इंडियन लेडीज़ क्लब: भाग ६

एक रात में सुमति और इंडियन लेडीज़ क्लब की औरतों का जीवन पूरी तरह बदल गया था. आखिर क्या हुआ था उनके साथ? सब क्यों इतनी विचलित थी?


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सुमति को तो यकीन नहीं हो रहा था जो उसके साथ हुआ था. होता भी कैसे? खुद अपने हाथो से अपने स्तनों को छुते हुए वो समझ नहीं पा रही थी कि रातो रात वो औरत कैसे बन गयी? कितने नर्म और मुलायम थे उसके स्तन. “क्या मैं सचमुच औरत बन गयी हूँ?”, यह सवाल उसके मन में चलता रहा. अपने स्तनों को छूकर जो महसूस हो रहा था उसे यकीन नहीं हुआ उसे कितना अच्छा लग रहा था… पर फिर भी मन तो दुविधा में था. फिर उसने अपने लम्बे बालो को सामने एक ओर कंधे पर लाकर उन्हें महसूस किया. “यह सब इतना असली कैसे लग रहा है मुझे? मैं कैसा सपना देख रही हूँ यह. ये सचमुच के बाल है विग नहीं. इस सपने से मैं बाहर नहीं निकलना चाहती हूँ पर कोई तो मुझे बताये की ये सपना है.” पर वहां कोई भी नहीं था जो उसे ये कहता. उसके मन में खलबली मच चुकी थी.

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सुमति ने अपने बिस्तर में रखे सिल्क गाउन को पहन लिया. वो अपने तन को देखना नहीं चाहती थी.

सुमति के बगल में बिस्तर में ही एक सिल्क गाउन रखा हुआ था. वो वहां कैसे आया? संभव ही नहीं था. अब तो उसे यकीन हो जाना चाहिए था कि ये सपना है. उसने झट से उस गाउन को अपने तन पर लपेटा. वो अपने तन को और नहीं देखना चाहती थी. उसका मन असमंजस में था और डरा हुआ भी था. उसे पता था कि वो एक क्रॉसड्रेसर है जिसे औरतों की तरह फैंसी शिफोन साड़ियाँ और चूड़ीदार पहनना पसंद था. फिर भी औरत बन कर तो उसका जीवन पूरी तरह उलट पुलट जाएगा, सब कुछ बदल जाएगा. इसलिए उसका घबराना उचित था.

डिंग डोंग! दरवाज़े पर घंटी बजी. “कौन हो सकता है इतनी सुबह सुबह?” इस हालत में सुमति किसी से भी मिलना नहीं चाहती थी. उसने सोची की जल्दी से वो अपने लडको वाले नाईट ड्रेस पहन लेगी. वो अपनी अलमारी तक चल कर गयी जहाँ उसके सारे नाईट ड्रेस और पैजामे रखे हुए थे. जब उसने अपनी अलमारी खोली, तो उसकी आँखें खुली की खुली रह गयी. वहां से उसके लडको वाले सारे कपडे गायब थे. ये सपना ख़त्म ही नहीं हो रहा था. अब उसकी अलमारी में सिर्फ औरतों के कपडे थे.. नाइटी, गाउन, सैटिन के पैजामे, सेक्सी लाऊंजरी, और न जाने क्या क्या. डिंग डोंग ! दरवाज़े की घंटी फिर से बजी. और अचानक ही सुमति को सर में एक चुभता हुआ सा दर्द महसूस हुआ. क्या यह सपना था? या किसी ने उसे कोई ऐसा ड्रग दिया है कि वो जागते हुए भी सपना देख रही है?


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अन्वेषा जब उठी तो उसे तेज़ हैंगओवर था. वो केवल टॉप पहनी हुई थी और निचे केवल पेंटी. उसकी स्कर्ट गायब थी.

जब अन्वेषा सोकर उठी तो उसे रात की शराब के बाद का हैंगओवर था. उसे तुरंत एहसास हो गया कि उसके तन में कुछ बदलाव हुआ है. उसके हाथ किसी और शरीर पर थे. पीछे से देखने पर उस शरीर पर हाल्टर ब्लाउज और पेटीकोट दिख रहा था. “हाँ… ये तो साशा है. और कौन होगी भला. पर उसकी साड़ी कहाँ है?”, अन्वेषा सोच में पड़ गयी. और उसने खुद को निचे की ओर देखा. “हे भगवान, मेरी स्कर्ट कहाँ गयी?” अन्वेषा नग्न अवस्था में निचे केवल पेंटी पहने हुई थी. वही पेंटी जो कल इंडियन लेडीज़ क्लब में उसे तोहफे में मिली थी. कम से कम वो टॉप तो पहनी हुई थी.

उसे कुछ सेकंड ही लगे होंगे ये एहसास होने के लिए कि उसका हाथ साशा के ब्लाउज के अन्दर उसके सीने पे है. वो दोनों स्पून पोजीशन में सोयी थी रात को. पर उसके हाथ में कुछ नर्म सा महसूस हुआ. वो नरमी स्तन की तरह थी. “बूब्स? साशा के बूब्स है? ये कैसे हो सकता है?”, अन्वेषा भी दुविधा में थी. और फिर उसके सर में भी चुभता हुआ दर्द हुआ जैसे सुमति को हो रहा था. ये ज़रूर ज्यादा शराब का असर है. अन्वेषा ने खुद को समझाने की कोशिश की.


जब तक सुमति का सर दर्द कम हुआ, उसे याद आया कि यह तो दूधवाले के आने का समय है. ज़रूर वही होगा. रोज़ सुबह ६:३० बजे वो दूध का पैकेट देने आता है. कुछ और पहनने को नहीं मिला तो उसने सैटिन के पैजामे और कुरता पहनने की सोची. देखने से ही पता चल रहा था कि वो लड़कियों का है. पर उसके पास फिलहाल वोही चीज़ थी जो लडको के कपडे के सबसे करीब थी क्योंकि उसमे पैजामा था. बाहर दूधवाला इंतज़ार में उतावला हो रहा था.

सुमति ने सोचा कि वो दरवाज़ा इतना ही खोलेगी कि वो दूध का पैकेट ले सके. इससे दूधवाला उसे देख नहीं सकेगा. वो दरवाजे तक गयी. उसके दिल की धड़कने बढ़ चुक्की थी. किसी तरह हिम्मत करके उसने थोडा सा दरवाज़ा खोला और अपने हाथ बाहर निकाली. इस उम्मीद में कि दूधवाला उसे हाथ में पैकेट थमा देगा. पर सुमति के हाथो पर सैटिन कुर्ते की लम्बी बाँहें बेहद ही फेमिनिन थी और उसके किनारे पर बहुत सुन्दर सी लेस की डिजाईन थी. सुमति ने अपने हाथो को आज सुबह से पहली बार देखा था. वो बेहद ही नाज़ुक और फेमिनिन प्रतीत हो रहे थे. “अच्छा हुआ मैडम जो आप जाग गयी. मैं पैकेट ऐसे ही दरवाज़े पर छोड़ कर नहीं जाना चाहता था. पता नहीं कब कौन चोरी कर ले जाता. खैर मैडम, आपकी शादी की तयारी कैसे चल रही है? कब जा रही है आप अपने गाँव शादी के लिए?”, दूधवाला सुमति से यों बातें कर रहा था जैसे वो हमेशा से ही सुमति को मैडम के रूप में जानता हो.

सुमति को कुछ तो जवाब देना था. “हाँ, शादी की तैयारी अच्छी चल रही है.”, सुमति का गला रुंधा हुआ था. उसके गले से आवाज़ साफ़ नहीं आ रही थी.. न तो वो आवाज़ औरत की तरह थी और न ही मर्दों की तरह. “अच्छा मैडम, आपको देख कर लग रहा है कि आपका गला ख़राब हो गया. ठण्ड में ज़रा तबियत का ख्याल रखियेगा. आप अपनी शादी के दिन बीमार न पड़ जाए जब पूरी दुनिया आपको सुन्दर दुल्हन के रूप में देखने आएगी.”, दूधवाले ने कहा.

सुमति को लगा कि ये दूधवाला कुछ ज्यादा ही मेरी ज़िन्दगी में इंटरेस्ट ले रहा है. “पर ये मुझे मैडम क्यों कह रहा है? वो ये क्यों कह रहा है कि दुनिया मुझे दुल्हन के रूप में देखने आएगी? मैं एक आदमी हूँ और मेरी शादी लड़की से हो रही है.”, सुमति मन ही मन पागल हो रही थी. उसने झट से दरवाज़ा बंद किया और एक बार फिर उसके सर में तेज़ चुभता हुआ दर्द हुआ जो कुछ सेकंड के लिए रहा. उसका दिमाग उसके साथ खेल खेल रहा था.


अन्वेषा के सर का दर्द करीब ५ मिनट रहा और आखिर में कम हो गया. उसे आखिर अब समझ आ रहा था कि उसके आस पास क्या हो रहा है. उसने धीरे से साशा के स्तनों को मसल कर देखा जो उसे हाथ में थे. वो अपनी थ्योरी चेक करना चाहती थी जो ये समझा सकेगी कि उसके आस पास ये हो क्या रहा है. साशा के स्तन सचमुच में असली थे. साशा ने बड़ी ही कामुक सी आवाज़ निकाली जब अन्वेषा ने उसके स्तनों को दबाया. “सोने दो न मुझे..”, साशा ने बंद आँखों से कहा. “नहीं… यह नहीं हो सकता. पर यह सब सच है.”, अन्वेषा का अंदाजा सही निकला. उसने अपना फ़ोन दुसरे खाली हाथ से निकाला और उस पर कुछ देखने लगी.


इधर सुमति का दिमाग उसे विचित्र तसवीरें दिखा रहा था. उसे ऐसा याद आ रहा था कि वो रोज़ सुबह दूधवाले से एक औरत के रूप में ही दूध लेती रही है. पर ये सच नहीं था क्योंकि उसे याद है कि वो हमेशा आदमी के रूप में ही दूधवाले के सामने जाती थी. पर उसका दिमाग उसे ये बता रहा था कि उसने दूधवाले से सुमति के रूप में अपनी शादी की बात की थी. वो तसवीरें ज़रा धुंधली थी पर उसके दिमाग को बेचैन कर रही थी. “क्या दूधवाले को पता है कि मैं क्रॉसड्रेसर हूँ? क्या उसने सचमुच मुझे सुमति के रूप में देखा है?” सुमति के दिमाग में ऐसे अनगिनत सवाल उठ खड़े हुए. क्या सुमति पागल हो रही थी? ट्रिंग ट्रिंग… उसका मोबाइल फ़ोन तभी उसके बेडरूम में बज उठा. “अब क्या? कौन इतनी सुबह कॉल कर रहा होगा? भगवान.. मुझे पागल न बनाओ!”, सुमति सोच में पड़ गयी.


अन्वेषा ने साशा के ब्लाउज से हाथ निकालने की कोशिश की. वो बहुत धीरे धीरे हाथ हटाने लगी. और न चाहते हुए भी उसके हाथ साशा के स्तनों को छूने लगे. और उसके स्पर्श से साशा की नींद खुल गयी. वो थोड़ी सी झुंझला गयी थी क्योंकि उसे उसकी नींद से जगा दिया गया. शायद खूब सारी शराब का भी असर था कि वो और भी सोना चाहती थी. वो तुरंत पलट कर अन्वेषा पर चीख कर गुस्सा निकालने को तैयार थी. पर उस १ सेकंड में पलटते वक़्त उसे कुछ एहसास हुआ जो उसे एक सदमे की तरह लगा. पलटते हुए उसे सीने पर अपने स्तनों का भार महसूस हुआ. उसने निचे देखा तो उसके ब्लाउज के अन्दर उसके बड़े स्तन थे. उसका मुंह खुला का खुला रह गया. वो शॉक में चीखने ही वाली थी, पर अन्वेषा ने तुरंत ही उसके मुंह पर हाथ जोर से रख कर उसे रोक लिया. अन्वेषा जानती थी कि वहां क्या हो रहा है.

अन्वेषा ने अपने होंठो पर एक ऊँगली रख कर साशा को शांत होने का इशारा किया. “प्लीज़ शांत रहो और जल्दी से तैयार हो जाओ. हमें यहाँ से तुरंत निकलना होगा. मैंने एक ओला कैब मंगवा ली है.”, अन्वेषा ने धीरे से साशा से कहा. साशा न जाने कहीं खो गयी थी. “पर… पर मेरी साड़ी कहाँ है? और मेरे … मेरे.. सीने पे ये..”

“शश्श्… मैं सब समझा दूँगी. बस तुम धीमी आवाज़ में बात करो.” पर साशा का चेहरा शॉक से सफ़ेद सा हो गया था. ऐसा लगने लगा जैसे वो बस रोने ही वाली है. पर अन्वेषा ने उसे रोने न दिया. उसने तुरंत साशा की साड़ी ढूंढी और उसे धीरे से कहा, “अब जल्दी से इसे पहन लो.”. “मगर… मैंने तुम्हे बताया था मुझे साड़ी पहननी नहीं आती.”, साशा ने लगभग रोते हुआ कहा. उसकी आवाज़ काँप रही थी. “हमारे पास और कोई रास्ता नहीं है साशा. तुम्हे किसी तरह साड़ी पहननी होगी.”, अन्वेषा ने कहा.

साशा को अब किसी तरह खुद से साड़ी पहननी पड़ी. उसकी मदद के लिए वहां कोई नहीं था.

साशा ने इधर उधर देखा. सोहा, साशा की सहेली, उस रूम के दुसरे कोने में एक सोफे पर सोयी पड़ी थी. वो स्कर्ट तो पहनी हुई थी पर वो टॉपलेस थी. उसके स्तन खुले दिख रहे थे और उनमे बड़े डार्क निप्पल भी साफ़ दिख रहे थे. “चलो सोहा को जगाये.”, साशा ने अन्वेषा से कहा. साशा की आँखों में अब आंसू भर चुके थे. “नहीं!!! रुको!”, अन्वेषा ने साशा को रोका. “ये तुम्हारे लिए ही अच्छा होगा साशा. हम दोनों को तुरंत यहाँ से निकलना होगा बिना किसी को जगाये. अब समय व्यर्थ मत करो. जल्दी से अपनी साड़ी पहन लो इसके पहले की कोई जाग जाए.” अन्वेषा की बात सुनकर साशा चुपचाप कांपते हुए साड़ी पहनने लगी. उसे सचमुच साड़ी पहनना नहीं आता था… और फिर सैटिन की साड़ी भी तो फिसलती जा रही थी कि उसकी प्लेट बनाना और मुश्किल था. किसी तरह अपनी चूड़ियों में लगी हुई सेफ्टी पिन का उपयोग कर उसने साड़ी को किसी तरह पहनी. अन्वेषा उसकी मदद कर रही थी पर उसे भी साड़ी पहनने का कोई अनुभव नहीं था.


सुमति ने अपने पैजामे को उतारा. अब वो वापस अपनी नाइटी में थी. जीवन में पहली बार आज उसे औरतों वाले कपड़ो पे गुस्सा आ रहा था. बहुत नर्वस थी वो. उसका फ़ोन अब भी बज रहा था पर वो जवाब नहीं देना चाहती थी. फ़ोन की घंटी कुछ देर बाद रुक गयी. सुमति अब भी समझने की कोशिश कर रही थी कि ये सब क्या हो रहा है. बिना ये समझे वो किसी से मिलना या बात करना नहीं चाहती थी.

वो न जाने कबसे बाथरूम जाना चाहता थी. पर वो उसे रोके हुई थी क्योंकि वो घबरायी हुई थी कि कहीं उसका अपना निचला शरीर भी तो बदल न गया हो. पर अब जब उससे रहा न गया तो वो बाथरूम चली ही गयी. पहुचते ही उसने अपनी नाइटी उठायी ताकि वो अपनी पेंटी उतार सके. उसने अपनी पेंटी की ओर देखा तो उसकी सतह बिलकुल सपाट लग रही थी जैसे वहां कुछ न हो. उसका पुरुष अंग भी जा चूका था. उसने आँखें बंद की, और पेंटी उतार कर टॉयलेट सीट पर बैठ गयी… और वो करने लगी जो उसे करना था. वो रोने लगी. वो अब पूरी तरह औरत बन चुकी थी.


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साशा कल सचमुच बहुत सुन्दर लग रही थी. पर इस सुबह ने उसे झकझोर के रख दिया था.

अन्वेषा और साशा अब ओला कैब में बैठ चुकी थी. वो दोनों अन्वेषा के घर की ओर बढ़ रहे थे. साशा को अभी अभी सर में वही चुभता दर्द हुआ था जो अन्वेषा और सुमति सुबह से महसूस कर रही थी. साशा बेहद कंफ्यूज लग रही थी. उसके आँखों में आंसू थे. उसने अन्वेषा की ओर देखी और बोली, “मेरे दिमाग में कल रात की पार्टी की अजीब अजीब सी यादें आ रही है. पर मैं कुछ समझ नहीं पा रही हूँ. कल रात को क्या हुआ था?” अन्वेषा ने साशा की ओर देखा और उसके आँखों से आंसू पोंछते हुए बोली, “एक बार हम मेरे घर पहुच जाए मैं तुम्हे सब समझा दूँगी.” साशा ने अपना सर अन्वेषा के कंधो पर रख दिया और उसकी बांहों में धीरे धीरे सिसकने लगी.


सुमति का फ़ोन एक बार फिर से बजने लगा. उसने फ़ोन चेक किया तो दिखा कि उसकी माँ का कॉल था. उसने अपने आंसू पोंछे और हिम्मत करके जवाब देने के लिए तैयार हुई. “हेल्लो माँ”, सुमति ने कहा.

“हेल्लो, बेटा. कब से तेरी आवाज़ सुनने को तरस गयी थी मैं. तेरी आवाज़ सुनकर इस माँ के दिल को ठंडक मिल गयी अब.”, सुमति की माँ ने कहा. सुमति भी ये सुनकर थोड़ी भावुक और खुश हो गयी. क्योंकि सुमति की माँ ने उसे बेटा कहकर पुकारी. बेटा जो न जाने कैसे अब औरत के तन में था. “हाँ माँ. मुझे भी तुम्हारी आवाज़ सुनकर बहुत अच्छा लग रहा है.”, सुमति बोली. उसका गला अब भी रुंधा हुआ था. शायद उसका गला बैठ गया था.

“बेटा, तुम्हारा गला ख़राब है? शादी के कुछ दिन पहले गला खराब होना अच्छा लक्षण नहीं है. पता है न तुझे?”, सुमति की माँ ने कहा.

“हां माँ. चिंता न करो मुझे अपना ध्यान रखना आता है.”, सुमति बोली.

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सुमति ने आखिर हिम्मत करके अपनी माँ के फोन का जवाब दिया. वो आज किसी से भी बात नहीं करना चाहती थी.

“चल हट पगली. इतना काम करती है और फिर अपना ध्यान कहाँ रख सकेगी तू. तू जल्दी से अपने ऑफिस से छुट्टी ले ले और शादी के कम से कम १५ दिन पहले घर आजा बेटा. मेरी आखिर १ ही तो बेटी है. उसकी शादी की तैयारी तो उसी के साथ मिलकर करूंगी न?” सुमति की माँ ने ऐसे कहा जैसे वो अपनी बेटी से बात कर रही हो.

“बेटी?” सुमति अब और दुविधा में थी. उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था. क्या पूरी दुनिया के लिए अब वो औरत बन गयी है?

“ये क्या कह …”, सुमति ने जवाब देना चाहा पर उसके गले ने साथ न दिया. वो और खराश महसूस कर रही थी. “ये क्या कह रही हो माँ?”, सुमति की आवाज़ खूब कोशिश के बाद आखिर वापस आ ही गयी. पर अब आवाज़ न तो रुंधी हुई थी, न गले में कोई खराश थी… बल्कि यह आवाज़ बेहद सुरीली एक लड़की की आवाज़ थी. सुमति तो अब उसकी माँ की नजरो में भी बेटी थी!

इंडियन लेडीज़ क्लब: भाग ३

लेडीज़ क्लब में आज खुशियाँ छाई हुई थी. यहाँ सुन्दर सुन्दर लिबास में जमा सभी औरतें खुश थी पर उन्हें पता नहीं था कि आज की रात उनमे से एक औरत उनकी ज़िन्दगी हमेशा के लिए बदल देगी.


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हर किसी को मधुरिमा आंटी से बात करना पसंद था.

इंडियन लेडीज़ क्लब की पार्टी अब शुरू हो चुकी थी. और मधुरिमा भी पार्टी का मज़ा ले रही थी. एक कोने में किसी लड़की से बात कर रही थी. वैसे भी वहां की सभी औरतों को ‘मधु आंटी’ से बात करने में बड़ा मज़ा आता था. वैसे तो मधु झूठमूठ का गुस्सा दिखाती थी जब भी उसे कोई आंटी कहता था… पर फिर भी सभी मधु को प्यार से सम्मान के साथ आंटी कहते थे. पर फिर भी क्लब में कुछ औरतें ऐसी भी थी जिन्हें मधु से जलन होती थी. क्योंकि उनकी नजरो में मधु के पास सब कुछ था. उसके पास बड़े स्तन थे और उसे नकली ब्रैस्ट-फॉर्म की ज़रुरत नहीं होती थी. मधु आंटी के कुल्हे भी किसी मदमस्त औरत की तरह बड़े थे जो उनके फिगर को और आकर्षक बनाते थे. सचमुच बहुत सुन्दर लगती थी जब भी मधु अपनी भरी-पूरी काया पर कस कर साड़ी लपेटती थी. जब वो चलती थी तो उनके स्तन उनके हर कदम पर हिलते थे और साड़ी उनके कुलहो पर फिसल कर आवाज़ करती थी. पर सच तो सिर्फ मधु और उसकी करीबी कुछ सहेलियां जानती थी. एक लम्बी बीमारी और कई दवाइयों के सेवन से वो मोटी हो गयी थी, पर एक क्रॉस-ड्रेसर के रूप में ये मोटापा एक तरह का वरदान था. और फिर ऊपर से, अजंता नाम की एक ऐसी पत्नी थी मधु की, जो उनके हर कदम पर साथ भी देती थी, और न सिर्फ मधु को बलकि मधु की सहेलियों को भी ख़ुशी से अपनाती थी. मधु की तरह अजंता भी जवान लड़कियों को बिलकुल बेटी की तरह से प्यार से रखती थी. अजंता को कोई प्रॉब्लम नहीं थी इस बात से की मधु औरत के रूप में घर से बाहर जाए. और मधु की चाल और मदमस्त तन को देखकर किसी को शक भी नहीं होता था कि मधु औरत नहीं है. इंडियन लेडीज़ क्लब में किसी ने कभी मधु को आदमी के रूप में भी नहीं देखा था, वो तो हमेशा घर से ही मधु बनकर अपनी कार चलाकर आती थी. पर इन सब में एक औरत अपवाद थी.

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कुछ साल पहले, सुमति मधु के घर कुछ दिन रहने आई थी. वहां मधु ने सुमति को अपनी बेटी की तरह रहने दिया था.

कुछ साल पहले, सुमति को एक टेम्पररी जगह चाहिए थी रहने के लिए. यह तब की बात है जब सुमति इस घर में आई नहीं थी जो आज इंडियन लेडीज़ क्लब के नाम से जाना जाता है. उस वक़्त तक मधु और सुमति का रिश्ता माँ-बेटी के रिश्ते की तरह बन चूका था. और उस दिन जब सुमति मधु के घर रहने आई थी, तब मधु ने बिलकुल एक माँ बनकर अपनी बेटी का स्वागत किया था. और अगले दो दिन, सुमति उस घर में बेटी बनकर ख़ुशी से रही. मधु और उनकी पत्नी अजंता ने सुमति को खूब प्यार दिया था. सुमति भी अपने ‘मधुसुदन अंकल’ और ‘अजंता आंटी’ के साथ बहुत खुश रही थी. उस छोटे से समय में उसने अजंता आंटी के साथ किचन में बहुत कुछ बनाना सिख लिया था. अजंता सुमति से कहती थी कि यदि संभव होता तो वो सुमति को अपनी बहु ज़रूर बनाती! पर अजंता और मधुसुदन का कोई बेटा नहीं था. उनकी एक बेटी थी जिसकी शादी हो चुकी थी.

मधु की बेटी योगिता ने बचपन से ही अपने पिता को घर में कई बार साड़ी पहने देखा था. मधु और अजंता ने अपनी बेटी  योगिता से कभी कुछ छिपाया नहीं था. और योगिता भी मानती थी कि उसकी एक नहीं दो-दो माएँ है! आज भी जब वो अपने मायके आती है तो एक दिन ज़रूर अपनी मधु माँ के साथ बिताती है. उस एक दिन जहाँ एक माँ अजंता बेटी के लिए उसकी पसंद का खाना बनाने में व्यस्त रहती है, वही दूसरी माँ मधु योगिता को शौपिंग कराने बाहर ले जाती है. ये सब जानकर तो किसी को भी लगता था कि सब कुछ तो था मधु के पास. बस एक कमी थी.. एक अच्छी सेहत की. लम्बे समय से अपनी बीमारी से जूझती मधु अक्सर घर में बीमार पड़ी रहती थी.. और लोगो से तभी मिलती थी जब वो अच्छी हो. इसलिए किसी को पता नहीं था कि हंसती खेलती मधु जो सबको इतना खुश रखती है.. खुद कितनी परेशानियों के साथ जी रही होती है.

वो सुन्दर चूड़ियों की खनकती आवाज़…. इसलिए तो पहनती है हम इन्हें. परजब वो हमारी या हमारी सहेलियों की साड़ी में अटक जाती है तो हमें तकलीफ भी देती है. पर ऐसी तकलीफ तो हम औरतें रोज़ सहना चाहेंगी.

खैर इस वक़्त इस लेडीज़ क्लब की सभी लेडीज़ सज धज कर तैयार थी, उनके चेहरे पर मुस्कान थी, सभी अपने गहनों से लदी चमचमा रही थी और कुछ अपनी ऊँची हील पहन कर लड़खड़ा भी रही थी. भले ही सबको औरत बनना अच्छा लगता था यहाँ, पर हर किसी को अभी तक एक शालीन औरत की तरह चलना नहीं आता था. कुछ तो इसके बावजूद ४ इंच की हील पहन लेती थी भले उनसे १ इंच की सैंडल पहन कर भी चला न जाए. कुछ थी जिनसे अपना दुपट्टा या साड़ी का पल्लू संभाले नहीं संभालता था. बार बार पल्लू या दुपट्टा फिसलता और वो बार बार उसे ऊपर उठाकर ठीक करती… फिर भी पिन नहीं लगाती! और कुछ तो हज़ार पिन लगाने के बावजूद भी न संभाल पाती. ये छोटी छोटी बातें और मुश्किलें उनके औरत होने की अनुभूति को और बढ़ा देती थी. कुछ औरतों को लम्बे खुले बाल इतने पसंद थे कि भले वो आँखों के सामने आये और उन्हें कुछ अच्छे से दिखाई न दे… फिर भी बाल खुले ही रखेंगी! खनखनाती चूड़ियां और चमचमाते लहराते लम्बे कानो के झुमके कभी बालों में अटक जाते तो कभी साड़ी के पल्लू की एम्ब्राईडरी में! जितना सजो जितना पहनो उतनी मुसीबतें! यही तो इस क्लब में ख़ास था, आपके साथ आप ही की तरह और भी कई औरतें होती थी जो इन सब मुसीबतों को झेलते हुए भी आपको एक औरत बनने के सपने को पूरा करने में मदद करने को तैयार थी. इन छोटी छोटी मुश्किलों से कुछ सिख कर आगे बढ़ते हुए औरत बनने के इस रास्ते में सभी को मज़ा आता था. हर क्रॉस-ड्रेसर इस बात को समझती है.

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मधु अब आज का प्रोग्राम शुरू करने को तैयार थी.

मधुरिमा जी भी अब बस आज के मुख्य कार्यक्रम को शुरू करने के लिए तैयार थी. उन्होंने अपनी साड़ी के पल्लू को अपने ही नटखट अंदाज़ में अपनी बड़ी सी कुलहो पर लपेटा और सामने ठूंस कर सबके सामने आ गयी. उन्हें पल्लू को कमर में लपेटना अच्छा लगता था. वो उस कमरे में ऊपर जाती सीढ़ियों पर चढ़ने लगी. उनके हर एक कदम पर उनकी नितम्ब एक परफेक्ट औरत की तरह लहराती. शायद वो जान बुझ कर ऐसा करती है पर चुस्त ब्लाउज और कस के लपेटी हुई साड़ी में उनकी चाल सबका ध्यान उनकी ओर आकर्षित करने में कामयाब रहती थी. फिर ऊपर जाकर वो पलटी और ताली बजाकर एक बार फिर सबका ध्यान अपनी ओर खिंचा और बोली, “लेडीज़! अब आज के ख़ास पल का समय आ गया है जिसके लिए हम सब आज यहाँ है.” सभी का ध्यान अब मधु आंटी की ओर था.

“हां हाँ… डिन्नर के लिए ही न! पर डिनर के अलावा भी तो कुछ है आज और तुम सब तो जानती ही हो. अब जब तुम सब तैयार हो चुकी हो, अब तुम सब बस खाना खाना चाहती हो…”, सभी उनकी बात सुनकर हँसने लगी. “.. लेकिन आज हम सब यहाँ है हमारी नयी मेम्बर के स्वागत के लिए. मैं आप सभी का परिचय कराना चाहती हूँ अन्वेषा से!”, मधु ने आगे कहा. तालियों की गडगडाहट के साथ ही साथ खनकती चूड़ियों की मधुर आवाज़ अब हवा में भर गयी थी. और हर किसी की नज़र उस हैण्डसम जवान युवक की ओर थी जो शर्माता हुआ एक कोने में खड़ा था. जब इतनी औरतें एक साथ किसी की ओर देखे तो ज़ाहिर है उसे थोड़ी शर्म आएगी. बिना कुछ कहे उसने बस अपने हाथ हिलाकर सभी का अभिवादन किया. उस कमरे में अकेला वो आदमी … उसे ज़रा भी अंदाजा नहीं था कि इतनी सारी औरतें मिलकर उसके साथ क्या क्या कर सकती है! मधुरिमा आखिर उस युवक को अपने साथ खिंच लायी.

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मधु उस युवक को अपने तरह से छेड़ने लगी.

“ओहो देखो तो कितनी शर्मीली है अन्वेषा!”, मधुरिमा ने उस युवक को अपने हाथों से खींचते हुए कहा. “तो हैण्डसम.. हाय तुझे अपने हाथो से छुए बगैर कैसे रहूंगी मैं?”, मधुरिमा ने अब उस युवक को छेड़ते हुए करीब खींचते हुए अपने सीने से लगा लिया. बेचारा शर्माता रह गया वो.

“लेडीज़, आज हम सभी का कर्त्तव्य है कि अन्वेषा आज की रात कभी न भूल सके! इसे भी हम औरतों के हाथ का जादू हमेशा याद रहना चाहिए.”, मधुरिमा बोलती रही और वो युवक शर्माता रहा. जिस तरह से मधु उस युवक को कमर से पकड़ कर गले लगा रही थी, उस युवक को उस वक़्त एहसास नहीं था कि मधु के अन्दर कितना वात्सल्य प्रेम भरा हुआ था.

पर अब मधु ज़रा सीरियस हो गयी और बोली, “अन्वेषा, यह मेरा वादा है कि आज की रात तुम्हारी सबसे सुनहरी यादों वाली रात होगी. क्योंकि आज इस शहर की बेस्ट औरतें अपनी कला से तुम्हे जवान लड़के से खुबसूरत राजकुमारी में तब्दील कर देंगे.. ऐसी राजकुमारी जिसको तुमने सपने में भी नहीं सोचा होगा. हम सब तुम्हारा इस क्लब में स्वागत करती है.”

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अन्वेषा को क्लब की औरतों ने ये खुबसूरत सिल्क की ब्रा और पेंटी का सेट गिफ्ट में दिया था. 

मधु ने फिर सुमति की ओर इशारा किया और सुमति तुरंत एक बैग लेकर मधु के पास आई. मधु ने वो बैग पकड़ा और अन्वेषा की ओर पलट कर बोली, “अन्वेषा ये इस क्लब की सभी औरतों की ओर से एक छोटा सा तोहफा है तुम्हारे लिए जिसे हम सबने मिलकर प्यार से लिया है तुम्हारे लिए.”

अन्वेषा ने उस बैग को हाथ में लिया और आखिर उसने कुछ शब्द कह ही दिए. “सभी को मेरा धन्यवाद. आज मैं थोड़ी नर्वस हूँ और इमोशनल भी. मुझे यकीन नहीं हो रहा है कि आज रात मैं एक लड़की बन जाऊंगी और वो भी आप जैसे खुबसूरत औरतों की मदद से..”, अन्वेषा की आवाज़ रुन्धने लगी भावुकता में.

“डार्लिंग, इतनी भावुक भी न हो! कम से कम अपना गिफ्ट तो देख लो खोल कर!”, मधु ने अन्वेषा के चेहरे को प्यार से छूते हुए कहा. अन्वेषा ने जब बैग खोला तो उसकी आँखें चमक उठी. उस बैग में बहुत ही सुन्दर सैटिन सिल्क की ब्रा और पेंटी का सेट था. इतनी सुन्दर तो उसने कभी नहीं देखी थी. यह सोचकर ही कि वो इतनी नाज़ुक सुन्दर ब्रा पेंटी पहनेगी.. उसका दिल भर आया. और तो और उस सेट के साथ एक विक्टोरिया सीक्रेट का एक सैटिन का रोब भी था उस बैग में!

“लेडीज़!! इसके पहले की अन्वेषा और भावुक हो.. चलो इसे “प्रिंसेस रूम” में ले चलते है. ईशा तुम तैयार हो?”, मधुरिमा ने ईशा से पूछा जो एक लॉक कमरे को पहरा दे रही थी. वो कमरा था “प्रिंसेस रूम”. ईशा ने सर हिला कर हाँ का इशारा किया.

“प्रिंसेस रूम? यह क्या है?”, अन्वेषा ने पूछा. मधुरिमा ने फिर मुस्कुरा कर कहा, “बस एक मिनट में तुम्हे पता चल जायेगा डार्लिंग!” और मधु ने अपने हाथो से अन्वेषा के गाल खिंच लिए.

मधु अन्वेषा का हाथ पकड़ उसे अपने साथ ले चली. और सभी औरतें उन दोनों के पीछे पीछे. ईशा ने जब दरवाज़ा खोला तो वो कमरा किसी भी क्रॉस-ड्रेसर के लिए मानो स्वर्ग सा था. अन्वेषा का तो मुंह खुला का खुला रह गया. उस रूम को बेहद ही प्यार से सजाया गया था… जहाँ ढेरो खुबसूरत साड़ियाँ, फैंसी एम्ब्राईडरी किये ब्लाउज, लम्बी सुन्दर अनारकली, चमचमाते पंजाबी सूट, सेक्सी वेस्टर्न सैटिन गाउन, एक से बढ़कर एक लहंगा चोली, चमकते हुए गहने और अनगिनत चप्पल और सैंडल सजे हुए थे.

प्रिंसेस रूम को सुन्दर साड़ियों, दमकते ब्लाउज, सेक्सी इवनिंग गाउन, चमचमाते गहनों और अनगिनत सैंडल के साथ सजाया गया था. और इन सब में एक ऑउटफिट चुन कर पहनना अन्वेषा क्या किसी भी लड़कीके लिए आसान नहीं होगा.

प्रिंसेस रूम की तैयार सुमति और अंजलि ने मिलकर की थी. सुमति जो पूरी रात दौड़ रही थी, वो इसलिए क्योंकि वो दूसरी मेम्बर्स से वो कपडे इकठ्ठा कर रही थी जो अन्वेषा के साइज़ के हो. सभी ने अपने बेस्ट कपडे इस पल के लिए लाये थे जिसमे से एक अन्वेषा आज पहन सकेगी. सुमति ने ये सब चुप-चाप किया था वहीँ अंजलि ने अपनी सजावट की कला का उपयोग करते हुए सभी कपड़ो को बहुत सुन्दर तरह से उस कमरे में सजाया था. प्रिंसेस रूम न सिर्फ अन्वेषा के लिए बल्कि सभी के लिए सरप्राइज था. जब भी कोई नया मेम्बर क्लब में आता, सभी सदस्य उस रूम को देखने के लिए उतावले रहते. पुरुष रूप में न सही पर एक बार औरत बनने के बाद इस क्लब की सभी औरतें बेझिझक यहाँ कपड़ो के डिजाईन की तारीफ़ कर सकती थी. फैब्रिक छू छूकर देखती कि कैसे है वो कपडे या उनका रंग कैसा है.

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अंजलि ने अन्वेषा से कहा, “मैंने कहा था तुम्हे घबराने की कोई बात नहीं है.”

अंजलि फिर आगे आई और अन्वेषा से बोली, “मैंने कहा था हैण्डसम… आज तुम्हारी रात है. अब घबराने की कोई बात नहीं है.” अन्वेषा शर्मा गयी और अपना सर झुका ली. “अब तुम्हे इन सभी कपड़ो में से एक ऑउटफिट पसंद करनी है जो तुम्हे अच्छी लगे. खुद को इमेजिन करो कि तुम सबसे खुबसूरत किस्मे लगोगी?”

“इनमें से सिर्फ एक का चुनाव तो बहुत कठिन होगा… सब एक एक से सुन्दर है”, अन्वेषा सोचने लगी. आखिर वो लम्बे लाल सेक्सी सैटिन गाउन को कैसे रिजेक्ट करेगी… उसे पहन कर तो उसे रेड कारपेट पे चल रही सेलेब्रिटी की तरह लगेगा… या फिर फिर इस चमकीली गुलाबी साड़ी से कैसे मुंह फेर लूं जिसको पहन कर मैं नयी नवेली पत्नी की तरह दिखूंगी. या मैं उस स्लिम-फिट वाली अनारकली को कैसे मना कर दू जिसका इतना घेरा है कि मेरे कॉलेज की सभी लड़कियों को मुझसे जलन हो जाएगी? एक ऑउटफिट पसंद करना सचमुच कठिन काम होगा.

अन्वेषा की दुविधा देख कर अंजलि बोली, “रिलैक्स अन्वेषा. जब तुम अपनी पसंद की ड्रेस देखोगी न तो तुम्हे बिलकुल भी नहीं सोचना पड़ेगा. मेरा यकीन मानो, हर लड़की का सबसे फेवरेट ऑउटफिट होता है. पर उसके पहले तुम्हारे पास अभी थोडा समय है. ईशा तुम्हे बाथरूम ले जाएगी जहाँ तुम पहले अपनी ब्रा और पेंटी पहनोगी. फिर उस बैग से सैटिन रोब पहनकर बाहर आओगी. आखिर एक दुल्हन या राजकुमारी का श्रृंगार ऐसे ही थोड़ी शुरू होता है!” अंजलि अन्वेषा का कन्धा पकड़कर मुस्कुराने लगी. अन्वेषा मन ही मन सोच रही थी कि बस कुछ देर पहले जब वो अंजलि से पहली बार मिली थी तब उसे लगा था कि अंजलि उसके साथ फ़्लर्ट कर रही है. पर अब उसे समझ आ गया था कि इस क्लब में औरतें ऐसे ही एक दुसरे को छेडती है. अन्वेषा फिर ईशा के संग बाथरूम चली गयी जहाँ वो सबसे सेक्सी ब्रा और पेंटी पहनने वाली थी. वो औरत बनने की ओर कदम बढ़ा रही थी. आज उसका सपना सच होने वाला था.

अन्वेषा के अन्दर जाने पर ईशा ने बाथरूम का दरवाज़ा बंद कर दिया था. और इस दौरान, बाकी औरतें प्रिंसेस रूम की सजावट देखने में मगन हो गयी. आखिर उन सभी की भी सुनहरी यादें जुडी हुई है इस कमरे से. अन्वेषा की ही तरह एक दिन वो भी राजकुमारी बनी थी इसी कमरे में. पर इस ख़ुशी के बीच उन औरतों के ये नहीं पता था कि आज ये उनकी इंडियन लेडीज़ क्लब में आखिरी पार्टी होने वाली है. क्योंकि उनके बीच एक औरत है जो उन सब की ज़िन्दगी हमेशा के लिए बदल देगी.
क्रमश: …

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Scent of a woman

Were you ever mesmerized by the scent of a woman that they leave in their clothes after wearing?


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Note: We are thankful to lovely Alisha Sista for contributing her story. Not just that, she also gave her sexy pics to go with the story! Please say thanks to this hot girl on facebook!

This story started with me being obsessed with the scent of a woman’s dress. I was just about 10 years old when I started noticing the difference between how a woman and a man smelled. I was so attracted to the woman’s scent that I wanted to smell like her. The fascination drove me to rummaging through my mother’s washed clothes but the scent was just not there. I used to get that heavenly scent from my aunt who used to stay out of my town and used to visit us once in every 3 months. I used to wait for her to come & used to find multiple reasons to stay around her so that I can experience her scent. My first thoughts were that my aunt must using some imported perfume to get this heavenly scent. Her husband was after all working abroad & he must be sending her this imported stuff for her to smell so angelic. Oh how wrong was I !!! Continue reading “Scent of a woman”

देवर और भाभी

एक देवर और भाभी का रिश्ता तो बहुत ही नटखट और प्यार भरा होता है. पढ़िए एक ऐसी ही शरारत जब देवर को भाभी ने अपनी ननंद बना दिया!


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नोट: इस कहानी की लेखिका है “मेल इन साड़ी” जिन्होंने यह बहुत ही प्यारी देवर भाभी की कहानी हमारे expression challenge #3 के जवाब में लिखी है. आशा है आपको बहुत पसंद आएगी! हम तो इस कहानी को पढ़ कर पहले ही दीवाने हो चुके है!

देवर और भाभी का रिश्ता बड़ा ही प्यार भरा होता है| मेरा भी मेरी भाभी के साथ कुछ ऐसा ही था| एक दिन भाभी को पता नहीं क्या सूझी और बोली “देवर जी तुम भी चलो न मेरे साथ मेरी दोस्त की शादी में “| मैं बोला, “भाभी आपकी दोस्त की शादी है और वो भी गाँव में, मैं क्या करूंगा ? और फिर मेरे साथ का कोई होगा भी नहीं बोर हो जाऊंगा।” Continue reading “देवर और भाभी”

The daughter who never was – Part 1

One mistake that forced him to live the life of a woman


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It was already evening. The sun was going down. And the villages I could see from the train window looked really beautiful in the twilight hours. Bulbs and tubelights were now tinkling in those beautiful small houses. I could see people heading back home in their cycles and bikes. I was enamored with the beauty of the simplicity with which those villagers seemed to live their lives. Continue reading “The daughter who never was – Part 1”

बेटी जो थी नहीं – १

एक गलती जिसने उसे लड़की का जीवन जीने मजबूर कर दिया.


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शाम हो रही थी. और ट्रेन के बाहर जाते हुए छोटे छोटे गाँव शाम की हलकी रौशनी में बड़े सुन्दर दिख रहे थे. घरो में रौशनी के लिए बल्ब और ट्यूबलाइट अब चालू होने लगी थी. लोग शायद अब अपने अपने घरो को साइकिल और गाड़ियों से वापस हो रहे थे. और मेरा मन उनको निहारने में लगा हुआ था. Continue reading “बेटी जो थी नहीं – १”

The girl in me

A short story of a crossdresser who falls in love for the first time.


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Special thanks: We thank Gitanjali Paruah, the writer of the story First Time/ पहली बार, who once again contributed this lovely story about falling in love.

I love this brute, I thought. I smiled. But it wasn’t always like this. I was mortally scared of him, some years back. I used to be terrified.

He was my roomy from college. He was this swaggering blusterhead in first year. And he was loud, big and brawny to boot – the complete opposite of me. I could hardly hear myself speak in those days, I smiled as I recollected. Now I am a complete chatterbox.

The first day was absolutely terrifying. He just swooped in to my room and occupied my bed and started removing my clothes from the cupboard nearby. Then he noticed me glaring and stopped. Good, I thought. But he had an amused look on his face. “Clear up, babe,” he said. I don’t know what made me do it. But I quietly cleared the cupboard and moved my stuff to the other cupboard that had one door jammed. Continue reading “The girl in me”