इंडियन लेडीज़ क्लब: भाग ४

सज संवरकर अब अन्वेषा एक खुबसूरत औरत के रूप में कदम लेने ही वाली थी. और उस वक़्त एक औरत थी जो अकेले ख़ामोशी से अन्वेषा की तरफ देख रही थी. क्या चल रहा था उसके मन में?


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“अरे! बाहर जाकर घुमने फिरने की तो बहुत सी कहानियाँ है मेरे पास”, मधुरिमा ने औरतों के झूंड से कहा जो उसके आसपास मधुरिमा को घेरे खड़ी थी. अब जब अन्वेषा बाथरूम में ईशा के साथ कपडे बदल रही थी, तब तक दूसरी औरतें अपनी अपनी सहेलियों के संग गप्पे मार रही थी.

“पर एक दिन तो मुझे बड़ी अच्छी तरह याद है जब मैं सुमति को लेकर बाहर सब्जी खरीदने गयी थी.”, मधु ने कहा. “माँ!! नहीं… प्लीज़ वो दिन के बारे में मत बताना.”, सुमति हँस भी रही थी और अपनी माँ से विनती भी कर रही थी. “सुमति, कोई अपनी माँ से इस तरह से बात करता है?”, मधु ने शिकायती लहजे में कहा और अपनी कहानी जारी रखी. “अरी पता है बहनों तुमको तो सब कुछ.. एक अच्छी माँ होने के नाते, मैं तो चाहती थी कि सुमति एक कुशल गृहिणी बने. जो न सिर्फ किचन में खाना बनाना जानती हो, बल्कि बाहर सब्जी खरीद्टने वक़्त एक कुशल गृहिणी की तरह मोल भाव करना भी जानती हो.” मधु के चेहरे पर वो चिंता की शिकन और वो हाव भाव सभी को हंसा रहे थे.

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मधु वो किस्सा सुना रही थी जब वो और सुमति औरत बनकर बाहर सब्जी खरीदने गयी थी. उस दिन सुमति को बेहद शर्मिंदगी उठानी पड़ी थी.

“तो एक दिन हम दोनों ने यूँ ही घरेलु तरह की हलकी साड़ियाँ पहनी जैसे और औरतें सब्जी मार्किट जाते वक़्त पहनती है. मार्किट मेरे घर से १ कम दूर ही था तो मैंने सोचा की चलो पैदल ही चलते है. पर पूरे रास्ते सुमति घबराती रही और एक शब्द भी न बोली. अब तुम ही कहो बहनों, सड़क पर एक औरत के चलने पर ऐसा क्या घबराना? मैं तो न समझ सकी कि वो इतना घबरा क्यों रही है. अच्छी भली सुन्दर भी दिख रही थी.. आखिर मेरी बेटी जो ठहरी.”, मधु ने बड़े गर्व से कहा. पर उस दिन सुमति सचमुच में घबरायी हुई थी.. क्योंकि वो नहीं चाहती थी कि कोई उसे पहचान जाए की वो साड़ी पहने हुए एक आदमी है.

“मार्केट जाकर क्या हुआ आंटी?”, किसी ने मधु से पूछा. “खबरदार मुझे आंटी कहा!”, मधु ने गुस्सा दिखाया. “हाँ तो मैं कह रही थी.. कि जब हम मार्किट पहुचे तो हम सब्जियां ढूँढने लगी. अंत में जब सब सब्जियां बटोर चुकी थी हम दोनों तब मैंने सुमति को एक सुझाव दिया कि किस तरह सब्जी वाले से मोलभाव करना चाहिए. एक माँ हूँ और एक माँ अपनी बेटी को यह तरकीब नहीं सिखाएगी तो कौन सिखाएगा?”, मधु बोली. “माँ तुमने अब आगे की कहानी बताई तो मैं यहाँ एक पल भी नहीं ठहरूंगी.”, सुमति बोली. पर बाकी सभी औरतों ने मधु से कहानी आगे जारी रखने कहा.

“अरे आगे क्या.. मैंने सुमति से कहा कि ज़रा अपना पल्लू निचे सरकाकर अपना क्लीवेज दिखाए. यदि वो न करना हो तो पल्लू को इस तरह सरकाए कि उसके स्तन से भरा हुआ उसका ब्लाउज एक तरफ से दिखाई दे. तुमको तो पता है कि कोई भी आदमी तुम्हारी बात को टाल नहीं सकता यदि उसकी नज़र औरत के बूब्स पर पड़ जाए.”, मधु ऐसे कहने लगी जैसे की बड़ी ही शराफत भरी बात कही थी उसने. मधु की बातें सुनकर सभी जोर जोर से हँस रही थी. सुमति यह सब सुनकर थोड़ी नाराज़ हो रही थी. तो सुमति ने कहा, “पता है मेरी माँ ने उस दिन मेरे साथ क्या की थी? सबके सामने मेरी ही माँ ने मेरे पल्लू को निचे खिंच दिया था कि मेरा क्लीवेज दिखाई दे!”

“अरे तो क्या हुआ? ऐसी क्या गलत किया था मैंने? पता है बहनों, मेरी एक बात तक नहीं मानी सुमति ने उस दिन. कम से कम अपनी ब्रा का स्ट्रेप ही दिखा देती तो कम से कम ५० रुपये बच जाते हमारे उस दिन. पर मेरी बेटी मेरी बातें सुनती ही कहाँ है!”, मधु ने अपने सीने पे हाथ रखते हुए कहा जैसे वो कितनी ही दुखी माँ है. सुमति अब मुस्कुरा रही थी. उसने मधु को गले लगाकर कहा, “देख रही हो मेरी माँ को… ५० रुपये बचने के लिए मुझे अश्लीलता के लिए प्रेरित कर रही थी. ऐसी माँ तो मेरी दुश्मन को भी न मिले.”

“पर उसके आगे क्या हुआ?”, किसी ने पूछा. “होना क्या था.. मैं गैर-ज़िम्मेदार औरत थोड़ी हूँ भला. तो जब पैसे देने की बारी आई, मैंने सुमति की ओर देखकर जोर से कहा, ‘ओह सुमति! ज़रा देखना तो आज मेरी ब्रा का स्ट्रेप कुछ ज्यादा ही टाइट लग रही है.’ ऐसा कहते हुए मैंने उस सब्जीवाले के सामने ही अपनी ब्रा को अपने कंधे पर खींचते हुए ब्लाउज में अन्दर किया. अब संक्षिप्त में बताऊँ तो उस दिन २५ रुपये बचा लिए मैंने! मेरी जवानी के दिन होते न .. तो सच कहती हूँ .. वो सब्जीवाला तो ५० रुपये यूँ ही कम कर देता. और यह सुमति… उस दिन तो वो शर्म से लाल हो गयी थी.”, मधु बोली. और उसकी बातें सुन सभी औरतें जोर जोर से हँसने लगी. जब मधु साथ हो तो सभी यूँ ही हँसते थे उसकी हरकतों की वजह से.

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अन्वेषा एक सैटिन रोब पहन कर बाहर आई. लम्बे बालों का विग, हलकी लिपस्टिक, इनके साथ अन्वेषा को अब एक राजकुमारी सा महसूस हो रहा था. अब उसे आज की रात के लिए ख़ास ऑउटफिट पसंद करना था.

उसी हँसी के बीच तभी बाथरूम का दरवाज़ा खुला और वहां से पहले ईशा बाहर आई, जो अपने साथ उस शाम की राजकुमारी अन्वेषा को साथ लेकर आई. अन्वेषा ने उस वक़्त एक सैटिन का रोब पहना हुआ था जिसके अन्दर मैचिंग ब्रा और पेंटी पहनी हुई थी. अब उसे लम्बे बाल थे जिनको स्टाइल करना बाकी था, चेहरे पर हलके फाउंडेशन की लेयर थी और हलकी लिपस्टिक. इस के पीछे ईशा का ख्याल था कि अन्वेषा को शुरू से ही एक लड़की की तरह महसूस कराया जाए. और हुआ भी वैसा ही. अन्वेषा फूलो की तरह नाज़ुक कदमो के साथ चलते हुए बाहर आ रही थी.

“अन्वेषा.. तो तुम तैयार हो अपने लिए कपडे पसंद करने को?”, ईशा ने उससे पूछा. अन्वेषा एक दुल्हन की तरह शरमाते हुए हाँ में सर हिलाई. धीरे धीरे वो भी अब लड़की बन रही थी.

अन्वेषा ने पहले तो सभी चटक रंगों वाली भारी चमचमाती साड़ियाँ देखी. आखिर किसी भी भारतीय लड़की के लिए साड़ी की उसके दिल में ख़ास जगह होती है. उनकी बचपन की सबसे सुहानी यादें अपनी माँ और परिवार की दूसरी औरतों के साड़ी पहनने से जो जुडी होती है. और जब लडकियां उम्र में छोटी होती है, वो तो बस उस दिन का जैसे इंतज़ार कर रही होती है… जब वो बड़ी होकर ६ यार्ड की साड़ी अपने तन पर लपेटकर उसके सुख को महसूस कर सके. इंडियन लेडीज़ क्लब में ऐसी ही एक ख़ास साड़ी थी, लाल रंग की दुल्हन वाली, जो की अक्सर नए आने वाले सदस्यों का ध्यान खींचती थी. कुछ तो बात होती है लाल दुल्हन की साड़ी में जो भारतीय लडकियां उसकी तरफ आकर्षित होती है. इस साड़ी को सुमति ने खरीदी थी जो उसने कुछ साल पहले इस क्लब के शुभारम्भ के अवसर पर पहनी थी. तब से, न जाने कितनी ही नयी लड़कियों ने अपने पहले दिन उस साड़ी को चुना था. अन्वेषा ने भी उस साड़ी को हसरत भरी निगाहों से देखा. उसने आज से पहले कभी साड़ी नहीं पहनी थी, या कम से कम सलीके से तो नहीं, क्योंकि उसे साड़ी पहनना आता नहीं था. उसे डर था कि कही वो साड़ी पहनकर ठीक ढंग से चल न सकी तो. उसे अनुभव न होने की वजह से पता नहीं था कि एक बार पेटीकोट पहन लो तो साड़ी पहनकर चलना ज़रा भी मुश्किल नहीं होता.

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दुल्हन की लाल साड़ी में कुछ तो ख़ास है जो भारतीय लडकियां उसे अनदेखा नहीं कर सकती. शायद इसलिए इस क्लब की बहुत सी लड़कियों ने अपने पहले दिन इस साड़ी को चुना था. सुमति ने ये साड़ी इस क्लब के पहले दिन शुभारम्भ पर पहनी थी.

अन्वेषा सभी साड़ियों को पीछे छोड़ आगे बढ़ गयी. और साथ ही सभी सैटिन के इवनिंग गाउन को भी देख आगे बढ़ गयी. वो खुद इस वक़्त सैटिन के मखमली स्पर्श को अपने तन पर महसूस कर रही थी. उसने जो ब्रा और पेंटी पहनी थी, वो भी सैटिन सिल्क की थी, जो उसे अद्भुत आनंद दे रहे थे. और उसका सैटिन रोब तो उसकी स्किन के १ – १ इंच को रोमांचित कर रहा था. फिर अन्वेषा ने सोचा कि वो अनारकली पहनेगी. उसकी आँखों के सामने टंगी हुई सभी अनारकली सूट एक से बढ़कर एक थे. उसे अब एहसास हो रहा था कि किसी एक को चुनना मुश्किल होगा. उसने अपनी चॉइस अब एक हलकी गुलाबी चमकीली और दूसरी नारंगी जिसकी लाल बॉर्डर थी उस पर केन्द्रित की. दोनों ही भारी अनारकली थी जो की इतनी लम्बी थी कि पैरो पे हील तक आती. और उनके साथ के दुपट्टे तो और भी खुबसूरत थे. खुद को उन कपड़ो में इमेजिन करके ही अन्वेषा खुश हो रही थी. पर अब इनमे से एक कैसे चुने वो?

“हर लड़की का सबसे फेवरेट ऑउटफिट होता है. जब देखोगी तब तुम्हे तुरंत पता चल जायेगा.”, अन्वेषा को अंजलि की कही बात याद आ रही थी. ‘मेरा ऑउटफिट कहाँ है?’, अन्वेषा सोचने लगी. और तभी उसकी नज़र एक लहंगे पर पड़ी जैसा उसने पहले कभी नहीं देखी थी. लाल रंग का, दुल्हन के लिए ख़ास. और साथ में रत्न-जडित दुपट्टा भी था उसके साथ. उसे देखते ही एहसास हो गया कि यही है वो लिबास जो वो आज पहनेगी. हर लड़की का एक फेवरेट ऑउटफिट होता है. अन्वेषा मुस्कुरा दी और धीमी आवाज़ में लड़की की आवाज़ निकालने की कोशिश करते हुए बोली, “मुझे ये पसंद है.”

इन दोनों में से कौनसी अनारकली पसंद करेंगी आप?

“लेडीज़, अन्वेषा ने अपने कपडे पसंद कर लिए है. तो अन्वेषा का ट्रांसफॉर्मेशन शुरू किया जाए!”, मधु ने उत्साह में कहा. और जल्दी ही अन्वेषा के चारो ओर कुछ औरतें जमा हो गयी. जिनमे से दो ने अन्वेषा की कलाई पकड़ी और उसे उस ऊँची चेयर पर ले गए जहाँ उसका मेकअप होगा. अन्वेषा ने अपने आसपास सभी औरतो को देखा जो अपनी साड़ियों और लहंगो में दमक रही थी. उन्हें देख कर वो सचमुच राजकुमारी की तरह महसूस कर रही थी. और उसकी ख़ुशी की कोई सीमा नहीं थी. अब उसे समझ आ रहा था कि राजकुमारी होना क्या होता है. इंडियन लेडीज़ क्लब की लेडीज़ उससे झूठ नहीं कह रही थी. उन्हें सच मच स्पेशल होने का एहसास दिलाना आता है. और इन सभी औरतों के बीच इस राजकुमारी को सुरक्षित भी महसूस हो रहा था. कुछ देर पहले तक, वो एक युवक थी जो अपराचितो के बीच नर्वस था… पर अब वो राजकुमारी थी. वो धीमे धीमे मुस्कुराते हुए उस मेकअप चेयर तक बढ़ी. जब उसने कुछ औरतों को मुस्कुराते हुए देखा तो उसने शरमाकर नज़रे झुका ली. और जब नजरो के सामने उसकी लम्बी बालों की लटें आ गयी तो उन्हें अपने हाथों से एक ओर कर कान के पीछे करते हुए उसे जो स्त्रीत्व की अनुभूति हुई, वैसी पहले कभी नहीं हुई थी.

अन्वेषा का जादुई रूपांतरण अब शुरू हो चूका था.

 
और जल्दी ही ईशा ने अपने हाथो से अपने मेकअप का जादू दिखाना शुरू कर दिया. अन्वेषा अब पूरी तरह रिलैक्स थी. जब कोई और आपका मेकअप करता है, उस वक़्त की फीलिंग समझने के लिए उसे अनुभव करना बहुत ज़रूरी है. आज अंजलि का काम था कि वो अन्वेषा के हेयर स्टाइल करे. और उसकी मदद करने के लिए तृप्ति भी थी. उन दोनों ने कुछ देर कुछ डिस्कस किया कि कौनसी स्टाइल अन्वेषा पर अच्छी लगेगी. उन्होंने फिर लहंगे की ओर देखा और फिर तय किया कि उस लहंगे के साथ बेस्ट क्या लगेगा. अन्वेषा को खुद को अभी आईने में देखना मना था. क्लब की औरतें अन्वेषा के पूरे काया कल्प के बाद ही सरप्राइज देना चाहती थी. क्लब की कुछ औरतों ने अन्वेषा के पैरो के नेल्स पे नेल पोलिश लगाना शुरू कर दिया था तो किसी ने हाथो पे. और जब नेल पोलिश लग जाए और वो गीली हो.. और आप अपनी जगह से तब तक नहीं हिल सकती जब तक वो पूरी तरह सुख न जाए, तब पता चलता है सही मायने में कि राजकुमारी की तरह बैठना क्या होता है. अन्वेषा के पैरो के नाख़ून को थोड़ी सफाई की ज़रुरत थी तो लेडीज़ ने सोचा कि उसे पेडीक्योर भी दे दिया जाए पोलिश लगाने के पहले. फिर किसी ने कहा कि क्यों न नेल पोलिश को साफ़ कर सुन्दर लम्बे फेक नेल्स लगाये जाए! अन्वेषा देखना तो चाहती थी कि उसके हाथो और पैरो के साथ क्या हो रहा है पर अंजलि और तृप्ति उसके बाल बनाने में लगी हुई थी तो अन्वेषा झुक कर अपने नेल्स पूरी तरह देख नहीं सकती थी. पर उसे एक लम्बा नाख़ून दिखाई दे ही दिया.. “इतने लम्बे? इनके साथ मैं कुछ काम कैसे कर सकूंगी?”, वो सोचने लगी. पर राजकुमारी को कैसा काम भला?

शर्मीला आंटी वहीँ अन्वेषा के सामने मधु और सुमति के साथ खड़ी हुई थी. अचानक से वो हँसने लगी और मधु के कानो में कुछ कहा. मधु ने फिर अन्वेषा की ओर देखा. और फिर अपने माथे पर अपना हाथ रखते हुए सोचने लगी कि अब क्या किया जाए. अचानक ही दूसरी औरतों ने नोटिस किया और वो सब भी अन्वेषा की ओर देख कर जोर जोर से हँसने लगी. अन्वेषा को अब सचमुच लोगो के हँसने से शर्मिंदगी हो रही थी. तो मधु ने आखिर हिम्मत कर कहा, “प्लीज़ कोई ज़रा उसके रोब को बंद करो यार. देखो उसकी पेंटी से कुछ उभर रहा है. प्लीज़.. यहाँ हम सब शालीन औरतें है.” सुमति जोर जोर से हँस रही थी और बोली, “देखो तो कौन सी शालीन औरत कह रही है.. जिसको मार्किट में अपनी ब्रा और ब्लाउज दिखने में कोई शर्म नहीं आती.”

असल में अन्वेषा के साथ साथ उसके शरीर का वो पुरुष वाला अंग भी उत्साहित था. एक तो सैटिन की पेंटी पहनी हुई थी वो… और ऊपर से जो औरतें उसे तैयार कर रही थी… वो बेखबर थी कि कब उनका ब्लाउज या उनके स्तन अन्वेषा से टकरा जाते. भले उनके स्तन/ब्रेस्ट फॉर्म नकली हो पर उनका स्पर्श तो असली की तरह ही था. और जाने अनजाने वो स्पर्श अन्वेषा की पेंटी के अन्दर उत्साहित होकर उभर रहा था. वैसे भी १८-२५ की उम्र तक क्रॉस-ड्रेसिंग का ऐसा असर होता ही है.. आखिर हॉर्मोन का असर हावी होता है इस उम्र में. लगभग हर क्रोस-ड्रेसर ने ये अनुभव किया है और इसमें शर्माने की कोई बात नहीं होती है. ऐसा नहीं था कि अन्वेषा वहां किसी एक औरत के साथ कुछ ऐसा वैसा करना चाहती थी. उसका उसके तन पर कोई कण्ट्रोल नहीं था… बस. आखिर कब तक उसके तन को चूमती हुई सैटिन रोब के मखमली स्पर्श के असर को दबा कर रख पाती. उस वक़्त वहां की लेडीज़ जल्दी ही उस बात को भुलाकर अपने अपने काम में लग गयी. पर शर्मिंदगी में डूबी अन्वेषा उस बात को भूल नहीं पा रही थी. पर उसी शर्मिंदगी के असर से वो उत्साहित अंग भी धीरे धीरे शांत हो गया.

अंतिम रूपांतरण

अन्वेषा का मेकअप, बाल और नेल्स अब हो चूके थे. अब बस अंतिम रूपांतरण होना बाकी था. अन्वेषा को २ औरतों ने मेकअप चेयर से उठाया. ईशा अब अन्वेषा का सैटिन रोब उतारने को तैयार थी कि तभी मधु ने उसे रोका और कहा, “ईशा, एक बार देख लेना कि अन्दर कहीं कुछ और अभी भी उत्साहित तो नहीं है! मैं उसे एक बार फिर से नहीं देखना चाहती!” मधु की बात से सब फिर से खिलखिलाने लगी. और फिर अपनी हँसी को रोकते उनकी चूड़ियां खनकने लगी. ईशा पूरे मेकअप के साथ, सुन्दर स्टाइल किये हुए बालो के साथ अब सिर्फ ब्रा और पेंटी पहन कर सबके सामने थी. आश्चर्य की बात नहीं है कि उसे बेहद शर्म आ रही थी और उसने अपने दोनों हाथो से अपने चेहरे को तुरंत ढँक लिया था.

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अन्वेषा अब अपनी कमर के निचे उस भारी लहंगे को महसुस कर सकती थी. उस वजन से वो खुद को एक नाजुक स्त्री की तरह अनुभव कर रही थी.

तृप्ति तब अन्वेषा के पास आई और उसकी ब्रा में सॉफ्ट नर्म ब्रेस्ट-फॉर्म फिट कर दिए. अन्वेषा की आँखें अब भी बंद थी. वो अपने सीने पर नए ब्रेस्ट फॉर्म , अपने नए स्तनों के वजन को महसूस कर सकती थी, जिसे उसकी ब्रा संभालने की कोशिश कर रही थी.. “राजकुमारी अन्वेषा… अभी से अपने बूब्स को छूने की कोशिश मत करना!”, तृप्ति ने कहा. अन्वेषा एक बार फिर उस वजनी स्तनों के भार तले औरत होने की नयी अनुभूति में खो गयी. उसका अपने बूब्स को छूने का बड़ा मन हुआ और ऊपर से पहली बार उसने ब्रेस्ट फॉर्म उपयोग किये है. सचमुच लजाती हुई नारी के सामान महसूस करती अपना चेहरा छुपाये वहीँ खड़ी थी वो. वो जल्दी से कुछ पहनना चाहती थी क्योंकि वो नहीं जानती थी कि अब खुद के बूब्स के साथ न जाने फिर कब कुछ उसके तन को हो जाए. अंजलि और तृप्ति ने तब उसका लहंगा लाया और अन्वेषा के पैर उसमे डाले. आखिर अन्वेषा का निचला तन अब ढँक गया था. उस लहंगे के भारी वजन से वो निचे झुकने लगी. और फिर तृप्ति ने उस लहंगे का नाडा जोर से बाँध दिया, और अंजलि उस लहंगे के घेर को सजाने लगी.

तृप्ति ने कस कर अन्वेषा की चोली ऐसे बाँधी जिससे उसके ब्रेस्ट फॉर्म उसके तन का हिस्सा बन गए. वो नर्म मुलायम ब्रेस्ट फॉर्म वाकई में असली स्तन की तरह वजनी थे और अन्वेषा उन्हें छूने को बेताब थी.

अंजलि को पता था कि लहंगे को किस तरह से संवारना है. अन्वेषा को तो पता भी नहीं था कि यह लहंगा इतना भारी लगेगा उसे. पर यही तो हम क्रॉस-ड्रेसर के लिए सबसे अच्छी बात होती है, जितना ज्यादा भारी लहंगा होगा, उतनी ही मुश्किल उसे उठाकर चलने में आएगी… और उतनी ही नाज़ुक हम महसूस करेंगी. और वही तो हम चाहती है… एक नाज़ुक फुल की तरह महसूस करना. लहंगा पहन कर उसकी सैकड़ो चुन्नटों में चमचमाती बूटियों के साथ एक एक कदम हमें पूर्ण औरत बनाने की ओर ले जाता है. भारी लहंगा हमें धीमे चलने को मजबूर करता है.. और हम उस धीमे हो चुके पल में खुद औरत होने को अच्छी तरह महसूस कर पाती है.

इसके बाद तृप्ति ने अन्वेषा को चोली पहनाने में मदद की. तृप्ति ने उसकी चोली के पीछे से गाँठ बाँधने में मदद की. अब तंग हो चुकी चुस्त चोली में अन्वेषा के ब्रेस्ट फॉर्म उसके सीने से दबकर उसके अंग का अभिन्न हिस्सा बन गए थे… जैसे उसके अपने असली स्तन हो! वो अपने स्तनों को छूने को आतुर हो उठी. छूकर न सही पर कम से कम अपने सीने पर तो वो अनुभव कर पा रही थी. अब अन्वेषा अपने सपनो की औरत करीब करीब पूरी तरह बन चुकी थी. लम्बे बाल, मेकअप, नेल्स, खुबसूरत भारी लहंगा चोली, स्तन, सब कुछ तो हो गया था. उसकी आँखें और उसके हाव भाव हर पल और औरत की तरह होते जा रहे थे. अब यदि यह जादू नहीं था तो अन्वेषा को पता नहीं था कि और क्या जादू हो सकता है.

अंजलि और दूसरी औरतों ने तब एक बड़े से कलेक्शन से कुछ गहने उठा कर लायी जो अन्वेषा के लहंगा चोली से मैच करेंगे. “कैसा लग रहा है, अन्वेषा? तुम खुद को देखने को उतावली तो नहीं हो रही? बस कुछ देर और इंतज़ार कर लो.”, अंजलि ने कहा और उसके गले पर खुबसूरत सा हार पहनाया. अन्वेषा भी अब एक औरत की तरह अपने बालो को एक तरफ कर अंजलि को हार पहनाने का मौका दे रही थी. अन्वेषा अब नज़रे झुकाए शर्मा रही थी. “देखो तो राजकुमारी कैसे शर्मा रही है!”, मधु ने कहा. मधु सचमुच अन्वेषा की खूबसूरती को निहार रही थी. ईशा और दूसरी औरतों ने दर्जनों चूड़ियां अन्वेषा के हाथो पे पहनाई. हाय उन चूड़ियों और कंगन में तो अन्वेषा की कलाई और नाज़ुक लगने लगी. “आउच”, अन्वेषा ने धीमे से आवाज़ की जब कुछ चूड़ियां थोड़ी तंग महसूस हुई उसकी कलाई पर. “संभल कर लेडीज़, हमारी राजकुमारी बड़ी नाज़ुक है! न जाने इतने कंगनों का वजन वो संभाल भी सकेगी या नहीं.”, ईशा अन्वेषा को छेड़ते हुए बोली.

और फिर उन्ही औरतों ने अन्वेषा के कानो पर बड़े से झुमके पहनाये. अन्वेषा की तैयारी तो जैसे ख़त्म ही नहीं हो रही थी. हर पल कुछ नया उसे और ख़ुशी दे रहा था. एक औरत को भी न कितना कुछ करना पड़ता है सजने के लिए.. आज उसे एहसास हो रहा था. “अन्वेषा … यह झुमके कुछ समय बाद शायद तुम्हे कान में दर्द करेंगे. पर शायद तुम्हे पता होगा कि औरत होना इतना आसान भी नहीं होता न.”, अंजलि ने उसे चेताया. वो मीठा दर्द तो इस सुख के सामने कुछ भी न होगा. अन्वेषा ने सोचा. वैसे यदि दूसरी औरतों द्वारा सजाया जाना एक राजकुमारी जैसा अनुभव देता है, तो वहीँ जो औरतें उस राजकुमारी को सजाती है उनकी ख़ुशी भी कम नहीं होती. इंडियन लेडीज़ क्लब की हर औरत में एक छोटी लड़की छुपी हुई है जो बचपन से ही अपनी गुड़ियों को सजाना चाहती थी पर कभी यह कर न सकी. पर अब क्लब की नयी सदस्य को सजाकर वो अपनी बचपन की हसरतें पूरी करती है. और इस बात में कोई संदेह नहीं है कि उन्हें इस बात में बेहद ख़ुशी मिलती है.

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लहंगा चोली के साथ दुपट्टे को सही स्टाइल में पहनना सबसे ज़रूरी है. इसलिए शर्मीला आंटी वहां मदद करने को मौजूद थी.

लहंगा या चोली पहनना मुश्किल काम नहीं है, मुश्किल है उसके लम्बे और भारी से दुपट्टे को सही स्टाइल में प्लेट करके पहनना. आपके पास दुनिया की सबसे सुन्दर लहंगा चोली हो सकती है पर यदि आपने दुपट्टे को सही तरह से नहीं पहना तो आप अनुभवहीन और अप्रभावी दिखेंगी. इसलिए ऐसे समय पर शर्मीला आंटी की मदद की ज़रूरत होती थी. उन्होंने अन्वेषा के दुपट्टे को उसके दांयें जंधे पर बड़े ही प्यार से सजाया. और फिर प्लेट बनाकर उस दुपट्टे को अन्वेषा के ३६c साइज़ के वक्ष पर बड़े ही ध्यान से फैला कर पिन किया. दुपट्टे का पिछला हिस्सा फिर उन्होंने कमर से लपेटते हुए सामने लाकर राजरानी स्टाइल में पिन किया. इस रूपांतरण के हर एक कदम में, लहंगा, ब्रेस्ट फॉर्म, चोली, चूड़ियां, झुमके, दुपट्टा, अन्वेषा अपने अंग पर बढ़ते हुए वजन को महसूस कर सकती थी, और उसे उस वजन के मीठे दर्द से औरत बनकर बेहद सुकून मिल रहा था. इतने में अंजलि ने उसके सर पे एक बड़ा सा मांग-टीका भी सजा दिया.

अंजलि निचे बैठ कर अन्वेषा को यों पायल पहना रही थी मानो वो होने वाली दुल्हन की बड़ी बहन हो.

अंजलि ने फिर अपनी बड़ी पर्स से एक पायल निकाली और बोली, “ओके राजकुमारी! मुस्कुराओ अब बस आखरी गहना पहनाना रह गया है तुम्हे. अपने पांव आगे बढाओ.”, अंजलि बैठ कर खुद अपनी साड़ी का पल्लू संभालते हुए अन्वेषा के पाओं में पायल पहनाने लगी जैसे मानो वो होने वाली दुल्हन की बड़ी बहन हो. अंजलि ने ऊपर देख अन्वेषा की आँखों को देख मुस्कुरायी. अन्वेषा को यकीन नहीं हो रहा था कि इसी प्यारी बहन सी अंजलि के बारे में वो सोच रही थी वो फ़्लर्ट कर रही थी उसके साथ. अब मधु अन्वेषा के पास आई और उसे वात्सल्य से भर कर गले से लगा ली. और फिर उसने अपने दोनों हाथों से एक दुल्हन की माँ की तरह अन्वेषा के सर से नज़र उतारने की रस्म पूरी की. मधु ने फिर चांदी के रंग की सैंडल अप्पने साथ लायी और अन्वेषा के पैरो के आगे रख कर बोली, “अन्वेषा बेटी. अब तुम्हारी बारी है एक पूर्ण औरत के रूप में पहला कदम लेने के. आओ! कदम बढाओ और यह सैंडल पहनो.”

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अन्वेषा ने एक पूर्ण औरत के रूप में अपना पहला कदम सैंडल पहनने को उठाया. जोश में वो काँप रही थी.

अंजलि ने अन्वेषा का हाथ पकड़ा जब अन्वेषा ने अपने पहले कदम बढ़ाये. अन्वेषा का अंग अंग रोम रोम ख़ुशी से रोमांचित थी. उसकी सैंडल में एक इंच की हील थी और अंजलि वहां उसकी मदद के लिए थी कि कहीं सैंडल की हील को अन्वेषा संभाल न सके. ईशा ने अन्वेषा के लहंगे को ज़रा ऊपर उठाया ताकि अन्वेषा कम से कम अपने पैरो को देख सके सैंडल पहनते वक़्त. कभी कभी लहंगे का बड़ा सा घेरा लड़की को खुद के पैरो को देखने नहीं देता. अन्वेषा ने जैसे ही कदम लिया… उसकी पायल छनक उठी, चूड़ियां कंगन खनक उठे, लहंगे के अन्दर की अनगिनत लेयर में सरसराहट होने लगी और उसके झुमके दमक उठे, नेकलेस जगमगा उठा. और अन्वेषा खिल उठी! उसके गहनों और कपड़ो की हर एक आवाज़ जैसे उसके कानो में मधुर संगीत था. और फिर अगला कदम…और अब दोनों सैंडल वो पहन चुकी थी. और जब उसने पैरो से नज़रे उठा कर सामने देखा तो उसकी आँखों के सामने सबसे खुबसूरत लड़की खड़ी थी. उसने कई बार कल्पना तो की थी कि ये लड़की कैसे दिखेगी पर जो उसकी आँखों के सामने थी वो तो उसकी कल्पना से भी परे खुबसूरत थी. इंडियन लेडीज़ क्लब की औरतों ने चुपके से उसके सामने एक बड़ा सा आइना लाकर खड़ा कर दिया था जिस पर अन्वेषा की नज़र तब पड़ी जब उसने सैंडल पहन कर अपनी नज़रे उठायी और खुद को सामने देखा. लेडीज़ क्लब की औरतें जानती थी कि नए सदस्य को स्पेशल ट्रीटमेंट कैसे देना है. खुद को आईने में एक खुबसूरत औरत के रूप में देख, अन्वेषा के आँखों में ख़ुशी के आंसू थे. आज उसकी औरत के रूप में नयी ज़िन्दगी शुरू हो रही थी. और इस ज़िन्दगी की शुरुआत में उसका स्वागत करने के लिए क्लब की सभी औरतों ने उसका ताली बजाकर स्वागत किया.

इसी तालियों की गडगडाहट के बीच, एक औरत थी, जो कमरे एक कोने में अकेले खड़ी थी, और खामोशी से सब कुछ होते देख रही थी. वही तो थी जिसकी वजह से अन्वेषा के लिए यह ख़ास पल संभव हो सका, और न जाने इस क्लब की कितनी ही औरतों के सपने साकार किये थे उसी की मेहनत ने. पर आज उसके दिल-दिमाग में कुछ और ही चल रहा था. वो लोगो से कुछ कहना चाहती थी पर उसे समझ नहीं आ रहा था कि कैसे कहे.

क्रमश: …

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< भाग ३ भाग ५ >

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We are dedicated to bringing you the best crossdressing stories with indian context. We have several exciting stories that appeal to crossdressers of all kinds. While we try our best to maintain the quality of our stories, occasionally we are unable to do the best editing or use the best pictures to go with the story. Thus, we have three different tiers of stories. If you are new to our blog, we suggest getting a taste of our stories starting from the Platinum collection, and then try reading stories from other collections too.

हम समर्पित है आपके लिए सिर्फ और सिर्फ बेस्ट क्रॉसड्रेसिंग कहानियाँ लाने के लिए. और हमारे पास ऐसी बहुत सी कहानियाँ है जो सभी तरह के क्रॉसड्रेसर को पसंद आएगी. हमारी पूरी कोशिश होती है कि सभी कहानियों की क्वालिटी बहुत अच्छी हो, पर कभी कभी समय के अभाव में कुछ कहानियों की एडिटिंग में कोई कमी रह जाती है. इसलिए हमने कहानियों को तीन लेवल में विभाजित किया हुआ है. यदि आप इस ब्लॉग पर नए आये है तो हम कहेंगे कि आप हमारे प्लैटिनम संग्रह से शुरुआत कीजिये, और फिर दुसरे संग्रह से कहानियाँ पढ़े.

मुक्ति

एक कहानी मुक्ति की जो हर क्रॉसड्रेसर के अन्दर छुपी हुई औरत को बयान करती है.


कृपया ऊपर दिए गए स्टार रेटिंग आप्शन का प्रयोग कर इस कहानी को रेटिंग अवश्य दे!

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एक ख़ुशी का पल: मुझे बेहद गर्व हो रहा इस कहानी को प्रस्तुत करते हुए. इस कहानी की लेखिका देविका सेन है जिन्होंने यह कहानी हमारे First expression challenge के जवाब में लिखी थी. जब बात होती है एक क्रॉस-ड्रेसर के रूप में हमारे अपने आत्म-विश्लेषण की और हमारे अन्दर छुपे हुए पुरुष और स्त्री को समझने की, तो इस विषय में यह कहानी इस ब्लॉग की सभी कहानियों में सर्वश्रेष्ट है. इस विषय पर मेरी एक और पसंदीदा कहानी है जिसका नाम है ‘दूसरी औरत‘  (लेखिका: अंकिता शर्मा). जहाँ  दूसरी औरत कहानी अपनी परिस्थिति को स्वीकार करने की है, वहीँ यह कहानी मुक्ति पर आधारित है जो हमारी बाहर आने की तीव्र इच्छा को दर्शाती है. इस कहानी ने मेरे दिल को छुआ है, पर मुझे यकीन नहीं है कि मैं इसका हिंदी अनुवाद इतने बेहतर तरीके से कर सकुंगी जैसी यह कहानी इंग्लिश में है. फिर भी मेरा यह प्रयास शायद आपको पसंद आये.

अनुपमा त्रिवेदी


सालो की प्रैक्टिस और तपस्या ने आखिर इस साहसिक कदम के लिए रास्ता बना ही दिया. इस बारे में निर्णय लेने के लिए मैं काफी समय से सोच रही थी, पर अब सालो से अपने कमरे में बंद रहने के बाद, अब जब मुझे बाहर आना था तो मैं इसे छोटे मोटे तरीके से नहीं करना चाहती थी. मेरे लिए यह एक बड़ा पल होने वाला था और उतने ही शानदार तरीके से मैं अब बाहर आने को आतुर थी. अब जब निर्णय ले ही लिया था, तो अब सवाल यह था कि आखिर किसके सामने सबसे पहले आऊँ मैं? कोई ऐसा व्यक्ति जो न सिर्फ आपको स्वीकार करे बल्कि कोई ऐसा जो आप को औरत के रुप में देख कर खुद उस पल की खुशियों को संजोये. आखिर किसी अनजान बिना चेहरे वाले लोगो के सामने आना भी कोई बड़ा पल हुआ? वो तो केवल एक मजबूरी होगी.  और मैं किसी मजबूरी में बाहर नहीं आना चाहती थी, मैं आना चाहती थी क्योंकि मुक्ति मेरे दिल की ख्वाहिश थी.

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Coming Out

A story of liberation that vividly describes the inherent woman within each cross-dresser. A must read!


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इस कहानी को हिंदी में पढने के लिए यहाँ क्लिक करे

A Special Moment: We are really really proud to present this fascinating story from a very talented Devika Sen who submitted this in response to our First expression challenge. When it comes to self-reflection about being a crossdresser and understanding the inherent duality within us, this is the best story we have on our blog. My other personal favorite story on this subject is ‘The other woman‘ by Ankita Sharma. While The Other Woman was about accepting the circumstances, this story is about liberation, and it vividly expresses the desire to come out. This story really touched me, and I hope it will touch your heart too.

Anupama Trivedi


Years of practice and tutorials finally paved the way for this bold step. I had been mulling over this decision for a long long time, but after being trapped within the confines of your closet for what seems like an eternity, you just don’t come out one day willy-nilly. The lady wanted to make the event an occasion. After the decision was made, the only question left was to who. You need to come out to a person who will accept and cherish you as the woman you are, because coming out to a faceless nameless populace is not romantic, it’s an action taken out of compulsion. I was not coming out because I felt compelled to, I was coming out because I wanted to. Continue reading “Coming Out”

Caption: James Bond

A very short crossdressing story about the unforgettable Halloween I had.


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English

“How would you like to dress up for halloween this year?”, my girlfriend asked me.

“May be something from the James Bond theme”, I said.

I didn’t know that she would make me a hot bond girl with “him” dressed as James Bond standing besides me. I loved being on the side of my “hero”!

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हिंदी

“इस हेलोवीन पे तुम क्या पहनना चाहोगे?”, मेरी गर्लफ्रेंड ने मुझसे पूछा.

“शायद कुछ जेम्स बांड थीम पर आधारित”, मैंने कहा.

मुझे नहीं पता था कि वो मुझे एक हॉट बांड गर्ल बनाकर खुद मेरे बगल में जेम्स बांड बन कर खड़ी होगी. पर अपने “हीरो” के साथ खड़ी होकर मैं बहुत खुश और सेक्सी महसूस कर रही  थी!

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मैं परिणिता: अंतिम भाग

रात हो चुकी थी| हम पति-पत्नी खाना खा चुके थे और मैं बर्तन धोकर अब बस सोने के लिए तैयार थी| मैं जैसे ही अपने बेडरूम पहुंची उन्होंने मुझे कस के सीने से लगा लिया| मैं जानती थी कि वो क्या चाहते थे|


अब तक आपने मेरी कहानी में पढ़ा: यह कहानी है मेरी भावनाओं की, एक आदमी से औरत बनकर जो भी मैंने अपने बारे में समझा| मेरे दिल से निकली इस कहानी में प्यार है, सुकून है, सेक्स भी है, और औरत होना क्या होता उसकी सीख भी| जब से होश संभाला है, मैं जानती हूँ कि मेरे अंदर एक औरत बसी हुई है। पर दुनिया की नज़र में मैं हमेशा प्रतीक, एक लड़का बनकर रही। कुछ साल पहले जब मेरी शादी परिणीता से हुई, तो उसे भी मेरे अंदर की औरत कभी पसंद न आयी। हम दोनों पति-पत्नी US में डॉक्टर बन गए। पर मेरे अंदर की औरत हमेशा बाहर आने को तरसती रही। किसी तरह मैं अपने अरमानों को घर की चारदीवारियों के बीच सज संवर कर पूरा करती थी। पर आज से ३ साल पहले ऐसा कुछ हुआ जो हम दोनों को हमेशा के लिए बदल देने वाला था। उस सुबह जब हम सोकर उठे तो हम एक दूसरे में बदल चुके थे। मैं परिणीता के शरीर में एक औरत बन चुकी थी और परिणीता मेरे शरीर में एक आदमी। हमारे नए रूप में सुहागरात मनाने के बाद हमारा जीवन अच्छा ही चल रहा था, और एक औरत के बदन में मैं बेहद खुश थी| पर परिणीता, जो अब मेरी पति थे, वो तो पुरुष के तन में एक औरत ही थी| और उसी औरत की तलाश में अब मेरे पति क्रॉस ड्रेसर बन गए थे और उन्होंने अपने लिए नाम रखा था ‘अलका’! अब मेरी कहानी का अंतिम भाग –

६ महीने बाद

रात हो चुकी थी| हम पति-पत्नी खाना खा चुके थे और मैं बर्तन धोकर अब बस सोने के लिए तैयार थी| मैं जैसे ही अपने बेडरूम पहुंची उन्होंने मुझे कस के सीने से लगा लिया| मैं जानती थी कि वो क्या चाहते थे|

“नहीं, अल्का! प्लीज़ अभी नहीं”, मैंने कहा|

हाँ, पिछले ६ महीने में काफी कुछ बदल चूका था| अब मेरे पति जैसे ही घर लौटते, वह तुरंत स्त्री के कपडे पहनकर अल्का बन जाते| अब तो उन्होंने अपने बाल भी लम्बे कर लिए थे और तन को पूरी तरह से वैक्स करके उनकी त्वचा बेहद स्मूथ हो गयी थी| वो अब बेहद ही आकर्षक स्त्री बन चुके थे| और आज तो उन्होंने रात के लिए सैटिन की सेक्सी स्लिप पहन रखी थी| मैं जानती थी कि आज रात उनका इरादा क्या था| इसलिए तो उन्होंने एक बार फिर मुझे अपनी बांहों में जोर से पकड़ लिया|

मैंने धीरे से दर्द में आंह भरी और कहा, “कम से कम मुझे साड़ी तो बदल लेने दो|” मैं नखरे करने लगी| आखिर पत्नी जो ठहरी, एक बार यूँ ही थोड़ी मान जाती चाहे मेरा भी दिल मचल रहा हो|

“परिणीता, तुम तो जानती हो कि तुम मुझे साड़ी में कितनी सेक्सी लगती हो”, अलका ने कहा और मुझे जोरो का चुम्बन दिया| उफ्फ, उनके सेक्सी तन पर वो सैटिन नाईटी का स्पर्श और उनका चुम्बन मुझे उत्तेजित कर गया| अब तो अल्का मुझे प्रतीक नहीं परिणीता कहती थी, जो मुझे और भी सेक्सी लगता था| इन ६ महीनो में मैं तो लगभग भूल ही गयी थी कि मैं कभी प्रतीक एक आदमी हुआ करती थी|

अल्का ने मुझे दीवार से लगाकर पलटा और मेरी पीठ पर किस करने लगी और मेरे स्तनों को अपने दोनों हाथो से मसलने लगी| मैं आँखें बंद करके आंहे भरने लगी| आखिर क्यों न करती मैं ऐसा? मेरे ब्लाउज पर उनके हाथ जो कर रहे थे मुझे मदहोश कर रहे थे| मेरे ब्लाउज से झांकती नंगी पीठ पर उनकी सैटिन नाईटी/स्लिप  का स्पर्श और चुम्बन मुझे उकसा रहा था|

उनकी स्लिप उनकी कमर से थोड़ी ही नीचे तक आती थी| और उसके अन्दर पहनी हुई सुन्दर सैटिन की पैंटी में उनका तना हुआ पुरुष लिंग मेरे नितम्ब पर मेरी साड़ी पर से जोर लगा रहा था| अलका आकर्षक स्त्री होते हुए भी आखिर एक पुरुष थी| मैं अपनी साड़ी पर उनका लिंग महसूस करके मचल उठी| मैंने अपने हाथ से उनकी स्लिप को उठा कर उनकी पैंटी में उनके लिंग को पकड़ लिया| सैटिन में लिपटा हुआ वो  बड़ा तना हुआ लिंग बहुत ही सेक्सी महसूस हो रहा था|और उनकी नाज़ुक पैंटी उस मजबूत तने हुए लिंग को अन्दर अब रोक नहीं पा रही थी| फिर  मैंने भी अपने हाथो से उसे पैंटी से बाहर निकाल कर आजाद कर दिया|

“अल्का, तुम तो पूरी तरह तैयार लग रही हो|”, मैंने आंहे भरते हुए कहा| पर अल्का तो मदहोशी से मेरी गर्दन को चूम रही थी| उसने मेरी बात का जवाब एक बार फिर मेरे स्तनों को ज़ोर से दबा कर दिया| आह, उसके मेरे स्तन को दबाने से होने वाले दर्द में भी एक मिठास थी|

अल्का ने मुझे फिर ज़ोरों से जकड लिया, अब उसके स्तन मेरी पीठ पर दबने लगे| मैं तो बताना ही भूल गयी थी कि अल्का की औरत बनने की चाहत में उसने ३४ बी साइज़ के ब्रेस्ट इम्प्लांट ऑपरेशन द्वारा लगवा लिए थे| अब तो वह भी बेहद सुन्दर सुडौल स्तनों वाली औरत थी| मेरे लिए तो मानो एक सुन्दर सपना था यह| अल्का के स्तन और उसका पुरुष लिंग, मुझे एक साथ एक औरत और एक पुरुष से प्रेम करने का सौभाग्य मिलने लगा था|

कामोत्तेजना में अल्का ने अपनी पैंटी उतार दी और मुझे बिस्तर के किनारे ले जाकर झुका दी| और तुरंत ही मेरी साड़ी और पेटीकोट को उठाकर मेरी पैंटी उतारने लगी| कामोत्तेजित अल्का अब रुकने न वाली थी और मैं भी उतावली थी कि कब उसका लिंग मुझमे प्रवेश करेगा| अल्का ने मेरी पैंटी उतार कर अपनी उँगलियों से मेरी योनी को छुआ| उसके लम्बे नाख़ून और लाल रंग की नेल पोलिश में बेहद सेक्सी लग रहे थे| मुझे छेड़ते छेड़ते उसने अपनी ऊँगली मेरी योनी में डाल दी| मैं उत्तेजना में उन्माद से चीख उठी| “अब और न तरसाओ मुझे अल्का!”, मैं मदहोशी में उससे कहने लगी|

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जहाँ मैं साड़ी में खिल रही थी वहीँ अल्का अपनी सैटिन की स्लिप में गहरे रंग की लिपस्टिक के साथ बेहद सेक्सी लग रही थी| अल्का कोई और नहीं मेरे पति थे! और हम दोनों एक दुसरे के साथ रात बिताने को आतुर थे|

अल्का भी बिलकुल तैयार थी और देखते ही देखते उसका लिंग मेरी योनी को चुमते हुए मुझमे पूरा प्रवेश कर गया| मैं तो जैसे परम आनंद को महसूस कर रही थी| वो मेरी नितम्ब को अपने हाथो में पकड़ कर आगे पीछे करती तो मैं भी अपनी कमर को लहराते हुए और जोरो से आंहे भरती| और उसके हर स्ट्रोक के साथ हम दोनों के स्तन झूम उठते| मेरे स्तन तो अब भी ब्लाउज में कैद थे पर अल्का के स्तन उसकी सैटिन स्लिप में उछल रहे थे| अब अल्का खुद अपने एक हाथ से अपने ही स्तनों को मसलने लगी| और अपने ही होंठो को काटने लगी| गहरी लाल रंग की लिपस्टिक में उसके होंठ बेहद कामुक हो गए थे| वहीँ मैं अपनी साड़ी में लिपटी हुई इस पल का आँख बंद करके आनंद ले रही थी|

मैंने पलट कर देखा तो अल्का अब भी अपने स्तनों को मसल रही थी| उसे देख कर मेरा भी मन उसके स्तनों को चूमने को मचल उठा| मैं अब उठ कर अपनी साड़ी से अपने पैरो को ढककर अपने घुटनों पर खड़ी हो गयी और उसकी ओर चंचल नजरो से देखने लगी| शायद वो भी इंतजार कर रही थी कि कब मैं उसके स्तनों को चुमुंगी| फिर क्या था? मैं  उसके एक स्तन को अपने हाथो से पकड़ कर छूने लगी और उसे तरसाने लगी| उसके मुलायम सुडौल स्तन पर फिसलती हुई सैटिन स्लिप पर छूने का आनंद ही कुछ और था| उसने भी अपने दोनों हाथो से मेरे स्तनों को पकड़ लिया| मैंने उसका एक स्तन उसकी स्लिप से बाहर निकाला और फिर अपने होंठो से चूम ली| आनंद में अल्का ने अब अपनी आँखें बंद कर ली थी| मुझे एहसास था कि उसे बेहद मज़ा आ रहा है क्योंकि वो उस आनंद में मेरे स्तनों को और जोर से दबाने लगी| फिर अपनी जीभ से मैंने उसके निप्पल को थोडी देर चूमने के बाद, अपने दांतों से उसके निप्पल को काट दिया| अल्का अब दीवानी हो कर कहने लगी, “ज़रा और ज़ोर से कांटो”| फिर उसने मेरे सर को पूरी ताकत से अपने सीने से लगा लिया| मैंने अपने दुसरे हाथ से उसका लिंग पकड़ लिया| कहने की ज़रुरत नहीं है पर हम दोनों मदहोश हो रही थी| मैं तो सालो से एक स्त्री के साथ सेक्स करने में सहज थी और इस नए रूप में अब पुरुष तन का आनंद लेना भी सिख गयी थी मैं|और अल्का तो एक ही शरीर में स्त्री और पुरुष दोनों ही थी|

उसी उन्माद में फिर हम दोनों एक दुसरे को चूमने लगी| अल्का ने मेरा सर अपने हाथो में पकड़ कर मुझे चूमना शुरू कर दिया था| उसकी सैटिन स्लिप का मखमली स्पर्श मुझे उतावला कर रहा था और वहीँ मेरी नाज़ुक काया पर लिपटी हुई साड़ी उसे दीवाना कर रही थी| और हम दोनों के स्तन एक दुसरे को दबाते हुए मानो खुद खुश हो रहे थे| अल्का ने मेरे सीने से मेरी साड़ी को उठा कर मेरे ब्लाउज के अन्दर हाथ डाल लिया| वह जो भी कर रही थी वो मेरे अंग अंग में आग लगा रहा था| और उसका लिंग मेरे हाथो में मानो और कठोर होता जा रहा था|

अल्का ने एक बार फिर मेरी साड़ी को कमर तक उठा लिया| उसका इरादा स्पष्ट था| अब उसका लिंग मेरी योनी में सामने से प्रवेश करने वाला था| मैं भी बस उसी पल के इंतजार में थी| मैंने अपना पेतीकोट उठा कर उसके लिए रास्ता भी आसान कर दिया था| साड़ी की यही तो ख़ास बात है, बिना उतारे ही आप झट से प्यार कर सकते है| यह मैं भी जानती थी और अल्का भी| अल्का ने फिर धीरे से अपना लिंग मेरी योनी से लगाया| और  मैंने उस बड़े से लिंग को अपने अन्दर समा लिया| उसके अन्दर आते ही मैं और जोर जोर से आवाजें निकालने लगी| इस दौरान हम दोनों एक दुसरे के स्तन दबाकर उन्मादित थे| धीरे धीरे हमारी उत्तेजना बढती गयी, दोनों की आवाजें तेज़ होती गयी, हवा में अल्का के स्तन उसकी स्लिप से बाहर आकार झुमने लगे, और दोनों की आँखें बंद हो गयी| और उस उत्तेजना की परम सीमा पर पहुच कर हम दोनों ने एक दुसरे का हाथ कस कर पकड़ लिया| और फिर अल्का का एक आखिरी स्ट्रोक और हम दोनों एक ही पल में … बस मुझे कहने की ज़रुरत है क्या? यह वो रात थी जब मेरे तन में एक नए जीवन का प्रवेश हुआ| हाँ, उस रात के बाद अब मैं माँ बनने वाली थी!

पिछले ६ महीने

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अल्का और मैं, हम दोनों बहुत अच्छी सहेलियाँ बन गयी थी!

पिछले ६ महीने हम पति पत्नी के जीवन में नयी खुशियाँ और नई परीक्षा लेकर आया था| मेरे पति अब घर आकर तुरंत स्त्री के कपडे पहनते, मेकअप करते और अल्का बन जाते| मेरे पति अब क्रॉस ड्रेसर बन चुके थे और मैं इस स्थिति से खुश थी| मुझे एक सहेली मिल गयी थी| जब भी मौका मिलता हम दोनों सहेलियाँ बाहर शौपिंग करने या घुमने फिरने निकल पड़ती| दोनों को एक बार फिर जैसे नए सिरे से प्यार हो गया था| हम दोनों के कद काठी अलग अलग थी तो ड्रेस अलग अलग ही खरीदते पर साड़ियां अब साथ मिल कर लेते थे| पर ब्लाउज हमें अलग अलग सिलवाने पड़ते थे| जहाँ मैं अब एक औरत बन कर थोड़े पारंपरिक से ब्लाउज कट सिलवाने लगी थी, वहीँ वो ज्यादा सेक्सी ब्लाउज सिलवाने लगे थे| पुरुष तन को स्त्री के रूप में निखारने में वो कोई कमी नहीं रहने देना चाहते थे|

पर समय के साथ उनकी स्त्री बनने की इच्छा तीव्र होती जा रही थी| उन्होंने बाल भी बढ़ाना शुरू कर दिया था| पर मुझे शॉक उस दिन लगा जब उन्होंने घर लौट कर कहा कि अब वो ऑपरेशन करा कर पूरी तरह स्त्री बनना चाहते है| मैं तो एक पल के लिए अन्दर ही अन्दर टूट गयी थी क्योंकि चाहे जो भी हो, अब मैं एक स्त्री थी और मुझे सम्पूर्ण करने वाले पति यानी पुरुष का साथ चाहिए था| पर उन्होंने बेहद प्यार से मुझे गले लगाया और फिर मुझसे इस बारे में और बात की| फिर हमने मिलकर निर्णय लिया कि वह ब्रेस्ट इम्प्लांट करवाएंगे पर पूरी तरह लिंग परिवर्तन नहीं कराएँगे| मैं नहीं चाहती थी की वो अपना पूरा पुरुषत्व ख़त्म कर दे| ऑपरेशन के बाद ३४ बी साइज़ के उनके स्तन इतने बड़े भी नहीं थे कि दिन में अपनी नौकरी में वो पुरुष रूप में जाए तो छुप न सके| पर इतने छोटे भी न थे उनका आनंद न लिया जा सके| मेरा जीवन अब बेहद सुखी था| और उनका भी| अब मुझे पूरी तरह औरत होने का अनुभव करने में बस एक ही कमी रह गयी थी, मैं माँ बनना चाहती थी| मुझे उन्हें मनाने में थोडा समय लगा पर एक दिन वो मान ही गए|

अगले ९ महीने

अपने शरीर में पलती हुई एक नयी जान को लेकर चलने के वो ९ महीने का अनुभव शायद मेरे जीवन का अब तक सबसे प्यारा अनुभव रहा| इस दौरान मुझे अल्का के रूप में मुझे समझने वाली सहेली मिली तो पति के रूप में सहारा बनने वाला पुरुष भी| पर धीरे धीरे उन्होंने अल्का बनना कम कर दिया था, क्योंकि वो जानते थे कि अब मुझे एक पुरुष का सहारा चाहिए था| आखिर वो प्यार भरे ९ महीनो में ,अपने अन्दर पलते हुए जीवन को अब बाहर लाने का वक़्त आ गया था| बड़े प्यार से ९ महीने पाला था उसे, पर अब मैं हॉस्पिटल में प्रसव पीड़ा में थी| उस दर्द में तड़पते हुए तो मानो एक पछतावा हो रहा था कि क्यों मैंने माँ बनने का निर्णय लिया| पर उस पीड़ा को तो सहना ही था|अब उससे पीछे नहीं पलट सकती थी|

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9 महीने अपनी कोख में एक जान को पालना मेरे जीवन का सबसे प्यारा अनुभव था

मेरी प्रसव पीड़ा पूरे १४ घंटे रही| पर उसके बाद जब डॉक्टर ने मेरे हाथो में एक नन्ही सी जान को सौंपा तो मेरी आँखों में ख़ुशी के आंसू आ गए| मैं एक बेटी की माँ बन गयी थी| माँ, सबसे प्यारा अनुभव| औरत होने के सारे सुख दुःख इस अनुभव के सामने फीके है! मैंने अपनी बेटी को प्यार से गले से लगा लिया| मैं भावुक होकर सारा दर्द भूल चुकी थी| इसके बाद मुझे नर्स ने सिखाया कि बच्चे को दूध कैसे पिलाना है| उस बच्ची ने जब मेरे स्तन से दूध पीया तो जैसे मेरे अन्दर से प्यार की अनंत प्रेम धारा बह  निकली| मैं आँखें बंद करके उस प्यार को महसूस करने लगी| जब यह सब हो रहा था तब मेरे पति मेरे साथ ही थे| वो बहुत खुश थे पर उनकी आँखों में मैं एक बात देख सकती थी| उनके अन्दर हमारा शरीर बदलने के पहले वाली पत्नी परिणीता थी, जो सोच रही थी कि वो भी कभी माँ बन सकती थी और यह सुख वो भी पा सकती थी| पर किस्मत ने उनको अब आदमी बना दिया था| मैंने उनके दिल की बात सुनकर उन्हें पास बुलाकर कहा, “सुनो, अपनी बेटी को नहीं देखोगे?” उन्होंने प्यार से बेटी को गले लगा लिया| फिर मैंने उनके कान में धीमे से कहा, “हमारी बेटी भाग्यशाली है कि उसके पास एक पिता और दो माँ है!” मेरी बातें सुनकर उनकी आँखे भी नम हो गयी| उन्होंने कहा, “हाँ! और हमारी भाग्यशाली बेटी का नाम होगा प्रतीक और परिणीता की दुलारी “प्रणिता”!”

कुछ दिनों बाद

अब हम पति पत्नी घर आ गए थे| प्रणिता को दूध पिलाकर मैं उसे अपनी बगल में सुलाकर सोने को तैयार थी| वो भी आज बड़े दिनों बाद अल्का बन कर मेरी बगल में सोने आ गए| उन्होंने एक मुलायम सा गाउन पहना हुआ था उन्होंने मुझे प्यार से गले लगाकर गुड नाईट कहा और हमारा तीन सदस्यों का परिवार चैन की नींद सो गया|

अगली सुबह जब मैं उठी तो मेरे चेहरे पर खिड़की से सुनहरी धुप आ रही थी| लगता है मैं ज्यादा देर सो गयी थी| इतनी गहरी नींद लगी थी उस रात कि सुबह होने का अहसास ही न रहा| आज कुछ बदला बदला सा लग रहा था| अब तक मैंने अपनी आँखे नहीं खोली थी| पर मेरे स्तन आज हलके लग रहे थे जबकि उन्हें दूध से भरा होना चाहिए था| फिर भी अंगडाई लेती हुई जब मैंने आँखे खोली तो जो द्रिश्य था उसको देख कर आश्चर्य तो था पर ख़ुशी भी| मेरी आँखों के सामने मेरी पत्नी परिणीता बैठी हुई थी और उसकी गोद में हमारी बेटी प्रणिता सो रही थी| परिणीता ने ख़ुशी से मेरी ओर पलट कर देखा और चहकते हुए बोली, “हम फिर से अपने अपने रूप में आ गए प्रतीक! मैं फिर से परिणीता बन गयी हूँ और तुम मेरे पति प्रतीक!”

मैंने खुद को देखा तो मैंने वो गाउन पहना हुआ था जो कल रात मेरे पति पहन कर सोये थे| मैं फिर से आदमी बन गयी थी| मुझे एक पल को तो यकीन ही नहीं हुआ| इस नए बदलाव का मुझ पर क्या असर हुआ? क्या मुझे इस बात का दुख था कि अब मैं औरत नहीं थी? बिलकुल नहीं, मुझे बल्कि बेहद ख़ुशी थी| परिणीता की ख़ुशी देख कर स्त्रि का तन खोने का मुझे कोई दुख नहीं था| अब मैं फिर से एक क्रॉस ड्रेसर आदमी बनने को तैयार थी| पर अब मेरे पास वो कुछ था जो पहले न हुआ करता था| अब मेरे पास ऐसी पत्नी थी जो मेरे जीवन के क्रॉस ड्रेसिंग वाले इस पहलू को समझ सकती थी, एक ऐसी पत्नी जो मेरा सहयोग करने को तैयार थी| और तो और अब मेरे बाल लम्बे थे और मेरे पास स्तन भी थे! ज़रा सोच कर देखिये एक क्रॉस ड्रेसर को और क्या चाहिए इससे ज्यादा?

bbc
अब तो सोच कर यकीन ही नहीं होता कि मैं कभी संपूर्ण औरत बन कर एक बच्ची को जन्म भी दी थी या कभी किसी पुरुष से शारीरिक प्यार भी किया था| सब कुछ सपने की तरह है!

परिशिष्ट

आज लगभग २ साल हो चुके है उस रात से जब मैं प्रतीक से परिणीता बन गयी थी| और अब कुछ महीने बीत चुके है मुझे फिर से प्रतीक बने| आज भी हम दोनों पति-पत्नी को यकीन नहीं होता कि हमारे साथ ऐसा भी हुआ था| सोच कर ही अजीब लगता है कि मैं एक पुरुष से प्रेम करने लगी थी! या एक स्त्री के तन में मैं कभी थी भी| मैंने एक बच्चे को माँ बनकर जन्म दिया था, एक सपने सा लगता है| पर ऐसा सब हमारे साथ क्यों हुआ था? इसका जवाब हमारे पास नहीं है|पर जो हुआ उसने हमारा जीवन हमेशा के लिए बदल दिया था| हम दोनों के बीच अब बहुत प्यार है| हम दोनों एक दुसरे की परेशानियों को और दिल को बेहद अच्छे तरह से समझ सकते है, जो समझ हम दोनों में पहले न थी|अब मैं जानती हूँ कि औरत के रूप में परिणीता कितनी मुश्किलों का सामना करती है, और अब वो समझती है कि एक पुरुष होकर औरत बनने की लालसा क्या होती है| इसी समझ की वजह से अब मैं जब मन चाहे स्त्री रूप में अल्का बन सकती हूँ| पर इन सबसे ज्यादा, अब हमारे जीवन को पूरा करने वाली बेटी प्रणिता है जिसकी दो मांए है!

यह मेरी कहानी का अंतिम भाग था| फिर भी पिछले २ सालो में और भी बहुत कुछ हुआ था जिसके बारे में मैंने लिखा नहीं है| जैसे जब मैं परिणीता के शरीर में थी तब मेरी माँ के साथ मेरा रिश्ता कैसे बदल गया? उनकी नजरो में अब मैं उनका बेटा प्रतीक नहीं बल्कि बहु परिणीता थी? या मेरे सास ससुर के साथ मेरा रिश्ता जो अब मुझे अपनी बेटी की तरह देखते थे? या मेरी बहन के साथ उसकी शादी के समय मेरा समय कैसा बीता जब मैं उसका भैया न होकर प्यारी भी थी?  इन सब के बारे में समय मिला तो ज़रूर लिखूंगी| उसके लिए आपका सब्र, प्यार और कमेन्ट भी चाहिए| आखिर आपको मेरी कहानी कैसी लगी थी ज़रूर बताना| चाहे तो ब्लॉग पर या फिर फेसबुक पर कमेंट करे| मैं इंतज़ार करूंगी आपके प्यार भरे सन्देश का!

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मैं परिणिता: भाग १४

“अब बताओ मुझ पर कैसी लगेगी ये साड़ी?” मेरे पतिदेव बड़ी ही ख़ुशी से खुद पर साड़ी लगाकर प्रदर्शन कर रहे थे और मैं उनकी ख़ुशी देख कर हँस हँस कर पागल हो रही थी| अपने पति के तन पर साड़ी देख कर किसी भी औरत को अटपटा ज़रूर लगता पर मैं सामान्य औरत न थी|


अब तक आपने मेरी कहानी में पढ़ा: यह कहानी है मेरी भावनाओं की, एक आदमी से औरत बनकर जो भी मैंने अपने बारे में समझा| मेरे दिल से निकली इस कहानी में प्यार है, सुकून है, सेक्स भी है, और औरत होना क्या होता उसकी सीख भी| जब से होश संभाला है, मैं जानती हूँ कि मेरे अंदर एक औरत बसी हुई है। पर दुनिया की नज़र में मैं हमेशा प्रतीक, एक लड़का बनकर रही। कुछ साल पहले जब मेरी शादी परिणीता से हुई, तो उसे भी मेरे अंदर की औरत कभी पसंद न आयी। हम दोनों पति-पत्नी US में डॉक्टर बन गए। पर मेरे अंदर की औरत हमेशा बाहर आने को तरसती रही। किसी तरह मैं अपने अरमानों को घर की चारदीवारियों के बीच सज संवर कर पूरा करती थी। पर आज से ३ साल पहले ऐसा कुछ हुआ जो हम दोनों को हमेशा के लिए बदल देने वाला था। उस सुबह जब हम सोकर उठे तो हम एक दूसरे में बदल चुके थे। मैं परिणीता के शरीर में एक औरत बन चुकी थी और परिणीता मेरे शरीर में एक आदमी। हमारे नए रूप में सुहागरात मनाने के बाद हमारा जीवन अच्छा ही चल रहा था, और एक औरत के बदन में मैं बेहद खुश थी| पर परिणीता, जो अब मेरी पति थे? अब आगे –

“साड़ी के पल्ले को ऐसे अपने कंधे पर यूँ फैलाते है और बाकी की साड़ी से अपने पूरे तन को ऐसे फैलाकर ढँककर देखने से आपको बिना साड़ी को पहने ही बेहतर अंदाज़ा हो जाता है कि ये साड़ी पहनने के बाद आप पर कैसी लगेगी| अब बताओ मुझ पर कैसी लगेगी ये साड़ी?” मेरे पतिदेव बड़ी ही ख़ुशी से खुद पर साड़ी लगाकर प्रदर्शन कर रहे थे और मैं उनकी ख़ुशी देख कर हँस हँस कर पागल हो रही थी| अपने पति के तन पर साड़ी देख कर किसी भी औरत को अटपटा ज़रूर लगता पर मैं सामान्य औरत न थी| आज से तीन हफ्ते पहले तक मैं एक क्रॉस ड्रेस करने वाला आदमी थी और मेरे पति तब एक औरत होने के साथ साथ मेरी पत्नी परिणीता थे|

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मैंने ठान लिया था कि मैं अपने पति को साड़ी पहनने में सहयोग करूंगी| जिस स्थिति से मैं खुद गुज़र चुकी थी मैं नहीं चाहती थी की वो भी उस दुःख से गुज़रे|

हाँ जी, मेरे पति, परिणीता, को मैं साड़ी पहनने वाली थी!  ज़िन्दगी भी कैसे कैसे खेल खेलती है| “पत्नी ने पहनाई पति को साड़ी”, जब मैं क्रॉस-ड्रेसर थी, तब न जाने क्यों, कितनी ही बार मैं इन्टरनेट पर यह गूगल में खोजा करती थी| तब मेरी पत्नी परिणीता ने मुझे साड़ी पहनाना तो दूर, वह तो मुझे साड़ी में देखना तक नहीं चाहती थी| मैं सोचती थी कि दुनिया में क्या कोई भाग्यशाली क्रॉस-ड्रेसर है जिनकी पत्नियाँ उनको सहयोग करती है और अपने हाथो से साड़ी पहनाती है? तब मुझे क्या पता था कि एक दिन मैं खुद ही औरत बन जाऊंगी और मेरी तब की पत्नी परिणीता, मेरे पति बन जायेंगे| आदमी बनने के बाद भी परिणीता के अन्दर दिल तो औरत का ही था! और वो फिर से औरत की तरह से सजना संवरना चाहता था| पर उनके दिल में यह चिंता थी कि जब उन्होंने पहले मुझे हमेशा औरतों के कपडे  पहनने से मना किया था तो अब जब वह खुद आदमी बन चुके है तो कैसे वह अब औरतों के कपडे पहने? इसी बात से मेरे पति दुखी थे| अब एक औरत के रुप में मुझे वह करना था जो मैं पहले एक आदमी होते हुए अपनी पत्नी से उम्मीद करती थी| मुझे एक सहयोगी पत्नी बनना था! मैं नहीं चाहती थी कि मेरे पति उस दुःख से गुज़रे जो मैंने सहा था| मैंने ठान लिया था कि मैं उनकी पत्नी, उन्हें अपने हाथो से एक बेहद खुबसूरत औरत बनाऊँगी!

और इसीलिए मैं अपना पुराना क्रॉसड्रेसिंग का बक्सा लेकर उनके सामने बैठी थी| और वो, मेरी खरीदी हुई मखमली साड़ियों को खोल खोलकर अपने हाथो से छूकर अपने तन पर लगा कर देख रहे थे कि वो कौनसी साड़ी पहनेंगे| मैंने उन्हें अपनी ड्रेस्सेस भी दिखाई थी पर उन्हें कोई पसंद नहीं आई थी| उनके विचार में मेरी ड्रेस की चॉइस बड़ी ख़राब थी| पर ६ फूट की औरत के कद के लिए अच्छी ड्रेस मिलना आसान भी तो नहीं होता! पर फिर भी आज बड़े दिनों बाद उनकी आँखों में मैं ख़ुशी की चमक देख रही थी|

“प्रतीक, मानना पड़ेगा कि तुम्हारी साड़ियों की चॉइस बड़ी है|”, उन्होंने कहा| वो अब भी मुझे प्रतीक कहते है| आखिर में मैं प्रतीक ही हूँ भले अब एक औरत के शरीर में हूँ| मैं मुस्कुरा दी| उन्हें साड़ियों को खोलते हुए देख कर मुझे बेहद ख़ुशी मिल रही थी| वो एक एक साड़ी को खोल कर पल्ले को अपने कंधे पर लगाकर देखते, जैसे औरतें करती है| यह भी ज़िन्दगी का अजीब पल था, परिणीता जब औरत थे, तब उनका साड़ियों में कम और ड्रेस में ज्यादा इंटरेस्ट था पर अब इस नए जीवन में साड़ियों के लिए कितने उत्साहित लग रहे थे| वैसे सच कहूँ तो शायद उन्हें ज्यादा ख़ुशी इस बात की थी कि वह फिर से औरत होना महसूस करने वाले थे|

जहाँ मैं उन्हें खुश देखने में खोयी हुई थी, मेरा ध्यान ही न रहा कि मेरे पास उस बक्से में कुछ ऐसे कपडे भी थे जो मुझे सेक्सी औरत की तरह महसूस करने में मदद करते थे| मैं  नहीं चाहती थी कि उनकी नज़र उन पर पड़े| पर अब तो देर हो चुकी थी|उन्ही में से एक था मेरा ब्लाउज जो कि सच कहू तो बेहद सेक्सी था| उसमे पीठ काफी खुली रहती थी और पीछे से हुक लगती थी|उन्होंने उसे उठा कर कहा, “हम्म तो तुम्हे सेक्सी ब्लाउज पसंद है! इतना एक्स्पोस तो मैं औरत होकर भी नहीं करता था! और ब्लाउज की कटोरियों को देख कर तो लगता है कि तुम्हे बड़े बूब्स बहुत पसंद है|” वो मसखरी कर रहे थे|

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अपने पति को साड़ी पसंद करते देख मुझे बेहद ख़ुशी हो रही थी| अब वो मेरे जीवन का क्रॉस ड्रेसर वाला पहलु समझ सकते थे

“पतिदेव! जब मैंने वो ब्लाउज सिलवाई थी तब मैं एक ६ फूट की आदमी थी| और जब ६ फूट की औरत बनना हो तो स्वाभाविक दिखने के लिए बड़े बूब्स ही चाहिए|”, मैंने थोडा शरमाते हुए कहा| मुझे थोड़ी लाज तो आ ही रही थी क्योंकि मेरे क्रॉस ड्रेसर जीवन का पहलु मैं उनके साथ पहली बार इस तरह खुलकर शेयर कर रही थी| और यह सच था कि परिणीता से कहीं अधिक सेक्सी ब्लाउज थे मेरे पास|

“चलो पतिदेव, अब तुमने साड़ी पसंद कर ली हो तो मैं तुम्हे तैयार कर दूं|”, मैंने कहा| मैं भी अपनी पहनी हुई साड़ी की प्लेट ठीक करते हुए उठी और उनसे बोली की चलो अब कपडे उतारो|

“मुझे तैयार करना है? मैडम मैं तुम्हारे सामने कपडे नहीं उतारूंगा|”, उन्होंने कहा| “मेरे प्यारे पतिदेव, आपको याद न हो तो पिछले तीन हफ्तों में आपकी पत्नी बन कर रातों को मैंने आपको कई बार नग्न देखा है| तब तो आपको कोई परेशानी न थी|”, मैंने उनके चेहरे के बेहद करीब आकर कहा और उनके शर्ट के बटन खोलने लगी| भला वो उन हसीं रातों को कैसे भूल सकते थे जब मैंने पत्नी बन कर उनको सुख दिया था| मेरी सेक्सी मुस्कान से वो थोडा शर्मा गए|

“सुनिए मैडम, तुम भूल रही हो कि तुम्हे सिर्फ तीन हफ्ते हुए है औरत बने, जबकि मैं सालो तक औरत था| मुझे साड़ी पहनना आता है| मैं खुद पहन लूँगा| तुम्हे सिखाने की ज़रुरत नहीं है|”, उन्होंने कहा| मैं देख सकती थी कि उनमे अभी भी एक झिझक थी| एक सुन्दर औरत से आदमी बन जाना और फिर आदमी होते हुए पत्नी के सामने साड़ी पहनना उनके लिए आसान नहीं था| वो मुझसे और इस स्थिति से थोडा बौखला गए थे|

पर मैं भी एक प्यारी पत्नी थी| मैंने उन्हें अपने गले से लगा लिया और उनका सर अपने सीने पे रख दिया| मेरे स्तनों के बीच उन्हें ज़रूर प्यार महसूस हुआ होगा| फिर मैंने कहा, “मैं जानती हूँ कि तुम एक सुन्दर औरत थे| मैं जानती हूँ कि तुम खुद तैयार हो सकते हो| पर मैं भी जानती हूँ कि आदमी के शरीर को स्त्री रूप में सँवारने में क्या क्या दिक्कत आती है| मुझ पर भरोसा करो|”

मेरी बात मानते हुए उन्होंने अपने कपडे उतार लिए| जब तक वे साड़ियां खुद पर लगा लगा कर पसंद कर रहे थे, मैं उन्हें देख कर मुस्कुराती हुई उनके पहनने के लिए पॉकेट ब्रा और हिप पैड लेकर आई| आखिर में उन्होंने एक लाल रंग की मखमली साड़ी अपने कंधे पर लगायी और उससे अपने तन को ढंकते हुए मेरी ओर देख कर उत्साहित होकर बोले, “यह कैसी लगेगी मुझ पर?” उनका चेहरा खिल गया था|

उन्हें देख कर मेरी आँखें भर आई| वो आज मेरी उन भावनाओं को महसूस कर रहे थे जो मैं पहले क्रॉस ड्रेस करते वक़्त महसूस करती थी| वो साड़ी से अपने पूरे तन को ढकने की कोशिश कर रहे थे, पर एक चीज़ थी जो छुप न पा रही थी| मखमली साड़ी के स्पर्श से उनका पुरुष लिंग तन गया था और साड़ी में वह उभर कर दिख रहा था| वो थोडा शर्मा गए| अपने अनुभव से मैं जानती थी कि एक क्रॉस ड्रेस करने वाले पुरुष के लिए कई बार ऐसा होना स्वाभाविक है| मैंने उसे नज़रंदाज़ करते हुए उन्हें अपने हाथो से उन्हें हिप पैड वाली पैंटी पहनाई| पर एक औरत होते हुए तना हुआ लिंग ऐसे ही नज़रंदाज़ नहीं हो जाता| उस लिंग को पैंटी के अन्दर करते हुए मेरे तन में कुछ कुछ होने लगा| पर इस वक़्त मुझे मेरे पति, परिणीता, को औरत बनाना था| न कि उन्हें पुरुष होने का शारीरिक सुख देना था|

और फिर मैंने उन्हें बड़े प्यार से तैयार करना शुरू किया। मैं चाहती थी कि आज वो अपने पुरुष तन में वही नज़ाकत महसूस कर सके जो एक स्त्री महसूस करती है। इसलिए आज मैंने उन्हें साटिन की पेंटी और ब्रा पहनाई। और फिर मैचिंग पेटीकोट। और फिर धीरे धीरे प्यार से उनके तन पर साडी लपेट कर प्लेट बनाने लगी। मेरे नाज़ुक हाथों का स्पर्श शायद उन्हें स्त्री होने का सुख भी दे रहा था। और वैसे भी कोई भी औरत आपको बता सकती है कि कितनी प्यारी भावना है जब कोई और औरत आपको प्रेम से साड़ी पहना रही हो। मैंने उनके ब्लाउज पर साड़ी चढ़ाते हुए पूछा, “आप खुला पल्ला पसंद करेंगे या प्लेट किया हुआ?” उन्होंने मेरी आँखों में देखा पर कुछ न बोल सके। मैंने ही निश्चय किया कि वो खुला पल्ला पहनेंगे। खुला पल्ला जब प्यार से आपके हाथो पर स्पर्श करता है , वह जो स्त्रीत्व की भावना जगाता है वह एक पल में ही एक क्रॉस ड्रेसर को बेहद ही भावुक स्त्री बना सकता है। जब मैं पल्ले को उनके ब्लाउज पर पिन से लगा रही थी, उन्होंने अपने हाथों से मखमली पल्ले को छूते हुए अपनी आँखें बंद कर ली। मैं जानती थी कि वह क्या अनुभव कर रहे थे। आखिर मैं भी पहले एक क्रॉस ड्रेसर रह चुकी थी।

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हमने तय किया कि आज वो खुले पल्ला रखेंगे| स्त्रीत्व महसूस करना हो तो खुले पल्ले से बेहतर कुछ नहीं है| आखिर गिरते हुए पल्लू को सँभालने की नजाकत ही कुछ और होती है|

फिर मैंने उन्हें एक कुर्सी पर बैठाया ताकि मैं उनका मेकअप कर सकूँ। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ कर कहा, “थैंक यू प्रतिक! पर मैं मेकअप खुद कर सकता हूँ। मुझे  मेकअप करना आता है।”

“पतिदेव, पहले तो कहिये कि मैं मेकअप कर सकती हूँ! अब आप एक औरत है!” मेरी बात सुनकर उन्होंने एक औरत की तरह शर्मा कर नज़रे झुका ली। “पर आज मैं आपको मेकअप करने नहीं दूँगी। पुरुष के चेहरे को स्त्री की तरह निखारना एक अलग कला है जो अभी आपको आती नहीं है।  पर मैं अच्छी तरह जानती हूँ। मेरा भरोसा करिये मैं आपको बेहद सुन्दर औरत बनाउंगी!”

हम दोनों मुस्कुराये| और जल्द ही मैंने उनका मेकअप भी कर दिया।  मेकअप के बाद वो उस साड़ी में बेहद ही आकर्षक औरत में तब्दील हो गए थे। आखिर क्यों न होते, मैंने वह साड़ी बहुत सोच समझकर खरीदी थी उस तन के लिए। और आज मुझे खुद पर बड़ा गर्व था कि मैंने बहुत सलीके से उन्हें साडी पहनाई थी और मेकअप भी बहुत अच्छा कर सकी थी।

मैं फिर उनकी कुर्सी के पीछे से आकर अपने हाथों को उनके गले पर रख कर कुर्सी को शीशे की ओर घुमाया। परिणीता अब खुद को देख सकते थे। उन्हें यकीन ही न हुआ कि उनका पुरुष तन इतनी सुन्दर औरत में तब्दील हो सकता था। एक हाथ से उन्होंने अपने ब्लाउज की ऊपर की साड़ी की बॉर्डर के ऊपर फेर कर देखा। और फिर अपने चेहरे को हाथ लगाने लगे। उनकी आँखों में आज ख़ुशी के आंसू थे।

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परिणीता अब एक औरत बन चुके थे और औरत बनने की ख़ुशी उनके चेहरे पर साफ़ झलक रही थी|

“जानू, आज मैं एक भी आंसू और नहीं देखना चाहती।”, मैंने उन्हें प्यार से गले लगाते हुए कहा। वो भावुक होते हुए मुस्कुरा दिए। “थैंक यू प्रतिक। पर मेरे बालों का क्या होगा?”, उन्होंने अपने सर के छोटे छोटे बालों को हाथ लगाते हुए कहा।

मैं तो इसी पल के इंतज़ार में थी। सभी क्रॉस ड्रेसर जानते है कि जब तैयार होने के बाद अंत में आप लंबे बालो का विग लगाते है तो मानो एक पल में ही जादू हो जाता है। और मैं चाहती थी कि यह जादुई पल वह खुद अनुभव करे। और जैसे ही मैंने उन पर विग लगाया, वो ख़ुशी के मारे उठ खड़े हुए और अपने हाथों को हवा में फैलाकर अपनी साड़ी के पल्लू को लहराते हुए गोल गोल घूमने लगे। उनके शरीर में छुपी हुई मेरी पत्नी परिणीता वापस आ गयी थी। उनको ख़ुशी में झूमते देख मेरी आँखों में भी ख़ुशी थी।  और फिर हमने एक दुसरे को गले लगा लिया। उनके सीने से लग कर मैं भी बेहद खुश थी।

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आपका शरीर चाहे जैसा हो, साड़ी आपके तन की सभी कमियों को छुपा देती है, यह तो क्रॉस ड्रेसर बड़े अच्छे से जानते है| मेरे पति भी अब आकर्षक औरत लग रहे थे, बस उन्हें मेरी तरह खुला पल्लू सँभालने का अनुभव न था|

“सुनिये, क्योंकि आपका नाम परिणीता तो अब मेरा हो चूका है। क्या आपने अपने स्त्रीरूप के लिए कोई नया नाम सोचा है?”

“हाँ। वही नाम जिस नाम से तुम इस रूप में रहा करती थी। ‘अल्का’ ”

अल्का, यही नाम मैं उपयोग करती थी जब मैं प्रतिक से औरत बन जाया करती थी। अल्का का मतलब होता है खूबसूरत बालों वाली लड़की, और वही तो बनती थी मैं। और अब मेरे पति, मेरी सहेली अल्का बन चुके थे। आज हम दोनों के बीच एक नए रिश्ते की शुरुआत हो रही थी।  सच कहूँ तो हमारे तन एक दुसरे में बदलने का सबसे बड़ा फायदा यही हुआ था। भले औरत का तन पाने की मुझे बहुत ख़ुशी थी पर सबसे ज्यादा ख़ुशी इस बात की थी कि मुझे अब एक सहेली मिल गयी थी जिसके साथ मैं औरत होने का पूरा आनंद ले सकती थी! मैं परिणीता और मेरी प्यारी सहेली अलका! अगले भाग में हम दो सहेलियोँ की हॉट रात के बारे में पढना मत भूलियेगा, जब हम दो सहेलियाँ दो जिस्म एक जान हो गयी थी| अगला भाग मेरी इस कहानी का अंतिम भाग होगा,  तो पढ़ते रहिये और फेसबुक पर हमारे पेज को पसंद करना न भूलियेगा!

To be continued …

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