल न सकोगी।” किसी तरह अपनी साँसों को संभालते हुए मैं कहा, “इससे ज्यादा भी कुछ और हो सकता है भला? मैं तो… मैं तो.. वैसे ही होश खो चुकी हूँ। मुझे बस अपनी बांहों में ले लो।”

मेरी बात सुनकर वो मुस्कुरा दिए और बोले,”प्रिये, यह तो सिर्फ शुरुआत है।” इसके साथ थी उन्होंने मुझे फूलों की तरह अपनी मजबूत बांहों में उठा लिया। किसी भी औरत को एक फूलो सी राजकुमारी होने का अहसास होता है जब उसे कोई आदमी अपनी बांहो में उठा लेता है। मुझे भी वही सुन्दर एहसास हुआ। उन्होंने मुझे उठाकर फिर बिस्तर पर लिटा दिया। वो मेरी बगल में आये तो मैंने उठ कर उनके सीने पे हाथ रख कर उन्हें पीछे धकेला और कहा, “जानेमन, अब तुम्हारी बारी है। देखो अब मैं तुम्हारे साथ क्या क्या करती हूँ।” मेरी आँखों में एक नशीलापन था और मेरी मुस्कान कातिलाना थी। उसे देख कर जैसे वो सम्मोहित हो गए और कुछ कर न सके। बड़ी ही मुश्किल से मैंने खुद पर वश किया था और अब मैं परिणीता को दिखाना चाहती थी कि पति होने के क्या फायदे है। आखिर मैं सब कुछ जानती थी कि एक आदमी क्या चाहता है। भले ही मैं एक कुंवारी औरत थी पर मुझे पता था कि मेरे आदमी को क्या चाहिए मुझसे!

सबसे पहले उनकी गोद में चढ़ कर मैंने उनका चेहरा अपने स्तनों के बीच में भर लिया। मुझे पता था कि कोई भी आदमी स्तनों के बीच में सब कुछ भूल जाता है। मदहोश होकर वो मेरे ब्लाउज के ऊपर से ही स्तनों को चूमकर अपने मुंह में लेने की कोशिश करने लगे। मैंने उनका चेहरा ज़ोर से अपने स्तनों पर दबा दिया। उनके हाथ ऊपर बढ़ कर मेरे स्तनों को मसलने लगे। पर हाय, यह क्या? मेरे स्तनों पर उनके हाथ मुझे फिर मदहोश करने लगे। मेरे स्तनों का आकार बढ़ गया, मेरे निप्पल कठोर हो गए। मुझे एह्सास हो रहा था कि मेरे कठोर निप्पल अब मेरी ब्रा से रगड़ रहे है। स्तनों के बढ़ने से ब्लाउज मानो और टाइट हो गया था। मैंने सामने से ब्लाउज के हुक खोल कर ब्लाउज उतरने लगी। ब्लाउज के उतरते ही वो बेकाबू हो गए और मेरी ब्रा भी झट से उतार थी। उन्होंने मेरे बाए स्तन को अपने मुंह में ले लिया और ज़ोरो से चूसने लगे। और अपने एक हाथ से मेरे स्तनों को ज़ोरो से मसलने लगे। मुझे यकीन था कि उन्हें बेहद मज़ा आ रहा है पर मुझे जो स्तन चुस्वाने में आनंद आ रहा था उसकी सीमा न थी। मैंने उनके सर को ज़ोर से अपने स्तन पर दबा कर इशारा किया कि और ज़ोरो से चुसो। उन्होंने वैसे ही किया और एक बार मेरे निप्पल को दांतो से कांट भी दिया। मेरे मुंह से एक आवाज़ निकली जो दर्द की नहीं बल्कि एक परम आनंद की थी। जहाँ मैं यह महसूस कर रही थी वही एक विचार यह भी आ रहा था कि मुझे खुद को काबू कर अपने पति को खुश करना है।

जब उन्होंने मेरे अंग अंग को चूमना शुरू किया, तो मैं तो जैसे मदहोश हो गयी। मैं आँखें बंद कर उस एक एक स्पर्श का अपने रोम रोम में आनंद अनुभव करने लगी।

किसी तरह काबू कर मैं फिर अपने पति के सीने को चूमने लगी। मेरे स्तन उनके सीने से दब कर उन्हें उकसाने लगे। मैं धीरे धीरे नीचे सरकती हुई अपने स्तनों से उन्हें हर जगह छू रही थी और उनका लिंग और कठोर और बड़ा होता जा रहा था। पहले वह मेरे स्तनों के बीच आ कर मचलने लगा। तो मैंने उनकी पूरी पैंट और अंडरवियर उतार दी। मेरी आँखों के सामने उनका लिंग तन हुआ था। मैंने उसे हाथों में उसे पकड़ा तो लगा जैसे मेरे नाज़ुक हाथो में वो समा ही न सकेगा। तो मैंने उसे अपने स्तनों के बीच फसा कर छेड़ना शुरू किया। समझ नहीं आ रहा था कि मैं उन्हें छेड़ रही हूँ या खुद को। मेरे होंठ तो जैसे महसूस करना चाहते थे कि उनके  लिंग को चुम कर कैसे लगेगा। और सुबह से कई बार मैंने उनके लिंग को अपने हाथो में पकड़ा था और हर बार मैं उसे चूमना चाहती थी, होंठो के बीच चूसना चाहती थी, पर मैंने अब तक कुछ किया न था।  मैंने उसे फिर अपने हाथो में पकड़ा और उसके बेहद पास आ गयी। परिणीता ने औरत रूप में यह मेरे साथ बहुत कम बार किया था पर जब किया था मैं तो बस पागल हो गई थी। वो बेहद बेचैन हो रहे थे। उन्होंने मुझसे कहा, “तुम मुझे फिर अधर में छोड़ कर न जाओगी न?”। वो आज रात को इसके पहले की बात कर रही थी। मैं मुस्कुरायी और उनके लिंग को अपने होंठो के बीच ले ली। उनके बदन में जैसे आग लग गयी। किसी भी आदमी को उसके लिंग पर औरत के होंठ और उसकी जीभ पागल कर देती है। मैं जानती थी। मैंने अनुभव किया था इसे। पर मैं यह नहीं जानती थी कि चाहे कितना भी मन ललचाये लिंग को चूसने का, मेरा औरत का मुंह उसके लिए बेहद छोटा था, और वो बेहद बड़ा। बड़ा कठिन है उसे अंदर लेना और मैं ज्यादा देर उसे अंदर नहीं ले सकती थी। पर जब भी लिंग के अगले हिस्से पर मैं अपनी जीभ फेरती, उनका तन उत्तेजना से अकड़ जाता। जब भी ज़ोरो से उस गोल हिस्से को चुस्ती उनकी मुट्ठियां भींच जाती। एक आदमी के अनुभव से मैं जानती थी कि यदि मैंने कुछ देर और यह किया तो यह रात यही खत्म हो जायेगी। मेरे पति को अनुभव न था  खुद पे काबू करने का और मैं इस रात को अभी ख़त्म नहीं होने देना चाहती थी। इसलिए मैंने उनके लिंग पर फिर कंडोम चढ़ा दिया।

मेरे यह करते तक जैसे उन्होंने खुद पर काबू कर लिया और मुझे फिर अपनी बांहों में भरते हुए कहा,”अब तुम्हारी बारी।” और उन्होंने अपने लिंग को मेरी योनि पर दबाने लगे। मैं मदहोशी में मुस्कुरा उठी। मेरा औरत के रूप में कुंवारापन ख़त्म होने वाला था। मैं जानने वाली थी औरत होने का पूर्ण  सुख क्या होता है। उन्होंने एक एक कर मेरे मखमली बदन से मेरे कपडे उतारने शुरू किये। अब मैं सिर्फ अपनी पैंटी में थी। और उनकी बांहों में लिपटी हुई थी। हाय, कैसे कहूँ कि कितनी उत्तेजित थी मैं, कितनी उतावली थी मैं इस पल के लिए। उन्होंने अपनी उँगलियों से मेरे तन बदन को छूना शुरू किया, कभी स्तनों को छेड़ा, कभी चूम, कभी मेरी जांघो पर अपने हाथ फेरते और हर बार मेरी योनि के पास पहुँच कर फिर कुछ और करने लगते है। मेरी योनि मचलती जा रही थी वो उसे छुएंगे पर वो मुझे तड़पाये जा रहे थे। मुझे लग रहा था की मेरी पैंटी में मेरी योनि उभर आई होगी, उसमे इतनी आग लगी हुई थी। आखिर काफी देर मुझे तड़पाने के बाद उन्होंने मेरी पैंटी पर अपना हाथ फेरा। सचमुच जैसे मेरी योनि जोश में थोड़ी फूल गयी थी। फिर धीरे से उन्होंने मेरी पैंटी के अंदर हाथ डालकर मेरी योनि के ऊपरी हिस्से को छूना और दबाना शुरू किया। हाय, मैं तो मर ही गयी थी उस एह्सास से। कितना जोश आया था की मैं अपने हो होंठो को कांटने लगी थी। इसके आगे मैं ज्यादा बताऊंगी तो मेरी कहानी के पुरुष पाठकों से रहा न जायेगा और उन्हें अफ़सोस होने लगेगा कि वह पुरुष क्यों है? वह नशीली रात की याद तो आज भी मेरे रोम रोम को उकसा देती है। उस रात फिर कभी मैं उनके ऊपर होती तो कभी वह मेरे ऊपर। जब मैं ऊपर होती थी तो मेरे स्तन जैसे झूमते उसका आनंद ही अलग था। मेरी योनि के अंदर उनका बड़ा सा लिंग और उनके हाथों का मेरे स्तनों को मसलना, इतने सारे एहसास एक साथ अनुभव करना मेरे बस के बाहर था। उस रात उन्माद में जितनी चींखें मेरे मुंह से निकली है और जितने मेरे नाखुनो के खरोंचो के निशान परिणीता की पीठ पर बने थे, वो सबुत थे कि जो शारीरिक सुख एक औरत को मिलता है उसका एक छोटा सा हिस्सा भी पुरुष को नहीं मिलता। औरत बनकर एक और बात मुझे समझ आयी थी कि बड़े से लिंग को पूरा का पूरा अपने अंदर ले लेने का आनंद तो है पर जो आनंद उस लिंग से अपनी योनि के ऊपरी हिस्से को रगड़ कर, दबा कर उकसाने में है, उसकी बात ही अद्भुत है। कभी किसी औरत से पूछ कर देखना! बहुत ही नसीब वाली थी मैं जो मुझे इस जनम में ही पुरुष और औरत दोनों होने का सुख मिल गया था। और यक़ीनन ही औरत होना बेहद ही नज़ाकत भरा और प्यार भरा अनुभव है। एक औरत होने का एहसास कोई पुरुष एक पल के लिए ही कर सके तो भी दुनिया की सभी मुश्किलें ख़त्म हो जाए। क्योंकि जितना प्यार एक औरत के दिल में महसूस होता है, उतना पुरुष नहीं कर सकते। पर शायद इसलिए ही बदले में औरत को शारीरिक सुख भी सर्वोत्तम मिलता है। काश कि आप भी यह अनुभव कर पाते जो मैंने किया!

मैंने औरत बनने का पूर्ण सुख पा लिया था। मैं एक पत्नी बन चुकी थी और अपने पति को भी मैं उस रात अद्भुत सुख दे चुकी थी। पर सैक्स एक औरत के लिए सिर्फ शारीरिक सुख नहीं है, मेरे लिए वह अपने पति से भावनात्मक रूप से जुड़ने में भी मददगार रहा। हम दो जिस्म में एक जान हो गए थे। क्योंकि हम दोनों एक दुसरे के शरीर को जानते थे, हमारी सुहागरात सचमुच यादगार हो गयी क्योंकि हम जानते थे कि एक दुसरे को इस रात में क्या देना है। हम उस रात को दुसरे से कुछ लेने नहीं बल्कि अपना सब कुछ दुसरे पर न्योंछावर करने को तैयार थे। हमारे तन बदलने के पहले हम शायद यह कभी न कर पाते। पर सैक्स करने के बाद जब होश आता है तो आपका दिमाग फिर दूसरी बातें भी सोचने लगता है। मेरा भी दिमाग सोच रहा था कुछ।

आज से पहले जब मैं आदमी थी, एक क्रोसड्रेसर थी, मैं सुहागरात में पत्नी बनने के सपने तो ज़रूर देखा करती थी पर मेरे उन सपनो में हमेशा एक और औरत होती थी। एक पुरुष से शारीरिक सम्बन्ध के बारे में मैंने कभी न सोचा था। फिर आज मैं निःसंकोच एक पुरुष से प्रेम कैसे कर पायी? और मेरे पति परिणीता ने भी एक स्त्री से कैसे प्रेम किया? क्या यह मेरे नए शरीर के हॉर्मोन का असर था? या इस बात का कि चाहे जो भी हो, मैं परिणीता से प्रेम करती थी, भले वो पुरुष रूप में हो या स्त्री रूप में? या इस बात का असर था कि मैं जिस जिस्म में थी, उस जिस्म के दिमाग में यादें और भावनाएं परिणीता की थी, जो मेरे पुरुष रूप से प्यार करती थी, जो एक पुरुष को प्यार करती थी? शायद इसलिए अब मैं एक ही जिस्म में प्रतीक और परिणीता दोनों बन चुकी थी? क्या यही चीज़ परिणीता के साथ भी हो रही थी? हम दोनों सचमुच में एक दुसरे को समझ पाने वाले पति-पत्नी बनकर एक हो रहे थे। पर ये रात इन सवालों के बारे में सोचने के लिए न थी। इस सुहानी रात को मैं अपने पति की आगोश में समा कर बस एक पत्नी बन कर सुख ले रही थी। हमारे जीवन में उस सुबह इतना बड़ा बदलाव आया था फिर भी मैं इतनी जल्दी संतुष्ट थी, निश्चिन्त थी। क्योंकि मुझे पता था कि मेरे पति के होते हुए मुझे चिंता की कोई ज़रुरत नहीं है।

अगली सुबह

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मैं जब उनके लिए सुबह गर्म दूध लेकर आयी तो वो मुझे छोड़ने को तैयार ही न थे। मैंने भी उन्हें एक ऐसा ऑफर किया कि वो मना न कर सके।

अगली सुबह आदतन मेरी आँखें अँधेरे में ही ५ बजे खुल गयी। एक संतुष्ट सुहानी रात के बाद पति की बांहों में बढ़िया नींद के बाद सुबह सुबह चेहरे पर मुस्कान होना स्वाभाविक है। पर मन में पहला सवाल यह भी आया कि क्या आज सुबह मैं वापस पुरुष बन जगी हूँ। पर मेरे नग्न स्तनों ने मुझे मेरा जवाब दे दिया। हम पति-पत्नी अब भी अपने नए रूप में थे। पर आज हम दोनों को हॉस्पिटल जाकर अपनी डॉक्टर होने की ड्यूटी करनी थी, हमें पूरे दिन दुनिया से नए रूप में मिलना था। मन में थोड़ा डर तो था पर अपने सामने अपनी पति को देख कर विश्वास हो रहा था कि सब ठीक ही होगा। परिणीता की आँखें भी खुल चुकी थी। मैंने उनहे देखकर सुबह का एक प्यारा चुम्बन होंठो पर दिया। किसी भी पति का दिन बन जाता है जब मुस्कुराती हुई पत्नी सुबह सुबह उसे प्यार से चूमे। “इस दुनिया से आज नए रूप में मिलने को तैयार हो जानू?”, मैंने कहा। उसने मुस्कुरा कर कहा, “हाँ। हम दोनों ही एक ही स्पेशलिटी के डॉक्टर है तो मुझे तुम्हारा काम करने में और तुम्हे मेरा काम करने में मुश्किल नहीं होनी चाहिए।”

मैं बिस्तर से उठ खड़ी हुई। मेरे तन पर एक भी कपड़ा न था। उनकी नज़रे मेरे नग्न शरीर पर पड़ी तो मुझे शर्म सी महसूस होने लगी। मैंने झट से ब्रा, पैंटी, पेटीकोट, ब्लाउज और साड़ी पहन ली। परिणीता को यकीन नहीं हुआ कि मैं २ मिनट में ही साड़ी पहन सकती थी। सुहागरात के बाद का पहला दिन था। मैं एक अच्छी पत्नी की तरह किचन की ओर बढ़ने लगी। वहां सुबह सुबह अपने प्यारे पतिदेव के लिए दूध गर्म की और उनके लिए दूध का गिलास लेकर आयी। इसके बाद मैं उनके लिए थोड़ा नाश्ता बनाना चाहती थी। पर वो थे कि मेरा हाथ ही न छोड़ रहे थे। मुझे अपनी बगल से जाने न दे रहे थे। तो मैंने उनके कानों में कहा कि यदि आप मुझे नाश्ता बनाने दोगे तो मैं आपको अपने हाथो से नहलाऊंगी। दुनिया का कोई भी पति इस ऑफर को मना  नहीं कर सकता! और खासतौर पर नयी नवेली पत्नी हो जिसके मेरी तरह घने लंबे बाल हो, जिसने सुन्दर सी साड़ी पहन रखी हो, और जिसकी कमर सेक्सी हो। हाँ, मुझे अपनी खूबसूरती पर बड़ा नाज़ महसूस हो रहा था। कहते है कि खूबसूरती देखने वालो की आँखों मे होती है। सच ही कहते है क्योंकि मेरे पतिदेव की आँखों में प्यार का ही असर था जिसकी वजह से मैं  खुद को बेहद खूबसूरत महसूस कर रही थी। मैं ख़ुशी ख़ुशी किचन चल दी अपने पति की सेवा के लिए।

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मैं अपने हाथो से उन्हें नहलाऊं, और वो मना कर दे? ऐसा हो सकता था कभी भला?

मैं जल्दी ही हल्का सा नाश्ता बनाकर वापस आयी। और अपने वादे  के अनुसार उन्हें अपने हाँथो से नहलायी। रोज़ रोज़ यह कर सकूंगी या नहीं यह मुझे पता न था पर आज मुझे बेहद ख़ुशी मिल रही थी यह सब करते, एक अच्छी पत्नी होने का काम करते। नहाने के बाद उनके पहनने के लिए कपडे निकालने थे।  उनसे ज्यादा उनके कपड़ो की समझ मुझे थी क्योंकि कल तक वह सभी कपडे मेरे थे। तो मैंने खुद चुनकर उनके लिए कपडे निकाल कर रख दिए थे जो वो आज पहनेंगे। और मैं खुद नहाने को चल दी। और जब तक मैं नहाकर निकली तो वो तैयार थे।

उन्होंने मेरे लिए हॉस्पिटल जाने के कपड़ो के अलावा सही ब्रा पैंटी, पेंटीहोज और सैंडल भी निकाल रखी थी। एक दुसरे को समझने वाले ऐसे पति-पत्नी बेहद कम होते है। उन्होंने मुझे मेरे बालो को हेयर स्ट्रेटनर से सीधे कैसे करना है सिखाया, थोड़ी हेयर स्टाइल के बारे में बताया कि काम पर कैसी हेयर स्टाइल सुविधाजनक होगी। अपने हाथो से उन्होंने मेरा जूड़ा भी बनाया। जब मैं ड्रेस पहनने लगी तो उन्होंने आकर पीठ पर चेन चढाने में भी मदद की। और फिर उन्होंने बताया कि जो ड्रेस मैंने पहनी है उसमे कौनसी लिपस्टिक अच्छी लगेगी। मैंने लिपस्टिक लगा कर उनसे पूछा, “मैं कैसी लग रही हूँ?”। उन्होंने मेरी ओर देखा और बोले, “तुम तो परी लग रही हो, बस लिपस्टिक थोड़ी ज्यादा हो गयी है। आओ मैं उसे ठीक कर दू।” और ऐसा कहकर उन्होंने मुझे होंठो पे किस कर दिया। तो उनका ये तरीका था मेरी लिपस्टिक ठीक करने का।  मैंने नखरे दिखाते हुए उन्हें कहा, “जाओ, चलो हटो यहाँ से। मुझे तैयार होने दो।” औरत को तैयार होने में बड़ा समय लग सकता है, और मैं तो फिर भी नौसिखिया था। पर पति की इतनी सहायता से मुझे लगा कि उन्होंने मेरी कितनी मुश्किलें आसान कर दी। मैं खुद को दुनिया की सबसे भाग्यशाली पत्नी मान रही थी। और परिणीता भी खुद को सबसे भाग्यशाली पति। हम दोनों अब दुनिया का सामना करने को तैयार थे।

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उन्होने मेरी ड्रैस में ज़िप लगाने में मेरी मदद की। ऐसा पति सिर्फ भाग्यशाली पत्नी को मिलता है जो हर चीज़ में आपको समझे और सहायता करे।

मेरी कहानी में अब भी बहुत कुछ बाकी है। सिर्फ शारीरिक सुख ही औरत बनने के लिए काफी नहीं होता। और भी बहुत कुछ हुआ था मेरे जीवन में इसके बाद, जिसके बारे में मैं लिखती रहूंगी। पर आप पाठको से निवेदन है कि कृपया फेसबुक पर मुझे लाइक और शेयर ज़रूर करे। आपके शेयर के बिना मेरी कहानी सिर्फ ८-१० लोगो तक पहुँचती है, पर आपका एक शेयर मेरी कहानी को ४० और लोगो तक ले जाता है। आपके प्रोत्साहन के बिना मैं ज्यादा दिनों तक कहानी न लिख सकूंगी। तो प्लीज शेयर करे। मेरा फेसबुक पेज का लिंक आपको निचे मिल जाएगा।

To be continued …

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मैं परिणिता: भाग १०


अब तक आपने मेरी कहानी में पढ़ा: जब से होश संभाला है, मैं जानती हूँ कि मेरे अंदर एक औरत बसी हुई है। पर दुनिया की नज़र में मैं हमेशा प्रतीक, एक लड़का बनकर रही। कुछ साल पहले जब मेरी शादी परिणीता से हुई, तो उसे भी मेरे अंदर की औरत कभी पसंद न आयी। हम दोनों पति-पत्नी US में डॉक्टर बन गए। पर मेरे अंदर की औरत हमेशा बाहर आने को तरसती रही। किसी तरह मैं अपने अरमानों को घर की चारदीवारियों के बीच सज संवर कर पूरा करती थी। पर आज से ३ साल पहले ऐसा कुछ हुआ जो हम दोनों को हमेशा के लिए बदल देने वाला था। उस सुबह जब हम सोकर उठे तो हम एक दूसरे में बदल चुके थे। मैं परिणीता के शरीर में एक औरत बन चुकी थी और परिणीता मेरे शरीर में एक आदमी। हमारा पहला दिन अपने नए रूप को  समझने में बीत गया। अब रात हो चुकी थी। हमारे नए रूप हमारी पहली रात, जिसमे मैं एक औरत थी जिसके तन बदन में कामुकता भरी आग लगी हुई थी, और परिणीता एक आदमी। अब आगे –

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मैं जानती हूँ कि आप जानने को बड़े उत्सुक है कि एक औरत के रूप में मेरी पहली रात कैसे बीती। क्या वह रात मेरी औरत के रूप में सुहागरात थी?  क्या मैंने औरत होने का शारीरिक सुख पाया?  मुझे बताने में थोड़ी झिझक हो रही है। हाँ मैं एक औरत जो ठहरी। आप नहीं समझेंगे कि एक औरत के लिये शारीरिक सम्बन्ध क्या मायने रखता है। ऐसा नहीं है कि मेरे साथ यह औरत बनने के बाद हुआ है। जब मैं पुरुष क्रोसड्रेसर थी तब भी ऐसा न था कि मुझे सिर्फ औरतों के कपडे पहनना अच्छा लगता था। मेरे अंदर एक औरत हमेशा से छुपी हुई थी। वो औरत जो प्यार करती थी, ममता और शालीनता से भरी हुई थी, जो रिश्तो को जोड़कर रखने में विश्वास रखती थी, बेहद ही खूबसूरत और प्यारी औरत थी वो। पर यह दुनिया और मेरी पत्नी परिणीता मेरी अंदर की उस खूबसूरत औरत को हमेशा दबा कर रखती थी। छुप छुप कर सिसकती थी वो कि उसे बाहर आने का एक मौका तो दो। वो किसी का बुरा नहीं करेगी। आज़ाद होकर कितना चहकती वो। उस औरत को आज़ादी मिलती तो मैं पुरुष रूप में भी निखर जाती। शायद यही सालों की आज़ादी की चाहत थी, जिसकी वजह से जब मैं एक औरत के तन में आयी तो मैं वह सब कर लेना चाहती थी जो एक औरत करती है।

और उस रात परिणीता, जो की अब एक आदमी थी, उसने जब मेरी सैटिन नाईटी में अपने हाथों को डालकर मेरे कोमल मुलायम स्तनों को छूना शुरू ही किया था, मैंने जो अपने रोम रोम में महसूस किया, आज भी उसे याद कर मेरे अंग अंग में आग लग जाती है। आँखें बंद करके याद करू तो मेरे बदन के एक एक रोम में जो सनसनी थी, उसे महसूस कर मदहोश हो जाती हूँ। भूल नहीं सकती मैं, एक पत्नी के रूप में मेरी पहली रात। मैं पहले ही आपको चेतावनी दे रही हूँ कि इसे पढ़कर आप की रातें बेचैन हो सकती है, और आप में भी एक औरत बनने की ललक लग सकती है जिसको पूरा करना कभी आसान न होगा। जो मैं आगे बताऊंगी, आप को भी बेकाबू कर देगी। क्या आप तैयार है मेरी कहानी सुनने को? मुझे फिर न कहना की मैंने चेताया नहीं था।

उस रात हम पति-पत्नी दोनों के जिस्म में मानो आग सी लगी हुई थी। हमारा नया तन और उसमे हमें उत्तेजित करते हार्मोन, हमें उन्हें वश में करना नहीं आता था। पर फिर भी खुद को काबू करते हुए बिस्तर में मैं परिणीता से दूर हो पलट कर सो गयी थी। पर कुछ ही देर बाद परिणीता ने पलटकर मुझे पीछे से आकर अपनी बाहों में पकड़ लिया। मेरा कोमल सा नाज़ुक बदन उसके मजबूत बड़े बदन में मानो समा गया। परिणीता का एक हाथ मेरी सैटिन नाईटी की खुली गर्दन से होते हुए मेरे स्तन तक पहुच चुका था। पहले तो उसने मेरे निप्पलों को छुआ, जो उसके स्पर्श से तुरंत कठोर हो गए। मेरे दिल दिमाग में मानो बिजली का करंट दौड़ गया था। लग रहा था कि परिणीता काश मेरे निप्पलों को ज़ोरो से दबा दे या अपने दांतो से उन्हें कांटे। पर वो उन्हें सिर्फ हलके हलके छूती रही। फिर उसके हाथ मेरे स्तनों को पकड़ कर कुछ हलके हलके दबाने लगे। मेरी साँसे गहरी होती जा रही थी। मैं अपना वश खो रही थी। वहीँ परिणीता का पुरुष लिंग मेरे नितम्ब (हिप/चूतड़) को छू रहा था। पल पल मानो वह और कठोर और बड़ा होता जा रहा था। अपने आप से वश खोती हुई मैं अपनी नितम्ब उसके पुरुष लिंग के और करीब ले जाकर उसे दबाने लगी जैसे मैं उसे अपने अंदर समा लेना चाहती थी।

 

हम पति-पत्नी अब अपने वश से बाहर होते जा रहे थे। मैं परिणीता के ऊपर चढ़ कर अपने स्तनों को उसके सीने से दबाने लगी। 

औरत के तन का रग रग उत्तेजना में मचल उठता है। इतने सारे एहसास एक साथ मैंने पहले कभी महसूस न की थी। नए जिस्म की कामुकता में मदहोश होते हुए मेरे हाथों की मुट्ठी उन्माद में कसती चली गयी। मेरे होंठ तड़प उठे और मेरे दांतों से मैं अपने होंठो को कांटकर खुद को काबू करने की असफल कोशिश करती रही। ज़ोरो से मेरे स्तनों को अपने हाथों से मसल दो परिणीता, यह चीखने को जी कर रहा था। मेरे अंदर आकर मुझे औरत होने का सुख दे दो, इस आवाज़ को मैं दबाती रही। मेरे स्तन उस जोश में जैसे और बड़े होते जा रहे थे और सनसनी बढ़ती जा रही थी। आखिर मैंने अपना एक हाथ पीछे करके परिणीता का पुरुष लिंग पकड़ लिया जो अब तक विशाल हो चूका था और मुझमे प्रवेश करने को तैयार था। इस लिंग से मैं अच्छी तरह परिचित थी। कल तक जब मैं पुरुष थी, वो मेरे अंग का हिस्सा था। पर आज मेरे हाथ छोटे, कोमल और मुलायम थे। एक औरत के हाथ में वह बहुत ही बड़ा लग रहा था, या शायद परिणीता की उत्तेजना में वह बहुत बड़ा हो गया था। मैं उसे ज़ोर से पकड़ कर सहलाने लगी। और अपने दुसरे हाथ से परिणीता का हाथ पकड़ कर अपने स्तनों को ज़ोरो से दबाने का इशारा देने लगी। मेरी योनि में जो हलचल मची थी उसको तो मैं बयान भी नहीं कर सकती। मेरी खुली नंगी पीठ पर पड़ती परिणीता की गर्म साँसे मुझे और नशीला कर रही थी। न जाने कब पर मैं आँहें भरने लगी थी।

पर तभी परिणीता के हाथ रुक गए। परिणीता अब मेरे ऊपर आ चुकी थी। ऐसा लगा की अब वो मेरी नरम कोमल स्तनों को चुम कर और फिर अपने दांतो से काट कर मुझे और उकसाएगी। पर ऐसा कुछ न हुआ। मत रुको, प्लीज़। मैंने अपनी आँखों से परिणीता से कहा। “प्रतीक, तुम्हे याद है तुम मुझसे हमेशा पूछा करते थे कि सैक्स करने के बाद मुझे कैसा अनुभव हुआ?”, परिणीता ने मुझसे पूछा। मेरा मन बात करने का न था। मेरे जिस्म में आग लगा कर यह क्या कर रही है परिणीता? मेरे स्तन तुम्हारे होंठो के लिए तरस रहे है और तुम मुझसे यह कैसा सवाल कर रही हो? मैं मन ही मन सोच रही थी। अपनी उत्तेजना के बीच मैंने हाँ में सिर्फ “उम हम्म” कहा। “मैं भी अक्सर यही सोचा करती थी की तुम्हे सैक्स के बाद कैसा लगा? तुम संतुष्ट हुए या नहीं?”, परिणीता आगे बोली। बातें न करो परिणीता, मैं मन में सोचती रही। मैं मचली जा रही हूँ और तुम पुरानी बातों में लगी हुई हो।  “आज रात हमारे पास उस सवाल का जवाब पाने का मौका है। सैक्स के बाद औरत को कैसा महसूस होता है, आज तुम समझ सकते हो। क्या पता कल सुबह हमारे तन फिर बदल जाए? तो फिर क्यों न हम आज….”, परिणीता बोल ही रही थी कि मैंने अपना वश खोते हुए परिणीता के सीने से लगकर उसे वापस नीचे कर मैं उसके मजबूत विशाल तन पर चढ़ गयी।

बात न करते हुए मैं बस अब एक औरत बन जाने को आतुर थी। मैंने अपने स्तनों को परिणीता के सीने से दबाना शुरू कर दिया। मेरा मन आनंदित हो गया। पर मेरा मन अब सिर्फ सीने से लगाने से नहीं भरने वाला था। मुझे उस पर परिणीता के होंठ चाहिए थे। मेरे स्तनों को एक आदमी के हाथों से मसलने का आनंद चाहिए था। और इसलिए मैंने परिणीता के होंठो को अपने होंठो के बीच लेकर एक लंबा पैशनेट किस दिया जिसे देते वक़्त मेरा पूरा तन बदन  मादकता से झूम उठा। फिर मैंने उसकी जीभ को अपने होंठो के बीच पकड़ जो चुम्बन दिया, उससे परिणीता  का पुरुष तन उत्तेजित हो मानो अकड़ गया। उस चुम्बन को शायद परिणीता कभी भूल न पायेगी। चुम्बन देते वक़्त मेरे हिलते झूमते बदन के साथ मेरे आज़ाद स्तन मेरी सैटिन की नाईटी में उछल पड़े। अपने सीने से झूलते मेरे भारी स्तन, इनका तो मैं सिर्फ सपना देखा करती थी। आज मेरा सपना सच हो गया था। मैं और ज़ोरो से अपने स्तनों को परिणीता के सीने से दबाने लगी। जो मुझे महसूस हुआ, सोच कर ही मेरा चेहरा शर्म से लाल हो रहा है। मेरे स्तनों को छेड़ो, मेरी आँखें और मेरे होंठ परिणीता से कहते रहे। परिणीता को उसका जवाब मिल गया था कि मैं क्या चाहती हूँ। हाँ, मैं अनुभव करना चाहती थी की औरत को सैक्स करने के बाद कैसा लगता है।

जहाँ मेरा अंग अंग परिणीता के स्पर्श के लिए मचला जा रहा था, वहीँ परिणीता मेरे बदन के नीचे बिना कुछ किये मुझे और उकसा रही थी। लगता है कि अब मुझे एक औरत और एक पत्नी होने का धर्म का पालन करते हुए अपने पति परिणीता को खुश करना था। हम दोनों के रोल बदल गए थे और मैं पत्नी बन कर बेहद उन्मादित थी। बस उस उन्माद में मैं यही चाह रही थी कि परिणीता भी मुझे बदले में शारीरिक सुख दे। पर पहले यह काम मुझे करना था।

उसके होंठो को चूमने पर और उसकी जीभ को अपने होंठो के बीच महसूस करना बहुत ही sensual था। मेरे नाज़ुक होंठ मेरे पुरुष वाले होंठो से ज्यादा कामुक और संवेदनशील थे। मेरे पति का तन भी उन्माद में था। फिर मैंने होंठो को छोड़ कर परिणीता के कानो को अपने होंठो से चूमने लगी। कान पर पड़ने वाली मेरी गर्म साँसे उसे उत्तेजित कर रही थी। मैंने उसकी उत्तेजना देख कर उसके शर्ट के बटन खोल दिए और मैं सीने को हौले हौले चूमने लगी। अपने हाँथो से उसके सीने को छूने लगी और उसके नंगे विशाल से सीने पर अपने स्तनों को दबाकर रगड़ने लगी। मेरी सैटिन नाईटी का स्पर्श मेरे पति को उतावला किये जा रहा था। मेरे एक एक चुम्बन का असर जो उस पर हो रहा था वह मैं महसूस कर सकती थी। मेरे बदन पर उसके कठोर लिंग की दस्तक़ हो रही थी। अब शायद वह भी उतना ही उतावला था जितनी की मैं।

मैं परिणीता के ऊपर चढ़ कर अपने स्तनों को उसके सीने से दबाते हुए उसे ऐसा चुम्बन दी जो वो कभी भुला नहीं सकेगी। उसे मेरा जवाब मिल गया था कि आज रात मैं क्या चाहती हूँ। 

मेरे हर चुम्बन पर मेरे पति की बाँहें मुझे और ज़ोरो से जकड़ लेती। मैं भी उन्मादित हो अपने होंठो से ऐसा चुम्बन लेती जैसे आज उसके शरीर से सारा रस चूस लेने वाली हूँ। मैं धीरे धीरे परिणीता के सीने पर चुम्बन करते करते निचे होने लगी। अब उसकी नाभि के पास मैं चुम्बन कर रही थी और मेरे कोमल हाथ उसके सीने को छू रहे थे। मेरे स्तन अब परिणीता के लिंग के साथ थे। उसका लिंग मानो मेरे स्तनों के साथ खेलने लगा। कभी एक स्तन को छूता तो कभी दुसरे को। मैं अपने दोनों स्तनों के बीच उसे पकड़ कर अपने दोनों स्तनों से ऊपर निचे करने लगी। मेरे निचे आते आते मेरे होंठ मेरे पति के लिंग के बिलकुल निकट आ गए। मेरे होंठो पर सनसनाहट होने लगी। मैंने अपने हांथो से उसे एक बार पकड़ कर देखा। मेरे नाज़ुक हाथो का स्पर्श पाकर तो उसका उतावलापन बहुत बढ़ गया। परिणीता का शरीर अब बस मेरे होंठो का बेसब्री से इंतज़ार करने लगा। पर यह रात तो अभी बस शुरू ही हुई थी।

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मैं अपने पति परिणीता के सीने को चूमते हुए धीरे धीरे नीचे आ गयी। उसका लिंग अब मेरे होंठो के बेहद करीब था। उसका बदन अब मेरे होंठो का बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था।

मैं परिणीता के लिंग को उत्तेजित कर फिर उठ बैठी और थोड़ा झुककर परिणीता की ओर देखने लगी। उसका तना हुआ लिंग अब मेरी पैंटी के रास्ते मुझमे अंदर आने को आतुर था। उतनी ही आतुर तो मैं भी थी। फिर भी मैं थोड़ा रुक कर परिणीता के चेहरे को देखने लगी। मेरी नशीली आँखें और उनके आगे आते मेरे लंबे घने बालों को देख कर परिणीता की उत्तेजना मैं उसकी आँखों में देख सकती थी। उसके लिंग के मोटाई से महसूस कर सकती थी। उसके हाथ धीरे धीरे मेरे पैरो को छूते हुए, मेरी जांघो को उकसाते हुए, मेरी पैंटी को छूकर मेरी योनि में आग लगाकर, मेरी नाईटी में नीचे से घुसते हुए मेरे स्तनों की ओर बढ़ रहे थे। मेरी सैटिन की नाईटी जब जब मेरे मखमली बदन पर फिसलती तो मेरा रोम रोम और उत्तेजना में हिलोरे लेने लगता। मैं अपने पति की आँखों में देख सकती थी कि वह अब अपने मजबूत हाथों से मेरे स्तनों को मसल उठने को मचल रहे है।

“पता है जब एक शादी-शुदा औरत और आदमी पहली बार सैक्स करते है तो उस रात को क्या कहते है?”, मैंने परिणीता से पूछा। उसके जवाब देने के पहले ही मैंने उसके हाथ झट से अपनी नाईटी से निकाल कर कहा, “उस रात को सुहागरात कहते है। और आज हमारी सुहागरात है।” एक कातिल मुस्कान देकर मैं परिणीता के तन से उठकर बिस्तर से उतरने लगी। परिणीता ने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे रोकना चाहा पर मैं उसके हाथों से फिसल गयी। वह समझ नहीं पा रही थी कि मैं कहाँ जा रही हूँ। “थोड़ा इंतज़ार कर लो जानेमन”, कहकर मैं हँसते हुए चल दी। परिणीता का आतुर चेहरा और उसका तना हुआ लिंग देख कर मैं मन ही मन मुस्कुरा दी।

मैं परिणीता के तन पर चढ़ कर उसकी आँखों में देखने लगी। उसका लिंग मेरी पैंटी में दस्तक दे रहा था।

उस सैटिन नाईटी में मेरी हिरणी जैसी चाल न सिर्फ परिणीता को कामोत्तेजित कर रही थी बल्कि मुझे भी। मेरी हिप्स चलते चलते एक ओर झटके देती हुई मटकती हुई एक एक कदम पर परिणीता को दीवाना बना रही थी। मुझे भी मेरी बड़ी सी नितम्ब पर फिसलती हुई सैटिन नाईटी मदहोश कर रही थी। अपने हाथो से मैंने नाईटी को ऊपर की ओर सरका कर मैंने पीछे से अपनी पैंटी पतिदेव को दिखाई और वो बस पागल ही हो गए। पर मैं आगे चलती गयी। मेरे एक एक कदम पर मेरे खुले स्तन उछल पड़ते और मुझे भी अपने होने का प्यारा एहसास दिलाते। मेरे निप्पल भी कठोर हो गए थे और मेरी नाईटी में बाहर से उभर कर दिख रहे थे। सैटिन में उभरे हुए निप्पल दिखना किसी भी पुरुष को मदमस्त कर देते है। परिणीता को छेड़ने के लिए मैं रूककर पलटी, अपनी उँगलियों को अपने उभरे हुए निप्पल तक ले गयी और उन उँगलियों से दबा कर एक आँह के साथ बोली, “मेरे निप्पल तुम्हारे स्पर्श के लिए बेकरार है जानू”। कहकर मैं ऐसी कामुक हँसी हँस दी की कोई भी मुझ पर फ़िदा हो जाए। जिस्म में लगी हुई आग के रहते हुए भी मैं अपनी नज़ाकत भरे नखरे दिखाते हुए बैडरूम से बाहर निकल गयी। दरवाज़ा बंद करते हुए मैंने पतिदेव को एक कातिल सी मुस्कान दी।

 

pn10072जब तक मैं प्रतिक थी, ऐसा हमारे साथ कई बार हुआ था कि हम दोनों आलिंगन करते हुए प्यार करने में मदहोश है और किसी कारण परिणीता उठ कर चल देती थी। कभी घर से माँ का फोन या कभी और कोई कारण। मैं समझ न पाती थी कि आखिर इतनी कामोत्तेजित परिणीता, उस उत्तेजना से बाहर कैसे आ जाती थी। आदमी एक बार मचल उठे तो वह अपने आपको खुद से रोक नहीं सकता। जबकि औरतें यह आसानी से कर सकती है यदि उनके पास एक अच्छा कारण हो। आज कुछ ही देर पहले मैं बेकाबू थी जब मेरा खुद पर कोई वश न था। फिर ऐसा क्या हुआ कि मैं उठ कर चली आयी। एक आदमी हो या औरत उसे पहली रात मनाने का मौका जीवन में एक ही बार मिलता है। मैं भाग्यशाली थी जिसे यह मौका दूसरी बार मिल रहा था। एक औरत के रूप में प्यार करने का सपना मैंने देखा था। आज जब वो सच हो रहा था तो मैं अपनी इस सुहागरात में कोई कमी नहीं होने देना चाहती थी। यदि मैं सही सोच रही थी तो आज की रात परिणीता के लिए कभी न भूलने वाली रात होगी। वैसे भी इस दुनिया में यदि किसी पुरुष को संपूर्ण सुख कोई औरत दे सकती थी तो वह औरत कोई और नहीं मैं थी। आखिर क्यों भला? एक आदमी सम्भोग करते वक़्त क्या चाहता है, अपने पुरुष रूप में मैं अच्छी तरह जानती थी। और एक अच्छी पत्नी की तरह मैं अपने पति को वो सुख देना चाहती थी। परिणीता से ज्यादा भाग्यशाली पति न था इस दुनिया में इस वक़्त। और इस सुख को देने के पहले की तैयारी में मुझे करीब आधा घंटा लग गया। परिणीता हमारे बैडरूम में मेरा इंतज़ार करती रही।

मेरे आने की आहट सुनकर अंदर बैडरूम से ही परिणीता ने कहा, “प्रतीक अब कुछ नहीं होगा। वो समय बीत गया है।” मैं मंद मंद मुस्कायी। परिणीता को पता न था कि समय तो अब शुरू हुआ है। मैंने धीमे से बैडरूम का दरवाज़ा खोल और हलके हलके कदमों से चलते हुए अंदर आयी। मुझे देख कर परिणीता का मुंह खुला रह गया। मैं सही थी, समय अब शुरू हुआ था।

To be continued …

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मैं परिणिता: भाग ९


अब तक आपने मेरी कहानी में पढ़ा: मैं एक क्रोसड्रेसर हूँ जिसे भारतीय औरतों की तरह सजना अच्छा लगता है। मेरी शादी हो चुकी है और मेरी पत्नी परिणीता है। हम दोनों अमेरिका में डॉक्टर है। परिणीता को मेरा साड़ी पहनना या सजना संवारना बिलकुल पसंद नहीं था । पर आज से ३ साल पहले एक रात हम दोनों का जीवन बदल गया। सुबह उठने पर हम दोनों का बॉडी स्वैप हो चूका था मैं परिणीता के शरीर में थी और वो मेरे शरीर में थी।  मतलब मैं, प्रतीक, एक औरत बन चुकी थी और परिणीता एक पुरुष। उस सुबह इस हकीकत का सामना करते हुए हमने एक दुसरे का हाथ थाम कर घर से बाहर निकलने का निर्णय लिया।  और हम अब एक दूकान तक पहूँच चुके थे।  अब आगे –

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दूकान के भीतर पहुँच कर हमने एक शॉपिंग कार्ट ली। बहुत सा सामान जो खरीदना था हमें। थोड़ा आगे बढ़ते ही थोड़ी दूर में एक औरत अपने पति के साथ दिखाई दी। उसे देखते ही मेरे और परिणिता दोनों के मुंह से यह शब्द एक साथ निकले, “That bitch!”। हम दोनों ने थोड़ा आश्चर्य से एक दुसरे की ओर देखा क्योंकि दोनों ने एक ही बात एक साथ कही। सामने जो औरत थी, वह अदिति थी, हम दोनों के साथ एक ही हॉस्पिटल में वह भी डॉक्टर है। हम पति-पत्नी काफी हिम्मत करके घर से बाहर निकले थे, और हमने बिलकुल न सोचा था कि हम आज किसी जान पहचान के व्यक्ति से मिलेंगे। हम दोनों को अभी तक अपने नए शरीर की आदत न थी और न ही यह भरोसा कि मैं प्रतिक, परिणीता के रूप में सहज रहूँगा और परिणीता, प्रतीक के रूप में। किसी और के लिए यह कल्पना करना तो असंभव था कि हमारे शरीर एक दुसरे के साथ बदल गए है, पर उन्हें हमारे व्यव्हार में कुछ बदलाव तो दिखाई दे ही सकता है।

परिणीता ने मेरी ओर देखा और मुझसे बोली, “सुनो प्रतीक। डॉक्टर अदिति मुझे बिलकुल पसंद नहीं है। उससे मिलने पर प्लीज ऐसा बर्ताव करना जैसे तुम एक आदर्श पत्नी हो जो अपने पति प्रतीक को बेहद प्यार करती है। अदिति की नज़र में तुम आज परिणीता हो, और मैं तुम्हारा पति प्रतीक। क्या तुम मेरी खातिर यह कर सकते हो?”

मैंने परिणीता का हाथ थाम कर उसे भरोसा दिलाया कि सब ठीक होगा और कहा, “देखती जाओ, मैं कितनी अच्छी तरह परिणीता बनता हूँ। तुमसे प्यार जो है इतना कि मुझे तुमसे प्यार का नाटक करने की ज़रुरत नहीं है। तुम्हारा रूप बदला है आत्मा नहीं। मैं अब भी तुम्हे उतना ही प्यार करता हूँ।”

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अदिति अपने पति के साथ शॉपिंग करने आयी थी। नीली साड़ी उस पर बहुत जँच रही थी। पर उसे देख कर हम पति पत्नी बहुत खुश नहीं थे।

अब तक अदिति ने हमें देख लिया था। उसने नीली रंग की साड़ी पहनी हुई थी। अदिति ने हमें देख कर हाथ से इशारा किया और हमें पास बुलाने लगी। मैंने परिणीता से शिकायत भरे लहजे में कहा, “देखो परी, अदिति ने साड़ी पहनी हुई है और तुमने मुझे ठण्ड के इस मौसम में यह छोटी सी ड्रेस पहनने को दी। उसे तो देख कर ही लग रहा है कि उसे कितना आराम महसूस हो रहा होगा इस मौसम में साड़ी पहन कर।”

“अब ड्रामा मत करो प्रतीक! दूकान में अच्छी खासा हीटर चल रहा है। अदिति हमारे पास आ रही है, तैयार हो तुम?”, परिणीता मुझसे बोली। मैंने हाँ का इशारा किया।

अदिति अब बेहद करीब आ चुकी थी। वह हमारे पास पहुचते ही मुझसे गले लग गयी और बोली, “हाय परिणिता! कैसी हो तुम? तुम दोनों पति पत्नी भी सब्जी किराना खरीदने आये हो आज!” गले मिलकर थोड़ा पीछे होते हुए उसने मेरी दोनों कलाईयाँ ऐसी पकड़ी जैसे वो मेरी जन्मों की सहेली हो। दो औरतों का गले मिलना किसी पुरुष और औरत के गले मिलने से बहुत अलग होता है। मुझे यह बाद में परिणीता ने बताया था कि जब एक औरत दूसरी औरत से गले मिलती है तो वो अपने स्तन को बेहद हलके से दुसरे के स्तनों को छूती है। जबकि पुरुष स्त्री ज़ोरो से गले लगते है। मुझे यह पता न था। मैं तो उम्मीद भी न की थी कि अदिति आकर मुझे गले लगा लेगी। थोड़ी सी लड़खड़ाते हुए मैं अपनी आदत के अनुसार ज़ोर से गले लगा रही थी। गलती ही सही, अपने स्तन से दुसरे स्तन दबाने का भी मज़ा ही कुछ और है। खैर उस वक़्त मज़े की ओर मेरा ध्यान न था। अदिति एक टक मुस्कुराते हुए मेरी ओर देख रही थी। वो अपने सवाल के जवाब का इंतज़ार कर रही थी। ऐसा लगा मानो जीवन का सबसे कठिन सवाल पूछ लिया हो मुझसे। उसके गले मिलने ने मुझे थोड़ा सा बौखला दिया था।

मैंने थोड़ा खुद को संभाल और बोली, “हाँ, यार। संडे ही समय मिलता है यह सब करने का। तू बता? आज बड़ी अच्छी लग रही हो? क्या ख़ास बात है जो आज तुमने साड़ी पहनी है?”, मैंने ज़रा एक सहेली की तरह अपने हाथो से उसकी बाहों पे हल्का सा धक्का देते हुए कहा। मुझे लगा की मैंने परफेक्ट औरत की तरह ही बर्ताव किया था। पर मेरे दिमाग में कुछ और भी चल रहा था। मुझे अदिति के चेहरे को देख कर बड़ा गुस्सा आ रहा था। मैं समझ नहीं पा रही थी कि ऐसा क्यों हो रहा है। इसके पहले पुरुष रूप में मेरा अदिति से हॉस्पिटल में थोड़ा बहुत मिलना होता रहा था, और कभी भी मुझे उससे किसी प्रकार की दिक्कत न थी। हम काम की बातें करते थे और अपने अपने रास्ते चल देते थे। मेरे गुस्से की वजह मुझे समझ नहीं आ रही थी। कभी अदिति ने ऐसा कुछ किया भी न था कि मुझे ऐसा महसूस हो।

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अदिति और उसके पति कबीर की आज शादी की सालगिरह थी। अदिति को साड़ी में देख कर मैं सोचने लगी कि इस साड़ी में मैं कैसी दिखती?

अदिति ने बड़ी सी मुस्कान के साथ कहा, “आज हमारी शादी की सालगिरह है। और मेरे हसबैंड को आज मुझे भारतीय नारी की तरह सजे देखना था। बस इनकी फरमाईश पूरी कर रही हूँ।” मैं भी हँसते हुए बोली, “हाँ। सालगिरह तो दोनों की होती है पर फायदा सिर्फ पति उठाते है।”

“अब इन्हें कौन समझाए की साड़ी पहनना, सजना संवरना कितनी मेहनत का काम है। यहाँ अमेरिका में तो साड़ी पहनने की आदत है नहीं। मुझे तो पूरे समय डर लगा रहता है कि गलती से मेरी सैंडल मेरी प्लेट पर न चढ़ जाए और पूरी साड़ी खुल जाए। तुझे पता नहीं है कि मैंने कितनी पिन लगायी है इस साड़ी में जगह जगह।”, यहाँ की दूसरी भारतीय औरतों की तरह अदिति भी साड़ी पहनने की मुश्किलों की बात करने लगी। मैं तो आदमी होकर भी बड़े आराम से साड़ी पहन लेती हूँ और मुझे कोई दिक्कत नहीं होती। ये औरतें पता नहीं क्यों इतनी शिकायत करती है, वह भी तब जब वो मुश्किल से साल में २-३ बार पहनती है कुछ घंटो के लिए। परिणीता कभी शिकायत तो नहीं करती पर वो भी बहुत ख़ास दिनों पर ही साड़ी या लहंगा पहनती है।

अदिति की बात सुनकर मैं ज़ोरो से हंस दी। फिर भी मेरे दिमाग में न जाने क्यों उसे देखकर गुस्सा बढ़ता जा रहा था। “चाहे जो भी बोल तू, आज तू और तेरी साड़ी दोनों ही बेहद सुन्दर लग रही है। वैसे कहाँ से खरीदी थी यह? बहुत ही सुन्दर है। सिल्क है यह?”, मैंने उसके पल्लू को हाथ में पकड़ कर उसके पल्लू और साड़ी की बॉर्डर को निहारते हुए पूछा। जैसे औरतें करती है। उसकी साड़ी में मेरा इंटरेस्ट तो जाग रहा था। उसका बड़ा सा मंगलसूत्र साड़ी पर निखर के बाहर आ रहा था। काश, कभी मुझे भी कोई साड़ी गिफ्ट करे। मैं कुछ देर के लिए सोचने लग गयी कि मैं ये साड़ी पहन कर कैसे लगूंगी। ये सोचना थोड़ा अजीब सा भी था क्योंकि मेरे दिमाग में जो तस्वीर बन रही थी वो कभी मुझे मेरे पहले वाले प्रतीक के रूप में दिख रही थी तो कभी मेरे नए स्त्री वाले रूप में। ऐसा था मानो दो अलग अलग दिमाग आइडिया दे रहे है।

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अदिति को यह साड़ी उसकी सास ने गिफ्ट की थी। मैं उसकी साड़ी की बॉर्डर और डिजाईन निहार रही थी। उसका बड़ा सा मंगलसूत्र साड़ी पर निखर के बाहर आ रहा था। काश, कभी मुझे भी कोई साड़ी गिफ्ट करे।

“हाँ। यह मैसूर सिल्क साड़ी है। पिछले साल मेरी सास ने गिफ्ट की थी। वो हर साल मुझे २-३ साड़ी दे जाती है। इतनी बार तो मुझे यहाँ पहनने का मौका भी नहीं मिलता!” कहीं अदिति अब सास बहु के ड्रामे के बारे में बातें न शुरू कर दे। मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि ये वही अदिति है जो मुझसे बिलकुल प्रोफेशनल तरीके से मिलती थी और अपने काम के बारे में बात करती थी। और आज मैं उससे साड़ी, पति और सास के बारे में एक सहेली की तरह बात कर रही थी। वहीँ दूसरी ओर परिणीता, अदिति के पति कबीर से बिलकुल दो सामान्य आदमियों की तरह हाथ मिलाकर कुछ एक दुसरे के काम के बारे में बात कर रहे थे।

तभी परिणीता, जो कि दुनिया की नज़र में प्रतीक है, ने हमारी ओर पलट कर कहा, “लेडीज़! आप लोग अपनी साड़ियों की बात बाद में कर लेना। पहले तो अदिति और कबीर, आप दोनों को बहुत बधाई हो सालगिरह की।” मैंने भी कहा, “हाँ। सच में बहुत बधाई हो तुम दोनों को। पर कबीर, सालगिरह के दिन कोई भला पत्नी को किराना दूकान लेकर जाता है?”

अदिति और कबीर ज़ोर से हँस दिए। फिर कबीर ने कहा, “अरे भाभी जी, हम लोग इसके बाद रोमांटिक लंच के लिए एक अच्छे रेस्टोरेंट जा रहे है।” कबीर और अदिति साथ में बड़े अच्छे लग रहे थे।

“चलिए अच्छा है, साथ में पूरा दिन एन्जॉय करिये। हम तो अपनी प्यारी पत्नी के कहने पर किराना खरीदने आये है, और उसके बाद घर पे ही समय बिताएंगे।”, परिणीता ने कहते कहते मेरे करीब आकर अपने हाथ मेरी कमर पर रख दिया। “हाँ। ये मेरे लिए घर में आज खाना जो बनाने वाले है, तो मैंने सोचा कम से कम किराना खरीदने में इनका साथ दे दूं वरना ये आधा सामान तो लाना भूल जाते है। “, मैंने मज़ाकिया लहज़े में कहा।

मेरी कमर पे परिणीता का हाथ था तो मैं भी निःसंकोच परिणीता के सीने के करीब आ गयी। हम दोनों की हिप्स आपस में चिपक रही थी और मेरा बाईं ओर का स्तन परिणीता के सीने से दब रहा था। बिलकुल वैसे ही जैसे नए प्रेमी युगल एक दुसरे के कंधे पर सर रख कर खड़े होते है या चलते है। परिणीता के साथ पति-पत्नी वाली नोकझोंक मुझे अच्छी लग रही थी। उसे इतने करीब महसूस कर के प्यार भी महसूस हो रहा था। जी कर रहा था कि उसे किस कर लूँ। कल तक जब मैं पुरुष रूप में थी, तब तो मैं कई बार उसे किस कर ही लेती थी। हमने थोड़ी देर और अदिति और कबीर से बात की। और पूरे वक़्त हम दोनों पति-पत्नी एक दूजे को पकड़े हुए थे। बीच बीच में हम दोनों एक दुसरे की ओर प्यार से भी देखते, और कभी कभी मैं एक अच्छी पत्नी की तरह शर्मा जाती। हमने एक बार फिर अदिति को बधाई देकर उनसे विदा ली।

इसके बाद हम किराने का सामान लेने लगे। परिणीता ने मेरा एक हाथ साथ में पकड़ रखा था। शरीर बदलने के बाद भी हम दोनों पति-पत्नी में प्यार अनुभव करके मुझे ख़ुशी महसूस हो रही थी। पर अब एक बात मुझे बेचैन करने लगी थी। मुझे अब तक समझ नहीं आया था कि मुझे अदिति को देख कर गुस्सा क्यों आ रहा था। फिर भी खरीददारी करने में मैं मशगूल हो गयी।

“सुनिये। हमें ज़रा तूर दाल का पैकेट खरीदना है। मेरा उस ऊंचाई तक हाथ नहीं पहुच रहा है। आप निकाल देंगे प्लीज़?”, मैंने परिणीता से कहा। स्त्री-रूप में मेरा कद अब पहले से १० इंच कम था। इसलिए मुझे परिणीता से कहना पड़ा। आखिर मेरे पहले वाले तन में अब परिणीता थी।

परिणिता ने मेरे पास आकर कहा, “प्रतीक, वो दोनों अब जा चुके है। अब तुम्हे पत्नी होने का नाटक करने की आवश्यकता नहीं है।” जवाब में मैंने धीमी आवाज़ में परिणीता के कान में कहा, “मैं जानता हूँ पर यह पटेल स्टोर है। यहाँ सभी हिंदी समझते है। मैंने यदि औरत की बॉडी में पति की तरह बात की तो लोग पलट कर हमारी ओर देखने लगेंगे।” परिणीता मान गयी। इसके बाद हमने सामान ख़रीदा, और बिल अदा करने काउंटर पर गए। काउंटर पर एक भारतीय सज्जन थे। उन्होंने हमें देख कर कहा, “नमस्ते भाभी जी। नमस्ते भैया। आप को सब सामान तो मिल गया न?” इस वक़्त पुरुष होने के नाते परिणीता ने जवाब दिया और पैसे अदा किये। आमतौर पर हम क्रेडिट कार्ड का उपयोग करते है पर आज कैश का उपयोग किया क्योंकि मुझे यकीन नहीं था कि परिणीता मेरे क्रेडिट कार्ड के हस्ताक्षर कॉपी कर सकेगी।

दूकान से बाहर निकलते ही मैंने सामान के सारे बैग परिणीता को थमा दी और खुद सिर्फ अपना लेडीज़ पर्स कंधे पर टांग कर चलने लगी। “अब तुम सामान कार तक ले जाने में साथ नहीं दोगे?”, परिणीता ने कहा। “अरे, तुम अपनी नाज़ुक पत्नी से इतने भारी बैग्स उठावाओगे?”, मैं अब तक पत्नी के रोल में ही थी। पति-पत्नी के इस उलटे रोल में मुझे मज़ा भी बहुत आया। परिणीता भी इसी तरह मुझसे सभी बैग्स उठवाया करती थी। आज उसे पता चलेगा कि पति भी बड़ी मेहनत करते है।

कार में आकर बैठते ही स्त्री धर्म के अनुसार मैंने अपनी ड्रेस ठीक की। परिणीता भी आकर बैठ गयी। उसने बैठते ही मेरा हाथ पकड़ कर कहा, “थैंक यू प्रतीक। तुम तो मुझसे भी बेहतर पत्नी का रोल किये आज। मैं उस बुरी औरत अदिति के सामने हमारा इम्प्रैशन कम नहीं होने देना चाहती थी।”

“परी। यह हमारा टीमवर्क था। हम दोनों को ज़रुरत थी इसकी। और इस टीमवर्क में मुझे बहुत मज़ा भी आया।”, मैंने कहा। “मुझे भी बहुत अच्छा लगा प्रतीक!”, परिणीता ने भी चहकते हुए कहा। कल तक यदि ऐसा मौका आया होता जब हम दोनों एक दुसरे से इतना खुश होते तो मैं अपनी पत्नी परिणीता को तुरंत किस कर लेती। आज भी वही चाहत थी पर आज मैं औरत हूँ। मुझे पता नहीं था कि परिणीता क्या सोचेगी। इसलिए मैंने उसे किस नहीं किया।

“वैसे परी, मुझे यह समझाओ की आखिर तुम्हे अदिति पसंद क्यों नहीं है। मुझे तो बड़ी सीधी सादी काम से मतलब रखने वाली औरत लगती है।”, मैंने परिणीता से पूछा। परिणीता ने थोड़ा रुक कर कहा, “अदिति हॉस्पिटल में दूसरो की बहुत चुगली करती है। और आज जो वो सती सावित्री होने का ढोंग कर रही थी, सब दिखावा है। मैंने उसे पिछले हफ्ते एक जूनियर डॉक्टर की बांहों में देखा था।”

ओह माय गॉड। मेरे दिमाग में वह सीन तुरंत आ गया। ऐसा लग रहा था जैसे मैंने हॉस्पिटल में एक दरवाज़ा खोला और मैं अदिति को किसी दुसरे डॉक्टर से लिपटे किस करते देख रही हूँ। और उसके तुरंत बाद दरवाज़ा बंद करके मैं वहां से चली जाती हूँ। जहाँ तक मुझे याद है मैंने तो ऐसा पहले कभी देखा नहीं था। तो फिर वह सीन मुझे इतना साफ़ क्यों दिखाई दे रहा था।

“तुम क्या सोच रहे हो प्रतीक? तुम्हे तो अदिति सीधी सादी ही लगेगी। कोई सुन्दर औरत दिख जाए तो तुम्हे उसमे कुछ बुराई नहीं दिखेगी कभी। टिपिकल आदमी हो तुम!”, परिणीता मुझसे बोली।

“एक्सक्यूज़ मी, मैडम। मेरी शादी दुनिया की सबसे सुन्दर औरत से हुई है। उससे सुन्दर कोई नहीं है तो मैं क्यों भला अदिति को भाव देने लगा। वैसे भी अभी मैं दुनिया की सबसे हॉट एंड सेक्सी परिणीता के शरीर में हूँ। अदिति वगेरह में मेरा कोई इंटरेस्ट नहीं।”, मैंने अपने लंबे बालो को झटकते हुए एक तरफ कंधे पर करते हुए मजाकिये लहजे में कहा।

परिणीता हंस दी। “अब तुम ज्यादा हॉट होने की कोशिश न करो! बाल झटक के अदाएँ दिखाना तुम्हारे बस की बात नहीं।”, कुछ पल रुक कर फिर उसने कहा, “प्रतीक मुझे तुम्हे कुछ बताना है।”

“क्या बात है परी?”, मैंने पूछा। परिणीता गंभीर लग रही थी। “प्रतीक। मुझे पूरा यकीन तो नहीं है पर मुझे लगता है कि तुम्हारे तन में आने के बाद से मैं तुम्हारे दिमाग को पढ़ सकती हूँ। मेरे कहने का मतलब है कि मैं तुम्हारी यादों को देख सकती हूँ।”

मैं चुप थी। “प्रतीक। मुझे पता है कि अदिति को लेकर तुम्हारे दिमाग में कुछ नहीं है। क्योंकि उसे देखते ही मेरे दिमाग में वो याद आ गयी थी जब तुम पिछले हफ्ते अदिति से ५ मिनट के लिए मिले थे। तुम दोनों के बीच क्या बात हुई और तुम कैसा महसूस कर रहे थे, मुझे सब याद आ गया था। क्या तुम भी मेरी यादें पढ़ सकते हो प्रतीक?”

मैंने थोड़ी देर सोचा और फिर कहा, “परी, यहाँ कार में तुमसे बात करने के पहले तक मुझे ये पता नहीं था। अदिति को देख कर मुझे बेहद गुस्सा आ रहा था पर मुझे कारण नहीं पता था। शायद मेरे खुद के विचार इतने हावी थे कि तुम्हारे दिमाग की यादें बाहर नहीं आ पायी। पर जब तुमने मुझे बताया कि तुमने अदिति को जूनियर डॉक्टर की बांहो में देखा था, उसी वक़्त मेरे दिमाग में वो यादें बिलकुल साफ़ तस्वीर की तरह सामने आ गयी थी।”

“मुझे अब कुछ कुछ समझ आ रहा है। यादें हमारे दिमाग में बसी हुई है। पर उन्हें हम यूँ ही नहीं पढ़ सकते। वो बाहर तभी आती है जब हम बाहर की दुनिया में कुछ ऐसा देखे जो उन यादों से जुड़ा हो। और उस पर भी वो यादें बाहर तब आएगी जब हम अपना ध्यान उन पर लगाएंगे। शायद इसी कारण से अदिति को देख कर मुझे पूरी तरह से सब कुछ याद नहीं आया था क्योंकि मैं इस बात पर ध्यान लगाए हुए था कि मुझे पत्नी का रोल करना है।”, मैंने आगे कहा।

“तुम सही कह रहे हो प्रतीक। एक दुसरे की यादें पढ़ना खतरनाक भी हो सकता है हमारे रिश्ते के लिए तो प्लीज़ ज़रा संभल कर रहना।”, परिणीता ने चिंतित होकर कहा, “ओह गॉड। प्रतीक ऐसा हमारे साथ कैसे हो गया?”

“परिणीता, सब ठीक होगा। चिंता करके कोई फायदा नहीं है।”, मैंने परिणीता को दिलासा दिया पर खुद को अपनी कही बात पर यकीन नहीं था।

पहली रात

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मैं घर आते ही पैरो से सैंडल उतार कर बैठ गयी। ऊँची हील से मेरी एड़ियों में दर्द हो रहा था।

दूकान से आते ही मैंने सबसे पहले तो अपनी सैंडल उतारी थी। भले मुझे ऊँची हील पहन कर चलना आ गया था पर मेरी एड़ियों में दर्द होने लगा था। हिल पहन कर दिन भर घूमना आसान काम नहीं है। औरतों के बारे में काफी कुछ सिख रही थी मैं। बाकी का दिन हमने अपनी दिनचर्या में लगा दिया। कपडे धोये, खाना बनाये, बर्तन धोये, घर साफ़ किये आदि। परिणीता के शरीर में काम करते हुए यह पता चल गया था कि मेरे नए नाज़ुक तन से कई काम करना और वज़न उठाना उतना आसान नहीं था जो पहले मैं प्रतीक के रूप में कर सकती थी। फिर भी परिणीता बेझिझक वो सारे काम बिना शिकायत के करती थी। मेरी पत्नी मुझसे बेहद प्यार करती है, यह यकीन बढ़ता जा रहा था। परिणीता के दिमाग से यादें पढ़ने का मौका तो था पर मेरी कोशिश थी की ऐसा कुछ न करूँ। क्योंकि कुछ बातें प्राइवेट रहे तो ही अच्छा है। फिर भी छोटी छोटी बातें बाहर आ ही जाती थी। जैसे परिणीता जब हमारे घर के उस कमरे का दरवाज़ा बंद देखती थी जहाँ मैं प्रतीक से एक औरत बनने के लिए सजती संवरती थी, तब कैसे उसे बेचैनी होती थी। आज तक उसने मेरा वह बॉक्स नहीं देखा था जिसमे मेरी सारी चीज़े रखी हुई थी जैसे मेकअप, ब्रेस्टफॉर्म, विग, इत्यादि।

अब रात हो चुकी थी। हम दोनों के मन में बस यही आस थी कि सुबह उठने पर हम अपने अपने शरीर में वापस आ चुके होंगे। सोने से पहले हमने कपडे बदले। मैंने परिणीता की नाईटी पहनी। इस नाईटी की नैक काफी खुली हुई थी जिससे मेरे स्तन आसानी से दिख रहे थे। नाईटी की लंबाई भी काफी कम थी। इससे बस मेरी पैंटी छुप रही थी। मैं पहले ही बता चुकी हूँ आपको कि कैसे सुबह से उठने के बाद से मेरा तन मन कामुक भावनाओं से भरा हुआ था। स्त्री के तन के हॉर्मोन मुझे घड़ी घड़ी उकसा रहे थे। यह मखमली बदन मुझे मदहोश किये हुए था। ऊपर से यह नाईटी में मेरे उभरे हुए स्तन मुझे दीखते तो मन और मचल उठता। परिणीता की सभी नाईटीयाँ बेहद ही सेक्सी थी। न भी होती, तब भी यह बदन ही जानलेवा था। मेरा तन मन मेरे वश में नहीं था। जो हाल मेरा था वही हाल परिणीता का भी था। उसके तन में भी पुरुष हॉर्मोन ज़ोरो से दौड़ रहे थे।

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मैंने परिणीता की एक नाईटी पहनी और बिस्तर पर आ गयी। मेरे तन-बदन में आग लगी हुई थी। आज हम पति-पत्नी की नए रूप में पहली रात थी। कहीं आज मेरी सुहागरात तो नहीं होने वाली थी?

यह हमारी पहली रात थी जिसमे मैं पत्नी थी और परिणीता पति। जो मेरे तन मन में चल रहा था वह बेकाबू हो जाए तो आज हमारी सुहागरात हो जाए। मुझे तो इस बात का बेहद डर था। हम दोनों पति-पत्नी की आदत थी एक दुसरे को गले लगा कर सोने की। मुझे तो सोच सोच कर ही हलचल हो रही थी कि मैं कैसे अपने आप पर काबू रख सकूंगी।

परिणीता पहले ही बिस्तर पर थी। उसने मेरा साधारण सा पैजामा और शर्ट पहना था। मैं बिस्तर में परिणीता के बगल में आ गयी। कल तक परिणीता मेरे सीने पर अपना सिर रख कर सोती थी। पर आज मेरा बदन उसके बदन से छोटा था। मैं आज शायद आसानी से उसे वैसे न सुला सकती थी। मैं जैसे ही उसके पास पहुंची, उसने अपनी बाँहें खोल ली। और मैं चुपचाप उसके मजबूत बांहों में आ गयी। मैंने उसके बड़े से सीने पर अपना सिर रख दिया, और अपना एक हाथ भी। परिणीता का एक हाथ मुझे मेरी पीठ पर पकडे हुए था। कुछ देर बाद वो मुझे पीठ पर सहलाने लगी। मेरे स्तन परिणीता के पुरुष तन से दब रहे थे। मैं उतावली हुए जा रही थी। यह तो अच्छा हुआ था कि मैंने अब भी ब्रा पहनी हुई थी। वरना खुले स्तन मुझे और न जाने कितना मदमस्त करते। परिणीता का हाथ मेरी पीठ पर मेरी ब्रा स्ट्राप पर जा कर रुक गया। फिर उसने मेरी नाइटी को पीछे से ऊपर खिंचा। मैं कुछ न बोली। फिर उसका हाथ मेरे नितम्ब (हिप/ass) पर मेरी पैंटी को छूता हुआ ऊपर की ओर बढ़ने लगा। मेरी कमर पर उसका फिसलता हाथ मेरे तन-मन में आग लगा रहा था। उसका हाथ मेरी ब्रा के हुक पर जाकर रुका। परिणीता ने एक ही हाथ से वह हुक खोल दी। फिर अपने दुसरे हाथ से मेरी नाईटी के नीचे से मेरे कोमल पेट को छूते हुए सामने ब्रा तक गया।

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परिणीता ने अपने हाथो से मेरी नाईटी को ऊपर सरका कर मेरी ब्रा की हुक खोल दी।

“प्रतीक, रात भर ब्रा पहन कर रहोगे तो तुम्हारे कंधो पर दर्द होगा और तुम चैन से सो भी न पाओगे।”, परिणीता ने मुझसे कहा और अपने हाथो से मेरी ब्रा उतारने लगी। यह करते हुए उसके हाथ मेरे स्तनों को भी छू रहे थे। मैं मन ही मन सोच रही थी की परिणीता, प्लीज़ मेरे स्तन को अपने हाथों से मसल दो। तब तक उसने मेरी ब्रा उतार दी। मेरे दोनों स्तन अब आज़ाद हो चुके थे। मैं परिणीता के सीने से ज़ोर से लग गयी। मेरे स्तन और दब गए थे। मेरी तन की आग बढ़ती ही जा रही थी।

“कल सुबह हमें हॉस्पिटल काम पर जाना है। कल तक सब ठीक हो जाएगा न प्रतीक?”, परिणीता ने मुझसे पूछा। मैंने उसके गालों पर प्यार से एक छोटा सा चुम्बन दिया और कहा, “सब ठीक होगा। सुबह हम अपने अपने शरीर में वापस होंगे।” मैं उसके सीने को अपने हाथो से सहलाने लगी। शायद परिणीता को यह अच्छा लगा और उसने भी मुझे माथे पर किस दिया। छोटे छोटे किस हमारी रोज़ की आदत थी। बस आज हम बदले हुए थे।

न जाने क्यों मैं सीने पर सहलाते सहलाते, अपना हाथ नीचे की ओर ले जाने लगी। परिणीता के पेट से निचे और फिर उस जगह तक। परिणीता का लिंग बिलकुल तन कर कठोर हो चूका था। वह भी अपने तन को काबू में रखने के प्रयास में थी। मैंने परी के पेट से उसकी पैंट और फिर अंडरवेअर में हाथ डाल कर उसके कठोर लिंग को अपने हाथों से पकड़ लिया। एक बार पकड़ने पर उसे छोड़ने का मन न हुआ।

अब मेरा मन बिलकुल बेकाबू हो रहा था। मेरे होंठ परिणीता के होठो को चूमना चाह रहे थे। मेरे स्तन उसके हाथो से मसलना चाह रहे थे और मेरी योनि उस कठोर लिंग को अपने अंदर लेना चाहती थी। मैं अपनी योनि में एक हलचल महसूस कर रही थी। अब बेकाबू होकर मैं कुछ कर जाती पर किसी तरह काबू करके मैंने परिणीता के लिंग को ऊपर की ओर लिटाते हुए अपना हाथ बाहर निकाल लिया। और झट से उसकी मजबूत बाँहों से निकल कर पलट कर सोने लगी। मैंने अपनी नाईटी को निचे की ओर खिंच कर खुद को ढकने की कोशिश की।पर मेरी आँखों में नींद न थी। परिणीता से दूर होकर मेरी कामुकता थोड़ी कम हो गयी थी।

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परिणीता ने पीछे से मेरे बेहद करीब आकर मुझ पर हाथ रख दिया। उसका कठोर लिंग मुझे पीछे अपनी नितम्ब में महसूस हो रहा था। मानो वो मुझमे प्रवेश करना चाहता था। वो मेरे स्तनों को छूने लगी।

करीब १० मिनट बाद परिणीता मेरे पीछे से मेरे करीब आ गयी। उसने अपने हाथ पहले मेरी कमर पर और फिर मेरी बांहो पर रखा। वो धीरे धीरे मेरे और करीब आ रही थी। उसका विशाल सीना मेरी पीठ से लग चूका था। फिर उसका नीचला तन भी मेरी चूतड़ के पास आने लगा। मैं उसका लिंग अपनी चूतड़ पर महसूस कर पा रही थी। वह धीरे धीरे और बड़ा और कठोर होकर मानो मुझमे आना चाहता था। परिणीता मुझसे अब पूरी तरह से लिपट गयी थी। उसका हाथ बांहो से हट कर मेरी नाईटी की खुली नैक के रास्ते अब अंदर मेरे स्तनों तक आ गया था। उसने मेरे स्तनों को हलके से छुआ, फिर दोनों स्तनों को हिलाया। मेरा मन फिर बेकाबू होने लगा। मैं आँहे भर रही थी और मेरे दांत मेरे होंठो को काट रहे थे। परिणीता अपनी उंगलियों से मेरे निप्पल को छूने लगी। मेरे निप्पल कठोर होने लगे। मेरी चूतड़ अब खुद ब खुद परिणीता के लिंग को दबाने लगी। परिणीता के हाथ अब मेरे स्तन को पकड़ कर मसलने लगे। मेरी साँसे बहुत गहरी हो गयी। क्या आज मेरी सुहागरात होने वाली थी? क्या मुझे औरत होने का शारीरिक सुख मिलने वाला था? क्या परिणीता और मैं, नए पति-पत्नी बनने वाले थे? जानने के लिए मेरी कहानी पढ़ते रहिये।

To be continued …

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