Bare your heart – 008

Expressing your desires and feeling through backless blouses and dresses


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I am a delicate flower that blossoms up in a wide beautiful lehanga.

मैं वो कली हूँ जो अपने लहंगे के घेरे के साथ खिलती हूँ.

Indian Crossdressing Novel

Note:  Image Credit: Pinterest. No copyright violation intended. The pictures here are intended only to give wings to the imagination for us special women who this society addresses as crossdressers. Pictures will be removed if any objection is raised here.

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December 2017 Edition

List of all the indian crossdressing related articles and stories we published in December 2017.


EDITORIAL

Dear readers,
The year is coming to an end. And it comes with a realization that continuing to write good stories gets more challenging each time. But with your support, we hope that we will continue this trend in the coming year.

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Editor

संपादकीय

प्रिय पाठक,
साल का अंत निकट आ रहा है. और इसके साथ हमें यह अहसास भी हो रहा है कि नयी अच्छी कहानियाँ लिखना और मुश्किल होता जाता है! पर आपके प्यार के साथ, हमें यकीन है कि आने वाले साल में भी हम अच्छी कहानियां लेकर आयेंगे.

तो पढ़ते रहिये और हमारे इस पेज पर आते रहिये ताकि आप हमारी नई कहानियाँ पढ़ सके!

संपादक

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Be like her – 013

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A little shyness adds to the beauty and the grace of a woman. Feeling a little shy in your saree when you are out is ok as long as it’s not out of compulsion.

शर्म तो स्त्री का गहना है. और घर से बाहर थोडा शर्माना तो आपकी खूबसूरती बढ़ता है.. बस इतनी सी शर्त है कि ये शर्म किसी तरह की मजबूरी न हो .

Indian Crossdressing Novel

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Be like her – 012

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Red and black Satin Saree in Floral print. What else there is to say? You can find this saree by clicking here.

सैटिन फ्लोरल प्रिंट में साड़ी. क्या आप पहनना पसंद करेंगी? आप इस साड़ी को यहाँ क्लिक करके देख सकती है.

Indian Crossdressing Novel

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इंडियन लेडीज़ क्लब: भाग १०

एक औरत और एक बहु बनकर अब तक दिन बीताने में सुमति को कोई भी कठिनाई न महसूस हुई. बल्कि वो तो बहुत खुश थी. पर बहु के साथ साथ वो पत्नी भी बनने वाली थी. क्या वो आगे भी खुश रहेगी?


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चैतन्य के माता-पिता और सुमति के भाई रोहित को ट्रेन से विदा कर, एक दुसरे का हाथ पकडे चैतन्य और सुमति पार्किंग लॉट में खाड़ी कार की ओर बढ़ चले थे. कार के पास पहुँचने पर सुमति बड़ी सावधानी से अपनी साड़ी को उठाकर पैसेंजर सीट पर बैठ गयी. एक औरत को भी न बहुत संभल कर चलना होता है और ख़ास तौर पर जब इतने प्यार से साड़ी पहनी हो तो उसकी प्लेट तीतर-बीतर हो जाए तो किसी को भी अच्छा न लगेगा. सुमति मन ही मन आज बड़ा गर्व महसूस कर रही थी कि आज वो दिन भर साड़ी और हील वाली सैंडल पहन कर बिना किसी परेशानी के बीता सकी थी. मानो या न मानो सैंडल पहन कर इतने घंटो रहना बड़ी बात होती है. अपने सास-ससुर के साथ आज अपनी दुल्हन के लिबास की शौपिंग करके वो बड़ी खुश थी, जो उसके चेहरे से साफ़ झलक रही थी. और सुमति को खुश देख, चैतन्य भी बड़ा खुश था.

“हम्म … अब बस हम दोनों अकेले रह गए है. अब क्या करना है?”, चैतन्य ने थोडा शरारती अंदाज़ में कहा. जैसे उसके शब्दों में एक हसरत छुपी हुई थी.

“करना क्या है? अब ये भी मैं बताऊँ तुम्हे? मुझे घर ले चलो और क्या.”, सुमति ने थोड़े रूखे स्वर में कहा. जैसे कुछ देर के अन्दर उसके अन्दर का पुरुष जाग उठा था. पर बात वो नहीं थी. चैतन्य के साथ खुद को अकेला पाकर थोड़ी सी सहम गयी थी वो. चैतन्य की हसरत भरी निगाहों को देख कर उसे एहसास हो चला था कि अब वो एक औरत के तन में है जिसे पुरुष कुछ ख़ास नजरो से भी देख सकते है. और फिर चैतन्य की तो होने वाली बीवी थी वो… तो वो ऐसे देखे तो अचरज नहीं होना चाहिए था सुमति को. पर सुमति को औरत बने अभी एक दिन तक न हुआ था. कैसे समझ पाती वो यह सब? बेचारी बस थोडा असहज होते हुए अपने साड़ी के पल्ले को खोल कर अपने बदन के चारो ओर लपेट कर बैठ गयी. अपने सीने को ढँक कर रखना उसे उचित लगा.

“अच्छा राजकुमारी जी. जैसे आप कहें!”, चैतन्य ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया. जैसे उसे सुमति के रूखेपन वाले व्यवहार का अनुभव था. सुमति के लिए ये बड़ी अजीब सी स्थिति थी. चैतन्य जो कल तक चैताली नाम की लड़की था, वो उसके साथ ऐसे बर्ताव कर रहा था जैसे वो हमेशा से ही सुमति का होने वाला पति था. सुमति सोचती रह गयी कि यदि उसे याद है कि वो कल तक एक आदमी थी तो चैतन्य को क्यों याद नहीं है कि वो लड़की था? शायद ये सब एक सपना था पर चलती हुई कार से जब खिड़की से बहती हुई हवा उसके आँचल से छन कर उसके ब्लाउज में उसके स्तनों पर पड़ कर एक सिहरन पैदा करती, सुमति इस वास्तविकता को सपने के नाम पर नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती थी.

फिर भी सुमति मन ही मन उत्साहित थी. दुल्हन बनने की ख़ुशी जो थी. किस क्रॉसड्रेसर को अच्छा नहीं लगेगा ये? “एक बहु बनना इतना कठिन भी नहीं था. मेरी सास कितनी प्यारी है और मेरा कितना ख्याल रख रही थी वो मेरा आज”, सुमति कलावती के साथ बिठाये पलो को याद कर मुस्कुराने लगी. और मुस्कुराती भी क्यों नहीं आखिर इतना बढ़िया दिन जो बीता था. पर फिर भी उसे एहसास न था कि एक बहु बनने का मतलब सास के साथ सिर्फ शौपिंग करना नहीं होता है. और भी बहुत कुछ करना होता है. खैर अपनी सास के साथ उसने किचन में भी समय बिताया था. वो भी तो अच्छा ही था. पर वो एक बात भूल रही थी. किसी की बहु बनने के लिए किसी आदमी की पत्नी भी बनना पड़ता है. और वो इस बात को नज़रंदाज़ कर रही थी कि वो एक पत्नी बनने वाली है.

कार के चलने पर बहती हुई हवा में लहराती सुमति की रेशमी जुल्फें मानो उसके चेहरे पर खिलखिला रही थी. और सुमति बार बार अपनी जुल्फों को पीछे करती. उसे ऐसा करते देखना बहुत ही सुखद था चैतन्य के लिए जो चुप-चाप इस सुन्दर औरत को देख रहा था, जो कुछ दिनों में उसकी पत्नी बनने वाली थी. पर पूरे रास्ते में चैतन्य और सुमति ने एक दुसरे से ज्यादा बातें नहीं की.

जल्दी ही सुमति का घर आ गया था. सुमति ने घर का दरवाज़ा खोला और दोनों अन्दर आ गए. सुमति सोच कर चल रही थी कि चैतन्य कुछ मिनट घर में रूककर पानी वगेरह पीकर अपने रास्ते निकल जाएगा. उसे चैतन्य की उपस्थिति से ज्यादा परेशानी न थी. वो मन ही मन चैतन्य में अपनी बचपन की दोस्त चैताली को देखने की कोशिश करती पर उसके जेहन में बन रही नयी यादें उसे हमेशा चैतन्य को एक लड़के के रूप में ही दिखा रही थी.

“ओफ्फ्फ मैं तो शौपिंग करके थक गयी हूँ चैतन्य. मैं जाकर कपडे बदलती हूँ … अब और ज्यादा देर ये हील पहन कर नहीं रह सकूंगी मैं. तुम यहाँ बैठ कर पानी या सोडा लेकर पी लेना.”, सुमति ऐसा कहकर अपने कमरे चली गयी और चैतन्य बाहर के कमरे में सोफे में बैठ गया.

अपने बेडरूम में पहुँचते ही सुमति ने अपनी हील वाली सैंडल निकाल फेकी. उसके अन्दर उर्जा का नया संचार हो गया था. उसके अन्दर एक नया उतावलापन था खुद को आईने में देखने का… अपने नए बदन को निहारने का. सुमति तो आदमी के तन में भी औरत के कपडे पहनकर बहुत खुबसूरत लगती थी और अब तो उसके पास एक औरत का तन था. दिखने में सुमति लगभग पहले की ही तरह थी पर अब वो ज्यादा पतली थी, उसकी कमर और फिगर बेहद लचीला हो गया था, और अब उसका कद पहले से थोडा कम था. और तो और अब उसके बड़े और मुलायम स्तन थे और साथ ही अब उसके पास स्त्री योनी भी थी. किसी हुस्न्परी से कम नहीं लग रही थी वो आईने में और खुद को देखकर सुमति ख़ुशी से न फूली समा पायी.

सुमति ने फिर धीरे से अपना नेकलेस उतारा जो उसके नाज़ुक से गले पर बेहद जंच रहा था. और फिर कानो में पहनी भारी सी ईअर-रिंग भी उतारनी थी. उसके लिए उसने अपने बालो को पहले एक ओर कर अपने सर को एक ओर झुकाकर अपनी दुबली सुन्दर उँगलियों से उन झुमको के पीछे का स्क्रू खोलने लगी. एक क्रोसड्रेसर के रूप में तो उसे क्लिप-ऑन ईअररिंग पहनना पड़ता था जो कुछ घंटो में कानो में दर्द करने लगते थे. पर एक औरत के रूप में कानो में झुमके पहनने का अनुभव ही अलग था. सिर्फ झुमके उतारने में उसे स्त्रीत्व की अनोखी अनुभूति हो रही थी. और फिर उसने अपनी दूसरी ईअररिंग भी बड़े प्यार से निकाल ली.

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सुमति ने बड़े ही नजाकत से अपने नेकलेस और झुमको को उतारा. और फिर अपनी साड़ी के पल्लू का पिन जो ब्लाउज में लगी थी उसे खोल कर खुद को आईने में देखने लगी. कितनी ही खुबसूरत लग रही थी सुमति!

अब सुमति ने अपनी ब्लाउज में लगी पिन को खोल कर अपने पल्लू को आज़ाद कर दिया क्योंकि उसे अब साड़ी जो उतारनी थी. उसे महसूस हुआ कि अब नाज़ुक दुबली उँगलियों से यह सब करना कितना आसान हो गया था उसके लिए. सचमुच की औरत होना तो सुमति को बेहद लुभा रहा था. अभी तो एक दिन भी नहीं हुआ था औरत के तन में उसे और उसे इतना सुख मिल चूका था जो एक क्रॉस ड्रेसर के रूप में इतने समय में कभी नहीं मिला. वो अपने पल्लू को पकडे खुद को आईने में देखने लगी. “बिना गहनों के भी मैं कितनी सेक्सी लग रही हूँ. मेरे स्तन भी कितने परफेक्ट है. काश अंजलि और मधुरिमा माँ यहाँ होती तो कितना मज़ा आता. पता नहीं उनके साथ क्या हो रहा होगा?”, सुमति अपनी ख़ुशी जल्द से जल्द अपनी क्रॉसड्रेसर सहेलियों के साथ साझा करना चाहती थी.

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सुमति अब सिर्फ पेटीकोट और ब्लाउज पहन कर आईने के सामने खड़ी थी.

सुमति अब धीरे धीरे अपनी साड़ी को उतारने लगी. उसकी साड़ी तो मानो जैसे उसके तन से लिपट कर थी
और उसे उतारना एक खुबसूरत से गिफ्ट को खोलने के समान था जिस पर कई लेयर के गिफ्ट पेपर लपेटे हुए हो. और सुमति का तन उस पैकिंग में छुपा हुआ गिफ्ट था जो परत दर परत खुल कर दिखने को उतावला था. आज तो सुबह से ही बेचारी सुमति इतनी व्यस्त रही कि वो अपने इस औरत के तन को निहार तक न सकी थी. अब उसके पास समय था जब वो खुद को अच्छी तरह से देख सके. साड़ी को उतारने के बाद उसने अपनी साड़ी को अपनी बगल में बिस्तर में रख दी और खुद को पहली बार देखने लगी.

सुमति अब सिर्फ पेटीकोट और ब्लाउज पहने आईने के सामने खड़ी थी. “यकीन नहीं होता कि ये मेरा फिगर है! मेरी बाँहें कितनी पतली है और मेरी कमर भी पहले से पतली और लचीली हो गयी है. मेरे कुल्हे तो कितने बढ़ गए है! इतना बड़ा तो कभी हिप पैड पहन कर भी नहीं कर पायी थी मैं! और मेरे स्तन! हाय! मेरे ब्लाउज में कितने अच्छे लग रहे है. न जाने मेरा ब्रा साइज़ क्या है? मुझे अपनी ब्रा में देखना पड़ेगा”, सुमति अपने तन को देखते हुए सोचने लगी. सब कुछ सपने सा था. “यदि ये सपना है तो मुझे कभी इस सपने से न जगाना”, उसने खुद से कहा. उसे पता नहीं था कि जाने अनजाने कितनी बड़ी गलती कर रही थी वो ऐसा सोचकर.

खुद की ब्रा के बारे में सोचते हुए उसके मन में अब अपने स्तनों को देखने की इच्छा जागृत हुई. होती भी क्यों न? हम सभी क्रॉस-ड्रेसर को तो नकली स्तनों के साथ भी पूर्ण स्त्री का एहसास हो जाता है, और फिर सुमति के पास तो अब असली स्तन थे. अब वो एक बार अपने स्तनों को दबाकर देखना चाहती थी कि क्या वाकई में उसमे वो सुख है जैसे हम सभी सोचते है. सुबह कपडे बदलते वक़्त उसके पास यह करने का समय नहीं था, पर अब तो उसके पास बहुत समय है. आज तो दिन में जब वो साड़ी की दूकान में लहंगा चोली ट्राई करने गयी थी, उसके दिन में तो उसी वक़्त अपनी ब्रा उतारने के बाद यह करने की इच्छा थी पर उसे पता नहीं था कि क्या पता क्या नतीजा होता ऐसा करने पर. इसलिए उसने अपनी इच्छाओं पर उस वक़्त काबू रखना ही मुनासिब समझा था. वैसे भी उस वक़्त लहंगा और साड़ी की खरीददारी में ही इतना मज़ा आ रहा था कि स्तनों की तरफ ध्यान देने की ज़रुरत भी नहीं तो थी सुमति को. यही सब सोचते हुए उसे अचानक कुछ ध्यान आया. ट्रायल रूम में जब वो लहंगा चोली उतारकर फिर से साड़ी पहनने गयी थी, तब वो वापस से ब्रा पहनना भूल गयी थी! उसकी ब्रा अब तक उसकी पर्स में रखी हुई थी. “ओह माय गॉड! मैं अपने सास-ससुर के सामने बिना ब्रा के ही घूम रही थी! मैं भी कितनी बेवकूफ हूँ.”, वो सोचने लगी. अच्छा हुआ था कि उसका साड़ी ब्लाउज काफी सही फिट वाला था जो उसके स्तन उसके ब्लाउज के अन्दर झूल नहीं रहे थे. वरना बाहर किसी और के सामने स्तनों का ऐसा झुलना उचित नहीं माना जाता है. सुमति भी अब एक औरत की तरह ही सोचने लगी थी.

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सुमति ने सामने झुककर आईने में अपने क्लीवेज को देखा. और फिर उसने धीरे से अपने ब्लाउज के हुक खोलने शुरू किये. उसके स्तन तो मानो उसके टाइट ब्लाउज से बाहर निकलने को बेताब दे.

सुमति ने फिर अपने ब्लाउज में अपने क्लीवेज को देखा. वो मन ही मन मुस्कुराने लगी अपने उन दिनों को याद करके जब से टेप का उपयोग करके दर्द के साथ क्लीवेज बनाना पड़ता था. उस टेप को वापस त्वचा से उखाड़ने में जो दर्द होता था सो अलग. और अब देखो, उसके पास इतना गहरा क्लीवेज है. वो झुककर पास से अपने क्लीवेज की गहराई को देखने लगी. और फिर अपनी उँगलियों से क्लीवेज के बीच अपनी ब्लाउज की नैक को थोडा निचे खींचते हुए और अच्छे से देखने की कोशिश करने लगी. “हाय दैया! कितने बड़े और मुलायम स्तन मालुम होते है मेरे.”, खुद ही के स्तनों को अपने हाथो से छूते हुए सुमति शर्मा भी रही थी, इतने बड़े स्तन थे कि उसकी हथेली में न समा सकते थे वो. और फिर ऐसे लग रहे थे जैसे उसके टाइट ब्लाउज से बस वो खुद ब खुद बाहर निकल आयेंगे. खुद को दिल और दिमाग दोनों से खुबसूरत और सेक्सी महसूस करते हुए, सुमति अपने ब्लाउज के हुक धीरे धीरे खोलने लगी. “मेरे निप्पल कौनसे रंग के होंगे, हलके भूरे, गहरे भूरे या गुलाबी?”, मन भी न कैसे कैसे सवाल जगाता है. बेचारी सुमति सुबह इतनी जल्दी में थी कि अपने निप्पल के रंग तक को ठीक तरह से नोटिस नहीं कर सकी थी. सुबह सुबह उसके जीवन में इतना बड़ा परिवर्तन जो आ गया था. पर अब उसके पास खुद के स्तनों को देखने का भरपूर समय था.

वो धीरे धीरे अपने नए तन का आनंद ले रही थी. उसे अब कोई जल्दी नहीं थी. और अब वो वक़्त आ गया था जब वो खुद को पूरी तरह से देख सकेगी. उसने अपने ब्लाउज को उतारा और उसकी आँखों के सामने सुन्दर सुडौल उसके स्तन थे. देखने से ही प्रतीत होता था कि कितने मुलायम होंगे वे. हाय! कितना सुन्दर आकार था उनका और साइज़ भी ऐसा कि दिल करे कि उन्हें तुरंत पकड़ कर कुछ करने लगे. इतने नशीले झूमते स्तनों को चूम कर तो कोई भी लकी बन जाता. पर सुमति के पास अब बस यही तो कमी थी… उसके स्तनों को कोई प्यार से छूने वाला या चूमने वाला न था. पर किसी और की क्या ज़रुरत है? क्या सुमति खुद अपने स्तनों के साथ नहीं प्यार से खेल सकती?

ब्लाउज के उतारते ही सुमति के नर्म, मुलायम, बड़े, सुन्दर और सुडौल स्तन अब उसकी आँखों के सामने थे.

खुद के इतने सुन्दर स्तनों को देखकर सुमति को बड़ा गर्व महसूस हुआ और वो सोचने लगी, “अब यही क्यों रुकना? अब मुझे पेटीकोट उतारकर अपनी पूरी फिगर देखनी चाहिए!”, सुमति ने सोचा और फिर अपने पेटीकोट का नाडा खोलने लगी. पर अब आईने से मुंह फेरकर ऐसा करने लगी. शायद खुद को पहली बार नग्न देख कर सुमति लजा रही थी. और फिर धीरे धीरे अपने पेटीकोट को निचे सरकाने लगी. सुमति हर चीज़ धीरे धीरे कर रही थी क्योंकि अपने तन और स्त्रीत्व का आनंद लेना है तो वो धीरे धीरे कर कर लेने में ही सबसे ज्यादा सुख देता है. यह तो वो आदमी के तन में जब थी, तबसे जानती थी. और फिर आज तो उसकी टाँगे और जंघा इतनी चिकनी थी जैसे रेशम. दिन में जब भी वो अपने पैरो को क्रॉस करके एक के ऊपर एक करके बैठती थी… उसे तुरंत एहसास होता था कि कितनी चिकनी टाँगे है उसकी. और इन्ही चिकनी स्मूथ टांगो पर उसका पेटीकोट भी इतने प्यार से धीरे धीरे खुद ब खुद फिसलने लगा. वो मन ही मन शर्माने लगी… पर खुद को निहारने में मशगुल सुमति कुछ भूल रही थी. उस घर में उसके अलावा भी एक और शख्स था. चैतन्य बाहर के कमरे में सब्र के साथ सुमति का इंतज़ार कर रहा था, पर सुमति आधे घंटे से अब तक बाहर नहीं आई थी.

और फिर सुमति का इंतज़ार करते हुए थक जाने के बाद चैतन्य सुमति के कमरे में दरवाज़ा खोल कर दाखिल हुआ. और चैतन्य से बिलकुल बेखबर हो सुमति उस वक़्त लगभग नग्न अवस्था में थी. उसका पेटीकोट अब उसके घुटनों तक नीचे आ चूका था और ऊपर ब्लाउज तो वो पहले ही उतार चुकी थी. और क्योंकि वो आईने के विपरीत दिशा में देख रही थी, उसके खुले स्तनों के साथ वो चैतन्य की आँखों के सामने थी. और फिर चैतन्य को कमरे में देख कर वो गुस्से से आग बबूला हो उठी. “चैतन्य… तुम्हे शर्म हया है या नहीं? तुम्हे सुबह भी कहा था मैंने कि किसी के कमरे में आने के पहले दरवाज़े पर दस्तक देनी चाहिए.” सुमति चीख उठी. किसी तरह अपने पेटीकोट को जल्द से जल्द ऊपर उठा कर वो नाडा बाँध रही थी. और तब तक चैतन्य को सुमति के सुन्दर स्तनों का खुबसूरत नज़ारा देखने मिल रहा था. “कितने बेशर्म हो तुम. कम से कम अपनी आँखें तो बंद कर लो.”, सुमति लगभग रो पड़ी थी … उसकी आवाज़ काँप रही थी पर उसका गुस्सा बहुत बढ़ चूका था. गुस्से में उसके हाथ भी काँप रहे थे. शायद उसकी आँखों में एक-दो बूँद आंसूओं के भी थे.

सुमति ने फिर झट से अपनी बिस्तर पर पड़ी अपनी बेतरतीब साड़ी को उठाकर किसी तरह अपने सीने के सामने रख कर अपने स्तनों को छुपाने लगी. “निकल जाओ इस कमरे से तुरंत अभी. अब जाओ भी!”, सुमति एक बार फिर गुस्से से चैतन्य पर बरस पड़ी. पर चैतन्य मुस्कुरा रहा था.

“कम ऑन सुमति. ऐसा तो है नहीं कि मैं पहली बार तुम्हे बिना कपड़ो के देख रहा हूँ”, चैतन्य ने मुस्कुराते हुए कहा. “तुमने… तुमने मुझे बगैर कपड़ो के कब देखा?”, सुमति को यकीन नहीं हुआ. पर इस नयी दुनिया में कुछ भी यकीन करने लायक नहीं था वैसे भी.

चैतन्य उसके करीब आया और उसकी दोनों कलाइयों को पकड़ कर उसके और पास आ गया. सुमति अब चैतन्य की साँसे अपने तन पर महसूस कर सकती थी. और चैतन्य की मजबूत पकड़ के साथ उसके हाथ से उसकी साड़ी छुट गयी. और चैतन्य उसके और करीब आ गया. सुमति के स्तन अब चैतन्य के शरीर को छू रहे थे. “तुम भूल गयी उन पलों को जब हमने कई बार एक दुसरे के साथ प्यार किया था?”, चैतन्य ने कहा और आगे बढ़कर सुमति की कमर पर हाथ रख कर उसे अपने और करीब खिंच लाया. “नहीं… ये सच नहीं है.”, सुमति ने चैतन्य की बात को झुठलाना चाहा पर उसकी आवाज़ अब बेहद धीमी थी. ये स्थिति ही कुछ असहज थी सुमति के लिए… वो तो सपने में भी एक पुरुष के साथ शारीरिक सम्बन्ध के बारे में नहीं सोच सकती थी.

“क्या हो गया है तुम्हे सुमति? तुम कैसे इस बात को झुठला सकती हो? तुम ही तो थी जिसने सेक्स के लिए पहला कदम आगे बढ़ाया था. याद है जब कॉलेज के पहले साल के बाद तुम जब छुट्टियों में घर आई थी और…”, कहते कहते चैतन्य के होंठ सुमति के होंठो के काफी करीब आ गए थे. और सुमति उसकी आँखों में देखते रह गयी. जिस तरह से चैतन्य कह रहा था वो झूठ तो नहीं लग रहा था.

फिर भी सुमति कैसे मान लेती इस बात को. “नहीं ये सच नहीं हो सकता”, सुमति ने कहा और अपनी आँखें बंद कर ली. एक बार फिर उसके सर में चुभने वाला एक तेज़ दर्द हुआ. एक बार फिर उसके दिमाग में नयी यादों का जन्म हो रहा था. उस दर्द के साथ उसे याद आ रहा था वो गर्मी का मौसम जब उसने चैतन्य के साथ सेक्स के लिए खुद पहला कदम बढाया था. उस वक़्त उसके घर में कोई नहीं था. उसे सब कुछ ऐसे याद आ रहा था जैसे सब कुछ सचमुच उसके साथ ऐसा हुआ था. पर कल तक तो वो आदमी थी… फिर भी ये नयी यादें तो इस नयी दुनिया का सच थी. उसे याद आ रहा था कि कैसे सेक्स के वक़्त वो चैतन्य पर हावी थी और चैतन्य बस सुमति का साथ दे रहा था. पर सुमति ने ऐसा क्यों किया था?

अब तक चैतन्य के होंठ सुमति के होंठो को चूमने लगे थे. सुमति के कोमल चेहरे चैतन्य की हलकी हलकी दाढ़ी के बाल उसे चुभ रहे थे. सुमति ने अपनी कलाई चैतन्य के हाथो से छुडानी चाही पर उसकी मजबूत गिरफ्त से वो आज़ाद न हो सकी. वो महसूस कर सकती थी कि चैतन्य के शरीर का निचला हिस्सा अब उसके तन से और करीब आ रहा है. कुछ होता देख कर सुमति ने अपनी पूरी जान लगाकर चैतन्य को एक बार धक्का देकर अपने से दूर किया.

पर चैतन्य इतने सब के बाद अब रुकने के मूड में न था. उसने सुमति को पलटकर उसकी दोनों कलाइयों को पकड़ लिया और फिर सुमति की पीठ पर चूमने लगा. फिर उसने सुमति की कमर को अपने हाथो से लपेट लिया और उसे फिर अपनी बांहों में खिंच लिया. मदहोशी में ही उसने सुमति से कहा, “तुम कैसे भूल सकती हो हमने न जाने कितनी बार प्यार किया था? मैं तो हमारी शादी तक रुकना चाहता था पर तुम ही तो थी जो मुझे बार बार अपने करीब खिंच लाती थी. और अब तुम्हे ऐसे देखकर मैं खुद को कैसे रोकूंगा सुमति?” चैतन्य अब जोरो से सुमति की गर्दन पर चूमने लगा.

“प्लीज़ रुक जाओ चैतन्य.”, सुमति ने उससे भीख मांगी. पर चैतन्य तो सुमति के शरीर पर हाथ फेरते हुए और बेताब हुए जा रहा था. और फिर उसके हाथ सुमति के स्तनों को पकड़ कर जोरो से मसलने लगे और वो खुद सुमति की गर्दन को चूमता रहा. और अपने निचले तन से सुमति के कुलहो पर जोर देने लगा. अबसे कुछ मिनट पहले की ही तो बात थी जब सुमति खुद अपने स्तनों को दबवाना चाहती थी पर ऐसे तो नहीं? चैतन्य का लिंग सुमति को अब अपने कुलहो में पीछे महसूस होने लगा था. वो बस किसी तरह चैतन्य की गिरफ्त से निकलना चाहती थी. अन्दर ही अन्दर रोती हुई सुमति के लिए यह सब इतना तेज़ी से हो रहा था कि वो सोच भी नहीं पा रही थी. उसे पता भी नहीं था कि जो हो रहा है उसके साथ उसे पसंद भी आ रहा है या नहीं… या उसकी नयी यादो में उसे कभी ये पसंद भी रहा होगा?

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जब सुमति अपना पेटीकोट उतार रही थी, तभी चैतन्य उसके कमरे में आ गया था.

सुमति को पता चल गया था कि चैतन्य अब अपनी बेल्ट खोल रहा था. वो जानती थी कि अब उसके साथ क्या होने वाला है. क्या वो उसे रोक पाएगी? वो सोचती ही रही कि चैतन्य अपनी पेंट निचे कर अपने लिंग को सुमति के कुलहो के बीच की दरार में जोर से दबाने लगा. उसने एक बार फिर सुमति के स्तनों को अपने हाथो से जोर से मसला. और फिर सुमति को निचे झुकाकर उसने सुमति के पेटीकोट को उतार दिया. आज चैतन्य सुमति पर हावी हो रहा था… अपनी वासना में एक पल के लिए भी उसने नहीं सोचा कि सुमति क्या चाहती है. उसने अपने जोश में सुमति की पेंटी निचे उतार दी और फिर उसने वही किया जो हर आदमी इसके आगे करता है. “आआआ..आ.हहह”, ये आवाज़ सुमति के उन्माद की न थी बल्कि दर्द में निकली एक कराह थी. चैतन्य का लिंग सुमति की योनी के लिए काफी बड़ा मालूम हो रहा था. औरतों को तो अपने अन्दर पुरुष लिंग को लेना अच्छा लगना चाहिए न? पर सुमति को तो ऐसा नहीं लग रहा था. वो दर्द में थी और अन्दर ही अन्दर रो रही थी और चैतन्य उसकी भावनाओं को समझे बगैर एक वहशी की तरह सुमति के स्तनों को दबा रहा था.

पर अचानक ही जैसे चैतन्य को होश आया. उसे समझ आ रहा था कि कुछ गलत हो रहा है. सुमति आज वैसी नहीं थी जैसे वो उसे जानता था. प्यार करते वक़्त सुमति कभी इस तरह से नहीं रहती थी. उसने झट से अपने लिंग को खिंच लिया. “आई ऍम सॉरी सुमति यदि मैंने तुम्हे दर्द दिया हो तो. मुझे तुम्हारे साथ ज़बरदस्ती नहीं करनी चाहिए थी. मैं कभी तुम्हारे साथ ज़बरदस्ती नहीं करूंगा. मुझे माफ़ कर दो सुमति. मैं दुबारा कभी ऐसा नहीं करूंगा.” न जाने चैतन्य को क्या हुआ और वो बदहवासी में सुमति से माफ़ी मांगने लगा. अभी जो हुआ ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था उन दोनों के बीच. वो अन्दर ही अन्दर परेशान हो उठा. आज न जाने कैसे सुमति को अपनी आँखों के सामने नग्न देख कर वो बेकाबू हो गया था. उसे अपने किये पर शर्म आने लगी और बस तुरंत सुमति के बेडरूम से बाहर जाने लगा.

और सुमति? सुमति तो बिस्तर पर अपना चेहरा गडाए अपने पेट के बल लेटी रह गयी. उसका पेटीकोट अब भी उसके घुटनों निचे था और उसकी पेंटी भी निचे सरकी हुई थी. और उसकी आँखों में आंसूओं की मोटी मोटी बूँदें थी. अब उसे सब कुछ याद आ गया था. उसकी नयी यादों में जिसमे वो हमेशा से औरत थी, वो कभी भी पुरुषो की तरफ आकर्षित नहीं थी… उसे कभी भी पुरुष के साथ सेक्स करने की इच्छा नहीं हुई थी. और वो पल जब उसने चैतन्य के साथ प्यार किया था, वो सिर्फ इसलिए था क्योंकि वो जानना चाहती थी कि क्या वाकई में वो पुरुष को पसंद नहीं करती है. अपने नए जीवन में भी सुमति पहले की तरह सिर्फ और सिर्फ औरतों की तरफ आकर्षित होती थी. शायद इसलिए वो चैतन्य पर हावी होकर सेक्स करती थी ताकि वो हर तरह से देख ले कि उसे कोई आदमी सुख दे सकेगा या नहीं. भले अपने नए सच को जानने के लिए उसने चैतन्य का इस्तेमाल किया था पर उन पलों में चैतन्य सुमति के साथ भावुक रूप से जुड़ गया था.

एक औरत के रूप में नयी ज़िन्दगी इतनी सुन्दर भी नहीं होगी जितना सुमति ने सोची थी. आज दुनिया में हर कोई सुमति को सिर्फ और सिर्फ एक औरत के रूप में ही जानता है. पर सिर्फ सुमति ये सच जानती है कि वो एक पुरुष के रूप में जन्मी थी और कल तक एक आदमी थी. वो असली जीवन में एक क्रोस-ड्रेसर थी. पर अब इस नयी दुनिया में तो उस आदमी के अस्तित्व के बारे में भी किसी को नहीं पता. न जाने ये कैसी माया कैसा जादू था… सुमति अब तक नहीं समझ सकी थी इस बात को. पर एक बात वो समझ गयी थी. भले ही तन से वो आज एक पूरी औरत थी पर दिल-दिमाग से वो आज भी कल तक वाली आदमी थी जो एक क्रॉसड्रेसर था. उसका दिमाग भले स्त्रियों की हर चीज़ की तरफ आकर्षित था, वो सब कुछ औरतों की तरह करना चाहती थी पर शारीरिक रूप से भी वो सिर्फ औरतों के तरफ आकर्षित थी…. पुरुष की तरफ नहीं. अब इस नयी दुनिया में वो एक अच्छी बहु तो बन सकती थी पर कभी एक अच्छी पत्नी नहीं बन सकती थी. वो जानती थी कि भले वो घर एक कुशल गृहिणी की तरह संभाल सकती थी पर वो कभी अपने पति को तन का सुख नहीं दे सकती थी. ये औरत का शरीर जो एक घंटे पहले तक एक वरदान लग रहा था … अब सुमति को वही तन एक श्राप लग रहा था. इस नए सच को जानकर सुमति की आँखों से अश्रुधरा बह निकली. क्या एक क्रॉसड्रेसर के रूप में उसकी ज़िन्दगी इस औरत की ज़िन्दगी से बेहतर थी? ये सवाल रोती हुई सुमति के मन में घूम रहा था.

क्रमश: …

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< भाग ९ भाग ११ >

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इंडियन लेडीज़ क्लब: भाग ९

हर क्रोसड्रेसर का एक सपना होता है कि वो एक दिन दूल्हन की तरह सजे. जितना मज़ेदार दुल्हन बनना होता है, उतना ही मज़ा दुल्हन की शौपिंग करने में आता है. और सुमति वो सुख पाने वाली थी. आज वो उन दुकानों में जायेगी जहाँ रंग बिरंगी साड़ियाँ उसे दिखाई जाएँगी.


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किसी दिन दुल्हन बनने का हर क्रॉस-ड्रेसर का सपना होता है. और उसके लिए साड़ी खरीदने जाना तो होने वाली दुल्हन के लिए सबसे यादगार पलो में एक होता है!

हर क्रॉस-ड्रेसर का एक सपना होता है कि किसी दिन वो भी सोलह श्रृंगार करके दुल्हन बनेगी. जहाँ दुल्हन बनना अपने आप में एक अप्रतिम सपना है, उतना ही यादगार होता है एक दुल्हन के कपड़ो के लिए शौपिंग करना. वो ख़ुशी जो उन दुकानों में मिलती है जहाँ रंग-बिरंगी चमचमाती महँगी साड़ियाँ और लहंगे सजे होते है, जहाँ औरतें अपने जीवन के सबसे यादगार दिन के लिए कपडे खरीद रही होती है, वो ख़ुशी भी अलग ही होती है. वहां होने वाली दुल्हन को सबसे महँगी साड़ियों को छूने मिलता है जो वो अपने जीवन में फिर कभी नहीं पहनती. उन साड़ियों को छूकर पकड़ कर, और फिर दूसरी औरतों से बातें करते हुए उनकी शादी के दिन के किस्से सुनती हुई होने वाली दुल्हन सबके ध्यान का केंद्र होती है. आखिर कैसे भूल सकती है कोई वो अनुभव? शादी के दिन के लिए होने वाली दुल्हन सबसे भारी, सबसे सुन्दर, सबसे चमकीली, और सबसे महँगी साड़ी और लहंगा ट्राई करके देखती है उन दुकानों में. और आसपास की सभी औरतें होने वाली दुल्हन को सब करते निहारती है.. उसकी सुन्दरता को देख आन्हें भरती है. हर बार जब दुल्हन नया लिबास पहनती है तो सभी औरतों की आँखें चमक उठती है. फिर कोई तारीफ़ करती है या कोई नुख्स निकालती है पर दुल्हन सबकी बातें सुनकर बड़ी सी मुस्कान के साथ शर्माती भी है. उसका चेहरा ख़ुशी से दमक रहा होता है, और सभी औरतें उस दुल्हन की तरह अपने दिनों को भी याद करती है. दुर्भाग्य से ऐसा मौका सभी क्रॉसड्रेसर को नहीं मिलता. पर सुमति, वो ये सब कुछ अनुभव करने वाली थी जो उसके जान पहचान की किसी भी क्रॉसड्रेसर को अनुभव करने नहीं मिला था.

ऐसा नहीं था कि सुमति कभी साड़ी की दूकान नहीं गयी थी. पर हर बार वो वहां उस आदमी के रूप में गयी थी जो अपनी पत्नी, गर्लफ्रेंड या माँ के लिए साड़ी लेने का बहाना बनाता था. कई बार मुश्किल होता था सेल्स गर्ल को समझाना कि क्यों वो साड़ी चुनने में इतने नखरे दिखा रही है… कि आखिर उसे कौनसी और कैसी साड़ी चाहिए उसके बारे में उसे इतने अच्छे से पता है. सेल्स गर्ल जहाँ सोचती थी कि इस आदमी को साड़ी बेचना आसान होगा, वहीँ सुमति आदमी के रूप में भी किसी औरत से कम समय नहीं लेती थी. घंटो साड़ियाँ देखने के बाद ही एक साड़ी चुनती थी वो भी. पर आज उसे कोई बहाना करने की ज़रुरत नहीं है. क्योंकि आज वो ख़ुशी से कह सकती थी कि वो अपने लिए साड़ी खरीदने आई है. सोच कर ही वो इतना खुश थी कि वो तो भूल ही गयी थी कि वो दुल्हन एक मर्द के लिए बनेगी.

सुमति अब मार्किट की उस गली में थी जो शादी-ब्याह की साड़ियों की दूकान के लिए प्रसिद्ध थी. वो अपने सास-ससुर कलावती और प्रशांत के साथ चल रही थी. रोहित और चैतन्य उनके पीछे पीछे थे. वो इस गली में पहले भी आ चुकी थी. और हर बार वो दुकानों में सजे खुबसूरत लहंगे और साड़ियों को देख कर मोहित हो जाती थी. उसी की तरह उस वक़्त उस गली में न जाने कितनी होने वाली दुल्हने इकठ्ठा थी जो अपने परिवार के साथ खरीददारी करने आई थी. हवा में ही वो ख़ुशी साफ़ महसूस की जा सकती थी. सबके चेहरे पर वही ख़ुशी थी जो इस वक़्त सुमति और कलावती के चेहरे पर थी.

एक सेल्समेन खुद पर साड़ी चढ़ा कर औरतों को दिखा रहा था. एक आदमी के रूप में सुमति भी कई बार सोचा करती थी कि ये सेल्समेन कितना भाग्यशाली है!

चलते चलते सुमति ने वहां एक छोटी सी दूकान में झाँक कर देखि तो वहां एक सेल्समेन कुछ औरतो को साड़ियाँ दिखा रहा था. वो साड़ी में प्लेट बनाकर अपनी कमर पर लगाकर उन औरतों को दिखा रहा था कि पहनने पर वो साड़ी कैसी दिखेगी. और औरतें ख़ुशी से उस साड़ी को छूकर देख रही थी कि आखिर वो साड़ी उनकी पसंद की है या नहीं. सुमति यह सब देखकर मुस्कुराने लगी. उसे याद आ रहा था कि कैसे कई बार वो सोचा करती थी कि काश वो भी इस तरह की सेल्समेन होती तो वह भी दिन भर उन खुबसूरत साड़ियों के बीच रहती. और फिर ख़ुशी से उन साड़ियों को अपने तन पर लपेट कर दिखाती.

बढ़ते बढ़ते वो सभी कई दुकानों के सामने से गुज़रे और वो सोच रही थी कि आखिर कहाँ से शुरुआत की जाए.
इतनी सारी दुकानें जो थी और सभी के पास एक से एक दुल्हन के लिए कपडे थे. यदि मैं हर दूकान में जाकर वहां की साड़ियों को देख कर अपनी चॉइस तय करने जाऊ तो मुझे तो कई दिन लग जायेंगे! मुझे तो लगता था कि मुझे पता है मुझे कौनसी साड़ी पसंद आएगी पर इतनी सारी सुन्दर साड़ियों को देख कर तो मेरा सभी को ट्राई करने का मन कर रहा है. मुझे साड़ी लेना चाहिए या लहंगा? मैं तो यह भी तय नहीं कर पा रही हूँ. क्या मुझे दोनों ट्राई करना चाहिए कुछ तय करने के पहले? नहीं नहीं… वैसे तो और भी समय लग जाएगा. मुझे तो साड़ी पर ही ध्यान लगाना चाहिए. ऐसे ही विचार सुमति के मन में चल रहे थे.

“सुनो जी, मैं तुमसे कहे देती हूँ कि आज मैं खर्चे में कोई समझौता नहीं करूंगी. आखिर एक ही बहु है मेरी और उसे जो पसंद होगा वो वोही खरीदेगी. चाहे कितनी भी कीमत हो. समझ रहे हो न?”, कलावती, सुमति की सास, ने अपने पति प्रशांत से कहा.

“अरे कलावती जी. तुम्हारी तरह मेरी भी एक ही बहु है. मैंने तुमसे कब कहा कि मैं इस ख़ास अवसर पर कंजूसी करूंगा? तुम भी न हद ही कर देती हो अपनी बातों से”, प्रशांत ने कहा. उन दोनों की बातें सुनकर रोहित और चैतन्य मुस्कुराने लगे.

“ठीक है जी. पर ये तो बताओ कि हम वहां जा रहे है या नहीं?”, कलावती ने पूछा. “हाँ मेरी पत्नी. हम उसी दूकान में जा रहे है जो तुम्हे सबसे ज्यादा पसंद है.”, प्रशांत ने जवाब दिया.

उस गली में एक से बढ़कर एक दुकानें थी होने वाली दुल्हनो के लिए पर एक दूकान थी जो सबसे अलग थी. और जब सुमति उस दूकान के सामने पहुची तो वहां सजी हुई डिज़ाइनर साड़ियों को निहारने से वो खुद को रोक न सकी. वो सोचने लगी कि काश कलावती ने यही दूकान पसंद की हो. उसकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा जब प्रशांत ने कहा, “तो अब चले अन्दर? या यूँ ही बाहर से ही दूकान को देखती रहोगी?” सुमति की आँखों में ख़ुशी के आंसू आ रहे थे और वो मानो प्रशांत से कहना चाहती थी, “धन्यवाद् पिताजी”. पर जो शब्द ज़बान पर न आ सके वो उसकी आँखों ने कह दिया था.

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उस गली की अनगिनत दुकानों में एक दूकान थी जो सबसे अलग और सबसे अद्भुत थी. सुमति को तो यकीन ही नहीं हुआ कि उसके सास-ससुर उसे यहाँ खरीददारी के लिए ले जा रहे थे.

एक बार दूकान के अन्दर जाने के बाद, उन सबको वहां एक महिला ने अपने साथ अन्दर ले गयी जहाँ निचे कुछ गद्दे बिछे हुए थे और कई सारे कपडे दिखाने वाले लोग बैठे हुए थे. सुमति कलावती के साथ अपने पैर पीछे की ओर मोड़ कर बैठ गयी, उसकी कमर बिलकुल सीधी थी और उसके हाथ उसकी जांघो पर थे. उसे हमेशा से पता था कि एक औरत की तरह कैसे बैठा जाता है, और फिर इस नए शरीर में तो यह और भी आसान लग रहा था. आदमी और औरत के तन में कुछ तो फर्क होता है. लचीली कमर और बड़े कुल्हो के साथ एक औरत के लिए निचे बैठना ज्यादा आसान होता है. अब जब शौपिंग का काम शुरू हो गया था, सुमति थोडा शर्माने लगी थी. कलावती बस एक मात्र औरत थी जो उसके साथ थी ताकि सुमति को ३ आदमियों के बीचे अकेलापन न महसूस हो. वैसे भी साड़ी खरीदने में बहुत समय लगता है और आदमी ऐसे में काफी अधीर हो जाते है. पर जब कलावती साथ थी तो अब सुमति चैन से साड़ी देखने में समय लगा सकती थी. आखिर उसकी शादी की साड़ी जो खरीदनी थी… उसमे तो समय लगाना ही था.

“कुछ दुल्हन की साड़ियाँ दिखाइये प्लीज़. रंग नारंगी से मैरून के बीच होना चाहिए, लाल हो तो बेहतर होगा.”, कलावती ने दुकानदार से कहा. “ज़रूर मैडम. साड़ी दिखाऊँ उसके पहले कुछ ठंडा ले लीजिये. मैं आपको हमारे यहाँ की सबसे बेहतरीन साड़ियाँ दिखाऊँगा. वैसे आपने कुछ कीमत सोच रखी है?”, दुकानदार ने पूछा.

“आप कीमत की मत सोचिये, बस बेहिसाब महँगी साड़ियाँ भी मत दिखियेगा”, कलावती ने गर्व के साथ कहा.

“जी मैडम”, दुकानदार बोला और अन्दर जाकर कुछ साड़ियाँ लेकर वापस आया और फिर शुरू हुआ साड़ी दिखाना. “मैडम ये कांचीपुरम सिल्क साड़ी है. ये दक्षिण भारत में काफी प्रसिद्ध है शादियों के लिए.” सुमति की आँखों के सामने मैजंटा रंग की रिच सिल्क साड़ी थी जिस पर फुल और मंदिर के डिजाईन थे जो सुनहरे धागों से बुने गए थे. और उसके साथ एक भारी सा ब्लाउज पीस भी था जिसमे बड़ी सुन्दर एम्ब्रायडरी की गयी थी. कोई भी औरत उस साड़ी को पहन कर किसी महारानी से कम न समझती खुदको. दक्षिण भारतीय साड़ी होती ही क्लासिक है. छूते ही एक लक्ज़री का एहसास होता है. उस साड़ी के सामने तो सुमति की अभी की पहनी हुई साड़ी बहुत फीकी मालूम पड़ रही थी.

“मैडम, ये दूसरा सैंपल गोटा पट्टी वाली साड़ी है जो जोर्जेट के कपडे पर बनी है. ये हमारे एरिया में बहुत पोपुलर है शादियों के लिए.”, दुकानदार ने दूसरी साड़ी दिखाई. दो रंग वाली… एक नारंगी और एक चमकीला गुलाबी. ज़री, सेक्विन, पत्थर और एम्ब्रायडरी से सजी हुई भारी साड़ी… भले वो सिल्क न हो पर वो भी एक राजसी साड़ी थी. “क्या मैं इसे छूकर देख सकती हूँ?”, सुमति ने थोडा संकोच करते हुए पूछा. “ज़रूर मैडम. आप छूकर नहीं देखेंगी तो पसंद कैसे करेंगी?”, दुकानदार बोला.

“वाह… ये तो बहुत भारी है.”, सुमति के नाज़ुक हाथ जैसे उस साड़ी के वजन को संभाल न सके. “हम्म.. कल तक तो ऐसी भारी साड़ी मैं बखूबी संभाल सकती थी”, सुमति सोच रही थी. अब उसे समझ आ रहा था कि औरतें क्यों कई बार साड़ी के भारी होने की शिकायत करती है.

“हाँ बेटा. ये गोटा पट्टी वाली साड़ियाँ ऐसे ही भारी होती है. पर किसी महल की महारानी से कम नहीं लगोगी यदि तुम इसे पहनो तो.”, कलावती ने कहा.

सुमति को ये सब तो पहले से ही पता था. आखिर इन्टरनेट पर दुल्हन की साड़ी ढूंढ कर देखना उसका फेवरेट शौक था. जब समय मिलता वो देखती रहती कि क्या फैशन में चल रहा है. वो साड़ी सच मच अद्भुत थी, पर उसे दो टोन के रंग वाली साड़ियाँ ज्यादा पसंद नहीं थी. उसे तो एक रंग की ही साड़ी चाहिए थी.

फिर दुकानदार ने अगला सैंपल दिखाया और बोला, “मैडम ये ज़र्दोसी स्टाइल है. ये …”

“नहीं नहीं… मुझे ज़रदोज़ी साड़ी नहीं चाहिए. क्या आप गोटा पत्ती वाली ही साड़ियाँ दिखा सकते है जो ऐसे दो टोन वाली न हो?”, सुमति बोली.

“सुमति को तो पहले ही पता है उसे क्या चाहिए.”, चैतन्य हस दिया.

“ऑफ़ कोर्स, मेरे होने वाले पतिदेव”, सुमति भी चैतन्य के साथ हँस दी.. आखिर चैतन्य उसका बचपन का दोस्त था. “अच्छा तुमको पता है तुम्हे क्या चाहिए तो ये तो अच्छी बात है. शौपिंग जल्दी निपट जायेगी.”, चैतन्य ने कहा.

पर भला शादी की खरीददारी इतने जल्दी पूरी होती है भला. सुमति और कलावती करीब करीब ३.५ घंटे तक साड़ियाँ देखती रही. दोनों औरतों ने कई साड़ियाँ ट्राई भी की और फिर उसके बारे में विस्तार से बात भी की. कुछ नहीं तो ५०-६० साड़ियाँ तो उन्होंने देख ही ली होंगी. पर हर साड़ी में कोई एक कमी रह जाती थी जो किसी और साड़ी में पूरी हो जाती. पर फिर दूसरी साड़ी में कुछ और कमी रहती. ऐसा नहीं था कि वो साड़ियाँ खुबसूरत नहीं थी… सभी अच्छी थी पर शादी की बात है! और शादी की साड़ी परफेक्ट होनी चाहिए आखिर इतने पैसे जो खर्च करती है औरतें उस पर. तो उस साड़ी में कोई भी कमी उन्हें बर्दाश्त नहीं होती. बेचारे आदमी वहां बैठे बैठे अब बस उंह रहे थे. इस इंतज़ार में कि कब एक साड़ी फाइनल हो और वो दूकान से बाहर निकले.

आखिर वो पल आ ही गया जब सुमति ने कहा, “मैं कैसी लग रही हूँ इस साड़ी में?” सुमति ने सभी से पूछा और उसकी आँखों में एक आशा की किरण थी. उसने हॉट पिंक रंग की एक साड़ी पहनी थी. औरतों की आँखें भी न रंगों में भेद करना बखूबी जानती है. जैसे फूचसिया पिंक, हॉट पिंक, बेबी पिंक, नीऑन पिंक, और न जाने कितने ही गुलाबी के शेड. जबकि आदमी के लिए ये सभी रंग सिर्फ गुलाबी होते है. “माइंड ब्लोविंग लग रही हो सुमति दीदी. ज़बरदस्त है ये साड़ी”, रोहित ने कहा. उसकी बहन सचमुच खिल रही थी उस साड़ी में.

“अब तो पक्का है मेरी सुन्दर बहु यही साड़ी पहनेगी अपनी शादी में!”, कलावती बोली. “इससे बेहतर तो और कोई नहीं हो सकती बेटी.”, प्रशांत ने भी अपनी मुहर लगा दी.

“मैं तो अब बस इंतज़ार करूंगा उस दिन का जब तुम इसे पहनकर सजोगी!”, चैतन्य ने कहा.

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एक औरत को उसकी शादी के दिन कई बार कपडे बदलने होते है. उस दिन न सिर्फ एक साड़ी बल्कि एक लहंगा भी चाहिए होता है.

सुमति सबके मुंह से तारीफ़ सुनकर फिर शर्माने लगी. पर आखिर में साड़ी तय हो ही गयी.

“अब जब साड़ी चुन ली है तो अब लहंगा चोली देखा जाए?”, कलावती ने कहा.

“क्या? अब भी और खरीददारी बाकी है?”, चैतन्य ने चौंक कर कहा. “हाँ बेटा! शादी के पूरे दिन वो सिर्फ एक साड़ी पहन कर थोड़ी रहेगी. हर कार्यक्रम में एक अलग चीज़ पहननी होती है. आज तो हम लोग सिर्फ एक लहंगा चोली और खरीदेंगे, रिसेप्शन के अवसर के लिए. बाकी अवसर के कपडे सुमति खुद खरीद लेना तुम बाद में.”, कलावती ने लगभग चैतन्य को डांट ही दी थी उसकी अधीरता के लिए.

“ज़रा धीरज रखो चैतन्य जी. माँ, मुझे पता है मुझे कौनसा लहंगा चाहिए. साड़ियाँ देखते वक़्त मेरी नज़र वहां टंगे लहंगो पर थी, और उसमे से एक ही है जो मुझे पसंद आया है. मैं उसे लेकर पहनकर बस अभी आई.”, सुमति ने कहा.

और थोड़ी ही देर में सुमति चेंजिंग रूम से एक लाल रंग की लहंगा चोली पहन कर वापस आई. स्लीवलेस चोली और उस लहंगे में उसकी हलकी गोरी त्वचा दमक रही थी. इतनी सुन्दर लग रही थी वो कि देखते देखते आन्हें निकलने लग जाए.

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सुमति ने अपनी सैंडल पहन कर लहंगे की लम्बाई चेक की..

“नज़र न लगे मेरी बहु को.”, कलावती ने सुमति के आते ही उसे गले से लगा ली. “सुमति बेटा, ज़रा अपनी हील वाली सैंडल भी पहनकर देख लो कि लहंगे की लम्बाई सही है या नहीं”, कलावती ने फिर कहा. और सुमति ने वही किया. “हम्म.. बस अब चोली तुम्हारे साइज़ से सिलवानी पड़ेगी. वैसे सच कहूं बेटा तो अब तो पूरे शहर की औरतों के बीच मैं अब सबको ख़ुशी से बता सकूंगी कि सबसे सुन्दर बहु मेरी है”, और कलावती की बात सुनकर सब हँस पड़े.

और सबको हँसते हुए देख सुमति सोच रही थी, “यकीन नहीं होता कि मैं दुल्हन बनने वाली हूँ!” पर इस ख़ुशी में वो एहसास नहीं कर पा रही थी कि एक औरत के रूप में शादी करने के क्या मायने होते है. और उसे आगे क्या क्या नया देखना होगा इस नए जीवन में. उसके पास यह सब सोचने का समय ही कहाँ था. और वैसे भी अभी तो बस अपनी शादी के दिन सज-संवर कर दुल्हन बनने के बारे में ही सोच सोच कर खुश हो रही थी वो. एक तरह से वो भगवन को भी धन्यवाद दे रही थी कि उसे इतने अच्छे सास-ससुर मिले. ऐसी सास जो सुमति को बेटी की तरह चाहती थी. पर एक बात जो सुमति इस वक़्त नहीं सोच रही थी, या फिर वो जिस बारे में सोचना नहीं चाह रही थी, वो यह थी कि वो एक आदमी से शादी करने जा रही थी. एक आदमी से! क्या वो पत्नी बनने को तैयार थी? क्या वो अपना तन-मन सब कुछ एक आदमी को समर्पित कर देगी? क्या वो अब तक सिर्फ महिलाओं के प्रति आकर्षित नहीं हुआ करती थी? तो फिर कैसे एक आदमी से शादी करेगी वो? इन सब सवालों के बारे में सोचने के लिए उसे एकांत चाहिए था जो अब तक उसे मिला नहीं था.

खरीददारी के बाद प्रशांत और कलावती ने सुमति को बताया कि वो लगभग २ घंटे में आज ही अपने छोटे से शहर वापस जा रहे है. रोहित, जो उसी शहर में रहता था, वो भी उन्ही के साथ वापस जाने को तैयार हो गया था. समय कम था और सभी को भूख लग रही थी तो सबने तुरंत खाना खाने के लिए एक पास ही के भोजनालय को चुना. उस दिन सभी बेहद खुश थे. सुमति भी. और चैतन्य भी इस बात से खुश था कि सुमति बेहद खुश है. वो तो खुद को दुनिया का सबसे भाग्यवान आदमी समझता था जो उसे सुमति जैसी पत्नी मिल रही थी. वैसे किसी भी लड़के को ख़ुशी मिलती है जब उसकी होने वाली पत्नी उसके माता पिता के साथ इस तरह से घुल-मिल जाए जैसे सुमति मिल गयी थी. सुमति ज़रूर अच्छी बहु बनेगी. पर क्या वो अच्छी पत्नी बन सकेगी? ये तो समय ही बताएगा.

खाना खाने के बाद, सुमति और चैतन्य सभी के साथ रेलवे स्टेशन आ गए थे जहाँ से रोहित, प्रशांत और कलावती ट्रेन लेकर जाने वाले थे. सुमति ने अपने भाई को गले लगाकर विदा दी. सुबह के मुकाबले अब उसके और रोहित के बीच उसे कुछ भी अजीब न लगा. उसे ख़ुशी थी कि आज रोहित उसके साथ था वरना नए परिवार के बीच वो अकेले रह जाती. सुबह से अब तक कुछ घंटे ही बीते थे पर इतनी देर में ही सुमति अब कुछ अलग तरह से सोचने लगी थी. वो बहुत भावुक हो रही थी आज. और भाई को विदा करते हुए उसकी आँखों में आंसू थे. “जल्दी आना रोहित”, उसने रोहित से कहा. और फिर उसके गालों को खींचते हुए बोली, “घर में माँ-पिताजी की मदद करना और माँ से कहना कि मैं जल्दी ही आऊंगी शादी की तैयारियों में हाथ बंटाने” सुमति शायद एक अच्छी बेटी भी थी.

रोहित से अलग होकर अब सुमति ने अपने सर पर पल्लू किया और फिर चैतन्य के साथ ही झुककर अपने सास-ससुर के पैर छुए. “जीती रहो. भगवान तुम दोनों के बीच का प्यार और भी बढाए.”, प्रशांत ने सुमति को आशीर्वाद देते हुए कहा. और कलावती ने तो एक बार फिर प्यार से अपनी बहु को गले लगा ली.

जल्दी ही प्रशांत, कलावती और रोहित ट्रेन में चढ़ गए और ट्रेन रेलवे प्लेटफार्म छोड़ कर जा चुकी थी. अब बस रह गए थे सुमति और चैतन्य. दोनों ने एक दुसरे की आँखों में देखा और मुस्कुरा दिया. चैतन्य ने सुमति के सर से पल्लू को निचे उतारा और अपने हाथो में पकड़ लिया. सुमति ने उससे कुछ कहा नहीं और बस मुस्कुरा दी. चैतन्य के साथ उसे बहुत सहज लग रहा था. चैतन्य वोही तो था जिसे वो न जानते हुए भी जानती थी… उसके बचपन का बेस्ट फ्रेंड… वो दोनों साथ में एक दुसरे का हाथ थामे बाहर पार्किंग लॉट में चैतन्य की कार की ओर बढ़ चले.

क्रमश: …

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< भाग ८ भाग १० >

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इंडियन लेडीज़ क्लब: भाग ५

दोस्ती, यारी, सहेलियों का प्यार और औरतों की आपस में जलन, हर तरह के जज्बातों से भरी वो लेडीज़ क्लब की रात जल्दी ही इस दिशा में बढ़ने वाली थी जिसका वहां किसी को अंदेशा तक नहीं था.


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“लहंगे में कितनी सुन्दर लग रही है वो. हैं न?”, ईशा के इस सवाल से सुमति का ध्यान टुटा. न जाने कहाँ खोयी हुई थी वो. अब तक तो वो चुपचाप अन्वेषा को अपने नए रूप में बलखाते देख रही थी. अन्वेषा एक दुल्हन की तरह शालीनता से चल रही थी, धीरे से अपने लहंगे को ज़रा ऊपर उठा कर, थोड़ी घबरायी हुई कि कहीं खुद अपने लहंगे पर ही कदम न रख दे. पर इतने बड़े घेर वाले उस महंगे सुन्दर लहंगे में तो वो अपने पैर तक नहीं देख पा रही थी. आज के पहले तो वो कभी हील वाली सैंडल तक नहीं पहनी थी, इसलिए अंजलि उसका एक हाथ थाम कर साथ दे रही थी ताकि गलती से वो गिर न जाए. “उसका मेकअप भी अच्छा हुआ है. क्या कहती हो सुमति?”, ईशा ने फिर पूछा. “हाँ. वो तो होना ही था. आखिर तुम जो थी मेकअप के लिए!”, सुमति ने एक छोटी सी मुस्कान के साथ ईशा की ओर देखा.

“चल झूठी कहीं की. दिल से तारीफ़ करो तो मानू मैं”, ईशा ने कहा. “मैं देख रही हूँ कि कोई तो बात है जो तुझे परेशान कर रही है. क्या ये उसी खबर को लेकर है? सब ठीक होगा… तू यूँ ही चिंता कर रही है.”, ईशा की बात सुन सुमति थोड़ी आश्चर्य में थी कि उसे कैसे पता चला उस खबर के बारे में. उसने निचे थोड़ी उदासी के साथ देखा. नर्वस होकर वो अपने साड़ी के आँचल को अपनी उँगलियों में गोल गोल लपेट रही थी. पर ईशा ने सुमति का चेहरा उठाया और उससे कहा, “पगली. यह तो ख़ुशी की खबर है फिर चिंता कैसे?” सुमति थोड़ी भावुक हो गयी थी. उसने ईशा को गले लगा लिया और ईशा के कंधे पर सर रख कर बोली, “सब ठीक होगा न?” तो ईशा ने अपने हाथो से सुमति के बालों पर फेरते हुआ कहा, “हाँ. ज़रूर.”

अन्वेषा, अपने नए रूप में बेहद खुश थी और ख़ुशी के मारे वो नाच रही थी. और उसका लहँगा किसी फुल की भाँती खिल उठा था. जब आसपास आपके सभी औरतें हो और आप उनके बीच सबसे सुन्दर औरत हो, तो कौन खुश नहीं होगी?

कमरे के दुसरे कोने में अन्वेषा अब अपनी ऊँची हील की सैंडल पहनकर चलने में थोडा ज्यादा सहज महसूस कर रही थी. “छम छम”, उसकी पायल की मधुर आवाज़ पूरे कमरे में गूंज रही थी. ख़ुशी के मारे अब वो थोडा तेज़ भी चल रही थी, हँस रही थी और अपने आसपास की औरतों से भी ख़ुशी से बात कर रही थी जो उसे उसकी खूबसूरती पे कॉम्प्लीमेंट कर रही थी. सबसे मिलकर वो भी इस क्लब का हिस्सा बन रही थी, जान रही थी कि कौन उसकी सहेली बन सकती है. और इन सब के बीच अंजलि भी अन्वेषा का साथ देते हुए उसके साथ चल रही थी. पता नहीं कौन औरत थी वो जिसने अन्वेषा को चैलेंज किया कि वो अपनी इस खुबसूरत सी लहँगा चोली में नाच कर दिखाए और अन्वेषा भी जोश में आकर मान गयी. और अंजलि से हाथ छुड़ाकर वो अपनी राजकुमारी से लिबास में गोल गोल घुमने लगी. पहले तो अपने हाथो से अपने लहंगे को पकड़ और थोडा ऊपर उठाकर धीरे धीरे, आखिर उस फूलों सी लगने वाली अन्वेषा के नाज़ुक हांथो के लिए लहंगा बहुत भारी जो था. पर फिर जल्दी ही उसने ख़ुशी से अपनी बाँहें खो फैला ली और अपने सर को ऊपर उठाकर तेज़ी से गोल गोल घुमने लगी. उसका लहंगा धीरे धीरे ऊपर उठता गया, और उसका घेर बढ़ता गया मानो जैसे एक कलि खिल कर फुल बन रही हो. उसके चेहरे की ख़ुशी सभी को खुश कर रही थी. अन्वेषा अब फुल बन चुकी थी.

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ईशा ने अन्वेषा को अपने साथ सोफे पर ले जाकर बैठाया और वो देखने लगी की कहीं अन्वेषा को मोच तो नहीं आ गयी.

पर आप में चाहे जितना भी जोश हो, यदि आपके पास हील पहनकर चलने का अनुभव न हो तो आपको सावधानी बरतनी ही चाहिए. और अचानक ही उस राजकुमारी की एडी मुड़ गयी और वो लचक खाकर निचे गिर पड़ी. “सत्यानाश! यह आजकल की कॉलेज की लडकिया भी न… ज़रा सा इंतज़ार नहीं कर सकती!”, ईशा ने कहा और तुरंत अन्वेषा की ओर दौड़ पड़ी उसे उठाने के लिए. अंजलि तो थोड़ी चिंतित थी कि कहीं अन्वेषा को मोच न आ गयी हो. एक बड़ी बहन की तरह वो भी दौड़ पड़ी और कहने लगी, “इसलिए मैं कह रही थी कि मेरे साथ धीरे धीरे चलो. अब लग गयी न चोट.. पैरो में मोच तो नहीं आई?” पर अन्वेषा कहाँ सुनने वाली थी? वो तो अब भी हँस रही थी. ईशा और अंजलि ने उसे तुरंत उठाया और एक सोफे पर ले जाकर बिठाया और दोनों औरतें अन्वेषा के पैरो को पकड़ देखने लगी कि कहीं चोट तो नहीं आई है. दोनों औरतें भी कितनी ख्याल रखने वाली थी. पुरुष के रूप में वो चाहे जैसे भी रही हो, पर एक बार साड़ी पहन ले, तो उन औरतों से ज्यादा ख्याल रखने वाली कोई न हो इस दुनिया में. साड़ी का भी कितना प्यारा असर होता है पहनने वाली के मन पर! फिर भी कुछ औरतें ऐसी भी थी जिन्हें अन्वेषा के गिरने से कुछ फर्क न पड़ा… उन्हें तो जैसे अपने अन्दर की जलन निकालने का मौका मिल गया था. इंडियन लेडीज़ क्लब में आखिर सभी तरह की औरतें थी, जिनमे से कुछ ईर्ष्यालु औरतें भी थी.

मधु, जो की इस क्लब में माँ की तरह थी, वो आगे आई और बोली, “लेडीज़! क्या यार कब तक मुझ बेचारी को भूखा रखोगी. चलो जल्दी से आगे का प्रोग्राम करते है… मेरे पेट में तो चूहे कूद रहे है. अन्वेषा चलो आओ इधर.” मधु ने अन्वेषा को बुलाया जो अब मन ही मन थोडा शर्मा रही थी अपनी नाचने की बेवकूफी को लेकर. किसी तरह अपने पैरो पर खड़ी होकर अंजलि के सहयोग से वो चलकर मधु के पास आई.

“देखो अन्वेषा. अब इस रात की बस एक चीज़ और रह गयी है. तुम्हारे पास ये मौका है कि तुम्हारी कोई ख्वाहिश हो जो हम औरतें आज पूरी कर सके तो बेझिझक बोल दो. हम लोग पूरी कोशिश करेंगे तुम्हारी इच्छा पूरी करने की.”, मधु ने अन्वेषा से कहा. अन्वेषा को कुछ समझ न आया. आखिर इतना सब कुछ तो उसके लिए क्लब ने पहले ही किया है… जो उसने कभी सपनो में भी नहीं सोचा था. अब आखिर वो और क्या मांग सकती थी भला? थोड़ी नर्वस होकर उसने लडखडाती जबान से कहा, “मेरी इच्छा…. मैं चाहती हूँ की सभी औरतें…” बेचारी मधु जैसी मुखर और बड़ी सी औरत के सामने कुछ बोल न पा रही थी.”मैं चाहती हूँ की सभी औरतें एक बड़ा सा गोल घेरा बनाकर ज़मीन पर बैठ जाए” यह कैसी ख्वाहिश है, मधु तो सोच में पड़ गई. पर अब यह ख्वाहिश पूरी तो करनी थी. “लेडीज़ तुम सबने सुन लिया अन्वेषा क्या चाहती है… तो चलो सब गोला बनाकर बैठ जाओ.”, मधु ने जोर से सभी से कहा.

वैसे तो वो कमरा बड़ा था फिर भी इतनी सारी औरतों के लिए गोल घेरा बनाना थोडा मुश्किल काम था. और फिर निचे बैठना… इतने फैंसी कपडे पहनकर? मज़ाक थोड़ी है. यदि आपने कभी साड़ी पहनी हो तो आपको तो पता होगा कि कैसे आपको पहले जगह बनानी पड़ती है कि आप अपने पैरो को पेटीकोट के अन्दर मोड़ कर ऐसे बैठ सके कि आपकी साड़ी ख़राब न हो और उसकी प्लेट अच्छी तरह बनी रहे… और फिर पल्लू को भी तो संभाल कर फैलाना होता है. कभी कोशिश करियेगा… आसान नहीं होता है साड़ी पहन कर निचे बैठना.. और वो भी भारी साड़ियाँ! और यदि आपने टाइट चूड़ीदार पहना हो तो फिर आपके पास एक ही तरीका है कि दोनों पैरो को एक ओर मोड़ कर ही आप बैठ सकती है. पालती मारने की कोशिश भी न करना टाइट चूड़ीदार में! और फिर जो भी पहनी हो आप, एक औरत को बैठ कर अच्छी दिखने के लिए अपनी कमर सीधी रखनी होती है… वो और भी कठिन होता है. इसके अलावा छोटी स्कर्ट पहनकर बैठना थोडा आसान है पर वो भी तब जब आपने टाइट स्कर्ट न पहनी हो. और फिर इन सबके अलावा आपको अपनी बड़ी सी पर्स और सैंडल के लिए भी जगह बनानी होती है! इस क्लब के लेडीज़ असली औरतों की तरफ फ्लेक्सिबल तो थी नहीं कि जैसे चाहे आराम से मुड़ जाए. उन सब औरतों को निचे बैठने देना का सीन भी बड़ा मजेदार हो गया था. “उई… माँ! मेरी कमर.. कोई ज़रा सहारा तो दो!”, मधु ने सबसे पहले कहा जब वो धम्म से अपने बड़े से कुलहो पर निचे गिर पड़ी. अंजलि और सुमति तो देखकर ही हँस हँस कर लोटपोट हो रही थी. फिर भी किसी तरह सब निचे बैठ पायी. “अब आगे क्या करना है?”, अंजलि ने अन्वेषा से पूछा.

“अब मैं चाहती हूँ कि आप सब अपनी आँखें बंद करे और अपनी अगल बगल की औरतों का हाथ पकड़ कर चेन बनाये.. और अपने मन को शांत करे”, अन्वेषा ने कहा. पर जब कोई कहता है कि अपने मन को शांत करे तो इस क्लब की औरतों के मन में ये सब चल रहा था… “यार यह ब्रा स्ट्रेप बाहर निकल कर चुभ रहा है. मुझे ब्रा को थोड़ी ढीली पहनना चाहिए था.”, “हाय… मेरे बूब्स फिसल रहे है. आगे से कभी भारी बूब्स नहीं पहनूंगी. मेरी तो कमर में दर्द हो गया.”, “मुझे मेरे पैर फैलाने को जगह चाहिए. यह बगल वाली मोटी ने सारी जगह घेर ली.”, “आज कितनी सुन्दर लग रही हूँ मैं? शायद इस कमरे में आज मुझसे खुबसूरत कोई नहीं होगा.”, “यह क्या नाटक कर रहे है हम लोग?”, “एक दिन मैं भी अन्वेषा का लहंगा ट्राई करूंगी.”, “क्या आज मैं अपने दिल की बात उससे कह दू. क्या कहेगी वो?”, “अंजलि उस साड़ी में कितनी सेक्सी लग रही है. काश वो मेरी बीवी होती.”, “क्या कोई मेरी पीठ में चिकोटी कांट रहा है?”, “हे भगवान मुझे तो बड़ी हँसी आ रही है और यहाँ सबको चुप रहना है.”, “मुझे भूख लगी है.”, और न जाने क्या क्या सोच रही थी वो सब औरतें. जितनी औरतें उससे कहीं ज्यादा विचार!

जब सभी औरतें किसी तरह बैठ गयी तो अन्वेषा ने कहा, “इस क्लब की सभी औरतों को सबसे पहले मैं धन्यवाद् देना चाहती हूँ. क्योंकि आपकी वजह से मुझे इस ख़ास रात को अनुभव करने का मौका मिला. मैं आपमें से अधिक लोगो को तो नहीं जानती पर आप सबने मिलकर मुझे यह यादगार अनुभव दिया. मैं आप सभी के लिए कुछ कर तो नहीं सकती पर आज मैं आप सभी के लिए भगवान से ख़ास प्रार्थना करूंगी.” उसने अपनी बातों से सबका ध्यान अपनी तरफ खिंच लिया. “मैं भगवान और दुर्गा माँ से प्रार्थना करती हूँ कि वो यहाँ सभी के औरत का जीवन जीने के सपने को साकार करे. हमें ऐसा जीवन दे कि हमें किसी से छुप कर यूँ तैयार न होना पड़े. मैं प्रार्थना करती हूँ कि ये सोसाइटी हमें इसी जीवन में हमें हमारे रूप में स्वीकार करे. मैं चाहती हूँ कि हम ऐसे समाज में रहे जहाँ हम जब चाहे औरत बन सके और यह समाज हमें औरत के रूप में स्वीकार करे. मैं प्रार्थना करती हूँ कि हम सभी को ऐसे जीवनसाथी मिले जो हमारे अन्दर की औरत को भी स्वीकार करे.”

बहुत ही सोची समझी प्रार्थना थी अन्वेषा की. काश कि यह सच हो जाए तो कितना अच्छा होगा. इस प्रार्थना को सुनकर सब शान्ति से एक दुसरे का हाथ पकडे बैठी रही. कुछ सोच रही थी कि प्रार्थना तो अच्छी है पर ऐसी प्रार्थना का क्या फायदा. हमारे आसपास के लोगो की सोच एक रात में तो बदल नहीं जायेगी. पर फिर भी इस प्रार्थना ने सुमति और वहां बैठी बहुत सी औरतों के दिल को छू लिया. फिर थोड़ी देर बाद सभी औरतें अपनी जगह से उठ गयी. अब खाने का समय हो गया था. और सबकी सब दावत के मज़े लेने के लिए तैयार थी.

खाते वक़्त अन्वेषा ने मौके का फायदा उठा कर नयी जान पहचान और सहेलियां बनाना शुरू कर दी थी. वो दो लड़कियों के पास गयी जो देखने में उसकी हम-उम्र लगती थी. “हेल्लो अन्वेषा! कैसा लग रहा है राजकुमारी बन कर?”, उनमे से एक ने अन्वेषा से पूछा. “हम्म… बता नहीं सकती. ये सब सपने की तरह लग रहा है. थोड़ी सी तकलीफ हो रही है इस भारी से लहंगे को उठाकर चलने में… पर फिर भी बड़ा मज़ा आ रहा है.”, अन्वेषा ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया. “मैं समझ सकती हूँ तुम्हारे दिल की बात. मुझे भी अपनी यहाँ की पहली रात अच्छी तरह से याद है. वैसे इनसे मिलो… ये मेरी अच्छी सहेली सोहा है. और मेरा नाम तो बताना ही भूल गयी मैं! मैं साशा हूँ.”, हलकी गुलाबी रंग की सैटिन की साड़ी पहनी उस लड़की ने अपना और अपनी सहेली का परिचय अन्वेषा को दिया.

अन्वेषा बढ़ कर साशा और सोहा के पास गयी जो देखने में उसकी हम-उम्र मालूम पड़ती थी. साशा एक मॉडर्न तरीके से हलकी गुलाबी साड़ी पहनी हुई थी, जबकि सोहा सफ़ेद स्कर्ट और ऊँची हील में थी.

“तुम दोनों से मिलकर बहुत अच्छा लगा. वैसे साशा कितनी सुन्दर साड़ी है तुम्हारी यार. इतनी सेक्सी ब्लाउज के साथ इसको पहनने का तरीका भी बड़ा सेक्सी और मॉडर्न है. लगता है कि तुम साड़ी पहनने में एक्सपर्ट हो!”, अन्वेषा ने साशा की साड़ी के पल्लू को छूते हुए कहा. साशा सचमुच बहुत सुन्दर लग रही थी. फैंसी सैटिन की साड़ी और साथ में हाल्टर नैक ब्लाउज… उस पर खूब फब रहा था. “अरे कहाँ यार? मुझे तो साड़ी पहनना बिलकुल भी नहीं आता. वो तो यहाँ शर्मीला आंटी ने मेरी मदद की थी. वोही आंटी जिन्होंने तुम्हारा दुपट्टा तुम्हे पहनाया आज. देखना आगे से तुम भी उनकी मदद लोगी. बहुत प्यारी है वो. एक दिन वो मुझे खुद टेलर के पास ले जाकर मेरे लिए हाल्टर टॉप स्टाइल का ब्लाउज सिलवाई थी. मुझसे कहती है वो कि मेरी जैसी जवान लड़कियों की उम्र है अभी कि हम मॉडर्न ब्लाउज पहने. पुराने स्टाइल के ब्लाउज पहनने को तो पूरी उम्र बाकी है!”, साशा कहते कहते खिलखिलाने लगी. इस क्लब की लेडीज़ भी कितनी मिलनसार थी. सब एक दुसरे की मदद करते हुए एक औरत के रूप में परिपक्व हो रही थी.

“हा हा.. सच ही तो कहा है आंटी ने. जो भी तुम माल लग रही हो! मुझे तो तुम्हारी बम पे पिंच करने का जी चाह रहा है!”, अन्वेषा ने साशा को छेड़ते हुए कहा. और फिर वो सोहा की ओर पलट कर मुस्कुराने लगी. सोहा ने लम्बी स्लीव का नीले रंग का टॉप पहना था और साथ में एक सफ़ेद रंग की स्कर्ट… और मैच करती हुई सैंडल. “वाओ सोहा… ४ इंच की हील्स! मैं तो ऐसा कुछ पहनने का सोच भी नहीं सकती. आज तो १ इंच की हील में ही गिर गयी मैं. बड़ी शर्म आ रही थी उस वक़्त मुझे.”, अन्वेषा ने फिर सोहा से कहा.

“अरे इतनी जल्दी क्या है अन्वेषा. तुम भी सिख जाओगी.. ज्यादा समय नहीं लगता. बस थोड़ी सी प्रैक्टिस और फिर तुम भी हील्स में दौड़ने लगोगी..”, सोहा ने कहा. “दौड़ना..? न बाबा न … मैं तो थोडा तेज़ चल लूं उतना ही काफी है.”, अन्वेषा बोली. “वैसे अन्वेषा… तुमने लहंगा चुनकर बहुत अच्छा की. तुम पर बहुत जंच रहा है ये रंग. तुमको आज लहंगा पहनकर गोल गोल घूमते नाचते देख कर बहुत अच्छा लगा. तुम्हे न किसी गाने पे प्रैक्टिस करके यहाँ हम सबके सामने कभी डांस करना चाहिए!”, सोहा ने फिर कहा. “आईडिया तो अच्छा है.. पर पता नहीं मैं लहंगा दुबारा कब पहनूंगी. सच बताऊँ तो मैं स्कर्ट पहनने वाली लड़की हूँ. टाइट सेक्सी छोटी स्कर्ट… जो सबका ध्यान खींचे!!!”, अन्वेषा हँसते हुए बोली. उसके कंगन और चूड़ियों की खनक और उसकी हँसी सचमुच बड़ी मोहक थी.

“ओहो… क्या बात है. किसका ध्यान खींचना चाहती हो मैडम? यहाँ पर तो सब औरतें है! कोई आदमी नहीं है..”, साशा ने कहा और तीनो जोर जोर से हँसने लगी. तीनो लड़कियों के बीच जल्दी ही दोस्ती की शुरुआत हो चुकी थी. सोहा ने फिर दोनों से कहा कि कुछ खाना खा लिया जाए. और तीनो खाने की तरफ एक साथ चल पड़ी… एक नयी दोस्ती की शुरुआत थी यह. उसी तरह जैसे अंजलि, सुमति और मधु की दोस्ती थी.

रात आगे बढती रही. अन्वेषा के पास बहुत सी औरतें आई और उसका क्लब में स्वागत किया. सभी ने उसके रूप की तारीफ़ की. समय तेज़ी से गुज़र रहा था… और इन औरतों के पास कहने को बहुत कुछ था पर समय कम था. वो एक दुसरे की साड़ियाँ, मेकअप और ड्रेसेज की तारीफ़ करते करते थक नहीं रही थी. कोई किसी के सुन्दर हार के बारे में बात कर रही थी.. तो कोई इस बारे में कि कैसे मंगलसूत्र हम भारतीय औरतों की खूबसूरती बढ़ा देता है. कोई अपनी नयी पायल दिखा रही थी.. तो कोई अपनी सहेलियों के साथ बातें कर रही थी. कोई अपनी नयी हेयर स्टाइल दिखा रही थी. कोई बता रही थी कि ब्रेस्टफॉर्म पहनकर कैसे उनका जीवन ही बदल गया.. नर्म मुलायम.. उम्म्म… कोई बता रही थी कि उसने कैसे अपनी cd के बारे में अपनी गर्लफ्रेंड को बताया और उसने उसे स्वीकार कर लिया. कुछ औरतें पक्की औरतों की तरह रेसिपी डीसकस कर रही थी तो कोई अपनी फिगर की चिंता. कोई उन्हें उपाय दे रही थी कि कैसे पेट पतला किया जाए. तो कुछ औरतें इस क्लब के प्रोग्राम के बाद रात को कहाँ पार्टी करना है इसकी प्लानिंग कर रही थी. इस क्लब में करने को कितना कुछ था. कोई भी औरत वहां बोर नहीं हो सकती थी!

पर अब क्लब के प्रोग्राम के ख़त्म होने का समय आ गया था. ऐसा लग रहा था जैसे रात तो अभी ही शुरू हुई थी. अभी भी इन औरतों को कितनी बातें करना बाकी थी. एक बार फिर मधु जी सेण्टर में आकर हाथो से ताली बजाकर सबका ध्यान अपनी ओर खींचने लगी. वो कुछ कहने वाली थी. मधु ने अपने लम्बे पल्लू को सामने लाकर अपनी कमर में लपेटा और फिर कहने लगी, “लेडीज़! मुझे उम्मीद है कि आप सबको बहुत मज़ा आया होगा आज. पर अब रात को ख़त्म करने का समय आ गया है. पर मुझे आप सबसे एक ख़ुशी की खबर शेयर करनी है.” मधुरिमा ने फिर मुस्कुराते हुए सुमति की ओर देखा और बोली, “तुम सबको तो पता ही है कि मेरी सबसे प्यारी बेटी सुमति इतने सालो से अपने इस घर में इंडियन लेडीज़ क्लब चला रही है. तो सबसे पहले सुमति को धन्यवाद देने के लिए जोर से तालियाँ. आखिर वो इतने सालो से इतनी मेहनत करती आ रही है ताकि हम सभी को ऐसी जगह मिल सके जहाँ हम सब अपने सपने पूरे कर सके. और साथ ही अंजलि को भी थैंक यू जो जल्दी आकर आज की तैयारियों में सुमति का हाथ बंटा रही थी. और फिर ईशा, शर्मीला, और अनीता को भी धन्यवाद जिन्होंने आज अन्वेषा का रूपांतरण किया.” यह हर बार की तरह क्लब की तैयारी करने वाली औरतों को धन्यवाद देने वाला मेसेज था. और हमेशा की तरह सबने ख़ुशी से जोर से तालियाँ बजाई.

“और अब सबसे बड़ी खबर! मेरी बेटी, सुमति की शादी हो रही है! एक माँ होने के नाते मुझे कितनी ख़ुशी है मैं बता नहीं सकती. पर साथ ही मैं बहुत भावुक भी हूँ आज. मेरी बेटी का घर बसने जा रहा है और एक महीने में वो एक सुहागन होगी. काश मेरे पास और समय होता जो मैं उसको अच्छी पत्नी और अच्छी बहु होने के बारे में कुछ सिखा पाती ताकि वो ससुराल में मेरा नाम न डूबा दे! पर अब क्या कर सकती हूँ मैं…. जितना सिखा सकती थी सिखा दी… “, मधु का अपना ड्रामा फिर शुरू हो गया था. उसने एक बार फिर सुमति की ओर देखा. मधु चाहे जो भी कहे पर अन्दर ही अन्दर वो सुमति के लिए बहुत खुश थी. मधु ने फिर आगे कहा, “सुमति मैं और इस क्लब की सभी औरतें तुम्हारे लिए बहुत खुश है”

“अच्छा, लेडीज़ तो अब अगली खबर. तुम सब तो जानती हो कि हम सभी यहाँ सुमति के घर में मिलती आ रही थी. पर अब हमें पता नहीं कि सुमति की होने वाली पत्नी सुमति के इस रूप को स्वीकारेगी या नहीं. मुझे यकीन है कि वो सुमति को ज़रूर अपनाएगी. कौन नहीं अपनाएगी इतनी प्यारी सुमति को? पर फिर भी.. चाहे जो भी हो… एक नयी नवेली पत्नी भले सुमति को अपना ले पर हर हफ्ते ३०-४० लोगो को अपने घर में बुलाये, इसकी सम्भावना कम है. तो जब तक हम मिलने की नयी जगह नहीं ढूंढ लेती, इंडियन लेडीज़ क्लब की मीटिंग नहीं होगी.”

ये खबर सुनते ही मानो वहां की सभी औरतों का दिल टूट गया. यही तो उनकी सबसे सेफ जगह थी. खबर सुनते ही कमरे में सभी आपस में इस बारे में बात करने लगी. किसी भी ग्रुप की तरह, इस ग्रुप में भी कुछ औरतें थी जो इस क्लब का सारा फायदा तो उठाती थी पर फिर भी शिकायत करती रहती थी. ऐसी ही औरतों की एक लीडर थी.. गरिमा. खबर सुनते ही गरिमा ने आगे आकर कहा. “यह बात हमें स्वीकार्य नहीं है.. इंडियन लेडीज़ क्लब सिर्फ सुमति का नहीं है. उसकी शादी हो रही है तो हम सब औरतें क्यों भुगते?”

मधुरिमा को अपने जीवन में ऐसी औरतों को संभालने का काफी अनुभव था. तो मधुरिमा ने गरिमा से कहा, “ठीक है गरिमा. तुम सच कहती हो. तो फिर पक्का रहा. अगले हफ्ते भी इंडियन लेडीज़ क्लब की मीटिंग होगी और आगे भी होती रहेगी. लेडीज़ सभी ध्यान दो… अगले हफ्ते से हम सभी गरिमा के घर में मिला करेंगी.”

मधु की बात सुनकर गरिमा सकपका गयी. वो पीछे हो ली और बोली, “पर मैं तो अपने पेरेंट्स और पत्नी के साथ रहती हूँ. मैं कैसे करूंगी यह सब?”

“अच्छा… तुम्हारी यह बात भी ठीक है गरिमा.”, मधु बोली, “…. तो फिर मुझे यकीन है कि तुम्हे इस क्लब के लिए कुछ करने में कोई प्रॉब्लम नहीं होगी. तो तुम एक अलग घर इस क्लूब के लिए किराए पर ले लो. वो तो और भी बढ़िया होगा. हम सब वहां अपनी साप्ताहिक मीटिंग के अलावा भी जब चाहे वहां जा सकेगी.”

गरिमा और कुछ बोल न सकी. मधु ने उसकी बोलती बंद करा दी थी. गरिमा हमेशा से ही ऐसी परेशानी खड़ी करने वाली औरत थी. वो कुछ भी मदद तो नहीं करती थी पर क्लब के बारे में हमेशा सभी औरतों से चुगली करती रहती थी.

“अच्छा लेडीज़. अब और कुछ कहने को तो रहा नहीं. चलो प्लीज़ आप सब मिलकर घर को साफ़ करने में मदद कर दो. कल सुबह ही सुमति का छोटा भाई और उसकी मंगेतर यहाँ आने वाले है. और आप लोग जो भी अपना सामान लेकर आई थी, प्लीज़ अपने साथ ले जाना. यहाँ कुछ भी मेकअप या कपडे नहीं रहने चाहिए” और फिर सभी औरतें मधुरिमा की देख रेख में साफ़ सफाई में जुट गयी.

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मधु ने अब घर की सफाई की ज़िम्मेदारी उठा ली थी. हर कोई सुमति का घर साफ़ करने में मदद कर रही थी.

साफ़ सफाई होने के बाद, अब वक़्त आ गया था कि वो औरतें अब वापस अपने कपडे बदल कर आदमी बन जाए. बहुत सी औरतों के लिए यह उनके दिन का सबसे दुखदायी समय होता था. पर वो अपने साथ बहुत ही खुबसूरत यादें संजोये जा रही होती थी. कई बार कुछ औरतें रात को अपने औरत वाले रूप में ही वहां से निकल जाती थी. कुछ लोग किसी के घर जाकर फिर ड्रिंक्स और लेट पार्टी के लिए मिलते थे. अन्वेषा ने ऐसी ही एक पार्टी में जाना तय किया. उस पार्टी में करीब ९ औरतें थी और साथ में साशा और सोहा भी थी. पर वहां जाने के पहले अन्वेषा को कपडे बदलने थे. ऐसी राजकुमारी की तरह वो रात गए बाहर नहीं जा सकती थी. क्लब की कुछ औरतों ने उसे लहंगा चोली उतारने में मदद की. अब अन्वेषा ने एक छोटी ड्रेस पहन ली थी जो वो अपने साथ घर से लेकर आई थी. न जाने उसमे इतनी हिम्मत कैसे आ गयी थी कि वो यहाँ से बाहर लड़की बन कर ही जाने वाली थी. साशा, सोहा और दूसरी औरतें भी औरत की तरह ही उस पार्टी में जा रही थी. वैसे भी पार्टी किसी के घर में थी.. सौभाग्य से जिसका घर था उसके घरवाले कुछ दिनों के लिए बाहर गए हुए थे. भले ही पार्टी के लिए उन सबके पास जगह थी… पर वहां तक जाने के लिए इंडियन लेडीज़ क्लब से बाहर निकलना पड़ता. और चारदीवारी के बाहर जाने में सब उत्साहित रहती थी… पर बाहर जाने में डर भी रहता है कि यदि पुलिस वालो ने रोक लिया तो? या किसी पहचान वाले ने देख लिया? पर ग्रुप में बाहर जाने में डर थोडा कम हो जाता था. धीरे धीरे अन्वेषा, साशा, सोहा और लगभग सभी औरतें वहां से अब जा चुकी थी. और रह गयी थी सिर्फ सुमति, मधु, अंजलि और ईशा.

ईशा एक कोने में सुमति का हाथ पकड़ी हुई थी, और उसे विश्वास दिला रही थी कि शादी के बाद भी हम सब साथ मिलने का बहाना बना ही लेंगे. पर शादी के बाद क्या होगा सोचकर सुमति थोड़ी चिंतित ही रही. उसे देख अंजलि भी वहां आ गयी. और फिर अंजलि और ईशा ने एक एक कर उसे गले लगाकर प्यार से ढांढस बंधाया.

“क्यों न हम सबकी एक फोटो हो जाए? आखिर हम सहेलियों को ये रात यादगार बना लेनी चाहिए. क्योंकि अगली बार तो सुमति जी मिस से मिसेज़ हो चुकी होंगी.”, अंजलि कहकर हँसने लगी. तभी मधु वहां आ गयी और बोली, “फोटो खींचनी है तो तुम तीनो साथ में खड़ी हो जाओ. मैं खिंच देती हूँ.” और मधु ने अपनी ब्लाउज के अन्दर से फ़ोन निकाली. “मधु जी, फ़ोन भी ब्रा में? तो यह राज़ है आपके बड़े बूब्स का”, ईशा ने मधु से पूछा. अंजलि हँस रही थी. “मैडम ईशा, इस ब्रा में और भी बहुत कुछ है. मुझे पता है कि तुम भी मेरी तरह 40DD कप चाहती हो! चल अब छोडो बूब्स की बातें… मुस्कुराओ तुम तीनो” और फिर मधु के कहने पर तीनो सहेलियों ने एक दुसरे की कमर पर हाथ रखा, मुस्कुरायी और क्लिक! कितना यादगार पल था वो.. उन सहेलियों के लिए. हमेशा की तरह आज भी बेहद खुबसूरत लग रही थी तीनो.

फोटो के तुरंत बाद ही अंजलि और ईशा ने भी कपडे बदले और सुमति से विदा ली. मधु कुछ देर और वहां रुकी थी. उसने सुमति से कहा कि वो भी कपडे बदल कर नाइटी पहन ले. सुमति बाथरूम से कपडे बदलकर जल्दी ही वापस आ गयी. मधु और सुमति अब सुमति के बिस्तर पर ही बैठे हुए थे. वहां मधु ने सुमति को माँ के प्यार के साथ गले लगायी और बोली, “मैं जानती हूँ कि तुम कैसा महसूस कर रही हो सुमति. मैं भी कई सालो पहले ऐसे समय से गुज़र चुकी हूँ. पर शादी कोई सज़ा नहीं है.. वो भी तुम्हारे जीवन में खुशियाँ लेकर आएँगी. और कभी कभी, वो ख़ुशी इतनी ज्यादा होती है कि हम अपने अन्दर की औरत को भी भूल जाते है. कम से कम शुरु के कुछ साल तक तो ऐसा ही रहता है. फिर क्या पता तुम्हारी पत्नी भी सुमति को खुले दिल से स्वीकार कर ले? और यदि न करे, तब भी अंजलि, ईशा और मैं तो है न तेरे साथ हमेशा? हम किसी न किसी तरह समय और जगह ढूंढ लेंगे सुमति से मिलने के लिए. तुम समझ रही हो न?” मधु की बातों में सचमुच ममता भरी हुई थी.

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लम्बे व्यस्त दिन के बाद, सुमति अपनी नाइटी पहन कर जल्दी ही सो गयी.

“पर माँ! मैं तुम्हे भी तो कितना याद करूंगी. तुम मुझसे इतनी आसानी से मिल न पाओगी. और फिर अपनी बहु – मेरी पत्नी से नहीं मिलोगी तुम?”, सुमति ने कहा. “बेटी, मैं तो हमेशा इसी शहर में रहूंगी न? तो हम किसी न किसी तरह मिल लेंगे. अपनी माँ पे भरोसा नहीं है ? अब चुपचाप बिस्तर में सो जाओ.” मधु ने प्यार से सुमति के सर पर हाथ फेरा. वो भी जानती थी कि अपनी इस प्यारी सी बेटी से न मिल पाना उसे भी दुख देगा. उसने सुमति को लेटाकर एक माँ की भाँती चादर उढ़ाकर उसके माथे पर एक किस दिया. “गुड नाईट, सुमति बेटी. अपना विग जल्दी निकाल लेना वरना नींद नहीं आएगी अच्छे से.”, मधु बोली और फिर वो भी अपने घर के लिए निकल गयी. सुमति को भी जल्दी ही नींद आ गयी. इस व्यस्त रात के बाद, आरामदायक नाइटी पहनकर किसी को भी नींद आ जाए. आखिर एक अच्छी नाइटी एक औरत के तन को प्यार से छूती है, लपेटती है और अपने स्पर्श से उसे पहनने वाली औरत को अच्छी तरह से समझती भी है.

हैरानी भरी सुबह

सुमति के घर में : कभी आपने एक आरामदायक नाइटी में सोने का आनंद लिया है? यदि हाँ, तो आप जानती ही होंगी की सुबह सुबह नींद खुलने पर नाइटी का स्पर्श आपकी कोमल त्वचा पर कितना सुख देता है. सुमति ने भी वही अनुभव किया. उसकी आँखें बंद थी पर उसके चेहरे पर एक मुस्कान थी. उस वक़्त उसकी बांहों में कोई होता तो वो बंद आँखों के साथ ही उसे जोर से सीने से लगा लेती. पर फिर भी वो अपनी आँखें मींचे मींचे ही उठ बैठी. उफ़… उसकी स्मूथ त्वचा पर उसकी मखमली सी नाइटी तो आज मानो फिसल रही थी. सुबह सुबह इस तरह से औरत होना महसूस करते हुए उठने का मौका बार बार कहाँ मिलता है. सुमति अब सीधी होकर बैठ गयी थी. और बैठते ही उसने अपनी उँगलियों को अपने लम्बे बालो पर फेरा और फिर उन्हें अपने चेहरे के पीछे कर दी. पर उसके लम्बे बाल? सुबह सुबह सूरज की रौशनी में अब सुमति अंगडाई ले रही थी, मानो अपने अन्दर की सारी नींद को उस उजाले में उड़ा देना चाहती हो. नए दिन का स्वागत करती हुई सुमति का सीना उसके स्तनों के साथ अंगडाई लेते हुए किसी मादक सौंदर्य की धनी लड़की की तरह आगे निकल आया था. पर सुबह सुबह की हलकी सी ठण्ड जब महसूस हुई तो उसने अपने हाथ मोड़ लिए. अपने ही हाथो पर अपने ही नर्म मुलायम स्तनों का दबना उसे सुख दे रहा था. उसने फिर अपने स्तनों को अपनी बांहों के बीच थोडा और दबाया. और उस दबाव के साथ उसके स्तन थोड़े ऊपर उठ गए. पर उसके स्तन? कैसे?

अन्वेषा पार्टी वाले घर में: वो घर जहाँ कल रात अन्वेषा और औरतों के साथ ड्रिंक्स और डांस पार्टी के लिए गयी थी, आज वहाँ सब बिखरा पड़ा था. फर्श पर हर जगह बियर की बोतलें और कैन बेतरतीब तरह से बिखरी हुई थी. कहीं रंगीन ब्रा, कहीं सेक्सी पेंटीयाँ तो कहीं किसी लड़की के टॉप सब कुछ अस्त-व्यस्त पड़ी हुई थी. उस घर में कई लडकियां एक दुसरे के ऊपर सोयी पड़ी थी जैसे रात भर खूब पार्टी हुई हो. कुछ लडकियां तो टॉपलेस थी और उनके नग्न स्तन खुले दिख रहे थे. और कुछ लडकियां अपने टॉप पहनी हुई थी पर उनके स्तन टॉप से लापरवाह तरीके से बाहर दिख रहे थे. और कुछ तो केवल पेंटी पहनी हुई थी. दो लडकियां सिर्फ ब्लाउज और पेटीकोट पहनी हुई थी और उनकी साड़ियाँ बिस्तर पर फैली हुई थी. सभी लड़कियों को शायद शराब पीने के बाद का हैंगओवर था और सब एक दुसरे की बांहों में सोयी पड़ी थी. अन्वेषा कमरे के एक कोने में बिस्तर पर थी. ऐसा लग रहा था जैसे वो साशा के बगल में लेटी थी. साशा पेटीकोट पहनी हुई थी और अन्वेषा के हाथ उसके हाल्टर टॉप ब्लाउज के अन्दर थे. इन लड़कियों ने कुछ ज्यादा ही पार्टी कर ली थी कल रात को जहाँ कोई रोक टोक नहीं थी.

सुमति के घर में: सुमति तो अब शॉक में थी. उसके पास असली स्तन थे! यह कैसे हो सकता है? वो पागल तो नहीं हो रही? वो सोचने लगी. वो ज़रूर सपना देख रही होगी. क्या कल रात उसने कोई ड्रग तो नहीं ली. अपने असली स्तनों को महसूस करने के बाद वो अपनी कमर के निचले हिस्से की तरफ तो देखना ही नहीं चाहती थी. कहीं उसका लिंग तो नहीं बदल गया? वो सचमुच पागल हो रही थी, उसने खुद से कहा. पर हैरानी भरा समय जो उसे पागल करने वाला था, वो तो अब बस शुरू ही हुआ था.

प्रिय पाठिकाओं, धन्यवाद जो आपने अब तक इस कहानी को पढ़ा. अब आगे की कहानी बहुत ही क्रेजी होने वाली है. तो पढ़ते रहिये… जानने के लिए कि आगे क्या हुआ!

क्रमश: …

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