इंडियन लेडीज़ क्लब: भाग ६

एक रात में सुमति और इंडियन लेडीज़ क्लब की औरतों का जीवन पूरी तरह बदल गया था. आखिर क्या हुआ था उनके साथ? सब क्यों इतनी विचलित थी?


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सुमति को तो यकीन नहीं हो रहा था जो उसके साथ हुआ था. होता भी कैसे? खुद अपने हाथो से अपने स्तनों को छुते हुए वो समझ नहीं पा रही थी कि रातो रात वो औरत कैसे बन गयी? कितने नर्म और मुलायम थे उसके स्तन. “क्या मैं सचमुच औरत बन गयी हूँ?”, यह सवाल उसके मन में चलता रहा. अपने स्तनों को छूकर जो महसूस हो रहा था उसे यकीन नहीं हुआ उसे कितना अच्छा लग रहा था… पर फिर भी मन तो दुविधा में था. फिर उसने अपने लम्बे बालो को सामने एक ओर कंधे पर लाकर उन्हें महसूस किया. “यह सब इतना असली कैसे लग रहा है मुझे? मैं कैसा सपना देख रही हूँ यह. ये सचमुच के बाल है विग नहीं. इस सपने से मैं बाहर नहीं निकलना चाहती हूँ पर कोई तो मुझे बताये की ये सपना है.” पर वहां कोई भी नहीं था जो उसे ये कहता. उसके मन में खलबली मच चुकी थी.

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सुमति ने अपने बिस्तर में रखे सिल्क गाउन को पहन लिया. वो अपने तन को देखना नहीं चाहती थी.

सुमति के बगल में बिस्तर में ही एक सिल्क गाउन रखा हुआ था. वो वहां कैसे आया? संभव ही नहीं था. अब तो उसे यकीन हो जाना चाहिए था कि ये सपना है. उसने झट से उस गाउन को अपने तन पर लपेटा. वो अपने तन को और नहीं देखना चाहती थी. उसका मन असमंजस में था और डरा हुआ भी था. उसे पता था कि वो एक क्रॉसड्रेसर है जिसे औरतों की तरह फैंसी शिफोन साड़ियाँ और चूड़ीदार पहनना पसंद था. फिर भी औरत बन कर तो उसका जीवन पूरी तरह उलट पुलट जाएगा, सब कुछ बदल जाएगा. इसलिए उसका घबराना उचित था.

डिंग डोंग! दरवाज़े पर घंटी बजी. “कौन हो सकता है इतनी सुबह सुबह?” इस हालत में सुमति किसी से भी मिलना नहीं चाहती थी. उसने सोची की जल्दी से वो अपने लडको वाले नाईट ड्रेस पहन लेगी. वो अपनी अलमारी तक चल कर गयी जहाँ उसके सारे नाईट ड्रेस और पैजामे रखे हुए थे. जब उसने अपनी अलमारी खोली, तो उसकी आँखें खुली की खुली रह गयी. वहां से उसके लडको वाले सारे कपडे गायब थे. ये सपना ख़त्म ही नहीं हो रहा था. अब उसकी अलमारी में सिर्फ औरतों के कपडे थे.. नाइटी, गाउन, सैटिन के पैजामे, सेक्सी लाऊंजरी, और न जाने क्या क्या. डिंग डोंग ! दरवाज़े की घंटी फिर से बजी. और अचानक ही सुमति को सर में एक चुभता हुआ सा दर्द महसूस हुआ. क्या यह सपना था? या किसी ने उसे कोई ऐसा ड्रग दिया है कि वो जागते हुए भी सपना देख रही है?


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अन्वेषा जब उठी तो उसे तेज़ हैंगओवर था. वो केवल टॉप पहनी हुई थी और निचे केवल पेंटी. उसकी स्कर्ट गायब थी.

जब अन्वेषा सोकर उठी तो उसे रात की शराब के बाद का हैंगओवर था. उसे तुरंत एहसास हो गया कि उसके तन में कुछ बदलाव हुआ है. उसके हाथ किसी और शरीर पर थे. पीछे से देखने पर उस शरीर पर हाल्टर ब्लाउज और पेटीकोट दिख रहा था. “हाँ… ये तो साशा है. और कौन होगी भला. पर उसकी साड़ी कहाँ है?”, अन्वेषा सोच में पड़ गयी. और उसने खुद को निचे की ओर देखा. “हे भगवान, मेरी स्कर्ट कहाँ गयी?” अन्वेषा नग्न अवस्था में निचे केवल पेंटी पहने हुई थी. वही पेंटी जो कल इंडियन लेडीज़ क्लब में उसे तोहफे में मिली थी. कम से कम वो टॉप तो पहनी हुई थी.

उसे कुछ सेकंड ही लगे होंगे ये एहसास होने के लिए कि उसका हाथ साशा के ब्लाउज के अन्दर उसके सीने पे है. वो दोनों स्पून पोजीशन में सोयी थी रात को. पर उसके हाथ में कुछ नर्म सा महसूस हुआ. वो नरमी स्तन की तरह थी. “बूब्स? साशा के बूब्स है? ये कैसे हो सकता है?”, अन्वेषा भी दुविधा में थी. और फिर उसके सर में भी चुभता हुआ दर्द हुआ जैसे सुमति को हो रहा था. ये ज़रूर ज्यादा शराब का असर है. अन्वेषा ने खुद को समझाने की कोशिश की.


जब तक सुमति का सर दर्द कम हुआ, उसे याद आया कि यह तो दूधवाले के आने का समय है. ज़रूर वही होगा. रोज़ सुबह ६:३० बजे वो दूध का पैकेट देने आता है. कुछ और पहनने को नहीं मिला तो उसने सैटिन के पैजामे और कुरता पहनने की सोची. देखने से ही पता चल रहा था कि वो लड़कियों का है. पर उसके पास फिलहाल वोही चीज़ थी जो लडको के कपडे के सबसे करीब थी क्योंकि उसमे पैजामा था. बाहर दूधवाला इंतज़ार में उतावला हो रहा था.

सुमति ने सोचा कि वो दरवाज़ा इतना ही खोलेगी कि वो दूध का पैकेट ले सके. इससे दूधवाला उसे देख नहीं सकेगा. वो दरवाजे तक गयी. उसके दिल की धड़कने बढ़ चुक्की थी. किसी तरह हिम्मत करके उसने थोडा सा दरवाज़ा खोला और अपने हाथ बाहर निकाली. इस उम्मीद में कि दूधवाला उसे हाथ में पैकेट थमा देगा. पर सुमति के हाथो पर सैटिन कुर्ते की लम्बी बाँहें बेहद ही फेमिनिन थी और उसके किनारे पर बहुत सुन्दर सी लेस की डिजाईन थी. सुमति ने अपने हाथो को आज सुबह से पहली बार देखा था. वो बेहद ही नाज़ुक और फेमिनिन प्रतीत हो रहे थे. “अच्छा हुआ मैडम जो आप जाग गयी. मैं पैकेट ऐसे ही दरवाज़े पर छोड़ कर नहीं जाना चाहता था. पता नहीं कब कौन चोरी कर ले जाता. खैर मैडम, आपकी शादी की तयारी कैसे चल रही है? कब जा रही है आप अपने गाँव शादी के लिए?”, दूधवाला सुमति से यों बातें कर रहा था जैसे वो हमेशा से ही सुमति को मैडम के रूप में जानता हो.

सुमति को कुछ तो जवाब देना था. “हाँ, शादी की तैयारी अच्छी चल रही है.”, सुमति का गला रुंधा हुआ था. उसके गले से आवाज़ साफ़ नहीं आ रही थी.. न तो वो आवाज़ औरत की तरह थी और न ही मर्दों की तरह. “अच्छा मैडम, आपको देख कर लग रहा है कि आपका गला ख़राब हो गया. ठण्ड में ज़रा तबियत का ख्याल रखियेगा. आप अपनी शादी के दिन बीमार न पड़ जाए जब पूरी दुनिया आपको सुन्दर दुल्हन के रूप में देखने आएगी.”, दूधवाले ने कहा.

सुमति को लगा कि ये दूधवाला कुछ ज्यादा ही मेरी ज़िन्दगी में इंटरेस्ट ले रहा है. “पर ये मुझे मैडम क्यों कह रहा है? वो ये क्यों कह रहा है कि दुनिया मुझे दुल्हन के रूप में देखने आएगी? मैं एक आदमी हूँ और मेरी शादी लड़की से हो रही है.”, सुमति मन ही मन पागल हो रही थी. उसने झट से दरवाज़ा बंद किया और एक बार फिर उसके सर में तेज़ चुभता हुआ दर्द हुआ जो कुछ सेकंड के लिए रहा. उसका दिमाग उसके साथ खेल खेल रहा था.


अन्वेषा के सर का दर्द करीब ५ मिनट रहा और आखिर में कम हो गया. उसे आखिर अब समझ आ रहा था कि उसके आस पास क्या हो रहा है. उसने धीरे से साशा के स्तनों को मसल कर देखा जो उसे हाथ में थे. वो अपनी थ्योरी चेक करना चाहती थी जो ये समझा सकेगी कि उसके आस पास ये हो क्या रहा है. साशा के स्तन सचमुच में असली थे. साशा ने बड़ी ही कामुक सी आवाज़ निकाली जब अन्वेषा ने उसके स्तनों को दबाया. “सोने दो न मुझे..”, साशा ने बंद आँखों से कहा. “नहीं… यह नहीं हो सकता. पर यह सब सच है.”, अन्वेषा का अंदाजा सही निकला. उसने अपना फ़ोन दुसरे खाली हाथ से निकाला और उस पर कुछ देखने लगी.


इधर सुमति का दिमाग उसे विचित्र तसवीरें दिखा रहा था. उसे ऐसा याद आ रहा था कि वो रोज़ सुबह दूधवाले से एक औरत के रूप में ही दूध लेती रही है. पर ये सच नहीं था क्योंकि उसे याद है कि वो हमेशा आदमी के रूप में ही दूधवाले के सामने जाती थी. पर उसका दिमाग उसे ये बता रहा था कि उसने दूधवाले से सुमति के रूप में अपनी शादी की बात की थी. वो तसवीरें ज़रा धुंधली थी पर उसके दिमाग को बेचैन कर रही थी. “क्या दूधवाले को पता है कि मैं क्रॉसड्रेसर हूँ? क्या उसने सचमुच मुझे सुमति के रूप में देखा है?” सुमति के दिमाग में ऐसे अनगिनत सवाल उठ खड़े हुए. क्या सुमति पागल हो रही थी? ट्रिंग ट्रिंग… उसका मोबाइल फ़ोन तभी उसके बेडरूम में बज उठा. “अब क्या? कौन इतनी सुबह कॉल कर रहा होगा? भगवान.. मुझे पागल न बनाओ!”, सुमति सोच में पड़ गयी.


अन्वेषा ने साशा के ब्लाउज से हाथ निकालने की कोशिश की. वो बहुत धीरे धीरे हाथ हटाने लगी. और न चाहते हुए भी उसके हाथ साशा के स्तनों को छूने लगे. और उसके स्पर्श से साशा की नींद खुल गयी. वो थोड़ी सी झुंझला गयी थी क्योंकि उसे उसकी नींद से जगा दिया गया. शायद खूब सारी शराब का भी असर था कि वो और भी सोना चाहती थी. वो तुरंत पलट कर अन्वेषा पर चीख कर गुस्सा निकालने को तैयार थी. पर उस १ सेकंड में पलटते वक़्त उसे कुछ एहसास हुआ जो उसे एक सदमे की तरह लगा. पलटते हुए उसे सीने पर अपने स्तनों का भार महसूस हुआ. उसने निचे देखा तो उसके ब्लाउज के अन्दर उसके बड़े स्तन थे. उसका मुंह खुला का खुला रह गया. वो शॉक में चीखने ही वाली थी, पर अन्वेषा ने तुरंत ही उसके मुंह पर हाथ जोर से रख कर उसे रोक लिया. अन्वेषा जानती थी कि वहां क्या हो रहा है.

अन्वेषा ने अपने होंठो पर एक ऊँगली रख कर साशा को शांत होने का इशारा किया. “प्लीज़ शांत रहो और जल्दी से तैयार हो जाओ. हमें यहाँ से तुरंत निकलना होगा. मैंने एक ओला कैब मंगवा ली है.”, अन्वेषा ने धीरे से साशा से कहा. साशा न जाने कहीं खो गयी थी. “पर… पर मेरी साड़ी कहाँ है? और मेरे … मेरे.. सीने पे ये..”

“शश्श्… मैं सब समझा दूँगी. बस तुम धीमी आवाज़ में बात करो.” पर साशा का चेहरा शॉक से सफ़ेद सा हो गया था. ऐसा लगने लगा जैसे वो बस रोने ही वाली है. पर अन्वेषा ने उसे रोने न दिया. उसने तुरंत साशा की साड़ी ढूंढी और उसे धीरे से कहा, “अब जल्दी से इसे पहन लो.”. “मगर… मैंने तुम्हे बताया था मुझे साड़ी पहननी नहीं आती.”, साशा ने लगभग रोते हुआ कहा. उसकी आवाज़ काँप रही थी. “हमारे पास और कोई रास्ता नहीं है साशा. तुम्हे किसी तरह साड़ी पहननी होगी.”, अन्वेषा ने कहा.

साशा को अब किसी तरह खुद से साड़ी पहननी पड़ी. उसकी मदद के लिए वहां कोई नहीं था.

साशा ने इधर उधर देखा. सोहा, साशा की सहेली, उस रूम के दुसरे कोने में एक सोफे पर सोयी पड़ी थी. वो स्कर्ट तो पहनी हुई थी पर वो टॉपलेस थी. उसके स्तन खुले दिख रहे थे और उनमे बड़े डार्क निप्पल भी साफ़ दिख रहे थे. “चलो सोहा को जगाये.”, साशा ने अन्वेषा से कहा. साशा की आँखों में अब आंसू भर चुके थे. “नहीं!!! रुको!”, अन्वेषा ने साशा को रोका. “ये तुम्हारे लिए ही अच्छा होगा साशा. हम दोनों को तुरंत यहाँ से निकलना होगा बिना किसी को जगाये. अब समय व्यर्थ मत करो. जल्दी से अपनी साड़ी पहन लो इसके पहले की कोई जाग जाए.” अन्वेषा की बात सुनकर साशा चुपचाप कांपते हुए साड़ी पहनने लगी. उसे सचमुच साड़ी पहनना नहीं आता था… और फिर सैटिन की साड़ी भी तो फिसलती जा रही थी कि उसकी प्लेट बनाना और मुश्किल था. किसी तरह अपनी चूड़ियों में लगी हुई सेफ्टी पिन का उपयोग कर उसने साड़ी को किसी तरह पहनी. अन्वेषा उसकी मदद कर रही थी पर उसे भी साड़ी पहनने का कोई अनुभव नहीं था.


सुमति ने अपने पैजामे को उतारा. अब वो वापस अपनी नाइटी में थी. जीवन में पहली बार आज उसे औरतों वाले कपड़ो पे गुस्सा आ रहा था. बहुत नर्वस थी वो. उसका फ़ोन अब भी बज रहा था पर वो जवाब नहीं देना चाहती थी. फ़ोन की घंटी कुछ देर बाद रुक गयी. सुमति अब भी समझने की कोशिश कर रही थी कि ये सब क्या हो रहा है. बिना ये समझे वो किसी से मिलना या बात करना नहीं चाहती थी.

वो न जाने कबसे बाथरूम जाना चाहता थी. पर वो उसे रोके हुई थी क्योंकि वो घबरायी हुई थी कि कहीं उसका अपना निचला शरीर भी तो बदल न गया हो. पर अब जब उससे रहा न गया तो वो बाथरूम चली ही गयी. पहुचते ही उसने अपनी नाइटी उठायी ताकि वो अपनी पेंटी उतार सके. उसने अपनी पेंटी की ओर देखा तो उसकी सतह बिलकुल सपाट लग रही थी जैसे वहां कुछ न हो. उसका पुरुष अंग भी जा चूका था. उसने आँखें बंद की, और पेंटी उतार कर टॉयलेट सीट पर बैठ गयी… और वो करने लगी जो उसे करना था. वो रोने लगी. वो अब पूरी तरह औरत बन चुकी थी.


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साशा कल सचमुच बहुत सुन्दर लग रही थी. पर इस सुबह ने उसे झकझोर के रख दिया था.

अन्वेषा और साशा अब ओला कैब में बैठ चुकी थी. वो दोनों अन्वेषा के घर की ओर बढ़ रहे थे. साशा को अभी अभी सर में वही चुभता दर्द हुआ था जो अन्वेषा और सुमति सुबह से महसूस कर रही थी. साशा बेहद कंफ्यूज लग रही थी. उसके आँखों में आंसू थे. उसने अन्वेषा की ओर देखी और बोली, “मेरे दिमाग में कल रात की पार्टी की अजीब अजीब सी यादें आ रही है. पर मैं कुछ समझ नहीं पा रही हूँ. कल रात को क्या हुआ था?” अन्वेषा ने साशा की ओर देखा और उसके आँखों से आंसू पोंछते हुए बोली, “एक बार हम मेरे घर पहुच जाए मैं तुम्हे सब समझा दूँगी.” साशा ने अपना सर अन्वेषा के कंधो पर रख दिया और उसकी बांहों में धीरे धीरे सिसकने लगी.


सुमति का फ़ोन एक बार फिर से बजने लगा. उसने फ़ोन चेक किया तो दिखा कि उसकी माँ का कॉल था. उसने अपने आंसू पोंछे और हिम्मत करके जवाब देने के लिए तैयार हुई. “हेल्लो माँ”, सुमति ने कहा.

“हेल्लो, बेटा. कब से तेरी आवाज़ सुनने को तरस गयी थी मैं. तेरी आवाज़ सुनकर इस माँ के दिल को ठंडक मिल गयी अब.”, सुमति की माँ ने कहा. सुमति भी ये सुनकर थोड़ी भावुक और खुश हो गयी. क्योंकि सुमति की माँ ने उसे बेटा कहकर पुकारी. बेटा जो न जाने कैसे अब औरत के तन में था. “हाँ माँ. मुझे भी तुम्हारी आवाज़ सुनकर बहुत अच्छा लग रहा है.”, सुमति बोली. उसका गला अब भी रुंधा हुआ था. शायद उसका गला बैठ गया था.

“बेटा, तुम्हारा गला ख़राब है? शादी के कुछ दिन पहले गला खराब होना अच्छा लक्षण नहीं है. पता है न तुझे?”, सुमति की माँ ने कहा.

“हां माँ. चिंता न करो मुझे अपना ध्यान रखना आता है.”, सुमति बोली.

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सुमति ने आखिर हिम्मत करके अपनी माँ के फोन का जवाब दिया. वो आज किसी से भी बात नहीं करना चाहती थी.

“चल हट पगली. इतना काम करती है और फिर अपना ध्यान कहाँ रख सकेगी तू. तू जल्दी से अपने ऑफिस से छुट्टी ले ले और शादी के कम से कम १५ दिन पहले घर आजा बेटा. मेरी आखिर १ ही तो बेटी है. उसकी शादी की तैयारी तो उसी के साथ मिलकर करूंगी न?” सुमति की माँ ने ऐसे कहा जैसे वो अपनी बेटी से बात कर रही हो.

“बेटी?” सुमति अब और दुविधा में थी. उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था. क्या पूरी दुनिया के लिए अब वो औरत बन गयी है?

“ये क्या कह …”, सुमति ने जवाब देना चाहा पर उसके गले ने साथ न दिया. वो और खराश महसूस कर रही थी. “ये क्या कह रही हो माँ?”, सुमति की आवाज़ खूब कोशिश के बाद आखिर वापस आ ही गयी. पर अब आवाज़ न तो रुंधी हुई थी, न गले में कोई खराश थी… बल्कि यह आवाज़ बेहद सुरीली एक लड़की की आवाज़ थी. सुमति तो अब उसकी माँ की नजरो में भी बेटी थी!

इंडियन लेडीज़ क्लब: भाग ५

दोस्ती, यारी, सहेलियों का प्यार और औरतों की आपस में जलन, हर तरह के जज्बातों से भरी वो लेडीज़ क्लब की रात जल्दी ही इस दिशा में बढ़ने वाली थी जिसका वहां किसी को अंदेशा तक नहीं था.


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“लहंगे में कितनी सुन्दर लग रही है वो. हैं न?”, ईशा के इस सवाल से सुमति का ध्यान टुटा. न जाने कहाँ खोयी हुई थी वो. अब तक तो वो चुपचाप अन्वेषा को अपने नए रूप में बलखाते देख रही थी. अन्वेषा एक दुल्हन की तरह शालीनता से चल रही थी, धीरे से अपने लहंगे को ज़रा ऊपर उठा कर, थोड़ी घबरायी हुई कि कहीं खुद अपने लहंगे पर ही कदम न रख दे. पर इतने बड़े घेर वाले उस महंगे सुन्दर लहंगे में तो वो अपने पैर तक नहीं देख पा रही थी. आज के पहले तो वो कभी हील वाली सैंडल तक नहीं पहनी थी, इसलिए अंजलि उसका एक हाथ थाम कर साथ दे रही थी ताकि गलती से वो गिर न जाए. “उसका मेकअप भी अच्छा हुआ है. क्या कहती हो सुमति?”, ईशा ने फिर पूछा. “हाँ. वो तो होना ही था. आखिर तुम जो थी मेकअप के लिए!”, सुमति ने एक छोटी सी मुस्कान के साथ ईशा की ओर देखा.

“चल झूठी कहीं की. दिल से तारीफ़ करो तो मानू मैं”, ईशा ने कहा. “मैं देख रही हूँ कि कोई तो बात है जो तुझे परेशान कर रही है. क्या ये उसी खबर को लेकर है? सब ठीक होगा… तू यूँ ही चिंता कर रही है.”, ईशा की बात सुन सुमति थोड़ी आश्चर्य में थी कि उसे कैसे पता चला उस खबर के बारे में. उसने निचे थोड़ी उदासी के साथ देखा. नर्वस होकर वो अपने साड़ी के आँचल को अपनी उँगलियों में गोल गोल लपेट रही थी. पर ईशा ने सुमति का चेहरा उठाया और उससे कहा, “पगली. यह तो ख़ुशी की खबर है फिर चिंता कैसे?” सुमति थोड़ी भावुक हो गयी थी. उसने ईशा को गले लगा लिया और ईशा के कंधे पर सर रख कर बोली, “सब ठीक होगा न?” तो ईशा ने अपने हाथो से सुमति के बालों पर फेरते हुआ कहा, “हाँ. ज़रूर.”

अन्वेषा, अपने नए रूप में बेहद खुश थी और ख़ुशी के मारे वो नाच रही थी. और उसका लहँगा किसी फुल की भाँती खिल उठा था. जब आसपास आपके सभी औरतें हो और आप उनके बीच सबसे सुन्दर औरत हो, तो कौन खुश नहीं होगी?

कमरे के दुसरे कोने में अन्वेषा अब अपनी ऊँची हील की सैंडल पहनकर चलने में थोडा ज्यादा सहज महसूस कर रही थी. “छम छम”, उसकी पायल की मधुर आवाज़ पूरे कमरे में गूंज रही थी. ख़ुशी के मारे अब वो थोडा तेज़ भी चल रही थी, हँस रही थी और अपने आसपास की औरतों से भी ख़ुशी से बात कर रही थी जो उसे उसकी खूबसूरती पे कॉम्प्लीमेंट कर रही थी. सबसे मिलकर वो भी इस क्लब का हिस्सा बन रही थी, जान रही थी कि कौन उसकी सहेली बन सकती है. और इन सब के बीच अंजलि भी अन्वेषा का साथ देते हुए उसके साथ चल रही थी. पता नहीं कौन औरत थी वो जिसने अन्वेषा को चैलेंज किया कि वो अपनी इस खुबसूरत सी लहँगा चोली में नाच कर दिखाए और अन्वेषा भी जोश में आकर मान गयी. और अंजलि से हाथ छुड़ाकर वो अपनी राजकुमारी से लिबास में गोल गोल घुमने लगी. पहले तो अपने हाथो से अपने लहंगे को पकड़ और थोडा ऊपर उठाकर धीरे धीरे, आखिर उस फूलों सी लगने वाली अन्वेषा के नाज़ुक हांथो के लिए लहंगा बहुत भारी जो था. पर फिर जल्दी ही उसने ख़ुशी से अपनी बाँहें खो फैला ली और अपने सर को ऊपर उठाकर तेज़ी से गोल गोल घुमने लगी. उसका लहंगा धीरे धीरे ऊपर उठता गया, और उसका घेर बढ़ता गया मानो जैसे एक कलि खिल कर फुल बन रही हो. उसके चेहरे की ख़ुशी सभी को खुश कर रही थी. अन्वेषा अब फुल बन चुकी थी.

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ईशा ने अन्वेषा को अपने साथ सोफे पर ले जाकर बैठाया और वो देखने लगी की कहीं अन्वेषा को मोच तो नहीं आ गयी.

पर आप में चाहे जितना भी जोश हो, यदि आपके पास हील पहनकर चलने का अनुभव न हो तो आपको सावधानी बरतनी ही चाहिए. और अचानक ही उस राजकुमारी की एडी मुड़ गयी और वो लचक खाकर निचे गिर पड़ी. “सत्यानाश! यह आजकल की कॉलेज की लडकिया भी न… ज़रा सा इंतज़ार नहीं कर सकती!”, ईशा ने कहा और तुरंत अन्वेषा की ओर दौड़ पड़ी उसे उठाने के लिए. अंजलि तो थोड़ी चिंतित थी कि कहीं अन्वेषा को मोच न आ गयी हो. एक बड़ी बहन की तरह वो भी दौड़ पड़ी और कहने लगी, “इसलिए मैं कह रही थी कि मेरे साथ धीरे धीरे चलो. अब लग गयी न चोट.. पैरो में मोच तो नहीं आई?” पर अन्वेषा कहाँ सुनने वाली थी? वो तो अब भी हँस रही थी. ईशा और अंजलि ने उसे तुरंत उठाया और एक सोफे पर ले जाकर बिठाया और दोनों औरतें अन्वेषा के पैरो को पकड़ देखने लगी कि कहीं चोट तो नहीं आई है. दोनों औरतें भी कितनी ख्याल रखने वाली थी. पुरुष के रूप में वो चाहे जैसे भी रही हो, पर एक बार साड़ी पहन ले, तो उन औरतों से ज्यादा ख्याल रखने वाली कोई न हो इस दुनिया में. साड़ी का भी कितना प्यारा असर होता है पहनने वाली के मन पर! फिर भी कुछ औरतें ऐसी भी थी जिन्हें अन्वेषा के गिरने से कुछ फर्क न पड़ा… उन्हें तो जैसे अपने अन्दर की जलन निकालने का मौका मिल गया था. इंडियन लेडीज़ क्लब में आखिर सभी तरह की औरतें थी, जिनमे से कुछ ईर्ष्यालु औरतें भी थी.

मधु, जो की इस क्लब में माँ की तरह थी, वो आगे आई और बोली, “लेडीज़! क्या यार कब तक मुझ बेचारी को भूखा रखोगी. चलो जल्दी से आगे का प्रोग्राम करते है… मेरे पेट में तो चूहे कूद रहे है. अन्वेषा चलो आओ इधर.” मधु ने अन्वेषा को बुलाया जो अब मन ही मन थोडा शर्मा रही थी अपनी नाचने की बेवकूफी को लेकर. किसी तरह अपने पैरो पर खड़ी होकर अंजलि के सहयोग से वो चलकर मधु के पास आई.

“देखो अन्वेषा. अब इस रात की बस एक चीज़ और रह गयी है. तुम्हारे पास ये मौका है कि तुम्हारी कोई ख्वाहिश हो जो हम औरतें आज पूरी कर सके तो बेझिझक बोल दो. हम लोग पूरी कोशिश करेंगे तुम्हारी इच्छा पूरी करने की.”, मधु ने अन्वेषा से कहा. अन्वेषा को कुछ समझ न आया. आखिर इतना सब कुछ तो उसके लिए क्लब ने पहले ही किया है… जो उसने कभी सपनो में भी नहीं सोचा था. अब आखिर वो और क्या मांग सकती थी भला? थोड़ी नर्वस होकर उसने लडखडाती जबान से कहा, “मेरी इच्छा…. मैं चाहती हूँ की सभी औरतें…” बेचारी मधु जैसी मुखर और बड़ी सी औरत के सामने कुछ बोल न पा रही थी.”मैं चाहती हूँ की सभी औरतें एक बड़ा सा गोल घेरा बनाकर ज़मीन पर बैठ जाए” यह कैसी ख्वाहिश है, मधु तो सोच में पड़ गई. पर अब यह ख्वाहिश पूरी तो करनी थी. “लेडीज़ तुम सबने सुन लिया अन्वेषा क्या चाहती है… तो चलो सब गोला बनाकर बैठ जाओ.”, मधु ने जोर से सभी से कहा.

वैसे तो वो कमरा बड़ा था फिर भी इतनी सारी औरतों के लिए गोल घेरा बनाना थोडा मुश्किल काम था. और फिर निचे बैठना… इतने फैंसी कपडे पहनकर? मज़ाक थोड़ी है. यदि आपने कभी साड़ी पहनी हो तो आपको तो पता होगा कि कैसे आपको पहले जगह बनानी पड़ती है कि आप अपने पैरो को पेटीकोट के अन्दर मोड़ कर ऐसे बैठ सके कि आपकी साड़ी ख़राब न हो और उसकी प्लेट अच्छी तरह बनी रहे… और फिर पल्लू को भी तो संभाल कर फैलाना होता है. कभी कोशिश करियेगा… आसान नहीं होता है साड़ी पहन कर निचे बैठना.. और वो भी भारी साड़ियाँ! और यदि आपने टाइट चूड़ीदार पहना हो तो फिर आपके पास एक ही तरीका है कि दोनों पैरो को एक ओर मोड़ कर ही आप बैठ सकती है. पालती मारने की कोशिश भी न करना टाइट चूड़ीदार में! और फिर जो भी पहनी हो आप, एक औरत को बैठ कर अच्छी दिखने के लिए अपनी कमर सीधी रखनी होती है… वो और भी कठिन होता है. इसके अलावा छोटी स्कर्ट पहनकर बैठना थोडा आसान है पर वो भी तब जब आपने टाइट स्कर्ट न पहनी हो. और फिर इन सबके अलावा आपको अपनी बड़ी सी पर्स और सैंडल के लिए भी जगह बनानी होती है! इस क्लब के लेडीज़ असली औरतों की तरफ फ्लेक्सिबल तो थी नहीं कि जैसे चाहे आराम से मुड़ जाए. उन सब औरतों को निचे बैठने देना का सीन भी बड़ा मजेदार हो गया था. “उई… माँ! मेरी कमर.. कोई ज़रा सहारा तो दो!”, मधु ने सबसे पहले कहा जब वो धम्म से अपने बड़े से कुलहो पर निचे गिर पड़ी. अंजलि और सुमति तो देखकर ही हँस हँस कर लोटपोट हो रही थी. फिर भी किसी तरह सब निचे बैठ पायी. “अब आगे क्या करना है?”, अंजलि ने अन्वेषा से पूछा.

“अब मैं चाहती हूँ कि आप सब अपनी आँखें बंद करे और अपनी अगल बगल की औरतों का हाथ पकड़ कर चेन बनाये.. और अपने मन को शांत करे”, अन्वेषा ने कहा. पर जब कोई कहता है कि अपने मन को शांत करे तो इस क्लब की औरतों के मन में ये सब चल रहा था… “यार यह ब्रा स्ट्रेप बाहर निकल कर चुभ रहा है. मुझे ब्रा को थोड़ी ढीली पहनना चाहिए था.”, “हाय… मेरे बूब्स फिसल रहे है. आगे से कभी भारी बूब्स नहीं पहनूंगी. मेरी तो कमर में दर्द हो गया.”, “मुझे मेरे पैर फैलाने को जगह चाहिए. यह बगल वाली मोटी ने सारी जगह घेर ली.”, “आज कितनी सुन्दर लग रही हूँ मैं? शायद इस कमरे में आज मुझसे खुबसूरत कोई नहीं होगा.”, “यह क्या नाटक कर रहे है हम लोग?”, “एक दिन मैं भी अन्वेषा का लहंगा ट्राई करूंगी.”, “क्या आज मैं अपने दिल की बात उससे कह दू. क्या कहेगी वो?”, “अंजलि उस साड़ी में कितनी सेक्सी लग रही है. काश वो मेरी बीवी होती.”, “क्या कोई मेरी पीठ में चिकोटी कांट रहा है?”, “हे भगवान मुझे तो बड़ी हँसी आ रही है और यहाँ सबको चुप रहना है.”, “मुझे भूख लगी है.”, और न जाने क्या क्या सोच रही थी वो सब औरतें. जितनी औरतें उससे कहीं ज्यादा विचार!

जब सभी औरतें किसी तरह बैठ गयी तो अन्वेषा ने कहा, “इस क्लब की सभी औरतों को सबसे पहले मैं धन्यवाद् देना चाहती हूँ. क्योंकि आपकी वजह से मुझे इस ख़ास रात को अनुभव करने का मौका मिला. मैं आपमें से अधिक लोगो को तो नहीं जानती पर आप सबने मिलकर मुझे यह यादगार अनुभव दिया. मैं आप सभी के लिए कुछ कर तो नहीं सकती पर आज मैं आप सभी के लिए भगवान से ख़ास प्रार्थना करूंगी.” उसने अपनी बातों से सबका ध्यान अपनी तरफ खिंच लिया. “मैं भगवान और दुर्गा माँ से प्रार्थना करती हूँ कि वो यहाँ सभी के औरत का जीवन जीने के सपने को साकार करे. हमें ऐसा जीवन दे कि हमें किसी से छुप कर यूँ तैयार न होना पड़े. मैं प्रार्थना करती हूँ कि ये सोसाइटी हमें इसी जीवन में हमें हमारे रूप में स्वीकार करे. मैं चाहती हूँ कि हम ऐसे समाज में रहे जहाँ हम जब चाहे औरत बन सके और यह समाज हमें औरत के रूप में स्वीकार करे. मैं प्रार्थना करती हूँ कि हम सभी को ऐसे जीवनसाथी मिले जो हमारे अन्दर की औरत को भी स्वीकार करे.”

बहुत ही सोची समझी प्रार्थना थी अन्वेषा की. काश कि यह सच हो जाए तो कितना अच्छा होगा. इस प्रार्थना को सुनकर सब शान्ति से एक दुसरे का हाथ पकडे बैठी रही. कुछ सोच रही थी कि प्रार्थना तो अच्छी है पर ऐसी प्रार्थना का क्या फायदा. हमारे आसपास के लोगो की सोच एक रात में तो बदल नहीं जायेगी. पर फिर भी इस प्रार्थना ने सुमति और वहां बैठी बहुत सी औरतों के दिल को छू लिया. फिर थोड़ी देर बाद सभी औरतें अपनी जगह से उठ गयी. अब खाने का समय हो गया था. और सबकी सब दावत के मज़े लेने के लिए तैयार थी.

खाते वक़्त अन्वेषा ने मौके का फायदा उठा कर नयी जान पहचान और सहेलियां बनाना शुरू कर दी थी. वो दो लड़कियों के पास गयी जो देखने में उसकी हम-उम्र लगती थी. “हेल्लो अन्वेषा! कैसा लग रहा है राजकुमारी बन कर?”, उनमे से एक ने अन्वेषा से पूछा. “हम्म… बता नहीं सकती. ये सब सपने की तरह लग रहा है. थोड़ी सी तकलीफ हो रही है इस भारी से लहंगे को उठाकर चलने में… पर फिर भी बड़ा मज़ा आ रहा है.”, अन्वेषा ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया. “मैं समझ सकती हूँ तुम्हारे दिल की बात. मुझे भी अपनी यहाँ की पहली रात अच्छी तरह से याद है. वैसे इनसे मिलो… ये मेरी अच्छी सहेली सोहा है. और मेरा नाम तो बताना ही भूल गयी मैं! मैं साशा हूँ.”, हलकी गुलाबी रंग की सैटिन की साड़ी पहनी उस लड़की ने अपना और अपनी सहेली का परिचय अन्वेषा को दिया.

अन्वेषा बढ़ कर साशा और सोहा के पास गयी जो देखने में उसकी हम-उम्र मालूम पड़ती थी. साशा एक मॉडर्न तरीके से हलकी गुलाबी साड़ी पहनी हुई थी, जबकि सोहा सफ़ेद स्कर्ट और ऊँची हील में थी.

“तुम दोनों से मिलकर बहुत अच्छा लगा. वैसे साशा कितनी सुन्दर साड़ी है तुम्हारी यार. इतनी सेक्सी ब्लाउज के साथ इसको पहनने का तरीका भी बड़ा सेक्सी और मॉडर्न है. लगता है कि तुम साड़ी पहनने में एक्सपर्ट हो!”, अन्वेषा ने साशा की साड़ी के पल्लू को छूते हुए कहा. साशा सचमुच बहुत सुन्दर लग रही थी. फैंसी सैटिन की साड़ी और साथ में हाल्टर नैक ब्लाउज… उस पर खूब फब रहा था. “अरे कहाँ यार? मुझे तो साड़ी पहनना बिलकुल भी नहीं आता. वो तो यहाँ शर्मीला आंटी ने मेरी मदद की थी. वोही आंटी जिन्होंने तुम्हारा दुपट्टा तुम्हे पहनाया आज. देखना आगे से तुम भी उनकी मदद लोगी. बहुत प्यारी है वो. एक दिन वो मुझे खुद टेलर के पास ले जाकर मेरे लिए हाल्टर टॉप स्टाइल का ब्लाउज सिलवाई थी. मुझसे कहती है वो कि मेरी जैसी जवान लड़कियों की उम्र है अभी कि हम मॉडर्न ब्लाउज पहने. पुराने स्टाइल के ब्लाउज पहनने को तो पूरी उम्र बाकी है!”, साशा कहते कहते खिलखिलाने लगी. इस क्लब की लेडीज़ भी कितनी मिलनसार थी. सब एक दुसरे की मदद करते हुए एक औरत के रूप में परिपक्व हो रही थी.

“हा हा.. सच ही तो कहा है आंटी ने. जो भी तुम माल लग रही हो! मुझे तो तुम्हारी बम पे पिंच करने का जी चाह रहा है!”, अन्वेषा ने साशा को छेड़ते हुए कहा. और फिर वो सोहा की ओर पलट कर मुस्कुराने लगी. सोहा ने लम्बी स्लीव का नीले रंग का टॉप पहना था और साथ में एक सफ़ेद रंग की स्कर्ट… और मैच करती हुई सैंडल. “वाओ सोहा… ४ इंच की हील्स! मैं तो ऐसा कुछ पहनने का सोच भी नहीं सकती. आज तो १ इंच की हील में ही गिर गयी मैं. बड़ी शर्म आ रही थी उस वक़्त मुझे.”, अन्वेषा ने फिर सोहा से कहा.

“अरे इतनी जल्दी क्या है अन्वेषा. तुम भी सिख जाओगी.. ज्यादा समय नहीं लगता. बस थोड़ी सी प्रैक्टिस और फिर तुम भी हील्स में दौड़ने लगोगी..”, सोहा ने कहा. “दौड़ना..? न बाबा न … मैं तो थोडा तेज़ चल लूं उतना ही काफी है.”, अन्वेषा बोली. “वैसे अन्वेषा… तुमने लहंगा चुनकर बहुत अच्छा की. तुम पर बहुत जंच रहा है ये रंग. तुमको आज लहंगा पहनकर गोल गोल घूमते नाचते देख कर बहुत अच्छा लगा. तुम्हे न किसी गाने पे प्रैक्टिस करके यहाँ हम सबके सामने कभी डांस करना चाहिए!”, सोहा ने फिर कहा. “आईडिया तो अच्छा है.. पर पता नहीं मैं लहंगा दुबारा कब पहनूंगी. सच बताऊँ तो मैं स्कर्ट पहनने वाली लड़की हूँ. टाइट सेक्सी छोटी स्कर्ट… जो सबका ध्यान खींचे!!!”, अन्वेषा हँसते हुए बोली. उसके कंगन और चूड़ियों की खनक और उसकी हँसी सचमुच बड़ी मोहक थी.

“ओहो… क्या बात है. किसका ध्यान खींचना चाहती हो मैडम? यहाँ पर तो सब औरतें है! कोई आदमी नहीं है..”, साशा ने कहा और तीनो जोर जोर से हँसने लगी. तीनो लड़कियों के बीच जल्दी ही दोस्ती की शुरुआत हो चुकी थी. सोहा ने फिर दोनों से कहा कि कुछ खाना खा लिया जाए. और तीनो खाने की तरफ एक साथ चल पड़ी… एक नयी दोस्ती की शुरुआत थी यह. उसी तरह जैसे अंजलि, सुमति और मधु की दोस्ती थी.

रात आगे बढती रही. अन्वेषा के पास बहुत सी औरतें आई और उसका क्लब में स्वागत किया. सभी ने उसके रूप की तारीफ़ की. समय तेज़ी से गुज़र रहा था… और इन औरतों के पास कहने को बहुत कुछ था पर समय कम था. वो एक दुसरे की साड़ियाँ, मेकअप और ड्रेसेज की तारीफ़ करते करते थक नहीं रही थी. कोई किसी के सुन्दर हार के बारे में बात कर रही थी.. तो कोई इस बारे में कि कैसे मंगलसूत्र हम भारतीय औरतों की खूबसूरती बढ़ा देता है. कोई अपनी नयी पायल दिखा रही थी.. तो कोई अपनी सहेलियों के साथ बातें कर रही थी. कोई अपनी नयी हेयर स्टाइल दिखा रही थी. कोई बता रही थी कि ब्रेस्टफॉर्म पहनकर कैसे उनका जीवन ही बदल गया.. नर्म मुलायम.. उम्म्म… कोई बता रही थी कि उसने कैसे अपनी cd के बारे में अपनी गर्लफ्रेंड को बताया और उसने उसे स्वीकार कर लिया. कुछ औरतें पक्की औरतों की तरह रेसिपी डीसकस कर रही थी तो कोई अपनी फिगर की चिंता. कोई उन्हें उपाय दे रही थी कि कैसे पेट पतला किया जाए. तो कुछ औरतें इस क्लब के प्रोग्राम के बाद रात को कहाँ पार्टी करना है इसकी प्लानिंग कर रही थी. इस क्लब में करने को कितना कुछ था. कोई भी औरत वहां बोर नहीं हो सकती थी!

पर अब क्लब के प्रोग्राम के ख़त्म होने का समय आ गया था. ऐसा लग रहा था जैसे रात तो अभी ही शुरू हुई थी. अभी भी इन औरतों को कितनी बातें करना बाकी थी. एक बार फिर मधु जी सेण्टर में आकर हाथो से ताली बजाकर सबका ध्यान अपनी ओर खींचने लगी. वो कुछ कहने वाली थी. मधु ने अपने लम्बे पल्लू को सामने लाकर अपनी कमर में लपेटा और फिर कहने लगी, “लेडीज़! मुझे उम्मीद है कि आप सबको बहुत मज़ा आया होगा आज. पर अब रात को ख़त्म करने का समय आ गया है. पर मुझे आप सबसे एक ख़ुशी की खबर शेयर करनी है.” मधुरिमा ने फिर मुस्कुराते हुए सुमति की ओर देखा और बोली, “तुम सबको तो पता ही है कि मेरी सबसे प्यारी बेटी सुमति इतने सालो से अपने इस घर में इंडियन लेडीज़ क्लब चला रही है. तो सबसे पहले सुमति को धन्यवाद देने के लिए जोर से तालियाँ. आखिर वो इतने सालो से इतनी मेहनत करती आ रही है ताकि हम सभी को ऐसी जगह मिल सके जहाँ हम सब अपने सपने पूरे कर सके. और साथ ही अंजलि को भी थैंक यू जो जल्दी आकर आज की तैयारियों में सुमति का हाथ बंटा रही थी. और फिर ईशा, शर्मीला, और अनीता को भी धन्यवाद जिन्होंने आज अन्वेषा का रूपांतरण किया.” यह हर बार की तरह क्लब की तैयारी करने वाली औरतों को धन्यवाद देने वाला मेसेज था. और हमेशा की तरह सबने ख़ुशी से जोर से तालियाँ बजाई.

“और अब सबसे बड़ी खबर! मेरी बेटी, सुमति की शादी हो रही है! एक माँ होने के नाते मुझे कितनी ख़ुशी है मैं बता नहीं सकती. पर साथ ही मैं बहुत भावुक भी हूँ आज. मेरी बेटी का घर बसने जा रहा है और एक महीने में वो एक सुहागन होगी. काश मेरे पास और समय होता जो मैं उसको अच्छी पत्नी और अच्छी बहु होने के बारे में कुछ सिखा पाती ताकि वो ससुराल में मेरा नाम न डूबा दे! पर अब क्या कर सकती हूँ मैं…. जितना सिखा सकती थी सिखा दी… “, मधु का अपना ड्रामा फिर शुरू हो गया था. उसने एक बार फिर सुमति की ओर देखा. मधु चाहे जो भी कहे पर अन्दर ही अन्दर वो सुमति के लिए बहुत खुश थी. मधु ने फिर आगे कहा, “सुमति मैं और इस क्लब की सभी औरतें तुम्हारे लिए बहुत खुश है”

“अच्छा, लेडीज़ तो अब अगली खबर. तुम सब तो जानती हो कि हम सभी यहाँ सुमति के घर में मिलती आ रही थी. पर अब हमें पता नहीं कि सुमति की होने वाली पत्नी सुमति के इस रूप को स्वीकारेगी या नहीं. मुझे यकीन है कि वो सुमति को ज़रूर अपनाएगी. कौन नहीं अपनाएगी इतनी प्यारी सुमति को? पर फिर भी.. चाहे जो भी हो… एक नयी नवेली पत्नी भले सुमति को अपना ले पर हर हफ्ते ३०-४० लोगो को अपने घर में बुलाये, इसकी सम्भावना कम है. तो जब तक हम मिलने की नयी जगह नहीं ढूंढ लेती, इंडियन लेडीज़ क्लब की मीटिंग नहीं होगी.”

ये खबर सुनते ही मानो वहां की सभी औरतों का दिल टूट गया. यही तो उनकी सबसे सेफ जगह थी. खबर सुनते ही कमरे में सभी आपस में इस बारे में बात करने लगी. किसी भी ग्रुप की तरह, इस ग्रुप में भी कुछ औरतें थी जो इस क्लब का सारा फायदा तो उठाती थी पर फिर भी शिकायत करती रहती थी. ऐसी ही औरतों की एक लीडर थी.. गरिमा. खबर सुनते ही गरिमा ने आगे आकर कहा. “यह बात हमें स्वीकार्य नहीं है.. इंडियन लेडीज़ क्लब सिर्फ सुमति का नहीं है. उसकी शादी हो रही है तो हम सब औरतें क्यों भुगते?”

मधुरिमा को अपने जीवन में ऐसी औरतों को संभालने का काफी अनुभव था. तो मधुरिमा ने गरिमा से कहा, “ठीक है गरिमा. तुम सच कहती हो. तो फिर पक्का रहा. अगले हफ्ते भी इंडियन लेडीज़ क्लब की मीटिंग होगी और आगे भी होती रहेगी. लेडीज़ सभी ध्यान दो… अगले हफ्ते से हम सभी गरिमा के घर में मिला करेंगी.”

मधु की बात सुनकर गरिमा सकपका गयी. वो पीछे हो ली और बोली, “पर मैं तो अपने पेरेंट्स और पत्नी के साथ रहती हूँ. मैं कैसे करूंगी यह सब?”

“अच्छा… तुम्हारी यह बात भी ठीक है गरिमा.”, मधु बोली, “…. तो फिर मुझे यकीन है कि तुम्हे इस क्लब के लिए कुछ करने में कोई प्रॉब्लम नहीं होगी. तो तुम एक अलग घर इस क्लूब के लिए किराए पर ले लो. वो तो और भी बढ़िया होगा. हम सब वहां अपनी साप्ताहिक मीटिंग के अलावा भी जब चाहे वहां जा सकेगी.”

गरिमा और कुछ बोल न सकी. मधु ने उसकी बोलती बंद करा दी थी. गरिमा हमेशा से ही ऐसी परेशानी खड़ी करने वाली औरत थी. वो कुछ भी मदद तो नहीं करती थी पर क्लब के बारे में हमेशा सभी औरतों से चुगली करती रहती थी.

“अच्छा लेडीज़. अब और कुछ कहने को तो रहा नहीं. चलो प्लीज़ आप सब मिलकर घर को साफ़ करने में मदद कर दो. कल सुबह ही सुमति का छोटा भाई और उसकी मंगेतर यहाँ आने वाले है. और आप लोग जो भी अपना सामान लेकर आई थी, प्लीज़ अपने साथ ले जाना. यहाँ कुछ भी मेकअप या कपडे नहीं रहने चाहिए” और फिर सभी औरतें मधुरिमा की देख रेख में साफ़ सफाई में जुट गयी.

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मधु ने अब घर की सफाई की ज़िम्मेदारी उठा ली थी. हर कोई सुमति का घर साफ़ करने में मदद कर रही थी.

साफ़ सफाई होने के बाद, अब वक़्त आ गया था कि वो औरतें अब वापस अपने कपडे बदल कर आदमी बन जाए. बहुत सी औरतों के लिए यह उनके दिन का सबसे दुखदायी समय होता था. पर वो अपने साथ बहुत ही खुबसूरत यादें संजोये जा रही होती थी. कई बार कुछ औरतें रात को अपने औरत वाले रूप में ही वहां से निकल जाती थी. कुछ लोग किसी के घर जाकर फिर ड्रिंक्स और लेट पार्टी के लिए मिलते थे. अन्वेषा ने ऐसी ही एक पार्टी में जाना तय किया. उस पार्टी में करीब ९ औरतें थी और साथ में साशा और सोहा भी थी. पर वहां जाने के पहले अन्वेषा को कपडे बदलने थे. ऐसी राजकुमारी की तरह वो रात गए बाहर नहीं जा सकती थी. क्लब की कुछ औरतों ने उसे लहंगा चोली उतारने में मदद की. अब अन्वेषा ने एक छोटी ड्रेस पहन ली थी जो वो अपने साथ घर से लेकर आई थी. न जाने उसमे इतनी हिम्मत कैसे आ गयी थी कि वो यहाँ से बाहर लड़की बन कर ही जाने वाली थी. साशा, सोहा और दूसरी औरतें भी औरत की तरह ही उस पार्टी में जा रही थी. वैसे भी पार्टी किसी के घर में थी.. सौभाग्य से जिसका घर था उसके घरवाले कुछ दिनों के लिए बाहर गए हुए थे. भले ही पार्टी के लिए उन सबके पास जगह थी… पर वहां तक जाने के लिए इंडियन लेडीज़ क्लब से बाहर निकलना पड़ता. और चारदीवारी के बाहर जाने में सब उत्साहित रहती थी… पर बाहर जाने में डर भी रहता है कि यदि पुलिस वालो ने रोक लिया तो? या किसी पहचान वाले ने देख लिया? पर ग्रुप में बाहर जाने में डर थोडा कम हो जाता था. धीरे धीरे अन्वेषा, साशा, सोहा और लगभग सभी औरतें वहां से अब जा चुकी थी. और रह गयी थी सिर्फ सुमति, मधु, अंजलि और ईशा.

ईशा एक कोने में सुमति का हाथ पकड़ी हुई थी, और उसे विश्वास दिला रही थी कि शादी के बाद भी हम सब साथ मिलने का बहाना बना ही लेंगे. पर शादी के बाद क्या होगा सोचकर सुमति थोड़ी चिंतित ही रही. उसे देख अंजलि भी वहां आ गयी. और फिर अंजलि और ईशा ने एक एक कर उसे गले लगाकर प्यार से ढांढस बंधाया.

“क्यों न हम सबकी एक फोटो हो जाए? आखिर हम सहेलियों को ये रात यादगार बना लेनी चाहिए. क्योंकि अगली बार तो सुमति जी मिस से मिसेज़ हो चुकी होंगी.”, अंजलि कहकर हँसने लगी. तभी मधु वहां आ गयी और बोली, “फोटो खींचनी है तो तुम तीनो साथ में खड़ी हो जाओ. मैं खिंच देती हूँ.” और मधु ने अपनी ब्लाउज के अन्दर से फ़ोन निकाली. “मधु जी, फ़ोन भी ब्रा में? तो यह राज़ है आपके बड़े बूब्स का”, ईशा ने मधु से पूछा. अंजलि हँस रही थी. “मैडम ईशा, इस ब्रा में और भी बहुत कुछ है. मुझे पता है कि तुम भी मेरी तरह 40DD कप चाहती हो! चल अब छोडो बूब्स की बातें… मुस्कुराओ तुम तीनो” और फिर मधु के कहने पर तीनो सहेलियों ने एक दुसरे की कमर पर हाथ रखा, मुस्कुरायी और क्लिक! कितना यादगार पल था वो.. उन सहेलियों के लिए. हमेशा की तरह आज भी बेहद खुबसूरत लग रही थी तीनो.

फोटो के तुरंत बाद ही अंजलि और ईशा ने भी कपडे बदले और सुमति से विदा ली. मधु कुछ देर और वहां रुकी थी. उसने सुमति से कहा कि वो भी कपडे बदल कर नाइटी पहन ले. सुमति बाथरूम से कपडे बदलकर जल्दी ही वापस आ गयी. मधु और सुमति अब सुमति के बिस्तर पर ही बैठे हुए थे. वहां मधु ने सुमति को माँ के प्यार के साथ गले लगायी और बोली, “मैं जानती हूँ कि तुम कैसा महसूस कर रही हो सुमति. मैं भी कई सालो पहले ऐसे समय से गुज़र चुकी हूँ. पर शादी कोई सज़ा नहीं है.. वो भी तुम्हारे जीवन में खुशियाँ लेकर आएँगी. और कभी कभी, वो ख़ुशी इतनी ज्यादा होती है कि हम अपने अन्दर की औरत को भी भूल जाते है. कम से कम शुरु के कुछ साल तक तो ऐसा ही रहता है. फिर क्या पता तुम्हारी पत्नी भी सुमति को खुले दिल से स्वीकार कर ले? और यदि न करे, तब भी अंजलि, ईशा और मैं तो है न तेरे साथ हमेशा? हम किसी न किसी तरह समय और जगह ढूंढ लेंगे सुमति से मिलने के लिए. तुम समझ रही हो न?” मधु की बातों में सचमुच ममता भरी हुई थी.

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लम्बे व्यस्त दिन के बाद, सुमति अपनी नाइटी पहन कर जल्दी ही सो गयी.

“पर माँ! मैं तुम्हे भी तो कितना याद करूंगी. तुम मुझसे इतनी आसानी से मिल न पाओगी. और फिर अपनी बहु – मेरी पत्नी से नहीं मिलोगी तुम?”, सुमति ने कहा. “बेटी, मैं तो हमेशा इसी शहर में रहूंगी न? तो हम किसी न किसी तरह मिल लेंगे. अपनी माँ पे भरोसा नहीं है ? अब चुपचाप बिस्तर में सो जाओ.” मधु ने प्यार से सुमति के सर पर हाथ फेरा. वो भी जानती थी कि अपनी इस प्यारी सी बेटी से न मिल पाना उसे भी दुख देगा. उसने सुमति को लेटाकर एक माँ की भाँती चादर उढ़ाकर उसके माथे पर एक किस दिया. “गुड नाईट, सुमति बेटी. अपना विग जल्दी निकाल लेना वरना नींद नहीं आएगी अच्छे से.”, मधु बोली और फिर वो भी अपने घर के लिए निकल गयी. सुमति को भी जल्दी ही नींद आ गयी. इस व्यस्त रात के बाद, आरामदायक नाइटी पहनकर किसी को भी नींद आ जाए. आखिर एक अच्छी नाइटी एक औरत के तन को प्यार से छूती है, लपेटती है और अपने स्पर्श से उसे पहनने वाली औरत को अच्छी तरह से समझती भी है.

हैरानी भरी सुबह

सुमति के घर में : कभी आपने एक आरामदायक नाइटी में सोने का आनंद लिया है? यदि हाँ, तो आप जानती ही होंगी की सुबह सुबह नींद खुलने पर नाइटी का स्पर्श आपकी कोमल त्वचा पर कितना सुख देता है. सुमति ने भी वही अनुभव किया. उसकी आँखें बंद थी पर उसके चेहरे पर एक मुस्कान थी. उस वक़्त उसकी बांहों में कोई होता तो वो बंद आँखों के साथ ही उसे जोर से सीने से लगा लेती. पर फिर भी वो अपनी आँखें मींचे मींचे ही उठ बैठी. उफ़… उसकी स्मूथ त्वचा पर उसकी मखमली सी नाइटी तो आज मानो फिसल रही थी. सुबह सुबह इस तरह से औरत होना महसूस करते हुए उठने का मौका बार बार कहाँ मिलता है. सुमति अब सीधी होकर बैठ गयी थी. और बैठते ही उसने अपनी उँगलियों को अपने लम्बे बालो पर फेरा और फिर उन्हें अपने चेहरे के पीछे कर दी. पर उसके लम्बे बाल? सुबह सुबह सूरज की रौशनी में अब सुमति अंगडाई ले रही थी, मानो अपने अन्दर की सारी नींद को उस उजाले में उड़ा देना चाहती हो. नए दिन का स्वागत करती हुई सुमति का सीना उसके स्तनों के साथ अंगडाई लेते हुए किसी मादक सौंदर्य की धनी लड़की की तरह आगे निकल आया था. पर सुबह सुबह की हलकी सी ठण्ड जब महसूस हुई तो उसने अपने हाथ मोड़ लिए. अपने ही हाथो पर अपने ही नर्म मुलायम स्तनों का दबना उसे सुख दे रहा था. उसने फिर अपने स्तनों को अपनी बांहों के बीच थोडा और दबाया. और उस दबाव के साथ उसके स्तन थोड़े ऊपर उठ गए. पर उसके स्तन? कैसे?

अन्वेषा पार्टी वाले घर में: वो घर जहाँ कल रात अन्वेषा और औरतों के साथ ड्रिंक्स और डांस पार्टी के लिए गयी थी, आज वहाँ सब बिखरा पड़ा था. फर्श पर हर जगह बियर की बोतलें और कैन बेतरतीब तरह से बिखरी हुई थी. कहीं रंगीन ब्रा, कहीं सेक्सी पेंटीयाँ तो कहीं किसी लड़की के टॉप सब कुछ अस्त-व्यस्त पड़ी हुई थी. उस घर में कई लडकियां एक दुसरे के ऊपर सोयी पड़ी थी जैसे रात भर खूब पार्टी हुई हो. कुछ लडकियां तो टॉपलेस थी और उनके नग्न स्तन खुले दिख रहे थे. और कुछ लडकियां अपने टॉप पहनी हुई थी पर उनके स्तन टॉप से लापरवाह तरीके से बाहर दिख रहे थे. और कुछ तो केवल पेंटी पहनी हुई थी. दो लडकियां सिर्फ ब्लाउज और पेटीकोट पहनी हुई थी और उनकी साड़ियाँ बिस्तर पर फैली हुई थी. सभी लड़कियों को शायद शराब पीने के बाद का हैंगओवर था और सब एक दुसरे की बांहों में सोयी पड़ी थी. अन्वेषा कमरे के एक कोने में बिस्तर पर थी. ऐसा लग रहा था जैसे वो साशा के बगल में लेटी थी. साशा पेटीकोट पहनी हुई थी और अन्वेषा के हाथ उसके हाल्टर टॉप ब्लाउज के अन्दर थे. इन लड़कियों ने कुछ ज्यादा ही पार्टी कर ली थी कल रात को जहाँ कोई रोक टोक नहीं थी.

सुमति के घर में: सुमति तो अब शॉक में थी. उसके पास असली स्तन थे! यह कैसे हो सकता है? वो पागल तो नहीं हो रही? वो सोचने लगी. वो ज़रूर सपना देख रही होगी. क्या कल रात उसने कोई ड्रग तो नहीं ली. अपने असली स्तनों को महसूस करने के बाद वो अपनी कमर के निचले हिस्से की तरफ तो देखना ही नहीं चाहती थी. कहीं उसका लिंग तो नहीं बदल गया? वो सचमुच पागल हो रही थी, उसने खुद से कहा. पर हैरानी भरा समय जो उसे पागल करने वाला था, वो तो अब बस शुरू ही हुआ था.

प्रिय पाठिकाओं, धन्यवाद जो आपने अब तक इस कहानी को पढ़ा. अब आगे की कहानी बहुत ही क्रेजी होने वाली है. तो पढ़ते रहिये… जानने के लिए कि आगे क्या हुआ!

क्रमश: …

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इंडियन लेडीज़ क्लब: भाग ३

लेडीज़ क्लब में आज खुशियाँ छाई हुई थी. यहाँ सुन्दर सुन्दर लिबास में जमा सभी औरतें खुश थी पर उन्हें पता नहीं था कि आज की रात उनमे से एक औरत उनकी ज़िन्दगी हमेशा के लिए बदल देगी.


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हर किसी को मधुरिमा आंटी से बात करना पसंद था.

इंडियन लेडीज़ क्लब की पार्टी अब शुरू हो चुकी थी. और मधुरिमा भी पार्टी का मज़ा ले रही थी. एक कोने में किसी लड़की से बात कर रही थी. वैसे भी वहां की सभी औरतों को ‘मधु आंटी’ से बात करने में बड़ा मज़ा आता था. वैसे तो मधु झूठमूठ का गुस्सा दिखाती थी जब भी उसे कोई आंटी कहता था… पर फिर भी सभी मधु को प्यार से सम्मान के साथ आंटी कहते थे. पर फिर भी क्लब में कुछ औरतें ऐसी भी थी जिन्हें मधु से जलन होती थी. क्योंकि उनकी नजरो में मधु के पास सब कुछ था. उसके पास बड़े स्तन थे और उसे नकली ब्रैस्ट-फॉर्म की ज़रुरत नहीं होती थी. मधु आंटी के कुल्हे भी किसी मदमस्त औरत की तरह बड़े थे जो उनके फिगर को और आकर्षक बनाते थे. सचमुच बहुत सुन्दर लगती थी जब भी मधु अपनी भरी-पूरी काया पर कस कर साड़ी लपेटती थी. जब वो चलती थी तो उनके स्तन उनके हर कदम पर हिलते थे और साड़ी उनके कुलहो पर फिसल कर आवाज़ करती थी. पर सच तो सिर्फ मधु और उसकी करीबी कुछ सहेलियां जानती थी. एक लम्बी बीमारी और कई दवाइयों के सेवन से वो मोटी हो गयी थी, पर एक क्रॉस-ड्रेसर के रूप में ये मोटापा एक तरह का वरदान था. और फिर ऊपर से, अजंता नाम की एक ऐसी पत्नी थी मधु की, जो उनके हर कदम पर साथ भी देती थी, और न सिर्फ मधु को बलकि मधु की सहेलियों को भी ख़ुशी से अपनाती थी. मधु की तरह अजंता भी जवान लड़कियों को बिलकुल बेटी की तरह से प्यार से रखती थी. अजंता को कोई प्रॉब्लम नहीं थी इस बात से की मधु औरत के रूप में घर से बाहर जाए. और मधु की चाल और मदमस्त तन को देखकर किसी को शक भी नहीं होता था कि मधु औरत नहीं है. इंडियन लेडीज़ क्लब में किसी ने कभी मधु को आदमी के रूप में भी नहीं देखा था, वो तो हमेशा घर से ही मधु बनकर अपनी कार चलाकर आती थी. पर इन सब में एक औरत अपवाद थी.

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कुछ साल पहले, सुमति मधु के घर कुछ दिन रहने आई थी. वहां मधु ने सुमति को अपनी बेटी की तरह रहने दिया था.

कुछ साल पहले, सुमति को एक टेम्पररी जगह चाहिए थी रहने के लिए. यह तब की बात है जब सुमति इस घर में आई नहीं थी जो आज इंडियन लेडीज़ क्लब के नाम से जाना जाता है. उस वक़्त तक मधु और सुमति का रिश्ता माँ-बेटी के रिश्ते की तरह बन चूका था. और उस दिन जब सुमति मधु के घर रहने आई थी, तब मधु ने बिलकुल एक माँ बनकर अपनी बेटी का स्वागत किया था. और अगले दो दिन, सुमति उस घर में बेटी बनकर ख़ुशी से रही. मधु और उनकी पत्नी अजंता ने सुमति को खूब प्यार दिया था. सुमति भी अपने ‘मधुसुदन अंकल’ और ‘अजंता आंटी’ के साथ बहुत खुश रही थी. उस छोटे से समय में उसने अजंता आंटी के साथ किचन में बहुत कुछ बनाना सिख लिया था. अजंता सुमति से कहती थी कि यदि संभव होता तो वो सुमति को अपनी बहु ज़रूर बनाती! पर अजंता और मधुसुदन का कोई बेटा नहीं था. उनकी एक बेटी थी जिसकी शादी हो चुकी थी.

मधु की बेटी योगिता ने बचपन से ही अपने पिता को घर में कई बार साड़ी पहने देखा था. मधु और अजंता ने अपनी बेटी  योगिता से कभी कुछ छिपाया नहीं था. और योगिता भी मानती थी कि उसकी एक नहीं दो-दो माएँ है! आज भी जब वो अपने मायके आती है तो एक दिन ज़रूर अपनी मधु माँ के साथ बिताती है. उस एक दिन जहाँ एक माँ अजंता बेटी के लिए उसकी पसंद का खाना बनाने में व्यस्त रहती है, वही दूसरी माँ मधु योगिता को शौपिंग कराने बाहर ले जाती है. ये सब जानकर तो किसी को भी लगता था कि सब कुछ तो था मधु के पास. बस एक कमी थी.. एक अच्छी सेहत की. लम्बे समय से अपनी बीमारी से जूझती मधु अक्सर घर में बीमार पड़ी रहती थी.. और लोगो से तभी मिलती थी जब वो अच्छी हो. इसलिए किसी को पता नहीं था कि हंसती खेलती मधु जो सबको इतना खुश रखती है.. खुद कितनी परेशानियों के साथ जी रही होती है.

वो सुन्दर चूड़ियों की खनकती आवाज़…. इसलिए तो पहनती है हम इन्हें. परजब वो हमारी या हमारी सहेलियों की साड़ी में अटक जाती है तो हमें तकलीफ भी देती है. पर ऐसी तकलीफ तो हम औरतें रोज़ सहना चाहेंगी.

खैर इस वक़्त इस लेडीज़ क्लब की सभी लेडीज़ सज धज कर तैयार थी, उनके चेहरे पर मुस्कान थी, सभी अपने गहनों से लदी चमचमा रही थी और कुछ अपनी ऊँची हील पहन कर लड़खड़ा भी रही थी. भले ही सबको औरत बनना अच्छा लगता था यहाँ, पर हर किसी को अभी तक एक शालीन औरत की तरह चलना नहीं आता था. कुछ तो इसके बावजूद ४ इंच की हील पहन लेती थी भले उनसे १ इंच की सैंडल पहन कर भी चला न जाए. कुछ थी जिनसे अपना दुपट्टा या साड़ी का पल्लू संभाले नहीं संभालता था. बार बार पल्लू या दुपट्टा फिसलता और वो बार बार उसे ऊपर उठाकर ठीक करती… फिर भी पिन नहीं लगाती! और कुछ तो हज़ार पिन लगाने के बावजूद भी न संभाल पाती. ये छोटी छोटी बातें और मुश्किलें उनके औरत होने की अनुभूति को और बढ़ा देती थी. कुछ औरतों को लम्बे खुले बाल इतने पसंद थे कि भले वो आँखों के सामने आये और उन्हें कुछ अच्छे से दिखाई न दे… फिर भी बाल खुले ही रखेंगी! खनखनाती चूड़ियां और चमचमाते लहराते लम्बे कानो के झुमके कभी बालों में अटक जाते तो कभी साड़ी के पल्लू की एम्ब्राईडरी में! जितना सजो जितना पहनो उतनी मुसीबतें! यही तो इस क्लब में ख़ास था, आपके साथ आप ही की तरह और भी कई औरतें होती थी जो इन सब मुसीबतों को झेलते हुए भी आपको एक औरत बनने के सपने को पूरा करने में मदद करने को तैयार थी. इन छोटी छोटी मुश्किलों से कुछ सिख कर आगे बढ़ते हुए औरत बनने के इस रास्ते में सभी को मज़ा आता था. हर क्रॉस-ड्रेसर इस बात को समझती है.

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मधु अब आज का प्रोग्राम शुरू करने को तैयार थी.

मधुरिमा जी भी अब बस आज के मुख्य कार्यक्रम को शुरू करने के लिए तैयार थी. उन्होंने अपनी साड़ी के पल्लू को अपने ही नटखट अंदाज़ में अपनी बड़ी सी कुलहो पर लपेटा और सामने ठूंस कर सबके सामने आ गयी. उन्हें पल्लू को कमर में लपेटना अच्छा लगता था. वो उस कमरे में ऊपर जाती सीढ़ियों पर चढ़ने लगी. उनके हर एक कदम पर उनकी नितम्ब एक परफेक्ट औरत की तरह लहराती. शायद वो जान बुझ कर ऐसा करती है पर चुस्त ब्लाउज और कस के लपेटी हुई साड़ी में उनकी चाल सबका ध्यान उनकी ओर आकर्षित करने में कामयाब रहती थी. फिर ऊपर जाकर वो पलटी और ताली बजाकर एक बार फिर सबका ध्यान अपनी ओर खिंचा और बोली, “लेडीज़! अब आज के ख़ास पल का समय आ गया है जिसके लिए हम सब आज यहाँ है.” सभी का ध्यान अब मधु आंटी की ओर था.

“हां हाँ… डिन्नर के लिए ही न! पर डिनर के अलावा भी तो कुछ है आज और तुम सब तो जानती ही हो. अब जब तुम सब तैयार हो चुकी हो, अब तुम सब बस खाना खाना चाहती हो…”, सभी उनकी बात सुनकर हँसने लगी. “.. लेकिन आज हम सब यहाँ है हमारी नयी मेम्बर के स्वागत के लिए. मैं आप सभी का परिचय कराना चाहती हूँ अन्वेषा से!”, मधु ने आगे कहा. तालियों की गडगडाहट के साथ ही साथ खनकती चूड़ियों की मधुर आवाज़ अब हवा में भर गयी थी. और हर किसी की नज़र उस हैण्डसम जवान युवक की ओर थी जो शर्माता हुआ एक कोने में खड़ा था. जब इतनी औरतें एक साथ किसी की ओर देखे तो ज़ाहिर है उसे थोड़ी शर्म आएगी. बिना कुछ कहे उसने बस अपने हाथ हिलाकर सभी का अभिवादन किया. उस कमरे में अकेला वो आदमी … उसे ज़रा भी अंदाजा नहीं था कि इतनी सारी औरतें मिलकर उसके साथ क्या क्या कर सकती है! मधुरिमा आखिर उस युवक को अपने साथ खिंच लायी.

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मधु उस युवक को अपने तरह से छेड़ने लगी.

“ओहो देखो तो कितनी शर्मीली है अन्वेषा!”, मधुरिमा ने उस युवक को अपने हाथों से खींचते हुए कहा. “तो हैण्डसम.. हाय तुझे अपने हाथो से छुए बगैर कैसे रहूंगी मैं?”, मधुरिमा ने अब उस युवक को छेड़ते हुए करीब खींचते हुए अपने सीने से लगा लिया. बेचारा शर्माता रह गया वो.

“लेडीज़, आज हम सभी का कर्त्तव्य है कि अन्वेषा आज की रात कभी न भूल सके! इसे भी हम औरतों के हाथ का जादू हमेशा याद रहना चाहिए.”, मधुरिमा बोलती रही और वो युवक शर्माता रहा. जिस तरह से मधु उस युवक को कमर से पकड़ कर गले लगा रही थी, उस युवक को उस वक़्त एहसास नहीं था कि मधु के अन्दर कितना वात्सल्य प्रेम भरा हुआ था.

पर अब मधु ज़रा सीरियस हो गयी और बोली, “अन्वेषा, यह मेरा वादा है कि आज की रात तुम्हारी सबसे सुनहरी यादों वाली रात होगी. क्योंकि आज इस शहर की बेस्ट औरतें अपनी कला से तुम्हे जवान लड़के से खुबसूरत राजकुमारी में तब्दील कर देंगे.. ऐसी राजकुमारी जिसको तुमने सपने में भी नहीं सोचा होगा. हम सब तुम्हारा इस क्लब में स्वागत करती है.”

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अन्वेषा को क्लब की औरतों ने ये खुबसूरत सिल्क की ब्रा और पेंटी का सेट गिफ्ट में दिया था. 

मधु ने फिर सुमति की ओर इशारा किया और सुमति तुरंत एक बैग लेकर मधु के पास आई. मधु ने वो बैग पकड़ा और अन्वेषा की ओर पलट कर बोली, “अन्वेषा ये इस क्लब की सभी औरतों की ओर से एक छोटा सा तोहफा है तुम्हारे लिए जिसे हम सबने मिलकर प्यार से लिया है तुम्हारे लिए.”

अन्वेषा ने उस बैग को हाथ में लिया और आखिर उसने कुछ शब्द कह ही दिए. “सभी को मेरा धन्यवाद. आज मैं थोड़ी नर्वस हूँ और इमोशनल भी. मुझे यकीन नहीं हो रहा है कि आज रात मैं एक लड़की बन जाऊंगी और वो भी आप जैसे खुबसूरत औरतों की मदद से..”, अन्वेषा की आवाज़ रुन्धने लगी भावुकता में.

“डार्लिंग, इतनी भावुक भी न हो! कम से कम अपना गिफ्ट तो देख लो खोल कर!”, मधु ने अन्वेषा के चेहरे को प्यार से छूते हुए कहा. अन्वेषा ने जब बैग खोला तो उसकी आँखें चमक उठी. उस बैग में बहुत ही सुन्दर सैटिन सिल्क की ब्रा और पेंटी का सेट था. इतनी सुन्दर तो उसने कभी नहीं देखी थी. यह सोचकर ही कि वो इतनी नाज़ुक सुन्दर ब्रा पेंटी पहनेगी.. उसका दिल भर आया. और तो और उस सेट के साथ एक विक्टोरिया सीक्रेट का एक सैटिन का रोब भी था उस बैग में!

“लेडीज़!! इसके पहले की अन्वेषा और भावुक हो.. चलो इसे “प्रिंसेस रूम” में ले चलते है. ईशा तुम तैयार हो?”, मधुरिमा ने ईशा से पूछा जो एक लॉक कमरे को पहरा दे रही थी. वो कमरा था “प्रिंसेस रूम”. ईशा ने सर हिला कर हाँ का इशारा किया.

“प्रिंसेस रूम? यह क्या है?”, अन्वेषा ने पूछा. मधुरिमा ने फिर मुस्कुरा कर कहा, “बस एक मिनट में तुम्हे पता चल जायेगा डार्लिंग!” और मधु ने अपने हाथो से अन्वेषा के गाल खिंच लिए.

मधु अन्वेषा का हाथ पकड़ उसे अपने साथ ले चली. और सभी औरतें उन दोनों के पीछे पीछे. ईशा ने जब दरवाज़ा खोला तो वो कमरा किसी भी क्रॉस-ड्रेसर के लिए मानो स्वर्ग सा था. अन्वेषा का तो मुंह खुला का खुला रह गया. उस रूम को बेहद ही प्यार से सजाया गया था… जहाँ ढेरो खुबसूरत साड़ियाँ, फैंसी एम्ब्राईडरी किये ब्लाउज, लम्बी सुन्दर अनारकली, चमचमाते पंजाबी सूट, सेक्सी वेस्टर्न सैटिन गाउन, एक से बढ़कर एक लहंगा चोली, चमकते हुए गहने और अनगिनत चप्पल और सैंडल सजे हुए थे.

प्रिंसेस रूम को सुन्दर साड़ियों, दमकते ब्लाउज, सेक्सी इवनिंग गाउन, चमचमाते गहनों और अनगिनत सैंडल के साथ सजाया गया था. और इन सब में एक ऑउटफिट चुन कर पहनना अन्वेषा क्या किसी भी लड़कीके लिए आसान नहीं होगा.

प्रिंसेस रूम की तैयार सुमति और अंजलि ने मिलकर की थी. सुमति जो पूरी रात दौड़ रही थी, वो इसलिए क्योंकि वो दूसरी मेम्बर्स से वो कपडे इकठ्ठा कर रही थी जो अन्वेषा के साइज़ के हो. सभी ने अपने बेस्ट कपडे इस पल के लिए लाये थे जिसमे से एक अन्वेषा आज पहन सकेगी. सुमति ने ये सब चुप-चाप किया था वहीँ अंजलि ने अपनी सजावट की कला का उपयोग करते हुए सभी कपड़ो को बहुत सुन्दर तरह से उस कमरे में सजाया था. प्रिंसेस रूम न सिर्फ अन्वेषा के लिए बल्कि सभी के लिए सरप्राइज था. जब भी कोई नया मेम्बर क्लब में आता, सभी सदस्य उस रूम को देखने के लिए उतावले रहते. पुरुष रूप में न सही पर एक बार औरत बनने के बाद इस क्लब की सभी औरतें बेझिझक यहाँ कपड़ो के डिजाईन की तारीफ़ कर सकती थी. फैब्रिक छू छूकर देखती कि कैसे है वो कपडे या उनका रंग कैसा है.

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अंजलि ने अन्वेषा से कहा, “मैंने कहा था तुम्हे घबराने की कोई बात नहीं है.”

अंजलि फिर आगे आई और अन्वेषा से बोली, “मैंने कहा था हैण्डसम… आज तुम्हारी रात है. अब घबराने की कोई बात नहीं है.” अन्वेषा शर्मा गयी और अपना सर झुका ली. “अब तुम्हे इन सभी कपड़ो में से एक ऑउटफिट पसंद करनी है जो तुम्हे अच्छी लगे. खुद को इमेजिन करो कि तुम सबसे खुबसूरत किस्मे लगोगी?”

“इनमें से सिर्फ एक का चुनाव तो बहुत कठिन होगा… सब एक एक से सुन्दर है”, अन्वेषा सोचने लगी. आखिर वो लम्बे लाल सेक्सी सैटिन गाउन को कैसे रिजेक्ट करेगी… उसे पहन कर तो उसे रेड कारपेट पे चल रही सेलेब्रिटी की तरह लगेगा… या फिर फिर इस चमकीली गुलाबी साड़ी से कैसे मुंह फेर लूं जिसको पहन कर मैं नयी नवेली पत्नी की तरह दिखूंगी. या मैं उस स्लिम-फिट वाली अनारकली को कैसे मना कर दू जिसका इतना घेरा है कि मेरे कॉलेज की सभी लड़कियों को मुझसे जलन हो जाएगी? एक ऑउटफिट पसंद करना सचमुच कठिन काम होगा.

अन्वेषा की दुविधा देख कर अंजलि बोली, “रिलैक्स अन्वेषा. जब तुम अपनी पसंद की ड्रेस देखोगी न तो तुम्हे बिलकुल भी नहीं सोचना पड़ेगा. मेरा यकीन मानो, हर लड़की का सबसे फेवरेट ऑउटफिट होता है. पर उसके पहले तुम्हारे पास अभी थोडा समय है. ईशा तुम्हे बाथरूम ले जाएगी जहाँ तुम पहले अपनी ब्रा और पेंटी पहनोगी. फिर उस बैग से सैटिन रोब पहनकर बाहर आओगी. आखिर एक दुल्हन या राजकुमारी का श्रृंगार ऐसे ही थोड़ी शुरू होता है!” अंजलि अन्वेषा का कन्धा पकड़कर मुस्कुराने लगी. अन्वेषा मन ही मन सोच रही थी कि बस कुछ देर पहले जब वो अंजलि से पहली बार मिली थी तब उसे लगा था कि अंजलि उसके साथ फ़्लर्ट कर रही है. पर अब उसे समझ आ गया था कि इस क्लब में औरतें ऐसे ही एक दुसरे को छेडती है. अन्वेषा फिर ईशा के संग बाथरूम चली गयी जहाँ वो सबसे सेक्सी ब्रा और पेंटी पहनने वाली थी. वो औरत बनने की ओर कदम बढ़ा रही थी. आज उसका सपना सच होने वाला था.

अन्वेषा के अन्दर जाने पर ईशा ने बाथरूम का दरवाज़ा बंद कर दिया था. और इस दौरान, बाकी औरतें प्रिंसेस रूम की सजावट देखने में मगन हो गयी. आखिर उन सभी की भी सुनहरी यादें जुडी हुई है इस कमरे से. अन्वेषा की ही तरह एक दिन वो भी राजकुमारी बनी थी इसी कमरे में. पर इस ख़ुशी के बीच उन औरतों के ये नहीं पता था कि आज ये उनकी इंडियन लेडीज़ क्लब में आखिरी पार्टी होने वाली है. क्योंकि उनके बीच एक औरत है जो उन सब की ज़िन्दगी हमेशा के लिए बदल देगी.
क्रमश: …

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इंडियन लेडीज़ क्लब: भाग २

इंडियन लेडीज़ क्लब में आज ख़ुशी का माहौल था. अपने पुरुष परिधान उतार कर आज सभी एक दुसरे की मदद कर रहे थे एक खुबसूरत महिला बनने के लिए. कोई भी वहां परफेक्ट नहीं था, पर उन्हें परफेक्ट होने की आवश्यकता भी नहीं थी. यहाँ सभी सिर्फ औरतें थी जो एक अच्छे पल के लिए इकठ्ठा हुई थी.


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इंडियन लेडीज़ क्लब में आज ख़ुशी का माहौल था. अपने पुरुष परिधान उतार कर आज सभी एक दुसरे की मदद कर रहे थे एक खुबसूरत महिला बनने के लिए. कोई भी वहां परफेक्ट नहीं था, पर उन्हें परफेक्ट होने की आवश्यकता भी नहीं थी. यहाँ सभी सिर्फ औरतें थी जो एक अच्छे पल के लिए इकठ्ठा हुई थी.

 

सुमति के घर में आज खुशियाँ छाई हुई थी. न जाने कितने ही तरह के आदमी आज उसके घर में इकठ्ठा हुए थे, कुछ ऊँचे, कुछ छोटे, कुछ मोटे, कुछ दुबले, कोई इंजिनियर, कोई बिज़नस मैन, हर कोई आज इस घर में औरत बनकर इस ख़ास अवसर में शामिल होने आये थे. सभी आदमी खुद को सबसे खुबसूरत औरत में बदलने में व्यस्त थे. ऐसा लग रहा था जैसे आज उस घर में शादी होने वाली है और सभी औरतें उस शादी के लिए सज रही हो. कुछ तो अब तक अपनी सबसे सुन्दर साड़ियाँ पहन चुकी थी, तो कुछ अब भी किसी की मदद चाह रही थी कि कोई उनकी पीठ पर चेन लगाने में मदद कर दे क्योंकि उनका हाथ पीठ पर पहुच नहीं रहा था, तो कुछ औरतें अब तक तय नहीं कर पा रही थी कि आज वो क्या पहनेंगी, तो कुछ औरतें आपस में अपने कपडे एक्सचेंज कर रही थी ताकि वो आज कुछ नया पहन सके, कुछ आज नयी हेयर स्टाइल ट्राई करना चाहती थी, तो कुछ औरतें खुद का मेकअप करने के बाद दूसरो के मेकअप में मदद कर रही थी, किसी को आँखों में काजल लगाने में मदद चाहिए थी तो किसी को अपनी साड़ी की प्लेट बनने में, किसी को लगा कि उनका ब्लाउज काफी चुस्त हो गया है, तो वहीँ एक कोने में एक लड़की गोल गोल घूमकर अपने नए लहंगे का घेर झूमती हुई सबको दिखा रही थी. हर तरह सिर्फ औरतें ही औरतें थी आज उस घर में.

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सुमति आज सबसे व्यस्त औरत थी. घर आये मेहमानों की ज़रूरतें पूरी करते करते वो यहाँ से वहां बस दौड़ी जा रही थी.

ऐसा नहीं था कि वो सभी औरतें एक से एक खुबसूरत थी या हर कोई किसी औरत की तरह नजाकत से भरी हुई थी. पर यही तो ख़ास बात थी इंडियन लेडीज़ क्लब की. आपका रंग रूप कैसा भी हो, यह क्लब सबके लिए खुला था और यहाँ आप सिर्फ और सिर्फ एक औरत है. इस बात से किसी को फर्क नहीं पड़ता था कि आप असली औरतों की तरह फेमिनिन है या नहीं, या आप मोटी हो गयी है. इस क्लब की सभी औरतें अपनी आँखों में और दिल से एक खुबसूरत औरत थी आज. और सभी जानती थी कि इंडियन लेडीज़ क्लब का भरपूर मज़ा लेना हो तो अपने आसपास की सभी दूसरी औरतों के साथ  सम्मानपूर्वक एक औरत की तरह ही व्यवहार करना होगा. वैसे भी वहां की हर औरत की अपनी एक ख़ास बात थी. कोई भी वहां परफेक्ट नहीं थी, पर वहां कोई किसी को जज नहीं कर रही थी. सभी बस खुद के अन्दर की औरत को आज अनुभव करने के लिए इकठ्ठा हुई थी.

और जब इतना कुछ चल रहा था, सुमति बेचारी एक कमरे से दुसरे कमरे में दौड़ भाग रही थी. आखिर उसे उसके घर आये सभी मेहमानों की ज़रूरतों को भी तो पूरा करना था. उसे तसल्ली थी कि आज उसने कोई भारी सी साड़ी नहीं पहनी वरना इतनी दौड़-भाग में बड़ी मुश्किल होती. क्लब की प्रेसिडेंट होने के नाते किसी को भी कोई भी समस्या होती तो वो तुरंत सुमति के पास आती और सुमति उनकी मदद करती.

हवा में औरतों की गपशप और हँसी गूंज रही थी. बिलकुल वैसे ही जैसे किसी भी औरतों के मिलन समारोह में उम्मीद की जा सकती है. एक बार पुरुषो के कपडे उतर जाए और वो औरत के कपडे पहन ले तो मानो वो सभी दिल से औरत बन जाती. गॉसिप करना हो  या फिर किसी और औरत की बुराई.. हर तरह से वो औरत बन जाती. हाँ, औरतें कभी कभी एक दुसरे से जलने लगती है और एक दुसरे की बुराई भी करती है, और यह ख़ास लेडीज़ भी उन औरतों से ख़ास अलग नहीं थी.  इसीलिए इस क्लब की सभी सीनियर सदस्य इस बात का बहुत ध्यान रखती थी कि सदस्यों के बीच मन-मुटाव न हो और प्यार बना रहे. वो इस बात का ख़ास ध्यान रखती थी कि इस क्लब के सदस्य जलने की जगह एक दुसरे का पूरा पूरा सहयोग करे… और इसलिए इस क्लब के कुछ नियम भी थे जो सबको मानने पड़ते थे. और इस क्लब का सबसे प्रमुख नियम था: इंडियन लेडीज़ क्लब में कोई भी पुरुष रूप में नहीं रह सकता था.

 

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एक बेहद खुबसूरत सी लड़की उस नर्वस दिख रहे अकेले युवक के पास आई. कौन थी वो?

पर उस कमरे में एक व्यक्ति था जो इस नियम को तोड़ रहा था. वो इन औरतों के झूंड में कुछ अलग ही प्रतीत हो रहा था. थोडा घबराया हुआ भी था. और जब आसपास इतनी सारी औरतें अपने रंग बिरंगे परिधान में इठला रही थी तब वो एक डल से रंग के कुर्ते में अकेला था. आसपास की सभी औरतें अपनी तैयारी में इतनी खोयी हुई थी कि किसी का उस व्यक्ति की तरफ ध्यान भी नहीं गया. उस व्यक्ति की शरमाहट से पता चल रहा था कि वो यहाँ ज्यादा किसी से परिचित नहीं था. वो इतनी अनजान औरतों को बस झुकी नज़रो से देख रहा था. वो मुस्कुराने की कोशिश करता पर कोई उसे देख ले तो उसके दिल की धड़कने बढ़ जाती, और वो अधिक देर तक मुस्कुरा नहीं पाता.

और इसी भीड़ में एक प्यारी सी औरत मानो फ़रिश्ता बनकर उसके पास आई और उसके दोनों हाथो को पकड़ कर बोली, “कैसा लग रहा है , हैण्डसम?”, उस औरत ने कहा. “ओह.. जी नमस्ते”, उस व्यक्ति ने औरत से घबरायी हुई आवाज़ में कहा. “तुम नर्वस लग रहे हो. ऐसा क्यों भला? तुम्हारे आस पास इतनी सारी सुन्दर औरतें है… तुम्हे सुन्दर औरतों से डर तो नहीं लगता कहीं? घबराओ मत… औरतें ही तो है. तुम्हे खा तो नहीं जायेंगी ये!”, उस अनजान औरत ने लगभग हँसते हुए उस आदमी से कहा. “माफ़ कीजियेगा… मैं यहाँ पहली बार आया हूँ और किसी को जानता भी नहीं हूँ.”, उस आदमी ने धीमी आवाज़ में जवाब दिया. उसका जवाब सुनकर वो औरत हँसने लगी… मगर उसकी आँखों में प्यार भरा हुआ था मानो जैसे वो उस आदमी के दिल को समझ  रही हो..

“रिलैक्स करो, हैण्डसम! इतनी टेंशन न लो. वैसे भी ये सब औरतें तुम्हारे लिए ही तो आज यहाँ आई है. मेरा विश्वास करो.. घबराने की कोई बात नहीं है”, वो औरत बोली. “थैंक यू, मैडम”, उस आदमी ने अपने चेहरे से पसीना पोंछते हुए कहा. ” वैसे मेरा नाम अंजलि है”, उस औरत ने कहा. “अच्छा मेरे पास आओ. तुम्हे ज़रुरत है एक हग की.. देखो कितना घबरा रहे हो. एक बार एक औरत को गले लगा लो तो नर्वसनेस दूर हो जाति है. चलो मुझे गले लगाने दो तुम्हे!”, अंजलि बोली. वो आदमी संकुचाता रहा तो अंजलि ने फिर कहा, “अरे मैं यूँ ही किसी अनजान आदमी को गले नहीं लगाती हूँ. ऐसी वैसी औरत नहीं हूँ मैं!”, अंजलि उसे छेड़ रही थी. वो आदमी आखिर गले लगाने को मान ही गया. सचमुच अंजलि को गले लगाने के बाद जैसे उसकी नर्वसनेस थोड़ी कम हो गयी. पर फिर भी धड़कने अब भी तेज़ थी. थोड़ी देर गले लगाने के बाद, अंजलि थोडा पीछे हुई और उस आदमी के चेहरे को अपने हाथो से उठाकर उसकी आँखों में देखते हुए बोली, “देखा.. घबराने की कोई बात नहीं है न? अब बेहतर लग रहा है तुम्हे?” वो आदमी उस सुन्दर औरत की आवाज़ सुनकर बस मुस्कुरा दिया.

“चलो मैं तुम्हे यहाँ के कुछ मेम्बर के बारे में बताती हूँ. तुम वो हरी रंग की साड़ी में उस औरत को देख रहे हो? जो इधर से उधर बस दौड़ी जा रही है और जिसके पीछे और औरतें मंडरा रही है?”, अंजलि ने कहा. “हां. कौन है वो?”, आदमी ने पूछा. वो अब अंजलि के साथ थोडा रिलैक्स महसूस कर रहा था. “वो सुमति है. वो यहीं इसी घर में रहती है और वो ही है जो इंडियन लेडीज़ क्लब की मीटिंग ओर्गानाइज़ करती है. यदि वो न होती तो तुम इस पार्टी में न होते. बाद में उसे धन्यवाद करना मत भूलना तुम. समझे?” अंजलि की बात सुन उस आदमी ने चुपचाप हाँ में हाँ मिला दी.

शर्मीला आंटी इस क्लब की साड़ी और लहंगा एक्सपर्ट थी जिनको १८ तरह से साड़ी स्टाइल करना आता था! लगभग हर कोई उनसे नयी स्टाइल सीखने के लिए उनके पास आता था. और आज की रात तो सबकी मदद करने में शर्मीला आंटी बेहद व्यस्त थी.

“अच्चा, अब वो सफ़ेद-काली साड़ी में आंटी को देख रहे हो? वो शर्मीला आंटी है. इस क्लब की साड़ी एक्सपर्ट है! उनको १८ तरह से साड़ी पहनना आता है. आज के जैसे ख़ास दिन के लिए तो उनकी बड़ी डिमांड रहती है. कौनसी साड़ी या लहंगा किस तरह से पहनना है… हर कोई उनकी मदद लेने आता है.”, अंजलि आगे बोलती रही. “हाँ, मैंने भी नोटिस किया… कम से कम दस औरतें अब तक उनसे अपनी साड़ी और लहंगा स्टाइल करवा चुकी होंगी.”, उस आदमी ने कुछ शब्द कहे.

इस क्लब में हर किसी को मदद की ज़रुरत नहीं होती थी. काफी सदस्य खुद से बिना किसी की मदद के तैयार होना जानते थे.

अंजलि ने फिर आगे कहा, “देखो हर कोई तो यहाँ किसी महारानी की तरह तैयार नहीं होता है. पर हम सभी कोशिश करती है कि हम अपने में कुछ और सुधार ला सके. और आज तो हम सब स्पेशल दिखना चाहती है… और यह सब ख़ास तुम्हारे लिए… तुम हमारे आज के चीफ गेस्ट जो हो!” वो आदमी ये बात सुनकर एक बार फिर नर्वस हो गया.

अंजलि ने अपनी पर्स से फ़ोन निकाल कर समय देखा, “अब बस १० मिनट और बचे है हैण्डसम! उसके बाद तुम्हारी बारी होगी. और हम सभी औरतें मिलकर आज तुम्हे किसी राजकुमारी की तरह सजायेंगे. आज तुम्हारे सपने सच होने वाले है. आज जितनी खुबसूरत लड़की तुम बनोगे… ऐसा तुम कभी नहीं बने होंगे. तो आज की रात को निश्चिन्त होकर एन्जॉय करना. आखिर यह रात तुम्हारी रात है.” अंजलि ने आँखें मारकर अपनी कुंहनी से उसके कंधे को धक्का देकर छेड़ने की कोशिश की. शायद इस छेड़ छाड़ में गलती से अंजलि के ब्रैस्ट-फॉर्म (स्तन) उस आदमी के कंधे से दब गए. उन स्तनों को महसूस करके तो जैसे उस आदमी के तन में करंट दौड़ गया और वो शर्माने लगा. पर अंजलि का इस बात पर ध्यान नहीं गया. “फिर मिलती हूँ मैं तुमसे थोड़ी देर में!”, अंजलि ने कहा और वो सुमति से बात करने चल दी.

वो आदमी वहीँ अकेले खड़ा रहा. वो थोडा सा असमंजस में था. “क्या वो औरत मेरे साथ फ़्लर्ट कर रही थी?”, वो मन ही मन सोच रहा था. उसे नहीं पता था कि इस क्लब की महिलाएं एक दुसरे को यूँ ही प्यार से ऐसे छेडती रहती है और इसके पीछे कोई और भावना नहीं थी. छेड़ने का भी अपना ही मज़ा है.

वो आदमी अपने आसपास सभी औरतों को देखने लगा. उसकी उम्र २२ के करीब होगी और आज उसका सपना सच होने वाला था. आज वो खुद को एक लडकी के रूप में देख सकेगा. और आज जो इंडियन लेडीज़ क्लब में चहल पहल थी, वो उसी के इस क्लब में स्वागत के लिए ही थी. इस क्लब की पालिसी थी कि किसी भी नए सदस्य का स्वागत इसी तरह उसे राजकुमारी की तरह स्पेशल मेकओवर के साथ सजा कर किया जाता था. नए सदस्य को खुद आज कुछ नहीं करना होता था. सभी कुछ क्लब के बाकी सदस्य मैनेज करते थे. वो जवान युवक इस सोच से ही खुश था क्योंकि उसके खुद के पास न ही अच्छे कपडे थे, और न ही उसे मेकअप करना आता था, और तो और उसके पास प्राइवेसी भी नहीं होती थी कि कभी वो खुद को एक लड़की बनकर देख सके. पर आज वो सब बदलने वाला था. स्वागत है आपका इंडियन लेडीज़ क्लब में!

क्रमश: … 

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इंडियन लेडीज़ क्लब: भाग १

एक अनूठा क्लब जहाँ भारतीय क्रॉस-ड्रेसर अपने सपनो को पूरा करते थे. और आज का दिन तो इस क्लब में ख़ास भी था. जानने के लिए पढ़े!


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नाम का क्या है? नाम तो कभी कभी धोखा भी  दे सकते है. इंडियन लेडीज़ क्लब नाम भी कुछ ऐसा ही था. नाम के विपरीत इस क्लब में एक भी महिला सदस्य नहीं थी अपितु यह क्लब तो था उन आदमियों के लिए जिनका औरतों से इतना लगाव था कि वो खुद एक खुबसूरत औरत बनने का सपना संजोये हुए थे. जी हाँ! इंडियन लेडीज़ क्लब या फिर संक्षिप्त में ILC एक क्लब है क्रॉसड्रेसर पुरुषो के लिए! पर इस क्लब को शुरू करने वाले सुमीत के नजरिये से ILC एक ऐसा क्लब है जहाँ एक मुक्त वातावरण में सभी आदमी अपना स्त्री-भाव और रूप अपना सकते है. सुमीत अक्सर कहता था, “एक खुबसूरत औरत बनकर हम इस दुनिया की खूबसूरती में इजाफा ही कर रहे है! एक स्त्री और पुरुष में बराबरी करने का इससे अच्छा तरीका क्या हो सकता है कि एक पुरुष सुन्दर सा सलवार पहन कंधे पर दुपट्टा डाले थोडा तो समझ सके कि एक औरत होना कितना सुखद अनुभव हो सकता है!”

पेशे से सॉफ्टवेर इंजिनियर, २८ वर्षीया सुमीत की सगाई तो हो चुकी है पर अब तक शादी नहीं हुई है. उसने यह क्लब आज से करीब ३ साल पहले अपनी गिनी चुनी क्रॉसड्रेसर सहेलियों के साथ बनाया था. और आज इस क्लब में ५० से ज्यादा सदस्य है! अपने अन्दर की औरत को अपनाते हुए सुमीत अपना रूप बदल कर सुमति बन, अपने किराये के घर में लगभग हर हफ्ते क्लब की एक मीटिंग रखता(ती?) है जहाँ सभी सदस्या इस स्वर्ग में आकर अपनी दबी हुई हसरतो को उन ३-४ घंटो में पूरी करती है.

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सुमति को आज बहुत काम करने थे इसलिए उसने एक हलकी क्रेप साड़ी पहनना तय किया.

आज तो इस क्लब के लिए ख़ास दिन है. और आज इस क्लब में बहुत भीड़ भी होने वाली है. बेचारी सुमति को भी न आज न जाने कितने काम करने है. अगले एक घंटे में आदमियों का झूंड जो इकट्ठा हो जाएगा और फिर शुरू होगा उनका ट्रांसफॉर्मेशन सुन्दर औरतों में! कोई अनारकली पहन इठलायेगी, तो कोई बड़े से घेरे वाली लहंगा चोली पहन कर बलखाएगी, कोई छोटी छोटी वेस्टर्न ड्रेस पहन कर इतराएगी तो कोई फूल के प्रिंट वाली साड़ी पहन कर शर्माएगी या फिर साउथ इंडिया की सिल्क साड़ी पहन कर मुस्कुराएगी. जल्दी ही सुमति का घर उस घर में बदल जायेगा जहां मानो शादी की तैयारियां हो रही होगी और कहीं दुल्हन और उसकी सखियाँ सज संवर कर तैयार हो रही होगी. और ऐसे ख़ास दिन के लिए सुमीत या हमारी प्यारी सुमति, जो की इस क्लब की प्रेसिडेंट है, उसे तो कुछ फैंसी सी भारी जोर्जेट की भारी साड़ी पहननी ही चाहिए! पर वो बेचारी तो देर होने के चक्कर में अपनी सुध-बुध खोयी हुई है. उसे न जाने कितने काम करने बाकी है अभी भी. इसलिए उसने एक साधारण सी लाल रंग की साड़ी पहनने की सोची, हलकी फॉक्स क्रेप कपडे की साड़ी, संभालने में आसान और झटपट प्लेट बनाकर पहनने के लिए सबसे बढ़िया.  आखिर आज के दिन बेचारी को इतनी दौड़-भाग करनी होगी… कहाँ वो जोर्जेट की भारी साड़ी पहन कर ये सब करेगी. उसने जल्दी से साड़ी पहनना शुरू की, एक्सपर्ट थी वो इस मामले में..

ilc30“डिंग डोंग”, दरवाज़े की घंटी बजी.  “लो लोग आना शुरू भी हो गए. मैं तो अब तक तैयार भी नहीं हुई हूँ”, सुमति ने खुद से कहा. वो तुरंत दरवाज़े की ओर दौड़ पड़ी और साथ ही साथ अपने पल्लू को अपने कंधे पर पिन लगाने लगी. उसने दरवाज़ा खोला तो उसकी जान में जान आई. सामने उसकी सबसे अच्छी सहेली अंजलि थी. अंजलि को देखते ही उसकी आँखों में ख़ुशी थी.

“ओह अंजलि! अच्छा हुआ तुम आ गयी. मेरी प्यारी सहेली की मुझे आज बहुत ज़रुरत है इस घर को ठीक करने के लिए. १ घंटे से भी कम समय बचा है.”, सुमति ने अंजलि को गले लगाते हुए कहा. अंजलि ने भी उसे बड़े प्यार से गले लगाया और मुस्कुरा कर सुमति की ओर देखने लगी. उसने सुमति के बालो और पीठ पर प्यार से अपना हाथ फेरा और बोली, “मुझे पता था कि आज तुझे मदद की ज़रुरत होगी. कितनी बार मैंने तुझसे कहा है कि कुछ औरतों को मदद के लिए पहले से ही घर में बुला लिया कर, पर तू मानती ही नहीं है. सब कुछ कब तक अकेले अकेले करेगी?” अंजलि हमेशा की तरह बड़ी प्यारी थी. सुमति का तब ध्यान अपनी साड़ी की प्लेट पर गया. दौड़ते हुए आते वक़्त उसने अपना एक पैर प्लेट पर रख दिया था. उसकी साड़ी की प्लेट एक बार फिर बिखर गयी थी. उसे फिर से ठीक करना होगा अपनी साड़ी को.

“हे भगवान! आज तो काम पर काम बढ़ते जा रहे है. अब इस प्लेट को भी ठीक करना होगा.”, सुमति ने कहा. पर फिर वो एक पल को रुक कर अंजलि को देखने लगी और बोली, “अंजलि, आज तो तू  … कमाल दिख रही है यार. हाय, कितने सुन्दर फूलों का प्रिंट है तेरी साड़ी पे. गुलाबी और पीला रंग तुझ पर बहुत फबता है. तेरी ही तरह सुन्दर है तेरी साड़ी भी. पर तू आज पहले से साड़ी पहन कर कैसे आ गई?”, सुमति ज़रा आश्चर्य में थी क्योंकि अंजलि हमेशा यहाँ आने के बाद ही तैयार होती थी. पर आज वो पहले से ही औरत बनकर आई थी.

“ओहो, मेरे पेरेंट्स, पत्नी और बेटी घर से बाहर गए हुए थे आज. तो मैंने सोचा की थोडा एडवेंचर हो जाए. इसलिए मैं घर से ही साड़ी पहनकर निकल आई. सोची इस तरह यहाँ आकर तुरंत तेरी मदद कर सकूंगी. जितने जल्दी हो सके कार भगाते हुए लायी हूँ. मैं पहली बार औरत बनकर अकेले घर से बाहर निकली थी…. बहुत मज़ा भी आया और थोडा डर भी लगा!”, अंजलि हँसने लगी. “पता है? जब भी सिग्नल पर रूकती थी मैं तो लोगो की नज़रे जब मुझ पर पड़ती तो बड़ा अच्छा भी लग रहा था”

“मैं जानती हूँ कि मेरी सहेली है ही इतनी खुबसूरत कि हर कोई उसे देखना चाह रहा होगा. पर आज शायद इस लाल रंग की ब्रा का भी कमाल होगा जिसका स्ट्रेप तेरे ब्लाउज से निकल कर दिख रहा है”, सुमति भी हँसने लगी.  “ऑफ़ कोर्स, डार्लिंग! मैंने जान बुझकर निकाल रखी थी! और मैंने अपनी साड़ी का आँचल भी ऐसे सरकाया था कि मेरा क्लीवेज भी दिखाई पड़े!”, अंजलि बोली.

“अंजलि!! तू भी न!!! कितनी शरारती है… लोग भी कितनी हसरत भरी निगाहों से तेरी ओर देखते रहे होंगे”, सुमति बोली. “हाँ हाँ ठीक है. पर पहले तो तेरी साड़ी बदलते है. आज के ख़ास मौके पर तुझे इतनी साधारण साड़ी पहनने नहीं दूँगी मैं.” अंजलि ने सुमति का हाथ पकड़ा और उसे अन्दर के कमरे में ले जाने लगी. “पर अंजू, हमारे पास समय नहीं है इतना कि  अब मै साड़ी बदल सकूं.”, सुमति ने कहा पर उसे पता था कि अंजलि ने अब मन बना लिया है. वो मानेगी नहीं.

 

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अंजलि ने सुमति की साड़ी पहनने में मदद की.

वैसे भी सुमति और अंजलि दोनों साड़ी पहनने में एक्सपर्ट थी. अंजलि ने जल्दी से एक हलकी हरी रंग की साड़ी पसंद की जो थोड़ी अधिक फैंसी थी पर फिर भी सुमति के लिए आसान रहेगी सँभालने को. अंजलि ने सुमति के तन पर जल्दी से उस सुन्दर सी साड़ी को लपेटना शुरू की, और सुमति अपना ब्लाउज बदल रही थी. फिर अंजलि ने सुमति की प्लेट बनाने में मदद की और पिन लगाने लगी ताकि साड़ी खुलने का डर ही न रहे! वो दोनों जानती थी कि किसे क्या करना है ताकि जल्द से जल्द सुमति तैयार हो सके. दोनों को देख ऐसा लगता था जैसे दोनों का जनम सहेलियां बनने के लिए हुआ था. दोनों एक दुसरे को कितने अच्छी तरह से समझती थी. वैसे तो दोनों कितने अलग अलग परिवेश से आई थी पर फिर भी दोनों इतनी घुल मिल गयी थी.

वैसे तो सुमति थोड़ी अधिक जवान थी, और नए कदम लेने से कभी घबराती नहीं थी, वो सही मायने में इंडियन लेडीज क्लब की लीडर थी. जबकि अंजलि सबको प्यार देने वाली औरत थी जो एक छोटे गाँव में पली बढ़ी थी. अभी वो अपने रुढ़िवादी माता-पिता के साथ रहती है. उसके माता पिता ने उसकी शादी एक नीता नाम की लड़की से की थी जो कि उसीकी तरह एक गाँव में पली बढ़ी थी. नीता को बचपन से सिखाया गया था कि उसे बस घर परिवार को संभालना है और अपने पति को भगवन मान कर उसकी सेवा करनी है. नीता अपने सास-ससुर की सेवा में कोई कमी नहीं होने देती थी. पर जबसे उसने बेटी को जनम दिया है, अंजलि के माता पिता ने नीता का जीना मुश्किल कर रखा था. उन्हें तो बेटा चाहिए था. पर अंजलि एक अच्छे पति का कर्त्तव्य निर्वाह करते हुए हमेशा नीता का बचाव करती थी. नीता के लिए, अंजलि एक पुरुष के रूप में सबसे अच्छा पति था… उससे अच्छा कुछ नीता जैसी लड़की के लिए नहीं हो सकता था. अंजलि को भी अपनी बेटी से बहुत प्यार था. आखिर जब एक इंसान के अन्दर खुद एक औरत छुपी हो, वो भला स्त्री से कैसे प्यार न करता. अंजलि के माता पिता को पसंद नहीं था फिर भी अंजलि, एक पति के रूप में, अपनी पत्नी नीता की हर तरह से मदद करती थी फिर चाहे वो खाना बनाना हो या कपडे धोना या बेटी की परवरिश करना. हर काम में वो साथ देती थी. जितनी स्वीट वो एक आदमी के रूप में थी, उतनी ही स्वीट वो एक औरत के रूप में भी थी.देख कर लगता है जैसे सुमति हमेशा से ही एक लीडर थी, पर पुरुष यानी सुमित के रूप में वो हमेशा से ऐसे कॉंफिडेंट नहीं थी. यह सब बदलने लगा था जब सुमति की मुलाक़ात अंजलि से ५ साल पहले हुई. उनकी दोस्ती बढ़ने लगी और वो खुद अंजलि के साथ सुमति के रूप में खिलने लगी. सुमति क्या बढ़ी, सुमित भी अपने काम में और ज्यादा कॉंफिडेंट इंसान बन कर उभरने लगा. और आज सुमति, एक पुरुष या स्त्री, किसी भी रूप में एक लीडर है. और सुमति इस बात का क्रेडिट अंजलि को देना नहीं भूलती.

सुमति अब अपनी तोता हरी रंग की साड़ी पहनकर तैयार थी. अंजलि ने उसकी ओर देख कर कहा, “मैंने तुझसे कहा था न कि बस ५ मिनट लगेंगे तैयार होने! अब बस ज़रा थोड़ी और डार्क लिपस्टिक लगा लो मेरी जान. और फिर हम दोनों मिलकर घर को ठीक करती है.”

“हाँ हाँ मैडम. मैं जानती थी अब जब तुम आ गयी हो तो सब कुछ हो जाएगा.”, सुमति बोली और एक बार फिर अपनी प्यारी सहेली को गले से लगा लिया. उन दोनों को एक बार फिर उन दोनों के बीच की प्यारी दोस्ती का एहसास हुआ. अंजलि फिर किचन जाकर अपने एक हाथ में झाड़ू लेकर वापस आई. “अच्छा मैं ज़रा पार्टी रूम की सफाई करती हूँ, फिर ड्रेसिंग रूम और किचन की करूंगी. तू तब तक ज़रा सजावट का काम देख ले इन कमरों की. फिर हम दोनों खाना भी टेबल पर लगा देंगी”, अंजलि ने अपना प्लान सुमति को बताया.

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अंजलि पार्टी के लिए कमरा और ड्रेसिंग रूम साफ़ करने लगी.  घर में अपनी पत्नी नीता की मदद करने के अनुभव से  अंजलि पार्टी की तैयारी करना बखूबी सीख चुकी थी.

अंजलि अपने घर में हमेशा से ही अपनी पत्नी की मदद करती रही थी इसलिए उसे पता था कि ऐसे समय पर कैसे प्लानिंग करनी चाहिए. अंजलि की पत्नी नीता हमेशा भगवान को धन्यवाद करती थी कि उसे इतना अच्छा पति मिला था. पर अपने पति के इस स्त्री रूप से वो हमेशा सहज नहीं रह पाती थी. अंजलि ने कभी नीता को मजबूर नहीं किया कि नीता उसकी क्रॉस-ड्रेसिंग को स्वीकार करे. पर नीता ऐसे माहौल में पली बढ़ी थी जहाँ उसे सिखाया गया था कि वो कभी अपने पति को किसी भी चीज़ के लिए मना न करे. वो चुप चाप स्वीकार कर लेती जब कभी अंजलि घर में अपने कमरे में अकेले साड़ी पहन कर तैयार होती. अंजलि इंडियन लेडीज क्लब में अक्सर कहती थी कि वो कितनी भाग्यशाली है जो उसे ऐसी पत्नी मिली जिसने उसके इस रूप को भी स्वीकार किया है. पर अंजलि को पता नहीं था कि नीता ये सिर्फ मजबूरी में ही स्वीकार करती है. नीता के मन की बात न कभी उसने अंजलि से की और न ही अंजलि को इस बात का अंदाजा था.

फिलहाल इंडियन लेडीज क्लब में यह दो औरतें, अंजलि और सुमति, काम में जुटी हुई थी. अंजलि ने हर कमरे को साफ़ कर दिया था, और सुमति ने हर कमरे की सजावट कर ली थी. अब बस १५ मिनट ही और बचे थे जब सभी उस घर में आना शुरू कर देंगे. अब बस उन्हें वो मेज सजानी थी जहाँ सभी के डिनर का इन्तेजाम होगा. वे दोनों खाना और एपेटाइज़र लोगो के तैयार होने के बाद गरम करेंगी, ऐसा उन्होंने तय किया.

 

मधुरिमा, एक भरी पूरी काय वाली मदमस्त औरत थी, जो अपने नखरो से लोगो को हंसा हंसा कर पागल कर देती. किसी भी पार्टी में जान डालना हो तो मधुरिमा से अच्छा कोई नहीं.

एक बार फिर दरवाज़े की घंटी बजी और इस बार दरवाज़ा अंजलि ने खोला. दरवाज़े पर इस वक़्त इस क्लब की तीसरी संस्थापक मधुरिमा थी. कोई भी मधुरिमा को देख ले, तो सबसे पहली नज़र उनके भरे पुरे दिखने में मुलायम स्तनों पर जाती थी. एक क्रॉस-ड्रेसर के पास असली स्तन हो, इससे बड़ा उपहार भगवान उसे और क्या दे सकते है? ऐसा उस क्लब की दूसरी औरतें सोचा करती थी. पर सच तो ये था कि मधुरिमा के स्तन उसकी बीमारी और कुछ दवाइयों की वजह से थे. पर हंसमुख मधुरिमा ने उसे हँसते हुए स्वीकार कर लिया था. एक पुरुष के रूप में तो उसके पीठ पीछे उसके स्तनों के उभार को देखकर हँसते थे, पर वो खुद ही वो ऐसे जोक करती थी जैसे “उसे अपनी पत्नी से बड़ी ब्रा की ज़रुरत होती है”. जब वो खुद पर हँस लेती थी तो दुसरे लोग उसके साथ ही हँस लेते थे. जो पीठ पीछे हँसने वाले होते थे, उन्हें खुद शर्मिंदगी महसूस होने लगी थी. पर सच में देखा जाए, तो मधुरिमा जैसे हंसमुख इंसान बहुत ही कम होते है दुनिया में. वो खुद भी खुश रहती और अपनी बातों और हरकतों से सभी को खुश कर देती. और उसका यही स्वाभाव उसे जवान बनाये रखता जबकि वो ५० से अधिक की थी उम्र में. सुमति के इस क्लब को बनाने के पहले, मधुरिमा ही थी जिसने अपने घर के दरवाज़े दुसरे क्रॉस-ड्रेसर के लिए खुले रखे थे. मधुरिमा की एक बेहद प्यारी पत्नी भी थी, जो न सिर्फ मधुरिमा का सहारा थी, बल्कि उसने अपने घर में बहुत से क्रॉस-ड्रेसर का खुले दिल से स्वागत किया था. मधुरिमा की पत्नी ही कारण थी कि मधुरिमा को कभी एक औरत के रुप में घर से बाहर निकलने में कभी सकोच नहीं हुआ. मधुरिमा का जितना अच्छा स्वभाव था, उसी की वजह से कई लडकियां मधुरिमा को अपनी माँ मानती थी.

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मधु को देखते ही सुमति की आँखें ख़ुशी से चमक उठी. वो दोनों न सिर्फ दोस्त थी बल्कि रिश्ते में माँ-बेटी भी थी.

“अच्छा लड़कियों… अब तुम्हारी महारानी आ चुकी है. सुमति कहाँ है? मेरी आज्ञा है कि वो तुरंत मेरे सामने पेश हो और आकर मुझे गले लगाए”, मधुरिमा ने आते ही अपनी हँसने खेलने वाली नौटंकी शुरू कर दी थी.”माँ!!!”, मधु की आवाज़ सुनकर सुमति भी ख़ुशी से दौड़ी चली आई. सबसे पहले मिलते ही सुमति ने झुककर मधु के पैर छुए.

“देख रही हों अंजलि तुम? मैंने इसे गले लगाने कहा और यह मेरी आज्ञा की अवहेलना कर मेरे पैर छू रही है. मुझे तुरंत एक हग चाहिए! वरना इस बात की सजा मैं इसे चूमकर दूँगी”, मधु की नौटंकी जारी रही और उसने झुकी हुई सुमति के कुलहो पर एक प्यार भरी चपत मारी.

“आउच! माँ!! क्या कर रही हो? कितना इंतज़ार करायी तुम. क्या अपनी बेटी की पार्टी को सक्सेस नहीं बनाओगी आज तुम? तुम्हे अच्छा लगेगा कि तुम्हारी बेटी की पार्टी फ्लॉप हो? बोलो?”, सुमति ने भी नाटक करते हुए गुस्सा दिखाया.

“दोनों ही माँ-बेटी ड्रामा क्वीन हो! चलो, अब काम पर लग जाओ.. लोग आते ही होंगे.”, अंजलि ने हँसते हुए कहा.

मधुरिमा ने सलाद बनाना शुरू किया और साथ ही साथ अपने नखरे भी दिखाती रही.

“हां माँ! तुम ज़रा अपनी फेमस सलाद तैयार कर दोगी?”, सुमति ने मधु से कहा. “ओह, तो मैं सिर्फ सलाद बनाने के लिए याद आ रही थी तुम्हे? अच्छा तुम दोनों इतना कहती हूँ तो मैं मना कहाँ कर सकती हूँ. हाय ये माँ होना भी न आसान नहीं होता. बेटी कितनी भी बड़ी हो जाए अपनी माँ से काम करवाती ही रहती है”, मधुरिमा हमेशा की तरह एक मजबूर माँ का ड्रामा करती रही. पर सच में वो सिर्फ प्यार से सुमति को छेड़ रही थी. मधु ने फ्रिज से सलाद का सामान निकाला और धम-धम करती अपने पैरो की पायल को बजाती हुई सोफे पर धम्म से जाकर बैठ गयी. चेहरे से मधु भले बहुत ही खुबसूरत औरत न हो, पर उसकी बड़ी भरी हुई काया उसके पूरी तरह औरत होने का आभास दिलाती थी. कभी कभी मस्ती में वो एक औरत के रूप में भी थोड़ी आदमियों की तरह हरकत करती तो वो और भी मजेदार लगती. यदि आपने उसे उस वक़्त सलाद के लिए फल-सब्जी कांटते हुए देखा होता तो आपको समझ आता कि कोई भी औरत अपनी साड़ी को यूँ घुटनों तक तो कभी न उठा कर करती यह सब… पर मधु ऐसा कर सकती थी. और उसके बाद भी वो किसी भी औरत से कम नहीं लगती. मधु सचमुच एक ख़ास औरत थी.

“तुम्हे पता है अंजलि? काश मेरी बेटी सुमति भी अपनी माँ की तरह मेहनती होती. देखो कितनी आलसी हो गयी है. ससुराल जाकर एक दिन मेरी नाक कटाएगी ये! पर मुझे ज्यादा चिंता इस बात की रहती है कि कितनी दुबली हो गयी है ये! एक माँ के लिए सबसे ख़ुशी की बात होती है कि उसकी बेटी अच्छे से खाए और सेहतमंद रहे पर यह है की जब तब डाइटिंग ही करती रहती है. मुझे देखो, मैं यहाँ ९० किलो की हो रही हूँ और यह ६० किलो की भी नहीं है. काश ये अपनी माँ की तरह होती! कौन करेगी इस सुखी दुबली लड़की से शादी? सोच सोच कर ही अब तो मेरा भी वजन कम होने लगा है”, मधुरिमा एक असली माँ की तरह सुमति को छेड़ना नहीं भूलती.

मधु की बात सुनकर अंजलि जोर जोर से हँसने लगी. तो सुमति भी अपनी जगह से उठकर मधु के पीछे आकर सोफे पर बैठ गयी और मधु को पीछे से गले लगाती हुए बोली, “माँ, यदि मैं तुमसे तुम्हारी तरह एक चीज़ पाना चाहूंगी तो वो है तुम्हारे बड़े बड़े बूब्स!” सुमति की बात सुनकर मधु छत की ओर देख कर बोली, “हे भगवान! कैसे बेशर्म बेटी दी है मुझे!”

सुमति और मधु के बीच की छेड़-छाड़ और कुछ देर चलती रही, और अब इंडियन लेडीज क्लब के और सदस्य भी आने लग गए थे. घर में अब चहल पहल थी. आने वाले लगभग सभी सदस्य एक आदमी के रूप में आये थे, पर अब सभी अपने सपनो की औरत बनने में मशगुल हो गए थे. इंडियन लेडीज क्लब अब जाग गया था और वातावरण में खुशियाँ अब बस बढती ही जा रही थी. और खुबसूरत औरतों की हँसी और खुबसूरत बातें अब माहौल को और खुशनुमा बना रही थी. सचमुच दुनिया कितनी सुन्दर होती यदि हर किसी के पास आज़ादी होती कि वो बिना दूसरो को परेशान किये अपनी मर्ज़ी से अपना जीवन जी सकता. सुमति ने अपने आसपास हंसती-खेलती सजती संवरती औरतों को देखा, और उसे मन में एक सुखद अनुभूति हुई यह सोचकर कि उसने ये इंडियन लेडीज क्लब इन औरतों के लिए बनाया है.

क्रमश: … 

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