Be like her – 013

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A little shyness adds to the beauty and the grace of a woman. Feeling a little shy in your saree when you are out is ok as long as it’s not out of compulsion.

शर्म तो स्त्री का गहना है. और घर से बाहर थोडा शर्माना तो आपकी खूबसूरती बढ़ता है.. बस इतनी सी शर्त है कि ये शर्म किसी तरह की मजबूरी न हो .

Indian Crossdressing Novel

Note: No copyright violation intended. The pictures here are intended only to give wings to the imagination for us special women who this society addresses as crossdressers. Pictures will be removed if any objection is raised here.

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Caption: Being a man!

When a man tried to humiliate a crossdresser in front of other women…


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English

He tried being a macho, and tried to humiliate me, in front of other ladies. All because I was a man who wears sarees. But I didn’t held back and responded back by saying, “Why don’t you go away and show your machoness somewhere else? Because under my saree pleats, I am more man than you are! Besides it takes a bigger man to wear a saree with high heels and walk confidently.” When I spoke these words, all the ladies came near me and stood behind me. And he walked away saving his face.

Be confident girls!

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हिंदी

दूसरी औरतों के सामने अपनी मर्दानगी दिखाने के लिए वो मेरा मज़ाक उड़ाने की कोशिश कर रहा था क्योंकि एक आदमी होते हुए भी मैंने साड़ी पहनी थी. पर मैं ऐसे कैसे चुप रहती तो मैंने भी उसे पलट कर जवाब दिया, “ओये हीरो, जाकर अपनी मर्दानगी कहीं और दिखाना. क्योंकि मेरी साड़ी की प्लेट के निचे मैं तुझसे कही ज्यादा मर्द हूँ. और वैसे भी साड़ी और ऊँची हील की सैंडल पहनकर सर उठाकर सिर्फ एक आत्म-विश्वासी आदमी चल सकता है.” मेरी बातें सुनकर वहां की सभी औरतें मेरे साथ मेरे पीछे खड़ी हो गयी. और वो चुप-चाप अपना मुंह छुपाते निकल लिया.

बी कॉंफिडेंट गर्ल्स!

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Be like her – 012

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Red and black Satin Saree in Floral print. What else there is to say? You can find this saree by clicking here.

सैटिन फ्लोरल प्रिंट में साड़ी. क्या आप पहनना पसंद करेंगी? आप इस साड़ी को यहाँ क्लिक करके देख सकती है.

Indian Crossdressing Novel

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इंडियन लेडीज़ क्लब: भाग ८

औरत का बदन भी एक पहेली की तरह होता है. सुमति अपने नए बदन को छूकर उसे अनुभव करना चाहती थी. उसके नाज़ुक कोमल स्तन, उसका फिगर, उसकी नाभि और जांघें, वो सबको छूकर महसूस करना चाहती थी.


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औरत का बदन भी एक पहेली की तरह होता है जिसे सुलझाना होता है. हर एक अंग पर स्पर्श एक बिलकुल अलग अहसास उस औरत में जगाता है. तभी तो आदमी औरत को हर जगह छूना चाहते है क्योंकि हर स्पर्श से वो औरत कुछ नए अंदाज़ में लचकती है, मचलती है. और सुमति के लिए तो ये स्पर्श का आनंद कुछ अधिक ही था. अब तो वो खुद एक औरत के जिस्म में थी. अपने खुद के स्पर्श से ही उसे आनंद मिल रहा था जैसा उसने पहले कभी अनुभव नहीं की थी. और इसलिए उसके अन्दर खुद को छूकर देखने की जिज्ञासा बढती जा रही थी. वो धीरे धीरे अपने तन पर अपनी उँगलियों को सहलाते हुए अपने हर अंग में छुपे हुए आनंद को भोगना चाहती थी. उसकी नजाकत भरी लचीली कमर, उसे संवेदनशील स्तन और जांघे, सब जगह वो छूना चाहती थी. पर किसी तरह वो खुद को संभाले हुई थी. अभी तो फिलहाल वो तैयार होकर खुद को आईने के सामने निहार रही थी. हलकी हरी रंग की साड़ी में बहुत खिल रही थी वो आज. एक तरह से उसका सपना सच हो गया था. वो हमेशा से ही इस दुनिया में एक औरत की तरह स्वच्छंद तरीके से विचरण करना चाहती थी, और आज वो एक असली औरत थी. आज वो अपने इस रूप को , इस जिस्म को घंटो आईने में निहार सकती थी और एक पल को भी बोर न होती. आज उसकी बस एक ख्वाहिश थी कि समय कुछ पलो के लिए थम जाए और वो अपने बदन और इस नए वरदान का सुख भोग सके.

सुमति अपनी साड़ी में बहुत सुन्दर लग रही थी. वो आज अपने तन को छूकर महसूस करना चाहती थी. यदि आप भी सुमति की तरह खुबसूरत औरत होती, तो आप क्या करती?

सुमति ने अपनी खुली कमर को एक बार अपनी नर्म ऊँगली से छुआ. “उफ़… खुद की ऊँगली से ही मुझे एक गुदगुदी सी हो रही है.”, उसने सोचा. सुमति खुद अपने ही तन के रोम रोम में छुपे आनंद से अब तक अनजान थी. उसके खुद के स्पर्श से एक ऐसा एहसास हो रहा था उसे जो उसे मचलने को मजबूर कर रहा था. वो अपनी मखमली त्वचा पर धीरे धीरे अपनी उँगलियों को फेरने लगे. अपने पेट पर, अपनी नाभि पर और फिर धीरे धीरे अपने स्तनों के बीच के गहरे क्लीवेज की ओर. उसने अपनी आँखें बंद कर ली ताकि वो हर एक एहसास को और अच्छी तरह से महसूस कर सके. “क्या मैं खुद अपने स्तनों को छूकर देखूं? न जाने क्या होगा उन्हें छूकर , उन्हें दबाकर?”, वो सोचने लगी. बाहरी दुनिया से खुद को दूर करके सुमति सिर्फ और सिर्फ अपने अन्दर होने वाली हलचल को अनुभव करने में मग्न हो रही थी. और फिर उसने अपनी कुछ उंगलियाँ अपनी साड़ी के निचे से अपने स्तनों पर हौले से फेरी. स्पर्शमात्र से ही उसके जिस्म में मानो बिजली दौड़ गयी और वो उन्माद में सिहर उठी. और उस उन्माद में खुद को काबू करने के लिए वो अपने ही होंठो को जोरो से कांटना चाहती थी.. क्योंकि अपने एक स्तन को अपने ही हाथ से धीरे से मसलते हुए वो बेकाबू हो रही थी. उसके तन में मानो आग लग रही थी. वो रुकना चाहते हुए भी खुद को रोक नहीं पा रही थी. मारे आनंद के वो चीखना चाहती थी. उसकी बेताबी बढती ही जा रही थी. उसकी उंगलियाँ उसके स्तन और निप्पल को छेड़ रही थी… और फिर उसकी उंगलियाँ उसके निप्पल के चारो ओर गोल गोल घुमाकर छूने लगी. “आह्ह्ह…”, वो आन्हें भरना चाहती थी पर उसे अपनी आन्हें दबाना होगा. उसकी उंगलियाँ अब जैसे बेकाबू हो गयी थी और उसके निप्पल को लगातार छेड़ रही थी. अब उसकी उंगलियाँ उसके निप्पल को पकड़ कर मसलने को तैयार थी. निप्पल दबाकर न जाने कितना सुख मिलेगा, यह सोचकर ही अब बस वो अपने होंठो को दबाते हुए अपने निप्पल को मसलने को तैयार थी.

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सुमति खुद को संभाल न सकी, और वो अपने ही नर्म मुलायम सुडौल स्तनों को दबाने को बेताब थी. सिर्फ सोच कर ही वो मचल उठी थी..

“डिंग डोंग”, दरवाज़े पर घंटी बजी. आज सुबह से ही घंटी बार बार बज रही थी और हर बार वो घंटी उसके लिए एक नया अनचाहा सरप्राइज लाती थी. पर इस बार इससे सही वक़्त पर घंटी नहीं बज सकती थी. घंटी न बजती तो वो बेकाबू होकर अपने निप्पल को निचोड़ कर मचल उठती और आन्हें भरने लगती, अपने ही होंठो को जोर से कांटने लगती. अपने ही होंठो को कांटना एक पुरुष के रूप में उसे कभी सेक्सी नहीं लगा… पर औरत के रूप में वो बात ही अलग थी. शुक्र था उस घंटी का जिसने उसे अपने ही बदन के जादू से बाहर निकाला.

सुमति सुन सकती थी कि किसी ने दरवाज़ा खोल दिया था तब तक. “नमस्ते अंकल| नमते आंटी! आइये आइये आप ही का इंतज़ार था”, सुमति अपने भाई रोहित की आवाज़ सुन रही थी. आखिर सुमति के सास-ससुर आ ही गए थे. उसने झट से अपने बालो को पीछे बाँधा और उनसे मिलने के लिए बाहर जाने को तैयार हो गयी. “मुझे जल्दी करनी होगी. वरना उन्हें अच्छा नहीं लगेगा कि उनकी होने वाली बहु उनके स्वागत के लिए बाहर तक नहीं आई. पर क्या मुझे यह फिक्र करनी चाहिए? एक औरत को तैयार होने में हमेशा से ज्यादा समय लगता है.. ये तो वो भी जानते होंगे.”, सुमति यह सब सोचते हुए अपने पल्लू और अपनी साड़ी को एक बार ठीक करते हुए पल्लू को हाथ में पकडे बाहर के कमरे की ओर जाने लगी. उसने अपने हाथों से पल्लू को पीठ पर से अपने दांये कंधे पर से सामने खिंच कर ले आई ताकि उसके स्तन और ब्लाउज को छुपा सके. सुमति एक पारंपरिक स्त्री की तरह महसूस कर रही थी इस वक़्त. उसने एक बार चलते हुए खुद को आईने में देखा. “साड़ी तो ठीक लग रही है. शायद रोहित और चैतन्य की तरह मेरे सास-ससुर को भी याद न होगा कि मैं कभी लड़का थी. बहुत संभव है कि मैं उन्हें पहले से जानती हूँ. शायद वो चैताली के माता पिता होंगे. (सुमति की शादी चैताली नाम की लड़की से होने वाली थी. पर इस नए परिवर्तन के बाद चैताली चैतन्य बन चुकी थी.)”, सुमति खुद से बातें करने लगी. सुमति को साड़ी पहन कर शालीनता से चलना पहले से ही आता था. आखिर वो इंडियन लेडीज़ क्लब की फाउंडर थी. उसने न जाने कितने ही आदमियों को सुन्दर औरत बनाया था. इन सबके बाव्जूद, अब वो खुद एक पूरी औरत है, इस बात का उसे यकीन नहीं हो रहा था, और फिर चैताली, उसकी होने वाली पत्नी, अब आदमी बन चुकी थी. किसे यकीन होगा ऐसी बातों का?

सुमति अपने कमरे से बाहर आई. उसके सास-ससुर सोफे के बगल में अब तक खड़े खड़े रोहित और चैतन्य से बातें कर रहे थे. सुमति सही थी… उसके सास-ससुर चैताली के ही माता पिता थे. कम से कम ये नहीं बदला. उसने उन्हें देखा और तुरंत ही अपने सर को अपने पल्लू से ढंकती हुई उनके पैर छूने के लिए झुक गयी. जैसे कोई भी आदर्श बहु करती. एक तरफ तो सुमति चैतन्य से शादी नहीं करना चाहती थी पर फिर भी उसे बहु बनने में जैसे कोई संकोच न था.

“जुग जुग जियो बेटी!”, उसके ससुर प्रशांत ने उसे आशीर्वाद दिया. “बेटी तुम्हारी जगह मेरे कदमो में नहीं मेरे दिल में है.”, उसकी सास कलावती ने नज़र उतारते हुए सुमति को फिर गले से लगा लिया. गले लगाते ही सुमति को माँ का प्यार महसूस हुआ. सुमति के चेहरे पर एक ख़ुशी भरी मुस्कान थी. उसे ऐसा अनुभव तो मधुरिमा के साथ भी होता था जो उसकी क्रॉस-ड्रेसर माँ थी. मधुरिमा की पत्नी अजंता भी तो सुमति को अपनी बेटी की तरह रखते थे. सुमति को आज भी याद आता है कि कैसे अजंता आंटी कहती थी कि उन्हें तो सुमति की तरह बहु चाहिए. शायद मधु और अजंता के साथ का अनुभव था जो आज सुमति सहज रूप से अपने सास-ससुर के सामने थी.

“माँ, बाबूजी, आप लोग बैठ कर थोड़ी देर आरम करिए. आप यात्रा करके थक गए होंगे. मैं तुरंत ही आप लोगो के लिए नाश्ता बनाकर लाती हूँ.”, सुमति ने प्रशांत और कलावती से कहा. पर मन ही मन वो सोच रही थी कि उसने ये सब क्यों कह दिया. उसका इस वक़्त कुछ भी पकाने का मन नहीं था. “रोहित, ज़रा माँ-बाबूजी का ध्यान रखना. मैं किचन में नाश्ता बनाती हूँ. तब तक तुम उन्हें पीने के लिए पानी तो लाकर दो.”, सुमति ने अपने भाई से कहा. और भाई ने सर हिलाकर हामी भर दी.

जब सुमति किचन की ओर बढ़ रही थी तो उसकी नज़रे चैतन्य की नजरो से मिली, उसका होने वाला पति, उसका मंगेतर! चैतन्य अपनी होने वाली खुबसूरत पत्नी को देख मुस्कुरा रहा था. सुमति भी उसे देख मुस्कुरा दी. “हम्म… इस आदमी के साथ मुझे अपनी पूरी ज़िन्दगी गुजारनी है.”, वो सोचने लगी. एक आदमी से शादी करने की बात सोच कर ही उसका मन विद्रोह करने लगता. उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसे इस बात से खुश होना चाहिए या रोना चाहिए. फिलहाल तो मन रोने को तैयार था, पर अब उसके पास एक खुबसूरत औरत का तन भी तो था. एक मौका जिसके लिए लिए वो सारी ज़िन्दगी प्रार्थना करती रहती थी कि उसे औरत की तरह जीवन जीने का मौका मिल जाए. पर ये समय यह सब सोचने का न था. उसे अपने सास-ससुर के लिए नाश्ता बनाना था.. शादी के बारे में वो बाद में शान्ति से सोच लेगी.

किचन में पहुँचते ही उसने अपना पल्लू सर से उतार कर अपनी कमर पर लपेट लिया. उसकी नाज़ुक कमर सच में बेहद सेक्सी थी. उसके बड़े से नितम्ब पर लिपटी हुई साड़ी और पल्लू उसे वो एहसास दे रही थी जैसे उसने पहले कभी नहीं किया था. और फिर उसने अपने बालो को लपेटकर जुड़ा बनाया और नाश्ता बनाने में जुट गयी. सालों से इंडियन लेडीज़ क्लब की मीटिंग की तैयारी करने के अनुभव से उसे भली-भाँती पता था कि साड़ी पहन कर एक एक्सपर्ट हाउसवाइफ की तरह घरेलु काम कैसे किये जाते है. “पहले तो मैं चाय बनाने लगा देती हूँ और फिर पोहा बनती हूँ. वो जल्दी बन जाएगा.”, उसने खुद से कहा. सुमति सब कुछ एक परफेक्ट गृहिणी की तरह कर रही थी. उसने गैस पर चाय का बर्तन चढ़ाया और फिर प्याज और आलू काटने लगी पोहा बनाने के लिए.

“तो.. मेरी प्यारी बहु क्या नाश्ता बना रही है?”, कलावती सुमति की सास ने अन्दर आते हुए कहा.

“ओह कुछ ख़ास नहीं माँ जी. मैं तो बस पोहा बना रही थी आप लोगो के लिए. आशा है कि आप लोगो को पोहा पसंद है.”, सुमति ने प्यार से जवाब दिया. उसने तुरंत अपने पल्लू को कमर से निकाला और फिर अपने सर को ढकने लगी.. अपने सास के सम्मान के लिए. “लो… अब मुझे सर ढँक कर किचन में काम करना पड़ेगा..”, सुमति मुस्कुराते हुए सोच रही थी. उसने कभी इस तरह से तो खाना नहीं बनाया था.

“अरे पगली… रहने दे तुझे सर ढंकने की ज़रुरत नहीं. है. मैं भी औरत हूँ. क्या मैं नहीं जानती सर पे पल्लू करके खाना बनाना कितना कठिन है? न तो ढंग से कुछ दिखाई देता है और फिर हाथ भी अच्छी तरह पल्लू के साथ हिल नहीं पाते. तू तो मेरी बेटी है. बचपन से तुझे अपनी आँखों के सामने बड़ी होते देखा है… जबसे तू फ्रॉक पहना करती थी. तब से सलवार सूट तक तुझे बढ़ते देखा है. और अब तू साड़ी भी पहन रही है. मैं नहीं चाहती कि शादी के बाद तुझे बदलना पड़े.”, कलावती ने प्यार से सुमति के सर पर हाथ फेरते हुए कहा.

कलावती ने फिर सुमति के चेहरे को छूते हुए बोली, “मैं तो बहुत खुश हूँ कि मेरे मोहल्ले की सबसे प्यारी गुडिया सुमति जो मेरे बेटे के साथ खेला करती थी, मेरे घर की बहु बनने वाली है. मैं तो सिर्फ इस बारे में सोचा करती थी, मुझे पता नहीं था कि चैतन्य सच में तुझे बहु बनाकर लाएगा..”

सुमति की शर्म से आँखें झुक गयी. इतना प्यार जो उसे मिल रहा था. पर मन ही मन वो सोच रही थी कि कैसे उसके आस पास की दुनिया बदल गयी है. उसके सामने खड़ी औरत उससे कह रही है कि उसने सुमति को छोटी बच्ची से जवान युवती बनते देखा है. किसी को भी याद नहीं कि वो कभी लड़का भी थी. हर किसी की नज़र में वो हमेशा से ही लड़की थी. ऐसा कैसे हो सकता है? कैसा मायाजाल है ये? क्या इस दुनिया में कोई भी नहीं जो पुरानी सुमति को जानता हो? सुमति के मन में हलचल बढती जा रही थी.

कलावती फिर सुमति की पोहा बनाने में मदद करने लगी. दोनों औरतें आपस में खूब बातें करती हुई हँसने लगी. सुमति को औरत बनने का यह पहलु बहुत अच्छा लग रहा था. अपनी सास के साथ वो जीवन की छोटी छोटी खुशियों के बारे में बात कर सकती थी. ऐसी बातें जो आदमी हो कर वो कभी नहीं कर सकती थी. आदमी के रूप में सिर्फ करियर और ज़िम्मेदारी की बातें होती थी. ऐसा नहीं था कि औरतों को ज़िम्मेदारी नहीं संभालनी होती पर उसके साथ ही साथ वो अपनी नयी नेल पोलिश या साड़ी के बारे में भी उतनी ही आसानी से बात कर सकती थी. जॉब में प्रमोशन की बात हो तो उसके साथ वो फिर ये भी बात कर सकती थी कि प्रमोशन के बाद वो कैसी पर्स लेकर ऑफिस जाया करेंगी या कैसे कपडे पहनेंगी. जहाँ तक करियर की बात है, सुमति को कोई अंदाजा नहीं था कि इस नए जीवन में उसका क्या करियर है या क्या जॉब है. शादी के बाद वो काम कर सकेगी या नहीं? भले ही घर की छोटी छोटी चीजें वो संभालना चाहती थी पर वो अपनी जॉब नहीं छोड़ना चाहती थी… चाहे जैसी भी जॉब हों. और फिर क्या वो शादी के बाद माँ बनना पसंद करेगी? बड़ा भारी सवाल था जिसका जवाब अभी वो सोचना नहीं चाहती थी.

अभी तो सुमति बस खुश थी अपनी सास के साथ किचन संभालते हुए. वो वैसे भी घर संभालने में एक्सपर्ट थी. उसने जल्दी ही सबके लिए चाय नाश्ता तैयार कर ली थी. बाहर नाश्ता ले जाने के पहले सुमति एक बार फिर अपना सर ढंकने वाली थी कि कलावती ने उसे रोक लिया और बोली, “अरे सुमति तू हमारी बेटी है न? अपने माँ बाप के सामने भी कोई पल्लू करता है भला? समझी?” सुमति मुस्कुरायी. अपनी सास के प्यार से वो मंत्र-मुग्ध थी. “थैंक यू माँ! मैं हमेशा आपकी बात याद रखूंगी.” सुमति सचमुच कलावती के प्यार की शुक्र-गुज़ार थी.

सभी अब नाश्ता करने में व्यस्त थे, पर चैतन्य की नज़रे तो बस अपनी होने वाली खुबसूरत नाज़ुक सी पत्नी पर थी. जब भी सुमति उसकी ओर देखती, वो तुरंत मुस्कुरा देता. वो खुश था आखिर उसकी शादी उसकी बेस्ट फ्रेंड के साथ हो रही थी. कम से कम, उसकी नयी यादों में वो सच था. चैतन्य खुद चैताली नाम की लड़की हुआ करता था पर उसे वो बिलकुल भी याद नहीं था. सुमति के अन्दर थोड़ी सी झिझक थी चैतन्य की मुस्कान का जवाब देने के लिए. आखिर सास ससुर उसके सामने थे. कोई अच्छी बहु ऐसे कर सकती थी भला?

“सुमति… भाई मेरा तो पेट भर गया लज़ीज़ नाश्ता कर के. अब हमें शादी की शौपिंग के लिए निकलना चाहिए. मुझे पता है कि औरतों को कपडे खरीदने में बड़ा समय लगता है और ख़ास कर शादी के कपडे”, ससुर प्रशांत ने कहा. “अब तुम शुरू मत हो जाना जी औरतों के कपडे के बारे में… तुम्हे कुछ तो पता नहीं होता कि दुल्हन को कितनी बातों का ध्यान रखना पड़ता है. बड़े आये बातें करने वाले.”, कलावती ने प्रशांत को टोका और सभी हँस पड़े.

अब सभी निकलने को तैयार थे. चैतन्य ने अपनी कार घर के दरवाज़े पर ले आया. उसके पिताजी उसके साथ सामने बैठ गए. और कलावती, सुमति और रोहित एक साथ पीछे. सुमति बीच की सीट में बैठी थी. अब तो उसकी हाइट कम थी तो उसके पैर बीच की सीट में आराम से आ गए. औरत होने का एक फायदा और!, सुमति सोच कर मुस्कुरा दी. वैसे भी वो अपनी शादी की खरीददारी के बारे में सोच कर ही खुश थी.

“सुमति बेटा, तुम्हे पता तो है न कि तुम शादी के दिन क्या पहनना चाहोगी?”, कलावती ने सुमति से पूछा. “हाँ माँ! मैं जानती हूँ मुझे क्या चाहिए.”, सुमति ने मुस्कुरा कर जवाब दिया. किसी और क्रॉस-ड्रेसर की तरह, सुमति को भी पता था कि दुल्हन के रूप में वो किस तरह से सजना चाहेंगी. इंडियन लेडीज़ क्लब में तो उसने कितनो के यह सपने सच भी किये थे. ये कितना ख़ुशी भरा दिन होने वाला था सुमति के लिए ! दुल्हन बनेगी वो सोच कर के ही वो बड़ी ख़ुश हो रही थी. और कुछ देर के लिए वो ये भूल गयी कि जब वो दुल्हन बनेगी तो उसके साथ एक आदमी दूल्हा भी बनेगा.

क्रमश: …

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इंडियन लेडीज़ क्लब: भाग ७

तैयार हो रही सुमति ने झट से अपनी साड़ी पकड़ी और अपने ब्लाउज को ढकने लगी. कोई भी औरत ऐसा करेगी जब कोई आदमी अचानक ही उसके कमरे में चला आये.


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सुमति की कहानी

“डिंग डोंग”, दरवाज़े की घंटी एक बार फिर से बजी.

सुमति जो अपने नए स्त्री वाले तन को निहारने में लगी हुई थी, अपने होंठ और अपने सुन्दर घने लम्बे बालो को सहला रही थी, उसे यह सब छोड़ अब दरवाज़ा खोलना था. पर फिर भी एक बात उसे सता रही थी. कल तक वो एक आदमी थी, पर आज पूरी दुनिया उसे सिर्फ और सिर्फ औरत के रूप में जानती है. अब तो सुमति की माँ भी सुमति को बेटी के रूप में याद करती है. उसे तो याद तक नहीं कि सुमति उसका बड़ा बेटा थी. क्या ये सब सुमति के सपने सच करने के लिए हुआ है? या फिर इसके कुछ बुरे परिणाम भी होंगे? अब तो समय ही बताएगा.

सुमति अब और कोई नए सरप्राइज के लिए तैयार नहीं थी. पर फिर भी दरवाज़ा तो खोलना ही था. चलते हुए उसे एहसास हुआ कि अब उसके स्तन झूल नहीं रहे है, ब्रा पहनना आखिर काम आया. आज के पहले उसने इस कारण से तो कभी ब्रा नहीं पहनी थी. सुमति ने आखिर दरवाज़ा खोला और उसके सामने उसका छोटा भाई रोहित था.

“रोहित!!”, सुमति ख़ुशी के मारे उछल पड़ी. आखिर, अपने भाई को देख कर खुश कैसे न हो. बड़े भाई के रूप में भी सुमति अपने छोटे भाई रोहित को हमेशा से ही प्यार करती थी और उसका ध्यान रखती थी.

“दीदी!”, रोहित भी ख़ुशी से बोल पड़ा. दूसरो की तरह रोहित को भी याद नहीं था कि उसका बड़ा भाई भी था कभी जो आज उसके सामने उसकी बड़ी दीदी बनकर खड़ा है. उसने अपनी दीदी को गले लगाने के लिए बाँहें खोल दी.

भाई को गले लगाना कोई बड़ी बात थोड़ी है. सुमति भी तो एक लड़के के रूप में हमेशा अपने भाई से मिलने पर गले लगाती थी. पर अब कुछ बदल गया था. अब उसके बड़े स्तन भी थे जो गले लगाने के बीच में आते थे. सुमति को पता नहीं था कि इस नए रूप में भाई को गले लगाना किस तरह ठीक रहेगा. किसी तरह फिर भी उसने आगे बढ़ भाई को सीने से लगा लिया.

“वाह दीदी! आप तो बड़े शहर आकर बिलकुल बदल गयी हो. देखो तो! मैंने तो कभी आपको जीन्स और टॉप में देखा ही नहीं था. आप तो कमाल लग रही हो.”, रोहित को अपनी बहन की सुन्दरता पर गर्व महसूस हुआ.

“मेरे भाई… शहर की ज़िन्दगी के हिसाब से सभी को ढलना पड़ता है. चल अब अन्दर आ जा.”, सुमति ने कहा. उसे और कुछ जवाब देने को न सुझा. पर इसके पहले वो कुछ और कह पाती, उसके सर में फिर वही तीव्र चुभने वाला दर्द हुआ. “ओह्ह मेरा सर तो आज फट कर ही रहेगा”, सुमति सर पकड़ कर सोचने लगी.

“क्या बात है दीदी? तुम्हारी तबियत कुछ सही नहीं लग रही? चलो अन्दर हम साथ में बैठते है.”, रोहित एक अच्छे भाई के नाते अपनी बहन को साथ पकड़ अन्दर ले चला. सुमति ने उसकी ओर देखा और सोचने लगी, “रोहित मुझसे कितना ऊँचा लग रहा है. लगता है औरत बनकर मेरी हाइट भी कम हो गयी है.”

z002 सुमति को वो यादें आने लगी जब वो रक्षाबंधन के त्यौहार पर रोहित को राखी बांधती थी. पर वो तो कभी रोहित की बहन थी ही नहीं.

अचानक ही सुमति के दिमाग में पुरानी यादें आने लगी जब वो रक्षाबंधन के त्यौहार पे अपने भाई के हाथो पे राखी बाँधा करती थी. यह सच नहीं हो सकता, आखिर मैं कभी बहन थी ही नहीं. मेरा दिमाग मेरे साथ क्या खेल खेल रहा है? सुमति खुद से ही बाते करने लगी. उसे एहसास नहीं था कि जब जब उसे तेज़ सर दर्द हो रहा था तब तब उसके दिमाग में नयी यादें बन रही थी जिसमे वो एक औरत हुआ करती थी. ताकि उसके इस औरत के रूप में नए जीवन की नींव डल सके.

“थैंक यू रोहित. पर अब मैं ठीक हूँ.”, सुमति ने कहा. “अच्छा तेरे हाल चाल कैसे है यह तो बता? अपनी दीदी से तो तू कितनी कम बातें करता है. कभी कभी फोन भी लगा लिया कर” सुमति ने जो अभी रोहित से कहा उसे तो खुद यकीन नहीं हुआ कि वो ये सब कह सकती थी.

“दीदी क्या बताऊँ आपकी शादी को लेकर कितना उत्साहित हूँ मैं. अब घर का अकेला बेटा हूँ तो आपकी शादी की तैयारी में व्यस्त रहता हूँ, और मुझे अच्छा भी लग रहा है.”, रोहित ने कहा.

“घर का अकेला बेटा”, ये शब्द सुमति के दिमाग में ठनकने लगे. उसे अब तक यकीन नहीं हो रहा था कि यही उसके जीवन का नया सच है. वो मुस्कुरायी और बोली, “इसलिए तो भाई होते है! अपनी बहन की सेवा करने के लिए.. हा हा” सुमति सचमुच एक अच्छी बहन का रोल अदा कर रही थी अब. बिलकुल वैसी ही जैसी उसके नयी यादों में वो थी.

रोहित ने तब एक बॉक्स निकाला और सुमति को देते हुए कहा, “दीदी माँ ने ये साड़ी भेजी है. आज जब अपने सास-ससुर के साथ शौपिंग पे जाओगी, तो यही पहनना. माँ ने कहा है कि तुम्हे ज़रूर पसंद आएगी और तुम इसमें बेहद खुबसूरत लगोगी.”

सुमति की तो उस साड़ी को देख कर आँखें चमक उठी. बचपन से ही माँ की इस साड़ी के लिए उसके मन में ख़ास लगाव था. जब भी माँ ये साड़ी पहनती, वो अपनी माँ के आसपास ही उनके पल्लू से खेलते रहती थी. उस साड़ी का फैब्रिक रेशमी और सॉफ्ट था. वो उसके स्पर्श को कभी भूली नहीं थी. उसके मन में वही पुरानी प्यारी यादें फिर से आ रही रही थी. वो हमेशा सपने देखा करती थी कि काश वो कभी ये साड़ी पहन सके. पर लड़का होने की वजह से, वो केवल सपना ही देख सकती थी. पर आज, वोही साड़ी उसके हाथ में थी… जो उसके तन से लिपटने को तैयार थी. आज उसके सपने सच होने वाले थे. और उसके अन्दर की बचपन वाली सुमति जाग उठी. ख़ुशी से उसने अपने भाई को गले लगाकर उसके गालो पर चूमा और बोली, “सच में रोहित! तुझे पता नहीं है ये साड़ी मेरे लिए क्या मायने रखती है!”

उसने एक बार फिर अपनी माँ के खुबसूरत तोहफे को देखा और रोहित से बोली, “ये साड़ी मेरे लिए बहुत स्पेशल है रोहित. माँ ने पहली बार मुझे अपनी साड़ी गिफ्ट की है. मैं तो इसे ख़ास दिन पर ही पहनूंगी. पर आज वो ख़ास दिन नहीं है. आज मैं कुछ और पहन लूंगी”

रोहित अपनी बहन की भावना को समझने की कोशिश कर रहा था पर लड़के क्या जाने कि माँ की साड़ी बेटी के लिए क्या मायने रखती है! “पर दीदी अब आपके सास-ससुर और चैतन्य जीजाजी आने वाले ही होंगे.. तुम तैयार हो जाओ जल्द से जल्द”, रोहित ने कहा.

“ठीक है. मैं जल्दी तैयार होती हूँ.”, सुमति ने बड़े उत्साह से कहा और अपने बेडरूम की ओर बढ़ गयी.

सुमति की अलमारी में अब तो उस की साइज़ और फिटिंग के कपड़ो से भरी पड़ी थी. उसके कपड़ो का कलेक्शन बहुत ही सुन्दर दिख रहा था, पर उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या पहने? इतने कपड़ो में ढूंढते हुए उसे बड़ा समय लग जाएगा. आज का मौका ऐसा था कि साड़ी पहनना ही बेस्ट होगा, सो वो अपनी साड़ियों के कलेक्शन में साड़ी देखने लगी. अब शौपिंग में उसे धुप में खूब चलना तो पड़ेगा ही, आखिर दुल्हन की शौपिंग है, एक दूकान में थोड़ी ही हो जायेगी? इसलिए उसे कोई ऐसी साड़ी चाहिए जो हलकी रंग की हो और जिसे पहन कर आसानी से चला जा सके. अंत में उसे एक हलकी हरे रंग की साड़ी मिल ही गयी जो इस अवसर पर परफेक्ट होगी. पहले तो वो सोच रही थी कि क्योंकि सास ससुर आ रहे है तो उसे भारी या सिल्क साड़ी पहननी चाहिए. पर उसे अपने अनुभव से पता था कि वैसे साड़ियों को दिन भर पहन कर चलना आसान नहीं होगा. और अब तो उसका बदन पहले से कहीं अधिक नाज़ुक भी हो चूका है… साड़ी का वजन अब उसे ज्यादा महसूस हुआ करेगा.

पहले तो सुमति ने साड़ी के ब्लाउज को पहन कर देखा कि उसकी फिटिंग सही आ रही है या नहीं. एक औरत जानती है कि एक सही और चुस्त फिटिंग का ब्लाउज आपको अत्यधिक आकर्षक बना सकता है. लूज़ फिटिंग के ब्लाउज तो कभी नहीं पहनना चाहिए! “सुमति! ये ब्लाउज तो बहुत सेक्सी लग रहा है तुझ पर. देख, तेरे बूब्स पर कितने अच्छे से शेप में फिट आया है.”, सुमति खुद को आईने में देखते हुए खुद से बातें कर रही थी. फिर उसने एक सफ़ेद पेटीकोट पहना. वो उम्मीद कर रही थी कि शायद सफ़ेद रंग उसकी साड़ी के रंग के निचे छिप जाएगा. उसके पास और कोई मैचिंग पेटीकोट नहीं मिल रहा था. वो एक बार फिर पलटी और खुद को आईने में देखने लगी. “हम्म… नाईस फिगर सुमति!”, उसे अपने नए बदन पर गर्व हो रहा था. और फिर उसने अपने साड़ी के एक छोर को पकड़ कर अपने पेटीकोट पर पीछे की ओर से चढ़ा कर देखा. वो देखना चाहती थी कि उसका सफ़ेद पेटीकोट उस साड़ी के रंग के निचे छिपेगा या नहीं. साड़ी से बेमेल रंग का दीखता हुआ पेटीकोट कभी अच्छा नहीं लगता. “हम्म… चल जाएगा ये पेटीकोट. थैंक गॉड!”, सुमति ने सोचा. “वैसे मेरी नाभि और कमर भी बड़ी सेक्सी लग रही है. बाहर तो इस सुन्दरता के साथ मेरे पीछे कई लड़के पड़ जायेंगे.”, सुमति अन्दर ही अन्दर मुस्कुरा रही थी अपनी सुन्दरता पर.

साड़ी का ब्लाउज सुमति के सुडौल स्तनों पर अच्छी तरह फिट आ गया था. उसे अपना लुक अच्छा लग रहा था. पर वो अपने सफ़ेद पेटीकोट को लेकर डाउट में थी. उसने अपने कुलहो पर पेटीकोट को साड़ी से ढककर देखा, पेटीकोट का रंग साड़ी के पीछे आसानी से छिप गया था. शुक्र है!

“डिंग डोंग”, दरवाज़े की घंटी एक बार और बजी. “उफ़ ये घंटी तो मेरी जान ही लेकर रहेगी आज. मेरे सास-ससुर इतने जल्दी न आ गए हो. मैं तो अब तक तैयार भी नहीं हुई हूँ.”, सुमति ने सोचा. “रोहित, ज़रा देखना तो कौन आया है… मैं तैयार हो रही हूँ.”, उसने बेडरूम से ही आवाज़ लगायी. अब सुमति आदमी नहीं है कि आधे अधूरे कपडे पहन कर बाहर आ जाए. अब उसे पूरे समय शालीन बनी रहना होगा. “हाँ दीदी”, रोहित की बाहर से आवाज़ आई.

सुमति वापस अपनी तैयारी में ध्यान देने लगी. पर उसका दिमाग उसे बेचैन किये जा रहा था. एक तरफ तो उसे अपने नए जिस्म में साड़ी पहनकर तैयार होते बड़ा अच्छा लग रहा था वहीँ दूसरी ओर, वो नाराज़ भी हो रही थी कि उसे अपने सास-ससुर के लिए तैयार होना पड़ रहा है, वो लोग जिनको वो जानती तक नहीं. एक आदमी से शादी करने की सोचते ही उसके मन में खीझ उठती थी. पर उसे ये शादी और बहु होने के किरदार में कम से कम कुछ दिन रहना पड़ेगा जब तक उसे समझ नहीं आ जाता कि ये सब हो क्या रहा है. एक बार माजरा समझ आ जाए तो इस शादी से बाहर निकलने की कोई न कोई तरकीब निकाल लेगी वो.

“स्वागत है चैतन्य जिजाजी! आपके माता-पिता कहा रह गए? साथ नहीं दिख रहे” रोहित की बातें सुमति सुन सकती थी. तो घर पे सुमति के होने वाले “वो” आ ही गए. पता नहीं क्यों सुमति के मन में एक उत्सुकता हुई उनको एक झलक देखने की. ये विचार आते ही उसे अपने ऊपर थोड़ी शर्म भी महसूस हुई. क्या उसका चेहरा शर्म से लाल हो रहा था? “माँ-पिताजी लगभग आधे घंटे में यहाँ आयेंगे. तुम्हारी दीदी तैयार हुई या नहीं?”, चैतन्य ने रोहित से कहा.

सुमति को सब कुछ साफ़ तो नहीं समझ आ रहा था कि बाहर के कमरे में वो दोनों व्यक्ति क्या बातें कर रहे है. वो एक बार फिर खुद को आईने में देखते हुए तैयार होने में मगन हो गयी. आज वो बहुत खुबसूरत दिखना चाहती थी. पता नहीं क्यों. पर एक औरत को सुन्दर दिखने के लिए कोई बहाने की ज़रुरत थोड़ी होती है भला… पर ये बात सुमति अब तक समझी नहीं थी. एक औरत खुद को खुबसूरत बना कर अपने बारे में अच्छा महसूस कर ले.. यही कारण काफी है सजने संवरने के लिए. “हेल्लो… ब्यूटीफुल!”, सुमति के कानो में एक मर्दानी आवाज़ सुनाई पड़ी.

सुमति को ज़रा भी अंदाजा नहीं था कि कोई उसके कमरे में यूँ चल कर आ सकता है जब वो तैयार हो रही हो. आखिर तमीज़ भी कोई चीज़ होती है. उसने तो अपने ब्लाउज को भी अपनी साड़ी के आँचल से अब तक ढंका नहीं था. वो तो अब तक अपनी कमर के निचे प्लेट ही बना रही थी. उसने झट से अपनी साड़ी को दोनों हाथों से पकड़ा और तुरंत उससे अपने सीने को छुपाने लगी. ठीक वैसे ही जैसे कोई भी औरत करेगी यदि कोई अनजान आदमी उसके कमरे में घुसा चला आये. कोई ऐसे ही कैसे उसके कमरे में आ सकता था? बदतमीज़. सुमति सोच ही रही थी. पर उसे इस आदमी को देखते ही गुस्सा आ गया और वो चीख पड़ी. “मेरे कमरे में ऐसे कैसे आ गए तुम? तुम्हे इतना भी पता नहीं कि किसी के कमरे में जाने से पहले दरवाज़े पर दस्तक देते है? तुम्हे कोई शर्म लिहाज है या नहीं? बदतमीज़” सुमति सचमुच गुस्से में थी.

सुमति खुद को बार बार आईने में निहार रही थी. इतनी सेक्सी नाभि और कमर पे कौन अपनी साड़ी की प्लेट नहीं पहनना चाहेगी भला?

सुमति का गुस्सा तो बढ़ता ही जा रहा था. उसके हाथ काँप रहे थे जब वो अपने स्तनों को अपनी साड़ी से छुपाने की कोशिश कर रही थी. आज से पहले उसके लिए ये परिस्थिति कभी आई नहीं थी. पर एक अनजान आदमी की अनुपस्थिति में शायद वो थोड़ी डरी हुई थी. “क्या हुआ, सुमति? ये मैं हूँ. चैतन्य! मुझसे क्या शर्माना. अब तो एक महिना भी नहीं बचा है जब हम दोनों के बीच की सारी दीवारे ढह जाएँगी. और ऐसा भी दिन आएगा जब तुम दुसरे कमरों को छोड़कर उस कमरे में आकर कपडे बदला करोगी जहाँ सिर्फ मैं रहूँगा… ताकि तुम्हे कोई और डिस्टर्ब न करे. और तुम मुझसे शर्मा रही हो?”, उस अनजान आदमी, जिसका नाम चैतन्य था, ने कहा. वो मुस्कुरा रहा था. उसके लिए तो वो अपनी होने वाली पत्नी के कमरे में था. उसे कोई शर्म न थी.

सुमति अब भी घबरायी हुई थी. उसकी दिल की धड़कने बहुत तेज़ चल रही थी. और सांसें बहुत गहरी. उसने गौर से अपनी आँखों के सामने खड़े इस आदमी को देखा. और उसे जल्द ही समझ आ गया कि चैतन्य कोई और नहीं… बल्कि वही लड़की है जिससे सुमति की शादी होने वाली थी. कम से कम चेहरा तो मेल खाता था. जब सुमति अचानक ही औरत बन सकती है तो वो लड़की भी अचानक ही आदमी बन सकती है. अब तो इस दुनिया में कुछ भी हो सकता था. “हे प्रभु… ये तो चैताली है जो अब आदमी बन चुकी है. ये सब कैसे हो सकता है? मुझे कुछ यकीन क्यों नहीं हो रहा है.”, सुमति अन्दर ही अन्दर रो पड़ी. और अचानक एक बार फिर उसके सर में तेज़ चुभने वाला दर्द हुआ. अब उसका दिमाग उसके लिए एक बार फिर नयी यादें बना रहा था जिसमे चैतन्य हमेशा से लड़का था और सुमति लड़की. उनका नया बचपन गढा जा रहा था जिसमे चैतन्य और सुमति अच्छे दोस्त हुआ करते थे.

सुमति का सर दर्द अब और बढ़ता ही जा रहा था. न जाने कितने नयी यादें उसकी आँखों के सामने दौड़ने लगी थी. उसका सर चकरा रहा था. और उस वक़्त उसके हाथों से उसकी साड़ी छुट कर निचे गिर गयी. उसने अपने सर को एक हाथ से पकड़ कर संभालने की कोशिश की. पर सुमति अब खुद को संभाल न सकी और वो बस निचे गिरने ही वाली थी. कि तभी चैतन्य ने दौड़कर उसे सही समय पर पकड़ लिया. सुमति अब चैतन्य की मजबूत बांहों में थी. उसके खुले लम्बे बाल अभी फर्श को छू रहे थे. और सुमति की आँखों के सामने उसके होने वाले पति का चेहरा था. चैतन्य की बड़ी बड़ी आँखें, उसके मोटे डार्क होंठ और हलकी सी दाढ़ी.. सुमति अपने होने वाले पति की बांहों में उसे इतने करीब से देख रही थी. और चैतन्य मुस्कुराते हुए सुमति को बेहद प्यार से सुमति की कमर पर एक हाथ रखे पकडे हुए थे, वहीँ उसका दूसरा हाथ सुमति की पीठ को छू रहा था. जो शायद किसी भी नए कपल के लिए सबसे रोमांटिक पल होता, वो पल सुमति के लिए उसके उलट था. एक आदमी की बांहों में उसे बिलकुल अच्छा नहीं लग रहा था. उसने चैतन्य को धक्का देते हुए बोली, “छोडो! जाने दो मुझे!” सुमति का इस वक्त का व्यवहार ठीक नहीं था. आखिर चैतन्य उसकी मदद कर रहा था. पर सुमति भी क्या करती. वो तन से भले इस वक़्त औरत थी पर उसका मन तो वोही पहले वाली सुमति का था. वो कभी किसी आदमी की तरफ आकर्षित नहीं महसूस करती थी भले वो एक औरत की तरह कपडे पहनना पसंद करती थी. सुमति औरत होने के इस पहलु को स्वीकार नहीं कर पा रही थी. और इस वक़्त इस नाजुक तन में चैतन्य के सामने वो कितनी असहाय महसूस कर रही थी. और उसके पास सिर्फ उसकी जुबां थी स्थिति को संभालने के लिए.

सुमति की बातें सुनकर चैतन्य चुप चाप पीछे हो लिया और सुमति से बोला, “सुमति मैं जानता हूँ की हम दोनों बचपन से अच्छे दोस्त रहे है. और हमारा रिश्ता बहुत तेज़ी से बदल रहा है. जल्दी ही हम पति-पत्नी बन जायेंगे. पर मैं कभी यह नहीं भूलूंगा कि तुम मेरी दोस्त पहले हो और पत्नी बाद में.”

चैतन्य की बातें सुनकर सुमति नयी दुविधा में पड़ गयी. उसकी नयी यादें उसे बता रही थी कि सचमुच वो और चैतन्य अच्छे दोस्त थे. और वो उसकी आँखों में देखते रह गयी.

चैतन्य भी उसकी आँखों में देख कर बोला, “मुझे एक बात बताओ सुमति. तुम्हारा स्वभाव हमेशा से थोडा उद्दंड और लडको सा था… हमारे गाँव की किसी भी लड़की के मुकाबले तुम कुछ ज्यादा मुंह-फट थी. तुम तो मुझसे कुश्ती भी लड़ा करती थी और मुझे हमेशा हराने की कोशिश भी करती थी. क्या तुम आगे भी ऐसा ही करोगी? मुझे लगता है कि मेरी पत्नी मेरी पिटाई करेगी तो अच्छा नहीं लगेगा दुनिया के सामने.” चैतन्य अब हँस रहा था.

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सुमति के पास अब खुबसूरत दिखने का एक कारण था. उसने एक बार फिर आईने में खुद को देखा “कैसी लग रही हूँ” पोस में!

“मैं ये वादा तो नहीं कर सकती चैतन्य.. क्या पता मैं आगे भी तुम्हे पिटती रहूँ”, सुमति ने शांत होते हुए मुस्कुरा कर चैतन्य को जवाब दिया. वो अब थोड़ी पिघल रही थी आखिर ये चैतन्य की गलती नही थी. “सुनो, तुम कुछ देर मेरा बाहर इंतज़ार करो. मुझे तुम्हारे माता-पिता के आने के पहले तैयार होना है.”, सुमति ने कहा. चैतन्य चुपचाप बाहर चला गया. वो तो खुश था कि उसकी शादी उसकी बेस्ट फ्रेंड से हो रही है.

सुमति भी जल्द तैयार हो गयी. उसके पास अब सुन्दर दिखने का एक कारण था. उसे नहीं पता था कि वो चैतन्य से शादी करेगी या नहीं. पर वो आज अपने बेस्ट फ्रेंड के लिए उसके माता-पिता के सामने खुबसूरत दिखना चाहती थी. आखिर में उसने तैयार होकर खुद को आईने में देखा… “कैसी लग रही हूँ मैं?”, खुद से ही ये सवाल पूछा. वो सचमुच बहुत खुबसूरत लग रही थी.

क्रमश: …

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इंडियन लेडीज़ क्लब: भाग ६

एक रात में सुमति और इंडियन लेडीज़ क्लब की औरतों का जीवन पूरी तरह बदल गया था. आखिर क्या हुआ था उनके साथ? सब क्यों इतनी विचलित थी?


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सुमति को तो यकीन नहीं हो रहा था जो उसके साथ हुआ था. होता भी कैसे? खुद अपने हाथो से अपने स्तनों को छुते हुए वो समझ नहीं पा रही थी कि रातो रात वो औरत कैसे बन गयी? कितने नर्म और मुलायम थे उसके स्तन. “क्या मैं सचमुच औरत बन गयी हूँ?”, यह सवाल उसके मन में चलता रहा. अपने स्तनों को छूकर जो महसूस हो रहा था उसे यकीन नहीं हुआ उसे कितना अच्छा लग रहा था… पर फिर भी मन तो दुविधा में था. फिर उसने अपने लम्बे बालो को सामने एक ओर कंधे पर लाकर उन्हें महसूस किया. “यह सब इतना असली कैसे लग रहा है मुझे? मैं कैसा सपना देख रही हूँ यह. ये सचमुच के बाल है विग नहीं. इस सपने से मैं बाहर नहीं निकलना चाहती हूँ पर कोई तो मुझे बताये की ये सपना है.” पर वहां कोई भी नहीं था जो उसे ये कहता. उसके मन में खलबली मच चुकी थी.

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सुमति ने अपने बिस्तर में रखे सिल्क गाउन को पहन लिया. वो अपने तन को देखना नहीं चाहती थी.

सुमति के बगल में बिस्तर में ही एक सिल्क गाउन रखा हुआ था. वो वहां कैसे आया? संभव ही नहीं था. अब तो उसे यकीन हो जाना चाहिए था कि ये सपना है. उसने झट से उस गाउन को अपने तन पर लपेटा. वो अपने तन को और नहीं देखना चाहती थी. उसका मन असमंजस में था और डरा हुआ भी था. उसे पता था कि वो एक क्रॉसड्रेसर है जिसे औरतों की तरह फैंसी शिफोन साड़ियाँ और चूड़ीदार पहनना पसंद था. फिर भी औरत बन कर तो उसका जीवन पूरी तरह उलट पुलट जाएगा, सब कुछ बदल जाएगा. इसलिए उसका घबराना उचित था.

डिंग डोंग! दरवाज़े पर घंटी बजी. “कौन हो सकता है इतनी सुबह सुबह?” इस हालत में सुमति किसी से भी मिलना नहीं चाहती थी. उसने सोची की जल्दी से वो अपने लडको वाले नाईट ड्रेस पहन लेगी. वो अपनी अलमारी तक चल कर गयी जहाँ उसके सारे नाईट ड्रेस और पैजामे रखे हुए थे. जब उसने अपनी अलमारी खोली, तो उसकी आँखें खुली की खुली रह गयी. वहां से उसके लडको वाले सारे कपडे गायब थे. ये सपना ख़त्म ही नहीं हो रहा था. अब उसकी अलमारी में सिर्फ औरतों के कपडे थे.. नाइटी, गाउन, सैटिन के पैजामे, सेक्सी लाऊंजरी, और न जाने क्या क्या. डिंग डोंग ! दरवाज़े की घंटी फिर से बजी. और अचानक ही सुमति को सर में एक चुभता हुआ सा दर्द महसूस हुआ. क्या यह सपना था? या किसी ने उसे कोई ऐसा ड्रग दिया है कि वो जागते हुए भी सपना देख रही है?


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अन्वेषा जब उठी तो उसे तेज़ हैंगओवर था. वो केवल टॉप पहनी हुई थी और निचे केवल पेंटी. उसकी स्कर्ट गायब थी.

जब अन्वेषा सोकर उठी तो उसे रात की शराब के बाद का हैंगओवर था. उसे तुरंत एहसास हो गया कि उसके तन में कुछ बदलाव हुआ है. उसके हाथ किसी और शरीर पर थे. पीछे से देखने पर उस शरीर पर हाल्टर ब्लाउज और पेटीकोट दिख रहा था. “हाँ… ये तो साशा है. और कौन होगी भला. पर उसकी साड़ी कहाँ है?”, अन्वेषा सोच में पड़ गयी. और उसने खुद को निचे की ओर देखा. “हे भगवान, मेरी स्कर्ट कहाँ गयी?” अन्वेषा नग्न अवस्था में निचे केवल पेंटी पहने हुई थी. वही पेंटी जो कल इंडियन लेडीज़ क्लब में उसे तोहफे में मिली थी. कम से कम वो टॉप तो पहनी हुई थी.

उसे कुछ सेकंड ही लगे होंगे ये एहसास होने के लिए कि उसका हाथ साशा के ब्लाउज के अन्दर उसके सीने पे है. वो दोनों स्पून पोजीशन में सोयी थी रात को. पर उसके हाथ में कुछ नर्म सा महसूस हुआ. वो नरमी स्तन की तरह थी. “बूब्स? साशा के बूब्स है? ये कैसे हो सकता है?”, अन्वेषा भी दुविधा में थी. और फिर उसके सर में भी चुभता हुआ दर्द हुआ जैसे सुमति को हो रहा था. ये ज़रूर ज्यादा शराब का असर है. अन्वेषा ने खुद को समझाने की कोशिश की.


जब तक सुमति का सर दर्द कम हुआ, उसे याद आया कि यह तो दूधवाले के आने का समय है. ज़रूर वही होगा. रोज़ सुबह ६:३० बजे वो दूध का पैकेट देने आता है. कुछ और पहनने को नहीं मिला तो उसने सैटिन के पैजामे और कुरता पहनने की सोची. देखने से ही पता चल रहा था कि वो लड़कियों का है. पर उसके पास फिलहाल वोही चीज़ थी जो लडको के कपडे के सबसे करीब थी क्योंकि उसमे पैजामा था. बाहर दूधवाला इंतज़ार में उतावला हो रहा था.

सुमति ने सोचा कि वो दरवाज़ा इतना ही खोलेगी कि वो दूध का पैकेट ले सके. इससे दूधवाला उसे देख नहीं सकेगा. वो दरवाजे तक गयी. उसके दिल की धड़कने बढ़ चुक्की थी. किसी तरह हिम्मत करके उसने थोडा सा दरवाज़ा खोला और अपने हाथ बाहर निकाली. इस उम्मीद में कि दूधवाला उसे हाथ में पैकेट थमा देगा. पर सुमति के हाथो पर सैटिन कुर्ते की लम्बी बाँहें बेहद ही फेमिनिन थी और उसके किनारे पर बहुत सुन्दर सी लेस की डिजाईन थी. सुमति ने अपने हाथो को आज सुबह से पहली बार देखा था. वो बेहद ही नाज़ुक और फेमिनिन प्रतीत हो रहे थे. “अच्छा हुआ मैडम जो आप जाग गयी. मैं पैकेट ऐसे ही दरवाज़े पर छोड़ कर नहीं जाना चाहता था. पता नहीं कब कौन चोरी कर ले जाता. खैर मैडम, आपकी शादी की तयारी कैसे चल रही है? कब जा रही है आप अपने गाँव शादी के लिए?”, दूधवाला सुमति से यों बातें कर रहा था जैसे वो हमेशा से ही सुमति को मैडम के रूप में जानता हो.

सुमति को कुछ तो जवाब देना था. “हाँ, शादी की तैयारी अच्छी चल रही है.”, सुमति का गला रुंधा हुआ था. उसके गले से आवाज़ साफ़ नहीं आ रही थी.. न तो वो आवाज़ औरत की तरह थी और न ही मर्दों की तरह. “अच्छा मैडम, आपको देख कर लग रहा है कि आपका गला ख़राब हो गया. ठण्ड में ज़रा तबियत का ख्याल रखियेगा. आप अपनी शादी के दिन बीमार न पड़ जाए जब पूरी दुनिया आपको सुन्दर दुल्हन के रूप में देखने आएगी.”, दूधवाले ने कहा.

सुमति को लगा कि ये दूधवाला कुछ ज्यादा ही मेरी ज़िन्दगी में इंटरेस्ट ले रहा है. “पर ये मुझे मैडम क्यों कह रहा है? वो ये क्यों कह रहा है कि दुनिया मुझे दुल्हन के रूप में देखने आएगी? मैं एक आदमी हूँ और मेरी शादी लड़की से हो रही है.”, सुमति मन ही मन पागल हो रही थी. उसने झट से दरवाज़ा बंद किया और एक बार फिर उसके सर में तेज़ चुभता हुआ दर्द हुआ जो कुछ सेकंड के लिए रहा. उसका दिमाग उसके साथ खेल खेल रहा था.


अन्वेषा के सर का दर्द करीब ५ मिनट रहा और आखिर में कम हो गया. उसे आखिर अब समझ आ रहा था कि उसके आस पास क्या हो रहा है. उसने धीरे से साशा के स्तनों को मसल कर देखा जो उसे हाथ में थे. वो अपनी थ्योरी चेक करना चाहती थी जो ये समझा सकेगी कि उसके आस पास ये हो क्या रहा है. साशा के स्तन सचमुच में असली थे. साशा ने बड़ी ही कामुक सी आवाज़ निकाली जब अन्वेषा ने उसके स्तनों को दबाया. “सोने दो न मुझे..”, साशा ने बंद आँखों से कहा. “नहीं… यह नहीं हो सकता. पर यह सब सच है.”, अन्वेषा का अंदाजा सही निकला. उसने अपना फ़ोन दुसरे खाली हाथ से निकाला और उस पर कुछ देखने लगी.


इधर सुमति का दिमाग उसे विचित्र तसवीरें दिखा रहा था. उसे ऐसा याद आ रहा था कि वो रोज़ सुबह दूधवाले से एक औरत के रूप में ही दूध लेती रही है. पर ये सच नहीं था क्योंकि उसे याद है कि वो हमेशा आदमी के रूप में ही दूधवाले के सामने जाती थी. पर उसका दिमाग उसे ये बता रहा था कि उसने दूधवाले से सुमति के रूप में अपनी शादी की बात की थी. वो तसवीरें ज़रा धुंधली थी पर उसके दिमाग को बेचैन कर रही थी. “क्या दूधवाले को पता है कि मैं क्रॉसड्रेसर हूँ? क्या उसने सचमुच मुझे सुमति के रूप में देखा है?” सुमति के दिमाग में ऐसे अनगिनत सवाल उठ खड़े हुए. क्या सुमति पागल हो रही थी? ट्रिंग ट्रिंग… उसका मोबाइल फ़ोन तभी उसके बेडरूम में बज उठा. “अब क्या? कौन इतनी सुबह कॉल कर रहा होगा? भगवान.. मुझे पागल न बनाओ!”, सुमति सोच में पड़ गयी.


अन्वेषा ने साशा के ब्लाउज से हाथ निकालने की कोशिश की. वो बहुत धीरे धीरे हाथ हटाने लगी. और न चाहते हुए भी उसके हाथ साशा के स्तनों को छूने लगे. और उसके स्पर्श से साशा की नींद खुल गयी. वो थोड़ी सी झुंझला गयी थी क्योंकि उसे उसकी नींद से जगा दिया गया. शायद खूब सारी शराब का भी असर था कि वो और भी सोना चाहती थी. वो तुरंत पलट कर अन्वेषा पर चीख कर गुस्सा निकालने को तैयार थी. पर उस १ सेकंड में पलटते वक़्त उसे कुछ एहसास हुआ जो उसे एक सदमे की तरह लगा. पलटते हुए उसे सीने पर अपने स्तनों का भार महसूस हुआ. उसने निचे देखा तो उसके ब्लाउज के अन्दर उसके बड़े स्तन थे. उसका मुंह खुला का खुला रह गया. वो शॉक में चीखने ही वाली थी, पर अन्वेषा ने तुरंत ही उसके मुंह पर हाथ जोर से रख कर उसे रोक लिया. अन्वेषा जानती थी कि वहां क्या हो रहा है.

अन्वेषा ने अपने होंठो पर एक ऊँगली रख कर साशा को शांत होने का इशारा किया. “प्लीज़ शांत रहो और जल्दी से तैयार हो जाओ. हमें यहाँ से तुरंत निकलना होगा. मैंने एक ओला कैब मंगवा ली है.”, अन्वेषा ने धीरे से साशा से कहा. साशा न जाने कहीं खो गयी थी. “पर… पर मेरी साड़ी कहाँ है? और मेरे … मेरे.. सीने पे ये..”

“शश्श्… मैं सब समझा दूँगी. बस तुम धीमी आवाज़ में बात करो.” पर साशा का चेहरा शॉक से सफ़ेद सा हो गया था. ऐसा लगने लगा जैसे वो बस रोने ही वाली है. पर अन्वेषा ने उसे रोने न दिया. उसने तुरंत साशा की साड़ी ढूंढी और उसे धीरे से कहा, “अब जल्दी से इसे पहन लो.”. “मगर… मैंने तुम्हे बताया था मुझे साड़ी पहननी नहीं आती.”, साशा ने लगभग रोते हुआ कहा. उसकी आवाज़ काँप रही थी. “हमारे पास और कोई रास्ता नहीं है साशा. तुम्हे किसी तरह साड़ी पहननी होगी.”, अन्वेषा ने कहा.

साशा को अब किसी तरह खुद से साड़ी पहननी पड़ी. उसकी मदद के लिए वहां कोई नहीं था.

साशा ने इधर उधर देखा. सोहा, साशा की सहेली, उस रूम के दुसरे कोने में एक सोफे पर सोयी पड़ी थी. वो स्कर्ट तो पहनी हुई थी पर वो टॉपलेस थी. उसके स्तन खुले दिख रहे थे और उनमे बड़े डार्क निप्पल भी साफ़ दिख रहे थे. “चलो सोहा को जगाये.”, साशा ने अन्वेषा से कहा. साशा की आँखों में अब आंसू भर चुके थे. “नहीं!!! रुको!”, अन्वेषा ने साशा को रोका. “ये तुम्हारे लिए ही अच्छा होगा साशा. हम दोनों को तुरंत यहाँ से निकलना होगा बिना किसी को जगाये. अब समय व्यर्थ मत करो. जल्दी से अपनी साड़ी पहन लो इसके पहले की कोई जाग जाए.” अन्वेषा की बात सुनकर साशा चुपचाप कांपते हुए साड़ी पहनने लगी. उसे सचमुच साड़ी पहनना नहीं आता था… और फिर सैटिन की साड़ी भी तो फिसलती जा रही थी कि उसकी प्लेट बनाना और मुश्किल था. किसी तरह अपनी चूड़ियों में लगी हुई सेफ्टी पिन का उपयोग कर उसने साड़ी को किसी तरह पहनी. अन्वेषा उसकी मदद कर रही थी पर उसे भी साड़ी पहनने का कोई अनुभव नहीं था.


सुमति ने अपने पैजामे को उतारा. अब वो वापस अपनी नाइटी में थी. जीवन में पहली बार आज उसे औरतों वाले कपड़ो पे गुस्सा आ रहा था. बहुत नर्वस थी वो. उसका फ़ोन अब भी बज रहा था पर वो जवाब नहीं देना चाहती थी. फ़ोन की घंटी कुछ देर बाद रुक गयी. सुमति अब भी समझने की कोशिश कर रही थी कि ये सब क्या हो रहा है. बिना ये समझे वो किसी से मिलना या बात करना नहीं चाहती थी.

वो न जाने कबसे बाथरूम जाना चाहता थी. पर वो उसे रोके हुई थी क्योंकि वो घबरायी हुई थी कि कहीं उसका अपना निचला शरीर भी तो बदल न गया हो. पर अब जब उससे रहा न गया तो वो बाथरूम चली ही गयी. पहुचते ही उसने अपनी नाइटी उठायी ताकि वो अपनी पेंटी उतार सके. उसने अपनी पेंटी की ओर देखा तो उसकी सतह बिलकुल सपाट लग रही थी जैसे वहां कुछ न हो. उसका पुरुष अंग भी जा चूका था. उसने आँखें बंद की, और पेंटी उतार कर टॉयलेट सीट पर बैठ गयी… और वो करने लगी जो उसे करना था. वो रोने लगी. वो अब पूरी तरह औरत बन चुकी थी.


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साशा कल सचमुच बहुत सुन्दर लग रही थी. पर इस सुबह ने उसे झकझोर के रख दिया था.

अन्वेषा और साशा अब ओला कैब में बैठ चुकी थी. वो दोनों अन्वेषा के घर की ओर बढ़ रहे थे. साशा को अभी अभी सर में वही चुभता दर्द हुआ था जो अन्वेषा और सुमति सुबह से महसूस कर रही थी. साशा बेहद कंफ्यूज लग रही थी. उसके आँखों में आंसू थे. उसने अन्वेषा की ओर देखी और बोली, “मेरे दिमाग में कल रात की पार्टी की अजीब अजीब सी यादें आ रही है. पर मैं कुछ समझ नहीं पा रही हूँ. कल रात को क्या हुआ था?” अन्वेषा ने साशा की ओर देखा और उसके आँखों से आंसू पोंछते हुए बोली, “एक बार हम मेरे घर पहुच जाए मैं तुम्हे सब समझा दूँगी.” साशा ने अपना सर अन्वेषा के कंधो पर रख दिया और उसकी बांहों में धीरे धीरे सिसकने लगी.


सुमति का फ़ोन एक बार फिर से बजने लगा. उसने फ़ोन चेक किया तो दिखा कि उसकी माँ का कॉल था. उसने अपने आंसू पोंछे और हिम्मत करके जवाब देने के लिए तैयार हुई. “हेल्लो माँ”, सुमति ने कहा.

“हेल्लो, बेटा. कब से तेरी आवाज़ सुनने को तरस गयी थी मैं. तेरी आवाज़ सुनकर इस माँ के दिल को ठंडक मिल गयी अब.”, सुमति की माँ ने कहा. सुमति भी ये सुनकर थोड़ी भावुक और खुश हो गयी. क्योंकि सुमति की माँ ने उसे बेटा कहकर पुकारी. बेटा जो न जाने कैसे अब औरत के तन में था. “हाँ माँ. मुझे भी तुम्हारी आवाज़ सुनकर बहुत अच्छा लग रहा है.”, सुमति बोली. उसका गला अब भी रुंधा हुआ था. शायद उसका गला बैठ गया था.

“बेटा, तुम्हारा गला ख़राब है? शादी के कुछ दिन पहले गला खराब होना अच्छा लक्षण नहीं है. पता है न तुझे?”, सुमति की माँ ने कहा.

“हां माँ. चिंता न करो मुझे अपना ध्यान रखना आता है.”, सुमति बोली.

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सुमति ने आखिर हिम्मत करके अपनी माँ के फोन का जवाब दिया. वो आज किसी से भी बात नहीं करना चाहती थी.

“चल हट पगली. इतना काम करती है और फिर अपना ध्यान कहाँ रख सकेगी तू. तू जल्दी से अपने ऑफिस से छुट्टी ले ले और शादी के कम से कम १५ दिन पहले घर आजा बेटा. मेरी आखिर १ ही तो बेटी है. उसकी शादी की तैयारी तो उसी के साथ मिलकर करूंगी न?” सुमति की माँ ने ऐसे कहा जैसे वो अपनी बेटी से बात कर रही हो.

“बेटी?” सुमति अब और दुविधा में थी. उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था. क्या पूरी दुनिया के लिए अब वो औरत बन गयी है?

“ये क्या कह …”, सुमति ने जवाब देना चाहा पर उसके गले ने साथ न दिया. वो और खराश महसूस कर रही थी. “ये क्या कह रही हो माँ?”, सुमति की आवाज़ खूब कोशिश के बाद आखिर वापस आ ही गयी. पर अब आवाज़ न तो रुंधी हुई थी, न गले में कोई खराश थी… बल्कि यह आवाज़ बेहद सुरीली एक लड़की की आवाज़ थी. सुमति तो अब उसकी माँ की नजरो में भी बेटी थी!