Caption: Challenge

Captions published under shortest story challenge

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Mother-in-law / सास
By Anupama Trivedi

Another life / दोहरी ज़िन्दगी
By Devika Sen

Womanhood / स्त्रीत्व
By Gitanjali Paruah

Maid / नौकरानी
By Saloni Sharma

Stuck / पहली बार
By Sonali Kapoor

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Caption: Best friends

When I came out as a crossdresser to my best friend, you will not believe what happened next.

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English हिंदी


“I cannot believe this is you!”, said Rajiv when he looked at my photograph wearing a green salwar suit. How could he believe? After all, it was me, Nimit, his best friend since his childhood who was sitting next to him wearing a t-shirt and jeans. It was unimaginable for anyone to realize that the beautiful girl in the picture with long hair could be a man like me.

“Of course, it is me. Rajiv.”, I said to him. I had finally decided to open up about my cross-dressing to my best friend who is also my roommate in a city where we both work. He didn’t ask much questions or judge me at all. I knew that Rajiv is not going to do anything to hurt me in anyway. I trusted him, and his actions so far suggested that I was right. He stared at the picture for a while and finally hesitantly asked, “Can I see you in real as a woman? Err.. only if you don’t mind.” I smiled at him. No, I was not being feminine or anything at this time. I was just being his friend he had always known. “Wait here for me”, I said to him.

I stood up and went to my bedroom where I began my transformation. I thought I will surprise him with my looks in a saree. It took me about 10 minutes to find a nice saree and drape it. But it took me about half an hour to apply makeup and wear accessories like dozens of bangles which I really like. I shaped my eye-brows a little bit with my liner because I wanted to look like a real woman. Finally, I applied bindi on my forehead and came out holding my saree pallu with a big smile on my face. I was thrilled because I was coming out as a woman to someone for the first time in my life!

“Wow!! You look … you look…”, Rajiv could not complete his sentence when he looked at me in a pretty colorful lehariya saree. May be because he was mesmerized by my beauty or may because he could not believe it was me, his best friend, Nimit. Seeing him struggle with his words, I giggled. This time I giggled like a real girl. “What’s the problem, Rajiv? Haven’t you seen a pretty girl before?”, I said laughingly.

“You look… amazing!!”, he finally completed his sentence. He looked a little nervous. “What should I call you?”, his next question came up with a lot of hesitation.

“Hmm… I prefer to be called Smita! You know you can treat me like your sister-in-law or like any other young married lady from your neighborhood”, I excitedly told him about my desire.

He gave a nervous smile and said, “Smita bhabhi (sister-in-law)? You know that the relationship between a brother-in-law and a sister-in-law can be really naughty. Right?”, he almost tried to tease me with his shy benign friendly look in his eyes.

“He he.. it’s ok my dear brother-in-law. You can talk naughty to me, but don’t try to come near me. After all, I am a married woman, na!”, I laughed again as I pulled my saree pallu over my head as a gesture of being a devoted married woman.

Honestly, Rajiv had been really a gentleman. After that day, he would occasionally tease me with his words like a true brother-in-law would, but he never said or did anything indecent. And our friendship only grew after that. I was happy to be his sister-in-law after coming back from my work. And he always respected me as a woman. Sometimes when I would be watching TV sitting on a sofa, he would come and sit next to me. And he would hold my saree pallu in his hands, play with it and touch it to feel the softness of the fabric.

I looked into his eyes. I understood what he wanted. I knew that he hasn’t fully realized it himself but the time has come when he himself should wear a saree, and experience what I feel everyday when I become a woman. The time has come for him to become my female friend. I hugged him, and took him to my room where I would transform him into my first and best female friend. Our friendship was going to reach the next level tonight.

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“मुझे यकीन नहीं होता कि ये तू है यार”, राजीव ने मुझसे कहा जब उसने मेरी फोटो देखी जिसमे मैं हरे रंग का सलवार सूट पहने हुए था. वैसे भी ऐसे कैसे यकीन कर लेता वो? आखिर, वो मैं था, निमित, उसके बचपन का जिगरी दोस्त जो उसके बगल में टी-शर्ट और जीन्स पहने बैठा हुआ था. किसी के लिए भी यकीन करना मुश्किल होता कि उस फोटो की खुबसूरत लड़की जिसके खुले लम्बे बाल है, वो कोई और नहीं बल्कि मैं हूँ निमित.

“ऑफ़ कोर्स, वो मैं ही हूँ राजीव”, मैंने उससे भरोसा दिलाते हुए कहा. आखिर आज मैंने अपने क्रॉसड्रेसिंग के राज़ को अपने बेस्ट फ्रेंड के सामने खोल ही दिया. अब तो वो मेरा रूममेट भी है उस शहर में जहाँ हम दोनों काम करते है. उसने मुझसे ज्यादा सवाल भी नहीं किये और न ही कोई बुरा बर्ताव. मैं जानता था कि राजीव ऐसा कुछ नहीं करेगा जिससे मुझे बुरा लगे. मुझे उस पर भरोसा था और उसका अब तक का व्यवहार मेरे भरोसे को सही ठहरा रहा था. सच में मेरा अच्छा दोस्त था राजीव. उसने कुछ देर और उस फोटो को देखा और फिर बोला, “क्या मैं तुम्हे लड़की के रूप में देख सकता हूँ? तुम बुरा न मानो तो” उस कहने में एक झिझक थी. पर उसकी इच्छा सुनकर मैं मुस्कुरा दिया. किसी औरत की तरह नहीं बल्कि एक दोस्त की तरह जिसे वो बचपन से जानता था. “तुम मेरा यहीं इंतज़ार करना. मैं आता हूँ”, मैंने उससे कहा.

मैं उठ कर अब अपने बेडरूम में आ गया जहाँ मैं अब औरत बनने वाली थी. मैंने सोचा कि राजीव को आज साड़ी पहन कर एक और सरप्राइज दू. मुझे करीब १० मिनट लगे होंगे एक अच्छी सी साड़ी ढूंढकर पहनने को पर मेकअप वगेरह करने में मुझे आधा घंटा और लग गया. मुझे चूड़ियां पहनना बहुत पसंद है तो मैंने करीब २ दर्जन कांच की चूड़ियां भी पहन ली. फिर मैंने अपनी ऑयब्रौस को अपने लाइनर से थोडा आकार दिया ताकि मैं एक खुबसूरत औरत की तरह दिख सकूं. आखिर में अपने माथे पर छोटी सी बिंदी लगाकर अपनी साड़ी का पल्लू हाथ में पकडे और एक बड़ी सी मुस्कान लिए मैं कमरे से बाहर निकली. आखिर ख़ुशी का दिन था ये. पहली बार एक औरत के रूप में मैं किसी के सामने आ रही थी!

“Wow!! तुम तो … तुम तो…”, राजीव अपने वाक्य भी पूरा नहीं कर पा रहा था मुझे लहरिया साड़ी पहने इठलाते देख कर. शायद मेरी खूबसूरती से उसके होश उड़ गए थे या फिर उसे यकीन नहीं हो रहा था कि मैं उसका दोस्त निमित हूँ. उसे ऐसे शब्दों से लडखडाते देख मैं खिलखिलाने लगी. इस बार बिलकुल एक औरत की तरह! “क्या बात है राजीव? मैं अच्छी नहीं दिख रही तुम्हे?”, मैंने हँसते हुए उससे पूछा. बेचारे की तो हालत थोड़ी खराब थी.

“नहीं… तुम बहुत खुबसूरत औरत लग रहे हो… लग रही हो”, उसने किसी तरह अपना वाक्य पूरा किया. थोडा नर्वस लग रहा था वो. “मैं तुम्हे क्या कह कर पुकार सकता हूँ?”, उसने पूछा.

“हम्म…. मुझे स्मिता नाम पसंद है. तुम मुझे अपनी भाभी मान सकते हो या फिर मुझे इस तरह ट्रीट कर सकते हो जैसे तुम्हारे पड़ोस में रहने वाली कोई जवान शादीशुदा औरत हूँ मैं”, मैंने ख़ुशी से अपनी इच्छा जाहिर की.

मेरी बात सुनकर उसने एक नर्वस सी अधूरी मुस्कान दी और मुझसे कहा, “स्मिता भाभी… मुझे अच्छा लगेगा तुम्हे भाभी की तरह ट्रीट करना. पर तुम्हे पता है न कि देवर भाभी के बीच का रिश्ता थोडा नटखट होता है. क्या तुम तैयार हो अपने देवर के लिए मेरी भाभी जी?” वो मुझे छेड़ने की कोशिश कर रहा था पर साथ ही शर्मा भी रहा था.

“हा हा… ठीक है देवर जी. तुम चाहे जितने नटखट हो जाओ मेरे साथ. पर थोड़ी सीमा बनाकर रखना. आखिर एक शादीशुदा औरत हूँ मैं!”, मैं फिर जोर से हँस दी और अपने सर पर पल्लू ओढ़कर कर इठलाने लगी जैसे एक पतिव्रता औरत हूँ!

सच कहूं तो राजीव एक जेंटलमैन था. उस दिन के बाद भले वो एक देवर की तरह मेरे साथ शरारतें करता था पर कभी भी उसने कोई अश्लील बात या हरकत मेरे साथ न की. हम दोनों की दोस्ती उस दिन के बाद से और गहरी होती चली गयी. मैं काम से घर वापस आने का बाद ख़ुशी से राजीव की स्मिता भाभी बन जाया करती थी. और वो मेरी हमेशा एक औरत के रूप में इज्ज़त किया करता था. कभी कभी जब मैं सोफे पर बैठ कर टीवी देख रही होती थी तब वो मेरे साड़ी के पल्लू को अपने हाथ में लेकर उससे खेलता और साड़ी के स्पर्श को महसूस करता. कभी कभी मेरी साड़ी को वो एक हसरत भरी निगाहों से देखता.

एक दिन मैंने उसकी आँखों में वो हसरत देख ली. मैं समझ गयी थी कि वो क्या चाहता है पर शायद वो पूरी तरह से खुद को अब तक नहीं समझ सका था. पर अब समय आ गया था कि अब वो खुद साड़ी पहन कर वो ख़ुशी महसूस करे जो मैं रोज़ औरत बनकर किया करती थी. अब समय आ गया था कि राजीव मेरे दोस्त के साथ साथ अब मेरी  सहेली भी बन जाए. वो अब भी मेरे पल्लू को पकड़ा हुआ था जब मैंने उसकी आँखों में देखा और उसे गले लगा लिया. और फिर उसका हाथ पकड़ कर मैं अपने कमरे में ले आई जहाँ आज वो मेरी पहली और सबसे प्यारी सहेली बनने वाला था. हमारी दोस्ती इस पल के बाद से एक नए कदम की ओर बढ़ रही थी.

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इंडियन लेडीज़ क्लब: अंतिम भाग

आखिर वो रात आ ही गयी थी जब इंडियन लेडीज़ क्लब की औरतों का जीवन एक बार फिर बदलने वाला था. क्या वो आगे भी औरत बनी रहेंगी?

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आखिर वो घडी आ ही गयी थी जब उस मेसेज के अनुसार सुमति और इंडियन लेडीज़ क्लब की सहेलियों के साथ कुछ ख़ास होने वाला था. क्या होने वाला था उस रात? सुमति तो अब भी एक खुबसूरत दुल्हन के लिबास में मुस्कुरा रही थी. उसके हाथों और पैरो पर बेहद सुन्दर डिजाईन वाली मेहंदी रचाई गयी थी. उसके आसपास उसकी बहाने, भाभियाँ और बहुत सी औरतों ने उसे घेर रखा था. हर जगह ख़ुशी और औरतों की हँसी की गूंज थी. हर कोई तो खुश था, फिर भी उस ख़ुशी के पीछे सुमति, अंजलि और मधुरिम चिंतित भी थी कि आज रात उनके साथ कौनसी नयी मुसीबत आने वाली है. इस वक़्त सभी औरतें सुमति की मेहंदी और उसकी खूबसूरती की तारीफ़ करने में लगी हुई थी. पर उसके बाद क्या हुआ वो किसी को अच्छी तरह से ध्यान नहीं आ रहा था. जैसे सभी शायद किसी नशीली नींद में चले गए थे. और सुमति को भी याद न रहा कि उसके बाद क्या हुआ था.

सुमति को पिछली रात इतना ही याद रहा कि वो औरतों से घिरी हुई थी. पर उसके बाद क्या हुआ था?

अगली सुबह

सुमति अपने बिस्तर से सोकर उठी पर उसने अब तक अपनी आँखें नहीं खोली थी. वो बाहर से कुछ औरतों की आपस में बातें करने की आवाजें सुन सकती थी.

“क्या दूल्हा अब भी सो रहा है?” किसी ने पूछा. “हाँ, कल इतनी रात तक जगा हुआ जो था. पर आज तो उसकी शादी है. कोई जाकर जगाओ उसे”, दूसरी औरत ने कहा.

तभी सुमति को अपने सर पर के प्यार भरा स्पर्श महसूस हुआ. “बेटा सुमित, अब उठ भी जाओ. आज शादी है तुम्हारी!”, सुमति ने अपनी माँ की आवाज़ सुनी और अपनी आँखें धीरे से खोली. उसकी माँ उसके सामने मुस्कुराती हुई खड़ी थी.

सुमति को मुश्किल से बस एक सेकंड लगा होगा समझने के लिए कि वो एक बार फिर से आदमी बन चुकी थी. वो एक बार फिर से सुमित थी. वो अपनी माँ के चेहरे को देख मुस्कुराया. एक बार फिर से माँ का बेटा बनकर सुमित खुश था.

उसने उठकर अपना फ़ोन देखा. उसमे एक मेसेज उसका इंतज़ार कर रहा था. +GOD नंबर से आया मेसेज. “सुमति तुमने बिलकुल सही निर्णय लिया. तुमने पिछले कुछ दिनों एक औरत के कर्त्तव्य का बखूबी निर्वाह किया. इसलिए मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है कि तुम्हारी हर इच्छा पूरी हो. इसलिए मैं तुम्हे तुम्हारा पुराना शरीर लौटा रहा हूँ. तुम्हारी दुनिया अब फिर से वैसी ही होगी जैसे १४ दिन पहले थी. तुम्हारा दाम्पत्य जीवन सुखी हो. अपनी पत्नी चैताली को हमेशा खुश रखना.”

सुमित उस मेसेज को पढ़कर तुरंत उठ खड़ा हुआ. और जल्दी ही नहाकर उसने चैताली से मिलने की सोची. उसकी माँ ने उससे कहा, “बेटा शादी के दिन शादी से पहले दुल्हन से मिलना ठीक नहीं होता है.” तो सुमित ने जवाब दिया, “यकीन मानो माँ. आज अब कुछ बुरा नहीं हो सकता. मुझे चैताली से बहुत ज़रूरी बात करनी है”

चैताली का घर बस कुछ १०० मीटर की दूरी पर ही था और सुमित दौड़ा दौड़ा चैताली से मिलने गया जो वहां अपने घर के मेहमानों के साथ व्यस्त थी. उसे दरवाज़े से देखते हुए चैताली खुश हो गयी. चैताली की माँ ने सुमित का स्वागत किया और उसकी इच्छा अनुसार, सुमित और चैताली को मिलने के लिए एकांत में एक कमरा दिलाया जहाँ सुमित चैताली से बात करने के लिए बेचैन था..

चैताली भी जल्दी ही वहां आ गयी. अपनी सिल्क साड़ी में वो परी लग रही थी. “क्या बात है सुमित? सब ठीक है न?”, उसने पूछा.

“चैताली. मैं तो सिर्फ ये कहने आया था कि आज मैं अपने आप को दुनिया का सबसे किस्मत वाला आदमी मानता हूँ जो मुझे तुम्हारी जैसी पत्नी मिल रही है. तुम हमेशा से मेरी अच्छी दोस्त रही हो. और मैं भी कहना चाहता हूँ कि मैं हमेशा तुम्हे प्यार करने वाला पति बन कर दिखाऊँगा. तुम्हारी ख़ुशी के लिए मैं कुछ भी करूंगा. और तुम चाहो तो मैं क्रॉसड्रेसिंग भी छोड़ दूंगा.”

“ओहो सुमित! मैंने तुमसे कभी कहा है क्रॉसड्रेसिंग छोड़ने को? तुम्हे पता है ये राज़ सिर्फ हम दोनों के बीच है. मैंने तुम्हे हमेशा सपोर्ट किया है, और आगे भी करूंगी. वैसे भी जब तुम औरत बनते हो, तो मुझे भी तो एक अच्छी सहेली मिल जाती है बात करने के लिए! मैं हम दोनों के बीच और कुछ भी नहीं बदलना चाहती. मैं तुम्हे प्यार करती हूँ और करती रहूंगी. तुम्हे क्रॉसड्रेसिंग छोड़ने की ज़रुरत नहीं है क्योंकि उसके बगैर तुम अधूरे रहोगे. सुमति को मैं अपने जीवन का हिस्सा बनाऊँगी. ये मेरा प्रॉमिस है”, चैताली ने कहा.

सुमित जल्दी ही चैताली से मिला. चैताली के साथ सुमति का राज़ सुरक्षित था.

चैताली की बात सुन सुमित का दिल भर आया. उसने उसे गले तो नहीं लगाया पर आँखों से उसने उसे धन्यवाद् किया. दोनों एक दुसरे की ओर देख कर मुस्कुराने लगे. उन दोनों के बीच काफी अच्छी आपसी समझ थी. उन्हें एक दुसरे से कुछ कहने के लिए शब्दों की ज़रुरत नहीं थी. वो जानते थे कि उन दोनों का जीवन बहुत खुबसूरत होगा.

जब अंजलि सुमति के घर में सोकर उठी तो उसे पता चला कि वो भी आदमी बन चुकी थी. उसने अपनी बेटी सपना और अपनी पत्नी को अपने बगल में सोता हुआ पाया. फिर उसने अपनी पत्नी को जगाकर कहा, “मेरी प्यारी धरम पत्नी. मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ. मैं जानता हूँ कि तुम सोचती हो कि तुम्हे मेरे हर निर्णय में साथ देना चाहिए. पर मैं तुम्हे बताना चाहता हूँ कि तुम मेरे बराबर हो और हर निर्णय में तुम्हारा उतना ही हक़ है जितना मेरा. तुम अपने विचार से मुझे अवगत करा सकती हो. और एक बात, मैं अपनी बेटी को बढ़ा कर एक स्वाभिमानी औरत बनाना चाहता हूँ. मेरे माता-पिता तुम्हारे साथ भले ठीक से व्यवहार न करते हो क्योंकि तुम्हे पोता नहीं मिला, पर सपना हमारे लिए किसी बेटे से कम नहीं होगी. मैं उसके हर सपने को पूरा करूंगा. और एक माँ होने के नाते तुम भी वैसा ही करना” ये शब्द सुनकर अंजलि की पत्नी दिल ही दिल में अपने पति की ओर शुक्रगुज़ार थी. उसे ख़ुशी थी कि उसकी बेटी बड़ी होकर स्वाभिमानी और इंडिपेंडेंट लड़की बनेगी.

और वहीँ जब मधुरिमा सोकर उठ, तो वो भी अब आदमी बन चुकी थी पहले की तरह. मधुरिमा के लिए तो पुरुष हो या स्त्री, उसका जीवन वैसे ही अच्छा था. उसने अपनी पत्नी अजंता को देखा और कहा, “अजंता, मैंने शायद तुमसे कई बार कहा नहीं है पर तुम्हे पत्नी पाकर मेरा जीवन सचमुच धन्य रहा है. तुम मेरा हर कदम साथ देती रही हो. पता है यदि संभव हुआ तो अगले जनम में मैं तुम्हारी पत्नी बनना चाहूँगा ताकि मैं तुम्हारी सेवा कर सकू!” अजंता के पास कुछ कहने को नहीं था… क्योंकि उसका पति तो हमेशा से ही उसे बेहद प्यार करता था. और फिर अजंता का स्वभाव भी सिर्फ देने वाला था पर उसे बदले में हमेशा बहुत सारा प्यार भी मिलता था.

इन सब से दूर शहर में जहाँ साशा रहती थी, उसकी रात भी चिंता में बीती थी. उसे याद आ रहा था कि कैसे उसने नौरीन के साथ दिल खोलकर बातें की थी. पर जब वो सोकर उठी तो वो एक बार फिर से आदमी बन चुकी थी. और जिस घर में वो थी, वो उसका पहले के घर था जहाँ उसके लड़के रूममेट थे. नौरीन आसपास कहीं भी नहीं थी. वो नौरीन को देखने को बेचैन हो उठी और जल्दी से ऑफिस जाने को तैयार हुई, अब एक आदमी के रूप में. उसे आज एक ज़रूरी काम था.

“नौरीन”, साशा अब लड़के के रुप में दौड़कर नौरीन के पास ओफ्फिए में पहुंचा. “हाँ सुशिल. तुम इतना हांफ क्यों रहे हो? दौड़ कर आये हो क्या?” नौरीन ने साशा के पुरुष रूप सुशील से कहा. नौरीन को पिछले दिनों के बारे में कुछ भी याद नहीं था जब साशा उसके साथ उसकी रूममेट बन कर रही थी.

“नौरीन मुझे तुमसे कुछ कहना है. अर्जेंट!”, साशा यानी सुशील ने कहा. और फिर दोनों एक मीटिंग रूम में चले आये जहाँ सुशील ने दोनों के बीच की चुप्पी को तोड़ते हुए कहा, “नौरीन, तुम ने दुनिया की सबसे अच्छी लड़की हो. तुम सबका सम्मान करती हो और सभी की बिना मांगे मदद भी करती हो, और बदले में किसी से कुछ भी नहीं चाहती. तुम्हे अंदाजा नहीं है कि तुमने मेरे सबसे मुश्किल समय में कैसे मदद की थी. पर मैं वो बात जानता हूँ. इसलिए मैं तुम्हे दिल से धन्यवाद देना चाहता हूँ. उस हर बात के लिए उस हर पल के लिए जिसमे तुमने मेरे साथ दिया था.”

फिर सुशील थोड़ी देर चुप रहने के बाद आगे बोला, “नौरीन, तुम मुझे बेहद पसंद हो. क्या तुम मुझसे शादी करके मेरी पत्नी बनना चाहोगी?”

नौरीन तो सुशील की बात सुनकर हैरान सी रह गयी. वो कुछ कह न सकी. “तुम मेरे सवाल का जवाब दो, उसके पहले मैं तुम्हे कुछ और बताना चाहता हूँ अपने बारे में”, सुशील ने कहा.

और फिर सुशील ने नौरीन को अपनी क्रॉसड्रेसिंग और साशा वाले रूप के बारे में बताया. वो नौरीन को बताना चाहता था पिछले दिनों के बारे में जब साशा और वो साथ रही थी, पर उसे पता था कि नौरीन उस बात का कभी यकीन नहीं करेगी. और उसके पास कोई सबूत भी तो नहीं था. यहाँ तक कि वो फ़ोन में आये sms भी अब उसके फ़ोन से गायब हो चुके थे. सुशील की बात सुनकर कुछ देर सोचने के बाद नौरीन ने सुशील की ओर देखा और बोली, “हाँ. मेरा जवाब हाँ है.” नौरीन मुस्कुरा दी. सच तो ये था कि नौरीन हमेशा से सुशील को चाहती थी और सुशील को ये पता भी नहीं था. पर पिछले कुछ दिनों में सुशील को उसका सच्चा प्यार पाने का मौका मिला था.

नौरीन को ज़रा भी याद नहीं था कि पिछले कुछ दिन साशा उसकी रूममेट बनकर उसके साथ रही थी.

एक बार फिर इंडियन लेडीज़ क्लब की औरतों का जीवन बदल गया था पर इस बार अच्छे के लिए. सुमति यानी सुमित की शादी भी निपट गयी थी जिसमे अंजलि और मधुरिमा उसके पुरुष मित्र बन कर शामिल हुए थे. सभी का जीवन आज ख़ुशी से भरा हुआ था. अब क्रॉसड्रेसर होना किसी के लिए अभिशाप नहीं था.

कुछ दिन बाद

आज इंडियन लेडीज़ क्लब में खुशियाँ ही खुशियाँ थी. और खूब भीड़-भाड थी. न जाने कितने ही आदमी आज यहाँ इकट्ठा हुए थे और खुद को खुबसूरत साड़ियों और लहंगो में सजा रहे थे. क्योंकि आज एक ख़ास दिन था. कुछ दिनों के ब्रेक के बाद इंडियन लेडीज़ क्लब फिर से खुल रहा था. पर इस बार के बदलाव था इस क्लब में. अब ये क्लब न सिर्फ क्रॉसड्रेसर “महिलाओं” के लिए था बल्कि अब उनकी पत्नियों, गर्ल फ्रेंड के लिए भी खुल गया था. बहुत सी क्लब की औरतों की मदद आज उनकी पत्नियां या गर्ल फ्रेंड कर रही थी. उन्हें सजाते हुए वो सब भी खुश थी. और जो क्लब की सदस्य अकेली थी, उनकी मदद के लिए क्लब की सीनियर लेडीज़ तो थी ही. सबके चेहरे पर ख़ुशी थी आज.

पर एक सदस्य जो सबसे ज्यादा खुश थी, वो थी सुमति. सुमति को आज दुल्हन के रूप में सजाया जा रहा था. अंजलि, मधुरिमा और कई औरतें इस ख़ास अवसर पर सुमति को सजाने में मदद कर रही थी. अंजलि और मधुरिमा का साथ पाकर सुमति भी बहुत खुश थी. इन तीनो सहेलियों ने कठिन समय भी साथ में गुज़ारा था, और इस दौरान उनकी दोस्ती और गहरी हो गयी थी. आज इस क्लब में सुमति और चैताली की शादी हो रही थी जहाँ वो दोनों ही दुल्हनें होंगी. सभी “लेडीज़” आज इस शादी में सुमति की तरफ से सम्मिलित हो रही थी और उनकी पत्नियाँ और गर्ल फ्रेंड चैताली की ओर से. सुमति अब दुल्हन के रूप में सजकर तैयार थी. और क्लब की दूसरी औरतें भी जो रंग बिरंगे परिधानों में निखर रही थी. सुमति आज क्लब के सदस्यों के प्रति शुक्रगुज़ार थी जो इस पल को यादगार बनाने के लिए शामिल हुए थे.

इंडियन लेडीज़ क्लब में आज खुशियाँ ही खुशियाँ थी. आज लेडीज़ सुन्दर साड़ियों और लहंगो में सजी थी, क्योंकि आज सुमति और चैताली की शादी का ख़ास अवसर था. सुमति इस वक़्त एक पारंपरिक दुल्हन बनकर अपनी सहेलियों से घिरी हुई थी. इंडियन लेडीज़ क्लब एक बार फिर जाग उठा था.

इंडियन लेडीज़ क्लब की आखिरी मीटिंग में शामिल सभी औरतें आज इस शादी में भी आई थी, बस एक औरत इस शादी में नहीं थी. वो थी अन्वेषा, जिसने पिछली बार राजकुमारी बनाया गया था. कुछ रात पहले जब सभी वापस आदमी बन गए थे, उस दिन अन्वेषा भी बदल गयी थी. पर आदमी बनने की बजाये या एक खुबसूरत औरत बनी रहने की जगह, जब वो सोकर उठी थी तो वो एक कुरूप औरत बन चुकी थी. वो एक बुरे विचारो वाली औरत थी जो अपने अलावा किसी और के बारे में नहीं सोचती थी. अपने सुन्दर औरत के रूप का उसने बहुत गलत फायदा उठाया था. और उसी कर्मो का फल था कि उसे हमेशा के लिए एक कुरूप औरत बनकर अब जीवन गुजारना था. शायद किसी दिन कोई राजकुमार आकर उसे इस श्राप से मुक्त करेगा पर तब तक उसे अकेले ही ऐसे जीवन गुजारना होगा.

पिछले कुछ हफ्ते, एक औरत के रूप में इंडियन लेडीज़ क्लब की औरतों को एक ख़ास शिक्षा दे गया था. क्रॉसड्रेसर होना श्राप नहीं है. ये हमारे ऊपर है कि हम इसे एक वरदान मान कर अपने अन्दर की स्त्री को अनुभव करे या फिर इसे श्राप मानकर अपने जीवन को दुखी करे. हम अपने अन्दर की खुबसूरत स्त्रियोचित भावनाओं और क्वालिटी का उपयोग अपनी जीवन संगिनियों को अच्छे से समझने में उपयोग कर सकती है. पर इसके लिए हमें खुद को अपने जीवन साथ के समक्ष खोलना होगा और उन्हें समझाना होगा कि हम सभी अच्छे लोग, चाहे हम जो भी कपडे पहने. और साथ ही साथ हमें उनकी ज़रूरतों को भी समझना होगा. हम हर समय औरत बनकर नहीं रह सकती उनकी इच्छाओ का सम्मान किये बगैर. किसी भी रिश्ते में एक बैलेंस ज़रूरी है और यह बात ये सभी औरतें समझ चुकी थी. इसलिए आज वो ये खुशियों भरा जीवन जी सकती थी.

लेखिका का नोट:  इस कहानी को ख़त्म करके मुझे बेहद ख़ुशी है. बहुत लम्बा था इसे लिखना और बहुत समय भी लगा. भले ये काल्पनिक कहानी थी और शायद हम सब भी चाहेंगी कि काश हमारे साथ भी ऐसा हो. पर रातोरात हम सब औरत बन जाए, ये शायद संभव नहीं है. पर यही तो इस कहानी का मुख्य सन्देश है. यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम अपने जीवन को खुशहाल बना सकते है चाहे हमारे पास सब कुछ न हो. और यदि हम ज़रा कोशिश करे, तो खुशियाँ हमसे दूर नहीं रह सकेगी. मैं प्रार्थना करती हूँ कि जितनी भी क्रॉसड्रेसर औरतें ये कहानी पढ़ रही है उन सबके सपने सच हो और उनका जीवन पुरुष और स्त्री दोनों रूप में खुशहाल रहे.

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< भाग १४

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इंडियन लेडीज़ क्लब: भाग १४

सुमति अपनी शादी के लिए घर आ गई थी. क्या वो इस शादी और अपने नए जीवन के लिए तैयार थी?

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सुमति की शादी

“माँ, सुमति दीदी आ गयी. जल्दी आओ न”, रोहित ने ख़ुशी से अपनी बहन को रिक्शे से आते देख अपनी माँ को आवाज़ दी. सुमति अब अपनी माँ के घर आ गयी थी जहाँ उसकी शादी की तैयारियां जोर शोर से चल रही थी. अब चैतन्य और सुमति की शादी में सिर्फ ८ दिन रह गए थे. अभी भी सुमति को यकीन नहीं हो रहा था पर कुछ ही दिनों में वो एक पत्नी बनने वाली थी. फिर भी, अपने घर में अपनी माँ के पास वापस आकर वो खुश थी.

रोहित भी अब दौड़े दौड़े सुमति के बैग उठाने आ गया था. शिक्षा भाभी जो पड़ोस के घर में रहती थी वो भी दौड़ी चली आई. “सुमति आ गयी! अरे वाह सुमति तो और भी खुबसूरत होकर आई है शहर से”, सर को अपने पल्लू से धक्के शिक्षा भाभी ने उत्साह से कहा. गाँव की रहने वाली शिक्षा भाभी को बड़ा उत्साह होता जब भी कोई शहर से आता. लगता है कि उन्हें सुमति बहुत पसंद थी तभी तो सुमति और रोहित को चलकर आते देखकर इतनी खुश थी वो.

अब तक सुमति की माँ भी दरवाजे पर आ गयी थी. वो हाथ में एक पूजा की थाली लिए खड़ी थी जिसमे एक दिया जल रहा था. अपनी बेटी सुमति को बेहद ख़ुशी के साथ उन्होंने घर में प्रवेश कराया. माँ को पूजा की थाली के साथ देख सुमति ने भी अपना सर अपने सलवार सूट के दुपट्टे से ढँक लिया और माँ उसकी नज़र उतारने लगी. माँ को देखते ही सुमति के चेहरे की ख़ुशी बढ़ गयी थी. पिछली बार जब वो यहाँ आई थी, तब वो घर का बड़ा बेटा थी. आज स्थिति बदल गयी थी पर फिर भी माँ का प्यार बिलकुल वैसा ही था. सुमति ने अपनी माँ के पैर छूने चाहे तो उन्होंने उसे रोक लिया. “अरे बेटी की जगह तो दिल में होती है पैरो पे नहीं”, ऐसा कहकर उन्होंने अपनी प्यारी बेटी के चेहरे को छुआ. माँ बेटी गले मिल अपनी अनकही ख़ुशी एक दुसरे के साथ बांटने लगी.

“अरे शिक्षा. वहां खड़ी खड़ी क्या कर रही है. तेरी ननद आई है, तू भी ज़रा नज़र उतार दे इसकी. स्वागत नहीं करेगी अपनी ननद का?”, सुमति की माँ ने शिक्षा भाभी से कहा जो एक जगह खड़ी होकर यह सब देख रही थी. शिखा सामने आई, और पूजा करके सुमति को गले लगा ली. “कैसी हो भाभी? और आपके शरारती बच्चे कैसे है?”, सुमति ने पूछा. “बच्चे ठीक है सुमति. थोड़ी ही देर में स्कूल से आते ही होंगे. “, भाभी ने जवाब दिया.

“लड़कियों! अभी बहुत समय है बात करने के लिए. पहले सुमति को घर के अन्दर आकर थोडा आराम तो करने दो”, सुमति की माँ ने दोनों से कहा.

अन्दर आकर सुमति अपने कमरे में चली गयी. कितना कुछ बदल गया था उस कमरे में. पहले वो एक लड़के का कमरा हुआ करता था. पर अब तो देख कर ही पता चल रहा था कि वो एक लड़की का कमरा था. और सब कुछ बिलकुल सुमति की एक औरत के रूप में पसंद के अनुसार ही था वहां. जब बचपन में वो सोचती थी कि यदि वो लड़की होती तो अपने कमरे को कैसे सजाती, बिलकुल वैसे ही सब सजा था उस कमरे में. सुमति की बनायीं हुई पेंटिंग भी थी उस कमरे में.

नहाने के बाद सुमति ने एक हरे रंग का सलवार सूट पहन लिया.

सुमति कुछ देर अपने बिस्तर पर बैठी जिस पर फूलो के प्रिंट वाली चादर बीछी थी. उसने कमरे की खिड़की से बाहर की ओर देखा तो, वहां से कुछ १०० मीटर की दूरी पे चैताली का घर दिखा जो अब चैतन्य थी, सुमति का होने वाला पति! दूर से ही उस घर में मेहमानों के चहल पहल दिख रही थी. कुछ ही दिन में सुमति उस घर की बहु बनने वाली थी. इस बारे में सोचना भी सुमति के लिए भारी था. पर फिर भी उन विचारो को अनदेखा करती हुई वो नहाने चली गयी. और नहाने के बाद उसने एक हरे रंग का सलवार सूट पहना. एक क्रॉसड्रेसर के रूप में तो सुमति हमेशा साड़ी पहनना पसंद करती थी. पर अब जब वो औरत बन चुकी थी, वो अब सलवार सूट पहनना ज्यादा पसंद करने लगी थी. साड़ी के मुकाबले शायद उसे मैनेज करना ज्यादा आसान था. उसने कुछ देर अपनी माँ के साथ समय बीताया क्योंकि इतने दिनों बाद अपनी माँ से मिल रही थी सुमति. माँ-बेटी ने साथ में लंच किया और फिर सुमति की माँ ने उसे कुछ घंटे सोने के लिए जाने कहा. वैसे भी लम्बी ट्रेन की यात्रा के बाद सुमति थक भी गयी थी. पर वो सोना नहीं चाहती थी. वो अपनी माँ से कुछ बातें करना चाहती थी. न जाने क्यों वो अपनी माँ को बताना चाहती थी कि सुमति उनकी बेटी नहीं बल्कि बेटा हुआ करती थी. पर कैसे समझाएगी वो ये सब अपनी माँ को जिनकी नजरो में आज वो हमेशा से ही उनकी बेटी रही है. इस स्थिति से सुमति अन्दर ही अन्दर थोडा कुढ़ सी गयी थी. पर क्या कर सकती थी वो. अंत में मन की उधेड़-बून के बाद उसने सोना ही उचित समझा.

कुछ घंटे बाद सुमति की माँ ने आकर उसके सर पे हाथ फेर कर सुमति को दुलार से जगाया. “बेटी शाम हो गयी है. अब उठ जाओ.”, माँ ने कहा और माँ की बात सुनकर सुमति उठ गयी. “ओह्ह मुझे तो पता भी नहीं चला इतनी देर हो गयी. शायद ट्रेन की थकान कुछ ज्यादा ही थी.”, सुमति बोली.

“कोई बात नहीं बेटा. वैसे भी घर में मेहमान कल से आना शुरू होंगे. उसके पहले मैं तुझसे कुछ बातें करना चाहती थी.”, सुमति की माँ ने कहा. “क्या बात है माँ?”, सुमति ने पूछा.

“बेटा तू जल्दी ही अब नए घर में चली जाएगी. मुझे तो बहुत ख़ुशी है कि तेरी शादी चैतन्य से हो रही है. बचपन से मैंने अपनी प्यारी गुडिया को चैतन्य के साथ खेलते देखा है और अब तू दुल्हन भी बनने जा रही है.”, माँ ने कहना शुरू किया.

“नहीं माँ, वो गुडिया चैताली थी मैं नहीं. मैं तो लड़का थी.”, सुमति ने मन ही मन सोचा. ये इंसान का दिल भी बड़ा अजीब होता है. जब सुमति लड़का थी तब वो चाहती थी कि उसकी माँ उसे लड़की के रुप में स्वीकार करे. अब जब वो औरत है तो वो माँ को अपने लड़के वाले रूप के बारे में याद दिलाना चाहती है. पर चाहते हुए भी वो माँ से कुछ कह न सकी.

“सुमति, अपने नए घर में सब तुझसे उम्मीद करेंगे कि तू सीधा पल्लू स्टाइल में साड़ी पहने और अपना सर ढँक कर रहे. तुझे कई सारे मेहमानों के लिए खाना भी बनाना पड़ेगा. और किसी भी माँ की तरह, मुझे भी अपनी बेटी की फ़िक्र है. मुझे पता है कि तूने शहर में अकेले रहते हुए खाना बनाना तो सिख लिया है. फिर भी मैं तुझे सीधा-पल्ला साड़ी पहनना और कुछ ख़ास डिश सीखाना चाहती हूँ. तू सीखेगी मुझसे?”

सुमति की माँ ने उसे सीधा पल्ला साड़ी पहनना सीखाया. किसी और माँ बेटी की तरह, उन दोनों का समय भी अच्छा बीत रहा था.

“ज़रूर माँ. मैं तुम्हारी रेसिपी ज़रूर सीखना चाहूंगी”, सुमति ने उत्साह के साथ कहा. वैसे भी लड़के के रूप में वो हमेशा सपने देखती थी कि उसकी माँ उसे बेटी की तरह ट्रीट करेगी और एक दिन अपनी एक साड़ी उसे पहनने को देगी. शायद एक माँ बेटी के बीच का सबसे प्यारा पल होता है ये जब माँ उसे पहली बार अपनी साड़ी गिफ्ट करती है. सुमति अब खुश थी कि आज वो बेटी बन रही है जो वो हमेशा से सोचा करती थी. थोड़ी देर में ही सुमति की माँ उसके लिए एक मेहंदी रंग की साड़ी लेकर आ गयी. तब तक सुमति भी अपना ब्लाउज और पेटीकोट बदल चुकी थी. उसके बाद उसकी माँ ने उसे सीधे पल्ले स्टाइल में साड़ी पहनना सिखाया. सुमति सचमुच बहुत खुश थी अपनी माँ से साड़ी पहनना सिख कर. वैसे सच तो यह था कि सुमति को पहले से ही कई तरह से साड़ी पहनना आता था पर वो यह ख़ुशी महसूस करना चाहती थी जिसमे उसकी माँ उसे बेटी के रूप में स्वीकार कर रही थी. बहुत सुन्दर पल थे वो माँ बेटी के बीच के. इसके बाद दोनों किचन गयी जहाँ सुमति की माँ ने अपनी ख़ास रेसिपी सुमति को सिखाई. दोनों को खाना बनाते वक्त बहुत मज़ा आया. तभी इस बीच सुमति के फ़ोन में एक sms आया. उसने देखा की उसके फ़ोन की लाइट टिमटिमा रही थी. उसने सोचा थोड़ी देर बाद sms देख लेगी पर न जाने क्यों वो उस sms को अनदेखा नहीं कर सकी. “मैं एक मिनट में फ़ोन देखकर आती हूँ माँ”, सुमति ने अपनी माँ से कहा. और फिर अपने हाथ धोकर अपनी साड़ी के पल्लू से पोंछकर वो फ़ोन में मेसेज पढने लगी.

“हेल्लो सुमति! औरत के रूप में नया जीवन कैसा बीत रहा है? क्या तुम्हे अपने पुरुष रूप के जीवन की याद आ रही है? पर तुम तो हमेशा से औरत बनना चाहती थी न? अब तक तो तुम्हे एहसास हो गया होगा कि चाहे पुरुष का जीवन हो या स्त्री का, जीवन में मुश्किलें और उतार-चढ़ाव तो बने ही रहते है. यदि तुम्हारी क़िस्मत में मुश्किलें लिखी है तो वो तुम्हारे कर्मो की वजह से होती है, न कि इस वजह से की तुम्हारा जन्म पुरुष या स्त्री रूप में हुआ है. औरत बनने के बाद भी तुम अपने कर्मो से आज़ाद नहीं हुई हो. तुमने जीवन का ये पाठ अब तक तो सिख ही लिया होगा. पर तुम्हारे पास अब भी मौका है. अच्छे कर्मो से तुम अपने भविष्य को अब भी संवार सकती हो. तो तुम बताओ, क्या अब भी तुम औरत बनी रहना चाहोगी या तुम्हे फिर से पुरुष बनना है? तुम्हारे पास सोचने के लिए एक हफ्ते का समय है. फिर समय का ये चक्र तुम्हारा भविष्य निर्धारित करेगी. हमेशा सुखी रहो यही मेरा आशीर्वाद है.”

बड़ा ही अजीब सा मेसेज था यह. कौन भेज सकता था ये? इंडियन लेडीज क्लब की औरतों के अलावा तो दुनिया में कोई भी सुमति के पुरुष रूप में जीवन को नहीं जानता था. “कौन हो तुम?”, सुमति ने उत्सुकतावश उस sms के जवाब में सवाल पूछा.

“मैं कौन हूँ, इससे क्या फर्क पड़ता है सुमति? कुछ लोग मुझे मोहन के नाम से जानते है और कुछ ने मुझे मोहिनी रूप में भी देखा है. तुम बस इस एक हफ्ते अपने भविष्य की सोचो. एक अच्छी औरत होने का कर्त्तव्य अदा करो, और सब ठीक ही होगा. गुड लक”

उस जवाब के बाद सुमति ने उस नंबर पर कॉल करने की कोशिश की. पर वो नंबर भी अधूरा दिख रहा था. +४६३. उसने ध्यान से देखा तो वो नंबर +GOD था. कोई उसके साथ खेल खेल रहा था. पर इस मेसेज ने उसे अन्दर से हिला कर रख दिया था.

ऐसा मेसेज पाने वाली सिर्फ सुमति नहीं थी. करीब उसी समय, साशा को भी ऐसा ही मेसेज ऑफिस में आया. अंजलि को भी जब वो अपनी बेटी सपना को खाना खिला रही थी. मधु के पास भी ऐसा ही मेसेज आया और अन्वेषा के पास भी. और इंडियन लेडीज़ क्लब की सभी सदस्यों को जो अब सभी उस एक रात के बाद औरतें बन गयी थी. कोई भी उस मेसेज को समझ नहीं सकी. क्या होगा एक हफ्ते में? सुमति के लिए तो वो दिन उसकी शादी के एक दिन पहले का दिन होगा.

अगले ७ दिन

सांतवे दिन सुमति जब उठी तो उसे पता नहीं था कि उस रात उसके साथ क्या होने वाला था.

अगले ७ दिन, सुमति का जीवन चलता रहा. उसके घर में कई मेहमान भी आ गए थे. उसने अपना नया जीवन अब तक स्वीकार कर लिया था और वो पूरी कोशिश करती की उसके आसपास सभी खुश रहे. उसके अन्दर चल रहे द्वन्द को वो अपने तक ही सीमित रखती. और फिर सांतवे दिन जब वो सोकर उठी, तो उसे एक हफ्ते पुराना वो मेसेज याद आया. पर उसे पता नहीं था कि उस रात उसके साथ क्या होगा. वो कुछ देर बिस्तर पर ही लेटी रही, वो अभी किसी से तुरंत बात नहीं करना चाहती थी. उसने बस भगवान से प्रार्थना की कि सब ठीक हो. और फिर बिस्तर से उठकर घर में अभी अभी आये दो मेहमानों से मिलने बाहर निकल आई. उन्हें देख कर वो बहुत खुश हुई, आखिर वो दोनों अंजलि और मधुरिमा थी. वो दोनों अपने परिवार समेत सुमति की शादी में सम्मिलित होने आये थे. अंजलि, अपने पति और सास-ससुर के साथ थी वही मधु अपने पति जयंत के साथ. उन्हें देखते ही सुमति को पता चल गया था कि उन दोनों को भी सुमति की ही तरह एक मेसेज आया था. उसे एक दिलासा हुआ कि चलो आज हम तीनो उस पल में साथ रहेंगी.

उस मेसेज के बाद का एक हफ्ता अंजलि के लिए भी कुछ बदलाव लेकर नहीं आया था. उसे एक पत्नी, एक माँ और एक बहु के रूप में अपने कर्त्तव्य हमेशा की तरह निभाने थे. वो भी सब की ख़ुशी के लिए दिन रात काम करती रहती थी, बिना कोई शिकायत. वो अब ऐसी औरत बन गयी थी जो सिर्फ देना जानती है बिना कुछ किसी से मांगे. असीमित प्यार से भरी औरत बन गयी थी अंजलि. वो तब भी उतने ही प्यार से रहती जब उसका पति देर रात काम से आता और उससे शारीरिक प्रेम करने लगता चाहे वो कितनी ही थकी होती. उसने खुद को अपने पति के प्रति समर्पित कर दिया था.

शादी के घर में, उन सहेलियों के लिए प्राइवेट में समय निकाल कर उस मेसेज के बारे में बात करना थोडा मुश्किल था पर उनकी आँखें एक दुसरे से सब कुछ कह दे रही थी. दिन अपनी गति से बीत रहा था. और दोपहर में सुमति को हल्दी लगाये जाने वाली थी. हल्दी के लिए मधु ने सुमति को उसकी माँ के साथ पीले रंग की लहंगा चोली पहनाने में मदद भी की. और फिर मधु और सुमति की माँ ने मिलकर सुमति को स्टेज पर लेकर आई जहाँ उसे बैठा कर ५ सुहागन औरतें उसे हल्दी लगाने की रस्म पूरा करने वाली थी. मधु तो एक माँ की तरह ही खुबसूरत सुमति को देख गर्व से फूली नहीं समा रही थी. अंजलि पहली सुहागन थी जो सुमति को हल्दी लगाने वाली थी. सुमति जो अब एक खुबसूरत दुल्हन थी, उसने अंजलि की आँखों में देखा. दोनों सहेलियां इस मीठे खुबसूरत पल का आनंद ले रही थी. वो इस पल को हमेशा याद रखेंगी.

अंजलि पहली सुहागन थी जो खुबसूरत दुल्हन को हल्दी लगाने वाली थी. दोनों सहेलियां इस पल को हमेशा याद रखेंगी.

हल्दी के बाद अब दिन जल्दी ही ख़त्म होने को आ रहा था. अब घर में मेहंदी की रस्म निभायी जा रही थी. सुमति के हाथो और पैरो पर खुबसूरत मेहंदी सजाई जा रही थी. और अंजलि और मधु उसके बगल में बैठ कर सुमति की खूबसूरती निहार रही थी. तभी अंजलि को एहसास हुआ कि उसके फ़ोन में कोई मेसेज आया है. बहुत सीधा सा मेसेज था. “क्या तुम तैयार हो आज रात के लिए अंजलि?” ये मेसेज उसी अनजान नंबर से आया था. मधु ने भी अपना फ़ोन देखा और उसमे भी वैसा ही मेसेज था. दोनों ने थोड़ी चिंता के साथ सुमति की ओर देखा जो इस वक़्त अपनी बहनों और भाभियों के संग ख़ुशी से खिलखिला रही थी. वो रात भी शान्ति से बढ़ रही थी. तब तक जब तक सब सो नहीं गए. अब वो समय आ गया था. समय का चक्र चल रहा था. पर अब कुछ होने वाला था.

अगला भाग इस कहानी का अंतिम भाग होगा. उस रात को क्या हुआ जानने के लिए ज़रूर पढ़े.

क्रमश: …

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< भाग १३ अंतिम भाग >

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इंडियन लेडीज़ क्लब: भाग १३

सुमति और अंजलि आज मधुरिमा से मिलने जा रही थी. क्या मधुरिमा के पास सुमति के सवालो का जवाब होगा?

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मधुरिमा का स्वर्ग

बाथरूम से फ्लश चलने की आवाज़ हुई, और दरवाज़ा खोल कर सुमति अपनी साड़ी ठीक करती हुई बाहर निकली. “उफ़.. ये इंडियन स्टाइल के टॉयलेट में साड़ी पहनकर जाना ज़रा भी आसान नहीं होता!”, सुमति ने शिकायत भरे लहजे में कहा. वो अपनी कमर के निचे की प्लेट को हिलाकर सुधार रही थी ताकि वो अपने पहले के रूप में आ जाए. वैसे भी टॉयलेट चाहे इंडियन हो या वेस्टर्न, हमेशा से आदमी के रूप में जाने की आदत के बाद औरत के रूप में जाना तो मुश्किल ही था सुमति के लिए.

सुमति की परेशानी देखकर अंजलि जोर जोर से हँसने लगी. उसने अपने बालो का जुड़ा खोला और फिर अपने बालों को पीछे एक रबर बैंड से बाँधने लगी. “तेरी साड़ी पीछे ऊपर अटक गयी है कमर पर. ठीक कर ले वरना ऐसे ही बाहर जायेगी तो दुनिया हँसेगी हम पर!”, अंजलि ने सुमति को चेताया.

सुमति ने पीछे पलट कर देखा तब उसे पता चला कि बाथरूम के बाद पेंटी ऊपर चढाते वक़्त उसकी साड़ी और पेटीकोट उसकी पेंटी में अटक गयी थी. बड़ी ही हास्यास्पद स्थिति थी और अंजलि का हँसना रुक ही नहीं रहा था. सुमति को थोड़ी शर्म सी महसूस हो रही थी. भले ही हँसने वाली स्थिति थी, पर एक औरत के रूप में सुमति को सावधान रहना होगा भविष्य में. “आई हेट दिस!”, सुमति गुस्से में बोली, “… देख, मेरी प्लेट भी अब सही से नहीं बन रही है. मुझे खोल कर फिर से ठीक करना होगा” सुमति थोड़ी सी उदास दिख रही थी. शायद वो ड्रामा क्वीन बन रही थी पर उसकी मुसीबत असली थी.

“अब शांत भी हो जाओ मैडम. मैंने तुझे पहले भी कितनी बार समझाया है कि प्लेट की लम्बाई में दो सेफ्टी पिन का उपयोग किया कर. एक सबसे ऊपर कमर के पास और दूसरी कुछ इंच निचे. अब याद रखेगी न? इधर आ मैं ठीक कर देती हूँ प्लेट”, अंजलि बोली. अंजलि अब भी पहले की ही तरह थी, सहायता करने वाली, प्यार से भरी हुई औरत. जब वो आदमी थी तब भी उसके अन्दर एक अच्छी औरत के सारे गुण मौजूद थे. उसने सुमति की साड़ी सुधारने में मदद की और फिर उसके बाद बोली, “अब ठीक है?” वो मुस्कुरायी और सुमति की आँखों में देखने लगी. सुमति अब ठीक मूड में थी. उसने हाँ में सर हिलाया और अपनी सहेली की तरह देख कर मुस्कुराने लगी.

इसके बाद अंजलि भी खुद तैयार होने लगी. वो एक पुराने से लम्बे आईने के सामने खड़े होकर अपने बालों पर कंघी कर सुलझाने लगी, और फिर से एक रबर बैंड से उन्हें बाँध ली. “कितनी प्यारी है अंजलि!”, सुमति मन ही मन सोचने लगी. वो भगवान को शुक्रिया अदा कर रही थी कि उसे अंजलि जैसी सहेली मिली.

“तो सुमति मैडम? हम चले? मैं तो तैयार हूँ अब”, अंजलि सुमति की ओर पलट कर बोली. “तू ऐसे चलेगी? तुझे मेकअप नहीं करना है तो कम से कम साड़ी तो बदल ले. सुबह से घर के काम करते वक़्त से यही साड़ी पहनी हुई है”, सुमति ने अंजलि को लगभाग डांट ही दिया.

अंजलि ने अपने बालो का जुड़ा खोला और अपने बालो को एक रबर बैंड से बाँध कर कुछ ही मिनट में जाने को तैयार हो गयी. पर सुमति चाहती थी कि अंजलि साड़ी बदल ले..

“जैसी आपकी आज्ञा सुमति मैडम! मैं बदलती हूँ साड़ी. मुझे ५ मिनट लगेंगे बस”, अंजलि ने सुमति के गुस्से को शांत करना चाहा.

“अंजलि, तुझे याद है कि कैसे लेडीज़ क्लब में सबसे अच्छा मेकअप करना तुझे ही आता था. और आज तू नेल पोलिश तक नहीं लगायी है.”, सुमति बोली.

“मेरी प्यारी सुमति. तब मैं हाउसवाइफ नहीं थी न.. दिन में दर्जनों बर्तन धोने के बाद कोई नेल पोलिश नहीं टिकती है. समय बदल गया है. अब मेकअप के अलावा कई बातें है जो एक औरत के रूप में मुझे आनंद देती है. तो मेकअप के लिए समय निकालना अब मेरे लिए ज़रूरी नहीं है. समझ रही तू?”, अंजलि अपनी अलमारी में साड़ी ढूंढते हुए बोली. सुमति कुछ कह न सकी. अंजलि की प्राथमिकताएं अब बदल गयी थी. अब वो एक खाली समय में सजने वाली क्रॉसड्रेसर नहीं थी, अब वो एक माँ और एक गृहिणी थी जिसके लिए कपडे पहनना टाइम पास नहीं था. तब तक अंजलि ने एक नीली और ग्रे रंग की साड़ी निकाल ली. उसने सुमति को इशारा किया कि उसे साड़ी बदलने के लिए थोड़ी प्राइवेसी चाहिए.

“क्या यार…. जब तू आदमी थी तब तो नहीं शरमाई तू मेरे सामने कपडे बदलने से.”, सुमति ने चुटकी लेते हुए कहा. “हाँ तू सही कह रही है”, अंजलि ने धीमी आवाज़ में कहा. फिर थोड़ी देर बाद बोली, “तब मेरे पास बूब्स नहीं थे न छुपाने के लिए!” सुमति भी थोडा हँस दी उसकी बात सुनकर. “तब तो मेरे पास भी बूब्स नहीं थे. पर अब… हम्म… तू देखना चाहेगी मेरे बूब्स?”, सुमति बोली.

“चल हट बड़ी नटखट हो गयी है तू. मुझे तेरे बूब्स देखने की ज़रुरत नहीं है. मेरे अपने बूब्स को देख कर ही खुश हूँ मैं. ३४DD साइज़ है मेरा… पता है तुझे?”, अंजलि ने ब्लाउज पर से ही अपने बूब्स को छूते हुए कहा. “चल अब मैं ब्लाउज बदल रही हूँ. झाँकने की कोशिश मत करना”, अंजलि ने मज़ाक में कहा और अपना ब्लाउज उतारने लगी. अन्दर उसने एक बेहद ही साधारण सी सफ़ेद रंग की ब्रा पहनी हुई थी. उसके स्तन तो बेहद सुन्दर आकार के थे, पर उसकी ब्रा थोड़ी बदसूरत सी थी. अंजलि के लिए समय सचमुच बदल गया था. एक क्रॉसड्रेसर के रूप में उसके पास कई महँगी और फैंसी ब्रा हुआ करती थी. तब तो ऐसे ब्रा वो कभी न पहनती. पर अब की आर्थिक स्थिति में शायद वो यही मैनेज कर पाती हो किसी तरह. “शायद मुझे अंजलि को अच्छी ब्रा गिफ्ट करनी चाहिए.”, सुमति सोच में पड़ गयी. जहाँ तक सुमति अंजलि को समझती थी, अंजलि सुन्दर ब्रा पाकर ज़रूर खुश होगी.

अंजलि खुद इस वक़्त सोच रही थी कि अपनी सहेली के सामने कपडे बदलने में वो इतना शर्मा क्यों रही थी. सुमति के साथ तो उसने कितने बार कपडे बदले थे. शायद उसे थोड़ी सी शर्म आ रही थी कि अब उसके अन्तःवस्त्र इतने सुन्दर न थे. उसने झट से अपना पेटीकोट उतारकर दूसरा पेटीकोट पहन लिया. और फिर उसने अपनी नीली रंग की साड़ी पहनी जिस पर काले पोल्का डॉट बने हुए थे. उसका ब्लाउज उसके स्तनों पर बहुत बढ़िया फिट आ रहा था और आस्तीन भी उसकी मांसल बांहों पर बिलकुल सही फिट आ रही थी. सेक्सी दिख रही थी अंजलि. अब जब इस औरत के नए जीवन में अंजलि और सुमति लेस्बियन थी, तो अंजलि की तरह सुमति का आकर्षित होना स्वाभाविक था. पर फिर भी इस आकर्षण को काबू में रखना है, यह दोनों ने थोड़ी देर पहले ही तय किया था. सुमति इस वक़्त सिर्फ अपनी सहेली को देखकर एडमायर करती रही.

अपने कहे अनुसार, अंजलि ५ मिनट में तैयार भी हो गयी. “ओह राजकुमारी सुमति जी, मैं तैयार हूँ. मधुरिमा आंटी का घर यहाँ से १० मिनट की दूरी पर है. तो चलते है अब. मुझे फिर १ बजे के पहले वापस भी आना है. सास ससुर को खाना खिलाने.”

अपनी सहेली को तैयार देख सुमति उसके पास चल कर आई और उसके एक हाथ को पकड़ कर बोली, “किसी की नज़र न लगे तुझे”

अंजलि ने फिर अपना घर लॉक किया और दोनों सहेलियां गेट की ओर बढ़ने लगी. “अंजलि प्लीज़ एक बार मेरी साड़ी देख ले पीछे से. कहीं और अटकी तो नहीं है? बाहर सड़क पर शर्मिंदगी नहीं झेल सकूंगी मैं” सुमति अब भी चिंतित थी. “सब ठीक है. अब चल इस रास्ते जाना है”, अंजलि ने कहा और दोनों चल पड़ी.

अंजलि ने जल्दी से साड़ी बदल ली. अपने नीले ब्लाउज और काले पोल्का डॉट की साड़ी में सेक्सी लग रही थी वो. उसने घर पे ताला लगाया और दोनों सहेलियां निकल गयी मधुरिमा से मिलने के लिए.

“अंजलि तुझे याद है करीब २ साल पहले हम दोनों दोपहर में घर से बाहर औरत बनकर निकली थी?”, सुमति ने पूछा. “कैसे भूल सकती हूँ वो दिन? कितना पीछे पड़ना पड़ा था मुझे तेरे. तू तो भीगी बिल्ली की तरह घबरायी हुई थी. मेकअप में पसीने छूटे हुए थे तेरे. और ५ मिनट में तू घर वापस भी हो गयी थी.”, अंजलि ने सुमति की ओर देख कर कहा.

“अब बात को इतना भी बढ़ा चढ़ा के मत बोल. पूरे १५ मिनट बाहर थे हम!”, सुमति ने शिकायती लहजे में नखरे भरे हावभाव करते हुए कहा. “चल ठीक है. फिर भी ५ मिनट न सही पर तू १० मिनट भी बाहर नहीं थी. और डर के मारे वापस घर की ओर दौड़ कर भागते हुए तू बार बार अपनी ही साड़ी पर पैर रख रही थी. और वैसे भी ३ इंच की सैंडल पहन कर कौनसी औरत दौड़ती है भला?”, अंजलि सुमति को छेड़ रही थी.

“हाँ मैं मान लेती हूँ कि मैं एक मुर्ख औरत थी तब. पर अब देखो… हम अब दो खुबसूरत औरतें है और खुले आसमान के निचे अब हम बेफिक्र होकर घूम सकती है. मैं तो मधुरिमा माँ से मिलने को लेकर बहुत उत्साहित हूँ. कैसी है वो? तेरी बात हुई थी उनसे?”, सुमति ने पूछा. (सुमति एक क्रॉसड्रेसर के रूप में मधुरिमाँ को अपनी माँ मानती थी)

सुमति सही कह रही थी. खुली हवा में दोनों औरतें आज बेफिक्र थी. और अचानक से बहती तेज़ हवा जैसे उनसे सहमत थी. उन दोनों की साड़ी और पल्लू उस तेज़ हवा के झोंके में आज़ादी की ख़ुशी में लहराने लगे थे. उन दोनों ने जल्दी से अपने पल्लू और साड़ी को अपने हांथो से पकड़ कर संभालने की कोशिश की. वो हवा का झोंका भी जल्दी ही चला गया. उस वक़्त सड़क किनारे कुछ आदमी भी थे जो इन खुबसूरत औरतों को देख रहे थे जो उन नजरो से बेफिक्र होकर अपनी ही दुनिया में मग्न थी.

“तुझे तो पता ही है की मधुरिमा आंटी की तबियत ठीक नहीं रहा करती थी. अब भी वैसी ही है. उनकी पत्नी अजंता आंटी अब उनके पति जयंत है! तो सरप्राइज मत होना यदि जयंत अंकल मिले आज घर पर. तुझे याद है न अजंता आंटी कितनी प्यारी थी? (भाग ३ में अजंता के बारे में पढ़े) वो हमेशा हमें कितने प्यार से घर में बुलाती थी. कभी हमारी क्रॉसड्रेसिंग को लेकर हमें बुरा नहीं महसूस कराया उन्होंने. अब वो आदमी है पर पहले की ही तरह उतने ही स्वीट है वो. मधु आंटी का बेहद प्यार से ध्यान रखते है”, अंजलि ने सुमति को बताया.

सुमति को जवाब सुनकर अच्छा लगा. और फिर दोनों सहेलियां बातें करती चलती रही. और जल्दी ही मधु आंटी के घर के बाहर पहुच गयी. दरवाज़े पर अंजलि घंटी बजाने वाली ही थी कि सुमति ने उसका हाथ झटककर अंजलि को रोक लिया. “रुक न ज़रा…. एक बार देख कर बता मैं ठीक लग रही हूँ न? मेरे बाल सही है?”

“हे भगवान! तू न एक विचित्र औरत बन गयी है! महारानी सुमति आप बहुत सुन्दर लग रही है. अपने हुस्न की चिंता करना बंद करे!”, अंजलि बोली. “ऐसे भी न बोल यार… मुझे तो बस लगा कि उस तेज़ हवा में मेरे बाल बिखर गए होंगे.”, सुमति ने उदास स्वर में कहा. अंजलि ने फिर दरवाज़े पर घंटी बजायी.

और थोड़ी देर में जयंत अंकल ने दरवाज़ा खोला. और जैसे ही सुमति ने उन्हें देखा, उसे ध्यान आया की उसकी साड़ी का आँचल थोडा ज्यादा उठा हुआ है इसलिए उसकी बांयी ओर से उसका ब्लाउज और उसका उभार दिख रहा है. उसने तुरंत अपने आँचल को अपने बांये हाथ से निचे खिंचा और ब्लाउज को ढँक कर जयंत अंकल के पैर छूने को झुक गयी. “नमस्ते अंकल”, दोनों औरतों ने अंकल को प्रणाम किया. “आओ आओ बेटी. पहले अन्दर तो आओ. तुम्हारी आंटी तो तुम्हारा कब से इंतज़ार कर रही है!”, अंकल ने कहा.

और अंकल के पीछे पीछे दोनों चल दी. चलते चलते सुमति ने कुहनी से अंजलि की कमर पर वार करते हुए फुसफुसा कर बोली, “मेरा ब्लाउज बाहर दिख रहा था तूने बताई क्यों नहीं थी पहले?” अंजलि बस देख कर हँस दी. सुमति को थोडा सा अजीब लग रहा था कि उसकी प्यारी अजंता आंटी अब जयंत अंकल बन चुकी थी. और जयंत अंकल को तो कोई अंदाजा भी नहीं था कि वो कभी इतनी प्यारी ममता भरी औरत हुआ करते थे. सुमति और इंडियन लेडीज़ क्लब की औरतों की दुनिया में आया हुआ ये बदलाव हुए अब २ दिन हो गए थे, फिर भी सब कुछ किसी सपने सा ही मालूम होता था. अभी भी सुमति को यकीन नहीं होता था. भले ही इस जीवन के कुछ हिस्से उसे अच्छे लगे थे पर शायद अन्दर ही अन्दर वो चाह रही थी कि ये यदि सपना है तो जल्दी ख़त्म हो और वो अपने पहले वाले जीवन में जा सके.

“अच्छा अब तुम दोनों अन्दर जाकर आंटी से मिल लो. मैं चाय पानी लेकर आता हूँ.”, अंकल ने कहा. “अंकल जी कोई ज़रुरत नहीं है चाय पानी की. हम तो बस १० मिनट चल कर आये है. अभी तो प्यास भी नहीं लगी है.”, अंजलि बोली.

और फिर दोनों घर के अन्दर बढ़ चले उस कमरे में जहाँ मधुरिमा आंटी थी. ऐसा लग रहा था कि जैसे बस अभी अभी तैयार हुई है वो. शायद दरवाज़े की घंटी बजने पर वो जल्दी जल्दी में तैयार हुई होंगी. मधुरिमा ने पलट कर सुमति और अंजलि को देखा. उनके चेहरे पर पहले की ही तरह एक बड़ी सी प्यार भरी और शरारती मुस्कान थी.

“तो मेरी प्यारी बेटियाँ आ गई है! आओ मुझसे गले नहीं मिलोगी”, मधु ने उन दोनों को देखते ही कहा. और दोनों दौड़कर आंटी को गले लगाने आ गयी. मधु आंटी अपने आकर में इतनी बड़ी तो थी कि दोनों को एक साथ गले लगा सके. उन्होंने दोनों को माथे पे प्यार से चूम लिया जैसे एक माँ करती हो. मधु जी एक बड़ी औरत थी जिनका सीना भी बेहद बड़ा था. जब वो एक आदमी थी तब भी उनके पास बड़े स्तन थे. ये सब उनकी तबियत खराब होने की वजह से था… दवाइयों का साइड इफ़ेक्ट जिसकी वजह से उनका वजन बढ़ गया था. पर उनके मोटापे की वजह से उनका जो रूप था बड़ा मातृत्व भरा रूप लगता था. हमेशा हंसती रहती और शरारत करती रहती. सभी को उनसे गले मिलकर अच्छा लगता था क्योंकि उनके पास तब भी ममता से भरे असली स्तन थे. और फिर वो सबको अपनी हरकतों और बातों से हंसाती भी तो रहती थी.

मधुरिमा अंजलि और सुमति के लिए माँ की तरह थी.

“चलो लड़कियों, अब बैठ भी जाओ. और अपनी आंटी को अपनी पूरी जीवन कहानी सुनाओ. तुम दोनों को अपनी बूढी आंटी की याद आई, मैं तो बस इसी बात से बहुत खुश हूँ”, मधु बोली.

“बूढी आंटी? अरे आप तो अभी हॉट जवान औरत हो माँ”, सुमति ने छेड़ते हुए कहा. “जानती हूँ जानती हूँ. तुम दोनों से भी ज्यादा सुन्दर हूँ मैं. पर तुम दोनों को हीन भावना न हो जाए इसलिए कह रही थी मैं.”, मधु ने नैन मटकाते हुए कहा. ऐसे ही मसखरी करती थी वो हमेशा.

“अच्छा बताओ, कुछ कहोगी? जयंत अंकल बना देंगे तुम्हारे लिए कुछ”, मधु ने पूछा. “आंटी चिंता मत करो. हम बस अभी अभी घर से पोहा खाकर ही निकली है”, अंजलि बोली. वो अंकल आंटी को परेशान नहीं करना चाहती थी. पर तब तक अंकल चाय बिस्कुट लेकर आ गए थे. “लेडीज़, अब मैं तुम सभी को अपनी बातें करने के लिए छोड़ कर जा रहा हूँ. मुझे बाहर पौधों को पानी देना है. कोई भी ज़रुरत हो तो आवाज़ दे देना मुझे.”, अंकल न कहा. “थैंक यू अंकल”, सुमति बोली.

अब जब अंकल जा चुके थे तो मधु सुमति की ओर देख कर बोली, “सुमति बेटी, सब ठीक है नए जीवन में?” वो जानती थी कि ये अचानक आया हुआ बदलाव किसी के लिए आसान नहीं था.

“सब कुछ अच्छा है माँ! अब तो मेरे शादी भी होने वाली है. तुम्हारे बेटी दुल्हन बनने वाली है. और तुम्हे मेरी शादी में ज़रूर आना है. अपनी बेटी को सुन्दर लहंगे में देखने तो आना ही पड़ेगा तुम्हे. कोई बहाना नहीं चलेगा!”, सुमति ने ख़ुशी से मधु से कहा. वो मधु को शायद दिलासा देना चाहती थी कि सुमति अब ठीक है.

“अरे क्यों नहीं… ज़रूर आऊंगी मैं. अपनी प्यारी बेटी को खुबसूरत दुल्हन के जोड़े में देखने ऐसे कैसे नहीं आऊंगी मैं. भले मुझे अपने भारी भरकम शरीर के साथ पैदल भी चलना पड़े तो भी मैं आऊंगी.”, मधु बोली. तीनो औरतें बातें करती हुई हँस दी. पर कोई भी नए जीवन की वजह से आई हुई परेशानियों के बारे में बात नहीं कर रहा था. कुछ देर और हँसी-ठिठोली करने के बाद मधु गंभीर हो गयी.

मधुरिमा ने सुमति और अंजलि से बैठने को कहा. वो उन दोनों से कुछ गंभीर बात करना चाहती थी.

“अंजलि, सुमति. मेरी बात ध्यान से सुनना. शायद तुम दोनों अपने दिल की बात कहने को अभी तैयार नहीं हो. पर तुम भी जानती हो कि औरत बनने के बाद से नयी कठिनाइयां आई होंगी. पर तुम दोनों हमेशा मुझ पर भरोसा कर सकती हो. मैं तुम दोनों के लिए पहले भी माँ समान थी, और आगे भी रहूंगी. तुम दोनों यदि अभी कुछ कहना नहीं चाहती हो तो न सही. पर मैं तुमसे कुछ कहना चाहती हूँ जो शायद तुम दोनों की मदद करे. ठीक है?”, मधु बोली. अंजलि और सुमति ने हाँ में सर हिला दिया. कितनी किस्मत वाली थी दोनों जो उन्हें मधु के रूप में एक माँ मिली थी जो उनकी असली माँ से ज्यादा उन दोनों के बारे में जानती थी.

“मुझे नहीं पता कि हम सब रातोरात औरतें कैसे बन गयी. और तुमने भी ये महसूस किया होगा कि हमारे आसपास की दुनिया भी कुछ बदल गयी है. हमारे अलावा किसी को याद तक नहीं कि हम कभी आदमी भी थे. सबके दिमाग में अब नयी यादें है जिसमे हम उनकी नजरो में हमेशा से औरतें थी. मुझे तो बहुत अच्छी लग रही है ये लाइफ, पर मैं पहले भी इतनी ही खुश थी अपनी लाइफ से. पर एक बात ज़रूर कहूँगी मैं. तुम्हारे आसपास के लोगो से तुम कैसे बर्ताव करती हो इस बात का ख़ास ध्यान रखना है तुम लोगो को. एक तरह से अपना भविष्य और अपना अतीत दोनों तैयार कर रहे है हम लोग. लोगो से अच्छा बर्ताव करोगी तो बदले में तुम्हारे साथ अच्छा ही होगा. और फिर बुरे बर्ताव का फल भी भुगतना पड़ेगा. यदि तुम अपने नए रूप को ख़ुशी से जीना चाहती हो तो सबके साथ अच्छे से रहो बस. बाकी सब ठीक होगा. सभी को प्यार करो और वो तुम्हे प्यार करेंगे. जो हो गया सो हो गया. वो क्यों हुआ यह हमारे हाथ में नहीं है. पर अपने भविष्य और रिश्तो को संभालना अब तुम्हारा काम है.”

सुमति ने मधु की बात ध्यानपूर्वक सुनी और फिर बोली, “माँ मुझे पूछने में थोडा संकोच हो रहा है क्योंकि ऐसी बात हमने पहले कभी नहीं की. पर आप अपने पति के साथ सम्बन्ध कैसे संभाल रही है? मेरा मतलब है… शारीरिक”, सुमति ने हिचकिचाते हुए पूछा.

सुमति का सवाल सुन मधु मुस्कुरा दी. “सुमति, अब हम उस उम्र में पहुच चुके है जहाँ शारीरिक सम्बन्ध अब बहुत कम बार बनाये जाते है. पर मेरे पति चाहे तो मैं ख़ुशी से उनकी इच्छा पूरी करूंगी. पता है क्यों? तुम्हे अजंता आंटी याद है? कितना ध्यान रखती थी वो मेरा? मेरी सेहत हो या मेरी क्रॉसड्रेसिंग… हर चीज़ में मेरा साथ दिया था उसने. और तुम दोनों को भी तो कितना प्यार करती थी वो. अब जब वो मेरे पति जयंत बन गए है, तो अब भी वो मेरा उतना ही ध्यान रखते है. पति होते हुए भी मेरी सेहत की वजह से घर का सारा काम देखते है. मैं भूल नहीं सकती कि पूरे जीवन में अजंता हो या जयंत, उन्होंने मेरा कितना ख्याल रखा है. और इसलिए कभी कभी मुझे अपना तन उन्हें समर्पित करना हो तो मेरे लिए ये कोई बड़ी बात नहीं है.”

सुमति उठ कर किचन जाकर सबके लिए पकोड़े तलने लगी. उसके दिल में इस घर से जुडी बहुत सुन्दर यादें थी.

सुमति को उसका जवाब मिल गया था. उसे याद था कि चैताली किस तरह सुमति की क्रॉसड्रेसिंग को जानते हुए भी दुनिया के लिए उसे राज़ ही रहने दिया था. यहाँ तक की सुमति को इसमें कई बार उसने सपोर्ट भी किया था. इसलिए जब चैताली से शादी की बात होने लगी थी तो सुमति ख़ुशी से मान गयी थी. और अब जब वो चैतन्य बन गयी है तो सुमति को एहसास होने लगा कि उसके दिल में अभी भी चैताली और चैतन्य के लिए प्यार है. सुमति भले इस नए जीवन में लेस्बियन बन गयी हो, पर फिर भी वो अपने होने वाले पति के प्रति प्यार और निष्ठा रखने वाली पतिव्रता स्त्री तो बन ही सकती है. क्योंकि उसके दिल में चैताली/चैतन्य के लिए प्यार जो है. कभी कभी बदलाव दिल पर भारी लग सकते है. दिमाग सब कुछ समझ रहा हो तब भी दिल के लिए भावनाओं को काबू करना आसान नहीं होता. ऐसे ही विचार अंजलि के दिल में उमड़ रहे थे. मधु की बातों ने उनकी थोड़ी तो मदद की थी ये समझने में कि वो अपने पतियों के साथ रिश्ता कैसे बनाये रखे. दोनों ही मधु की गोद में सर रखकर कुछ देर ख़ामोशी में रही. और मधु का ममता भरा प्यार जैसे उन्हें नयी उर्जा दे रहा था.

अंजलि और सुमति का मन अब कुछ हल्का हो गया था. सुमति ने कहा कि अब वो सभी के लिए पकोड़े तलेगी. इस घर से तो वो पहले से परिचित थी, इसलिए किचन में जाकर पकोड़े बनाना शुरू करने में उसे समय नहीं लगा. जब जयंत अंकल ने किचन में खटपट सुनी तो वो अन्दर आकर बोले, “अरे बेटा, ये सब तुम्हे करने की क्या ज़रुरत है. मैं हूँ न. मैं बना देता हूँ. तुम्हारे बूढ़े अंकल भी पकोड़े अच्छे बना लेते है” सुमति ने अंकल को देखा और उनके पास आकर बोली, “अंकल आपने वैसे भी मेरे लिए कितना कुछ किया है. मुझे कम से कम पकोड़े बना लेने दीजिये. आप जाकर अंजलि और आंटी के साथ बातें करिए” सुमति को वो दिन याद आ रहे थे जब अजंता आंटी ने उन्हें प्यार से बेटी के रूप में अपने दिल और घर में जगह दी थी.

सुमति जल्दी ही पकोड़े लेकर बाहर आ गयी जहाँ सभी आपस में बातें कर रहे थे. सुमति ने अंजलि की आँखों में देखा. दोनों सोच रही थी कि अब सब ठीक ही होगा. उनका दिल कह रहा था. आखिर सामने मधु और जयंत का प्यार उनके मन में एक नयी उम्मीद जगा रहा था. मधु के अन्दर जयंत के लिए शारीरिक आकर्षण न रहा हो पर उन दोनों के बीच का प्यार असीमित था. अंजलि और सुमति को उन्हें देख लगा कि उनका भी उनके पतियों के साथ ऐसा प्यार भरा रिश्ता हो सकता है. सब ठीक ही होगा.

क्रमश: …

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इंडियन लेडीज़ क्लब: भाग १२

सुमति और अंजलि की प्यार भरी कहानी. दो सहेलियां जो औरत बनने के बाद पहली बार मिल रही थी. क्या एक दुसरे के अनुभव से उनका ये नया जीवन कुछ सरल हो सकेगा?

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अंजलि की कहानी

सुमति अगली सुबह जल्दी ही उठ गयी. उसे सुबह ८ बजे अंजलि से मिलने जो जाना था. जब से सुमति औरत बन गयी है, अंजलि ही बस एक औरत थी इंडियन लेडीज़ क्लब की जिससे सुमति संपर्क कर सकी थी, और अंजलि भी अब एक औरत बन चुकी थी. न जाने कितनी ही बातें करनी थी दोनों को. तैयार होते वक़्त सुमति सोच रही थी कि अंजलि ने उसे पारंपरिक कपडे पहन कर क्यों आने कहा है. कोई और समय होता तो सुमति ख़ुशी से साड़ी पहन कर जाती. पर कल ऑफिस में बुरे अनुभव के बाद जब ऑफिस के आदमी उसकी कमर को बुरी नजरो से देख रहे थे, इस वजह से सुमति का आज साड़ी पहनने का मन नहीं था.

सुमति ने जब अपनी अलमारी देखी तो उसमे सभी सलवार सूट में डीप कट थे जिससे उसका क्लीवेज साफ़ झलकता. अब उसके पास साड़ी पहनने के अलावा कोई चारा नहीं था. साड़ी में वो वैसे भी बहुत शालीन प्रतीत होती है, ये वो अच्छी तरह जानती थी. उसने अपनी अलमारी से बेबी पिंक और सफ़ेद रंग की साड़ी निकाली और झटपट पहनने लगी. आखिर उसे देर जो हो रही थी. उसने साथ में एक मध्यम आस्तीन का ब्लाउज पहना. और फिर खुद को आईने में देखने लगी. सब कुछ ठीक ही तो दिख रहा था. साड़ी उस पर अच्छी लग रही थी. उसने पल्लू से अपने सर को ढंका और सोचने लगी कि वो पारंपरिक दिख रही है या नहीं. वो खुद को ऐसे देख मुस्कुराने लगी. चाहे जो भी हो, अंजलि से मिलने को लेकर वो बेहद उत्साहित थी. आखिर एक अंजलि ही तो थी इस दुनिया में जो उसकी प्रॉब्लम समझ सकती थी… आखिर वो भी सुमति की तरह रातोरात औरत बन गयी थी. उसने फ़ोन देखा और अंजलि का पता नोट किया. अंजलि का घर का पता अब बदल गया था. उसे थोडा सा अचम्भा हुआ क्योंकि सुमति तो अब भी उसी घर में थी जहाँ वो आदमी के रूप में पहले थी. सुमति ने फिर भगवन से प्रार्थना की कि अंजलि सकुशल हो.

सुमति ने फिर ऑटो किया और अंजलि के घर समय पर पहुच गयी. सुबह सुबह दुनिया अब सुमति को अच्छी लग रही थी. एक नयी शुरुआत जो थी. उसने ऑटो से उतर कर ऑटो वाले को पैसे दिए और फिर कमर के निचे अपनी साड़ी की प्लेट को एक हाथ से पकड़ कर अंजलि के घर की ओर बढ़ने लगी. साड़ी को हाथ से थोडा ऊपर उठाना ज़रूरी था क्योंकि सड़क पर पानी और कीचड़ था. वो अपनी साड़ी ख़राब नहीं करना चाहती थी. घर के बाहर से ही पता चल रहा था कि अंजलि का घर किसी सामान्य घर की तरह था जहाँ बच्चे रहते हो. सुबह की गहमा-गहमी उस घर में बाहर से ही पता चल रही थी. देखने में घर काफी पुराना लग रहा था.. ऐसे मानो जैसे उस घर ने भव्य दिन देखे है पुराने समय में पर अब उसे रिपेयर की सख्त ज़रुरत थी.

सपना की प्यार भरी माँ उसके पीछे टिफ़िन लिए दौड़ी चली आई. अंजलि अब एक माँ बन चुकी थी.

“सपना, अपनी होमवर्क की कॉपी रख ली तुमने?”, सुमति ने एक चिंतित माँ की प्यार भरी आवाज़ सुनी जो अपनी छोटी सी बेटी के पीछे दौड़ी आ रही थी. “हाँ मम्मी. सब पैक कर चुकी हूँ”, उस प्यारी सी बेटी सपना ने कहा जो अपने छोटे नाज़ुक कंधो पर एक बड़ा सा बस्ता टाँगे हुई थी. “अपना लंच मत भूलना”, माँ ने कहा और सपना के पास आकर उसे उसका टिफ़िन दिया. वो माँ कोई और नहीं अंजलि थी. अंजलि अब एक ६ साल की बेटी की माँ थी! उसे देख कर अंजलि एक मध्यम उम्र की हाउसवाइफ लग रही थी. अंजलि के बिखरे हुए बालो से साफ़ पता चल रहा था कि उसकी सुबह बहुत व्यस्त रही होगी अपने परिवार का ध्यान रखने में. सुमति यह सब मुस्कुराते हुए देख रही थी. न जाने क्यों पर कई क्रॉसड्रेसर का एक हाउसवाइफ बनने का सपना होता है, और अंजलि अब वो सपना जी रही थी. पर हाउसवाइफ की ज़िन्दगी इतनी आसान भी तो नहीं होती है.

“हेल्लो सुमति आंटी”, सपना ने कहा जब उसका ध्यान घर के गेट पर खड़ी सुमति पर गया. सपना अपने स्कूल यूनिफार्म में बड़ी प्यारी लग रही थी. उसकी आवाज़ सुन कर तो सुमति के कानो में जैसे शहद घुल गया. सुमति ने झुककर प्यारी सपना को एक आंटी की तरह गले लगाया. “कैसे है मेरी प्यारी सपना?”, सुमति ने अपनी पर्स से एक चॉकलेट निकाल कर देते हुए कहा. “थैंक यु आंटी”, सपना ने ख़ुशी से कहा.

“सपना चलो अब जाने का समय हो गया है. नहीं तो बस छुट जायेगी.”, चिंतित माँ अंजलि ने कहा. साथ ही साथ अंजलि के चेहरे पर ख़ुशी का भाव भी था जब उसने सपना को सुमति आंटी को गले लगाते देखा. सुमति तो पहले भी अंजलि के यहाँ आती थी. पर तब एक आदमी के रूप में. सुमति को पता था कि अंजलि की बेटी थी, इसलिए वो हमेशा चॉकलेट लेकर ही आती थी. पर तब अंजलि एक पिता थी, माँ नहीं जिसे अब सुमति देख रही थी. और सुमति भी अंकल हुआ करती थी आंटी नहीं. पर अब दुनिया बदल चुकी थी, अच्छे या बुरे के लिए यह तो भगवान ही जाने. सपना घर से निकलकर अपनी उम्र की और लड़कियों के साथ बस स्टॉप की ओर चल दी जहाँ उसकी स्कूल बस आती थी. सुमति और अंजलि दोनों ने प्यारी सपना को विदा किया.

अंजलि सुमति को देख कर सचमुच बहुत खुश थी. आखिर उसके सबसे पक्की सहेली थी वो. उसने सुमति को गले लगाया और बोली, “वाह सुमति तुम तो और खुबसूरत हो गयी हो! तुम्हे देख कर बहुत अच्छा लगा सुमति.” इस छोटे से समय में जबसे वो औरतें बन गई थी, दोनों ये सिख चुकी थी कि औरतें एक दुसरे को गले कैसे लगाती है… बिना एक दुसरे के स्तनों को दबाये! शुरू शुरू में थोडा अजीब सा लगता है जब कोई दूसरी औरत आपकी पीठ पर गले लगाते वक़्त अपना हाथ रखती है. पर दोनों तो अपने इंडियन लेडीज़ क्लब के दिनों से इसकी आदि थी.

“तुझे पता नहीं है मैं कितनी खुश हूँ तुझे देख कर अंजलि”, सुमति ने अंजलि से अलग होते हुआ कहा. वो अब भी अपनी सहेली का हाथ पकडे हुए थी. और दोनों एक दुसरे को एक टक देखने लगी.

“बहु हम मन्दिर जाने को तैयार है. हम लोग दोपहर तक वापस आयेंगे. तब तक खाना तैयार रखना.”, अन्दर से एक बुज़ुर्ग औरत की आवाज़ आई. “मेरी सास होगी वो. वो आज मंदिर जा रही है ससुर जी के साथ प्रवचन सुनने के लिए.”, अंजलि ने कहा.

और फिर एक बुज़ुर्ग दंपत्ति घर से बाहर आये… अंजलि के सास ससुर. सुमति उनसे पहले कभी नहीं मिली थी. क्योंकि अंजलि पहले एक आदमी थी और उसके साथ उसके माता-पिता रहते थे. पर अब अंजलि अपने सास-ससुर के साथ रहने वाली औरत थी. उन्हें देखते ही सुमति ने सर पर पल्लू ओढा और उनके पैर छुए. “जूग जुग जियो बेटी”, ससुर ने कहा. “तुम्हारी शादी की तैयारी ठीक तो चल रही है न?”, उन्होंने पूछा. “जी अंकल. अब तो २ दिन में मैं घर भी जा रही हूँ तयारी के लिए.”, सुमति ने जवाब दिया. “हम भी तुम्हारी शादी में ज़रूर आयेंगे बेटी. अभी तो हमें मंदिर जाने के लिए देर हो रही है. फिर मिलते है.”, अंजलि के ससुर ने मुस्कुरा कर कहा और दोनों घर से बाहर चल दिए.

सुमति को थोडा आश्चर्य हुआ कि अंजलि की सास ने उससे एक शब्द तक नहीं कहा. पर उसे उसकी परवाह नहीं थी. “चल, मुझे अपना घर तो दिखाओ मिसेज़ अंजलि!”, सुमति ने अंजलि को छेड़ते हुए कहा. “हां हाँ क्यों नहीं. पर एक बात बता तुझे एहसास हुआ कि नहीं कि मेरी सास तुझे पसंद नहीं करती है?”, अंजलि बोली. सुमति ने अपने सर से पल्लू को फेंकते हुए और अब केयर-फ्री होकर बोली, “हाँ लगा तो सही. पर ऐसा क्यों है? वो मुझे पसंद क्यों नहीं करती है?”

“तो ऐसा है कि हमारी नयी ज़िन्दगी में तुम यहाँ पहले भी एक औरत की तरह आ चुकी हो. पर पहले तुम यहाँ जीन्स टॉप पहन कर आई थी. और मेरी सास ठहरी पुराने ख़यालात की. उन्हें बिलकुल पसंद नहीं आया. उन्हें लगता है कि तुम सपना पर बुरा असर डालोगी.”, अंजलि बोली. “ओह तभी तूने मुझे पारंपरिक कपडे पहन कर बुलाई थी. वैसे तूने ये क्या तुम तुम लगा रखा है. तू बोल! खैर अब सास को छोड़… अपनी लाइफ की सब मसाला स्टोरी सुना मुझे”, सुमति में अब एक नयी जान थी.

सुमति घर के अन्दर जाते ही सोफे पर कूद कर बैठ गयी. वो बड़ी खुश थी अब. क्योंकि पहले उन्हें औरतों के रूप में छिप छिप कर मिलना पड़ता था. पहले वो एक दुसरे के साथ देवरानी जेठानी होने का नाटक किया करती थी. पर अब असल में औरतें थी वो, तो अब छुपने की ज़रुरत नहीं थी.

“ठीक है ठीक है. जल्दी ही होने वाली मिसेज़ सुमति. मैं सब बताती हूँ. पर ज़रा मुझे घर के काम भी करने है मेरे सास-ससुर के आने के पहले. तो तू मुझे काम करते देख और मैं तुझे कहानी सुनाती हूँ. तू चाहे तो मेरी मदद कर देना.”, अंजलि ने भी मुस्कुराते हुए कहा.

“ना ! मैं तेरी इन कामो में कोई मदद नहीं करूंगी. मैं ऑफिस जाने वाली औरत हूँ… हाउसवाइफ नहीं!”, सुमति ने मज़ाक करते हुआ कहा. पर वो अंजलि की मदद करेगी, यह तो अंजलि भी जानती थी.

“तो ठीक है पहले बेडरूम से शुरू करते है”, अंजलि बोली. “वाह! बेडरूम की कहानियाँ तो मेरी फेवरेट है! अपनी हॉट रातों के बारे में डिटेल से बता मुझे!”, सुमति हँसते हुए बोली. “चुप कर पगली. मेरे कहने का मतलब है कि पहले बेडरूम की सफाई करते है.”, अंजलि ने घूरते हुए सुमति से कहा.

अंजलि का घर सचमुच बेहद पुराना था और उसमे ढेरो पुराना फर्नीचर था. कोई भी देख कर कह सकता था कि इस परिवार की आर्थिक स्थिति अब सही नहीं थी. और इतने बड़े घर की देखभाल करने वाली बस अंजलि अकेली थी. पर फिर भी अंजलि एक प्यारी हाउसवाइफ लग रही थी. सुमति ने उसे थोड़ी देर ही अपनी बेटी और सास-ससुर के साथ देखा था, पर वो समझ गयी थी कि अंजलि अब एक आदर्श बहु है. उसके चेहरे पर मोहक मुस्कान थी. अंजलि ने एक पुरानी सैटिन की साड़ी पहनी हुई थी. शायद वो घर के काम करते वक़्त ऐसी साड़ी पहनती हो, सुमति ने सोचा. इसके पहले तो सुमति ने अंजलि को सिर्फ फैंसी साड़ियों में ही देखा था.

अंजलि ने फिर झाड़ू निकाली और एक हाथ से अपने को उठाकर अपने कंधे पर ले लिया. और पल्लू के दुसरे छोर को अपनी कमर में फंसा कर काम शुरू कर दी. अंजलि के सैटिन ब्लाउज में उसके मुलायम स्तन अब साड़ी के बाहर दिख रहे थे. आम तौर पर औरतें काम करते वक़्त साड़ी को यूँ ही करती है ताकि वो काम करते वक़्त उनके बीच न आये. अंजलि बिना मेकअप और गहनों के बिलकुल घरेलु गृहिणी लग रही थी. और साथ ही एक आकर्षक महिला भी. उसके रूप में इतनी सादगी के बात भी आकर्षण था. अंजलि फिर कमरे में झाड़ू लगाने लगी. पर अंजलि को इस तरह काम करते देख सुमति को थोडा दुख हो रहा था. क्योंकि एक आदमी के रूप में, अंजलि की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी थी. और अब? सुमति अंजलि से घर की आर्थिक स्थिति के बारे में बात करना नहीं चाहती थी क्योंकि अपनी सहेली से अभी तो मिली थी वो. “अच्छा मिसेज़ अंजलि. ये तो बताओ कि माँ बनकर कैसा लग रहा है? मैं देख रही थी कि सपना कितना ज्यादा प्यार करती है तुझे.”, सुमति ने ये सवाल जान बुझकर किया था क्योंकि वो जानती थी कि इस सवाल से अंजलि बहुत खुश होगी. कोई भी माँ अपने बच्चो के बारे में बातें करके खुश होती है, और अंजलि तो अभी अभी माँ बनी थी.

अंजलि ने झाड़ू निकाल कर बेडरूम की सफाई शुरू कर दी. उसने साड़ी को इस तरह पहनी थी कि वो एक मिडिल ऐज हाउसवाइफ लग रही थी.

“सुमति तुझे पता नहीं है कि माँ बनना कितना सुखद होता है! क्रॉसड्रेसिंग से बहुत बढ़कर है माँ बनना. मैं तो चाहती हूँ कि तू भी एक दिन माँ बने! पता है तुझे कि सपना तो हमेशा से ही प्यारी बेटी थी. पर जब से मैं उसकी माँ बनी हूँ, हम दोनों के बीच का रिश्ता पहले से भी ज्यादा गहरा हो गया है. मुझे उसके लिए कुछ भी करना बहुत अच्छा लगता है… चाहे उसका लंच बनाना, उसकी चोटी बनाना, उसे तैयार करना, उसके साथ खेलना, सब कुछ. मेरी ही तरह उसे साड़ी का भी बहुत शौक है. जब तब वो मुझे साड़ी पहनाने को कहती है. पर अभी तो साड़ी के लिए वो बहुत छोटी है. तुझे पता नहीं कि न जाने कितने घंटे हम दोनों बातें करती है. वो अपनी माँ को सचमुच बहुत प्यार करती है और मैं भी उसे. वो कहती है कि बड़ी होकर मेरी ही तरह बनेगी. और पता है सबसे खुबसूरत बात क्या है इस अनुभव की? मेरा उसके लिए प्यार अब जैसे अंतहीन हो गया. माँ-बेटी का रिश्ता सचमुच बहुत प्यार भरा होता है सुमति. तू समझ रही है? अभी नहीं समझी तो माँ बनकर तू भी समझ जायेगी.”, गर्व से एक माँ अंजलि ने कहा. और साथ ही वो झाड़ू भी लगाती रही.

सुमति ने अंजलि की फर्श पर पड़े खिलोनो को समेटने में मदद की. वो सोच में पड़ गयी कि क्या वो भी कभी माँ बनना चाहेगी?

“हाँ, ये सब तो तेरी आँखों की चमक देख कर ही पता चल रहा है कि तुझे माँ बनकर कितना अच्छा लग रहा है.”, सुमति ने मुस्कुराकर कहा. और फिर उस कमरे में फर्श में बिखरे खिलौनों को उठाकर सुमति ने अंजलि की कमरे को साफ़ करने में मदद की. सपना की एक गुडिया को हाथ में पकडे सुमति उसे एक टक देखते हुए सोचने लगी क्या वो कभी चैतन्य के बच्चे की माँ बनना चाहेगी? चाहे माँ बनने का अनुभव कितना भी अच्छा हो, पर उसके लिए उसे चैतन्य के साथ वो करना पड़ेगा जिसे सोच कर ही उसे मन ही मन ख़राब लग रहा था. उसके लिए माँ बनना इतना आसान नहीं होगा. अंजलि की बात और थी, वो तो पहले से ही माँ बन चुकी थी. “तू ये बता तूने अपने होने वाले पति से बच्चो के बारें में बात की या नहीं?”, अंजलि ने बिस्तर ठीक करते हुए सुमति से पूछा. सुमति जो उस वक़्त अपने मन की उधेड़ बून में खोयी थी, अचानक अंजलि के सवाल से बाहर निकली. “नहीं, अभी तक तो हमने इस बारे में बात नहीं की है.”, सुमति ने किसी तरह जवाब दिया.

“यदि मेरा अंदाजा सही है तो जिस आदमी से तेरी शादी हो रही है वो चैताली ही है न?”, अंजलि ने अपने जीवन में आये बदलाव से सुमति के बारे में अंदाज़ लगाया. “हाँ, चैताली ही अब चैतन्य है! दिल का बहुत साफ़ है वो. और उसके माता पिता भी मुझे बहुत प्यार करते है. वो दोनों परसों आये थे मुझे दुल्हन के कपडे खरीदवाने. मुझे बहुत मज़ा आया था उनके साथ. पता है बहुत महँगी साड़ियाँ और लहंगा ख़रीदा है मैंने. तू मेरी शादी में आएगी न? शादी के दिन स्टेज में मेरी बगल में खड़ी रहना तू. समझी? यकीन नहीं होता कि मैं दुल्हन बनने के सपने जो देखती थी वो ऐसे सच होंगे”, सुमति ने कहा. जब वो अंजलि से शादी में आने को कह रही थी, उसमे कहीं एक दर्द भरी रिक्वेस्ट थी… क्योंकि सच तो यही था कि उस शादी को लेकर वो संशय में थी.

शायद दोनों सहेलियां इस बात को जानती थी इसलिए दोनों के लबो पे अब एक चुप्पी थी. “ये सब कितना अजीब लग रहा है न अंजलि. ये औरत का जीवन. मुझे पता नहीं मैं खुश रह पाऊंगी या नहीं.”, सुमति ने अंजलि से अब दिल की बात कह ही दी थी. “मैं जानती हूँ तुझ पर क्या गुज़र रही है सुमति.”, अंजलि ने प्यार से कहा.

“अच्छा मेरी छोड़.. तू बता .. हाउसवाइफ बनकर कैसा लग रहा है? हम सभी क्रॉसड्रेसर का तो सपना था हाउसवाइफ जैसे जीना. तू तो वो सपना जी रही है. बता न तुझे अच्छा लग रहा है?”, सुमति ने उचकते हुए अंजलि से पूछा. शायद अंजलि खुश हो अपने जीवन में तो वो भी सुमति को कुछ सीख देती, ऐसी सोच थी सुमति की उस सवाल के पीछे. उसका सवाल सुनकर अंजलि हँस दी.

“यार तेरा घर कितना ठंडा है.”, सुमति कहते हुए उस कमरे में बिस्तर में बैठ गयी. उसने फिर सावधानी से अपने पैरो को अपनी साड़ी से ढँक लिया. ये दोनों औरतें शुरू से ही साड़ी को हर सिचुएशन में संभालने में एक्सपर्ट थी. क्रॉसड्रेसर होते हुए भी किसी औरत से ज्यादा सहज थी ये दोनों साड़ी में. सुमति की अदाएं तो बेहद मोहक और स्त्रियोचित थी. उसने अपने बांये हाथ से अपने पल्लू को खिंच कर सामने कर अपनी गोद में रख दिया ताकि वो अपने पल्लू पर न बैठे. अंजलि तो शुरू से ही कहती थी कि सुमति एक परफेक्ट औरत है. और आज उसकी बात कितनी सही साबित हो रही थी. सुमति की नर्म सैटिन की साड़ी उसे ठन्डे कमरे में एक गर्माहट दे रही थी.

“तूने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया अंजलि”, सुमति ने फिर कहा.

“कौनसा सवाल? हाउसवाइफ के सपने वाला? इतना भी ग्लेमर भरा काम नहीं है सुमति ये. एक पत्नी के रूप में सजने सँवारने का समय नहीं होता है. ऊपर से दिन में ३ बार खाना नाश्ता बनाओ, घर की दिन भर सफाई करो, बच्चे को तैयार करो और वो भी रोज़ रोज़. और फिर सास-ससुर की सेवा सो अलग. और इतना करने पर भी किसी की तरफ से कभी कोई प्यार नहीं, सिवाय मेरी बेटी के. सच कहूं तो हाउसवाइफ होना बड़ा कठिन काम है. मैं तो ये सब ख़ुशी से इसलिए करती हूँ क्योंकि फिर मुझे मेरी प्यारी बेटी सपना के साथ समय बीताने मिलता है. मुझे गृहिणी बन कर अच्छा लग रहा है पर उस कारण से नहीं, जिस कारण से क्रॉसड्रेसर हाउसवाइफ बनना चाहते है. इस काम में ग्लैमर कम और मेहनत ज्यादा है.”, अंजलि ने कह. वो बात करते करते घर भर में बिखरी हुई चीजें समेट कर उनकी सही जगह पर रखने में व्यस्त थी. अंजलि का जीवन सचमुच में बड़ा व्यस्त था फिर भी उसके चेहरे पर एक संतुष्टि थी. उसका जीवन इतने तेज़ी से एक काम करने वाले अच्छी खासी कमाई वाले आदमी से एक थोड़ी गरीब परिस्थिति वाली औरत में बदल गया था. फिर भी एक चीज़ थी जो उसके लिए सबसे बड़ा सुख लेकर आई थी… वो था अपनी बेटी की माँ बनना.

अंजलि सचमुच एक हाउसवाइफ के जीवन में ढल गयी थी. उसने बिस्तर जमाया ताकि सुमति उस पर बैठ सके. सुमति को कमरे में ठण्ड लग रही थी तो उसने अपने पैरो को साड़ी से अच्छी तरह ढँक लिया. दोनों सहेलियां साड़ी संभालने में शुरू से ही एक्सपर्ट थी.

“तुझे भूख लगी होगी सुमति. मैं तेरे लिए नाश्ता लेकर आती हूँ. मैंने पोहा बनाया है. तुझे पसंद है ?”, अंजलि ने सुमति से कहा. “चिंता मत कर अंजलि … नाश्ता इंतज़ार कर सकता है. मैं तो तुझसे मिलने आई हूँ नाश्ता करने नहीं.”, सुमति बोली.

“चल पगली. मैं भूल नहीं सकती कि तू किस तरह इंडियन लेडीज़ क्लब की सभी औरतों के लिए खाना बनाया करती थी. मैं तो तुझे पोहा खिला ही सकती हूँ. वैसे भी तैयार है बस लेकर आना है. फिर हम दोनों बैठ कर बातें करेंगी. मैं साफ़ सफाई बाद में कर लूंगी. दोपहर का खाना मैंने पहले ही तैयार कर लिया है तो मुझे और कोई काम भी नहीं है. बस अब अपनी सहेली के साथ गप्पे मारूंगी”, अंजलि मुस्कुराते हुए बोली.

“सुबह के ८:३० बजे लंच भी तैयार? तू मज़ाक कर रही है? बेटी को तैयार करने के बाद तुझे इतना समय कैसे मिल गया?”, सुमति आश्चर्यचकित थी.

अंजलि तभी एक प्लेट पोहा लेकर आई. “मैं सुबह ४ बजे उठ गयी थी.”, अंजलि मुस्कुराकर बोली. “वैसे भी सपना और उसके पापा के लिए टिफ़िन बनाना था. वो भी सुबह जल्दी काम पर जाते है न”

“सपना के पापा! अब तुम उनका नाम भी नहीं लेती.. हा हा”, सुमति हँस दी. “वैसे मुझे अच्छी पत्नी बनने के लिए तुझसे हफ्ते भर की ट्रेनिंग लेनी पड़ेगी. मेरी शादी के बाद काम आएगी.”

सुमति को जैसे यकीन नहीं हो रहा था कि अंजलि कैसे अपने नए जीवन में ढल गयी थी. सुमति को तो फिर भी थोडा समय मिला था सब चीज़ से परिचित होने में. पर अंजलि को तो सोचने समझने का मौका भी नहीं मिला होगा. उस दिन सुबह उठते ही औरत बनते ही उसके सर पर सुबह से ही माँ, पत्नी और बहु होने की ज़िम्मेदारी आ गयी होगी. पोहा खाते हुए सुमति बोली, “हम्म ये हुआ न टेस्टी पोहा!” अंजलि सुमति को देख खुश हो गयी कि उसकी सहेली को नाश्ता पसंद आया.

अंजलि सुमति के सामने एक बेंच पर बैठ गयी और अपनी साड़ी से अपने स्तनों को ढंकने लगी. वो थकी हुई ज़रूर लग रही थी पर इस जीवन से वो संतुष्ट थी.

अंजलि सुमति के सामने एक बेंच में बैठ गयी. वो अपनी साड़ी में दमक रही थी. एक परफेक्ट हाउसवाइफ के लिए उसकी साड़ी उसकी हर चीज़ में सहायक होती है. घर की पुरानी फींकी रंग की दीवार से टिक कर अंजलि ने अपने घुटने को ज़रा ऊपर उठाया और उस पर अपना हाथ रखकर जैसे एक पल आराम करना चाहती थी वो. साड़ी ज़रा उठने को आई तो तुरंत आदतनुसार उसने उसे खिंच कर अपने पैरो को ढँक लिया. थोड़ी थकी ज़रूर दिख रही थी वो पर सन्तुष्ट भी थी. “क्रॉसड्रेसर का हाउसवाइफ का सपना”, मन ही मन सोचकर ही उसे हँसी आ गई.

“अंजलि तू बुरा न माने तो एक बात पूछू?”, सुमति ने पूछा. “अरे अब परमिशन लेगी क्या? मुझे पता है कि कल से तुझे कुछ परेशान कर रहा है. और मुझे तेरी परेशानी का कारण भी पता है. फिर भी तू ही पूछ”, अंजलि बोली. आखिर अंजलि भी तो उसी परिस्थिति से गुज़र रही थी जिससे सुमति.

“जहाँ तक मेरा अंदाजा है, जो मेरी भाभी थी पहले, वही अब तेरा पति भी है. है न? उनके साथ तेरे सम्बन्ध कैसे है?”, सुमति ने अपना सवाल पूछा. इस सवाल के बहाने वो शादी के बाद का अपना भविष्य समझना चाहती थी.

“तो मेरा अंदाजा सही था कि कौनसी बात तुझे परेशान कर रही है.”, अंजलि हँसते हुए बोली और फिर एक मिनट के लिए चुप भी हो गयी. उसने एक लम्बी गहरी सांस ली जैसे उसे समझ न आ रहा था कि इस सवाल का जवाब कैसे दे. “सुमति, तू मेरी सहेली है इसलिए तुझे बता रही हूँ. मैं कबसे किसी से इस बारे में बात करना चाहती थी पर किसी से नहीं कर सकती मैं. शुक्र है कि तू है मेरे साथ”, अंजलि बोली. उसने अपनी साड़ी का पल्लू खिंच कर अपने स्तनों को ढँक लिया. उसकी सैटिन साड़ी बेहद ही स्मूथ थी जो बार बार उसके ब्लाउज पर फिसल जाती और उसके ब्लाउज का उभार बाहर दिखने लगता. एक औरत के सामने उसके स्तनों का उभार ब्लाउज में दिखना, उसे इस बात से कोई परेशानी तो नहीं थी. वैसे भी सुमति से क्या शर्माना. पर फिर भी फिसलती हुई साड़ी संभालना तो आदत थी उसकी.

“तुझे याद है कि तेरी भाभी पहले कैसे हुआ करती थी? एक छोटे से गाँव से आई हुई डरी सहमी और बहुत ही पारंपरिक. सास-ससुर की हर एक बात माने वाली और पति को परमेश्वर मानने वाली. मैं एक पति के रूप में जो भी करती थी, वो हमेशा बिना सवाल किये मुझे सहारा देती थी. उसने मुझसे कभी नहीं पूछा कि मैं एक आदमी होते हुए साड़ी क्यों पहनती थी. मुझे लगता था कि वो मुझे समझती थी. पर सच तो ये था कि उसकी परवरिश ऐसी हुई थी कि कभी पति या सास-ससुर से कोई सवाल नहीं करना है उसे. वो तो बस अपना कर्त्तव्य मान कर मेरी हर बात मान लेती थी. इसलिए मेरे क्रॉसड्रेसर होने पर भी उसने कभी शिकायत नहीं की थी. मुझे कभी पता भी नहीं चला था कि उसके दिल में मेरे औरत बनने पर उसे कैसा लगता था. और ऊपर से ज्यादा पढ़ी लिखी भी नहीं थी वो.”, अंजलि पुरानी बातों में खो गयी थी.

सुमति को अब लगा कि उसकी सहेली अब दिल से बात कह रही है तो वो भी अब रिलैक्स हो गयी थी. और वो
अंजलि की बातें सुनती हुई बिस्तर पर लेट गयी. अपनी सहेली की उपस्थिति में अब उसकी साड़ी बिखर भी रही थी तो उसे उसकी फ़िक्र नहीं थी. इस वक़्त उसे पता था कि अंजलि अब कुछ गंभीर बात उससे कहने वाली है.

“पता है. अब तेरी भाभी मेरे पति परमेश्वर बन चुके है. और वो बिलकुल भी नहीं बदले है. पहले की ही तरह है अब बस वो एक आदमी है.” अंजलि बोली.

सुमति अब बेफिक्र होकर अपनी सहेली की बात सुनते हुए बिस्तर पर लेट गयी. उसका एक स्तन उसकी ब्रा से बाहर आ रहा था.

“मतलब?”, सुमति ने पूछा. लेटने पर सुमति का एक स्तन उसकी ब्रा से बाहर आ रहा था जिसे उसने अपने हाथो से वापस अन्दर कर दिया. सुमति को यूँ अपने स्तनों को संभालते देख अंजलि मुस्कुरा दी पर फिर जल्दी ही गंभीर होकर बोली, “मेरे पति पहले की ही तरह सोचते है. वो मानते है कि पत्नी को हर हाल में अपने पति की हर बात मानना चाहिए. पत्नी का काम बस घर, बच्चे और परिवार संभालना है उनके अनुसार. मैं जिस तरह की पति थी उसके बिलकुल विपरीत है वो. मैं तो अपनी पत्नी की जितनी हो सके मदद करती थी, पर ये बिलकुल भी नहीं करते. और हमारी घर में आर्थिक स्थिति भी थोड़ी ठीक नहीं है कि घर में कोई मदद के लिए नौकर चाकर रख ले. हम दोनों में मैं ज्यादा पढ़ी लिखी हूँ नौकरी करने लायक… पर ये और इनके माता पिता भले गरीबी में रह लेंगे पर बहु को घर से बाहर काम पर जाने नहीं देंगे. उनके हिसाब से मुझे घर साफ़ रखना और खाना बनाना ही देखना चाहिए.”, कहते कहते अंजलि की आँखों में आंसू आ गए.

“ये घर कितनी मुश्किल से चल रहा है कैसे बताऊँ मैं. मेरे ससुर की थोड़ी सी पेंशन और मेरे घर से मेरे माता-पिता जो समय समय पर पैसे भेजते है, उसके सहारे किसी तरह जीवन कट रहा है. मैं तो अपनी बेटी की छोटी छोटी छोटी इच्छाएं भी पूरी नहीं कर पाती”, अंजलि की आवाज़ अब टूट रही थी. “दिन भर काम करने के बाद फिर रात को… “, कहते कहते वो रुक गयी. उसकी बातें सुन सुमति उठ कर अंजलि की बगल में आकर बैठ गई. उसके हाथो को अपने हाथ में लेकर अंजलि के सर को अपने कंधे पर रख कर उसे सांत्वना देने लगी. बेहद भावुक पल था वो जब दो सहेलियां दिल से अपनी ज़िन्दगी बयान कर रही थी. इस वक़्त वो सिर्फ औरतें नहीं थी … वो दो दोस्त थी. सुमति अंजलि की पीठ पर हाथ फेर कर उसे सहारा दे रही थी.

“… और फिर रात को… रात को… मुझे अपना तन अपने पति को समर्पित करना पड़ता है. चाहे मैं कितनी भी थकी हुई क्यों न हो. मुझे वो अच्छा नहीं लगता है सुमति… एक आदमी का स्पर्श. मुझे बिलकुल पसंद नहीं पर उन १०-१५ मिनटों के लिए मैं बिस्तर पर लेटी रहती हूँ जब वो मेरे जिस्म का …”, अंजलि का दुख अब बाहर आ चूका था. सुमति और वो दोनों एक ही परेशानी से गुज़र रही थी.

सुमति को पता न था कि वो क्या कहे अंजलि से. ये दोनों सहेलियां बस एक दुसरे को गले लगाए एक दुसरे का हाथ थामे वहां बैठी रही. कुछ देर बाद, सुमति ने अंजलि के चेहरे को उठाकर अपनी प्यारी सहेली के चेहरे को देखा. और फिर उसने अपनी सहेली के होंठो को चूम लिया. अंजलि ने भी उसे रोका नहीं और उसने भी सुमति के होंठो को चूम लिया. उन दोनों के अन्दर की भावनाए उमड़ कर उस चुम्बन में आ रही थी. उन दोनों के नर्म होंठ एक दुसरे को चूम रहे थे. उन दोनों के गर्म और मुलायम जिस्म एक दुसरे के करीब आ रहे थे. अंजलि की सॉफ्ट सैटिन साड़ी अब सुमति की साड़ी से मिल रही थी. उन दोनों के कोमल स्तन एक दुसरे को दबा रहे थे. और सुमति के हाथ अंजलि की जांघो और उसकी कमर पर फिसल रहे थे. सुमति के स्पर्श से जैसे अंजलि के तन में आग लग गयी थी. दोनों सहेलियां एक दुसरे को चूमती रही. सुमति अब थोड़ी उत्तेजित हो रही थी. उसने अपने हाथ अंजलि के साड़ी के अन्दर से उसके ब्लाउज के ऊपर पहुँच गए और अंजलि से स्तनों को दबाने लगे. अंजलि भी जवाब में और जोरो से सुमति के होंठो को चूमने लगी. सुमति अंजलि के और करीब आकर अपने स्तनों को उसके स्तनों से दबाने लगी और अपने हाथ अंजलि के ब्लाउज के अन्दर डाल उसके स्तनों को मसलने लगी. दो स्त्रियों के कोमल जिस्म का यह मिलन बेहद उत्तेजित था. दोनों को वो चुम्बन मदहोश कर रहा था. ऐसा चुम्बन जो उन्होंने पहले कभी महसूस नहीं किया था. पर फिर भी सब कुछ कितना स्वाभाविक लग रहा था. जैसे दोनों सहेलियां एक दुसरे के लिए ही बनी थी… और दोनों के जिसमे एक दुसरे के पूरक थे. पर अचानक अंजलि ने अपने होंठो को वापस खिंच लिया और वो चुम्बन वहीँ रुक गया.

“नहीं मैं ये नहीं कर सकती सुमति”, अंजलि बोली. “क्यों नहीं कर सकती अंजलि? मैं भी शादी नहीं करना चाहती हूँ चैतन्य के साथ. अभी भी देर नहीं हुई है. हम दोनों एक नया जीवन साथ में शुरू कर सकती है. सपना भी हमारे साथ रहेगी. मैं जॉब करूंगी और सपना को हम एक बेहतर जीवन दे सकते है. सब कुछ ठीक होगा अंजलि. बस तुम मेरे साथ आकर मेरी जीवन संगिनी बन जाओ”, सुमति ने अंजलि से याचना की. पर मन ही मन वो जानती थी कि अंजलि नहीं मानेगी.

“सुमति… मुझे तुम पसंद हो. और ये सब अभी ठीक लग रहा है, पर हम आगे नहीं बढ़ सकती इस रास्ते पर. ये ठीक नहीं होगा”, अंजलि ने कहा. “क्या ठीक नहीं है अंजलि? क्या हमें एक खुबसूरत जीवन का हक़ नहीं है?”, सुमति बोली पर वो जानती थी कि अंजलि क्या सोच रही है.

“सुमति इतनी स्वार्थी न बनो. तुम्हे चैताली याद है? उसने तुम्हारा साथ तब दिया था जब तुम एक क्रॉसड्रेसर थी. तुम्हारी बचपन की सबसे अच्छी दोस्त थी वो. वो भले आज चैतन्य बन गयी होगी पर वो वही इंसान है जिसने तुम्हे स्वीकार किया था क्रॉसड्रेसर के रूप में. क्या तुम इन कामुक भावनाओं के लिए वो सब भुला कर उसे छोड़ दोगी? और सपना के बारे में सोचो… माँ बाप अलग रहेंगे तो उस पर क्या बीतेगी. मैं अपने पति को नहीं छोड़ सकती. भले आज वो जैसे भी हो पर उन्होंने मेरा साथ तब दिया था जब वो औरत थे.”, अंजलि की बात में सच था.

सुमति भी अंजलि की बात समझ रही थी. पर मनमें चल रही भावनाओं को काबू करना आसान कहाँ होता है. औरत बनना ही अपने आप में एक कठिन अनुभव रहा है अब तक. ऐसा लगने लगा था जैसे कि एक क्रॉसड्रेसर का जीवन ही बेहतर था औरत होने से तो. उसकी आँखों से आंसू बह निकले. तो अंजलि ने अपनी साड़ी के पल्लू से अपनी सहेली के आंसू पोंछने लगी.

सुमति ने उठ कर अपनी साड़ी ठीक की.

“मुझे गलत न समझना सुमति. काश मैं तुम्हारे साथ जीवन जी सकती. पर ये मेरे लिए गलत होगा कि मैं अपने परिवार को छोड़ दूं. और मुझे अपनी बेटी के भविष्य के बारे में सोचना है. मैं उसे एक परिपक्व और आज़ाद विचारों की औरत बनाना चाहती हूँ. उसे मेरे अनुभव से सीखना होगा कि औरत की जगह सिर्फ ४ दीवारों के अन्दर नहीं है. तुम समझ रही हो?”, अंजलि बोली. सुमति का चेहरा अब भी उदास था. तो अंजलि ने उसकी आँखों में देख कर कहा, “मैं चाहती हूँ कि मेरी बेटी अपनी सुमति आंटी की तरह कॉंफिडेंट औरत बने.” और सुमति मुस्कुरा दी.

दोनों सहेलियों ने एक दुसरे को एक बार फिर गले लगाया, इस वादे के साथ कि वो दोनों एक दुसरे का सहारा बन कर रहेंगे. और फिर दोनों औरतें उठ खड़ी हुई और अपनी साड़ी की प्लेट सुधारने लगी.

“सुमति.. सुन. मैंने कल मधुरिमा आंटी को बताया था कि हम दोनों आज उनसे मिलने १० बजे आयेंगे उनके घर पर. हमें जाने के लिए तैयार होना चाहिए.”, अंजलि ने कहा.

सुमति का दिल अब कुछ हल्का था. शायद ये अपनी भावनाएं व्यक्त करने का नतीजा था कि दोनों सहेलियां अब कुछ अच्छा महसूस कर रही थी. अंजलि ने सुमति को ये एहसास दिलाया था कि कभी कभी सही रास्ते पर चलने के लिए कुछ सैक्रिफाइस करना पड़ता है. अंजलि सही भी थी कि चैताली ने हमेशा सुमति की क्रॉसड्रेसिंग में साथ दिया था बचपन से, और आज तक किसी को इस बारे में बताया नहीं था. सुमति अब भला कैसे चैताली को छोड़ सकती थी सिर्फ इसलिए कि वो अब चैतन्य नाम का एक आदमी है. वो भी तो आखिर चैताली के सामने औरत बन जाया करती थी.

“अच्छा सुन अंजलि, मैं तेरा बाथरूम यूज़ करती हूँ अपना मेकअप सुधारने. मेरे आंसू से मेरा काजल फ़ैल गया होगा.” , सुमति बोली.

अंजलि सुमति की तरफ देख कर मुस्कुरा दी. और खुद तैयार होने में मगन हो गयी.

क्रमश: …

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इंडियन लेडीज़ क्लब: भाग ११

उस विचित्र रात के बाद साशा अब अन्वेषा के साथ घबराई हुई सी थी. पर अन्वेषा के मन में कुछ चल रहा था जो साशा के लिए ठीक न था.

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साशा का डर

साशा अपने इस नए रूप और जीवन से अब तक घबरायी हुई थी. उसे अब तक समझ नहीं आ रहा था कि वो रातो-रात पूरी तरह से औरत कैसे बन गयी और उसका असर अब उसके जीवन पर कैसे पड़ेगा. और फिर अन्वेषा के साथ उसका वो किस?? क्या मतलब था उस किस का? सचमुच तो मन ही मन उसे वो चुम्बन बेहद अच्छा लगा था फिर भी उस चुम्बन के बारे में कुछ था जो उसे असहज कर रहा था.

“मुझे कुछ समय चाहिए अन्वेषा. इतने जल्दी इतने सारे बदलाव हो रहे है. मुझे सोचने के लिए कुछ वक़्त चाहिए.”, साशा ने कहा और फिर खुद को अपनी साड़ी के आँचल में लपेट कर सोफे पर बैठ गयी. शायद अपनी ही साड़ी के आँचल में वो सुरक्षा ढूंढ रही थी जो एक औरत को अपने तन को परायी नजरो से बचाते हुए ढँककर उसकी साड़ी उसे देती है. साशा को इस वक़्त अपनी नर्म साड़ी की गर्माहट और सुरक्षित होने की भावना की ज़रुरत थी.

“जितना चाहे समय ले लो साशा. पर मैं तो इस औरत के रूप में अपने जीवन का खूब मज़ा लेने वाली हूँ. और मुझे यकीन है कि तुम भी लोगी. सोचो लडकियां अपनी सेक्सी बॉडी का कितना फायदा उठाती है… अब हम भी वो सब कर सकते है!”, अन्वेषा बड़ी उत्साहित थी सोच कर ही. पर कहीं न कहीं उसकी सोच गलत थी. कुछ तो था उसकी सोच में और उसकी उस कुटिल मुस्कान में जो साशा के लिए ठीक नहीं थी.

“अन्वेषा शायद किसी दिन मैं भी इस परिवर्तन में कुछ अच्छा ढूंढ सकूंगी. पर इस वक़्त मुझे अपनी इस नयी ज़िन्दगी को समझने के लिए वक़्त चाहिए. मुझे ३ घंटे में अपने ऑफिस में जाना है और मुझे तो ये तक पता नहीं कि मैं अब भी उसी घर में रहती हूँ जहाँ पहले रहती थी. पर कैसे हो सकता है यह? मैं तो कई रूममेट के साथ रहती थी.”, साशा ने कुछ सोचकर कहा.

“क्या हुआ तुम्हारे रूममेट को?”, अन्वेषा ने साशा से पूछा.

“मेरे साथ के सभी रूममेट तो लड़के थे अन्वेषा…और वो हमारी तरह क्रॉसड्रेसर नहीं थे. और अब मैं लड़की. मैं उनके साथ कैसे रहूंगी?”,साशा ने अपनी नज़रे झुकाकर अपने बदन को देखा और कहा. उसकी बात सही थी. एक खुबसूरत लड़की के लिए जवान लडको के साथ रहना … सोच कर ही उसे डर लग रहा था.

“कम ऑन साशा. तुम जल्दी ही सब पता कर लोगी. सब ठीक होगा. यदि तुम्हारे रूममेट अब भी लड़के है तो भी इतना क्या बुरा होगा? तुम उन सबके साथ सेक्स कर सकती हो. हा हा…”, अन्वेषा हँस पड़ी. पर साशा को उसकी बात ज़रा भी ठीक न लगी. साशा को यकीन नहीं हो रहा था कि ये वही अन्वेषा है जो कल रात को इतना शर्मा रही थी. क्या ये वोही अन्वेषा है जिसे कल रात इंडियन लेडीज़ क्लब की औरतों ने इतने प्यार से एक खुबसूरत राजकुमारी में तब्दील किया था?

“ओह मेरी साशा! मैं तो बस मज़ाक कर रही थी. ऐसे घुर कर न देखो मुझे.”, अन्वेषा बोली, “वैसे भी मैं नहीं चाहती कि कोई लड़का तुम्हारे पास भी आये. क्योंकि मैं चाहती हूँ कि तुम सिर्फ मेरी और मेरी बन कर रहो.”, अन्वेषा ने साशा की तरह हसरत भरी नजरो से देखा.

“अन्वेषा.. तुम समझ नहीं रही हो. मुझे तो अपने घर के बारे में कुछ पता भी नहीं है. मैं ऑफिस जाने के लिए कपडे कैसे और कहाँ बदलूंगी? मैं ऑफिस में यूँ साड़ी पहन कर तो नहीं जा सकती? और न मुझे और न तुम्हे साड़ी पहनना आता है.”, साशा की चिंता वाजिब थी.

“चिंता क्यों करती हो डार्लिंग? मेरे क्लोसेट में तुम्हारे पहनने के लिए कुछ न कुछ मिल ही जाएगा.”, अन्वेषा कहते कहते साशा के करीब आ कर बैठ गयी. “और तुम्हे कुछ सेक्सी कपडे पहनाकर मुझे भी मज़ा आएगा.”, अन्वेषा ने साशा की जांघो पर अपना हाथ रख उस पर फेरने लगी जैसे वो कुछ करना चाहती हो साशा के साथ.

साशा को अन्वेषा की हरकत पर यकीन नहीं हुआ. “साशा क्या तुम्हे याद नहीं कि कल रात से ही मेरा तुम में इंटरेस्ट आ गया था?”, अन्वेषा आगे बोली. और साशा बस अचम्भे से उसकी ओर देखती रह गयी.

“पर तुम्हारा मुझमे इंटरेस्ट कैसे हो सकता था अन्वेषा? कल रात तक तो मैं साड़ी के अन्दर एक आदमी थी. एक आदमी! और तुम खुद एक आदमी थी.”, साशा ने अन्वेषा से दूर होने की कोशिश की.

पर अन्वेषा यूँ पीछे नहीं हटने वाली थी. वो अब भी साशा की स्मूथ सैटिन साड़ी पर अपना हाथ फेर रही थी. “हाँ मैं जानती थी कि तुम एक आदमी हो. पर फिर भी मैं तुम्हारे अन्दर की औरत को पाकर ही रहती. मेरी जब तुम पर पहली नज़र पड़ी थी तभी से तुम्हे छूकर अपनी बांहों में भर लेने की मेरी इच्छा जाग गयी थी.”, अन्वेषा बोली.

“बस करो अन्वेषा. मैं एक क्रॉसड्रेसर थी… पर मेरा इंटरेस्ट हमेशा से लड़कियों में था… आदमी में नहीं. मैं तुम्हारी कभी नहीं हो सकती थी.”, साशा ने कांपती आवाज़ में कहा. भले अन्वेषा के हाथो का स्पर्श उसके कोमल तन को उकसा रहा था फिर भी वो उसे नकारना चाह रही थी.

“कितनी भोली हो तुम साशा. तुम चाहे जो सोचो… पर मैं जो चाहती हूँ वो पाकर रहती हूँ.”, अन्वेषा के चेहरे की मुस्कान और कुटिल होती जा रही थी.

“क्या मतलब है तुम्हारा?”, साशा ने घबरायी आवाज में अन्वेषा से पूछा.

“डार्लिंग… चाहे जो भी हो क्रॉसड्रेसर की एक कमजोरी होती है. वो औरत की तरह पूरी तरह महसूस करना चाहते है. थोड़ी सी ड्रिंक्स और उन्हें थोडा सा औरत की तरह ट्रीट करो.. और फिर वो सब करने को तैयार हो जाते है जो होश में न करते. मैं तुम्हे एक बेहद खुबसूरत औरत की तरह कॉम्प्लीमेंट करती और कुछ ड्रिंक्स के बाद तुम अपने घुटनों पर मेरी बन जाती. तुम समझ रही हो? हा हा हा..”, अन्वेषा ने अपने हाथो को साशा के जांघो के बीच उसकी योनी के बीच ले जाकर उसे उकसाने लगी. पर साशा ने उसका हाथ तुरंत हटा दिया.

“तुम्हे क्यों लगता है कि मैं तुम्हे इतने ड्रिंक्स दे रही थी कल रात? क्यों मैं पूरी रात तुम्हारे आस पास थी? क्योंकि मैं तुम्हे तैयार कर रही थी डार्लिंग कि तुम कल रात मेरी बन सको. भले तुम्हे सुबह होश आने पर अफ़सोस होता मगर मुझे वो सब कुछ मिल गया होता जो मैं चाहती थी.”, अन्वेषा सच मच बेहद बुरी थी.

अन्वेषा ने कल रात साशा को उसकी सहेली सोहा से दूर कर दिया था ताकि वो साशा पर अपना जादू चला सके.

“कल रात मैंने देख लिया था कि तुम्हारी सहेली सोहा मेरे मोटिव समझ चुकी थी. वो हम दोनों के बीच आकर तुम्हे मुझसे बचाना चाहती थी. इसलिए मैंने तुम दोनों को अलग कर दिया था ताकि मैं तुम्हारे करीब आ सकू”, अन्वेषा ने आगे कहा. अब वो साशा के स्तनों को धीरे धीरे छू रही थी जो साशा के तन में आग लगा रहा था. “पर कल जो हुआ अब मायने नहीं रखता. अब तो मुझे वो सब करने की ज़रुरत भी नहीं है. अब हम दोनों खुबसूरत औरतें है. मुझे भी औरतें पसंद है और तुम्हे भी. हम अब एक दुसरे के साथ जो चाहे कर सकते है. क्यों सही कह रही हूँ न मैं?”, अन्वेषा एक बार फिर हँस दी.

साशा को अन्वेषा के कुटिल इरादों पर यकीन नहीं हुआ. भले अन्वेषा को उसमे कुछ गलत नहीं लग रहा था पर साशा जानती थी कि वो इतनी बुरी औरत की बांहों में नहीं जा सकती थी.

“छोडो मुझे. मुझे बाथरूम जाना है.”, साशा अब अन्वेषा के साथ एक मिनट भी और नहीं ठहरना चाहती थी.

“जरूर डार्लिंग. पर मैंने जो कहा उसे भूलना मत. बस मैं ही हूँ इस वक़्त जो तुम्हारी मदद कर सकती हूँ.”, अन्वेषा ने कहा. वो साशा की मजबूरी का फायदा उठा रही थी.

साशा उठकर बाथरूम चली गयी और रोने लगी.

एक ऑटो एक बिल्डिंग के सामने रुका जिसमे से एक औरत उतर कर बाहर आई. वो औरत कोई और नहीं साशा थी. उसने अब भी वही साड़ी पहनी हुई थी. पर अब वो फ्रेश लग रही थी. अन्वेषा के घर में बाथरूम में अकेले अकेले रोने के बाद वह मुंह हाथ धोकर फ्रेश हो गयी थी. वहां वो अन्वेषा से और बात नहीं करना चाहती थी, इसलिए उसने चुप चाप खुद ही youtube में साड़ी पहनने से सम्बंधित विडियो देखकर खुद ही साड़ी पहन ली थी. परफेक्ट तो नहीं थी पर फिर भी वो इस तरह से तो तैयार हो गई थी कि घर से बाहर जा सके. उसने खुद को एक बार बाथरूम के आईने में देखा और अपने बालों को अपनी पसंद के अनुसार बाँध लिया. भगवान या जिसने भी उसे औरत बनाया था, उसे सचमुच खुबसुरत बनाया था. यदि साड़ी पहनने में कोई कमी रह भी गयी हो तो किसी की उसकी खूबसूरती के आगे नज़र नहीं जाती.”सब कुछ ठीक होगा साशा”, उसने खुद को संभालते हुए कहा था ऑफिस के लिए निकलने के पहले. “साशा डार्लिंग तो आज शाम को मिलोगी न मुझसे?”, अन्वेषा ने साशा से कहा था. पर अन्वेषा से दोबारा मिलने की सोच कर ही साशा को बुरा लग रहा था. चाहे जो हो जाए वो यहाँ वापस नहीं आएगी. पर फिर वो जायेगी भी कहाँ? उसे पता नहीं था पर किसी तरह वो देख लेगी.

ऑटो से उतारकर जैसे ही साशा अपनी ऑफिस की बिल्डिंग की तरफ बढ़ने लगी, उसे पीछे से एक आवाज़ सुनाई दी. “साशा! साशा!”, कोई लड़की उसे पुकार रही थी. जब उसने पलट कर पीछे देखा तो वही लड़की उसकी तरफ दौड़ी चली आ रही थी. आवाज़ से ही साशा को अंदाजा हो गया था कि ये नौरीन थी. नौरीन, उसके साथ ही ऑफिस में काम करती थी. शायद दुनिया में सबसे स्वीट लड़की होगी जिसे साशा जानती थी. एक साधारण रूप रंग वाली नौरीन हमेशा सादे से सलवार सूट में हुआ करती थी और उसके चेहरे पर हमेशा एक बड़ी सी मुस्कान होती थी. इतनी प्यारी होने के बाद भी, किसी लड़के ने उसमे इंटरेस्ट नहीं दिखाया. शायद उसकी सादगी और पुराना फैशन वजह थी. हर लड़का उसे सिर्फ “दोस्त” मानता था, उससे ज्यादा कुछ नहीं. नौरीन को इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता था. शायद उसे इस बात की आदत हो गयी थी या फिर वो इतनी सीधी थी कि प्यार इश्क के चक्कर के बारे में उसने कभी सोचा ही नहीं. ऐसा तो नहीं था कि उसे प्यार में पड़ने की इच्छा नहीं थी. हर लड़की की तरह उसके दिल में भी एक राजकुमार की हसरत तो थी, पर शहर के कॉस्मोपॉलिटन कल्चर में उसके जैसी साधारण लड़की के लिए प्यार पाना मुश्किल था. पर फिर भी वो सभी के साथ बड़े अच्छे से व्यवहार करती थी.

“नौरीन!”, साशा के चेहरे पर एक बड़ी मुस्कान थी. आज सुबह से उठने के बाद पहली बार मुस्कुरा रही थी. शायद साशा को थोड़ी राहत मिली थी कि उसे इस दुनिया में साशा के रूप में जानने वाली नौरीन तो है जो उसकी मदद ज़रूर करेगी. नौरीन अब साशा के पास आ गयी थी. दौड़ते दौड़ते उसकी सांस फुल गयी थी. “साशा, कहाँ थी यार तू कल पूरी रात? मैं कितनी बार तुझे कॉल करने की कोशिश करती रही पर तूने जवाब तक नहीं दी”, नौरीन ने चिंता के साथ कहा. वो अब भी मुश्किल से सांस ले पा रही थी.

साशा ने नौरीन की ओर देखा पर इसके पहले कि वो कुछ कह पाती, उसके सर में तीव्र दर्द हुआ. उसका दिमाग भी उसकी नयी यादें बना रहा था एक औरत के रूप में. और इस औरत के रूप में उसके नए जीवन में नौरीन उसकी रूममेट थी. उस दर्द के साथ ही साशा के दिल में ख़ुशी भी जाग गयी. नौरीन से अच्छी रूममेट कोई और नहीं हो सकती थी इस वक़्त उसके लिए. अन्वेषा से पीछा छुटा! और फिर उसने तुरंत ही नौरीन को जोर से गले लगा लिया और उसकी आँखों में ख़ुशी के आंसू आ गए. नौरीन को तो कुछ पता न था कि साशा के साथ क्या हो रहा है पर उसने उसे प्यार से गले लगा लिया और उसकी पीठ पर हाथ सहला कर जैसे साशा को संभाल रही थी वो.

“क्या हुआ साशा? सब ठीक तो है? और तू साड़ी पहन कर कैसे आ गयी आज? तुझे तो मैंने कभी जीन्स या सलवार के अलावा किसी और कपड़ो में ऑफिस में तो नहीं देखा पहले”, नौरीन ने साशा से पूछा. “सब ठीक है नौरीन. अब तू आ गयी है यहाँ तो सब ठीक ही होगा.”, साशा ने आँखें बंद रखकर ही नौरीन से कहा और उसे अपनी बांहों से बाहर जाने न दिया.

“सुन मैंने तुझे कल कम से कम १० बार कॉल किया था. मुझे चिंता हो गयी थी. पर तू ठीक है इस बात से मुझे बहुत ख़ुशी मिल रही है”, नौरीन बोली.

तभी साशा का फ़ोन बज्ज करने लगा. और उसके फ़ोन पर एक मेसेज दिखाई दिया. “You have 15 missed calls from Naureen” “लो तुम्हारे मिस्ड कॉल अब दिखाई दे रहे है!”, साशा ने मुस्कुराते हुए कहा.

“चल मैं तेरे लिए नाश्ता लेकर आई हूँ. तुझे भूख लगी होगी.”, नौरीन बोली. “हाँ तुझे कैसे पता चला कि मुझे भूख लगी होगी?”, साशा ने मुस्कुरा कर कहा. उसने फिर नौरीन का एक हाथ पकड़ा और अपनी रूममेट और नयी दोस्त नौरीन के साथ चलने लगी. नौरीन इस वक़्त साशा के जीवन में एक फ़रिश्ता बन कर आई थी और साशा इस बात के लिए बेहद शुक्रगुज़ार थी. और फिर दोनों सहेलियां ऐसे बातें करने लगी जैसे सालो से एक दुसरे को जानती हो. कम से कम नौरीन की नजरो में तो ये सच था. पर साशा के लिए ये एक नया सच था.

सुमति की दुविधा

ऑफिस का काम निपटा कर सुमति अब घर जा रही थी. कल तक तो एक आदमी के रूप में सुमति हमेशा बस से घर वापस जाती थी. पर आज जो ऑफिस में हुआ, उसके बाद उसे बस में जाना ठीक नहीं लगा. वो कुछ पल एकांत के चाहती थी. इसलिए आज वो ऑटो से घर जा रही थी. उसका शहर तो ट्रैफिक और हॉर्न के शोर में व्यस्त था पर सुमति उन सबसे दूर अपने विचारो में खोयी हुई थी. चलते हुए ऑटो में हवा से उसके बाल बिखर कर उसके चेहरे पर आ रहे थे. पर सुमति तो बस अपनी साड़ी को लपेटे अपनी ही दुनिया में थी. आज ऑफिस में एक औरत के रूप में उसका पहला दिन था. और आज जो उसने अनुभव किया, लाखो करोडो औरतें रोज़ ही यह अनुभव करती है.

आज सुबह जब वो सुबह उठी थी तो उसे अच्छी तरह याद था कि पिछले दिन चैतन्य और उसके बीच क्या हुआ था. एक पुरुष का स्पर्श उसे बिलकुल अच्छा नहीं लगा था पर अब तो उसकी चैतन्य के साथ शादी भी होने वाली थी. अब क्या कर सकती थी वो. इन सब विचारो की उन्हापोह से अपना मन भटकाने के लिए ऑफिस जाने से अच्छा क्या हो सकता था. पर ऑफिस में भी तो आदमी होते है. वहां दुसरे आदमियों की नज़र से बचने के लिए सुमति ने सोचा कि ऑफिस में एक सिंपल सी सिल्क साड़ी पहन कर जायेगी. कम से कम मेकअप के साथ ताकि लोगो के बीच वो आकर्षण का केंद्र न बन जाए. पर क्या किसी खुबसूरत औरत के लिए इतना आसान होता है आदमियों की नजरो से बच निकलना?

आज ऑफिस में सुमति एक सिंपल प्लेन सिल्क साड़ी पहन कर गयी थी.

सुमति को तो मानो सदमा लग गया जब उसके ऑफिस के आदमी उसकी कमर और उसकी ब्लाउज पर नज़रे गडाए घुर कर उसे देखने लगे. कोई इस तरह उसे खुले आम तो नहीं घूर रहा था पर उसे पता था कि कब लोगो की बुरी नज़र उस पर पड़ रही है. उसे यकीन नहीं हुआ कि ये सब वही आदमी है जिनके साथ वो रोज़ काम करती थी. आज उनके बारे में उसे जो पता चला वो मान ही नहीं पा रही थी. उसे लगता था कि उसके साथ काम करने वाले सभ्य आदमी थे. पर कितनी गलत थी वो! पर सबसे ज्यादा उसे परेशान इस बात ने किया कि उसका सहायक रवि, जो सुमति के पुरुष रूप में उसका सबसे अच्छा दोस्त हुआ करता था, वो भी ऐसा निकला! आज उसके साथ मीटिंग के वक़्त वह पूरे समय सुमति की तरफ मुस्कुरा कर देख रहा था और सीधे सीधे न सही पर सुमति के साथ फ़्लर्ट करने की कोशिश कर रहा था. उसका बर्ताव तो ऐसा था जैसे किसी औरत से पहली बार मिल रहा हो. क्या उसे इतना भी पता नहीं था कि सुमति की एक महीने के अन्दर शादी होने वाली थी? जिस औरत की शादी हो रही हो क्या उसके साथ इस तरह का बर्ताव एक सभ्य आदमी को शोभा देता है? सुमति ने रवि की पर्सनालिटी का यह पहलु पहले कभी नहीं देखा था. एक औरत बनने के बाद वो उसके आस पास के लोगो को नए तरीके से जान रही थी.

औरत बनते ही जैसे सुमति के लिए एक नयी दुनिया खुल गई थी. शुक्र है कि कम से कम इस पूरे दिन में उसे २ सभ्य आदमी मिले. एक तो था वाचमैन जिसने सुमति को पूरे सम्मान के साथ सुबह नमस्ते कहा था… उस इज्ज़त के साथ जो एक औरत का हक़ है. और दूसरा आदमी था उसका मेनेजर सुदिप्तो. किसी भी एम्प्लोयी की तरह, सुमति को भी कल तक उसके मेनेजर से कोई ख़ास लगाव नहीं था.. बल्कि मन में शिकायतें ही थी. पर आज दोपहर में सुदिप्तो सुमति से मिलने आये थे और उन्होंने कहा, “सुमति बेटी, तुम्हारी आज तबियत ठीक नहीं लग रही है. तुम घर जाकर आज आराम क्यों नहीं कर लेती? वैसे भी कुछ दिनों में तुम्हारी शादी है और फिर तुम्हे आराम करने का मौका नहीं मिलेगा” सुमति मन ही मन शुक्रगुजार थी सुदिप्तो की. “और हाँ… मैं और मेरी पत्नी आने वाले है तुम्हारी शादी में आशीर्वाद देने. मैंने सोचा कि तुम्हे बता दूं”, सुदिप्तो ने बड़े प्यार से एक पिता की तरह कहा था सुमति से.

पर ऐसे एक दो अनुभव को छोड़ कर सुमति को किसी और आदमी से मिलकर ज़रा भी अच्छा नहीं लगा. आज उसे खुद शर्म महसूस हो रही थी अपने पहले वाले बर्ताव पर जब वो आदमी के रूप में औरतों को ऐसे देखा करती थी, और फिर मन ही मन उस औरत की खूबसूरती का स्कोर भी दिया करती थी. पर पिछले २ दिनों में औरत बनने के बाद से, सुमति के अनुभव जैसे उसकी आँखें खोल रहे थे और वो इन सब के बारे में किसी से बात भी नहीं कर पा रही थी. कितना अकेला महसूस कर रही थी वो आज.

पर सुमति के पास तो एक सहेली हमेशा हुआ करती थी. अंजलि, उसकी सबसे अच्छी सहेली, जो हमेशा उसका साथ देती थी. सुमति को तो आज ये भी नहीं पता था कि अंजलि अब भी एक क्रॉसड्रेसर पुरुष है या फिर वो भी औरत बन गयी है. अंजलि का ख्याल आते ही सुमति ने अपने फ़ोन में अंजलि का नंबर ढूँढा. उसे पता नहीं था कि इस नयी दुनिया में क्या अंजलि का वही नंबर होगा. फ़ोन में अंजलि का नाम देख कर उसे एक ख़ुशी महसूस हुई. अब उसे अपनी किस्मत आजमाना था शायद अंजलि जवाब दे दे.

“हाय अंजलि”, सुमति ने अंजलि को एक sms भेजा. “सुमति.. कैसी है यार तू?”, सुमति को तुरंत जवाब भी मिल गया. जिसे देख कर सुमति ख़ुशी से फूली न समायी.

“हमें तुरंत बात करने की ज़रुरत है अंजलि. मुझे तुम्हारी सख्त ज़रुरत है”, सुमति ने मेसेज लिखा. “हम्म… तो शायद तुम्हारे साथ भी वही हुआ है जो मेरे साथ?”, अंजलि का जवाब आया. अंजलि ने सीधे सीधे कहा तो नहीं पर दोनों जानती थी कि वो किस बारे में कह रही है. “हाँ. मेरी दुनिया बदल गयी है अंजलि. मुझे तुमसे मिलना है. कब मिल सकती हो?”, सुमति ने लिखा.

“रिलैक्स सुमति. कल सुबह मेरे घर ८ बजे के बाद आ जाना. मैं अब दुसरे पते पर रहती हूँ. मैं तुम्हे एड्रेस भेजती हूँ जल्दी.”, अंजलि का जवाब आया. “थैंक यू अंजलि. मुझे तुम्हारी सच मच बहुत याद आ रही है”, सुमति ने लिखा.

“सुमति. यदि तुम बुरा न मानो तो कुछ ट्रेडिशनल कंज़रवेटिव कपडे पहन कर आना. जब तुम आओगी मैं तुम्हे सब समझा दूँगी. पर चिंता मत करो, सब ठीक होगा.”, अंजलि ने एक अजीब सी रिक्वेस्ट भेजी थी सुमति को. आखिर क्यों ट्रेडिशनल कपडे पहनने को कह रही थी वो? “ठीक है. मैं कल मिलती हूँ.”

सुमति की जान में अब थोड़ी जान आई थी. अब उसे पता चल गया था कि वो अकेली नहीं है जो यूँ अचानक ही औरत बन गयी. उसकी सहेली अंजलि भी अब औरत बन चुकी है. अंजलि हमेशा से ही मुसीबत के समय में भी शांत रहती थी और हमेशा सुमति की मदद करती थी. “सब ठीक ही होगा”, सुमति ने सोचा. और फिर वो बाहर डूबते हुए सूरज की ओर देखने लगी. कुछ अजीब सी संतुष्टि थी इस वक़्त उसके मन में. शायद ये बदली हुई दुनिया उसे जल्दी ही समझ आएगी.

आने वाले भागो में हम देखेंगे कि अंजलि का जीवन अब कैसा है. और फिर सुमति की क्रॉसड्रेसर के रूप में माँ मधुरिमा से मुलाक़ात कैसी होती है. और फिर कहानी में एक और ट्विस्ट भी है. बस कुछ भाग और है इस कहानी में. तो इंतज़ार करियेगा!

क्रमश: …

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