The Girly Feed

Stories, captions and articles from the web.


Cross-dressing related stories, captions and articles from the web.

Last Entry Updated on: 04 July, 2018.



If you have any articles you would like us to feature here, use our feedback form to submit the links!

Caption: Challenge

Captions published under shortest story challenge


The results of ‘Shortest Story Challenge’ are in! Scroll down to read all the beautiful captions and stories contributed. 



Mother-in-law / सास
By Anupama Trivedi



Another life / दोहरी ज़िन्दगी
By Devika Sen



Womanhood / स्त्रीत्व
By Gitanjali Paruah



Maid / नौकरानी
By Saloni Sharma



Stuck / पहली बार
By Sonali Kapoor

Click here for all the captions /सभी कैप्शन पढने के लिए यहाँ क्लिक करे

If you liked this caption, please don’t forget to give your ratings!

free hit counter

इंडियन लेडीज़ क्लब: भाग १०

एक औरत और एक बहु बनकर अब तक दिन बीताने में सुमति को कोई भी कठिनाई न महसूस हुई. बल्कि वो तो बहुत खुश थी. पर बहु के साथ साथ वो पत्नी भी बनने वाली थी. क्या वो आगे भी खुश रहेगी?


यदि आपको कहानी पसंद आये, तो ऊपर दी हुई स्टार रेटिंग का उपयोग कर रेटिंग ज़रूर दे!

Click here to read in English/ सभी भागो के लिए क्लिक करे

चैतन्य के माता-पिता और सुमति के भाई रोहित को ट्रेन से विदा कर, एक दुसरे का हाथ पकडे चैतन्य और सुमति पार्किंग लॉट में खाड़ी कार की ओर बढ़ चले थे. कार के पास पहुँचने पर सुमति बड़ी सावधानी से अपनी साड़ी को उठाकर पैसेंजर सीट पर बैठ गयी. एक औरत को भी न बहुत संभल कर चलना होता है और ख़ास तौर पर जब इतने प्यार से साड़ी पहनी हो तो उसकी प्लेट तीतर-बीतर हो जाए तो किसी को भी अच्छा न लगेगा. सुमति मन ही मन आज बड़ा गर्व महसूस कर रही थी कि आज वो दिन भर साड़ी और हील वाली सैंडल पहन कर बिना किसी परेशानी के बीता सकी थी. मानो या न मानो सैंडल पहन कर इतने घंटो रहना बड़ी बात होती है. अपने सास-ससुर के साथ आज अपनी दुल्हन के लिबास की शौपिंग करके वो बड़ी खुश थी, जो उसके चेहरे से साफ़ झलक रही थी. और सुमति को खुश देख, चैतन्य भी बड़ा खुश था.

“हम्म … अब बस हम दोनों अकेले रह गए है. अब क्या करना है?”, चैतन्य ने थोडा शरारती अंदाज़ में कहा. जैसे उसके शब्दों में एक हसरत छुपी हुई थी.

“करना क्या है? अब ये भी मैं बताऊँ तुम्हे? मुझे घर ले चलो और क्या.”, सुमति ने थोड़े रूखे स्वर में कहा. जैसे कुछ देर के अन्दर उसके अन्दर का पुरुष जाग उठा था. पर बात वो नहीं थी. चैतन्य के साथ खुद को अकेला पाकर थोड़ी सी सहम गयी थी वो. चैतन्य की हसरत भरी निगाहों को देख कर उसे एहसास हो चला था कि अब वो एक औरत के तन में है जिसे पुरुष कुछ ख़ास नजरो से भी देख सकते है. और फिर चैतन्य की तो होने वाली बीवी थी वो… तो वो ऐसे देखे तो अचरज नहीं होना चाहिए था सुमति को. पर सुमति को औरत बने अभी एक दिन तक न हुआ था. कैसे समझ पाती वो यह सब? बेचारी बस थोडा असहज होते हुए अपने साड़ी के पल्ले को खोल कर अपने बदन के चारो ओर लपेट कर बैठ गयी. अपने सीने को ढँक कर रखना उसे उचित लगा.

“अच्छा राजकुमारी जी. जैसे आप कहें!”, चैतन्य ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया. जैसे उसे सुमति के रूखेपन वाले व्यवहार का अनुभव था. सुमति के लिए ये बड़ी अजीब सी स्थिति थी. चैतन्य जो कल तक चैताली नाम की लड़की था, वो उसके साथ ऐसे बर्ताव कर रहा था जैसे वो हमेशा से ही सुमति का होने वाला पति था. सुमति सोचती रह गयी कि यदि उसे याद है कि वो कल तक एक आदमी थी तो चैतन्य को क्यों याद नहीं है कि वो लड़की था? शायद ये सब एक सपना था पर चलती हुई कार से जब खिड़की से बहती हुई हवा उसके आँचल से छन कर उसके ब्लाउज में उसके स्तनों पर पड़ कर एक सिहरन पैदा करती, सुमति इस वास्तविकता को सपने के नाम पर नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती थी.

फिर भी सुमति मन ही मन उत्साहित थी. दुल्हन बनने की ख़ुशी जो थी. किस क्रॉसड्रेसर को अच्छा नहीं लगेगा ये? “एक बहु बनना इतना कठिन भी नहीं था. मेरी सास कितनी प्यारी है और मेरा कितना ख्याल रख रही थी वो मेरा आज”, सुमति कलावती के साथ बिठाये पलो को याद कर मुस्कुराने लगी. और मुस्कुराती भी क्यों नहीं आखिर इतना बढ़िया दिन जो बीता था. पर फिर भी उसे एहसास न था कि एक बहु बनने का मतलब सास के साथ सिर्फ शौपिंग करना नहीं होता है. और भी बहुत कुछ करना होता है. खैर अपनी सास के साथ उसने किचन में भी समय बिताया था. वो भी तो अच्छा ही था. पर वो एक बात भूल रही थी. किसी की बहु बनने के लिए किसी आदमी की पत्नी भी बनना पड़ता है. और वो इस बात को नज़रंदाज़ कर रही थी कि वो एक पत्नी बनने वाली है.

कार के चलने पर बहती हुई हवा में लहराती सुमति की रेशमी जुल्फें मानो उसके चेहरे पर खिलखिला रही थी. और सुमति बार बार अपनी जुल्फों को पीछे करती. उसे ऐसा करते देखना बहुत ही सुखद था चैतन्य के लिए जो चुप-चाप इस सुन्दर औरत को देख रहा था, जो कुछ दिनों में उसकी पत्नी बनने वाली थी. पर पूरे रास्ते में चैतन्य और सुमति ने एक दुसरे से ज्यादा बातें नहीं की.

जल्दी ही सुमति का घर आ गया था. सुमति ने घर का दरवाज़ा खोला और दोनों अन्दर आ गए. सुमति सोच कर चल रही थी कि चैतन्य कुछ मिनट घर में रूककर पानी वगेरह पीकर अपने रास्ते निकल जाएगा. उसे चैतन्य की उपस्थिति से ज्यादा परेशानी न थी. वो मन ही मन चैतन्य में अपनी बचपन की दोस्त चैताली को देखने की कोशिश करती पर उसके जेहन में बन रही नयी यादें उसे हमेशा चैतन्य को एक लड़के के रूप में ही दिखा रही थी.

“ओफ्फ्फ मैं तो शौपिंग करके थक गयी हूँ चैतन्य. मैं जाकर कपडे बदलती हूँ … अब और ज्यादा देर ये हील पहन कर नहीं रह सकूंगी मैं. तुम यहाँ बैठ कर पानी या सोडा लेकर पी लेना.”, सुमति ऐसा कहकर अपने कमरे चली गयी और चैतन्य बाहर के कमरे में सोफे में बैठ गया.

अपने बेडरूम में पहुँचते ही सुमति ने अपनी हील वाली सैंडल निकाल फेकी. उसके अन्दर उर्जा का नया संचार हो गया था. उसके अन्दर एक नया उतावलापन था खुद को आईने में देखने का… अपने नए बदन को निहारने का. सुमति तो आदमी के तन में भी औरत के कपडे पहनकर बहुत खुबसूरत लगती थी और अब तो उसके पास एक औरत का तन था. दिखने में सुमति लगभग पहले की ही तरह थी पर अब वो ज्यादा पतली थी, उसकी कमर और फिगर बेहद लचीला हो गया था, और अब उसका कद पहले से थोडा कम था. और तो और अब उसके बड़े और मुलायम स्तन थे और साथ ही अब उसके पास स्त्री योनी भी थी. किसी हुस्न्परी से कम नहीं लग रही थी वो आईने में और खुद को देखकर सुमति ख़ुशी से न फूली समा पायी.

सुमति ने फिर धीरे से अपना नेकलेस उतारा जो उसके नाज़ुक से गले पर बेहद जंच रहा था. और फिर कानो में पहनी भारी सी ईअर-रिंग भी उतारनी थी. उसके लिए उसने अपने बालो को पहले एक ओर कर अपने सर को एक ओर झुकाकर अपनी दुबली सुन्दर उँगलियों से उन झुमको के पीछे का स्क्रू खोलने लगी. एक क्रोसड्रेसर के रूप में तो उसे क्लिप-ऑन ईअररिंग पहनना पड़ता था जो कुछ घंटो में कानो में दर्द करने लगते थे. पर एक औरत के रूप में कानो में झुमके पहनने का अनुभव ही अलग था. सिर्फ झुमके उतारने में उसे स्त्रीत्व की अनोखी अनुभूति हो रही थी. और फिर उसने अपनी दूसरी ईअररिंग भी बड़े प्यार से निकाल ली.

ac03
सुमति ने बड़े ही नजाकत से अपने नेकलेस और झुमको को उतारा. और फिर अपनी साड़ी के पल्लू का पिन जो ब्लाउज में लगी थी उसे खोल कर खुद को आईने में देखने लगी. कितनी ही खुबसूरत लग रही थी सुमति!

अब सुमति ने अपनी ब्लाउज में लगी पिन को खोल कर अपने पल्लू को आज़ाद कर दिया क्योंकि उसे अब साड़ी जो उतारनी थी. उसे महसूस हुआ कि अब नाज़ुक दुबली उँगलियों से यह सब करना कितना आसान हो गया था उसके लिए. सचमुच की औरत होना तो सुमति को बेहद लुभा रहा था. अभी तो एक दिन भी नहीं हुआ था औरत के तन में उसे और उसे इतना सुख मिल चूका था जो एक क्रॉस ड्रेसर के रूप में इतने समय में कभी नहीं मिला. वो अपने पल्लू को पकडे खुद को आईने में देखने लगी. “बिना गहनों के भी मैं कितनी सेक्सी लग रही हूँ. मेरे स्तन भी कितने परफेक्ट है. काश अंजलि और मधुरिमा माँ यहाँ होती तो कितना मज़ा आता. पता नहीं उनके साथ क्या हो रहा होगा?”, सुमति अपनी ख़ुशी जल्द से जल्द अपनी क्रॉसड्रेसर सहेलियों के साथ साझा करना चाहती थी.

ac05
सुमति अब सिर्फ पेटीकोट और ब्लाउज पहन कर आईने के सामने खड़ी थी.

सुमति अब धीरे धीरे अपनी साड़ी को उतारने लगी. उसकी साड़ी तो मानो जैसे उसके तन से लिपट कर थी
और उसे उतारना एक खुबसूरत से गिफ्ट को खोलने के समान था जिस पर कई लेयर के गिफ्ट पेपर लपेटे हुए हो. और सुमति का तन उस पैकिंग में छुपा हुआ गिफ्ट था जो परत दर परत खुल कर दिखने को उतावला था. आज तो सुबह से ही बेचारी सुमति इतनी व्यस्त रही कि वो अपने इस औरत के तन को निहार तक न सकी थी. अब उसके पास समय था जब वो खुद को अच्छी तरह से देख सके. साड़ी को उतारने के बाद उसने अपनी साड़ी को अपनी बगल में बिस्तर में रख दी और खुद को पहली बार देखने लगी.

सुमति अब सिर्फ पेटीकोट और ब्लाउज पहने आईने के सामने खड़ी थी. “यकीन नहीं होता कि ये मेरा फिगर है! मेरी बाँहें कितनी पतली है और मेरी कमर भी पहले से पतली और लचीली हो गयी है. मेरे कुल्हे तो कितने बढ़ गए है! इतना बड़ा तो कभी हिप पैड पहन कर भी नहीं कर पायी थी मैं! और मेरे स्तन! हाय! मेरे ब्लाउज में कितने अच्छे लग रहे है. न जाने मेरा ब्रा साइज़ क्या है? मुझे अपनी ब्रा में देखना पड़ेगा”, सुमति अपने तन को देखते हुए सोचने लगी. सब कुछ सपने सा था. “यदि ये सपना है तो मुझे कभी इस सपने से न जगाना”, उसने खुद से कहा. उसे पता नहीं था कि जाने अनजाने कितनी बड़ी गलती कर रही थी वो ऐसा सोचकर.

खुद की ब्रा के बारे में सोचते हुए उसके मन में अब अपने स्तनों को देखने की इच्छा जागृत हुई. होती भी क्यों न? हम सभी क्रॉस-ड्रेसर को तो नकली स्तनों के साथ भी पूर्ण स्त्री का एहसास हो जाता है, और फिर सुमति के पास तो अब असली स्तन थे. अब वो एक बार अपने स्तनों को दबाकर देखना चाहती थी कि क्या वाकई में उसमे वो सुख है जैसे हम सभी सोचते है. सुबह कपडे बदलते वक़्त उसके पास यह करने का समय नहीं था, पर अब तो उसके पास बहुत समय है. आज तो दिन में जब वो साड़ी की दूकान में लहंगा चोली ट्राई करने गयी थी, उसके दिन में तो उसी वक़्त अपनी ब्रा उतारने के बाद यह करने की इच्छा थी पर उसे पता नहीं था कि क्या पता क्या नतीजा होता ऐसा करने पर. इसलिए उसने अपनी इच्छाओं पर उस वक़्त काबू रखना ही मुनासिब समझा था. वैसे भी उस वक़्त लहंगा और साड़ी की खरीददारी में ही इतना मज़ा आ रहा था कि स्तनों की तरफ ध्यान देने की ज़रुरत भी नहीं तो थी सुमति को. यही सब सोचते हुए उसे अचानक कुछ ध्यान आया. ट्रायल रूम में जब वो लहंगा चोली उतारकर फिर से साड़ी पहनने गयी थी, तब वो वापस से ब्रा पहनना भूल गयी थी! उसकी ब्रा अब तक उसकी पर्स में रखी हुई थी. “ओह माय गॉड! मैं अपने सास-ससुर के सामने बिना ब्रा के ही घूम रही थी! मैं भी कितनी बेवकूफ हूँ.”, वो सोचने लगी. अच्छा हुआ था कि उसका साड़ी ब्लाउज काफी सही फिट वाला था जो उसके स्तन उसके ब्लाउज के अन्दर झूल नहीं रहे थे. वरना बाहर किसी और के सामने स्तनों का ऐसा झुलना उचित नहीं माना जाता है. सुमति भी अब एक औरत की तरह ही सोचने लगी थी.

ac06
सुमति ने सामने झुककर आईने में अपने क्लीवेज को देखा. और फिर उसने धीरे से अपने ब्लाउज के हुक खोलने शुरू किये. उसके स्तन तो मानो उसके टाइट ब्लाउज से बाहर निकलने को बेताब दे.

सुमति ने फिर अपने ब्लाउज में अपने क्लीवेज को देखा. वो मन ही मन मुस्कुराने लगी अपने उन दिनों को याद करके जब से टेप का उपयोग करके दर्द के साथ क्लीवेज बनाना पड़ता था. उस टेप को वापस त्वचा से उखाड़ने में जो दर्द होता था सो अलग. और अब देखो, उसके पास इतना गहरा क्लीवेज है. वो झुककर पास से अपने क्लीवेज की गहराई को देखने लगी. और फिर अपनी उँगलियों से क्लीवेज के बीच अपनी ब्लाउज की नैक को थोडा निचे खींचते हुए और अच्छे से देखने की कोशिश करने लगी. “हाय दैया! कितने बड़े और मुलायम स्तन मालुम होते है मेरे.”, खुद ही के स्तनों को अपने हाथो से छूते हुए सुमति शर्मा भी रही थी, इतने बड़े स्तन थे कि उसकी हथेली में न समा सकते थे वो. और फिर ऐसे लग रहे थे जैसे उसके टाइट ब्लाउज से बस वो खुद ब खुद बाहर निकल आयेंगे. खुद को दिल और दिमाग दोनों से खुबसूरत और सेक्सी महसूस करते हुए, सुमति अपने ब्लाउज के हुक धीरे धीरे खोलने लगी. “मेरे निप्पल कौनसे रंग के होंगे, हलके भूरे, गहरे भूरे या गुलाबी?”, मन भी न कैसे कैसे सवाल जगाता है. बेचारी सुमति सुबह इतनी जल्दी में थी कि अपने निप्पल के रंग तक को ठीक तरह से नोटिस नहीं कर सकी थी. सुबह सुबह उसके जीवन में इतना बड़ा परिवर्तन जो आ गया था. पर अब उसके पास खुद के स्तनों को देखने का भरपूर समय था.

वो धीरे धीरे अपने नए तन का आनंद ले रही थी. उसे अब कोई जल्दी नहीं थी. और अब वो वक़्त आ गया था जब वो खुद को पूरी तरह से देख सकेगी. उसने अपने ब्लाउज को उतारा और उसकी आँखों के सामने सुन्दर सुडौल उसके स्तन थे. देखने से ही प्रतीत होता था कि कितने मुलायम होंगे वे. हाय! कितना सुन्दर आकार था उनका और साइज़ भी ऐसा कि दिल करे कि उन्हें तुरंत पकड़ कर कुछ करने लगे. इतने नशीले झूमते स्तनों को चूम कर तो कोई भी लकी बन जाता. पर सुमति के पास अब बस यही तो कमी थी… उसके स्तनों को कोई प्यार से छूने वाला या चूमने वाला न था. पर किसी और की क्या ज़रुरत है? क्या सुमति खुद अपने स्तनों के साथ नहीं प्यार से खेल सकती?

ब्लाउज के उतारते ही सुमति के नर्म, मुलायम, बड़े, सुन्दर और सुडौल स्तन अब उसकी आँखों के सामने थे.

खुद के इतने सुन्दर स्तनों को देखकर सुमति को बड़ा गर्व महसूस हुआ और वो सोचने लगी, “अब यही क्यों रुकना? अब मुझे पेटीकोट उतारकर अपनी पूरी फिगर देखनी चाहिए!”, सुमति ने सोचा और फिर अपने पेटीकोट का नाडा खोलने लगी. पर अब आईने से मुंह फेरकर ऐसा करने लगी. शायद खुद को पहली बार नग्न देख कर सुमति लजा रही थी. और फिर धीरे धीरे अपने पेटीकोट को निचे सरकाने लगी. सुमति हर चीज़ धीरे धीरे कर रही थी क्योंकि अपने तन और स्त्रीत्व का आनंद लेना है तो वो धीरे धीरे कर कर लेने में ही सबसे ज्यादा सुख देता है. यह तो वो आदमी के तन में जब थी, तबसे जानती थी. और फिर आज तो उसकी टाँगे और जंघा इतनी चिकनी थी जैसे रेशम. दिन में जब भी वो अपने पैरो को क्रॉस करके एक के ऊपर एक करके बैठती थी… उसे तुरंत एहसास होता था कि कितनी चिकनी टाँगे है उसकी. और इन्ही चिकनी स्मूथ टांगो पर उसका पेटीकोट भी इतने प्यार से धीरे धीरे खुद ब खुद फिसलने लगा. वो मन ही मन शर्माने लगी… पर खुद को निहारने में मशगुल सुमति कुछ भूल रही थी. उस घर में उसके अलावा भी एक और शख्स था. चैतन्य बाहर के कमरे में सब्र के साथ सुमति का इंतज़ार कर रहा था, पर सुमति आधे घंटे से अब तक बाहर नहीं आई थी.

और फिर सुमति का इंतज़ार करते हुए थक जाने के बाद चैतन्य सुमति के कमरे में दरवाज़ा खोल कर दाखिल हुआ. और चैतन्य से बिलकुल बेखबर हो सुमति उस वक़्त लगभग नग्न अवस्था में थी. उसका पेटीकोट अब उसके घुटनों तक नीचे आ चूका था और ऊपर ब्लाउज तो वो पहले ही उतार चुकी थी. और क्योंकि वो आईने के विपरीत दिशा में देख रही थी, उसके खुले स्तनों के साथ वो चैतन्य की आँखों के सामने थी. और फिर चैतन्य को कमरे में देख कर वो गुस्से से आग बबूला हो उठी. “चैतन्य… तुम्हे शर्म हया है या नहीं? तुम्हे सुबह भी कहा था मैंने कि किसी के कमरे में आने के पहले दरवाज़े पर दस्तक देनी चाहिए.” सुमति चीख उठी. किसी तरह अपने पेटीकोट को जल्द से जल्द ऊपर उठा कर वो नाडा बाँध रही थी. और तब तक चैतन्य को सुमति के सुन्दर स्तनों का खुबसूरत नज़ारा देखने मिल रहा था. “कितने बेशर्म हो तुम. कम से कम अपनी आँखें तो बंद कर लो.”, सुमति लगभग रो पड़ी थी … उसकी आवाज़ काँप रही थी पर उसका गुस्सा बहुत बढ़ चूका था. गुस्से में उसके हाथ भी काँप रहे थे. शायद उसकी आँखों में एक-दो बूँद आंसूओं के भी थे.

सुमति ने फिर झट से अपनी बिस्तर पर पड़ी अपनी बेतरतीब साड़ी को उठाकर किसी तरह अपने सीने के सामने रख कर अपने स्तनों को छुपाने लगी. “निकल जाओ इस कमरे से तुरंत अभी. अब जाओ भी!”, सुमति एक बार फिर गुस्से से चैतन्य पर बरस पड़ी. पर चैतन्य मुस्कुरा रहा था.

“कम ऑन सुमति. ऐसा तो है नहीं कि मैं पहली बार तुम्हे बिना कपड़ो के देख रहा हूँ”, चैतन्य ने मुस्कुराते हुए कहा. “तुमने… तुमने मुझे बगैर कपड़ो के कब देखा?”, सुमति को यकीन नहीं हुआ. पर इस नयी दुनिया में कुछ भी यकीन करने लायक नहीं था वैसे भी.

चैतन्य उसके करीब आया और उसकी दोनों कलाइयों को पकड़ कर उसके और पास आ गया. सुमति अब चैतन्य की साँसे अपने तन पर महसूस कर सकती थी. और चैतन्य की मजबूत पकड़ के साथ उसके हाथ से उसकी साड़ी छुट गयी. और चैतन्य उसके और करीब आ गया. सुमति के स्तन अब चैतन्य के शरीर को छू रहे थे. “तुम भूल गयी उन पलों को जब हमने कई बार एक दुसरे के साथ प्यार किया था?”, चैतन्य ने कहा और आगे बढ़कर सुमति की कमर पर हाथ रख कर उसे अपने और करीब खिंच लाया. “नहीं… ये सच नहीं है.”, सुमति ने चैतन्य की बात को झुठलाना चाहा पर उसकी आवाज़ अब बेहद धीमी थी. ये स्थिति ही कुछ असहज थी सुमति के लिए… वो तो सपने में भी एक पुरुष के साथ शारीरिक सम्बन्ध के बारे में नहीं सोच सकती थी.

“क्या हो गया है तुम्हे सुमति? तुम कैसे इस बात को झुठला सकती हो? तुम ही तो थी जिसने सेक्स के लिए पहला कदम आगे बढ़ाया था. याद है जब कॉलेज के पहले साल के बाद तुम जब छुट्टियों में घर आई थी और…”, कहते कहते चैतन्य के होंठ सुमति के होंठो के काफी करीब आ गए थे. और सुमति उसकी आँखों में देखते रह गयी. जिस तरह से चैतन्य कह रहा था वो झूठ तो नहीं लग रहा था.

फिर भी सुमति कैसे मान लेती इस बात को. “नहीं ये सच नहीं हो सकता”, सुमति ने कहा और अपनी आँखें बंद कर ली. एक बार फिर उसके सर में चुभने वाला एक तेज़ दर्द हुआ. एक बार फिर उसके दिमाग में नयी यादों का जन्म हो रहा था. उस दर्द के साथ उसे याद आ रहा था वो गर्मी का मौसम जब उसने चैतन्य के साथ सेक्स के लिए खुद पहला कदम बढाया था. उस वक़्त उसके घर में कोई नहीं था. उसे सब कुछ ऐसे याद आ रहा था जैसे सब कुछ सचमुच उसके साथ ऐसा हुआ था. पर कल तक तो वो आदमी थी… फिर भी ये नयी यादें तो इस नयी दुनिया का सच थी. उसे याद आ रहा था कि कैसे सेक्स के वक़्त वो चैतन्य पर हावी थी और चैतन्य बस सुमति का साथ दे रहा था. पर सुमति ने ऐसा क्यों किया था?

अब तक चैतन्य के होंठ सुमति के होंठो को चूमने लगे थे. सुमति के कोमल चेहरे चैतन्य की हलकी हलकी दाढ़ी के बाल उसे चुभ रहे थे. सुमति ने अपनी कलाई चैतन्य के हाथो से छुडानी चाही पर उसकी मजबूत गिरफ्त से वो आज़ाद न हो सकी. वो महसूस कर सकती थी कि चैतन्य के शरीर का निचला हिस्सा अब उसके तन से और करीब आ रहा है. कुछ होता देख कर सुमति ने अपनी पूरी जान लगाकर चैतन्य को एक बार धक्का देकर अपने से दूर किया.

पर चैतन्य इतने सब के बाद अब रुकने के मूड में न था. उसने सुमति को पलटकर उसकी दोनों कलाइयों को पकड़ लिया और फिर सुमति की पीठ पर चूमने लगा. फिर उसने सुमति की कमर को अपने हाथो से लपेट लिया और उसे फिर अपनी बांहों में खिंच लिया. मदहोशी में ही उसने सुमति से कहा, “तुम कैसे भूल सकती हो हमने न जाने कितनी बार प्यार किया था? मैं तो हमारी शादी तक रुकना चाहता था पर तुम ही तो थी जो मुझे बार बार अपने करीब खिंच लाती थी. और अब तुम्हे ऐसे देखकर मैं खुद को कैसे रोकूंगा सुमति?” चैतन्य अब जोरो से सुमति की गर्दन पर चूमने लगा.

“प्लीज़ रुक जाओ चैतन्य.”, सुमति ने उससे भीख मांगी. पर चैतन्य तो सुमति के शरीर पर हाथ फेरते हुए और बेताब हुए जा रहा था. और फिर उसके हाथ सुमति के स्तनों को पकड़ कर जोरो से मसलने लगे और वो खुद सुमति की गर्दन को चूमता रहा. और अपने निचले तन से सुमति के कुलहो पर जोर देने लगा. अबसे कुछ मिनट पहले की ही तो बात थी जब सुमति खुद अपने स्तनों को दबवाना चाहती थी पर ऐसे तो नहीं? चैतन्य का लिंग सुमति को अब अपने कुलहो में पीछे महसूस होने लगा था. वो बस किसी तरह चैतन्य की गिरफ्त से निकलना चाहती थी. अन्दर ही अन्दर रोती हुई सुमति के लिए यह सब इतना तेज़ी से हो रहा था कि वो सोच भी नहीं पा रही थी. उसे पता भी नहीं था कि जो हो रहा है उसके साथ उसे पसंद भी आ रहा है या नहीं… या उसकी नयी यादो में उसे कभी ये पसंद भी रहा होगा?

ac10
जब सुमति अपना पेटीकोट उतार रही थी, तभी चैतन्य उसके कमरे में आ गया था.

सुमति को पता चल गया था कि चैतन्य अब अपनी बेल्ट खोल रहा था. वो जानती थी कि अब उसके साथ क्या होने वाला है. क्या वो उसे रोक पाएगी? वो सोचती ही रही कि चैतन्य अपनी पेंट निचे कर अपने लिंग को सुमति के कुलहो के बीच की दरार में जोर से दबाने लगा. उसने एक बार फिर सुमति के स्तनों को अपने हाथो से जोर से मसला. और फिर सुमति को निचे झुकाकर उसने सुमति के पेटीकोट को उतार दिया. आज चैतन्य सुमति पर हावी हो रहा था… अपनी वासना में एक पल के लिए भी उसने नहीं सोचा कि सुमति क्या चाहती है. उसने अपने जोश में सुमति की पेंटी निचे उतार दी और फिर उसने वही किया जो हर आदमी इसके आगे करता है. “आआआ..आ.हहह”, ये आवाज़ सुमति के उन्माद की न थी बल्कि दर्द में निकली एक कराह थी. चैतन्य का लिंग सुमति की योनी के लिए काफी बड़ा मालूम हो रहा था. औरतों को तो अपने अन्दर पुरुष लिंग को लेना अच्छा लगना चाहिए न? पर सुमति को तो ऐसा नहीं लग रहा था. वो दर्द में थी और अन्दर ही अन्दर रो रही थी और चैतन्य उसकी भावनाओं को समझे बगैर एक वहशी की तरह सुमति के स्तनों को दबा रहा था.

पर अचानक ही जैसे चैतन्य को होश आया. उसे समझ आ रहा था कि कुछ गलत हो रहा है. सुमति आज वैसी नहीं थी जैसे वो उसे जानता था. प्यार करते वक़्त सुमति कभी इस तरह से नहीं रहती थी. उसने झट से अपने लिंग को खिंच लिया. “आई ऍम सॉरी सुमति यदि मैंने तुम्हे दर्द दिया हो तो. मुझे तुम्हारे साथ ज़बरदस्ती नहीं करनी चाहिए थी. मैं कभी तुम्हारे साथ ज़बरदस्ती नहीं करूंगा. मुझे माफ़ कर दो सुमति. मैं दुबारा कभी ऐसा नहीं करूंगा.” न जाने चैतन्य को क्या हुआ और वो बदहवासी में सुमति से माफ़ी मांगने लगा. अभी जो हुआ ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था उन दोनों के बीच. वो अन्दर ही अन्दर परेशान हो उठा. आज न जाने कैसे सुमति को अपनी आँखों के सामने नग्न देख कर वो बेकाबू हो गया था. उसे अपने किये पर शर्म आने लगी और बस तुरंत सुमति के बेडरूम से बाहर जाने लगा.

और सुमति? सुमति तो बिस्तर पर अपना चेहरा गडाए अपने पेट के बल लेटी रह गयी. उसका पेटीकोट अब भी उसके घुटनों निचे था और उसकी पेंटी भी निचे सरकी हुई थी. और उसकी आँखों में आंसूओं की मोटी मोटी बूँदें थी. अब उसे सब कुछ याद आ गया था. उसकी नयी यादों में जिसमे वो हमेशा से औरत थी, वो कभी भी पुरुषो की तरफ आकर्षित नहीं थी… उसे कभी भी पुरुष के साथ सेक्स करने की इच्छा नहीं हुई थी. और वो पल जब उसने चैतन्य के साथ प्यार किया था, वो सिर्फ इसलिए था क्योंकि वो जानना चाहती थी कि क्या वाकई में वो पुरुष को पसंद नहीं करती है. अपने नए जीवन में भी सुमति पहले की तरह सिर्फ और सिर्फ औरतों की तरफ आकर्षित होती थी. शायद इसलिए वो चैतन्य पर हावी होकर सेक्स करती थी ताकि वो हर तरह से देख ले कि उसे कोई आदमी सुख दे सकेगा या नहीं. भले अपने नए सच को जानने के लिए उसने चैतन्य का इस्तेमाल किया था पर उन पलों में चैतन्य सुमति के साथ भावुक रूप से जुड़ गया था.

एक औरत के रूप में नयी ज़िन्दगी इतनी सुन्दर भी नहीं होगी जितना सुमति ने सोची थी. आज दुनिया में हर कोई सुमति को सिर्फ और सिर्फ एक औरत के रूप में ही जानता है. पर सिर्फ सुमति ये सच जानती है कि वो एक पुरुष के रूप में जन्मी थी और कल तक एक आदमी थी. वो असली जीवन में एक क्रोस-ड्रेसर थी. पर अब इस नयी दुनिया में तो उस आदमी के अस्तित्व के बारे में भी किसी को नहीं पता. न जाने ये कैसी माया कैसा जादू था… सुमति अब तक नहीं समझ सकी थी इस बात को. पर एक बात वो समझ गयी थी. भले ही तन से वो आज एक पूरी औरत थी पर दिल-दिमाग से वो आज भी कल तक वाली आदमी थी जो एक क्रॉसड्रेसर था. उसका दिमाग भले स्त्रियों की हर चीज़ की तरफ आकर्षित था, वो सब कुछ औरतों की तरह करना चाहती थी पर शारीरिक रूप से भी वो सिर्फ औरतों के तरफ आकर्षित थी…. पुरुष की तरफ नहीं. अब इस नयी दुनिया में वो एक अच्छी बहु तो बन सकती थी पर कभी एक अच्छी पत्नी नहीं बन सकती थी. वो जानती थी कि भले वो घर एक कुशल गृहिणी की तरह संभाल सकती थी पर वो कभी अपने पति को तन का सुख नहीं दे सकती थी. ये औरत का शरीर जो एक घंटे पहले तक एक वरदान लग रहा था … अब सुमति को वही तन एक श्राप लग रहा था. इस नए सच को जानकर सुमति की आँखों से अश्रुधरा बह निकली. क्या एक क्रॉसड्रेसर के रूप में उसकी ज़िन्दगी इस औरत की ज़िन्दगी से बेहतर थी? ये सवाल रोती हुई सुमति के मन में घूम रहा था.

क्रमश: …

सभी भागो के लिए यहाँ क्लिक करे

< भाग ९ भाग ११ >

यदि आपको कहानी पसंद आई हो, तो अपनी रेटिंग देना न भूले!

free hit counter

The daughter who never was – Part 6

My story of how I learnt to live my life as a woman while facing humiliation


Please use the star rating option above to rate this story!

हिंदी में पढ़े/ Click here for all the parts

Morning

After finishing breakfast, Shikha didi helped me with the breakfast. I felt really nice when I touched my own soft smooth skin after years. The satin nightie that I was wearing was slipping effortlessly over my body and got me excited a little.

“OK, dear. Now, you should go and take a hot bath. And take out a beautiful saree from my cupboard to get ready. I don’t want to hear our mother nagging about your looks.”, Shikha didi said as she touched my legs to inspect for any spots that may have been left. She wanted to ensure that my waxing was perfect. She seemed satisfied with her work.
Continue reading “The daughter who never was – Part 6”

बेटी जो थी नहीं – ६

My story of how I learnt to live my life as a woman while facing humiliation


कृपया ऊपर दी हुई स्टार रेटिंग का प्रयोग कर इस कहानी को रेट करे!

Read in English/ कहानी के सभी भागो के लिए क्लिक करे

सुबह

नाश्ता करने के बाद शिखा दीदी ने मेरी फुल बॉडी वैक्सिंग की. सालो बाद अपनी मखमली कोमल त्वचा को महसूस करके मुझे अच्छा तो बहुत लग रहा था. अब दीदी की दी हुई सैटिन की मैक्सी भी मेरे तन पर फिसलते हुए मुझे रोमांचित कर रही थी.

“अच्छा वैक्सिंग तो हो गयी. अब नहा ले और मेरी अलमारी से अच्छी सी साड़ी निकाल कर तैयार हो जा. माँ को कोई शिकायत का मौका नहीं मिलना चाहिए.”, शिखा दीदी ने मेरे पैरो पर हाथ फेरते हुए कहा. वो देख रही थी कि कहीं कोई हिस्सा रह तो नहीं गया वैक्सिंग के लिए. अपने काम से वो संतुष्ट दिखी.
Continue reading “बेटी जो थी नहीं – ६”

The daughter who never was – Part 5

My story of how I learnt to live my life as a woman while facing humiliation


Please use the star rating option above to rate this story!

हिंदी में पढ़े/ Click here for all the parts

Freedom

“Listen, now that you are going to a big city, don’t forget our culture and your manners. I have heard the kind of things the girls from big cities do. Don’t ever forget your limits!”, my mother Gita said as she filled my suitcase with sarees and salwar suits.

z1.jpg
I was going to receive my freedom soon

The time to go and attend my college in Delhi had arrived. My sister Shikha didi and her husband Vinay will be coming to take me with them soon. After years of wait, I was finally ready to be free from the control of my evil mother Gita. I will now be free to live my life as a boy in my new college. But still, my mother was packing my bag with sarees and salwar suits. May be she had really become a mad woman, or she was trying to ignore the fact that she had forced me to live the life of a girl, which I never intended to be. I never saw any remorse or regret on her face for all the bad things she did to me. I silently listened to whatever she was saying to me. It was just a matter of a few hours, and I will be free soon! Continue reading “The daughter who never was – Part 5”

बेटी जो थी नहीं – ५

My story of how I learnt to live my life as a woman while facing humiliation


कृपया ऊपर दी हुई स्टार रेटिंग का प्रयोग कर इस कहानी को रेट करे!

Read in English/ कहानी के सभी भागो के लिए क्लिक करे

आज़ादी

“अच्छा सुन, शहर जाकर अपने रंग ढंग न बदल लेना. मैंने सुना है बड़े शहरों के कॉलेज में लडकियां कैसे कैसे गुल खिलाती है. अपनी मर्यादा मत भूलना!”, मेरी माँ ने मेरे सूटकेस में कुछ साड़ियाँ और सलवार सूट भरते हुए कहा.

z1.jpg
अब जल्दी ही मैं अपनी माँ के चंगुल से आज़ाद होने वाली थी.

मेरे दिल्ली में कॉलेज जाने का समय आ चूका था. थोड़ी ही देर में शिखा दीदी और विनय जीजू मुझे अपने साथ लेने के लिए आने ही वाले थे. अब सालों के इंतज़ार के बाद मैं अपनी क्रूर माँ गीता के चंगुल से आज़ाद होकर कॉलेज में एक लड़के के रूप में पढने वाली थी. पता नहीं फिर क्यों मेरी माँ गीता मेरे लिए साड़ियाँ और सूट भर रही थी. या तो वो पागल हो गयी थी या फिर वो इस बात को अनदेखा करना चाहती थी कि अपने जिस बेटे को उसने ज़बरदस्ती एक लड़की का जीवन जीने मजबूर की है, वो अब फिर से लड़का बन कर रहना चाहता है. उसके चेहरे पे उसने जो कुछ भी मेरे साथ किया उसके लिए कभी पश्चाताप या दुःख नहीं देखा मैंने. मैं चुपचाप उसकी बातें सुनती रही. बस कुछ ही घंटे और सहना था मुझे और फिर मैं आज़ाद पंछी. Continue reading “बेटी जो थी नहीं – ५”