Caption: Challenge

Captions published under shortest story challenge


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Mother-in-law / सास
By Anupama Trivedi



Another life / दोहरी ज़िन्दगी
By Devika Sen



Womanhood / स्त्रीत्व
By Gitanjali Paruah



Maid / नौकरानी
By Saloni Sharma



Stuck / पहली बार
By Sonali Kapoor

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Caption: Best friends

When I came out as a crossdresser to my best friend, you will not believe what happened next.


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English हिंदी

English

“I cannot believe this is you!”, said Rajiv when he looked at my photograph wearing a green salwar suit. How could he believe? After all, it was me, Nimit, his best friend since his childhood who was sitting next to him wearing a t-shirt and jeans. It was unimaginable for anyone to realize that the beautiful girl in the picture with long hair could be a man like me.

“Of course, it is me. Rajiv.”, I said to him. I had finally decided to open up about my cross-dressing to my best friend who is also my roommate in a city where we both work. He didn’t ask much questions or judge me at all. I knew that Rajiv is not going to do anything to hurt me in anyway. I trusted him, and his actions so far suggested that I was right. He stared at the picture for a while and finally hesitantly asked, “Can I see you in real as a woman? Err.. only if you don’t mind.” I smiled at him. No, I was not being feminine or anything at this time. I was just being his friend he had always known. “Wait here for me”, I said to him.

I stood up and went to my bedroom where I began my transformation. I thought I will surprise him with my looks in a saree. It took me about 10 minutes to find a nice saree and drape it. But it took me about half an hour to apply makeup and wear accessories like dozens of bangles which I really like. I shaped my eye-brows a little bit with my liner because I wanted to look like a real woman. Finally, I applied bindi on my forehead and came out holding my saree pallu with a big smile on my face. I was thrilled because I was coming out as a woman to someone for the first time in my life!

“Wow!! You look … you look…”, Rajiv could not complete his sentence when he looked at me in a pretty colorful lehariya saree. May be because he was mesmerized by my beauty or may because he could not believe it was me, his best friend, Nimit. Seeing him struggle with his words, I giggled. This time I giggled like a real girl. “What’s the problem, Rajiv? Haven’t you seen a pretty girl before?”, I said laughingly.

“You look… amazing!!”, he finally completed his sentence. He looked a little nervous. “What should I call you?”, his next question came up with a lot of hesitation.

“Hmm… I prefer to be called Smita! You know you can treat me like your sister-in-law or like any other young married lady from your neighborhood”, I excitedly told him about my desire.

He gave a nervous smile and said, “Smita bhabhi (sister-in-law)? You know that the relationship between a brother-in-law and a sister-in-law can be really naughty. Right?”, he almost tried to tease me with his shy benign friendly look in his eyes.

“He he.. it’s ok my dear brother-in-law. You can talk naughty to me, but don’t try to come near me. After all, I am a married woman, na!”, I laughed again as I pulled my saree pallu over my head as a gesture of being a devoted married woman.

Honestly, Rajiv had been really a gentleman. After that day, he would occasionally tease me with his words like a true brother-in-law would, but he never said or did anything indecent. And our friendship only grew after that. I was happy to be his sister-in-law after coming back from my work. And he always respected me as a woman. Sometimes when I would be watching TV sitting on a sofa, he would come and sit next to me. And he would hold my saree pallu in his hands, play with it and touch it to feel the softness of the fabric.

I looked into his eyes. I understood what he wanted. I knew that he hasn’t fully realized it himself but the time has come when he himself should wear a saree, and experience what I feel everyday when I become a woman. The time has come for him to become my female friend. I hugged him, and took him to my room where I would transform him into my first and best female friend. Our friendship was going to reach the next level tonight.

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हिंदी

“मुझे यकीन नहीं होता कि ये तू है यार”, राजीव ने मुझसे कहा जब उसने मेरी फोटो देखी जिसमे मैं हरे रंग का सलवार सूट पहने हुए था. वैसे भी ऐसे कैसे यकीन कर लेता वो? आखिर, वो मैं था, निमित, उसके बचपन का जिगरी दोस्त जो उसके बगल में टी-शर्ट और जीन्स पहने बैठा हुआ था. किसी के लिए भी यकीन करना मुश्किल होता कि उस फोटो की खुबसूरत लड़की जिसके खुले लम्बे बाल है, वो कोई और नहीं बल्कि मैं हूँ निमित.

“ऑफ़ कोर्स, वो मैं ही हूँ राजीव”, मैंने उससे भरोसा दिलाते हुए कहा. आखिर आज मैंने अपने क्रॉसड्रेसिंग के राज़ को अपने बेस्ट फ्रेंड के सामने खोल ही दिया. अब तो वो मेरा रूममेट भी है उस शहर में जहाँ हम दोनों काम करते है. उसने मुझसे ज्यादा सवाल भी नहीं किये और न ही कोई बुरा बर्ताव. मैं जानता था कि राजीव ऐसा कुछ नहीं करेगा जिससे मुझे बुरा लगे. मुझे उस पर भरोसा था और उसका अब तक का व्यवहार मेरे भरोसे को सही ठहरा रहा था. सच में मेरा अच्छा दोस्त था राजीव. उसने कुछ देर और उस फोटो को देखा और फिर बोला, “क्या मैं तुम्हे लड़की के रूप में देख सकता हूँ? तुम बुरा न मानो तो” उस कहने में एक झिझक थी. पर उसकी इच्छा सुनकर मैं मुस्कुरा दिया. किसी औरत की तरह नहीं बल्कि एक दोस्त की तरह जिसे वो बचपन से जानता था. “तुम मेरा यहीं इंतज़ार करना. मैं आता हूँ”, मैंने उससे कहा.

मैं उठ कर अब अपने बेडरूम में आ गया जहाँ मैं अब औरत बनने वाली थी. मैंने सोचा कि राजीव को आज साड़ी पहन कर एक और सरप्राइज दू. मुझे करीब १० मिनट लगे होंगे एक अच्छी सी साड़ी ढूंढकर पहनने को पर मेकअप वगेरह करने में मुझे आधा घंटा और लग गया. मुझे चूड़ियां पहनना बहुत पसंद है तो मैंने करीब २ दर्जन कांच की चूड़ियां भी पहन ली. फिर मैंने अपनी ऑयब्रौस को अपने लाइनर से थोडा आकार दिया ताकि मैं एक खुबसूरत औरत की तरह दिख सकूं. आखिर में अपने माथे पर छोटी सी बिंदी लगाकर अपनी साड़ी का पल्लू हाथ में पकडे और एक बड़ी सी मुस्कान लिए मैं कमरे से बाहर निकली. आखिर ख़ुशी का दिन था ये. पहली बार एक औरत के रूप में मैं किसी के सामने आ रही थी!

“Wow!! तुम तो … तुम तो…”, राजीव अपने वाक्य भी पूरा नहीं कर पा रहा था मुझे लहरिया साड़ी पहने इठलाते देख कर. शायद मेरी खूबसूरती से उसके होश उड़ गए थे या फिर उसे यकीन नहीं हो रहा था कि मैं उसका दोस्त निमित हूँ. उसे ऐसे शब्दों से लडखडाते देख मैं खिलखिलाने लगी. इस बार बिलकुल एक औरत की तरह! “क्या बात है राजीव? मैं अच्छी नहीं दिख रही तुम्हे?”, मैंने हँसते हुए उससे पूछा. बेचारे की तो हालत थोड़ी खराब थी.

“नहीं… तुम बहुत खुबसूरत औरत लग रहे हो… लग रही हो”, उसने किसी तरह अपना वाक्य पूरा किया. थोडा नर्वस लग रहा था वो. “मैं तुम्हे क्या कह कर पुकार सकता हूँ?”, उसने पूछा.

“हम्म…. मुझे स्मिता नाम पसंद है. तुम मुझे अपनी भाभी मान सकते हो या फिर मुझे इस तरह ट्रीट कर सकते हो जैसे तुम्हारे पड़ोस में रहने वाली कोई जवान शादीशुदा औरत हूँ मैं”, मैंने ख़ुशी से अपनी इच्छा जाहिर की.

मेरी बात सुनकर उसने एक नर्वस सी अधूरी मुस्कान दी और मुझसे कहा, “स्मिता भाभी… मुझे अच्छा लगेगा तुम्हे भाभी की तरह ट्रीट करना. पर तुम्हे पता है न कि देवर भाभी के बीच का रिश्ता थोडा नटखट होता है. क्या तुम तैयार हो अपने देवर के लिए मेरी भाभी जी?” वो मुझे छेड़ने की कोशिश कर रहा था पर साथ ही शर्मा भी रहा था.

“हा हा… ठीक है देवर जी. तुम चाहे जितने नटखट हो जाओ मेरे साथ. पर थोड़ी सीमा बनाकर रखना. आखिर एक शादीशुदा औरत हूँ मैं!”, मैं फिर जोर से हँस दी और अपने सर पर पल्लू ओढ़कर कर इठलाने लगी जैसे एक पतिव्रता औरत हूँ!

सच कहूं तो राजीव एक जेंटलमैन था. उस दिन के बाद भले वो एक देवर की तरह मेरे साथ शरारतें करता था पर कभी भी उसने कोई अश्लील बात या हरकत मेरे साथ न की. हम दोनों की दोस्ती उस दिन के बाद से और गहरी होती चली गयी. मैं काम से घर वापस आने का बाद ख़ुशी से राजीव की स्मिता भाभी बन जाया करती थी. और वो मेरी हमेशा एक औरत के रूप में इज्ज़त किया करता था. कभी कभी जब मैं सोफे पर बैठ कर टीवी देख रही होती थी तब वो मेरे साड़ी के पल्लू को अपने हाथ में लेकर उससे खेलता और साड़ी के स्पर्श को महसूस करता. कभी कभी मेरी साड़ी को वो एक हसरत भरी निगाहों से देखता.

एक दिन मैंने उसकी आँखों में वो हसरत देख ली. मैं समझ गयी थी कि वो क्या चाहता है पर शायद वो पूरी तरह से खुद को अब तक नहीं समझ सका था. पर अब समय आ गया था कि अब वो खुद साड़ी पहन कर वो ख़ुशी महसूस करे जो मैं रोज़ औरत बनकर किया करती थी. अब समय आ गया था कि राजीव मेरे दोस्त के साथ साथ अब मेरी  सहेली भी बन जाए. वो अब भी मेरे पल्लू को पकड़ा हुआ था जब मैंने उसकी आँखों में देखा और उसे गले लगा लिया. और फिर उसका हाथ पकड़ कर मैं अपने कमरे में ले आई जहाँ आज वो मेरी पहली और सबसे प्यारी सहेली बनने वाला था. हमारी दोस्ती इस पल के बाद से एक नए कदम की ओर बढ़ रही थी.

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January – March 2018 Edition

List of all the indian crossdressing related articles and stories we published in January 2018.


Updates
[21/02/2017] Several captions published under our Shortest Story Challenge.
[18/01/2017] A new caption Best friends/ दोस्त या सहेली? is now published.
[15/01/2017] Our english story Suhasini is nearing it’s conclusion. Parts 10 and 11 are now available.
[05/01/2017] इंडियन लेडीज़ क्लब कहानी के अंतिम भाग १४ एवं भाग १५ प्रकाशित.

EDITORIAL

Dear readers,
Another year has come, and we sincerely pray that you girls really get to experience the full femininity within you at least once this year. With those wishes in heart, we are really happy to inform you all that Indian Crossdressing Novel is completing it’s one year on January 15, 2018! We really thank you from our heart for your support and love in the past year. And we sincerely hope for your continued love and support this year too!

Editor

संपादकीय

प्रिय पाठिकाओं,

नया साल आ गया है और हमारी दिल से कामना है कि इस साल आप सभी को अपने अन्दर की स्त्री को पूरी तरह से खुली हवा में जीने का कम से कम एक मौका ज़रूर मिले. और साथ ही, हमें ख़ुशी है ये बताते हुए कि १५ जनवरी, २०१८ को इंडियन क्रॉसड्रेसिंग नावेल के १ साल पूरे हो रहे है! आशा है कि आने वाले साल में भी आपका प्यार और सहयोग हमें निरंतर रूप से मिलता रहेगा.

तो पढ़ते रहिये!

संपादिका

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इंडियन लेडीज़ क्लब: अंतिम भाग

आखिर वो रात आ ही गयी थी जब इंडियन लेडीज़ क्लब की औरतों का जीवन एक बार फिर बदलने वाला था. क्या वो आगे भी औरत बनी रहेंगी?


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आखिर वो घडी आ ही गयी थी जब उस मेसेज के अनुसार सुमति और इंडियन लेडीज़ क्लब की सहेलियों के साथ कुछ ख़ास होने वाला था. क्या होने वाला था उस रात? सुमति तो अब भी एक खुबसूरत दुल्हन के लिबास में मुस्कुरा रही थी. उसके हाथों और पैरो पर बेहद सुन्दर डिजाईन वाली मेहंदी रचाई गयी थी. उसके आसपास उसकी बहाने, भाभियाँ और बहुत सी औरतों ने उसे घेर रखा था. हर जगह ख़ुशी और औरतों की हँसी की गूंज थी. हर कोई तो खुश था, फिर भी उस ख़ुशी के पीछे सुमति, अंजलि और मधुरिम चिंतित भी थी कि आज रात उनके साथ कौनसी नयी मुसीबत आने वाली है. इस वक़्त सभी औरतें सुमति की मेहंदी और उसकी खूबसूरती की तारीफ़ करने में लगी हुई थी. पर उसके बाद क्या हुआ वो किसी को अच्छी तरह से ध्यान नहीं आ रहा था. जैसे सभी शायद किसी नशीली नींद में चले गए थे. और सुमति को भी याद न रहा कि उसके बाद क्या हुआ था.

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सुमति को पिछली रात इतना ही याद रहा कि वो औरतों से घिरी हुई थी. पर उसके बाद क्या हुआ था?

अगली सुबह

सुमति अपने बिस्तर से सोकर उठी पर उसने अब तक अपनी आँखें नहीं खोली थी. वो बाहर से कुछ औरतों की आपस में बातें करने की आवाजें सुन सकती थी.

“क्या दूल्हा अब भी सो रहा है?” किसी ने पूछा. “हाँ, कल इतनी रात तक जगा हुआ जो था. पर आज तो उसकी शादी है. कोई जाकर जगाओ उसे”, दूसरी औरत ने कहा.

तभी सुमति को अपने सर पर के प्यार भरा स्पर्श महसूस हुआ. “बेटा सुमित, अब उठ भी जाओ. आज शादी है तुम्हारी!”, सुमति ने अपनी माँ की आवाज़ सुनी और अपनी आँखें धीरे से खोली. उसकी माँ उसके सामने मुस्कुराती हुई खड़ी थी.

सुमति को मुश्किल से बस एक सेकंड लगा होगा समझने के लिए कि वो एक बार फिर से आदमी बन चुकी थी. वो एक बार फिर से सुमित थी. वो अपनी माँ के चेहरे को देख मुस्कुराया. एक बार फिर से माँ का बेटा बनकर सुमित खुश था.

उसने उठकर अपना फ़ोन देखा. उसमे एक मेसेज उसका इंतज़ार कर रहा था. +GOD नंबर से आया मेसेज. “सुमति तुमने बिलकुल सही निर्णय लिया. तुमने पिछले कुछ दिनों एक औरत के कर्त्तव्य का बखूबी निर्वाह किया. इसलिए मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है कि तुम्हारी हर इच्छा पूरी हो. इसलिए मैं तुम्हे तुम्हारा पुराना शरीर लौटा रहा हूँ. तुम्हारी दुनिया अब फिर से वैसी ही होगी जैसे १४ दिन पहले थी. तुम्हारा दाम्पत्य जीवन सुखी हो. अपनी पत्नी चैताली को हमेशा खुश रखना.”

सुमित उस मेसेज को पढ़कर तुरंत उठ खड़ा हुआ. और जल्दी ही नहाकर उसने चैताली से मिलने की सोची. उसकी माँ ने उससे कहा, “बेटा शादी के दिन शादी से पहले दुल्हन से मिलना ठीक नहीं होता है.” तो सुमित ने जवाब दिया, “यकीन मानो माँ. आज अब कुछ बुरा नहीं हो सकता. मुझे चैताली से बहुत ज़रूरी बात करनी है”

चैताली का घर बस कुछ १०० मीटर की दूरी पर ही था और सुमित दौड़ा दौड़ा चैताली से मिलने गया जो वहां अपने घर के मेहमानों के साथ व्यस्त थी. उसे दरवाज़े से देखते हुए चैताली खुश हो गयी. चैताली की माँ ने सुमित का स्वागत किया और उसकी इच्छा अनुसार, सुमित और चैताली को मिलने के लिए एकांत में एक कमरा दिलाया जहाँ सुमित चैताली से बात करने के लिए बेचैन था..

चैताली भी जल्दी ही वहां आ गयी. अपनी सिल्क साड़ी में वो परी लग रही थी. “क्या बात है सुमित? सब ठीक है न?”, उसने पूछा.

“चैताली. मैं तो सिर्फ ये कहने आया था कि आज मैं अपने आप को दुनिया का सबसे किस्मत वाला आदमी मानता हूँ जो मुझे तुम्हारी जैसी पत्नी मिल रही है. तुम हमेशा से मेरी अच्छी दोस्त रही हो. और मैं भी कहना चाहता हूँ कि मैं हमेशा तुम्हे प्यार करने वाला पति बन कर दिखाऊँगा. तुम्हारी ख़ुशी के लिए मैं कुछ भी करूंगा. और तुम चाहो तो मैं क्रॉसड्रेसिंग भी छोड़ दूंगा.”

“ओहो सुमित! मैंने तुमसे कभी कहा है क्रॉसड्रेसिंग छोड़ने को? तुम्हे पता है ये राज़ सिर्फ हम दोनों के बीच है. मैंने तुम्हे हमेशा सपोर्ट किया है, और आगे भी करूंगी. वैसे भी जब तुम औरत बनते हो, तो मुझे भी तो एक अच्छी सहेली मिल जाती है बात करने के लिए! मैं हम दोनों के बीच और कुछ भी नहीं बदलना चाहती. मैं तुम्हे प्यार करती हूँ और करती रहूंगी. तुम्हे क्रॉसड्रेसिंग छोड़ने की ज़रुरत नहीं है क्योंकि उसके बगैर तुम अधूरे रहोगे. सुमति को मैं अपने जीवन का हिस्सा बनाऊँगी. ये मेरा प्रॉमिस है”, चैताली ने कहा.

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सुमित जल्दी ही चैताली से मिला. चैताली के साथ सुमति का राज़ सुरक्षित था.

चैताली की बात सुन सुमित का दिल भर आया. उसने उसे गले तो नहीं लगाया पर आँखों से उसने उसे धन्यवाद् किया. दोनों एक दुसरे की ओर देख कर मुस्कुराने लगे. उन दोनों के बीच काफी अच्छी आपसी समझ थी. उन्हें एक दुसरे से कुछ कहने के लिए शब्दों की ज़रुरत नहीं थी. वो जानते थे कि उन दोनों का जीवन बहुत खुबसूरत होगा.

जब अंजलि सुमति के घर में सोकर उठी तो उसे पता चला कि वो भी आदमी बन चुकी थी. उसने अपनी बेटी सपना और अपनी पत्नी को अपने बगल में सोता हुआ पाया. फिर उसने अपनी पत्नी को जगाकर कहा, “मेरी प्यारी धरम पत्नी. मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ. मैं जानता हूँ कि तुम सोचती हो कि तुम्हे मेरे हर निर्णय में साथ देना चाहिए. पर मैं तुम्हे बताना चाहता हूँ कि तुम मेरे बराबर हो और हर निर्णय में तुम्हारा उतना ही हक़ है जितना मेरा. तुम अपने विचार से मुझे अवगत करा सकती हो. और एक बात, मैं अपनी बेटी को बढ़ा कर एक स्वाभिमानी औरत बनाना चाहता हूँ. मेरे माता-पिता तुम्हारे साथ भले ठीक से व्यवहार न करते हो क्योंकि तुम्हे पोता नहीं मिला, पर सपना हमारे लिए किसी बेटे से कम नहीं होगी. मैं उसके हर सपने को पूरा करूंगा. और एक माँ होने के नाते तुम भी वैसा ही करना” ये शब्द सुनकर अंजलि की पत्नी दिल ही दिल में अपने पति की ओर शुक्रगुज़ार थी. उसे ख़ुशी थी कि उसकी बेटी बड़ी होकर स्वाभिमानी और इंडिपेंडेंट लड़की बनेगी.

और वहीँ जब मधुरिमा सोकर उठ, तो वो भी अब आदमी बन चुकी थी पहले की तरह. मधुरिमा के लिए तो पुरुष हो या स्त्री, उसका जीवन वैसे ही अच्छा था. उसने अपनी पत्नी अजंता को देखा और कहा, “अजंता, मैंने शायद तुमसे कई बार कहा नहीं है पर तुम्हे पत्नी पाकर मेरा जीवन सचमुच धन्य रहा है. तुम मेरा हर कदम साथ देती रही हो. पता है यदि संभव हुआ तो अगले जनम में मैं तुम्हारी पत्नी बनना चाहूँगा ताकि मैं तुम्हारी सेवा कर सकू!” अजंता के पास कुछ कहने को नहीं था… क्योंकि उसका पति तो हमेशा से ही उसे बेहद प्यार करता था. और फिर अजंता का स्वभाव भी सिर्फ देने वाला था पर उसे बदले में हमेशा बहुत सारा प्यार भी मिलता था.

इन सब से दूर शहर में जहाँ साशा रहती थी, उसकी रात भी चिंता में बीती थी. उसे याद आ रहा था कि कैसे उसने नौरीन के साथ दिल खोलकर बातें की थी. पर जब वो सोकर उठी तो वो एक बार फिर से आदमी बन चुकी थी. और जिस घर में वो थी, वो उसका पहले के घर था जहाँ उसके लड़के रूममेट थे. नौरीन आसपास कहीं भी नहीं थी. वो नौरीन को देखने को बेचैन हो उठी और जल्दी से ऑफिस जाने को तैयार हुई, अब एक आदमी के रूप में. उसे आज एक ज़रूरी काम था.

“नौरीन”, साशा अब लड़के के रुप में दौड़कर नौरीन के पास ओफ्फिए में पहुंचा. “हाँ सुशिल. तुम इतना हांफ क्यों रहे हो? दौड़ कर आये हो क्या?” नौरीन ने साशा के पुरुष रूप सुशील से कहा. नौरीन को पिछले दिनों के बारे में कुछ भी याद नहीं था जब साशा उसके साथ उसकी रूममेट बन कर रही थी.

“नौरीन मुझे तुमसे कुछ कहना है. अर्जेंट!”, साशा यानी सुशील ने कहा. और फिर दोनों एक मीटिंग रूम में चले आये जहाँ सुशील ने दोनों के बीच की चुप्पी को तोड़ते हुए कहा, “नौरीन, तुम ने दुनिया की सबसे अच्छी लड़की हो. तुम सबका सम्मान करती हो और सभी की बिना मांगे मदद भी करती हो, और बदले में किसी से कुछ भी नहीं चाहती. तुम्हे अंदाजा नहीं है कि तुमने मेरे सबसे मुश्किल समय में कैसे मदद की थी. पर मैं वो बात जानता हूँ. इसलिए मैं तुम्हे दिल से धन्यवाद देना चाहता हूँ. उस हर बात के लिए उस हर पल के लिए जिसमे तुमने मेरे साथ दिया था.”

फिर सुशील थोड़ी देर चुप रहने के बाद आगे बोला, “नौरीन, तुम मुझे बेहद पसंद हो. क्या तुम मुझसे शादी करके मेरी पत्नी बनना चाहोगी?”

नौरीन तो सुशील की बात सुनकर हैरान सी रह गयी. वो कुछ कह न सकी. “तुम मेरे सवाल का जवाब दो, उसके पहले मैं तुम्हे कुछ और बताना चाहता हूँ अपने बारे में”, सुशील ने कहा.

और फिर सुशील ने नौरीन को अपनी क्रॉसड्रेसिंग और साशा वाले रूप के बारे में बताया. वो नौरीन को बताना चाहता था पिछले दिनों के बारे में जब साशा और वो साथ रही थी, पर उसे पता था कि नौरीन उस बात का कभी यकीन नहीं करेगी. और उसके पास कोई सबूत भी तो नहीं था. यहाँ तक कि वो फ़ोन में आये sms भी अब उसके फ़ोन से गायब हो चुके थे. सुशील की बात सुनकर कुछ देर सोचने के बाद नौरीन ने सुशील की ओर देखा और बोली, “हाँ. मेरा जवाब हाँ है.” नौरीन मुस्कुरा दी. सच तो ये था कि नौरीन हमेशा से सुशील को चाहती थी और सुशील को ये पता भी नहीं था. पर पिछले कुछ दिनों में सुशील को उसका सच्चा प्यार पाने का मौका मिला था.

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नौरीन को ज़रा भी याद नहीं था कि पिछले कुछ दिन साशा उसकी रूममेट बनकर उसके साथ रही थी.

एक बार फिर इंडियन लेडीज़ क्लब की औरतों का जीवन बदल गया था पर इस बार अच्छे के लिए. सुमति यानी सुमित की शादी भी निपट गयी थी जिसमे अंजलि और मधुरिमा उसके पुरुष मित्र बन कर शामिल हुए थे. सभी का जीवन आज ख़ुशी से भरा हुआ था. अब क्रॉसड्रेसर होना किसी के लिए अभिशाप नहीं था.

कुछ दिन बाद

आज इंडियन लेडीज़ क्लब में खुशियाँ ही खुशियाँ थी. और खूब भीड़-भाड थी. न जाने कितने ही आदमी आज यहाँ इकट्ठा हुए थे और खुद को खुबसूरत साड़ियों और लहंगो में सजा रहे थे. क्योंकि आज एक ख़ास दिन था. कुछ दिनों के ब्रेक के बाद इंडियन लेडीज़ क्लब फिर से खुल रहा था. पर इस बार के बदलाव था इस क्लब में. अब ये क्लब न सिर्फ क्रॉसड्रेसर “महिलाओं” के लिए था बल्कि अब उनकी पत्नियों, गर्ल फ्रेंड के लिए भी खुल गया था. बहुत सी क्लब की औरतों की मदद आज उनकी पत्नियां या गर्ल फ्रेंड कर रही थी. उन्हें सजाते हुए वो सब भी खुश थी. और जो क्लब की सदस्य अकेली थी, उनकी मदद के लिए क्लब की सीनियर लेडीज़ तो थी ही. सबके चेहरे पर ख़ुशी थी आज.

पर एक सदस्य जो सबसे ज्यादा खुश थी, वो थी सुमति. सुमति को आज दुल्हन के रूप में सजाया जा रहा था. अंजलि, मधुरिमा और कई औरतें इस ख़ास अवसर पर सुमति को सजाने में मदद कर रही थी. अंजलि और मधुरिमा का साथ पाकर सुमति भी बहुत खुश थी. इन तीनो सहेलियों ने कठिन समय भी साथ में गुज़ारा था, और इस दौरान उनकी दोस्ती और गहरी हो गयी थी. आज इस क्लब में सुमति और चैताली की शादी हो रही थी जहाँ वो दोनों ही दुल्हनें होंगी. सभी “लेडीज़” आज इस शादी में सुमति की तरफ से सम्मिलित हो रही थी और उनकी पत्नियाँ और गर्ल फ्रेंड चैताली की ओर से. सुमति अब दुल्हन के रूप में सजकर तैयार थी. और क्लब की दूसरी औरतें भी जो रंग बिरंगे परिधानों में निखर रही थी. सुमति आज क्लब के सदस्यों के प्रति शुक्रगुज़ार थी जो इस पल को यादगार बनाने के लिए शामिल हुए थे.

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इंडियन लेडीज़ क्लब में आज खुशियाँ ही खुशियाँ थी. आज लेडीज़ सुन्दर साड़ियों और लहंगो में सजी थी, क्योंकि आज सुमति और चैताली की शादी का ख़ास अवसर था. सुमति इस वक़्त एक पारंपरिक दुल्हन बनकर अपनी सहेलियों से घिरी हुई थी. इंडियन लेडीज़ क्लब एक बार फिर जाग उठा था.

इंडियन लेडीज़ क्लब की आखिरी मीटिंग में शामिल सभी औरतें आज इस शादी में भी आई थी, बस एक औरत इस शादी में नहीं थी. वो थी अन्वेषा, जिसने पिछली बार राजकुमारी बनाया गया था. कुछ रात पहले जब सभी वापस आदमी बन गए थे, उस दिन अन्वेषा भी बदल गयी थी. पर आदमी बनने की बजाये या एक खुबसूरत औरत बनी रहने की जगह, जब वो सोकर उठी थी तो वो एक कुरूप औरत बन चुकी थी. वो एक बुरे विचारो वाली औरत थी जो अपने अलावा किसी और के बारे में नहीं सोचती थी. अपने सुन्दर औरत के रूप का उसने बहुत गलत फायदा उठाया था. और उसी कर्मो का फल था कि उसे हमेशा के लिए एक कुरूप औरत बनकर अब जीवन गुजारना था. शायद किसी दिन कोई राजकुमार आकर उसे इस श्राप से मुक्त करेगा पर तब तक उसे अकेले ही ऐसे जीवन गुजारना होगा.

पिछले कुछ हफ्ते, एक औरत के रूप में इंडियन लेडीज़ क्लब की औरतों को एक ख़ास शिक्षा दे गया था. क्रॉसड्रेसर होना श्राप नहीं है. ये हमारे ऊपर है कि हम इसे एक वरदान मान कर अपने अन्दर की स्त्री को अनुभव करे या फिर इसे श्राप मानकर अपने जीवन को दुखी करे. हम अपने अन्दर की खुबसूरत स्त्रियोचित भावनाओं और क्वालिटी का उपयोग अपनी जीवन संगिनियों को अच्छे से समझने में उपयोग कर सकती है. पर इसके लिए हमें खुद को अपने जीवन साथ के समक्ष खोलना होगा और उन्हें समझाना होगा कि हम सभी अच्छे लोग, चाहे हम जो भी कपडे पहने. और साथ ही साथ हमें उनकी ज़रूरतों को भी समझना होगा. हम हर समय औरत बनकर नहीं रह सकती उनकी इच्छाओ का सम्मान किये बगैर. किसी भी रिश्ते में एक बैलेंस ज़रूरी है और यह बात ये सभी औरतें समझ चुकी थी. इसलिए आज वो ये खुशियों भरा जीवन जी सकती थी.

लेखिका का नोट:  इस कहानी को ख़त्म करके मुझे बेहद ख़ुशी है. बहुत लम्बा था इसे लिखना और बहुत समय भी लगा. भले ये काल्पनिक कहानी थी और शायद हम सब भी चाहेंगी कि काश हमारे साथ भी ऐसा हो. पर रातोरात हम सब औरत बन जाए, ये शायद संभव नहीं है. पर यही तो इस कहानी का मुख्य सन्देश है. यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम अपने जीवन को खुशहाल बना सकते है चाहे हमारे पास सब कुछ न हो. और यदि हम ज़रा कोशिश करे, तो खुशियाँ हमसे दूर नहीं रह सकेगी. मैं प्रार्थना करती हूँ कि जितनी भी क्रॉसड्रेसर औरतें ये कहानी पढ़ रही है उन सबके सपने सच हो और उनका जीवन पुरुष और स्त्री दोनों रूप में खुशहाल रहे.
समाप्त

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< भाग १४

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इंडियन लेडीज़ क्लब: भाग १४

सुमति अपनी शादी के लिए घर आ गई थी. क्या वो इस शादी और अपने नए जीवन के लिए तैयार थी?


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सुमति की शादी

“माँ, सुमति दीदी आ गयी. जल्दी आओ न”, रोहित ने ख़ुशी से अपनी बहन को रिक्शे से आते देख अपनी माँ को आवाज़ दी. सुमति अब अपनी माँ के घर आ गयी थी जहाँ उसकी शादी की तैयारियां जोर शोर से चल रही थी. अब चैतन्य और सुमति की शादी में सिर्फ ८ दिन रह गए थे. अभी भी सुमति को यकीन नहीं हो रहा था पर कुछ ही दिनों में वो एक पत्नी बनने वाली थी. फिर भी, अपने घर में अपनी माँ के पास वापस आकर वो खुश थी.

रोहित भी अब दौड़े दौड़े सुमति के बैग उठाने आ गया था. शिक्षा भाभी जो पड़ोस के घर में रहती थी वो भी दौड़ी चली आई. “सुमति आ गयी! अरे वाह सुमति तो और भी खुबसूरत होकर आई है शहर से”, सर को अपने पल्लू से धक्के शिक्षा भाभी ने उत्साह से कहा. गाँव की रहने वाली शिक्षा भाभी को बड़ा उत्साह होता जब भी कोई शहर से आता. लगता है कि उन्हें सुमति बहुत पसंद थी तभी तो सुमति और रोहित को चलकर आते देखकर इतनी खुश थी वो.

अब तक सुमति की माँ भी दरवाजे पर आ गयी थी. वो हाथ में एक पूजा की थाली लिए खड़ी थी जिसमे एक दिया जल रहा था. अपनी बेटी सुमति को बेहद ख़ुशी के साथ उन्होंने घर में प्रवेश कराया. माँ को पूजा की थाली के साथ देख सुमति ने भी अपना सर अपने सलवार सूट के दुपट्टे से ढँक लिया और माँ उसकी नज़र उतारने लगी. माँ को देखते ही सुमति के चेहरे की ख़ुशी बढ़ गयी थी. पिछली बार जब वो यहाँ आई थी, तब वो घर का बड़ा बेटा थी. आज स्थिति बदल गयी थी पर फिर भी माँ का प्यार बिलकुल वैसा ही था. सुमति ने अपनी माँ के पैर छूने चाहे तो उन्होंने उसे रोक लिया. “अरे बेटी की जगह तो दिल में होती है पैरो पे नहीं”, ऐसा कहकर उन्होंने अपनी प्यारी बेटी के चेहरे को छुआ. माँ बेटी गले मिल अपनी अनकही ख़ुशी एक दुसरे के साथ बांटने लगी.

“अरे शिक्षा. वहां खड़ी खड़ी क्या कर रही है. तेरी ननद आई है, तू भी ज़रा नज़र उतार दे इसकी. स्वागत नहीं करेगी अपनी ननद का?”, सुमति की माँ ने शिक्षा भाभी से कहा जो एक जगह खड़ी होकर यह सब देख रही थी. शिखा सामने आई, और पूजा करके सुमति को गले लगा ली. “कैसी हो भाभी? और आपके शरारती बच्चे कैसे है?”, सुमति ने पूछा. “बच्चे ठीक है सुमति. थोड़ी ही देर में स्कूल से आते ही होंगे. “, भाभी ने जवाब दिया.

“लड़कियों! अभी बहुत समय है बात करने के लिए. पहले सुमति को घर के अन्दर आकर थोडा आराम तो करने दो”, सुमति की माँ ने दोनों से कहा.

अन्दर आकर सुमति अपने कमरे में चली गयी. कितना कुछ बदल गया था उस कमरे में. पहले वो एक लड़के का कमरा हुआ करता था. पर अब तो देख कर ही पता चल रहा था कि वो एक लड़की का कमरा था. और सब कुछ बिलकुल सुमति की एक औरत के रूप में पसंद के अनुसार ही था वहां. जब बचपन में वो सोचती थी कि यदि वो लड़की होती तो अपने कमरे को कैसे सजाती, बिलकुल वैसे ही सब सजा था उस कमरे में. सुमति की बनायीं हुई पेंटिंग भी थी उस कमरे में.

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नहाने के बाद सुमति ने एक हरे रंग का सलवार सूट पहन लिया.

सुमति कुछ देर अपने बिस्तर पर बैठी जिस पर फूलो के प्रिंट वाली चादर बीछी थी. उसने कमरे की खिड़की से बाहर की ओर देखा तो, वहां से कुछ १०० मीटर की दूरी पे चैताली का घर दिखा जो अब चैतन्य थी, सुमति का होने वाला पति! दूर से ही उस घर में मेहमानों के चहल पहल दिख रही थी. कुछ ही दिन में सुमति उस घर की बहु बनने वाली थी. इस बारे में सोचना भी सुमति के लिए भारी था. पर फिर भी उन विचारो को अनदेखा करती हुई वो नहाने चली गयी. और नहाने के बाद उसने एक हरे रंग का सलवार सूट पहना. एक क्रॉसड्रेसर के रूप में तो सुमति हमेशा साड़ी पहनना पसंद करती थी. पर अब जब वो औरत बन चुकी थी, वो अब सलवार सूट पहनना ज्यादा पसंद करने लगी थी. साड़ी के मुकाबले शायद उसे मैनेज करना ज्यादा आसान था. उसने कुछ देर अपनी माँ के साथ समय बीताया क्योंकि इतने दिनों बाद अपनी माँ से मिल रही थी सुमति. माँ-बेटी ने साथ में लंच किया और फिर सुमति की माँ ने उसे कुछ घंटे सोने के लिए जाने कहा. वैसे भी लम्बी ट्रेन की यात्रा के बाद सुमति थक भी गयी थी. पर वो सोना नहीं चाहती थी. वो अपनी माँ से कुछ बातें करना चाहती थी. न जाने क्यों वो अपनी माँ को बताना चाहती थी कि सुमति उनकी बेटी नहीं बल्कि बेटा हुआ करती थी. पर कैसे समझाएगी वो ये सब अपनी माँ को जिनकी नजरो में आज वो हमेशा से ही उनकी बेटी रही है. इस स्थिति से सुमति अन्दर ही अन्दर थोडा कुढ़ सी गयी थी. पर क्या कर सकती थी वो. अंत में मन की उधेड़-बून के बाद उसने सोना ही उचित समझा.

कुछ घंटे बाद सुमति की माँ ने आकर उसके सर पे हाथ फेर कर सुमति को दुलार से जगाया. “बेटी शाम हो गयी है. अब उठ जाओ.”, माँ ने कहा और माँ की बात सुनकर सुमति उठ गयी. “ओह्ह मुझे तो पता भी नहीं चला इतनी देर हो गयी. शायद ट्रेन की थकान कुछ ज्यादा ही थी.”, सुमति बोली.

“कोई बात नहीं बेटा. वैसे भी घर में मेहमान कल से आना शुरू होंगे. उसके पहले मैं तुझसे कुछ बातें करना चाहती थी.”, सुमति की माँ ने कहा. “क्या बात है माँ?”, सुमति ने पूछा.

“बेटा तू जल्दी ही अब नए घर में चली जाएगी. मुझे तो बहुत ख़ुशी है कि तेरी शादी चैतन्य से हो रही है. बचपन से मैंने अपनी प्यारी गुडिया को चैतन्य के साथ खेलते देखा है और अब तू दुल्हन भी बनने जा रही है.”, माँ ने कहना शुरू किया.

“नहीं माँ, वो गुडिया चैताली थी मैं नहीं. मैं तो लड़का थी.”, सुमति ने मन ही मन सोचा. ये इंसान का दिल भी बड़ा अजीब होता है. जब सुमति लड़का थी तब वो चाहती थी कि उसकी माँ उसे लड़की के रुप में स्वीकार करे. अब जब वो औरत है तो वो माँ को अपने लड़के वाले रूप के बारे में याद दिलाना चाहती है. पर चाहते हुए भी वो माँ से कुछ कह न सकी.

“सुमति, अपने नए घर में सब तुझसे उम्मीद करेंगे कि तू सीधा पल्लू स्टाइल में साड़ी पहने और अपना सर ढँक कर रहे. तुझे कई सारे मेहमानों के लिए खाना भी बनाना पड़ेगा. और किसी भी माँ की तरह, मुझे भी अपनी बेटी की फ़िक्र है. मुझे पता है कि तूने शहर में अकेले रहते हुए खाना बनाना तो सिख लिया है. फिर भी मैं तुझे सीधा-पल्ला साड़ी पहनना और कुछ ख़ास डिश सीखाना चाहती हूँ. तू सीखेगी मुझसे?”

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सुमति की माँ ने उसे सीधा पल्ला साड़ी पहनना सीखाया. किसी और माँ बेटी की तरह, उन दोनों का समय भी अच्छा बीत रहा था.

“ज़रूर माँ. मैं तुम्हारी रेसिपी ज़रूर सीखना चाहूंगी”, सुमति ने उत्साह के साथ कहा. वैसे भी लड़के के रूप में वो हमेशा सपने देखती थी कि उसकी माँ उसे बेटी की तरह ट्रीट करेगी और एक दिन अपनी एक साड़ी उसे पहनने को देगी. शायद एक माँ बेटी के बीच का सबसे प्यारा पल होता है ये जब माँ उसे पहली बार अपनी साड़ी गिफ्ट करती है. सुमति अब खुश थी कि आज वो बेटी बन रही है जो वो हमेशा से सोचा करती थी. थोड़ी देर में ही सुमति की माँ उसके लिए एक मेहंदी रंग की साड़ी लेकर आ गयी. तब तक सुमति भी अपना ब्लाउज और पेटीकोट बदल चुकी थी. उसके बाद उसकी माँ ने उसे सीधे पल्ले स्टाइल में साड़ी पहनना सिखाया. सुमति सचमुच बहुत खुश थी अपनी माँ से साड़ी पहनना सिख कर. वैसे सच तो यह था कि सुमति को पहले से ही कई तरह से साड़ी पहनना आता था पर वो यह ख़ुशी महसूस करना चाहती थी जिसमे उसकी माँ उसे बेटी के रूप में स्वीकार कर रही थी. बहुत सुन्दर पल थे वो माँ बेटी के बीच के. इसके बाद दोनों किचन गयी जहाँ सुमति की माँ ने अपनी ख़ास रेसिपी सुमति को सिखाई. दोनों को खाना बनाते वक्त बहुत मज़ा आया. तभी इस बीच सुमति के फ़ोन में एक sms आया. उसने देखा की उसके फ़ोन की लाइट टिमटिमा रही थी. उसने सोचा थोड़ी देर बाद sms देख लेगी पर न जाने क्यों वो उस sms को अनदेखा नहीं कर सकी. “मैं एक मिनट में फ़ोन देखकर आती हूँ माँ”, सुमति ने अपनी माँ से कहा. और फिर अपने हाथ धोकर अपनी साड़ी के पल्लू से पोंछकर वो फ़ोन में मेसेज पढने लगी.

“हेल्लो सुमति! औरत के रूप में नया जीवन कैसा बीत रहा है? क्या तुम्हे अपने पुरुष रूप के जीवन की याद आ रही है? पर तुम तो हमेशा से औरत बनना चाहती थी न? अब तक तो तुम्हे एहसास हो गया होगा कि चाहे पुरुष का जीवन हो या स्त्री का, जीवन में मुश्किलें और उतार-चढ़ाव तो बने ही रहते है. यदि तुम्हारी क़िस्मत में मुश्किलें लिखी है तो वो तुम्हारे कर्मो की वजह से होती है, न कि इस वजह से की तुम्हारा जन्म पुरुष या स्त्री रूप में हुआ है. औरत बनने के बाद भी तुम अपने कर्मो से आज़ाद नहीं हुई हो. तुमने जीवन का ये पाठ अब तक तो सिख ही लिया होगा. पर तुम्हारे पास अब भी मौका है. अच्छे कर्मो से तुम अपने भविष्य को अब भी संवार सकती हो. तो तुम बताओ, क्या अब भी तुम औरत बनी रहना चाहोगी या तुम्हे फिर से पुरुष बनना है? तुम्हारे पास सोचने के लिए एक हफ्ते का समय है. फिर समय का ये चक्र तुम्हारा भविष्य निर्धारित करेगी. हमेशा सुखी रहो यही मेरा आशीर्वाद है.”

बड़ा ही अजीब सा मेसेज था यह. कौन भेज सकता था ये? इंडियन लेडीज क्लब की औरतों के अलावा तो दुनिया में कोई भी सुमति के पुरुष रूप में जीवन को नहीं जानता था. “कौन हो तुम?”, सुमति ने उत्सुकतावश उस sms के जवाब में सवाल पूछा.

“मैं कौन हूँ, इससे क्या फर्क पड़ता है सुमति? कुछ लोग मुझे मोहन के नाम से जानते है और कुछ ने मुझे मोहिनी रूप में भी देखा है. तुम बस इस एक हफ्ते अपने भविष्य की सोचो. एक अच्छी औरत होने का कर्त्तव्य अदा करो, और सब ठीक ही होगा. गुड लक”

उस जवाब के बाद सुमति ने उस नंबर पर कॉल करने की कोशिश की. पर वो नंबर भी अधूरा दिख रहा था. +४६३. उसने ध्यान से देखा तो वो नंबर +GOD था. कोई उसके साथ खेल खेल रहा था. पर इस मेसेज ने उसे अन्दर से हिला कर रख दिया था.

ऐसा मेसेज पाने वाली सिर्फ सुमति नहीं थी. करीब उसी समय, साशा को भी ऐसा ही मेसेज ऑफिस में आया. अंजलि को भी जब वो अपनी बेटी सपना को खाना खिला रही थी. मधु के पास भी ऐसा ही मेसेज आया और अन्वेषा के पास भी. और इंडियन लेडीज़ क्लब की सभी सदस्यों को जो अब सभी उस एक रात के बाद औरतें बन गयी थी. कोई भी उस मेसेज को समझ नहीं सकी. क्या होगा एक हफ्ते में? सुमति के लिए तो वो दिन उसकी शादी के एक दिन पहले का दिन होगा.

अगले ७ दिन

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सांतवे दिन सुमति जब उठी तो उसे पता नहीं था कि उस रात उसके साथ क्या होने वाला था.

अगले ७ दिन, सुमति का जीवन चलता रहा. उसके घर में कई मेहमान भी आ गए थे. उसने अपना नया जीवन अब तक स्वीकार कर लिया था और वो पूरी कोशिश करती की उसके आसपास सभी खुश रहे. उसके अन्दर चल रहे द्वन्द को वो अपने तक ही सीमित रखती. और फिर सांतवे दिन जब वो सोकर उठी, तो उसे एक हफ्ते पुराना वो मेसेज याद आया. पर उसे पता नहीं था कि उस रात उसके साथ क्या होगा. वो कुछ देर बिस्तर पर ही लेटी रही, वो अभी किसी से तुरंत बात नहीं करना चाहती थी. उसने बस भगवान से प्रार्थना की कि सब ठीक हो. और फिर बिस्तर से उठकर घर में अभी अभी आये दो मेहमानों से मिलने बाहर निकल आई. उन्हें देख कर वो बहुत खुश हुई, आखिर वो दोनों अंजलि और मधुरिमा थी. वो दोनों अपने परिवार समेत सुमति की शादी में सम्मिलित होने आये थे. अंजलि, अपने पति और सास-ससुर के साथ थी वही मधु अपने पति जयंत के साथ. उन्हें देखते ही सुमति को पता चल गया था कि उन दोनों को भी सुमति की ही तरह एक मेसेज आया था. उसे एक दिलासा हुआ कि चलो आज हम तीनो उस पल में साथ रहेंगी.

उस मेसेज के बाद का एक हफ्ता अंजलि के लिए भी कुछ बदलाव लेकर नहीं आया था. उसे एक पत्नी, एक माँ और एक बहु के रूप में अपने कर्त्तव्य हमेशा की तरह निभाने थे. वो भी सब की ख़ुशी के लिए दिन रात काम करती रहती थी, बिना कोई शिकायत. वो अब ऐसी औरत बन गयी थी जो सिर्फ देना जानती है बिना कुछ किसी से मांगे. असीमित प्यार से भरी औरत बन गयी थी अंजलि. वो तब भी उतने ही प्यार से रहती जब उसका पति देर रात काम से आता और उससे शारीरिक प्रेम करने लगता चाहे वो कितनी ही थकी होती. उसने खुद को अपने पति के प्रति समर्पित कर दिया था.

शादी के घर में, उन सहेलियों के लिए प्राइवेट में समय निकाल कर उस मेसेज के बारे में बात करना थोडा मुश्किल था पर उनकी आँखें एक दुसरे से सब कुछ कह दे रही थी. दिन अपनी गति से बीत रहा था. और दोपहर में सुमति को हल्दी लगाये जाने वाली थी. हल्दी के लिए मधु ने सुमति को उसकी माँ के साथ पीले रंग की लहंगा चोली पहनाने में मदद भी की. और फिर मधु और सुमति की माँ ने मिलकर सुमति को स्टेज पर लेकर आई जहाँ उसे बैठा कर ५ सुहागन औरतें उसे हल्दी लगाने की रस्म पूरा करने वाली थी. मधु तो एक माँ की तरह ही खुबसूरत सुमति को देख गर्व से फूली नहीं समा रही थी. अंजलि पहली सुहागन थी जो सुमति को हल्दी लगाने वाली थी. सुमति जो अब एक खुबसूरत दुल्हन थी, उसने अंजलि की आँखों में देखा. दोनों सहेलियां इस मीठे खुबसूरत पल का आनंद ले रही थी. वो इस पल को हमेशा याद रखेंगी.

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अंजलि पहली सुहागन थी जो खुबसूरत दुल्हन को हल्दी लगाने वाली थी. दोनों सहेलियां इस पल को हमेशा याद रखेंगी.

हल्दी के बाद अब दिन जल्दी ही ख़त्म होने को आ रहा था. अब घर में मेहंदी की रस्म निभायी जा रही थी. सुमति के हाथो और पैरो पर खुबसूरत मेहंदी सजाई जा रही थी. और अंजलि और मधु उसके बगल में बैठ कर सुमति की खूबसूरती निहार रही थी. तभी अंजलि को एहसास हुआ कि उसके फ़ोन में कोई मेसेज आया है. बहुत सीधा सा मेसेज था. “क्या तुम तैयार हो आज रात के लिए अंजलि?” ये मेसेज उसी अनजान नंबर से आया था. मधु ने भी अपना फ़ोन देखा और उसमे भी वैसा ही मेसेज था. दोनों ने थोड़ी चिंता के साथ सुमति की ओर देखा जो इस वक़्त अपनी बहनों और भाभियों के संग ख़ुशी से खिलखिला रही थी. वो रात भी शान्ति से बढ़ रही थी. तब तक जब तक सब सो नहीं गए. अब वो समय आ गया था. समय का चक्र चल रहा था. पर अब कुछ होने वाला था.

अगला भाग इस कहानी का अंतिम भाग होगा. उस रात को क्या हुआ जानने के लिए ज़रूर पढ़े.

क्रमश: …

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< भाग १३ अंतिम भाग >

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इंडियन लेडीज़ क्लब: भाग १३

सुमति और अंजलि आज मधुरिमा से मिलने जा रही थी. क्या मधुरिमा के पास सुमति के सवालो का जवाब होगा?


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मधुरिमा का स्वर्ग

बाथरूम से फ्लश चलने की आवाज़ हुई, और दरवाज़ा खोल कर सुमति अपनी साड़ी ठीक करती हुई बाहर निकली. “उफ़.. ये इंडियन स्टाइल के टॉयलेट में साड़ी पहनकर जाना ज़रा भी आसान नहीं होता!”, सुमति ने शिकायत भरे लहजे में कहा. वो अपनी कमर के निचे की प्लेट को हिलाकर सुधार रही थी ताकि वो अपने पहले के रूप में आ जाए. वैसे भी टॉयलेट चाहे इंडियन हो या वेस्टर्न, हमेशा से आदमी के रूप में जाने की आदत के बाद औरत के रूप में जाना तो मुश्किल ही था सुमति के लिए.

सुमति की परेशानी देखकर अंजलि जोर जोर से हँसने लगी. उसने अपने बालो का जुड़ा खोला और फिर अपने बालों को पीछे एक रबर बैंड से बाँधने लगी. “तेरी साड़ी पीछे ऊपर अटक गयी है कमर पर. ठीक कर ले वरना ऐसे ही बाहर जायेगी तो दुनिया हँसेगी हम पर!”, अंजलि ने सुमति को चेताया.

सुमति ने पीछे पलट कर देखा तब उसे पता चला कि बाथरूम के बाद पेंटी ऊपर चढाते वक़्त उसकी साड़ी और पेटीकोट उसकी पेंटी में अटक गयी थी. बड़ी ही हास्यास्पद स्थिति थी और अंजलि का हँसना रुक ही नहीं रहा था. सुमति को थोड़ी शर्म सी महसूस हो रही थी. भले ही हँसने वाली स्थिति थी, पर एक औरत के रूप में सुमति को सावधान रहना होगा भविष्य में. “आई हेट दिस!”, सुमति गुस्से में बोली, “… देख, मेरी प्लेट भी अब सही से नहीं बन रही है. मुझे खोल कर फिर से ठीक करना होगा” सुमति थोड़ी सी उदास दिख रही थी. शायद वो ड्रामा क्वीन बन रही थी पर उसकी मुसीबत असली थी.

“अब शांत भी हो जाओ मैडम. मैंने तुझे पहले भी कितनी बार समझाया है कि प्लेट की लम्बाई में दो सेफ्टी पिन का उपयोग किया कर. एक सबसे ऊपर कमर के पास और दूसरी कुछ इंच निचे. अब याद रखेगी न? इधर आ मैं ठीक कर देती हूँ प्लेट”, अंजलि बोली. अंजलि अब भी पहले की ही तरह थी, सहायता करने वाली, प्यार से भरी हुई औरत. जब वो आदमी थी तब भी उसके अन्दर एक अच्छी औरत के सारे गुण मौजूद थे. उसने सुमति की साड़ी सुधारने में मदद की और फिर उसके बाद बोली, “अब ठीक है?” वो मुस्कुरायी और सुमति की आँखों में देखने लगी. सुमति अब ठीक मूड में थी. उसने हाँ में सर हिलाया और अपनी सहेली की तरह देख कर मुस्कुराने लगी.

इसके बाद अंजलि भी खुद तैयार होने लगी. वो एक पुराने से लम्बे आईने के सामने खड़े होकर अपने बालों पर कंघी कर सुलझाने लगी, और फिर से एक रबर बैंड से उन्हें बाँध ली. “कितनी प्यारी है अंजलि!”, सुमति मन ही मन सोचने लगी. वो भगवान को शुक्रिया अदा कर रही थी कि उसे अंजलि जैसी सहेली मिली.

“तो सुमति मैडम? हम चले? मैं तो तैयार हूँ अब”, अंजलि सुमति की ओर पलट कर बोली. “तू ऐसे चलेगी? तुझे मेकअप नहीं करना है तो कम से कम साड़ी तो बदल ले. सुबह से घर के काम करते वक़्त से यही साड़ी पहनी हुई है”, सुमति ने अंजलि को लगभाग डांट ही दिया.

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अंजलि ने अपने बालो का जुड़ा खोला और अपने बालो को एक रबर बैंड से बाँध कर कुछ ही मिनट में जाने को तैयार हो गयी. पर सुमति चाहती थी कि अंजलि साड़ी बदल ले..

“जैसी आपकी आज्ञा सुमति मैडम! मैं बदलती हूँ साड़ी. मुझे ५ मिनट लगेंगे बस”, अंजलि ने सुमति के गुस्से को शांत करना चाहा.

“अंजलि, तुझे याद है कि कैसे लेडीज़ क्लब में सबसे अच्छा मेकअप करना तुझे ही आता था. और आज तू नेल पोलिश तक नहीं लगायी है.”, सुमति बोली.

“मेरी प्यारी सुमति. तब मैं हाउसवाइफ नहीं थी न.. दिन में दर्जनों बर्तन धोने के बाद कोई नेल पोलिश नहीं टिकती है. समय बदल गया है. अब मेकअप के अलावा कई बातें है जो एक औरत के रूप में मुझे आनंद देती है. तो मेकअप के लिए समय निकालना अब मेरे लिए ज़रूरी नहीं है. समझ रही तू?”, अंजलि अपनी अलमारी में साड़ी ढूंढते हुए बोली. सुमति कुछ कह न सकी. अंजलि की प्राथमिकताएं अब बदल गयी थी. अब वो एक खाली समय में सजने वाली क्रॉसड्रेसर नहीं थी, अब वो एक माँ और एक गृहिणी थी जिसके लिए कपडे पहनना टाइम पास नहीं था. तब तक अंजलि ने एक नीली और ग्रे रंग की साड़ी निकाल ली. उसने सुमति को इशारा किया कि उसे साड़ी बदलने के लिए थोड़ी प्राइवेसी चाहिए.

“क्या यार…. जब तू आदमी थी तब तो नहीं शरमाई तू मेरे सामने कपडे बदलने से.”, सुमति ने चुटकी लेते हुए कहा. “हाँ तू सही कह रही है”, अंजलि ने धीमी आवाज़ में कहा. फिर थोड़ी देर बाद बोली, “तब मेरे पास बूब्स नहीं थे न छुपाने के लिए!” सुमति भी थोडा हँस दी उसकी बात सुनकर. “तब तो मेरे पास भी बूब्स नहीं थे. पर अब… हम्म… तू देखना चाहेगी मेरे बूब्स?”, सुमति बोली.

“चल हट बड़ी नटखट हो गयी है तू. मुझे तेरे बूब्स देखने की ज़रुरत नहीं है. मेरे अपने बूब्स को देख कर ही खुश हूँ मैं. ३४DD साइज़ है मेरा… पता है तुझे?”, अंजलि ने ब्लाउज पर से ही अपने बूब्स को छूते हुए कहा. “चल अब मैं ब्लाउज बदल रही हूँ. झाँकने की कोशिश मत करना”, अंजलि ने मज़ाक में कहा और अपना ब्लाउज उतारने लगी. अन्दर उसने एक बेहद ही साधारण सी सफ़ेद रंग की ब्रा पहनी हुई थी. उसके स्तन तो बेहद सुन्दर आकार के थे, पर उसकी ब्रा थोड़ी बदसूरत सी थी. अंजलि के लिए समय सचमुच बदल गया था. एक क्रॉसड्रेसर के रूप में उसके पास कई महँगी और फैंसी ब्रा हुआ करती थी. तब तो ऐसे ब्रा वो कभी न पहनती. पर अब की आर्थिक स्थिति में शायद वो यही मैनेज कर पाती हो किसी तरह. “शायद मुझे अंजलि को अच्छी ब्रा गिफ्ट करनी चाहिए.”, सुमति सोच में पड़ गयी. जहाँ तक सुमति अंजलि को समझती थी, अंजलि सुन्दर ब्रा पाकर ज़रूर खुश होगी.

अंजलि खुद इस वक़्त सोच रही थी कि अपनी सहेली के सामने कपडे बदलने में वो इतना शर्मा क्यों रही थी. सुमति के साथ तो उसने कितने बार कपडे बदले थे. शायद उसे थोड़ी सी शर्म आ रही थी कि अब उसके अन्तःवस्त्र इतने सुन्दर न थे. उसने झट से अपना पेटीकोट उतारकर दूसरा पेटीकोट पहन लिया. और फिर उसने अपनी नीली रंग की साड़ी पहनी जिस पर काले पोल्का डॉट बने हुए थे. उसका ब्लाउज उसके स्तनों पर बहुत बढ़िया फिट आ रहा था और आस्तीन भी उसकी मांसल बांहों पर बिलकुल सही फिट आ रही थी. सेक्सी दिख रही थी अंजलि. अब जब इस औरत के नए जीवन में अंजलि और सुमति लेस्बियन थी, तो अंजलि की तरह सुमति का आकर्षित होना स्वाभाविक था. पर फिर भी इस आकर्षण को काबू में रखना है, यह दोनों ने थोड़ी देर पहले ही तय किया था. सुमति इस वक़्त सिर्फ अपनी सहेली को देखकर एडमायर करती रही.

अपने कहे अनुसार, अंजलि ५ मिनट में तैयार भी हो गयी. “ओह राजकुमारी सुमति जी, मैं तैयार हूँ. मधुरिमा आंटी का घर यहाँ से १० मिनट की दूरी पर है. तो चलते है अब. मुझे फिर १ बजे के पहले वापस भी आना है. सास ससुर को खाना खिलाने.”

अपनी सहेली को तैयार देख सुमति उसके पास चल कर आई और उसके एक हाथ को पकड़ कर बोली, “किसी की नज़र न लगे तुझे”

अंजलि ने फिर अपना घर लॉक किया और दोनों सहेलियां गेट की ओर बढ़ने लगी. “अंजलि प्लीज़ एक बार मेरी साड़ी देख ले पीछे से. कहीं और अटकी तो नहीं है? बाहर सड़क पर शर्मिंदगी नहीं झेल सकूंगी मैं” सुमति अब भी चिंतित थी. “सब ठीक है. अब चल इस रास्ते जाना है”, अंजलि ने कहा और दोनों चल पड़ी.

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अंजलि ने जल्दी से साड़ी बदल ली. अपने नीले ब्लाउज और काले पोल्का डॉट की साड़ी में सेक्सी लग रही थी वो. उसने घर पे ताला लगाया और दोनों सहेलियां निकल गयी मधुरिमा से मिलने के लिए.

“अंजलि तुझे याद है करीब २ साल पहले हम दोनों दोपहर में घर से बाहर औरत बनकर निकली थी?”, सुमति ने पूछा. “कैसे भूल सकती हूँ वो दिन? कितना पीछे पड़ना पड़ा था मुझे तेरे. तू तो भीगी बिल्ली की तरह घबरायी हुई थी. मेकअप में पसीने छूटे हुए थे तेरे. और ५ मिनट में तू घर वापस भी हो गयी थी.”, अंजलि ने सुमति की ओर देख कर कहा.

“अब बात को इतना भी बढ़ा चढ़ा के मत बोल. पूरे १५ मिनट बाहर थे हम!”, सुमति ने शिकायती लहजे में नखरे भरे हावभाव करते हुए कहा. “चल ठीक है. फिर भी ५ मिनट न सही पर तू १० मिनट भी बाहर नहीं थी. और डर के मारे वापस घर की ओर दौड़ कर भागते हुए तू बार बार अपनी ही साड़ी पर पैर रख रही थी. और वैसे भी ३ इंच की सैंडल पहन कर कौनसी औरत दौड़ती है भला?”, अंजलि सुमति को छेड़ रही थी.

“हाँ मैं मान लेती हूँ कि मैं एक मुर्ख औरत थी तब. पर अब देखो… हम अब दो खुबसूरत औरतें है और खुले आसमान के निचे अब हम बेफिक्र होकर घूम सकती है. मैं तो मधुरिमा माँ से मिलने को लेकर बहुत उत्साहित हूँ. कैसी है वो? तेरी बात हुई थी उनसे?”, सुमति ने पूछा. (सुमति एक क्रॉसड्रेसर के रूप में मधुरिमाँ को अपनी माँ मानती थी)

सुमति सही कह रही थी. खुली हवा में दोनों औरतें आज बेफिक्र थी. और अचानक से बहती तेज़ हवा जैसे उनसे सहमत थी. उन दोनों की साड़ी और पल्लू उस तेज़ हवा के झोंके में आज़ादी की ख़ुशी में लहराने लगे थे. उन दोनों ने जल्दी से अपने पल्लू और साड़ी को अपने हांथो से पकड़ कर संभालने की कोशिश की. वो हवा का झोंका भी जल्दी ही चला गया. उस वक़्त सड़क किनारे कुछ आदमी भी थे जो इन खुबसूरत औरतों को देख रहे थे जो उन नजरो से बेफिक्र होकर अपनी ही दुनिया में मग्न थी.

“तुझे तो पता ही है की मधुरिमा आंटी की तबियत ठीक नहीं रहा करती थी. अब भी वैसी ही है. उनकी पत्नी अजंता आंटी अब उनके पति जयंत है! तो सरप्राइज मत होना यदि जयंत अंकल मिले आज घर पर. तुझे याद है न अजंता आंटी कितनी प्यारी थी? (भाग ३ में अजंता के बारे में पढ़े) वो हमेशा हमें कितने प्यार से घर में बुलाती थी. कभी हमारी क्रॉसड्रेसिंग को लेकर हमें बुरा नहीं महसूस कराया उन्होंने. अब वो आदमी है पर पहले की ही तरह उतने ही स्वीट है वो. मधु आंटी का बेहद प्यार से ध्यान रखते है”, अंजलि ने सुमति को बताया.

सुमति को जवाब सुनकर अच्छा लगा. और फिर दोनों सहेलियां बातें करती चलती रही. और जल्दी ही मधु आंटी के घर के बाहर पहुच गयी. दरवाज़े पर अंजलि घंटी बजाने वाली ही थी कि सुमति ने उसका हाथ झटककर अंजलि को रोक लिया. “रुक न ज़रा…. एक बार देख कर बता मैं ठीक लग रही हूँ न? मेरे बाल सही है?”

“हे भगवान! तू न एक विचित्र औरत बन गयी है! महारानी सुमति आप बहुत सुन्दर लग रही है. अपने हुस्न की चिंता करना बंद करे!”, अंजलि बोली. “ऐसे भी न बोल यार… मुझे तो बस लगा कि उस तेज़ हवा में मेरे बाल बिखर गए होंगे.”, सुमति ने उदास स्वर में कहा. अंजलि ने फिर दरवाज़े पर घंटी बजायी.

और थोड़ी देर में जयंत अंकल ने दरवाज़ा खोला. और जैसे ही सुमति ने उन्हें देखा, उसे ध्यान आया की उसकी साड़ी का आँचल थोडा ज्यादा उठा हुआ है इसलिए उसकी बांयी ओर से उसका ब्लाउज और उसका उभार दिख रहा है. उसने तुरंत अपने आँचल को अपने बांये हाथ से निचे खिंचा और ब्लाउज को ढँक कर जयंत अंकल के पैर छूने को झुक गयी. “नमस्ते अंकल”, दोनों औरतों ने अंकल को प्रणाम किया. “आओ आओ बेटी. पहले अन्दर तो आओ. तुम्हारी आंटी तो तुम्हारा कब से इंतज़ार कर रही है!”, अंकल ने कहा.

और अंकल के पीछे पीछे दोनों चल दी. चलते चलते सुमति ने कुहनी से अंजलि की कमर पर वार करते हुए फुसफुसा कर बोली, “मेरा ब्लाउज बाहर दिख रहा था तूने बताई क्यों नहीं थी पहले?” अंजलि बस देख कर हँस दी. सुमति को थोडा सा अजीब लग रहा था कि उसकी प्यारी अजंता आंटी अब जयंत अंकल बन चुकी थी. और जयंत अंकल को तो कोई अंदाजा भी नहीं था कि वो कभी इतनी प्यारी ममता भरी औरत हुआ करते थे. सुमति और इंडियन लेडीज़ क्लब की औरतों की दुनिया में आया हुआ ये बदलाव हुए अब २ दिन हो गए थे, फिर भी सब कुछ किसी सपने सा ही मालूम होता था. अभी भी सुमति को यकीन नहीं होता था. भले ही इस जीवन के कुछ हिस्से उसे अच्छे लगे थे पर शायद अन्दर ही अन्दर वो चाह रही थी कि ये यदि सपना है तो जल्दी ख़त्म हो और वो अपने पहले वाले जीवन में जा सके.

“अच्छा अब तुम दोनों अन्दर जाकर आंटी से मिल लो. मैं चाय पानी लेकर आता हूँ.”, अंकल ने कहा. “अंकल जी कोई ज़रुरत नहीं है चाय पानी की. हम तो बस १० मिनट चल कर आये है. अभी तो प्यास भी नहीं लगी है.”, अंजलि बोली.

और फिर दोनों घर के अन्दर बढ़ चले उस कमरे में जहाँ मधुरिमा आंटी थी. ऐसा लग रहा था कि जैसे बस अभी अभी तैयार हुई है वो. शायद दरवाज़े की घंटी बजने पर वो जल्दी जल्दी में तैयार हुई होंगी. मधुरिमा ने पलट कर सुमति और अंजलि को देखा. उनके चेहरे पर पहले की ही तरह एक बड़ी सी प्यार भरी और शरारती मुस्कान थी.

“तो मेरी प्यारी बेटियाँ आ गई है! आओ मुझसे गले नहीं मिलोगी”, मधु ने उन दोनों को देखते ही कहा. और दोनों दौड़कर आंटी को गले लगाने आ गयी. मधु आंटी अपने आकर में इतनी बड़ी तो थी कि दोनों को एक साथ गले लगा सके. उन्होंने दोनों को माथे पे प्यार से चूम लिया जैसे एक माँ करती हो. मधु जी एक बड़ी औरत थी जिनका सीना भी बेहद बड़ा था. जब वो एक आदमी थी तब भी उनके पास बड़े स्तन थे. ये सब उनकी तबियत खराब होने की वजह से था… दवाइयों का साइड इफ़ेक्ट जिसकी वजह से उनका वजन बढ़ गया था. पर उनके मोटापे की वजह से उनका जो रूप था बड़ा मातृत्व भरा रूप लगता था. हमेशा हंसती रहती और शरारत करती रहती. सभी को उनसे गले मिलकर अच्छा लगता था क्योंकि उनके पास तब भी ममता से भरे असली स्तन थे. और फिर वो सबको अपनी हरकतों और बातों से हंसाती भी तो रहती थी.

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मधुरिमा अंजलि और सुमति के लिए माँ की तरह थी.

“चलो लड़कियों, अब बैठ भी जाओ. और अपनी आंटी को अपनी पूरी जीवन कहानी सुनाओ. तुम दोनों को अपनी बूढी आंटी की याद आई, मैं तो बस इसी बात से बहुत खुश हूँ”, मधु बोली.

“बूढी आंटी? अरे आप तो अभी हॉट जवान औरत हो माँ”, सुमति ने छेड़ते हुए कहा. “जानती हूँ जानती हूँ. तुम दोनों से भी ज्यादा सुन्दर हूँ मैं. पर तुम दोनों को हीन भावना न हो जाए इसलिए कह रही थी मैं.”, मधु ने नैन मटकाते हुए कहा. ऐसे ही मसखरी करती थी वो हमेशा.

“अच्छा बताओ, कुछ कहोगी? जयंत अंकल बना देंगे तुम्हारे लिए कुछ”, मधु ने पूछा. “आंटी चिंता मत करो. हम बस अभी अभी घर से पोहा खाकर ही निकली है”, अंजलि बोली. वो अंकल आंटी को परेशान नहीं करना चाहती थी. पर तब तक अंकल चाय बिस्कुट लेकर आ गए थे. “लेडीज़, अब मैं तुम सभी को अपनी बातें करने के लिए छोड़ कर जा रहा हूँ. मुझे बाहर पौधों को पानी देना है. कोई भी ज़रुरत हो तो आवाज़ दे देना मुझे.”, अंकल न कहा. “थैंक यू अंकल”, सुमति बोली.

अब जब अंकल जा चुके थे तो मधु सुमति की ओर देख कर बोली, “सुमति बेटी, सब ठीक है नए जीवन में?” वो जानती थी कि ये अचानक आया हुआ बदलाव किसी के लिए आसान नहीं था.

“सब कुछ अच्छा है माँ! अब तो मेरे शादी भी होने वाली है. तुम्हारे बेटी दुल्हन बनने वाली है. और तुम्हे मेरी शादी में ज़रूर आना है. अपनी बेटी को सुन्दर लहंगे में देखने तो आना ही पड़ेगा तुम्हे. कोई बहाना नहीं चलेगा!”, सुमति ने ख़ुशी से मधु से कहा. वो मधु को शायद दिलासा देना चाहती थी कि सुमति अब ठीक है.

“अरे क्यों नहीं… ज़रूर आऊंगी मैं. अपनी प्यारी बेटी को खुबसूरत दुल्हन के जोड़े में देखने ऐसे कैसे नहीं आऊंगी मैं. भले मुझे अपने भारी भरकम शरीर के साथ पैदल भी चलना पड़े तो भी मैं आऊंगी.”, मधु बोली. तीनो औरतें बातें करती हुई हँस दी. पर कोई भी नए जीवन की वजह से आई हुई परेशानियों के बारे में बात नहीं कर रहा था. कुछ देर और हँसी-ठिठोली करने के बाद मधु गंभीर हो गयी.

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मधुरिमा ने सुमति और अंजलि से बैठने को कहा. वो उन दोनों से कुछ गंभीर बात करना चाहती थी.

“अंजलि, सुमति. मेरी बात ध्यान से सुनना. शायद तुम दोनों अपने दिल की बात कहने को अभी तैयार नहीं हो. पर तुम भी जानती हो कि औरत बनने के बाद से नयी कठिनाइयां आई होंगी. पर तुम दोनों हमेशा मुझ पर भरोसा कर सकती हो. मैं तुम दोनों के लिए पहले भी माँ समान थी, और आगे भी रहूंगी. तुम दोनों यदि अभी कुछ कहना नहीं चाहती हो तो न सही. पर मैं तुमसे कुछ कहना चाहती हूँ जो शायद तुम दोनों की मदद करे. ठीक है?”, मधु बोली. अंजलि और सुमति ने हाँ में सर हिला दिया. कितनी किस्मत वाली थी दोनों जो उन्हें मधु के रूप में एक माँ मिली थी जो उनकी असली माँ से ज्यादा उन दोनों के बारे में जानती थी.

“मुझे नहीं पता कि हम सब रातोरात औरतें कैसे बन गयी. और तुमने भी ये महसूस किया होगा कि हमारे आसपास की दुनिया भी कुछ बदल गयी है. हमारे अलावा किसी को याद तक नहीं कि हम कभी आदमी भी थे. सबके दिमाग में अब नयी यादें है जिसमे हम उनकी नजरो में हमेशा से औरतें थी. मुझे तो बहुत अच्छी लग रही है ये लाइफ, पर मैं पहले भी इतनी ही खुश थी अपनी लाइफ से. पर एक बात ज़रूर कहूँगी मैं. तुम्हारे आसपास के लोगो से तुम कैसे बर्ताव करती हो इस बात का ख़ास ध्यान रखना है तुम लोगो को. एक तरह से अपना भविष्य और अपना अतीत दोनों तैयार कर रहे है हम लोग. लोगो से अच्छा बर्ताव करोगी तो बदले में तुम्हारे साथ अच्छा ही होगा. और फिर बुरे बर्ताव का फल भी भुगतना पड़ेगा. यदि तुम अपने नए रूप को ख़ुशी से जीना चाहती हो तो सबके साथ अच्छे से रहो बस. बाकी सब ठीक होगा. सभी को प्यार करो और वो तुम्हे प्यार करेंगे. जो हो गया सो हो गया. वो क्यों हुआ यह हमारे हाथ में नहीं है. पर अपने भविष्य और रिश्तो को संभालना अब तुम्हारा काम है.”

सुमति ने मधु की बात ध्यानपूर्वक सुनी और फिर बोली, “माँ मुझे पूछने में थोडा संकोच हो रहा है क्योंकि ऐसी बात हमने पहले कभी नहीं की. पर आप अपने पति के साथ सम्बन्ध कैसे संभाल रही है? मेरा मतलब है… शारीरिक”, सुमति ने हिचकिचाते हुए पूछा.

सुमति का सवाल सुन मधु मुस्कुरा दी. “सुमति, अब हम उस उम्र में पहुच चुके है जहाँ शारीरिक सम्बन्ध अब बहुत कम बार बनाये जाते है. पर मेरे पति चाहे तो मैं ख़ुशी से उनकी इच्छा पूरी करूंगी. पता है क्यों? तुम्हे अजंता आंटी याद है? कितना ध्यान रखती थी वो मेरा? मेरी सेहत हो या मेरी क्रॉसड्रेसिंग… हर चीज़ में मेरा साथ दिया था उसने. और तुम दोनों को भी तो कितना प्यार करती थी वो. अब जब वो मेरे पति जयंत बन गए है, तो अब भी वो मेरा उतना ही ध्यान रखते है. पति होते हुए भी मेरी सेहत की वजह से घर का सारा काम देखते है. मैं भूल नहीं सकती कि पूरे जीवन में अजंता हो या जयंत, उन्होंने मेरा कितना ख्याल रखा है. और इसलिए कभी कभी मुझे अपना तन उन्हें समर्पित करना हो तो मेरे लिए ये कोई बड़ी बात नहीं है.”

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सुमति उठ कर किचन जाकर सबके लिए पकोड़े तलने लगी. उसके दिल में इस घर से जुडी बहुत सुन्दर यादें थी.

सुमति को उसका जवाब मिल गया था. उसे याद था कि चैताली किस तरह सुमति की क्रॉसड्रेसिंग को जानते हुए भी दुनिया के लिए उसे राज़ ही रहने दिया था. यहाँ तक की सुमति को इसमें कई बार उसने सपोर्ट भी किया था. इसलिए जब चैताली से शादी की बात होने लगी थी तो सुमति ख़ुशी से मान गयी थी. और अब जब वो चैतन्य बन गयी है तो सुमति को एहसास होने लगा कि उसके दिल में अभी भी चैताली और चैतन्य के लिए प्यार है. सुमति भले इस नए जीवन में लेस्बियन बन गयी हो, पर फिर भी वो अपने होने वाले पति के प्रति प्यार और निष्ठा रखने वाली पतिव्रता स्त्री तो बन ही सकती है. क्योंकि उसके दिल में चैताली/चैतन्य के लिए प्यार जो है. कभी कभी बदलाव दिल पर भारी लग सकते है. दिमाग सब कुछ समझ रहा हो तब भी दिल के लिए भावनाओं को काबू करना आसान नहीं होता. ऐसे ही विचार अंजलि के दिल में उमड़ रहे थे. मधु की बातों ने उनकी थोड़ी तो मदद की थी ये समझने में कि वो अपने पतियों के साथ रिश्ता कैसे बनाये रखे. दोनों ही मधु की गोद में सर रखकर कुछ देर ख़ामोशी में रही. और मधु का ममता भरा प्यार जैसे उन्हें नयी उर्जा दे रहा था.

अंजलि और सुमति का मन अब कुछ हल्का हो गया था. सुमति ने कहा कि अब वो सभी के लिए पकोड़े तलेगी. इस घर से तो वो पहले से परिचित थी, इसलिए किचन में जाकर पकोड़े बनाना शुरू करने में उसे समय नहीं लगा. जब जयंत अंकल ने किचन में खटपट सुनी तो वो अन्दर आकर बोले, “अरे बेटा, ये सब तुम्हे करने की क्या ज़रुरत है. मैं हूँ न. मैं बना देता हूँ. तुम्हारे बूढ़े अंकल भी पकोड़े अच्छे बना लेते है” सुमति ने अंकल को देखा और उनके पास आकर बोली, “अंकल आपने वैसे भी मेरे लिए कितना कुछ किया है. मुझे कम से कम पकोड़े बना लेने दीजिये. आप जाकर अंजलि और आंटी के साथ बातें करिए” सुमति को वो दिन याद आ रहे थे जब अजंता आंटी ने उन्हें प्यार से बेटी के रूप में अपने दिल और घर में जगह दी थी.

सुमति जल्दी ही पकोड़े लेकर बाहर आ गयी जहाँ सभी आपस में बातें कर रहे थे. सुमति ने अंजलि की आँखों में देखा. दोनों सोच रही थी कि अब सब ठीक ही होगा. उनका दिल कह रहा था. आखिर सामने मधु और जयंत का प्यार उनके मन में एक नयी उम्मीद जगा रहा था. मधु के अन्दर जयंत के लिए शारीरिक आकर्षण न रहा हो पर उन दोनों के बीच का प्यार असीमित था. अंजलि और सुमति को उन्हें देख लगा कि उनका भी उनके पतियों के साथ ऐसा प्यार भरा रिश्ता हो सकता है. सब ठीक ही होगा.

क्रमश: …

Image Credits: Lasi_Beauty on Flickr (a beautiful crossdresser) and xossip.com

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