इंडियन लेडीज़ क्लब: भाग ८

औरत का बदन भी एक पहेली की तरह होता है. सुमति अपने नए बदन को छूकर उसे अनुभव करना चाहती थी. उसके नाज़ुक कोमल स्तन, उसका फिगर, उसकी नाभि और जांघें, वो सबको छूकर महसूस करना चाहती थी.


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औरत का बदन भी एक पहेली की तरह होता है जिसे सुलझाना होता है. हर एक अंग पर स्पर्श एक बिलकुल अलग अहसास उस औरत में जगाता है. तभी तो आदमी औरत को हर जगह छूना चाहते है क्योंकि हर स्पर्श से वो औरत कुछ नए अंदाज़ में लचकती है, मचलती है. और सुमति के लिए तो ये स्पर्श का आनंद कुछ अधिक ही था. अब तो वो खुद एक औरत के जिस्म में थी. अपने खुद के स्पर्श से ही उसे आनंद मिल रहा था जैसा उसने पहले कभी अनुभव नहीं की थी. और इसलिए उसके अन्दर खुद को छूकर देखने की जिज्ञासा बढती जा रही थी. वो धीरे धीरे अपने तन पर अपनी उँगलियों को सहलाते हुए अपने हर अंग में छुपे हुए आनंद को भोगना चाहती थी. उसकी नजाकत भरी लचीली कमर, उसे संवेदनशील स्तन और जांघे, सब जगह वो छूना चाहती थी. पर किसी तरह वो खुद को संभाले हुई थी. अभी तो फिलहाल वो तैयार होकर खुद को आईने के सामने निहार रही थी. हलकी हरी रंग की साड़ी में बहुत खिल रही थी वो आज. एक तरह से उसका सपना सच हो गया था. वो हमेशा से ही इस दुनिया में एक औरत की तरह स्वच्छंद तरीके से विचरण करना चाहती थी, और आज वो एक असली औरत थी. आज वो अपने इस रूप को , इस जिस्म को घंटो आईने में निहार सकती थी और एक पल को भी बोर न होती. आज उसकी बस एक ख्वाहिश थी कि समय कुछ पलो के लिए थम जाए और वो अपने बदन और इस नए वरदान का सुख भोग सके.

सुमति अपनी साड़ी में बहुत सुन्दर लग रही थी. वो आज अपने तन को छूकर महसूस करना चाहती थी. यदि आप भी सुमति की तरह खुबसूरत औरत होती, तो आप क्या करती?

सुमति ने अपनी खुली कमर को एक बार अपनी नर्म ऊँगली से छुआ. “उफ़… खुद की ऊँगली से ही मुझे एक गुदगुदी सी हो रही है.”, उसने सोचा. सुमति खुद अपने ही तन के रोम रोम में छुपे आनंद से अब तक अनजान थी. उसके खुद के स्पर्श से एक ऐसा एहसास हो रहा था उसे जो उसे मचलने को मजबूर कर रहा था. वो अपनी मखमली त्वचा पर धीरे धीरे अपनी उँगलियों को फेरने लगे. अपने पेट पर, अपनी नाभि पर और फिर धीरे धीरे अपने स्तनों के बीच के गहरे क्लीवेज की ओर. उसने अपनी आँखें बंद कर ली ताकि वो हर एक एहसास को और अच्छी तरह से महसूस कर सके. “क्या मैं खुद अपने स्तनों को छूकर देखूं? न जाने क्या होगा उन्हें छूकर , उन्हें दबाकर?”, वो सोचने लगी. बाहरी दुनिया से खुद को दूर करके सुमति सिर्फ और सिर्फ अपने अन्दर होने वाली हलचल को अनुभव करने में मग्न हो रही थी. और फिर उसने अपनी कुछ उंगलियाँ अपनी साड़ी के निचे से अपने स्तनों पर हौले से फेरी. स्पर्शमात्र से ही उसके जिस्म में मानो बिजली दौड़ गयी और वो उन्माद में सिहर उठी. और उस उन्माद में खुद को काबू करने के लिए वो अपने ही होंठो को जोरो से कांटना चाहती थी.. क्योंकि अपने एक स्तन को अपने ही हाथ से धीरे से मसलते हुए वो बेकाबू हो रही थी. उसके तन में मानो आग लग रही थी. वो रुकना चाहते हुए भी खुद को रोक नहीं पा रही थी. मारे आनंद के वो चीखना चाहती थी. उसकी बेताबी बढती ही जा रही थी. उसकी उंगलियाँ उसके स्तन और निप्पल को छेड़ रही थी… और फिर उसकी उंगलियाँ उसके निप्पल के चारो ओर गोल गोल घुमाकर छूने लगी. “आह्ह्ह…”, वो आन्हें भरना चाहती थी पर उसे अपनी आन्हें दबाना होगा. उसकी उंगलियाँ अब जैसे बेकाबू हो गयी थी और उसके निप्पल को लगातार छेड़ रही थी. अब उसकी उंगलियाँ उसके निप्पल को पकड़ कर मसलने को तैयार थी. निप्पल दबाकर न जाने कितना सुख मिलेगा, यह सोचकर ही अब बस वो अपने होंठो को दबाते हुए अपने निप्पल को मसलने को तैयार थी.

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सुमति खुद को संभाल न सकी, और वो अपने ही नर्म मुलायम सुडौल स्तनों को दबाने को बेताब थी. सिर्फ सोच कर ही वो मचल उठी थी..

“डिंग डोंग”, दरवाज़े पर घंटी बजी. आज सुबह से ही घंटी बार बार बज रही थी और हर बार वो घंटी उसके लिए एक नया अनचाहा सरप्राइज लाती थी. पर इस बार इससे सही वक़्त पर घंटी नहीं बज सकती थी. घंटी न बजती तो वो बेकाबू होकर अपने निप्पल को निचोड़ कर मचल उठती और आन्हें भरने लगती, अपने ही होंठो को जोर से कांटने लगती. अपने ही होंठो को कांटना एक पुरुष के रूप में उसे कभी सेक्सी नहीं लगा… पर औरत के रूप में वो बात ही अलग थी. शुक्र था उस घंटी का जिसने उसे अपने ही बदन के जादू से बाहर निकाला.

सुमति सुन सकती थी कि किसी ने दरवाज़ा खोल दिया था तब तक. “नमस्ते अंकल| नमते आंटी! आइये आइये आप ही का इंतज़ार था”, सुमति अपने भाई रोहित की आवाज़ सुन रही थी. आखिर सुमति के सास-ससुर आ ही गए थे. उसने झट से अपने बालो को पीछे बाँधा और उनसे मिलने के लिए बाहर जाने को तैयार हो गयी. “मुझे जल्दी करनी होगी. वरना उन्हें अच्छा नहीं लगेगा कि उनकी होने वाली बहु उनके स्वागत के लिए बाहर तक नहीं आई. पर क्या मुझे यह फिक्र करनी चाहिए? एक औरत को तैयार होने में हमेशा से ज्यादा समय लगता है.. ये तो वो भी जानते होंगे.”, सुमति यह सब सोचते हुए अपने पल्लू और अपनी साड़ी को एक बार ठीक करते हुए पल्लू को हाथ में पकडे बाहर के कमरे की ओर जाने लगी. उसने अपने हाथों से पल्लू को पीठ पर से अपने दांये कंधे पर से सामने खिंच कर ले आई ताकि उसके स्तन और ब्लाउज को छुपा सके. सुमति एक पारंपरिक स्त्री की तरह महसूस कर रही थी इस वक़्त. उसने एक बार चलते हुए खुद को आईने में देखा. “साड़ी तो ठीक लग रही है. शायद रोहित और चैतन्य की तरह मेरे सास-ससुर को भी याद न होगा कि मैं कभी लड़का थी. बहुत संभव है कि मैं उन्हें पहले से जानती हूँ. शायद वो चैताली के माता पिता होंगे. (सुमति की शादी चैताली नाम की लड़की से होने वाली थी. पर इस नए परिवर्तन के बाद चैताली चैतन्य बन चुकी थी.)”, सुमति खुद से बातें करने लगी. सुमति को साड़ी पहन कर शालीनता से चलना पहले से ही आता था. आखिर वो इंडियन लेडीज़ क्लब की फाउंडर थी. उसने न जाने कितने ही आदमियों को सुन्दर औरत बनाया था. इन सबके बाव्जूद, अब वो खुद एक पूरी औरत है, इस बात का उसे यकीन नहीं हो रहा था, और फिर चैताली, उसकी होने वाली पत्नी, अब आदमी बन चुकी थी. किसे यकीन होगा ऐसी बातों का?

सुमति अपने कमरे से बाहर आई. उसके सास-ससुर सोफे के बगल में अब तक खड़े खड़े रोहित और चैतन्य से बातें कर रहे थे. सुमति सही थी… उसके सास-ससुर चैताली के ही माता पिता थे. कम से कम ये नहीं बदला. उसने उन्हें देखा और तुरंत ही अपने सर को अपने पल्लू से ढंकती हुई उनके पैर छूने के लिए झुक गयी. जैसे कोई भी आदर्श बहु करती. एक तरफ तो सुमति चैतन्य से शादी नहीं करना चाहती थी पर फिर भी उसे बहु बनने में जैसे कोई संकोच न था.

“जुग जुग जियो बेटी!”, उसके ससुर प्रशांत ने उसे आशीर्वाद दिया. “बेटी तुम्हारी जगह मेरे कदमो में नहीं मेरे दिल में है.”, उसकी सास कलावती ने नज़र उतारते हुए सुमति को फिर गले से लगा लिया. गले लगाते ही सुमति को माँ का प्यार महसूस हुआ. सुमति के चेहरे पर एक ख़ुशी भरी मुस्कान थी. उसे ऐसा अनुभव तो मधुरिमा के साथ भी होता था जो उसकी क्रॉस-ड्रेसर माँ थी. मधुरिमा की पत्नी अजंता भी तो सुमति को अपनी बेटी की तरह रखते थे. सुमति को आज भी याद आता है कि कैसे अजंता आंटी कहती थी कि उन्हें तो सुमति की तरह बहु चाहिए. शायद मधु और अजंता के साथ का अनुभव था जो आज सुमति सहज रूप से अपने सास-ससुर के सामने थी.

“माँ, बाबूजी, आप लोग बैठ कर थोड़ी देर आरम करिए. आप यात्रा करके थक गए होंगे. मैं तुरंत ही आप लोगो के लिए नाश्ता बनाकर लाती हूँ.”, सुमति ने प्रशांत और कलावती से कहा. पर मन ही मन वो सोच रही थी कि उसने ये सब क्यों कह दिया. उसका इस वक़्त कुछ भी पकाने का मन नहीं था. “रोहित, ज़रा माँ-बाबूजी का ध्यान रखना. मैं किचन में नाश्ता बनाती हूँ. तब तक तुम उन्हें पीने के लिए पानी तो लाकर दो.”, सुमति ने अपने भाई से कहा. और भाई ने सर हिलाकर हामी भर दी.

जब सुमति किचन की ओर बढ़ रही थी तो उसकी नज़रे चैतन्य की नजरो से मिली, उसका होने वाला पति, उसका मंगेतर! चैतन्य अपनी होने वाली खुबसूरत पत्नी को देख मुस्कुरा रहा था. सुमति भी उसे देख मुस्कुरा दी. “हम्म… इस आदमी के साथ मुझे अपनी पूरी ज़िन्दगी गुजारनी है.”, वो सोचने लगी. एक आदमी से शादी करने की बात सोच कर ही उसका मन विद्रोह करने लगता. उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसे इस बात से खुश होना चाहिए या रोना चाहिए. फिलहाल तो मन रोने को तैयार था, पर अब उसके पास एक खुबसूरत औरत का तन भी तो था. एक मौका जिसके लिए लिए वो सारी ज़िन्दगी प्रार्थना करती रहती थी कि उसे औरत की तरह जीवन जीने का मौका मिल जाए. पर ये समय यह सब सोचने का न था. उसे अपने सास-ससुर के लिए नाश्ता बनाना था.. शादी के बारे में वो बाद में शान्ति से सोच लेगी.

किचन में पहुँचते ही उसने अपना पल्लू सर से उतार कर अपनी कमर पर लपेट लिया. उसकी नाज़ुक कमर सच में बेहद सेक्सी थी. उसके बड़े से नितम्ब पर लिपटी हुई साड़ी और पल्लू उसे वो एहसास दे रही थी जैसे उसने पहले कभी नहीं किया था. और फिर उसने अपने बालो को लपेटकर जुड़ा बनाया और नाश्ता बनाने में जुट गयी. सालों से इंडियन लेडीज़ क्लब की मीटिंग की तैयारी करने के अनुभव से उसे भली-भाँती पता था कि साड़ी पहन कर एक एक्सपर्ट हाउसवाइफ की तरह घरेलु काम कैसे किये जाते है. “पहले तो मैं चाय बनाने लगा देती हूँ और फिर पोहा बनती हूँ. वो जल्दी बन जाएगा.”, उसने खुद से कहा. सुमति सब कुछ एक परफेक्ट गृहिणी की तरह कर रही थी. उसने गैस पर चाय का बर्तन चढ़ाया और फिर प्याज और आलू काटने लगी पोहा बनाने के लिए.

“तो.. मेरी प्यारी बहु क्या नाश्ता बना रही है?”, कलावती सुमति की सास ने अन्दर आते हुए कहा.

“ओह कुछ ख़ास नहीं माँ जी. मैं तो बस पोहा बना रही थी आप लोगो के लिए. आशा है कि आप लोगो को पोहा पसंद है.”, सुमति ने प्यार से जवाब दिया. उसने तुरंत अपने पल्लू को कमर से निकाला और फिर अपने सर को ढकने लगी.. अपने सास के सम्मान के लिए. “लो… अब मुझे सर ढँक कर किचन में काम करना पड़ेगा..”, सुमति मुस्कुराते हुए सोच रही थी. उसने कभी इस तरह से तो खाना नहीं बनाया था.

“अरे पगली… रहने दे तुझे सर ढंकने की ज़रुरत नहीं. है. मैं भी औरत हूँ. क्या मैं नहीं जानती सर पे पल्लू करके खाना बनाना कितना कठिन है? न तो ढंग से कुछ दिखाई देता है और फिर हाथ भी अच्छी तरह पल्लू के साथ हिल नहीं पाते. तू तो मेरी बेटी है. बचपन से तुझे अपनी आँखों के सामने बड़ी होते देखा है… जबसे तू फ्रॉक पहना करती थी. तब से सलवार सूट तक तुझे बढ़ते देखा है. और अब तू साड़ी भी पहन रही है. मैं नहीं चाहती कि शादी के बाद तुझे बदलना पड़े.”, कलावती ने प्यार से सुमति के सर पर हाथ फेरते हुए कहा.

कलावती ने फिर सुमति के चेहरे को छूते हुए बोली, “मैं तो बहुत खुश हूँ कि मेरे मोहल्ले की सबसे प्यारी गुडिया सुमति जो मेरे बेटे के साथ खेला करती थी, मेरे घर की बहु बनने वाली है. मैं तो सिर्फ इस बारे में सोचा करती थी, मुझे पता नहीं था कि चैतन्य सच में तुझे बहु बनाकर लाएगा..”

सुमति की शर्म से आँखें झुक गयी. इतना प्यार जो उसे मिल रहा था. पर मन ही मन वो सोच रही थी कि कैसे उसके आस पास की दुनिया बदल गयी है. उसके सामने खड़ी औरत उससे कह रही है कि उसने सुमति को छोटी बच्ची से जवान युवती बनते देखा है. किसी को भी याद नहीं कि वो कभी लड़का भी थी. हर किसी की नज़र में वो हमेशा से ही लड़की थी. ऐसा कैसे हो सकता है? कैसा मायाजाल है ये? क्या इस दुनिया में कोई भी नहीं जो पुरानी सुमति को जानता हो? सुमति के मन में हलचल बढती जा रही थी.

कलावती फिर सुमति की पोहा बनाने में मदद करने लगी. दोनों औरतें आपस में खूब बातें करती हुई हँसने लगी. सुमति को औरत बनने का यह पहलु बहुत अच्छा लग रहा था. अपनी सास के साथ वो जीवन की छोटी छोटी खुशियों के बारे में बात कर सकती थी. ऐसी बातें जो आदमी हो कर वो कभी नहीं कर सकती थी. आदमी के रूप में सिर्फ करियर और ज़िम्मेदारी की बातें होती थी. ऐसा नहीं था कि औरतों को ज़िम्मेदारी नहीं संभालनी होती पर उसके साथ ही साथ वो अपनी नयी नेल पोलिश या साड़ी के बारे में भी उतनी ही आसानी से बात कर सकती थी. जॉब में प्रमोशन की बात हो तो उसके साथ वो फिर ये भी बात कर सकती थी कि प्रमोशन के बाद वो कैसी पर्स लेकर ऑफिस जाया करेंगी या कैसे कपडे पहनेंगी. जहाँ तक करियर की बात है, सुमति को कोई अंदाजा नहीं था कि इस नए जीवन में उसका क्या करियर है या क्या जॉब है. शादी के बाद वो काम कर सकेगी या नहीं? भले ही घर की छोटी छोटी चीजें वो संभालना चाहती थी पर वो अपनी जॉब नहीं छोड़ना चाहती थी… चाहे जैसी भी जॉब हों. और फिर क्या वो शादी के बाद माँ बनना पसंद करेगी? बड़ा भारी सवाल था जिसका जवाब अभी वो सोचना नहीं चाहती थी.

अभी तो सुमति बस खुश थी अपनी सास के साथ किचन संभालते हुए. वो वैसे भी घर संभालने में एक्सपर्ट थी. उसने जल्दी ही सबके लिए चाय नाश्ता तैयार कर ली थी. बाहर नाश्ता ले जाने के पहले सुमति एक बार फिर अपना सर ढंकने वाली थी कि कलावती ने उसे रोक लिया और बोली, “अरे सुमति तू हमारी बेटी है न? अपने माँ बाप के सामने भी कोई पल्लू करता है भला? समझी?” सुमति मुस्कुरायी. अपनी सास के प्यार से वो मंत्र-मुग्ध थी. “थैंक यू माँ! मैं हमेशा आपकी बात याद रखूंगी.” सुमति सचमुच कलावती के प्यार की शुक्र-गुज़ार थी.

सभी अब नाश्ता करने में व्यस्त थे, पर चैतन्य की नज़रे तो बस अपनी होने वाली खुबसूरत नाज़ुक सी पत्नी पर थी. जब भी सुमति उसकी ओर देखती, वो तुरंत मुस्कुरा देता. वो खुश था आखिर उसकी शादी उसकी बेस्ट फ्रेंड के साथ हो रही थी. कम से कम, उसकी नयी यादों में वो सच था. चैतन्य खुद चैताली नाम की लड़की हुआ करता था पर उसे वो बिलकुल भी याद नहीं था. सुमति के अन्दर थोड़ी सी झिझक थी चैतन्य की मुस्कान का जवाब देने के लिए. आखिर सास ससुर उसके सामने थे. कोई अच्छी बहु ऐसे कर सकती थी भला?

“सुमति… भाई मेरा तो पेट भर गया लज़ीज़ नाश्ता कर के. अब हमें शादी की शौपिंग के लिए निकलना चाहिए. मुझे पता है कि औरतों को कपडे खरीदने में बड़ा समय लगता है और ख़ास कर शादी के कपडे”, ससुर प्रशांत ने कहा. “अब तुम शुरू मत हो जाना जी औरतों के कपडे के बारे में… तुम्हे कुछ तो पता नहीं होता कि दुल्हन को कितनी बातों का ध्यान रखना पड़ता है. बड़े आये बातें करने वाले.”, कलावती ने प्रशांत को टोका और सभी हँस पड़े.

अब सभी निकलने को तैयार थे. चैतन्य ने अपनी कार घर के दरवाज़े पर ले आया. उसके पिताजी उसके साथ सामने बैठ गए. और कलावती, सुमति और रोहित एक साथ पीछे. सुमति बीच की सीट में बैठी थी. अब तो उसकी हाइट कम थी तो उसके पैर बीच की सीट में आराम से आ गए. औरत होने का एक फायदा और!, सुमति सोच कर मुस्कुरा दी. वैसे भी वो अपनी शादी की खरीददारी के बारे में सोच कर ही खुश थी.

“सुमति बेटा, तुम्हे पता तो है न कि तुम शादी के दिन क्या पहनना चाहोगी?”, कलावती ने सुमति से पूछा. “हाँ माँ! मैं जानती हूँ मुझे क्या चाहिए.”, सुमति ने मुस्कुरा कर जवाब दिया. किसी और क्रॉस-ड्रेसर की तरह, सुमति को भी पता था कि दुल्हन के रूप में वो किस तरह से सजना चाहेंगी. इंडियन लेडीज़ क्लब में तो उसने कितनो के यह सपने सच भी किये थे. ये कितना ख़ुशी भरा दिन होने वाला था सुमति के लिए ! दुल्हन बनेगी वो सोच कर के ही वो बड़ी ख़ुश हो रही थी. और कुछ देर के लिए वो ये भूल गयी कि जब वो दुल्हन बनेगी तो उसके साथ एक आदमी दूल्हा भी बनेगा.

क्रमश: …

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Suhasini

Everyone knows that the parents’ world revolves around their children, and they are willing to do anything for them. Witness this story of a father who embarks on an unpredictable journey to see his daughter smile.


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In English: Everyone knows that the parents’ world revolves around their children, and they are willing to do anything for them. Witness this story of a father who embarks on an unpredictable journey to see his daughter smile.

Lakshmi Seetha

Editor’s Note:  It gives us a great pleasure to present this story from the talented writer Lakshmi who had previously published her story Varsha and Ragini with us. We are sure that you will love this story as much as you liked her previous stories. All the rights for this story remain with the author.

Chapter 1: The Queen
Chapter 2: The Trip
Chapter 3: The Start
Chapter 4: The Trial
Chapter 5: The Surprise
Chapter 6: The Mother
Chapter 7: The Neighbour
Chapter 8: The Trust
Chapter 9: The Stress
Chapter 10: Coming Soon

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Varsha: The Drama Begins

The drama begins in the school where I was to play the role of a girl!


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Note: This story is contributed by our lovely reader, Lakshmi Seetha. We have not edited this story in any way. All rights for this story belong to the original author.

“Varshan…….WAKE UP”, my mom came running towards me with my tooth brush. “Wake up…wake up, it 7am. It’s getting late”, she repeated again and again like a rap singer. At last, I woke up and looked at my wall clock, it was showing 6:30 am. “Mom…. Seriously”, I stared at her with anger. She looked at the clock like an innocent kid. “Oh sorry, I thought it was 7am”, she gave an Oscar worthy performance stating how the clock was 7 when she saw and had magically turned 6:30. She placed the brush in my hand and left to prepare lunch. “You deserve an Oscar”, I shook my head with disapproval and started my way to the wash-sink. Continue reading “Varsha: The Drama Begins”

Varsha: A Loving Couple

The story of a loving couple with a crossdressing twist in it.


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Note: This story is contributed by our lovely reader, Lakshmi Seetha. We have not edited this story in any way. All rights for this story belong to the original author.

“Beep Beep…..Beep Beep” the alarm from my mobile was ringing as usual. Lying under piles of bed sheet, the alarm startled me for a second and I looked around frantically as if I had woken up from worst nightmare. Coming back to conscious, I laid back again breathing a sigh of relief.

Beside me, was my love Arun, who had a bizarre face expression, quickly covered the head under a pillow and started to mumble about the alarm.

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With much effort I slowly moved my hand out of the pile and started tapping the table in search of my phone. The tapings made my bangles clink which suddenly had a pounding on my heart upon hearing the sound. After multiple tapings, I grabbed my phone and looked at it, rubbing my eyes to check the time. My phone still beeping with alarm time showed “7:30 AM Sunday”, filling up my entire screen. It’s my usual alarm clock which I used for waking up during work days. Continue reading “Varsha: A Loving Couple”

Varsha

This is the story of Varsha and her husband Arun. We don’t need to say that there is a cross-dressing twist to it!


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In English: This is the story of Varsha and her husband Arun. We don’t need to say but there is a cross-dressing twist to it! In this story, you will come to know how a boy who was never into crossdressing, but begins to fall in love with it once he experiences the feminine pleasure. Read this beautiful journey that he travels with the support he receives from known and unknown people in his life.

Lakshmi Seetha

Editor’s Note:  Though this story starts with a familiar plot where a boy dresses up for a school drama, but that familiarity ends right there, and begins a beautiful journey with heart-felt conversations between the characters in this story. Don’t miss those conversations! All the rights for this story remain with the author, Lakshmi Seetha.

Chapter 1: A loving couple
Chapter 2: The drama begins
Chapter 3: Stage is set
Chapter 4: The Masterplan
Chapter 5: Sister’s surprise
Chapter 6: A new friend
Chapter 7: Secret trip
Chapter 8: Wedding
Chapter 9: Anniversary

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Entry into Girl’s gang

A story of how I, a crossdresser, became a part of a girl’s group!


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Note: This is a Silver category story contributed by our reader, Kainaat Khan. Indian Crossdressing Novel is publishing this story without any major edits or review. Our team does not make any claim on the story. All rights to this story remain with the original author.

I am Rohini, a closet crossdresser of 22 years. I stayed with my parents and how I became a crossdresser has lot to do with my aunty Meera who was sooo sexy and modern. Her fashion sense used to make me too jealous of her. She was really my role model, and I always wanted to be like her. So, I started to wear my mom’s cloths in my attempt to be like my aunt. I have been crossdressing for last 3 years. And today, when I heard that there is a saree sale at the mall, I could not resist myself from checking it out. I decided to stop at my aunty’s home on my way to the mall. I wanted to see her once, and notice a few things about her dressing style, so that I could be like her. Continue reading “Entry into Girl’s gang”