Be like her – 013

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A little shyness adds to the beauty and the grace of a woman. Feeling a little shy in your saree when you are out is ok as long as it’s not out of compulsion.

शर्म तो स्त्री का गहना है. और घर से बाहर थोडा शर्माना तो आपकी खूबसूरती बढ़ता है.. बस इतनी सी शर्त है कि ये शर्म किसी तरह की मजबूरी न हो .

Indian Crossdressing Novel

Note: No copyright violation intended. The pictures here are intended only to give wings to the imagination for us special women who this society addresses as crossdressers. Pictures will be removed if any objection is raised here.

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Be like her – 012

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Red and black Satin Saree in Floral print. What else there is to say? You can find this saree by clicking here.

सैटिन फ्लोरल प्रिंट में साड़ी. क्या आप पहनना पसंद करेंगी? आप इस साड़ी को यहाँ क्लिक करके देख सकती है.

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इंडियन लेडीज़ क्लब: भाग ५

दोस्ती, यारी, सहेलियों का प्यार और औरतों की आपस में जलन, हर तरह के जज्बातों से भरी वो लेडीज़ क्लब की रात जल्दी ही इस दिशा में बढ़ने वाली थी जिसका वहां किसी को अंदेशा तक नहीं था.


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“लहंगे में कितनी सुन्दर लग रही है वो. हैं न?”, ईशा के इस सवाल से सुमति का ध्यान टुटा. न जाने कहाँ खोयी हुई थी वो. अब तक तो वो चुपचाप अन्वेषा को अपने नए रूप में बलखाते देख रही थी. अन्वेषा एक दुल्हन की तरह शालीनता से चल रही थी, धीरे से अपने लहंगे को ज़रा ऊपर उठा कर, थोड़ी घबरायी हुई कि कहीं खुद अपने लहंगे पर ही कदम न रख दे. पर इतने बड़े घेर वाले उस महंगे सुन्दर लहंगे में तो वो अपने पैर तक नहीं देख पा रही थी. आज के पहले तो वो कभी हील वाली सैंडल तक नहीं पहनी थी, इसलिए अंजलि उसका एक हाथ थाम कर साथ दे रही थी ताकि गलती से वो गिर न जाए. “उसका मेकअप भी अच्छा हुआ है. क्या कहती हो सुमति?”, ईशा ने फिर पूछा. “हाँ. वो तो होना ही था. आखिर तुम जो थी मेकअप के लिए!”, सुमति ने एक छोटी सी मुस्कान के साथ ईशा की ओर देखा.

“चल झूठी कहीं की. दिल से तारीफ़ करो तो मानू मैं”, ईशा ने कहा. “मैं देख रही हूँ कि कोई तो बात है जो तुझे परेशान कर रही है. क्या ये उसी खबर को लेकर है? सब ठीक होगा… तू यूँ ही चिंता कर रही है.”, ईशा की बात सुन सुमति थोड़ी आश्चर्य में थी कि उसे कैसे पता चला उस खबर के बारे में. उसने निचे थोड़ी उदासी के साथ देखा. नर्वस होकर वो अपने साड़ी के आँचल को अपनी उँगलियों में गोल गोल लपेट रही थी. पर ईशा ने सुमति का चेहरा उठाया और उससे कहा, “पगली. यह तो ख़ुशी की खबर है फिर चिंता कैसे?” सुमति थोड़ी भावुक हो गयी थी. उसने ईशा को गले लगा लिया और ईशा के कंधे पर सर रख कर बोली, “सब ठीक होगा न?” तो ईशा ने अपने हाथो से सुमति के बालों पर फेरते हुआ कहा, “हाँ. ज़रूर.”

अन्वेषा, अपने नए रूप में बेहद खुश थी और ख़ुशी के मारे वो नाच रही थी. और उसका लहँगा किसी फुल की भाँती खिल उठा था. जब आसपास आपके सभी औरतें हो और आप उनके बीच सबसे सुन्दर औरत हो, तो कौन खुश नहीं होगी?

कमरे के दुसरे कोने में अन्वेषा अब अपनी ऊँची हील की सैंडल पहनकर चलने में थोडा ज्यादा सहज महसूस कर रही थी. “छम छम”, उसकी पायल की मधुर आवाज़ पूरे कमरे में गूंज रही थी. ख़ुशी के मारे अब वो थोडा तेज़ भी चल रही थी, हँस रही थी और अपने आसपास की औरतों से भी ख़ुशी से बात कर रही थी जो उसे उसकी खूबसूरती पे कॉम्प्लीमेंट कर रही थी. सबसे मिलकर वो भी इस क्लब का हिस्सा बन रही थी, जान रही थी कि कौन उसकी सहेली बन सकती है. और इन सब के बीच अंजलि भी अन्वेषा का साथ देते हुए उसके साथ चल रही थी. पता नहीं कौन औरत थी वो जिसने अन्वेषा को चैलेंज किया कि वो अपनी इस खुबसूरत सी लहँगा चोली में नाच कर दिखाए और अन्वेषा भी जोश में आकर मान गयी. और अंजलि से हाथ छुड़ाकर वो अपनी राजकुमारी से लिबास में गोल गोल घुमने लगी. पहले तो अपने हाथो से अपने लहंगे को पकड़ और थोडा ऊपर उठाकर धीरे धीरे, आखिर उस फूलों सी लगने वाली अन्वेषा के नाज़ुक हांथो के लिए लहंगा बहुत भारी जो था. पर फिर जल्दी ही उसने ख़ुशी से अपनी बाँहें खो फैला ली और अपने सर को ऊपर उठाकर तेज़ी से गोल गोल घुमने लगी. उसका लहंगा धीरे धीरे ऊपर उठता गया, और उसका घेर बढ़ता गया मानो जैसे एक कलि खिल कर फुल बन रही हो. उसके चेहरे की ख़ुशी सभी को खुश कर रही थी. अन्वेषा अब फुल बन चुकी थी.

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ईशा ने अन्वेषा को अपने साथ सोफे पर ले जाकर बैठाया और वो देखने लगी की कहीं अन्वेषा को मोच तो नहीं आ गयी.

पर आप में चाहे जितना भी जोश हो, यदि आपके पास हील पहनकर चलने का अनुभव न हो तो आपको सावधानी बरतनी ही चाहिए. और अचानक ही उस राजकुमारी की एडी मुड़ गयी और वो लचक खाकर निचे गिर पड़ी. “सत्यानाश! यह आजकल की कॉलेज की लडकिया भी न… ज़रा सा इंतज़ार नहीं कर सकती!”, ईशा ने कहा और तुरंत अन्वेषा की ओर दौड़ पड़ी उसे उठाने के लिए. अंजलि तो थोड़ी चिंतित थी कि कहीं अन्वेषा को मोच न आ गयी हो. एक बड़ी बहन की तरह वो भी दौड़ पड़ी और कहने लगी, “इसलिए मैं कह रही थी कि मेरे साथ धीरे धीरे चलो. अब लग गयी न चोट.. पैरो में मोच तो नहीं आई?” पर अन्वेषा कहाँ सुनने वाली थी? वो तो अब भी हँस रही थी. ईशा और अंजलि ने उसे तुरंत उठाया और एक सोफे पर ले जाकर बिठाया और दोनों औरतें अन्वेषा के पैरो को पकड़ देखने लगी कि कहीं चोट तो नहीं आई है. दोनों औरतें भी कितनी ख्याल रखने वाली थी. पुरुष के रूप में वो चाहे जैसे भी रही हो, पर एक बार साड़ी पहन ले, तो उन औरतों से ज्यादा ख्याल रखने वाली कोई न हो इस दुनिया में. साड़ी का भी कितना प्यारा असर होता है पहनने वाली के मन पर! फिर भी कुछ औरतें ऐसी भी थी जिन्हें अन्वेषा के गिरने से कुछ फर्क न पड़ा… उन्हें तो जैसे अपने अन्दर की जलन निकालने का मौका मिल गया था. इंडियन लेडीज़ क्लब में आखिर सभी तरह की औरतें थी, जिनमे से कुछ ईर्ष्यालु औरतें भी थी.

मधु, जो की इस क्लब में माँ की तरह थी, वो आगे आई और बोली, “लेडीज़! क्या यार कब तक मुझ बेचारी को भूखा रखोगी. चलो जल्दी से आगे का प्रोग्राम करते है… मेरे पेट में तो चूहे कूद रहे है. अन्वेषा चलो आओ इधर.” मधु ने अन्वेषा को बुलाया जो अब मन ही मन थोडा शर्मा रही थी अपनी नाचने की बेवकूफी को लेकर. किसी तरह अपने पैरो पर खड़ी होकर अंजलि के सहयोग से वो चलकर मधु के पास आई.

“देखो अन्वेषा. अब इस रात की बस एक चीज़ और रह गयी है. तुम्हारे पास ये मौका है कि तुम्हारी कोई ख्वाहिश हो जो हम औरतें आज पूरी कर सके तो बेझिझक बोल दो. हम लोग पूरी कोशिश करेंगे तुम्हारी इच्छा पूरी करने की.”, मधु ने अन्वेषा से कहा. अन्वेषा को कुछ समझ न आया. आखिर इतना सब कुछ तो उसके लिए क्लब ने पहले ही किया है… जो उसने कभी सपनो में भी नहीं सोचा था. अब आखिर वो और क्या मांग सकती थी भला? थोड़ी नर्वस होकर उसने लडखडाती जबान से कहा, “मेरी इच्छा…. मैं चाहती हूँ की सभी औरतें…” बेचारी मधु जैसी मुखर और बड़ी सी औरत के सामने कुछ बोल न पा रही थी.”मैं चाहती हूँ की सभी औरतें एक बड़ा सा गोल घेरा बनाकर ज़मीन पर बैठ जाए” यह कैसी ख्वाहिश है, मधु तो सोच में पड़ गई. पर अब यह ख्वाहिश पूरी तो करनी थी. “लेडीज़ तुम सबने सुन लिया अन्वेषा क्या चाहती है… तो चलो सब गोला बनाकर बैठ जाओ.”, मधु ने जोर से सभी से कहा.

वैसे तो वो कमरा बड़ा था फिर भी इतनी सारी औरतों के लिए गोल घेरा बनाना थोडा मुश्किल काम था. और फिर निचे बैठना… इतने फैंसी कपडे पहनकर? मज़ाक थोड़ी है. यदि आपने कभी साड़ी पहनी हो तो आपको तो पता होगा कि कैसे आपको पहले जगह बनानी पड़ती है कि आप अपने पैरो को पेटीकोट के अन्दर मोड़ कर ऐसे बैठ सके कि आपकी साड़ी ख़राब न हो और उसकी प्लेट अच्छी तरह बनी रहे… और फिर पल्लू को भी तो संभाल कर फैलाना होता है. कभी कोशिश करियेगा… आसान नहीं होता है साड़ी पहन कर निचे बैठना.. और वो भी भारी साड़ियाँ! और यदि आपने टाइट चूड़ीदार पहना हो तो फिर आपके पास एक ही तरीका है कि दोनों पैरो को एक ओर मोड़ कर ही आप बैठ सकती है. पालती मारने की कोशिश भी न करना टाइट चूड़ीदार में! और फिर जो भी पहनी हो आप, एक औरत को बैठ कर अच्छी दिखने के लिए अपनी कमर सीधी रखनी होती है… वो और भी कठिन होता है. इसके अलावा छोटी स्कर्ट पहनकर बैठना थोडा आसान है पर वो भी तब जब आपने टाइट स्कर्ट न पहनी हो. और फिर इन सबके अलावा आपको अपनी बड़ी सी पर्स और सैंडल के लिए भी जगह बनानी होती है! इस क्लब के लेडीज़ असली औरतों की तरफ फ्लेक्सिबल तो थी नहीं कि जैसे चाहे आराम से मुड़ जाए. उन सब औरतों को निचे बैठने देना का सीन भी बड़ा मजेदार हो गया था. “उई… माँ! मेरी कमर.. कोई ज़रा सहारा तो दो!”, मधु ने सबसे पहले कहा जब वो धम्म से अपने बड़े से कुलहो पर निचे गिर पड़ी. अंजलि और सुमति तो देखकर ही हँस हँस कर लोटपोट हो रही थी. फिर भी किसी तरह सब निचे बैठ पायी. “अब आगे क्या करना है?”, अंजलि ने अन्वेषा से पूछा.

“अब मैं चाहती हूँ कि आप सब अपनी आँखें बंद करे और अपनी अगल बगल की औरतों का हाथ पकड़ कर चेन बनाये.. और अपने मन को शांत करे”, अन्वेषा ने कहा. पर जब कोई कहता है कि अपने मन को शांत करे तो इस क्लब की औरतों के मन में ये सब चल रहा था… “यार यह ब्रा स्ट्रेप बाहर निकल कर चुभ रहा है. मुझे ब्रा को थोड़ी ढीली पहनना चाहिए था.”, “हाय… मेरे बूब्स फिसल रहे है. आगे से कभी भारी बूब्स नहीं पहनूंगी. मेरी तो कमर में दर्द हो गया.”, “मुझे मेरे पैर फैलाने को जगह चाहिए. यह बगल वाली मोटी ने सारी जगह घेर ली.”, “आज कितनी सुन्दर लग रही हूँ मैं? शायद इस कमरे में आज मुझसे खुबसूरत कोई नहीं होगा.”, “यह क्या नाटक कर रहे है हम लोग?”, “एक दिन मैं भी अन्वेषा का लहंगा ट्राई करूंगी.”, “क्या आज मैं अपने दिल की बात उससे कह दू. क्या कहेगी वो?”, “अंजलि उस साड़ी में कितनी सेक्सी लग रही है. काश वो मेरी बीवी होती.”, “क्या कोई मेरी पीठ में चिकोटी कांट रहा है?”, “हे भगवान मुझे तो बड़ी हँसी आ रही है और यहाँ सबको चुप रहना है.”, “मुझे भूख लगी है.”, और न जाने क्या क्या सोच रही थी वो सब औरतें. जितनी औरतें उससे कहीं ज्यादा विचार!

जब सभी औरतें किसी तरह बैठ गयी तो अन्वेषा ने कहा, “इस क्लब की सभी औरतों को सबसे पहले मैं धन्यवाद् देना चाहती हूँ. क्योंकि आपकी वजह से मुझे इस ख़ास रात को अनुभव करने का मौका मिला. मैं आपमें से अधिक लोगो को तो नहीं जानती पर आप सबने मिलकर मुझे यह यादगार अनुभव दिया. मैं आप सभी के लिए कुछ कर तो नहीं सकती पर आज मैं आप सभी के लिए भगवान से ख़ास प्रार्थना करूंगी.” उसने अपनी बातों से सबका ध्यान अपनी तरफ खिंच लिया. “मैं भगवान और दुर्गा माँ से प्रार्थना करती हूँ कि वो यहाँ सभी के औरत का जीवन जीने के सपने को साकार करे. हमें ऐसा जीवन दे कि हमें किसी से छुप कर यूँ तैयार न होना पड़े. मैं प्रार्थना करती हूँ कि ये सोसाइटी हमें इसी जीवन में हमें हमारे रूप में स्वीकार करे. मैं चाहती हूँ कि हम ऐसे समाज में रहे जहाँ हम जब चाहे औरत बन सके और यह समाज हमें औरत के रूप में स्वीकार करे. मैं प्रार्थना करती हूँ कि हम सभी को ऐसे जीवनसाथी मिले जो हमारे अन्दर की औरत को भी स्वीकार करे.”

बहुत ही सोची समझी प्रार्थना थी अन्वेषा की. काश कि यह सच हो जाए तो कितना अच्छा होगा. इस प्रार्थना को सुनकर सब शान्ति से एक दुसरे का हाथ पकडे बैठी रही. कुछ सोच रही थी कि प्रार्थना तो अच्छी है पर ऐसी प्रार्थना का क्या फायदा. हमारे आसपास के लोगो की सोच एक रात में तो बदल नहीं जायेगी. पर फिर भी इस प्रार्थना ने सुमति और वहां बैठी बहुत सी औरतों के दिल को छू लिया. फिर थोड़ी देर बाद सभी औरतें अपनी जगह से उठ गयी. अब खाने का समय हो गया था. और सबकी सब दावत के मज़े लेने के लिए तैयार थी.

खाते वक़्त अन्वेषा ने मौके का फायदा उठा कर नयी जान पहचान और सहेलियां बनाना शुरू कर दी थी. वो दो लड़कियों के पास गयी जो देखने में उसकी हम-उम्र लगती थी. “हेल्लो अन्वेषा! कैसा लग रहा है राजकुमारी बन कर?”, उनमे से एक ने अन्वेषा से पूछा. “हम्म… बता नहीं सकती. ये सब सपने की तरह लग रहा है. थोड़ी सी तकलीफ हो रही है इस भारी से लहंगे को उठाकर चलने में… पर फिर भी बड़ा मज़ा आ रहा है.”, अन्वेषा ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया. “मैं समझ सकती हूँ तुम्हारे दिल की बात. मुझे भी अपनी यहाँ की पहली रात अच्छी तरह से याद है. वैसे इनसे मिलो… ये मेरी अच्छी सहेली सोहा है. और मेरा नाम तो बताना ही भूल गयी मैं! मैं साशा हूँ.”, हलकी गुलाबी रंग की सैटिन की साड़ी पहनी उस लड़की ने अपना और अपनी सहेली का परिचय अन्वेषा को दिया.

अन्वेषा बढ़ कर साशा और सोहा के पास गयी जो देखने में उसकी हम-उम्र मालूम पड़ती थी. साशा एक मॉडर्न तरीके से हलकी गुलाबी साड़ी पहनी हुई थी, जबकि सोहा सफ़ेद स्कर्ट और ऊँची हील में थी.

“तुम दोनों से मिलकर बहुत अच्छा लगा. वैसे साशा कितनी सुन्दर साड़ी है तुम्हारी यार. इतनी सेक्सी ब्लाउज के साथ इसको पहनने का तरीका भी बड़ा सेक्सी और मॉडर्न है. लगता है कि तुम साड़ी पहनने में एक्सपर्ट हो!”, अन्वेषा ने साशा की साड़ी के पल्लू को छूते हुए कहा. साशा सचमुच बहुत सुन्दर लग रही थी. फैंसी सैटिन की साड़ी और साथ में हाल्टर नैक ब्लाउज… उस पर खूब फब रहा था. “अरे कहाँ यार? मुझे तो साड़ी पहनना बिलकुल भी नहीं आता. वो तो यहाँ शर्मीला आंटी ने मेरी मदद की थी. वोही आंटी जिन्होंने तुम्हारा दुपट्टा तुम्हे पहनाया आज. देखना आगे से तुम भी उनकी मदद लोगी. बहुत प्यारी है वो. एक दिन वो मुझे खुद टेलर के पास ले जाकर मेरे लिए हाल्टर टॉप स्टाइल का ब्लाउज सिलवाई थी. मुझसे कहती है वो कि मेरी जैसी जवान लड़कियों की उम्र है अभी कि हम मॉडर्न ब्लाउज पहने. पुराने स्टाइल के ब्लाउज पहनने को तो पूरी उम्र बाकी है!”, साशा कहते कहते खिलखिलाने लगी. इस क्लब की लेडीज़ भी कितनी मिलनसार थी. सब एक दुसरे की मदद करते हुए एक औरत के रूप में परिपक्व हो रही थी.

“हा हा.. सच ही तो कहा है आंटी ने. जो भी तुम माल लग रही हो! मुझे तो तुम्हारी बम पे पिंच करने का जी चाह रहा है!”, अन्वेषा ने साशा को छेड़ते हुए कहा. और फिर वो सोहा की ओर पलट कर मुस्कुराने लगी. सोहा ने लम्बी स्लीव का नीले रंग का टॉप पहना था और साथ में एक सफ़ेद रंग की स्कर्ट… और मैच करती हुई सैंडल. “वाओ सोहा… ४ इंच की हील्स! मैं तो ऐसा कुछ पहनने का सोच भी नहीं सकती. आज तो १ इंच की हील में ही गिर गयी मैं. बड़ी शर्म आ रही थी उस वक़्त मुझे.”, अन्वेषा ने फिर सोहा से कहा.

“अरे इतनी जल्दी क्या है अन्वेषा. तुम भी सिख जाओगी.. ज्यादा समय नहीं लगता. बस थोड़ी सी प्रैक्टिस और फिर तुम भी हील्स में दौड़ने लगोगी..”, सोहा ने कहा. “दौड़ना..? न बाबा न … मैं तो थोडा तेज़ चल लूं उतना ही काफी है.”, अन्वेषा बोली. “वैसे अन्वेषा… तुमने लहंगा चुनकर बहुत अच्छा की. तुम पर बहुत जंच रहा है ये रंग. तुमको आज लहंगा पहनकर गोल गोल घूमते नाचते देख कर बहुत अच्छा लगा. तुम्हे न किसी गाने पे प्रैक्टिस करके यहाँ हम सबके सामने कभी डांस करना चाहिए!”, सोहा ने फिर कहा. “आईडिया तो अच्छा है.. पर पता नहीं मैं लहंगा दुबारा कब पहनूंगी. सच बताऊँ तो मैं स्कर्ट पहनने वाली लड़की हूँ. टाइट सेक्सी छोटी स्कर्ट… जो सबका ध्यान खींचे!!!”, अन्वेषा हँसते हुए बोली. उसके कंगन और चूड़ियों की खनक और उसकी हँसी सचमुच बड़ी मोहक थी.

“ओहो… क्या बात है. किसका ध्यान खींचना चाहती हो मैडम? यहाँ पर तो सब औरतें है! कोई आदमी नहीं है..”, साशा ने कहा और तीनो जोर जोर से हँसने लगी. तीनो लड़कियों के बीच जल्दी ही दोस्ती की शुरुआत हो चुकी थी. सोहा ने फिर दोनों से कहा कि कुछ खाना खा लिया जाए. और तीनो खाने की तरफ एक साथ चल पड़ी… एक नयी दोस्ती की शुरुआत थी यह. उसी तरह जैसे अंजलि, सुमति और मधु की दोस्ती थी.

रात आगे बढती रही. अन्वेषा के पास बहुत सी औरतें आई और उसका क्लब में स्वागत किया. सभी ने उसके रूप की तारीफ़ की. समय तेज़ी से गुज़र रहा था… और इन औरतों के पास कहने को बहुत कुछ था पर समय कम था. वो एक दुसरे की साड़ियाँ, मेकअप और ड्रेसेज की तारीफ़ करते करते थक नहीं रही थी. कोई किसी के सुन्दर हार के बारे में बात कर रही थी.. तो कोई इस बारे में कि कैसे मंगलसूत्र हम भारतीय औरतों की खूबसूरती बढ़ा देता है. कोई अपनी नयी पायल दिखा रही थी.. तो कोई अपनी सहेलियों के साथ बातें कर रही थी. कोई अपनी नयी हेयर स्टाइल दिखा रही थी. कोई बता रही थी कि ब्रेस्टफॉर्म पहनकर कैसे उनका जीवन ही बदल गया.. नर्म मुलायम.. उम्म्म… कोई बता रही थी कि उसने कैसे अपनी cd के बारे में अपनी गर्लफ्रेंड को बताया और उसने उसे स्वीकार कर लिया. कुछ औरतें पक्की औरतों की तरह रेसिपी डीसकस कर रही थी तो कोई अपनी फिगर की चिंता. कोई उन्हें उपाय दे रही थी कि कैसे पेट पतला किया जाए. तो कुछ औरतें इस क्लब के प्रोग्राम के बाद रात को कहाँ पार्टी करना है इसकी प्लानिंग कर रही थी. इस क्लब में करने को कितना कुछ था. कोई भी औरत वहां बोर नहीं हो सकती थी!

पर अब क्लब के प्रोग्राम के ख़त्म होने का समय आ गया था. ऐसा लग रहा था जैसे रात तो अभी ही शुरू हुई थी. अभी भी इन औरतों को कितनी बातें करना बाकी थी. एक बार फिर मधु जी सेण्टर में आकर हाथो से ताली बजाकर सबका ध्यान अपनी ओर खींचने लगी. वो कुछ कहने वाली थी. मधु ने अपने लम्बे पल्लू को सामने लाकर अपनी कमर में लपेटा और फिर कहने लगी, “लेडीज़! मुझे उम्मीद है कि आप सबको बहुत मज़ा आया होगा आज. पर अब रात को ख़त्म करने का समय आ गया है. पर मुझे आप सबसे एक ख़ुशी की खबर शेयर करनी है.” मधुरिमा ने फिर मुस्कुराते हुए सुमति की ओर देखा और बोली, “तुम सबको तो पता ही है कि मेरी सबसे प्यारी बेटी सुमति इतने सालो से अपने इस घर में इंडियन लेडीज़ क्लब चला रही है. तो सबसे पहले सुमति को धन्यवाद देने के लिए जोर से तालियाँ. आखिर वो इतने सालो से इतनी मेहनत करती आ रही है ताकि हम सभी को ऐसी जगह मिल सके जहाँ हम सब अपने सपने पूरे कर सके. और साथ ही अंजलि को भी थैंक यू जो जल्दी आकर आज की तैयारियों में सुमति का हाथ बंटा रही थी. और फिर ईशा, शर्मीला, और अनीता को भी धन्यवाद जिन्होंने आज अन्वेषा का रूपांतरण किया.” यह हर बार की तरह क्लब की तैयारी करने वाली औरतों को धन्यवाद देने वाला मेसेज था. और हमेशा की तरह सबने ख़ुशी से जोर से तालियाँ बजाई.

“और अब सबसे बड़ी खबर! मेरी बेटी, सुमति की शादी हो रही है! एक माँ होने के नाते मुझे कितनी ख़ुशी है मैं बता नहीं सकती. पर साथ ही मैं बहुत भावुक भी हूँ आज. मेरी बेटी का घर बसने जा रहा है और एक महीने में वो एक सुहागन होगी. काश मेरे पास और समय होता जो मैं उसको अच्छी पत्नी और अच्छी बहु होने के बारे में कुछ सिखा पाती ताकि वो ससुराल में मेरा नाम न डूबा दे! पर अब क्या कर सकती हूँ मैं…. जितना सिखा सकती थी सिखा दी… “, मधु का अपना ड्रामा फिर शुरू हो गया था. उसने एक बार फिर सुमति की ओर देखा. मधु चाहे जो भी कहे पर अन्दर ही अन्दर वो सुमति के लिए बहुत खुश थी. मधु ने फिर आगे कहा, “सुमति मैं और इस क्लब की सभी औरतें तुम्हारे लिए बहुत खुश है”

“अच्छा, लेडीज़ तो अब अगली खबर. तुम सब तो जानती हो कि हम सभी यहाँ सुमति के घर में मिलती आ रही थी. पर अब हमें पता नहीं कि सुमति की होने वाली पत्नी सुमति के इस रूप को स्वीकारेगी या नहीं. मुझे यकीन है कि वो सुमति को ज़रूर अपनाएगी. कौन नहीं अपनाएगी इतनी प्यारी सुमति को? पर फिर भी.. चाहे जो भी हो… एक नयी नवेली पत्नी भले सुमति को अपना ले पर हर हफ्ते ३०-४० लोगो को अपने घर में बुलाये, इसकी सम्भावना कम है. तो जब तक हम मिलने की नयी जगह नहीं ढूंढ लेती, इंडियन लेडीज़ क्लब की मीटिंग नहीं होगी.”

ये खबर सुनते ही मानो वहां की सभी औरतों का दिल टूट गया. यही तो उनकी सबसे सेफ जगह थी. खबर सुनते ही कमरे में सभी आपस में इस बारे में बात करने लगी. किसी भी ग्रुप की तरह, इस ग्रुप में भी कुछ औरतें थी जो इस क्लब का सारा फायदा तो उठाती थी पर फिर भी शिकायत करती रहती थी. ऐसी ही औरतों की एक लीडर थी.. गरिमा. खबर सुनते ही गरिमा ने आगे आकर कहा. “यह बात हमें स्वीकार्य नहीं है.. इंडियन लेडीज़ क्लब सिर्फ सुमति का नहीं है. उसकी शादी हो रही है तो हम सब औरतें क्यों भुगते?”

मधुरिमा को अपने जीवन में ऐसी औरतों को संभालने का काफी अनुभव था. तो मधुरिमा ने गरिमा से कहा, “ठीक है गरिमा. तुम सच कहती हो. तो फिर पक्का रहा. अगले हफ्ते भी इंडियन लेडीज़ क्लब की मीटिंग होगी और आगे भी होती रहेगी. लेडीज़ सभी ध्यान दो… अगले हफ्ते से हम सभी गरिमा के घर में मिला करेंगी.”

मधु की बात सुनकर गरिमा सकपका गयी. वो पीछे हो ली और बोली, “पर मैं तो अपने पेरेंट्स और पत्नी के साथ रहती हूँ. मैं कैसे करूंगी यह सब?”

“अच्छा… तुम्हारी यह बात भी ठीक है गरिमा.”, मधु बोली, “…. तो फिर मुझे यकीन है कि तुम्हे इस क्लब के लिए कुछ करने में कोई प्रॉब्लम नहीं होगी. तो तुम एक अलग घर इस क्लूब के लिए किराए पर ले लो. वो तो और भी बढ़िया होगा. हम सब वहां अपनी साप्ताहिक मीटिंग के अलावा भी जब चाहे वहां जा सकेगी.”

गरिमा और कुछ बोल न सकी. मधु ने उसकी बोलती बंद करा दी थी. गरिमा हमेशा से ही ऐसी परेशानी खड़ी करने वाली औरत थी. वो कुछ भी मदद तो नहीं करती थी पर क्लब के बारे में हमेशा सभी औरतों से चुगली करती रहती थी.

“अच्छा लेडीज़. अब और कुछ कहने को तो रहा नहीं. चलो प्लीज़ आप सब मिलकर घर को साफ़ करने में मदद कर दो. कल सुबह ही सुमति का छोटा भाई और उसकी मंगेतर यहाँ आने वाले है. और आप लोग जो भी अपना सामान लेकर आई थी, प्लीज़ अपने साथ ले जाना. यहाँ कुछ भी मेकअप या कपडे नहीं रहने चाहिए” और फिर सभी औरतें मधुरिमा की देख रेख में साफ़ सफाई में जुट गयी.

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मधु ने अब घर की सफाई की ज़िम्मेदारी उठा ली थी. हर कोई सुमति का घर साफ़ करने में मदद कर रही थी.

साफ़ सफाई होने के बाद, अब वक़्त आ गया था कि वो औरतें अब वापस अपने कपडे बदल कर आदमी बन जाए. बहुत सी औरतों के लिए यह उनके दिन का सबसे दुखदायी समय होता था. पर वो अपने साथ बहुत ही खुबसूरत यादें संजोये जा रही होती थी. कई बार कुछ औरतें रात को अपने औरत वाले रूप में ही वहां से निकल जाती थी. कुछ लोग किसी के घर जाकर फिर ड्रिंक्स और लेट पार्टी के लिए मिलते थे. अन्वेषा ने ऐसी ही एक पार्टी में जाना तय किया. उस पार्टी में करीब ९ औरतें थी और साथ में साशा और सोहा भी थी. पर वहां जाने के पहले अन्वेषा को कपडे बदलने थे. ऐसी राजकुमारी की तरह वो रात गए बाहर नहीं जा सकती थी. क्लब की कुछ औरतों ने उसे लहंगा चोली उतारने में मदद की. अब अन्वेषा ने एक छोटी ड्रेस पहन ली थी जो वो अपने साथ घर से लेकर आई थी. न जाने उसमे इतनी हिम्मत कैसे आ गयी थी कि वो यहाँ से बाहर लड़की बन कर ही जाने वाली थी. साशा, सोहा और दूसरी औरतें भी औरत की तरह ही उस पार्टी में जा रही थी. वैसे भी पार्टी किसी के घर में थी.. सौभाग्य से जिसका घर था उसके घरवाले कुछ दिनों के लिए बाहर गए हुए थे. भले ही पार्टी के लिए उन सबके पास जगह थी… पर वहां तक जाने के लिए इंडियन लेडीज़ क्लब से बाहर निकलना पड़ता. और चारदीवारी के बाहर जाने में सब उत्साहित रहती थी… पर बाहर जाने में डर भी रहता है कि यदि पुलिस वालो ने रोक लिया तो? या किसी पहचान वाले ने देख लिया? पर ग्रुप में बाहर जाने में डर थोडा कम हो जाता था. धीरे धीरे अन्वेषा, साशा, सोहा और लगभग सभी औरतें वहां से अब जा चुकी थी. और रह गयी थी सिर्फ सुमति, मधु, अंजलि और ईशा.

ईशा एक कोने में सुमति का हाथ पकड़ी हुई थी, और उसे विश्वास दिला रही थी कि शादी के बाद भी हम सब साथ मिलने का बहाना बना ही लेंगे. पर शादी के बाद क्या होगा सोचकर सुमति थोड़ी चिंतित ही रही. उसे देख अंजलि भी वहां आ गयी. और फिर अंजलि और ईशा ने एक एक कर उसे गले लगाकर प्यार से ढांढस बंधाया.

“क्यों न हम सबकी एक फोटो हो जाए? आखिर हम सहेलियों को ये रात यादगार बना लेनी चाहिए. क्योंकि अगली बार तो सुमति जी मिस से मिसेज़ हो चुकी होंगी.”, अंजलि कहकर हँसने लगी. तभी मधु वहां आ गयी और बोली, “फोटो खींचनी है तो तुम तीनो साथ में खड़ी हो जाओ. मैं खिंच देती हूँ.” और मधु ने अपनी ब्लाउज के अन्दर से फ़ोन निकाली. “मधु जी, फ़ोन भी ब्रा में? तो यह राज़ है आपके बड़े बूब्स का”, ईशा ने मधु से पूछा. अंजलि हँस रही थी. “मैडम ईशा, इस ब्रा में और भी बहुत कुछ है. मुझे पता है कि तुम भी मेरी तरह 40DD कप चाहती हो! चल अब छोडो बूब्स की बातें… मुस्कुराओ तुम तीनो” और फिर मधु के कहने पर तीनो सहेलियों ने एक दुसरे की कमर पर हाथ रखा, मुस्कुरायी और क्लिक! कितना यादगार पल था वो.. उन सहेलियों के लिए. हमेशा की तरह आज भी बेहद खुबसूरत लग रही थी तीनो.

फोटो के तुरंत बाद ही अंजलि और ईशा ने भी कपडे बदले और सुमति से विदा ली. मधु कुछ देर और वहां रुकी थी. उसने सुमति से कहा कि वो भी कपडे बदल कर नाइटी पहन ले. सुमति बाथरूम से कपडे बदलकर जल्दी ही वापस आ गयी. मधु और सुमति अब सुमति के बिस्तर पर ही बैठे हुए थे. वहां मधु ने सुमति को माँ के प्यार के साथ गले लगायी और बोली, “मैं जानती हूँ कि तुम कैसा महसूस कर रही हो सुमति. मैं भी कई सालो पहले ऐसे समय से गुज़र चुकी हूँ. पर शादी कोई सज़ा नहीं है.. वो भी तुम्हारे जीवन में खुशियाँ लेकर आएँगी. और कभी कभी, वो ख़ुशी इतनी ज्यादा होती है कि हम अपने अन्दर की औरत को भी भूल जाते है. कम से कम शुरु के कुछ साल तक तो ऐसा ही रहता है. फिर क्या पता तुम्हारी पत्नी भी सुमति को खुले दिल से स्वीकार कर ले? और यदि न करे, तब भी अंजलि, ईशा और मैं तो है न तेरे साथ हमेशा? हम किसी न किसी तरह समय और जगह ढूंढ लेंगे सुमति से मिलने के लिए. तुम समझ रही हो न?” मधु की बातों में सचमुच ममता भरी हुई थी.

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लम्बे व्यस्त दिन के बाद, सुमति अपनी नाइटी पहन कर जल्दी ही सो गयी.

“पर माँ! मैं तुम्हे भी तो कितना याद करूंगी. तुम मुझसे इतनी आसानी से मिल न पाओगी. और फिर अपनी बहु – मेरी पत्नी से नहीं मिलोगी तुम?”, सुमति ने कहा. “बेटी, मैं तो हमेशा इसी शहर में रहूंगी न? तो हम किसी न किसी तरह मिल लेंगे. अपनी माँ पे भरोसा नहीं है ? अब चुपचाप बिस्तर में सो जाओ.” मधु ने प्यार से सुमति के सर पर हाथ फेरा. वो भी जानती थी कि अपनी इस प्यारी सी बेटी से न मिल पाना उसे भी दुख देगा. उसने सुमति को लेटाकर एक माँ की भाँती चादर उढ़ाकर उसके माथे पर एक किस दिया. “गुड नाईट, सुमति बेटी. अपना विग जल्दी निकाल लेना वरना नींद नहीं आएगी अच्छे से.”, मधु बोली और फिर वो भी अपने घर के लिए निकल गयी. सुमति को भी जल्दी ही नींद आ गयी. इस व्यस्त रात के बाद, आरामदायक नाइटी पहनकर किसी को भी नींद आ जाए. आखिर एक अच्छी नाइटी एक औरत के तन को प्यार से छूती है, लपेटती है और अपने स्पर्श से उसे पहनने वाली औरत को अच्छी तरह से समझती भी है.

हैरानी भरी सुबह

सुमति के घर में : कभी आपने एक आरामदायक नाइटी में सोने का आनंद लिया है? यदि हाँ, तो आप जानती ही होंगी की सुबह सुबह नींद खुलने पर नाइटी का स्पर्श आपकी कोमल त्वचा पर कितना सुख देता है. सुमति ने भी वही अनुभव किया. उसकी आँखें बंद थी पर उसके चेहरे पर एक मुस्कान थी. उस वक़्त उसकी बांहों में कोई होता तो वो बंद आँखों के साथ ही उसे जोर से सीने से लगा लेती. पर फिर भी वो अपनी आँखें मींचे मींचे ही उठ बैठी. उफ़… उसकी स्मूथ त्वचा पर उसकी मखमली सी नाइटी तो आज मानो फिसल रही थी. सुबह सुबह इस तरह से औरत होना महसूस करते हुए उठने का मौका बार बार कहाँ मिलता है. सुमति अब सीधी होकर बैठ गयी थी. और बैठते ही उसने अपनी उँगलियों को अपने लम्बे बालो पर फेरा और फिर उन्हें अपने चेहरे के पीछे कर दी. पर उसके लम्बे बाल? सुबह सुबह सूरज की रौशनी में अब सुमति अंगडाई ले रही थी, मानो अपने अन्दर की सारी नींद को उस उजाले में उड़ा देना चाहती हो. नए दिन का स्वागत करती हुई सुमति का सीना उसके स्तनों के साथ अंगडाई लेते हुए किसी मादक सौंदर्य की धनी लड़की की तरह आगे निकल आया था. पर सुबह सुबह की हलकी सी ठण्ड जब महसूस हुई तो उसने अपने हाथ मोड़ लिए. अपने ही हाथो पर अपने ही नर्म मुलायम स्तनों का दबना उसे सुख दे रहा था. उसने फिर अपने स्तनों को अपनी बांहों के बीच थोडा और दबाया. और उस दबाव के साथ उसके स्तन थोड़े ऊपर उठ गए. पर उसके स्तन? कैसे?

अन्वेषा पार्टी वाले घर में: वो घर जहाँ कल रात अन्वेषा और औरतों के साथ ड्रिंक्स और डांस पार्टी के लिए गयी थी, आज वहाँ सब बिखरा पड़ा था. फर्श पर हर जगह बियर की बोतलें और कैन बेतरतीब तरह से बिखरी हुई थी. कहीं रंगीन ब्रा, कहीं सेक्सी पेंटीयाँ तो कहीं किसी लड़की के टॉप सब कुछ अस्त-व्यस्त पड़ी हुई थी. उस घर में कई लडकियां एक दुसरे के ऊपर सोयी पड़ी थी जैसे रात भर खूब पार्टी हुई हो. कुछ लडकियां तो टॉपलेस थी और उनके नग्न स्तन खुले दिख रहे थे. और कुछ लडकियां अपने टॉप पहनी हुई थी पर उनके स्तन टॉप से लापरवाह तरीके से बाहर दिख रहे थे. और कुछ तो केवल पेंटी पहनी हुई थी. दो लडकियां सिर्फ ब्लाउज और पेटीकोट पहनी हुई थी और उनकी साड़ियाँ बिस्तर पर फैली हुई थी. सभी लड़कियों को शायद शराब पीने के बाद का हैंगओवर था और सब एक दुसरे की बांहों में सोयी पड़ी थी. अन्वेषा कमरे के एक कोने में बिस्तर पर थी. ऐसा लग रहा था जैसे वो साशा के बगल में लेटी थी. साशा पेटीकोट पहनी हुई थी और अन्वेषा के हाथ उसके हाल्टर टॉप ब्लाउज के अन्दर थे. इन लड़कियों ने कुछ ज्यादा ही पार्टी कर ली थी कल रात को जहाँ कोई रोक टोक नहीं थी.

सुमति के घर में: सुमति तो अब शॉक में थी. उसके पास असली स्तन थे! यह कैसे हो सकता है? वो पागल तो नहीं हो रही? वो सोचने लगी. वो ज़रूर सपना देख रही होगी. क्या कल रात उसने कोई ड्रग तो नहीं ली. अपने असली स्तनों को महसूस करने के बाद वो अपनी कमर के निचले हिस्से की तरफ तो देखना ही नहीं चाहती थी. कहीं उसका लिंग तो नहीं बदल गया? वो सचमुच पागल हो रही थी, उसने खुद से कहा. पर हैरानी भरा समय जो उसे पागल करने वाला था, वो तो अब बस शुरू ही हुआ था.

प्रिय पाठिकाओं, धन्यवाद जो आपने अब तक इस कहानी को पढ़ा. अब आगे की कहानी बहुत ही क्रेजी होने वाली है. तो पढ़ते रहिये… जानने के लिए कि आगे क्या हुआ!

क्रमश: …

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इंडियन लेडीज़ क्लब: भाग ४

सज संवरकर अब अन्वेषा एक खुबसूरत औरत के रूप में कदम लेने ही वाली थी. और उस वक़्त एक औरत थी जो अकेले ख़ामोशी से अन्वेषा की तरफ देख रही थी. क्या चल रहा था उसके मन में?


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“अरे! बाहर जाकर घुमने फिरने की तो बहुत सी कहानियाँ है मेरे पास”, मधुरिमा ने औरतों के झूंड से कहा जो उसके आसपास मधुरिमा को घेरे खड़ी थी. अब जब अन्वेषा बाथरूम में ईशा के साथ कपडे बदल रही थी, तब तक दूसरी औरतें अपनी अपनी सहेलियों के संग गप्पे मार रही थी.

“पर एक दिन तो मुझे बड़ी अच्छी तरह याद है जब मैं सुमति को लेकर बाहर सब्जी खरीदने गयी थी.”, मधु ने कहा. “माँ!! नहीं… प्लीज़ वो दिन के बारे में मत बताना.”, सुमति हँस भी रही थी और अपनी माँ से विनती भी कर रही थी. “सुमति, कोई अपनी माँ से इस तरह से बात करता है?”, मधु ने शिकायती लहजे में कहा और अपनी कहानी जारी रखी. “अरी पता है बहनों तुमको तो सब कुछ.. एक अच्छी माँ होने के नाते, मैं तो चाहती थी कि सुमति एक कुशल गृहिणी बने. जो न सिर्फ किचन में खाना बनाना जानती हो, बल्कि बाहर सब्जी खरीद्टने वक़्त एक कुशल गृहिणी की तरह मोल भाव करना भी जानती हो.” मधु के चेहरे पर वो चिंता की शिकन और वो हाव भाव सभी को हंसा रहे थे.

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मधु वो किस्सा सुना रही थी जब वो और सुमति औरत बनकर बाहर सब्जी खरीदने गयी थी. उस दिन सुमति को बेहद शर्मिंदगी उठानी पड़ी थी.

“तो एक दिन हम दोनों ने यूँ ही घरेलु तरह की हलकी साड़ियाँ पहनी जैसे और औरतें सब्जी मार्किट जाते वक़्त पहनती है. मार्किट मेरे घर से १ कम दूर ही था तो मैंने सोचा की चलो पैदल ही चलते है. पर पूरे रास्ते सुमति घबराती रही और एक शब्द भी न बोली. अब तुम ही कहो बहनों, सड़क पर एक औरत के चलने पर ऐसा क्या घबराना? मैं तो न समझ सकी कि वो इतना घबरा क्यों रही है. अच्छी भली सुन्दर भी दिख रही थी.. आखिर मेरी बेटी जो ठहरी.”, मधु ने बड़े गर्व से कहा. पर उस दिन सुमति सचमुच में घबरायी हुई थी.. क्योंकि वो नहीं चाहती थी कि कोई उसे पहचान जाए की वो साड़ी पहने हुए एक आदमी है.

“मार्केट जाकर क्या हुआ आंटी?”, किसी ने मधु से पूछा. “खबरदार मुझे आंटी कहा!”, मधु ने गुस्सा दिखाया. “हाँ तो मैं कह रही थी.. कि जब हम मार्किट पहुचे तो हम सब्जियां ढूँढने लगी. अंत में जब सब सब्जियां बटोर चुकी थी हम दोनों तब मैंने सुमति को एक सुझाव दिया कि किस तरह सब्जी वाले से मोलभाव करना चाहिए. एक माँ हूँ और एक माँ अपनी बेटी को यह तरकीब नहीं सिखाएगी तो कौन सिखाएगा?”, मधु बोली. “माँ तुमने अब आगे की कहानी बताई तो मैं यहाँ एक पल भी नहीं ठहरूंगी.”, सुमति बोली. पर बाकी सभी औरतों ने मधु से कहानी आगे जारी रखने कहा.

“अरे आगे क्या.. मैंने सुमति से कहा कि ज़रा अपना पल्लू निचे सरकाकर अपना क्लीवेज दिखाए. यदि वो न करना हो तो पल्लू को इस तरह सरकाए कि उसके स्तन से भरा हुआ उसका ब्लाउज एक तरफ से दिखाई दे. तुमको तो पता है कि कोई भी आदमी तुम्हारी बात को टाल नहीं सकता यदि उसकी नज़र औरत के बूब्स पर पड़ जाए.”, मधु ऐसे कहने लगी जैसे की बड़ी ही शराफत भरी बात कही थी उसने. मधु की बातें सुनकर सभी जोर जोर से हँस रही थी. सुमति यह सब सुनकर थोड़ी नाराज़ हो रही थी. तो सुमति ने कहा, “पता है मेरी माँ ने उस दिन मेरे साथ क्या की थी? सबके सामने मेरी ही माँ ने मेरे पल्लू को निचे खिंच दिया था कि मेरा क्लीवेज दिखाई दे!”

“अरे तो क्या हुआ? ऐसी क्या गलत किया था मैंने? पता है बहनों, मेरी एक बात तक नहीं मानी सुमति ने उस दिन. कम से कम अपनी ब्रा का स्ट्रेप ही दिखा देती तो कम से कम ५० रुपये बच जाते हमारे उस दिन. पर मेरी बेटी मेरी बातें सुनती ही कहाँ है!”, मधु ने अपने सीने पे हाथ रखते हुए कहा जैसे वो कितनी ही दुखी माँ है. सुमति अब मुस्कुरा रही थी. उसने मधु को गले लगाकर कहा, “देख रही हो मेरी माँ को… ५० रुपये बचने के लिए मुझे अश्लीलता के लिए प्रेरित कर रही थी. ऐसी माँ तो मेरी दुश्मन को भी न मिले.”

“पर उसके आगे क्या हुआ?”, किसी ने पूछा. “होना क्या था.. मैं गैर-ज़िम्मेदार औरत थोड़ी हूँ भला. तो जब पैसे देने की बारी आई, मैंने सुमति की ओर देखकर जोर से कहा, ‘ओह सुमति! ज़रा देखना तो आज मेरी ब्रा का स्ट्रेप कुछ ज्यादा ही टाइट लग रही है.’ ऐसा कहते हुए मैंने उस सब्जीवाले के सामने ही अपनी ब्रा को अपने कंधे पर खींचते हुए ब्लाउज में अन्दर किया. अब संक्षिप्त में बताऊँ तो उस दिन २५ रुपये बचा लिए मैंने! मेरी जवानी के दिन होते न .. तो सच कहती हूँ .. वो सब्जीवाला तो ५० रुपये यूँ ही कम कर देता. और यह सुमति… उस दिन तो वो शर्म से लाल हो गयी थी.”, मधु बोली. और उसकी बातें सुन सभी औरतें जोर जोर से हँसने लगी. जब मधु साथ हो तो सभी यूँ ही हँसते थे उसकी हरकतों की वजह से.

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अन्वेषा एक सैटिन रोब पहन कर बाहर आई. लम्बे बालों का विग, हलकी लिपस्टिक, इनके साथ अन्वेषा को अब एक राजकुमारी सा महसूस हो रहा था. अब उसे आज की रात के लिए ख़ास ऑउटफिट पसंद करना था.

उसी हँसी के बीच तभी बाथरूम का दरवाज़ा खुला और वहां से पहले ईशा बाहर आई, जो अपने साथ उस शाम की राजकुमारी अन्वेषा को साथ लेकर आई. अन्वेषा ने उस वक़्त एक सैटिन का रोब पहना हुआ था जिसके अन्दर मैचिंग ब्रा और पेंटी पहनी हुई थी. अब उसे लम्बे बाल थे जिनको स्टाइल करना बाकी था, चेहरे पर हलके फाउंडेशन की लेयर थी और हलकी लिपस्टिक. इस के पीछे ईशा का ख्याल था कि अन्वेषा को शुरू से ही एक लड़की की तरह महसूस कराया जाए. और हुआ भी वैसा ही. अन्वेषा फूलो की तरह नाज़ुक कदमो के साथ चलते हुए बाहर आ रही थी.

“अन्वेषा.. तो तुम तैयार हो अपने लिए कपडे पसंद करने को?”, ईशा ने उससे पूछा. अन्वेषा एक दुल्हन की तरह शरमाते हुए हाँ में सर हिलाई. धीरे धीरे वो भी अब लड़की बन रही थी.

अन्वेषा ने पहले तो सभी चटक रंगों वाली भारी चमचमाती साड़ियाँ देखी. आखिर किसी भी भारतीय लड़की के लिए साड़ी की उसके दिल में ख़ास जगह होती है. उनकी बचपन की सबसे सुहानी यादें अपनी माँ और परिवार की दूसरी औरतों के साड़ी पहनने से जो जुडी होती है. और जब लडकियां उम्र में छोटी होती है, वो तो बस उस दिन का जैसे इंतज़ार कर रही होती है… जब वो बड़ी होकर ६ यार्ड की साड़ी अपने तन पर लपेटकर उसके सुख को महसूस कर सके. इंडियन लेडीज़ क्लब में ऐसी ही एक ख़ास साड़ी थी, लाल रंग की दुल्हन वाली, जो की अक्सर नए आने वाले सदस्यों का ध्यान खींचती थी. कुछ तो बात होती है लाल दुल्हन की साड़ी में जो भारतीय लडकियां उसकी तरफ आकर्षित होती है. इस साड़ी को सुमति ने खरीदी थी जो उसने कुछ साल पहले इस क्लब के शुभारम्भ के अवसर पर पहनी थी. तब से, न जाने कितनी ही नयी लड़कियों ने अपने पहले दिन उस साड़ी को चुना था. अन्वेषा ने भी उस साड़ी को हसरत भरी निगाहों से देखा. उसने आज से पहले कभी साड़ी नहीं पहनी थी, या कम से कम सलीके से तो नहीं, क्योंकि उसे साड़ी पहनना आता नहीं था. उसे डर था कि कही वो साड़ी पहनकर ठीक ढंग से चल न सकी तो. उसे अनुभव न होने की वजह से पता नहीं था कि एक बार पेटीकोट पहन लो तो साड़ी पहनकर चलना ज़रा भी मुश्किल नहीं होता.

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दुल्हन की लाल साड़ी में कुछ तो ख़ास है जो भारतीय लडकियां उसे अनदेखा नहीं कर सकती. शायद इसलिए इस क्लब की बहुत सी लड़कियों ने अपने पहले दिन इस साड़ी को चुना था. सुमति ने ये साड़ी इस क्लब के पहले दिन शुभारम्भ पर पहनी थी.

अन्वेषा सभी साड़ियों को पीछे छोड़ आगे बढ़ गयी. और साथ ही सभी सैटिन के इवनिंग गाउन को भी देख आगे बढ़ गयी. वो खुद इस वक़्त सैटिन के मखमली स्पर्श को अपने तन पर महसूस कर रही थी. उसने जो ब्रा और पेंटी पहनी थी, वो भी सैटिन सिल्क की थी, जो उसे अद्भुत आनंद दे रहे थे. और उसका सैटिन रोब तो उसकी स्किन के १ – १ इंच को रोमांचित कर रहा था. फिर अन्वेषा ने सोचा कि वो अनारकली पहनेगी. उसकी आँखों के सामने टंगी हुई सभी अनारकली सूट एक से बढ़कर एक थे. उसे अब एहसास हो रहा था कि किसी एक को चुनना मुश्किल होगा. उसने अपनी चॉइस अब एक हलकी गुलाबी चमकीली और दूसरी नारंगी जिसकी लाल बॉर्डर थी उस पर केन्द्रित की. दोनों ही भारी अनारकली थी जो की इतनी लम्बी थी कि पैरो पे हील तक आती. और उनके साथ के दुपट्टे तो और भी खुबसूरत थे. खुद को उन कपड़ो में इमेजिन करके ही अन्वेषा खुश हो रही थी. पर अब इनमे से एक कैसे चुने वो?

“हर लड़की का सबसे फेवरेट ऑउटफिट होता है. जब देखोगी तब तुम्हे तुरंत पता चल जायेगा.”, अन्वेषा को अंजलि की कही बात याद आ रही थी. ‘मेरा ऑउटफिट कहाँ है?’, अन्वेषा सोचने लगी. और तभी उसकी नज़र एक लहंगे पर पड़ी जैसा उसने पहले कभी नहीं देखी थी. लाल रंग का, दुल्हन के लिए ख़ास. और साथ में रत्न-जडित दुपट्टा भी था उसके साथ. उसे देखते ही एहसास हो गया कि यही है वो लिबास जो वो आज पहनेगी. हर लड़की का एक फेवरेट ऑउटफिट होता है. अन्वेषा मुस्कुरा दी और धीमी आवाज़ में लड़की की आवाज़ निकालने की कोशिश करते हुए बोली, “मुझे ये पसंद है.”

इन दोनों में से कौनसी अनारकली पसंद करेंगी आप?

“लेडीज़, अन्वेषा ने अपने कपडे पसंद कर लिए है. तो अन्वेषा का ट्रांसफॉर्मेशन शुरू किया जाए!”, मधु ने उत्साह में कहा. और जल्दी ही अन्वेषा के चारो ओर कुछ औरतें जमा हो गयी. जिनमे से दो ने अन्वेषा की कलाई पकड़ी और उसे उस ऊँची चेयर पर ले गए जहाँ उसका मेकअप होगा. अन्वेषा ने अपने आसपास सभी औरतो को देखा जो अपनी साड़ियों और लहंगो में दमक रही थी. उन्हें देख कर वो सचमुच राजकुमारी की तरह महसूस कर रही थी. और उसकी ख़ुशी की कोई सीमा नहीं थी. अब उसे समझ आ रहा था कि राजकुमारी होना क्या होता है. इंडियन लेडीज़ क्लब की लेडीज़ उससे झूठ नहीं कह रही थी. उन्हें सच मच स्पेशल होने का एहसास दिलाना आता है. और इन सभी औरतों के बीच इस राजकुमारी को सुरक्षित भी महसूस हो रहा था. कुछ देर पहले तक, वो एक युवक थी जो अपराचितो के बीच नर्वस था… पर अब वो राजकुमारी थी. वो धीमे धीमे मुस्कुराते हुए उस मेकअप चेयर तक बढ़ी. जब उसने कुछ औरतों को मुस्कुराते हुए देखा तो उसने शरमाकर नज़रे झुका ली. और जब नजरो के सामने उसकी लम्बी बालों की लटें आ गयी तो उन्हें अपने हाथों से एक ओर कर कान के पीछे करते हुए उसे जो स्त्रीत्व की अनुभूति हुई, वैसी पहले कभी नहीं हुई थी.

अन्वेषा का जादुई रूपांतरण अब शुरू हो चूका था.

 
और जल्दी ही ईशा ने अपने हाथो से अपने मेकअप का जादू दिखाना शुरू कर दिया. अन्वेषा अब पूरी तरह रिलैक्स थी. जब कोई और आपका मेकअप करता है, उस वक़्त की फीलिंग समझने के लिए उसे अनुभव करना बहुत ज़रूरी है. आज अंजलि का काम था कि वो अन्वेषा के हेयर स्टाइल करे. और उसकी मदद करने के लिए तृप्ति भी थी. उन दोनों ने कुछ देर कुछ डिस्कस किया कि कौनसी स्टाइल अन्वेषा पर अच्छी लगेगी. उन्होंने फिर लहंगे की ओर देखा और फिर तय किया कि उस लहंगे के साथ बेस्ट क्या लगेगा. अन्वेषा को खुद को अभी आईने में देखना मना था. क्लब की औरतें अन्वेषा के पूरे काया कल्प के बाद ही सरप्राइज देना चाहती थी. क्लब की कुछ औरतों ने अन्वेषा के पैरो के नेल्स पे नेल पोलिश लगाना शुरू कर दिया था तो किसी ने हाथो पे. और जब नेल पोलिश लग जाए और वो गीली हो.. और आप अपनी जगह से तब तक नहीं हिल सकती जब तक वो पूरी तरह सुख न जाए, तब पता चलता है सही मायने में कि राजकुमारी की तरह बैठना क्या होता है. अन्वेषा के पैरो के नाख़ून को थोड़ी सफाई की ज़रुरत थी तो लेडीज़ ने सोचा कि उसे पेडीक्योर भी दे दिया जाए पोलिश लगाने के पहले. फिर किसी ने कहा कि क्यों न नेल पोलिश को साफ़ कर सुन्दर लम्बे फेक नेल्स लगाये जाए! अन्वेषा देखना तो चाहती थी कि उसके हाथो और पैरो के साथ क्या हो रहा है पर अंजलि और तृप्ति उसके बाल बनाने में लगी हुई थी तो अन्वेषा झुक कर अपने नेल्स पूरी तरह देख नहीं सकती थी. पर उसे एक लम्बा नाख़ून दिखाई दे ही दिया.. “इतने लम्बे? इनके साथ मैं कुछ काम कैसे कर सकूंगी?”, वो सोचने लगी. पर राजकुमारी को कैसा काम भला?

शर्मीला आंटी वहीँ अन्वेषा के सामने मधु और सुमति के साथ खड़ी हुई थी. अचानक से वो हँसने लगी और मधु के कानो में कुछ कहा. मधु ने फिर अन्वेषा की ओर देखा. और फिर अपने माथे पर अपना हाथ रखते हुए सोचने लगी कि अब क्या किया जाए. अचानक ही दूसरी औरतों ने नोटिस किया और वो सब भी अन्वेषा की ओर देख कर जोर जोर से हँसने लगी. अन्वेषा को अब सचमुच लोगो के हँसने से शर्मिंदगी हो रही थी. तो मधु ने आखिर हिम्मत कर कहा, “प्लीज़ कोई ज़रा उसके रोब को बंद करो यार. देखो उसकी पेंटी से कुछ उभर रहा है. प्लीज़.. यहाँ हम सब शालीन औरतें है.” सुमति जोर जोर से हँस रही थी और बोली, “देखो तो कौन सी शालीन औरत कह रही है.. जिसको मार्किट में अपनी ब्रा और ब्लाउज दिखने में कोई शर्म नहीं आती.”

असल में अन्वेषा के साथ साथ उसके शरीर का वो पुरुष वाला अंग भी उत्साहित था. एक तो सैटिन की पेंटी पहनी हुई थी वो… और ऊपर से जो औरतें उसे तैयार कर रही थी… वो बेखबर थी कि कब उनका ब्लाउज या उनके स्तन अन्वेषा से टकरा जाते. भले उनके स्तन/ब्रेस्ट फॉर्म नकली हो पर उनका स्पर्श तो असली की तरह ही था. और जाने अनजाने वो स्पर्श अन्वेषा की पेंटी के अन्दर उत्साहित होकर उभर रहा था. वैसे भी १८-२५ की उम्र तक क्रॉस-ड्रेसिंग का ऐसा असर होता ही है.. आखिर हॉर्मोन का असर हावी होता है इस उम्र में. लगभग हर क्रोस-ड्रेसर ने ये अनुभव किया है और इसमें शर्माने की कोई बात नहीं होती है. ऐसा नहीं था कि अन्वेषा वहां किसी एक औरत के साथ कुछ ऐसा वैसा करना चाहती थी. उसका उसके तन पर कोई कण्ट्रोल नहीं था… बस. आखिर कब तक उसके तन को चूमती हुई सैटिन रोब के मखमली स्पर्श के असर को दबा कर रख पाती. उस वक़्त वहां की लेडीज़ जल्दी ही उस बात को भुलाकर अपने अपने काम में लग गयी. पर शर्मिंदगी में डूबी अन्वेषा उस बात को भूल नहीं पा रही थी. पर उसी शर्मिंदगी के असर से वो उत्साहित अंग भी धीरे धीरे शांत हो गया.

अंतिम रूपांतरण

अन्वेषा का मेकअप, बाल और नेल्स अब हो चूके थे. अब बस अंतिम रूपांतरण होना बाकी था. अन्वेषा को २ औरतों ने मेकअप चेयर से उठाया. ईशा अब अन्वेषा का सैटिन रोब उतारने को तैयार थी कि तभी मधु ने उसे रोका और कहा, “ईशा, एक बार देख लेना कि अन्दर कहीं कुछ और अभी भी उत्साहित तो नहीं है! मैं उसे एक बार फिर से नहीं देखना चाहती!” मधु की बात से सब फिर से खिलखिलाने लगी. और फिर अपनी हँसी को रोकते उनकी चूड़ियां खनकने लगी. ईशा पूरे मेकअप के साथ, सुन्दर स्टाइल किये हुए बालो के साथ अब सिर्फ ब्रा और पेंटी पहन कर सबके सामने थी. आश्चर्य की बात नहीं है कि उसे बेहद शर्म आ रही थी और उसने अपने दोनों हाथो से अपने चेहरे को तुरंत ढँक लिया था.

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अन्वेषा अब अपनी कमर के निचे उस भारी लहंगे को महसुस कर सकती थी. उस वजन से वो खुद को एक नाजुक स्त्री की तरह अनुभव कर रही थी.

तृप्ति तब अन्वेषा के पास आई और उसकी ब्रा में सॉफ्ट नर्म ब्रेस्ट-फॉर्म फिट कर दिए. अन्वेषा की आँखें अब भी बंद थी. वो अपने सीने पर नए ब्रेस्ट फॉर्म , अपने नए स्तनों के वजन को महसूस कर सकती थी, जिसे उसकी ब्रा संभालने की कोशिश कर रही थी.. “राजकुमारी अन्वेषा… अभी से अपने बूब्स को छूने की कोशिश मत करना!”, तृप्ति ने कहा. अन्वेषा एक बार फिर उस वजनी स्तनों के भार तले औरत होने की नयी अनुभूति में खो गयी. उसका अपने बूब्स को छूने का बड़ा मन हुआ और ऊपर से पहली बार उसने ब्रेस्ट फॉर्म उपयोग किये है. सचमुच लजाती हुई नारी के सामान महसूस करती अपना चेहरा छुपाये वहीँ खड़ी थी वो. वो जल्दी से कुछ पहनना चाहती थी क्योंकि वो नहीं जानती थी कि अब खुद के बूब्स के साथ न जाने फिर कब कुछ उसके तन को हो जाए. अंजलि और तृप्ति ने तब उसका लहंगा लाया और अन्वेषा के पैर उसमे डाले. आखिर अन्वेषा का निचला तन अब ढँक गया था. उस लहंगे के भारी वजन से वो निचे झुकने लगी. और फिर तृप्ति ने उस लहंगे का नाडा जोर से बाँध दिया, और अंजलि उस लहंगे के घेर को सजाने लगी.

तृप्ति ने कस कर अन्वेषा की चोली ऐसे बाँधी जिससे उसके ब्रेस्ट फॉर्म उसके तन का हिस्सा बन गए. वो नर्म मुलायम ब्रेस्ट फॉर्म वाकई में असली स्तन की तरह वजनी थे और अन्वेषा उन्हें छूने को बेताब थी.

अंजलि को पता था कि लहंगे को किस तरह से संवारना है. अन्वेषा को तो पता भी नहीं था कि यह लहंगा इतना भारी लगेगा उसे. पर यही तो हम क्रॉस-ड्रेसर के लिए सबसे अच्छी बात होती है, जितना ज्यादा भारी लहंगा होगा, उतनी ही मुश्किल उसे उठाकर चलने में आएगी… और उतनी ही नाज़ुक हम महसूस करेंगी. और वही तो हम चाहती है… एक नाज़ुक फुल की तरह महसूस करना. लहंगा पहन कर उसकी सैकड़ो चुन्नटों में चमचमाती बूटियों के साथ एक एक कदम हमें पूर्ण औरत बनाने की ओर ले जाता है. भारी लहंगा हमें धीमे चलने को मजबूर करता है.. और हम उस धीमे हो चुके पल में खुद औरत होने को अच्छी तरह महसूस कर पाती है.

इसके बाद तृप्ति ने अन्वेषा को चोली पहनाने में मदद की. तृप्ति ने उसकी चोली के पीछे से गाँठ बाँधने में मदद की. अब तंग हो चुकी चुस्त चोली में अन्वेषा के ब्रेस्ट फॉर्म उसके सीने से दबकर उसके अंग का अभिन्न हिस्सा बन गए थे… जैसे उसके अपने असली स्तन हो! वो अपने स्तनों को छूने को आतुर हो उठी. छूकर न सही पर कम से कम अपने सीने पर तो वो अनुभव कर पा रही थी. अब अन्वेषा अपने सपनो की औरत करीब करीब पूरी तरह बन चुकी थी. लम्बे बाल, मेकअप, नेल्स, खुबसूरत भारी लहंगा चोली, स्तन, सब कुछ तो हो गया था. उसकी आँखें और उसके हाव भाव हर पल और औरत की तरह होते जा रहे थे. अब यदि यह जादू नहीं था तो अन्वेषा को पता नहीं था कि और क्या जादू हो सकता है.

अंजलि और दूसरी औरतों ने तब एक बड़े से कलेक्शन से कुछ गहने उठा कर लायी जो अन्वेषा के लहंगा चोली से मैच करेंगे. “कैसा लग रहा है, अन्वेषा? तुम खुद को देखने को उतावली तो नहीं हो रही? बस कुछ देर और इंतज़ार कर लो.”, अंजलि ने कहा और उसके गले पर खुबसूरत सा हार पहनाया. अन्वेषा भी अब एक औरत की तरह अपने बालो को एक तरफ कर अंजलि को हार पहनाने का मौका दे रही थी. अन्वेषा अब नज़रे झुकाए शर्मा रही थी. “देखो तो राजकुमारी कैसे शर्मा रही है!”, मधु ने कहा. मधु सचमुच अन्वेषा की खूबसूरती को निहार रही थी. ईशा और दूसरी औरतों ने दर्जनों चूड़ियां अन्वेषा के हाथो पे पहनाई. हाय उन चूड़ियों और कंगन में तो अन्वेषा की कलाई और नाज़ुक लगने लगी. “आउच”, अन्वेषा ने धीमे से आवाज़ की जब कुछ चूड़ियां थोड़ी तंग महसूस हुई उसकी कलाई पर. “संभल कर लेडीज़, हमारी राजकुमारी बड़ी नाज़ुक है! न जाने इतने कंगनों का वजन वो संभाल भी सकेगी या नहीं.”, ईशा अन्वेषा को छेड़ते हुए बोली.

और फिर उन्ही औरतों ने अन्वेषा के कानो पर बड़े से झुमके पहनाये. अन्वेषा की तैयारी तो जैसे ख़त्म ही नहीं हो रही थी. हर पल कुछ नया उसे और ख़ुशी दे रहा था. एक औरत को भी न कितना कुछ करना पड़ता है सजने के लिए.. आज उसे एहसास हो रहा था. “अन्वेषा … यह झुमके कुछ समय बाद शायद तुम्हे कान में दर्द करेंगे. पर शायद तुम्हे पता होगा कि औरत होना इतना आसान भी नहीं होता न.”, अंजलि ने उसे चेताया. वो मीठा दर्द तो इस सुख के सामने कुछ भी न होगा. अन्वेषा ने सोचा. वैसे यदि दूसरी औरतों द्वारा सजाया जाना एक राजकुमारी जैसा अनुभव देता है, तो वहीँ जो औरतें उस राजकुमारी को सजाती है उनकी ख़ुशी भी कम नहीं होती. इंडियन लेडीज़ क्लब की हर औरत में एक छोटी लड़की छुपी हुई है जो बचपन से ही अपनी गुड़ियों को सजाना चाहती थी पर कभी यह कर न सकी. पर अब क्लब की नयी सदस्य को सजाकर वो अपनी बचपन की हसरतें पूरी करती है. और इस बात में कोई संदेह नहीं है कि उन्हें इस बात में बेहद ख़ुशी मिलती है.

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लहंगा चोली के साथ दुपट्टे को सही स्टाइल में पहनना सबसे ज़रूरी है. इसलिए शर्मीला आंटी वहां मदद करने को मौजूद थी.

लहंगा या चोली पहनना मुश्किल काम नहीं है, मुश्किल है उसके लम्बे और भारी से दुपट्टे को सही स्टाइल में प्लेट करके पहनना. आपके पास दुनिया की सबसे सुन्दर लहंगा चोली हो सकती है पर यदि आपने दुपट्टे को सही तरह से नहीं पहना तो आप अनुभवहीन और अप्रभावी दिखेंगी. इसलिए ऐसे समय पर शर्मीला आंटी की मदद की ज़रूरत होती थी. उन्होंने अन्वेषा के दुपट्टे को उसके दांयें जंधे पर बड़े ही प्यार से सजाया. और फिर प्लेट बनाकर उस दुपट्टे को अन्वेषा के ३६c साइज़ के वक्ष पर बड़े ही ध्यान से फैला कर पिन किया. दुपट्टे का पिछला हिस्सा फिर उन्होंने कमर से लपेटते हुए सामने लाकर राजरानी स्टाइल में पिन किया. इस रूपांतरण के हर एक कदम में, लहंगा, ब्रेस्ट फॉर्म, चोली, चूड़ियां, झुमके, दुपट्टा, अन्वेषा अपने अंग पर बढ़ते हुए वजन को महसूस कर सकती थी, और उसे उस वजन के मीठे दर्द से औरत बनकर बेहद सुकून मिल रहा था. इतने में अंजलि ने उसके सर पे एक बड़ा सा मांग-टीका भी सजा दिया.

अंजलि निचे बैठ कर अन्वेषा को यों पायल पहना रही थी मानो वो होने वाली दुल्हन की बड़ी बहन हो.

अंजलि ने फिर अपनी बड़ी पर्स से एक पायल निकाली और बोली, “ओके राजकुमारी! मुस्कुराओ अब बस आखरी गहना पहनाना रह गया है तुम्हे. अपने पांव आगे बढाओ.”, अंजलि बैठ कर खुद अपनी साड़ी का पल्लू संभालते हुए अन्वेषा के पाओं में पायल पहनाने लगी जैसे मानो वो होने वाली दुल्हन की बड़ी बहन हो. अंजलि ने ऊपर देख अन्वेषा की आँखों को देख मुस्कुरायी. अन्वेषा को यकीन नहीं हो रहा था कि इसी प्यारी बहन सी अंजलि के बारे में वो सोच रही थी वो फ़्लर्ट कर रही थी उसके साथ. अब मधु अन्वेषा के पास आई और उसे वात्सल्य से भर कर गले से लगा ली. और फिर उसने अपने दोनों हाथों से एक दुल्हन की माँ की तरह अन्वेषा के सर से नज़र उतारने की रस्म पूरी की. मधु ने फिर चांदी के रंग की सैंडल अप्पने साथ लायी और अन्वेषा के पैरो के आगे रख कर बोली, “अन्वेषा बेटी. अब तुम्हारी बारी है एक पूर्ण औरत के रूप में पहला कदम लेने के. आओ! कदम बढाओ और यह सैंडल पहनो.”

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अन्वेषा ने एक पूर्ण औरत के रूप में अपना पहला कदम सैंडल पहनने को उठाया. जोश में वो काँप रही थी.

अंजलि ने अन्वेषा का हाथ पकड़ा जब अन्वेषा ने अपने पहले कदम बढ़ाये. अन्वेषा का अंग अंग रोम रोम ख़ुशी से रोमांचित थी. उसकी सैंडल में एक इंच की हील थी और अंजलि वहां उसकी मदद के लिए थी कि कहीं सैंडल की हील को अन्वेषा संभाल न सके. ईशा ने अन्वेषा के लहंगे को ज़रा ऊपर उठाया ताकि अन्वेषा कम से कम अपने पैरो को देख सके सैंडल पहनते वक़्त. कभी कभी लहंगे का बड़ा सा घेरा लड़की को खुद के पैरो को देखने नहीं देता. अन्वेषा ने जैसे ही कदम लिया… उसकी पायल छनक उठी, चूड़ियां कंगन खनक उठे, लहंगे के अन्दर की अनगिनत लेयर में सरसराहट होने लगी और उसके झुमके दमक उठे, नेकलेस जगमगा उठा. और अन्वेषा खिल उठी! उसके गहनों और कपड़ो की हर एक आवाज़ जैसे उसके कानो में मधुर संगीत था. और फिर अगला कदम…और अब दोनों सैंडल वो पहन चुकी थी. और जब उसने पैरो से नज़रे उठा कर सामने देखा तो उसकी आँखों के सामने सबसे खुबसूरत लड़की खड़ी थी. उसने कई बार कल्पना तो की थी कि ये लड़की कैसे दिखेगी पर जो उसकी आँखों के सामने थी वो तो उसकी कल्पना से भी परे खुबसूरत थी. इंडियन लेडीज़ क्लब की औरतों ने चुपके से उसके सामने एक बड़ा सा आइना लाकर खड़ा कर दिया था जिस पर अन्वेषा की नज़र तब पड़ी जब उसने सैंडल पहन कर अपनी नज़रे उठायी और खुद को सामने देखा. लेडीज़ क्लब की औरतें जानती थी कि नए सदस्य को स्पेशल ट्रीटमेंट कैसे देना है. खुद को आईने में एक खुबसूरत औरत के रूप में देख, अन्वेषा के आँखों में ख़ुशी के आंसू थे. आज उसकी औरत के रूप में नयी ज़िन्दगी शुरू हो रही थी. और इस ज़िन्दगी की शुरुआत में उसका स्वागत करने के लिए क्लब की सभी औरतों ने उसका ताली बजाकर स्वागत किया.

इसी तालियों की गडगडाहट के बीच, एक औरत थी, जो कमरे एक कोने में अकेले खड़ी थी, और खामोशी से सब कुछ होते देख रही थी. वही तो थी जिसकी वजह से अन्वेषा के लिए यह ख़ास पल संभव हो सका, और न जाने इस क्लब की कितनी ही औरतों के सपने साकार किये थे उसी की मेहनत ने. पर आज उसके दिल-दिमाग में कुछ और ही चल रहा था. वो लोगो से कुछ कहना चाहती थी पर उसे समझ नहीं आ रहा था कि कैसे कहे.

क्रमश: …

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इंडियन लेडीज़ क्लब: भाग ३

लेडीज़ क्लब में आज खुशियाँ छाई हुई थी. यहाँ सुन्दर सुन्दर लिबास में जमा सभी औरतें खुश थी पर उन्हें पता नहीं था कि आज की रात उनमे से एक औरत उनकी ज़िन्दगी हमेशा के लिए बदल देगी.


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हर किसी को मधुरिमा आंटी से बात करना पसंद था.

इंडियन लेडीज़ क्लब की पार्टी अब शुरू हो चुकी थी. और मधुरिमा भी पार्टी का मज़ा ले रही थी. एक कोने में किसी लड़की से बात कर रही थी. वैसे भी वहां की सभी औरतों को ‘मधु आंटी’ से बात करने में बड़ा मज़ा आता था. वैसे तो मधु झूठमूठ का गुस्सा दिखाती थी जब भी उसे कोई आंटी कहता था… पर फिर भी सभी मधु को प्यार से सम्मान के साथ आंटी कहते थे. पर फिर भी क्लब में कुछ औरतें ऐसी भी थी जिन्हें मधु से जलन होती थी. क्योंकि उनकी नजरो में मधु के पास सब कुछ था. उसके पास बड़े स्तन थे और उसे नकली ब्रैस्ट-फॉर्म की ज़रुरत नहीं होती थी. मधु आंटी के कुल्हे भी किसी मदमस्त औरत की तरह बड़े थे जो उनके फिगर को और आकर्षक बनाते थे. सचमुच बहुत सुन्दर लगती थी जब भी मधु अपनी भरी-पूरी काया पर कस कर साड़ी लपेटती थी. जब वो चलती थी तो उनके स्तन उनके हर कदम पर हिलते थे और साड़ी उनके कुलहो पर फिसल कर आवाज़ करती थी. पर सच तो सिर्फ मधु और उसकी करीबी कुछ सहेलियां जानती थी. एक लम्बी बीमारी और कई दवाइयों के सेवन से वो मोटी हो गयी थी, पर एक क्रॉस-ड्रेसर के रूप में ये मोटापा एक तरह का वरदान था. और फिर ऊपर से, अजंता नाम की एक ऐसी पत्नी थी मधु की, जो उनके हर कदम पर साथ भी देती थी, और न सिर्फ मधु को बलकि मधु की सहेलियों को भी ख़ुशी से अपनाती थी. मधु की तरह अजंता भी जवान लड़कियों को बिलकुल बेटी की तरह से प्यार से रखती थी. अजंता को कोई प्रॉब्लम नहीं थी इस बात से की मधु औरत के रूप में घर से बाहर जाए. और मधु की चाल और मदमस्त तन को देखकर किसी को शक भी नहीं होता था कि मधु औरत नहीं है. इंडियन लेडीज़ क्लब में किसी ने कभी मधु को आदमी के रूप में भी नहीं देखा था, वो तो हमेशा घर से ही मधु बनकर अपनी कार चलाकर आती थी. पर इन सब में एक औरत अपवाद थी.

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कुछ साल पहले, सुमति मधु के घर कुछ दिन रहने आई थी. वहां मधु ने सुमति को अपनी बेटी की तरह रहने दिया था.

कुछ साल पहले, सुमति को एक टेम्पररी जगह चाहिए थी रहने के लिए. यह तब की बात है जब सुमति इस घर में आई नहीं थी जो आज इंडियन लेडीज़ क्लब के नाम से जाना जाता है. उस वक़्त तक मधु और सुमति का रिश्ता माँ-बेटी के रिश्ते की तरह बन चूका था. और उस दिन जब सुमति मधु के घर रहने आई थी, तब मधु ने बिलकुल एक माँ बनकर अपनी बेटी का स्वागत किया था. और अगले दो दिन, सुमति उस घर में बेटी बनकर ख़ुशी से रही. मधु और उनकी पत्नी अजंता ने सुमति को खूब प्यार दिया था. सुमति भी अपने ‘मधुसुदन अंकल’ और ‘अजंता आंटी’ के साथ बहुत खुश रही थी. उस छोटे से समय में उसने अजंता आंटी के साथ किचन में बहुत कुछ बनाना सिख लिया था. अजंता सुमति से कहती थी कि यदि संभव होता तो वो सुमति को अपनी बहु ज़रूर बनाती! पर अजंता और मधुसुदन का कोई बेटा नहीं था. उनकी एक बेटी थी जिसकी शादी हो चुकी थी.

मधु की बेटी योगिता ने बचपन से ही अपने पिता को घर में कई बार साड़ी पहने देखा था. मधु और अजंता ने अपनी बेटी  योगिता से कभी कुछ छिपाया नहीं था. और योगिता भी मानती थी कि उसकी एक नहीं दो-दो माएँ है! आज भी जब वो अपने मायके आती है तो एक दिन ज़रूर अपनी मधु माँ के साथ बिताती है. उस एक दिन जहाँ एक माँ अजंता बेटी के लिए उसकी पसंद का खाना बनाने में व्यस्त रहती है, वही दूसरी माँ मधु योगिता को शौपिंग कराने बाहर ले जाती है. ये सब जानकर तो किसी को भी लगता था कि सब कुछ तो था मधु के पास. बस एक कमी थी.. एक अच्छी सेहत की. लम्बे समय से अपनी बीमारी से जूझती मधु अक्सर घर में बीमार पड़ी रहती थी.. और लोगो से तभी मिलती थी जब वो अच्छी हो. इसलिए किसी को पता नहीं था कि हंसती खेलती मधु जो सबको इतना खुश रखती है.. खुद कितनी परेशानियों के साथ जी रही होती है.

वो सुन्दर चूड़ियों की खनकती आवाज़…. इसलिए तो पहनती है हम इन्हें. परजब वो हमारी या हमारी सहेलियों की साड़ी में अटक जाती है तो हमें तकलीफ भी देती है. पर ऐसी तकलीफ तो हम औरतें रोज़ सहना चाहेंगी.

खैर इस वक़्त इस लेडीज़ क्लब की सभी लेडीज़ सज धज कर तैयार थी, उनके चेहरे पर मुस्कान थी, सभी अपने गहनों से लदी चमचमा रही थी और कुछ अपनी ऊँची हील पहन कर लड़खड़ा भी रही थी. भले ही सबको औरत बनना अच्छा लगता था यहाँ, पर हर किसी को अभी तक एक शालीन औरत की तरह चलना नहीं आता था. कुछ तो इसके बावजूद ४ इंच की हील पहन लेती थी भले उनसे १ इंच की सैंडल पहन कर भी चला न जाए. कुछ थी जिनसे अपना दुपट्टा या साड़ी का पल्लू संभाले नहीं संभालता था. बार बार पल्लू या दुपट्टा फिसलता और वो बार बार उसे ऊपर उठाकर ठीक करती… फिर भी पिन नहीं लगाती! और कुछ तो हज़ार पिन लगाने के बावजूद भी न संभाल पाती. ये छोटी छोटी बातें और मुश्किलें उनके औरत होने की अनुभूति को और बढ़ा देती थी. कुछ औरतों को लम्बे खुले बाल इतने पसंद थे कि भले वो आँखों के सामने आये और उन्हें कुछ अच्छे से दिखाई न दे… फिर भी बाल खुले ही रखेंगी! खनखनाती चूड़ियां और चमचमाते लहराते लम्बे कानो के झुमके कभी बालों में अटक जाते तो कभी साड़ी के पल्लू की एम्ब्राईडरी में! जितना सजो जितना पहनो उतनी मुसीबतें! यही तो इस क्लब में ख़ास था, आपके साथ आप ही की तरह और भी कई औरतें होती थी जो इन सब मुसीबतों को झेलते हुए भी आपको एक औरत बनने के सपने को पूरा करने में मदद करने को तैयार थी. इन छोटी छोटी मुश्किलों से कुछ सिख कर आगे बढ़ते हुए औरत बनने के इस रास्ते में सभी को मज़ा आता था. हर क्रॉस-ड्रेसर इस बात को समझती है.

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मधु अब आज का प्रोग्राम शुरू करने को तैयार थी.

मधुरिमा जी भी अब बस आज के मुख्य कार्यक्रम को शुरू करने के लिए तैयार थी. उन्होंने अपनी साड़ी के पल्लू को अपने ही नटखट अंदाज़ में अपनी बड़ी सी कुलहो पर लपेटा और सामने ठूंस कर सबके सामने आ गयी. उन्हें पल्लू को कमर में लपेटना अच्छा लगता था. वो उस कमरे में ऊपर जाती सीढ़ियों पर चढ़ने लगी. उनके हर एक कदम पर उनकी नितम्ब एक परफेक्ट औरत की तरह लहराती. शायद वो जान बुझ कर ऐसा करती है पर चुस्त ब्लाउज और कस के लपेटी हुई साड़ी में उनकी चाल सबका ध्यान उनकी ओर आकर्षित करने में कामयाब रहती थी. फिर ऊपर जाकर वो पलटी और ताली बजाकर एक बार फिर सबका ध्यान अपनी ओर खिंचा और बोली, “लेडीज़! अब आज के ख़ास पल का समय आ गया है जिसके लिए हम सब आज यहाँ है.” सभी का ध्यान अब मधु आंटी की ओर था.

“हां हाँ… डिन्नर के लिए ही न! पर डिनर के अलावा भी तो कुछ है आज और तुम सब तो जानती ही हो. अब जब तुम सब तैयार हो चुकी हो, अब तुम सब बस खाना खाना चाहती हो…”, सभी उनकी बात सुनकर हँसने लगी. “.. लेकिन आज हम सब यहाँ है हमारी नयी मेम्बर के स्वागत के लिए. मैं आप सभी का परिचय कराना चाहती हूँ अन्वेषा से!”, मधु ने आगे कहा. तालियों की गडगडाहट के साथ ही साथ खनकती चूड़ियों की मधुर आवाज़ अब हवा में भर गयी थी. और हर किसी की नज़र उस हैण्डसम जवान युवक की ओर थी जो शर्माता हुआ एक कोने में खड़ा था. जब इतनी औरतें एक साथ किसी की ओर देखे तो ज़ाहिर है उसे थोड़ी शर्म आएगी. बिना कुछ कहे उसने बस अपने हाथ हिलाकर सभी का अभिवादन किया. उस कमरे में अकेला वो आदमी … उसे ज़रा भी अंदाजा नहीं था कि इतनी सारी औरतें मिलकर उसके साथ क्या क्या कर सकती है! मधुरिमा आखिर उस युवक को अपने साथ खिंच लायी.

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मधु उस युवक को अपने तरह से छेड़ने लगी.

“ओहो देखो तो कितनी शर्मीली है अन्वेषा!”, मधुरिमा ने उस युवक को अपने हाथों से खींचते हुए कहा. “तो हैण्डसम.. हाय तुझे अपने हाथो से छुए बगैर कैसे रहूंगी मैं?”, मधुरिमा ने अब उस युवक को छेड़ते हुए करीब खींचते हुए अपने सीने से लगा लिया. बेचारा शर्माता रह गया वो.

“लेडीज़, आज हम सभी का कर्त्तव्य है कि अन्वेषा आज की रात कभी न भूल सके! इसे भी हम औरतों के हाथ का जादू हमेशा याद रहना चाहिए.”, मधुरिमा बोलती रही और वो युवक शर्माता रहा. जिस तरह से मधु उस युवक को कमर से पकड़ कर गले लगा रही थी, उस युवक को उस वक़्त एहसास नहीं था कि मधु के अन्दर कितना वात्सल्य प्रेम भरा हुआ था.

पर अब मधु ज़रा सीरियस हो गयी और बोली, “अन्वेषा, यह मेरा वादा है कि आज की रात तुम्हारी सबसे सुनहरी यादों वाली रात होगी. क्योंकि आज इस शहर की बेस्ट औरतें अपनी कला से तुम्हे जवान लड़के से खुबसूरत राजकुमारी में तब्दील कर देंगे.. ऐसी राजकुमारी जिसको तुमने सपने में भी नहीं सोचा होगा. हम सब तुम्हारा इस क्लब में स्वागत करती है.”

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अन्वेषा को क्लब की औरतों ने ये खुबसूरत सिल्क की ब्रा और पेंटी का सेट गिफ्ट में दिया था. 

मधु ने फिर सुमति की ओर इशारा किया और सुमति तुरंत एक बैग लेकर मधु के पास आई. मधु ने वो बैग पकड़ा और अन्वेषा की ओर पलट कर बोली, “अन्वेषा ये इस क्लब की सभी औरतों की ओर से एक छोटा सा तोहफा है तुम्हारे लिए जिसे हम सबने मिलकर प्यार से लिया है तुम्हारे लिए.”

अन्वेषा ने उस बैग को हाथ में लिया और आखिर उसने कुछ शब्द कह ही दिए. “सभी को मेरा धन्यवाद. आज मैं थोड़ी नर्वस हूँ और इमोशनल भी. मुझे यकीन नहीं हो रहा है कि आज रात मैं एक लड़की बन जाऊंगी और वो भी आप जैसे खुबसूरत औरतों की मदद से..”, अन्वेषा की आवाज़ रुन्धने लगी भावुकता में.

“डार्लिंग, इतनी भावुक भी न हो! कम से कम अपना गिफ्ट तो देख लो खोल कर!”, मधु ने अन्वेषा के चेहरे को प्यार से छूते हुए कहा. अन्वेषा ने जब बैग खोला तो उसकी आँखें चमक उठी. उस बैग में बहुत ही सुन्दर सैटिन सिल्क की ब्रा और पेंटी का सेट था. इतनी सुन्दर तो उसने कभी नहीं देखी थी. यह सोचकर ही कि वो इतनी नाज़ुक सुन्दर ब्रा पेंटी पहनेगी.. उसका दिल भर आया. और तो और उस सेट के साथ एक विक्टोरिया सीक्रेट का एक सैटिन का रोब भी था उस बैग में!

“लेडीज़!! इसके पहले की अन्वेषा और भावुक हो.. चलो इसे “प्रिंसेस रूम” में ले चलते है. ईशा तुम तैयार हो?”, मधुरिमा ने ईशा से पूछा जो एक लॉक कमरे को पहरा दे रही थी. वो कमरा था “प्रिंसेस रूम”. ईशा ने सर हिला कर हाँ का इशारा किया.

“प्रिंसेस रूम? यह क्या है?”, अन्वेषा ने पूछा. मधुरिमा ने फिर मुस्कुरा कर कहा, “बस एक मिनट में तुम्हे पता चल जायेगा डार्लिंग!” और मधु ने अपने हाथो से अन्वेषा के गाल खिंच लिए.

मधु अन्वेषा का हाथ पकड़ उसे अपने साथ ले चली. और सभी औरतें उन दोनों के पीछे पीछे. ईशा ने जब दरवाज़ा खोला तो वो कमरा किसी भी क्रॉस-ड्रेसर के लिए मानो स्वर्ग सा था. अन्वेषा का तो मुंह खुला का खुला रह गया. उस रूम को बेहद ही प्यार से सजाया गया था… जहाँ ढेरो खुबसूरत साड़ियाँ, फैंसी एम्ब्राईडरी किये ब्लाउज, लम्बी सुन्दर अनारकली, चमचमाते पंजाबी सूट, सेक्सी वेस्टर्न सैटिन गाउन, एक से बढ़कर एक लहंगा चोली, चमकते हुए गहने और अनगिनत चप्पल और सैंडल सजे हुए थे.

प्रिंसेस रूम को सुन्दर साड़ियों, दमकते ब्लाउज, सेक्सी इवनिंग गाउन, चमचमाते गहनों और अनगिनत सैंडल के साथ सजाया गया था. और इन सब में एक ऑउटफिट चुन कर पहनना अन्वेषा क्या किसी भी लड़कीके लिए आसान नहीं होगा.

प्रिंसेस रूम की तैयार सुमति और अंजलि ने मिलकर की थी. सुमति जो पूरी रात दौड़ रही थी, वो इसलिए क्योंकि वो दूसरी मेम्बर्स से वो कपडे इकठ्ठा कर रही थी जो अन्वेषा के साइज़ के हो. सभी ने अपने बेस्ट कपडे इस पल के लिए लाये थे जिसमे से एक अन्वेषा आज पहन सकेगी. सुमति ने ये सब चुप-चाप किया था वहीँ अंजलि ने अपनी सजावट की कला का उपयोग करते हुए सभी कपड़ो को बहुत सुन्दर तरह से उस कमरे में सजाया था. प्रिंसेस रूम न सिर्फ अन्वेषा के लिए बल्कि सभी के लिए सरप्राइज था. जब भी कोई नया मेम्बर क्लब में आता, सभी सदस्य उस रूम को देखने के लिए उतावले रहते. पुरुष रूप में न सही पर एक बार औरत बनने के बाद इस क्लब की सभी औरतें बेझिझक यहाँ कपड़ो के डिजाईन की तारीफ़ कर सकती थी. फैब्रिक छू छूकर देखती कि कैसे है वो कपडे या उनका रंग कैसा है.

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अंजलि ने अन्वेषा से कहा, “मैंने कहा था तुम्हे घबराने की कोई बात नहीं है.”

अंजलि फिर आगे आई और अन्वेषा से बोली, “मैंने कहा था हैण्डसम… आज तुम्हारी रात है. अब घबराने की कोई बात नहीं है.” अन्वेषा शर्मा गयी और अपना सर झुका ली. “अब तुम्हे इन सभी कपड़ो में से एक ऑउटफिट पसंद करनी है जो तुम्हे अच्छी लगे. खुद को इमेजिन करो कि तुम सबसे खुबसूरत किस्मे लगोगी?”

“इनमें से सिर्फ एक का चुनाव तो बहुत कठिन होगा… सब एक एक से सुन्दर है”, अन्वेषा सोचने लगी. आखिर वो लम्बे लाल सेक्सी सैटिन गाउन को कैसे रिजेक्ट करेगी… उसे पहन कर तो उसे रेड कारपेट पे चल रही सेलेब्रिटी की तरह लगेगा… या फिर फिर इस चमकीली गुलाबी साड़ी से कैसे मुंह फेर लूं जिसको पहन कर मैं नयी नवेली पत्नी की तरह दिखूंगी. या मैं उस स्लिम-फिट वाली अनारकली को कैसे मना कर दू जिसका इतना घेरा है कि मेरे कॉलेज की सभी लड़कियों को मुझसे जलन हो जाएगी? एक ऑउटफिट पसंद करना सचमुच कठिन काम होगा.

अन्वेषा की दुविधा देख कर अंजलि बोली, “रिलैक्स अन्वेषा. जब तुम अपनी पसंद की ड्रेस देखोगी न तो तुम्हे बिलकुल भी नहीं सोचना पड़ेगा. मेरा यकीन मानो, हर लड़की का सबसे फेवरेट ऑउटफिट होता है. पर उसके पहले तुम्हारे पास अभी थोडा समय है. ईशा तुम्हे बाथरूम ले जाएगी जहाँ तुम पहले अपनी ब्रा और पेंटी पहनोगी. फिर उस बैग से सैटिन रोब पहनकर बाहर आओगी. आखिर एक दुल्हन या राजकुमारी का श्रृंगार ऐसे ही थोड़ी शुरू होता है!” अंजलि अन्वेषा का कन्धा पकड़कर मुस्कुराने लगी. अन्वेषा मन ही मन सोच रही थी कि बस कुछ देर पहले जब वो अंजलि से पहली बार मिली थी तब उसे लगा था कि अंजलि उसके साथ फ़्लर्ट कर रही है. पर अब उसे समझ आ गया था कि इस क्लब में औरतें ऐसे ही एक दुसरे को छेडती है. अन्वेषा फिर ईशा के संग बाथरूम चली गयी जहाँ वो सबसे सेक्सी ब्रा और पेंटी पहनने वाली थी. वो औरत बनने की ओर कदम बढ़ा रही थी. आज उसका सपना सच होने वाला था.

अन्वेषा के अन्दर जाने पर ईशा ने बाथरूम का दरवाज़ा बंद कर दिया था. और इस दौरान, बाकी औरतें प्रिंसेस रूम की सजावट देखने में मगन हो गयी. आखिर उन सभी की भी सुनहरी यादें जुडी हुई है इस कमरे से. अन्वेषा की ही तरह एक दिन वो भी राजकुमारी बनी थी इसी कमरे में. पर इस ख़ुशी के बीच उन औरतों के ये नहीं पता था कि आज ये उनकी इंडियन लेडीज़ क्लब में आखिरी पार्टी होने वाली है. क्योंकि उनके बीच एक औरत है जो उन सब की ज़िन्दगी हमेशा के लिए बदल देगी.
क्रमश: …

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