इंडियन लेडीज़ क्लब: भाग १३

सुमति और अंजलि आज मधुरिमा से मिलने जा रही थी. क्या मधुरिमा के पास सुमति के सवालो का जवाब होगा?


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मधुरिमा का स्वर्ग

बाथरूम से फ्लश चलने की आवाज़ हुई, और दरवाज़ा खोल कर सुमति अपनी साड़ी ठीक करती हुई बाहर निकली. “उफ़.. ये इंडियन स्टाइल के टॉयलेट में साड़ी पहनकर जाना ज़रा भी आसान नहीं होता!”, सुमति ने शिकायत भरे लहजे में कहा. वो अपनी कमर के निचे की प्लेट को हिलाकर सुधार रही थी ताकि वो अपने पहले के रूप में आ जाए. वैसे भी टॉयलेट चाहे इंडियन हो या वेस्टर्न, हमेशा से आदमी के रूप में जाने की आदत के बाद औरत के रूप में जाना तो मुश्किल ही था सुमति के लिए.

सुमति की परेशानी देखकर अंजलि जोर जोर से हँसने लगी. उसने अपने बालो का जुड़ा खोला और फिर अपने बालों को पीछे एक रबर बैंड से बाँधने लगी. “तेरी साड़ी पीछे ऊपर अटक गयी है कमर पर. ठीक कर ले वरना ऐसे ही बाहर जायेगी तो दुनिया हँसेगी हम पर!”, अंजलि ने सुमति को चेताया.

सुमति ने पीछे पलट कर देखा तब उसे पता चला कि बाथरूम के बाद पेंटी ऊपर चढाते वक़्त उसकी साड़ी और पेटीकोट उसकी पेंटी में अटक गयी थी. बड़ी ही हास्यास्पद स्थिति थी और अंजलि का हँसना रुक ही नहीं रहा था. सुमति को थोड़ी शर्म सी महसूस हो रही थी. भले ही हँसने वाली स्थिति थी, पर एक औरत के रूप में सुमति को सावधान रहना होगा भविष्य में. “आई हेट दिस!”, सुमति गुस्से में बोली, “… देख, मेरी प्लेट भी अब सही से नहीं बन रही है. मुझे खोल कर फिर से ठीक करना होगा” सुमति थोड़ी सी उदास दिख रही थी. शायद वो ड्रामा क्वीन बन रही थी पर उसकी मुसीबत असली थी.

“अब शांत भी हो जाओ मैडम. मैंने तुझे पहले भी कितनी बार समझाया है कि प्लेट की लम्बाई में दो सेफ्टी पिन का उपयोग किया कर. एक सबसे ऊपर कमर के पास और दूसरी कुछ इंच निचे. अब याद रखेगी न? इधर आ मैं ठीक कर देती हूँ प्लेट”, अंजलि बोली. अंजलि अब भी पहले की ही तरह थी, सहायता करने वाली, प्यार से भरी हुई औरत. जब वो आदमी थी तब भी उसके अन्दर एक अच्छी औरत के सारे गुण मौजूद थे. उसने सुमति की साड़ी सुधारने में मदद की और फिर उसके बाद बोली, “अब ठीक है?” वो मुस्कुरायी और सुमति की आँखों में देखने लगी. सुमति अब ठीक मूड में थी. उसने हाँ में सर हिलाया और अपनी सहेली की तरह देख कर मुस्कुराने लगी.

इसके बाद अंजलि भी खुद तैयार होने लगी. वो एक पुराने से लम्बे आईने के सामने खड़े होकर अपने बालों पर कंघी कर सुलझाने लगी, और फिर से एक रबर बैंड से उन्हें बाँध ली. “कितनी प्यारी है अंजलि!”, सुमति मन ही मन सोचने लगी. वो भगवान को शुक्रिया अदा कर रही थी कि उसे अंजलि जैसी सहेली मिली.

“तो सुमति मैडम? हम चले? मैं तो तैयार हूँ अब”, अंजलि सुमति की ओर पलट कर बोली. “तू ऐसे चलेगी? तुझे मेकअप नहीं करना है तो कम से कम साड़ी तो बदल ले. सुबह से घर के काम करते वक़्त से यही साड़ी पहनी हुई है”, सुमति ने अंजलि को लगभाग डांट ही दिया.

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अंजलि ने अपने बालो का जुड़ा खोला और अपने बालो को एक रबर बैंड से बाँध कर कुछ ही मिनट में जाने को तैयार हो गयी. पर सुमति चाहती थी कि अंजलि साड़ी बदल ले..

“जैसी आपकी आज्ञा सुमति मैडम! मैं बदलती हूँ साड़ी. मुझे ५ मिनट लगेंगे बस”, अंजलि ने सुमति के गुस्से को शांत करना चाहा.

“अंजलि, तुझे याद है कि कैसे लेडीज़ क्लब में सबसे अच्छा मेकअप करना तुझे ही आता था. और आज तू नेल पोलिश तक नहीं लगायी है.”, सुमति बोली.

“मेरी प्यारी सुमति. तब मैं हाउसवाइफ नहीं थी न.. दिन में दर्जनों बर्तन धोने के बाद कोई नेल पोलिश नहीं टिकती है. समय बदल गया है. अब मेकअप के अलावा कई बातें है जो एक औरत के रूप में मुझे आनंद देती है. तो मेकअप के लिए समय निकालना अब मेरे लिए ज़रूरी नहीं है. समझ रही तू?”, अंजलि अपनी अलमारी में साड़ी ढूंढते हुए बोली. सुमति कुछ कह न सकी. अंजलि की प्राथमिकताएं अब बदल गयी थी. अब वो एक खाली समय में सजने वाली क्रॉसड्रेसर नहीं थी, अब वो एक माँ और एक गृहिणी थी जिसके लिए कपडे पहनना टाइम पास नहीं था. तब तक अंजलि ने एक नीली और ग्रे रंग की साड़ी निकाल ली. उसने सुमति को इशारा किया कि उसे साड़ी बदलने के लिए थोड़ी प्राइवेसी चाहिए.

“क्या यार…. जब तू आदमी थी तब तो नहीं शरमाई तू मेरे सामने कपडे बदलने से.”, सुमति ने चुटकी लेते हुए कहा. “हाँ तू सही कह रही है”, अंजलि ने धीमी आवाज़ में कहा. फिर थोड़ी देर बाद बोली, “तब मेरे पास बूब्स नहीं थे न छुपाने के लिए!” सुमति भी थोडा हँस दी उसकी बात सुनकर. “तब तो मेरे पास भी बूब्स नहीं थे. पर अब… हम्म… तू देखना चाहेगी मेरे बूब्स?”, सुमति बोली.

“चल हट बड़ी नटखट हो गयी है तू. मुझे तेरे बूब्स देखने की ज़रुरत नहीं है. मेरे अपने बूब्स को देख कर ही खुश हूँ मैं. ३४DD साइज़ है मेरा… पता है तुझे?”, अंजलि ने ब्लाउज पर से ही अपने बूब्स को छूते हुए कहा. “चल अब मैं ब्लाउज बदल रही हूँ. झाँकने की कोशिश मत करना”, अंजलि ने मज़ाक में कहा और अपना ब्लाउज उतारने लगी. अन्दर उसने एक बेहद ही साधारण सी सफ़ेद रंग की ब्रा पहनी हुई थी. उसके स्तन तो बेहद सुन्दर आकार के थे, पर उसकी ब्रा थोड़ी बदसूरत सी थी. अंजलि के लिए समय सचमुच बदल गया था. एक क्रॉसड्रेसर के रूप में उसके पास कई महँगी और फैंसी ब्रा हुआ करती थी. तब तो ऐसे ब्रा वो कभी न पहनती. पर अब की आर्थिक स्थिति में शायद वो यही मैनेज कर पाती हो किसी तरह. “शायद मुझे अंजलि को अच्छी ब्रा गिफ्ट करनी चाहिए.”, सुमति सोच में पड़ गयी. जहाँ तक सुमति अंजलि को समझती थी, अंजलि सुन्दर ब्रा पाकर ज़रूर खुश होगी.

अंजलि खुद इस वक़्त सोच रही थी कि अपनी सहेली के सामने कपडे बदलने में वो इतना शर्मा क्यों रही थी. सुमति के साथ तो उसने कितने बार कपडे बदले थे. शायद उसे थोड़ी सी शर्म आ रही थी कि अब उसके अन्तःवस्त्र इतने सुन्दर न थे. उसने झट से अपना पेटीकोट उतारकर दूसरा पेटीकोट पहन लिया. और फिर उसने अपनी नीली रंग की साड़ी पहनी जिस पर काले पोल्का डॉट बने हुए थे. उसका ब्लाउज उसके स्तनों पर बहुत बढ़िया फिट आ रहा था और आस्तीन भी उसकी मांसल बांहों पर बिलकुल सही फिट आ रही थी. सेक्सी दिख रही थी अंजलि. अब जब इस औरत के नए जीवन में अंजलि और सुमति लेस्बियन थी, तो अंजलि की तरह सुमति का आकर्षित होना स्वाभाविक था. पर फिर भी इस आकर्षण को काबू में रखना है, यह दोनों ने थोड़ी देर पहले ही तय किया था. सुमति इस वक़्त सिर्फ अपनी सहेली को देखकर एडमायर करती रही.

अपने कहे अनुसार, अंजलि ५ मिनट में तैयार भी हो गयी. “ओह राजकुमारी सुमति जी, मैं तैयार हूँ. मधुरिमा आंटी का घर यहाँ से १० मिनट की दूरी पर है. तो चलते है अब. मुझे फिर १ बजे के पहले वापस भी आना है. सास ससुर को खाना खिलाने.”

अपनी सहेली को तैयार देख सुमति उसके पास चल कर आई और उसके एक हाथ को पकड़ कर बोली, “किसी की नज़र न लगे तुझे”

अंजलि ने फिर अपना घर लॉक किया और दोनों सहेलियां गेट की ओर बढ़ने लगी. “अंजलि प्लीज़ एक बार मेरी साड़ी देख ले पीछे से. कहीं और अटकी तो नहीं है? बाहर सड़क पर शर्मिंदगी नहीं झेल सकूंगी मैं” सुमति अब भी चिंतित थी. “सब ठीक है. अब चल इस रास्ते जाना है”, अंजलि ने कहा और दोनों चल पड़ी.

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अंजलि ने जल्दी से साड़ी बदल ली. अपने नीले ब्लाउज और काले पोल्का डॉट की साड़ी में सेक्सी लग रही थी वो. उसने घर पे ताला लगाया और दोनों सहेलियां निकल गयी मधुरिमा से मिलने के लिए.

“अंजलि तुझे याद है करीब २ साल पहले हम दोनों दोपहर में घर से बाहर औरत बनकर निकली थी?”, सुमति ने पूछा. “कैसे भूल सकती हूँ वो दिन? कितना पीछे पड़ना पड़ा था मुझे तेरे. तू तो भीगी बिल्ली की तरह घबरायी हुई थी. मेकअप में पसीने छूटे हुए थे तेरे. और ५ मिनट में तू घर वापस भी हो गयी थी.”, अंजलि ने सुमति की ओर देख कर कहा.

“अब बात को इतना भी बढ़ा चढ़ा के मत बोल. पूरे १५ मिनट बाहर थे हम!”, सुमति ने शिकायती लहजे में नखरे भरे हावभाव करते हुए कहा. “चल ठीक है. फिर भी ५ मिनट न सही पर तू १० मिनट भी बाहर नहीं थी. और डर के मारे वापस घर की ओर दौड़ कर भागते हुए तू बार बार अपनी ही साड़ी पर पैर रख रही थी. और वैसे भी ३ इंच की सैंडल पहन कर कौनसी औरत दौड़ती है भला?”, अंजलि सुमति को छेड़ रही थी.

“हाँ मैं मान लेती हूँ कि मैं एक मुर्ख औरत थी तब. पर अब देखो… हम अब दो खुबसूरत औरतें है और खुले आसमान के निचे अब हम बेफिक्र होकर घूम सकती है. मैं तो मधुरिमा माँ से मिलने को लेकर बहुत उत्साहित हूँ. कैसी है वो? तेरी बात हुई थी उनसे?”, सुमति ने पूछा. (सुमति एक क्रॉसड्रेसर के रूप में मधुरिमाँ को अपनी माँ मानती थी)

सुमति सही कह रही थी. खुली हवा में दोनों औरतें आज बेफिक्र थी. और अचानक से बहती तेज़ हवा जैसे उनसे सहमत थी. उन दोनों की साड़ी और पल्लू उस तेज़ हवा के झोंके में आज़ादी की ख़ुशी में लहराने लगे थे. उन दोनों ने जल्दी से अपने पल्लू और साड़ी को अपने हांथो से पकड़ कर संभालने की कोशिश की. वो हवा का झोंका भी जल्दी ही चला गया. उस वक़्त सड़क किनारे कुछ आदमी भी थे जो इन खुबसूरत औरतों को देख रहे थे जो उन नजरो से बेफिक्र होकर अपनी ही दुनिया में मग्न थी.

“तुझे तो पता ही है की मधुरिमा आंटी की तबियत ठीक नहीं रहा करती थी. अब भी वैसी ही है. उनकी पत्नी अजंता आंटी अब उनके पति जयंत है! तो सरप्राइज मत होना यदि जयंत अंकल मिले आज घर पर. तुझे याद है न अजंता आंटी कितनी प्यारी थी? (भाग ३ में अजंता के बारे में पढ़े) वो हमेशा हमें कितने प्यार से घर में बुलाती थी. कभी हमारी क्रॉसड्रेसिंग को लेकर हमें बुरा नहीं महसूस कराया उन्होंने. अब वो आदमी है पर पहले की ही तरह उतने ही स्वीट है वो. मधु आंटी का बेहद प्यार से ध्यान रखते है”, अंजलि ने सुमति को बताया.

सुमति को जवाब सुनकर अच्छा लगा. और फिर दोनों सहेलियां बातें करती चलती रही. और जल्दी ही मधु आंटी के घर के बाहर पहुच गयी. दरवाज़े पर अंजलि घंटी बजाने वाली ही थी कि सुमति ने उसका हाथ झटककर अंजलि को रोक लिया. “रुक न ज़रा…. एक बार देख कर बता मैं ठीक लग रही हूँ न? मेरे बाल सही है?”

“हे भगवान! तू न एक विचित्र औरत बन गयी है! महारानी सुमति आप बहुत सुन्दर लग रही है. अपने हुस्न की चिंता करना बंद करे!”, अंजलि बोली. “ऐसे भी न बोल यार… मुझे तो बस लगा कि उस तेज़ हवा में मेरे बाल बिखर गए होंगे.”, सुमति ने उदास स्वर में कहा. अंजलि ने फिर दरवाज़े पर घंटी बजायी.

और थोड़ी देर में जयंत अंकल ने दरवाज़ा खोला. और जैसे ही सुमति ने उन्हें देखा, उसे ध्यान आया की उसकी साड़ी का आँचल थोडा ज्यादा उठा हुआ है इसलिए उसकी बांयी ओर से उसका ब्लाउज और उसका उभार दिख रहा है. उसने तुरंत अपने आँचल को अपने बांये हाथ से निचे खिंचा और ब्लाउज को ढँक कर जयंत अंकल के पैर छूने को झुक गयी. “नमस्ते अंकल”, दोनों औरतों ने अंकल को प्रणाम किया. “आओ आओ बेटी. पहले अन्दर तो आओ. तुम्हारी आंटी तो तुम्हारा कब से इंतज़ार कर रही है!”, अंकल ने कहा.

और अंकल के पीछे पीछे दोनों चल दी. चलते चलते सुमति ने कुहनी से अंजलि की कमर पर वार करते हुए फुसफुसा कर बोली, “मेरा ब्लाउज बाहर दिख रहा था तूने बताई क्यों नहीं थी पहले?” अंजलि बस देख कर हँस दी. सुमति को थोडा सा अजीब लग रहा था कि उसकी प्यारी अजंता आंटी अब जयंत अंकल बन चुकी थी. और जयंत अंकल को तो कोई अंदाजा भी नहीं था कि वो कभी इतनी प्यारी ममता भरी औरत हुआ करते थे. सुमति और इंडियन लेडीज़ क्लब की औरतों की दुनिया में आया हुआ ये बदलाव हुए अब २ दिन हो गए थे, फिर भी सब कुछ किसी सपने सा ही मालूम होता था. अभी भी सुमति को यकीन नहीं होता था. भले ही इस जीवन के कुछ हिस्से उसे अच्छे लगे थे पर शायद अन्दर ही अन्दर वो चाह रही थी कि ये यदि सपना है तो जल्दी ख़त्म हो और वो अपने पहले वाले जीवन में जा सके.

“अच्छा अब तुम दोनों अन्दर जाकर आंटी से मिल लो. मैं चाय पानी लेकर आता हूँ.”, अंकल ने कहा. “अंकल जी कोई ज़रुरत नहीं है चाय पानी की. हम तो बस १० मिनट चल कर आये है. अभी तो प्यास भी नहीं लगी है.”, अंजलि बोली.

और फिर दोनों घर के अन्दर बढ़ चले उस कमरे में जहाँ मधुरिमा आंटी थी. ऐसा लग रहा था कि जैसे बस अभी अभी तैयार हुई है वो. शायद दरवाज़े की घंटी बजने पर वो जल्दी जल्दी में तैयार हुई होंगी. मधुरिमा ने पलट कर सुमति और अंजलि को देखा. उनके चेहरे पर पहले की ही तरह एक बड़ी सी प्यार भरी और शरारती मुस्कान थी.

“तो मेरी प्यारी बेटियाँ आ गई है! आओ मुझसे गले नहीं मिलोगी”, मधु ने उन दोनों को देखते ही कहा. और दोनों दौड़कर आंटी को गले लगाने आ गयी. मधु आंटी अपने आकर में इतनी बड़ी तो थी कि दोनों को एक साथ गले लगा सके. उन्होंने दोनों को माथे पे प्यार से चूम लिया जैसे एक माँ करती हो. मधु जी एक बड़ी औरत थी जिनका सीना भी बेहद बड़ा था. जब वो एक आदमी थी तब भी उनके पास बड़े स्तन थे. ये सब उनकी तबियत खराब होने की वजह से था… दवाइयों का साइड इफ़ेक्ट जिसकी वजह से उनका वजन बढ़ गया था. पर उनके मोटापे की वजह से उनका जो रूप था बड़ा मातृत्व भरा रूप लगता था. हमेशा हंसती रहती और शरारत करती रहती. सभी को उनसे गले मिलकर अच्छा लगता था क्योंकि उनके पास तब भी ममता से भरे असली स्तन थे. और फिर वो सबको अपनी हरकतों और बातों से हंसाती भी तो रहती थी.

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मधुरिमा अंजलि और सुमति के लिए माँ की तरह थी.

“चलो लड़कियों, अब बैठ भी जाओ. और अपनी आंटी को अपनी पूरी जीवन कहानी सुनाओ. तुम दोनों को अपनी बूढी आंटी की याद आई, मैं तो बस इसी बात से बहुत खुश हूँ”, मधु बोली.

“बूढी आंटी? अरे आप तो अभी हॉट जवान औरत हो माँ”, सुमति ने छेड़ते हुए कहा. “जानती हूँ जानती हूँ. तुम दोनों से भी ज्यादा सुन्दर हूँ मैं. पर तुम दोनों को हीन भावना न हो जाए इसलिए कह रही थी मैं.”, मधु ने नैन मटकाते हुए कहा. ऐसे ही मसखरी करती थी वो हमेशा.

“अच्छा बताओ, कुछ कहोगी? जयंत अंकल बना देंगे तुम्हारे लिए कुछ”, मधु ने पूछा. “आंटी चिंता मत करो. हम बस अभी अभी घर से पोहा खाकर ही निकली है”, अंजलि बोली. वो अंकल आंटी को परेशान नहीं करना चाहती थी. पर तब तक अंकल चाय बिस्कुट लेकर आ गए थे. “लेडीज़, अब मैं तुम सभी को अपनी बातें करने के लिए छोड़ कर जा रहा हूँ. मुझे बाहर पौधों को पानी देना है. कोई भी ज़रुरत हो तो आवाज़ दे देना मुझे.”, अंकल न कहा. “थैंक यू अंकल”, सुमति बोली.

अब जब अंकल जा चुके थे तो मधु सुमति की ओर देख कर बोली, “सुमति बेटी, सब ठीक है नए जीवन में?” वो जानती थी कि ये अचानक आया हुआ बदलाव किसी के लिए आसान नहीं था.

“सब कुछ अच्छा है माँ! अब तो मेरे शादी भी होने वाली है. तुम्हारे बेटी दुल्हन बनने वाली है. और तुम्हे मेरी शादी में ज़रूर आना है. अपनी बेटी को सुन्दर लहंगे में देखने तो आना ही पड़ेगा तुम्हे. कोई बहाना नहीं चलेगा!”, सुमति ने ख़ुशी से मधु से कहा. वो मधु को शायद दिलासा देना चाहती थी कि सुमति अब ठीक है.

“अरे क्यों नहीं… ज़रूर आऊंगी मैं. अपनी प्यारी बेटी को खुबसूरत दुल्हन के जोड़े में देखने ऐसे कैसे नहीं आऊंगी मैं. भले मुझे अपने भारी भरकम शरीर के साथ पैदल भी चलना पड़े तो भी मैं आऊंगी.”, मधु बोली. तीनो औरतें बातें करती हुई हँस दी. पर कोई भी नए जीवन की वजह से आई हुई परेशानियों के बारे में बात नहीं कर रहा था. कुछ देर और हँसी-ठिठोली करने के बाद मधु गंभीर हो गयी.

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मधुरिमा ने सुमति और अंजलि से बैठने को कहा. वो उन दोनों से कुछ गंभीर बात करना चाहती थी.

“अंजलि, सुमति. मेरी बात ध्यान से सुनना. शायद तुम दोनों अपने दिल की बात कहने को अभी तैयार नहीं हो. पर तुम भी जानती हो कि औरत बनने के बाद से नयी कठिनाइयां आई होंगी. पर तुम दोनों हमेशा मुझ पर भरोसा कर सकती हो. मैं तुम दोनों के लिए पहले भी माँ समान थी, और आगे भी रहूंगी. तुम दोनों यदि अभी कुछ कहना नहीं चाहती हो तो न सही. पर मैं तुमसे कुछ कहना चाहती हूँ जो शायद तुम दोनों की मदद करे. ठीक है?”, मधु बोली. अंजलि और सुमति ने हाँ में सर हिला दिया. कितनी किस्मत वाली थी दोनों जो उन्हें मधु के रूप में एक माँ मिली थी जो उनकी असली माँ से ज्यादा उन दोनों के बारे में जानती थी.

“मुझे नहीं पता कि हम सब रातोरात औरतें कैसे बन गयी. और तुमने भी ये महसूस किया होगा कि हमारे आसपास की दुनिया भी कुछ बदल गयी है. हमारे अलावा किसी को याद तक नहीं कि हम कभी आदमी भी थे. सबके दिमाग में अब नयी यादें है जिसमे हम उनकी नजरो में हमेशा से औरतें थी. मुझे तो बहुत अच्छी लग रही है ये लाइफ, पर मैं पहले भी इतनी ही खुश थी अपनी लाइफ से. पर एक बात ज़रूर कहूँगी मैं. तुम्हारे आसपास के लोगो से तुम कैसे बर्ताव करती हो इस बात का ख़ास ध्यान रखना है तुम लोगो को. एक तरह से अपना भविष्य और अपना अतीत दोनों तैयार कर रहे है हम लोग. लोगो से अच्छा बर्ताव करोगी तो बदले में तुम्हारे साथ अच्छा ही होगा. और फिर बुरे बर्ताव का फल भी भुगतना पड़ेगा. यदि तुम अपने नए रूप को ख़ुशी से जीना चाहती हो तो सबके साथ अच्छे से रहो बस. बाकी सब ठीक होगा. सभी को प्यार करो और वो तुम्हे प्यार करेंगे. जो हो गया सो हो गया. वो क्यों हुआ यह हमारे हाथ में नहीं है. पर अपने भविष्य और रिश्तो को संभालना अब तुम्हारा काम है.”

सुमति ने मधु की बात ध्यानपूर्वक सुनी और फिर बोली, “माँ मुझे पूछने में थोडा संकोच हो रहा है क्योंकि ऐसी बात हमने पहले कभी नहीं की. पर आप अपने पति के साथ सम्बन्ध कैसे संभाल रही है? मेरा मतलब है… शारीरिक”, सुमति ने हिचकिचाते हुए पूछा.

सुमति का सवाल सुन मधु मुस्कुरा दी. “सुमति, अब हम उस उम्र में पहुच चुके है जहाँ शारीरिक सम्बन्ध अब बहुत कम बार बनाये जाते है. पर मेरे पति चाहे तो मैं ख़ुशी से उनकी इच्छा पूरी करूंगी. पता है क्यों? तुम्हे अजंता आंटी याद है? कितना ध्यान रखती थी वो मेरा? मेरी सेहत हो या मेरी क्रॉसड्रेसिंग… हर चीज़ में मेरा साथ दिया था उसने. और तुम दोनों को भी तो कितना प्यार करती थी वो. अब जब वो मेरे पति जयंत बन गए है, तो अब भी वो मेरा उतना ही ध्यान रखते है. पति होते हुए भी मेरी सेहत की वजह से घर का सारा काम देखते है. मैं भूल नहीं सकती कि पूरे जीवन में अजंता हो या जयंत, उन्होंने मेरा कितना ख्याल रखा है. और इसलिए कभी कभी मुझे अपना तन उन्हें समर्पित करना हो तो मेरे लिए ये कोई बड़ी बात नहीं है.”

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सुमति उठ कर किचन जाकर सबके लिए पकोड़े तलने लगी. उसके दिल में इस घर से जुडी बहुत सुन्दर यादें थी.

सुमति को उसका जवाब मिल गया था. उसे याद था कि चैताली किस तरह सुमति की क्रॉसड्रेसिंग को जानते हुए भी दुनिया के लिए उसे राज़ ही रहने दिया था. यहाँ तक की सुमति को इसमें कई बार उसने सपोर्ट भी किया था. इसलिए जब चैताली से शादी की बात होने लगी थी तो सुमति ख़ुशी से मान गयी थी. और अब जब वो चैतन्य बन गयी है तो सुमति को एहसास होने लगा कि उसके दिल में अभी भी चैताली और चैतन्य के लिए प्यार है. सुमति भले इस नए जीवन में लेस्बियन बन गयी हो, पर फिर भी वो अपने होने वाले पति के प्रति प्यार और निष्ठा रखने वाली पतिव्रता स्त्री तो बन ही सकती है. क्योंकि उसके दिल में चैताली/चैतन्य के लिए प्यार जो है. कभी कभी बदलाव दिल पर भारी लग सकते है. दिमाग सब कुछ समझ रहा हो तब भी दिल के लिए भावनाओं को काबू करना आसान नहीं होता. ऐसे ही विचार अंजलि के दिल में उमड़ रहे थे. मधु की बातों ने उनकी थोड़ी तो मदद की थी ये समझने में कि वो अपने पतियों के साथ रिश्ता कैसे बनाये रखे. दोनों ही मधु की गोद में सर रखकर कुछ देर ख़ामोशी में रही. और मधु का ममता भरा प्यार जैसे उन्हें नयी उर्जा दे रहा था.

अंजलि और सुमति का मन अब कुछ हल्का हो गया था. सुमति ने कहा कि अब वो सभी के लिए पकोड़े तलेगी. इस घर से तो वो पहले से परिचित थी, इसलिए किचन में जाकर पकोड़े बनाना शुरू करने में उसे समय नहीं लगा. जब जयंत अंकल ने किचन में खटपट सुनी तो वो अन्दर आकर बोले, “अरे बेटा, ये सब तुम्हे करने की क्या ज़रुरत है. मैं हूँ न. मैं बना देता हूँ. तुम्हारे बूढ़े अंकल भी पकोड़े अच्छे बना लेते है” सुमति ने अंकल को देखा और उनके पास आकर बोली, “अंकल आपने वैसे भी मेरे लिए कितना कुछ किया है. मुझे कम से कम पकोड़े बना लेने दीजिये. आप जाकर अंजलि और आंटी के साथ बातें करिए” सुमति को वो दिन याद आ रहे थे जब अजंता आंटी ने उन्हें प्यार से बेटी के रूप में अपने दिल और घर में जगह दी थी.

सुमति जल्दी ही पकोड़े लेकर बाहर आ गयी जहाँ सभी आपस में बातें कर रहे थे. सुमति ने अंजलि की आँखों में देखा. दोनों सोच रही थी कि अब सब ठीक ही होगा. उनका दिल कह रहा था. आखिर सामने मधु और जयंत का प्यार उनके मन में एक नयी उम्मीद जगा रहा था. मधु के अन्दर जयंत के लिए शारीरिक आकर्षण न रहा हो पर उन दोनों के बीच का प्यार असीमित था. अंजलि और सुमति को उन्हें देख लगा कि उनका भी उनके पतियों के साथ ऐसा प्यार भरा रिश्ता हो सकता है. सब ठीक ही होगा.

क्रमश: …

Image Credits: Lasi_Beauty on Flickr (a beautiful crossdresser) and xossip.com

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इंडियन लेडीज़ क्लब: भाग १२

सुमति और अंजलि की प्यार भरी कहानी. दो सहेलियां जो औरत बनने के बाद पहली बार मिल रही थी. क्या एक दुसरे के अनुभव से उनका ये नया जीवन कुछ सरल हो सकेगा?


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अंजलि की कहानी

सुमति अगली सुबह जल्दी ही उठ गयी. उसे सुबह ८ बजे अंजलि से मिलने जो जाना था. जब से सुमति औरत बन गयी है, अंजलि ही बस एक औरत थी इंडियन लेडीज़ क्लब की जिससे सुमति संपर्क कर सकी थी, और अंजलि भी अब एक औरत बन चुकी थी. न जाने कितनी ही बातें करनी थी दोनों को. तैयार होते वक़्त सुमति सोच रही थी कि अंजलि ने उसे पारंपरिक कपडे पहन कर क्यों आने कहा है. कोई और समय होता तो सुमति ख़ुशी से साड़ी पहन कर जाती. पर कल ऑफिस में बुरे अनुभव के बाद जब ऑफिस के आदमी उसकी कमर को बुरी नजरो से देख रहे थे, इस वजह से सुमति का आज साड़ी पहनने का मन नहीं था.

सुमति ने जब अपनी अलमारी देखी तो उसमे सभी सलवार सूट में डीप कट थे जिससे उसका क्लीवेज साफ़ झलकता. अब उसके पास साड़ी पहनने के अलावा कोई चारा नहीं था. साड़ी में वो वैसे भी बहुत शालीन प्रतीत होती है, ये वो अच्छी तरह जानती थी. उसने अपनी अलमारी से बेबी पिंक और सफ़ेद रंग की साड़ी निकाली और झटपट पहनने लगी. आखिर उसे देर जो हो रही थी. उसने साथ में एक मध्यम आस्तीन का ब्लाउज पहना. और फिर खुद को आईने में देखने लगी. सब कुछ ठीक ही तो दिख रहा था. साड़ी उस पर अच्छी लग रही थी. उसने पल्लू से अपने सर को ढंका और सोचने लगी कि वो पारंपरिक दिख रही है या नहीं. वो खुद को ऐसे देख मुस्कुराने लगी. चाहे जो भी हो, अंजलि से मिलने को लेकर वो बेहद उत्साहित थी. आखिर एक अंजलि ही तो थी इस दुनिया में जो उसकी प्रॉब्लम समझ सकती थी… आखिर वो भी सुमति की तरह रातोरात औरत बन गयी थी. उसने फ़ोन देखा और अंजलि का पता नोट किया. अंजलि का घर का पता अब बदल गया था. उसे थोडा सा अचम्भा हुआ क्योंकि सुमति तो अब भी उसी घर में थी जहाँ वो आदमी के रूप में पहले थी. सुमति ने फिर भगवन से प्रार्थना की कि अंजलि सकुशल हो.

सुमति ने फिर ऑटो किया और अंजलि के घर समय पर पहुच गयी. सुबह सुबह दुनिया अब सुमति को अच्छी लग रही थी. एक नयी शुरुआत जो थी. उसने ऑटो से उतर कर ऑटो वाले को पैसे दिए और फिर कमर के निचे अपनी साड़ी की प्लेट को एक हाथ से पकड़ कर अंजलि के घर की ओर बढ़ने लगी. साड़ी को हाथ से थोडा ऊपर उठाना ज़रूरी था क्योंकि सड़क पर पानी और कीचड़ था. वो अपनी साड़ी ख़राब नहीं करना चाहती थी. घर के बाहर से ही पता चल रहा था कि अंजलि का घर किसी सामान्य घर की तरह था जहाँ बच्चे रहते हो. सुबह की गहमा-गहमी उस घर में बाहर से ही पता चल रही थी. देखने में घर काफी पुराना लग रहा था.. ऐसे मानो जैसे उस घर ने भव्य दिन देखे है पुराने समय में पर अब उसे रिपेयर की सख्त ज़रुरत थी.

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सपना की प्यार भरी माँ उसके पीछे टिफ़िन लिए दौड़ी चली आई. अंजलि अब एक माँ बन चुकी थी.

“सपना, अपनी होमवर्क की कॉपी रख ली तुमने?”, सुमति ने एक चिंतित माँ की प्यार भरी आवाज़ सुनी जो अपनी छोटी सी बेटी के पीछे दौड़ी आ रही थी. “हाँ मम्मी. सब पैक कर चुकी हूँ”, उस प्यारी सी बेटी सपना ने कहा जो अपने छोटे नाज़ुक कंधो पर एक बड़ा सा बस्ता टाँगे हुई थी. “अपना लंच मत भूलना”, माँ ने कहा और सपना के पास आकर उसे उसका टिफ़िन दिया. वो माँ कोई और नहीं अंजलि थी. अंजलि अब एक ६ साल की बेटी की माँ थी! उसे देख कर अंजलि एक मध्यम उम्र की हाउसवाइफ लग रही थी. अंजलि के बिखरे हुए बालो से साफ़ पता चल रहा था कि उसकी सुबह बहुत व्यस्त रही होगी अपने परिवार का ध्यान रखने में. सुमति यह सब मुस्कुराते हुए देख रही थी. न जाने क्यों पर कई क्रॉसड्रेसर का एक हाउसवाइफ बनने का सपना होता है, और अंजलि अब वो सपना जी रही थी. पर हाउसवाइफ की ज़िन्दगी इतनी आसान भी तो नहीं होती है.

“हेल्लो सुमति आंटी”, सपना ने कहा जब उसका ध्यान घर के गेट पर खड़ी सुमति पर गया. सपना अपने स्कूल यूनिफार्म में बड़ी प्यारी लग रही थी. उसकी आवाज़ सुन कर तो सुमति के कानो में जैसे शहद घुल गया. सुमति ने झुककर प्यारी सपना को एक आंटी की तरह गले लगाया. “कैसे है मेरी प्यारी सपना?”, सुमति ने अपनी पर्स से एक चॉकलेट निकाल कर देते हुए कहा. “थैंक यु आंटी”, सपना ने ख़ुशी से कहा.

“सपना चलो अब जाने का समय हो गया है. नहीं तो बस छुट जायेगी.”, चिंतित माँ अंजलि ने कहा. साथ ही साथ अंजलि के चेहरे पर ख़ुशी का भाव भी था जब उसने सपना को सुमति आंटी को गले लगाते देखा. सुमति तो पहले भी अंजलि के यहाँ आती थी. पर तब एक आदमी के रूप में. सुमति को पता था कि अंजलि की बेटी थी, इसलिए वो हमेशा चॉकलेट लेकर ही आती थी. पर तब अंजलि एक पिता थी, माँ नहीं जिसे अब सुमति देख रही थी. और सुमति भी अंकल हुआ करती थी आंटी नहीं. पर अब दुनिया बदल चुकी थी, अच्छे या बुरे के लिए यह तो भगवान ही जाने. सपना घर से निकलकर अपनी उम्र की और लड़कियों के साथ बस स्टॉप की ओर चल दी जहाँ उसकी स्कूल बस आती थी. सुमति और अंजलि दोनों ने प्यारी सपना को विदा किया.

अंजलि सुमति को देख कर सचमुच बहुत खुश थी. आखिर उसके सबसे पक्की सहेली थी वो. उसने सुमति को गले लगाया और बोली, “वाह सुमति तुम तो और खुबसूरत हो गयी हो! तुम्हे देख कर बहुत अच्छा लगा सुमति.” इस छोटे से समय में जबसे वो औरतें बन गई थी, दोनों ये सिख चुकी थी कि औरतें एक दुसरे को गले कैसे लगाती है… बिना एक दुसरे के स्तनों को दबाये! शुरू शुरू में थोडा अजीब सा लगता है जब कोई दूसरी औरत आपकी पीठ पर गले लगाते वक़्त अपना हाथ रखती है. पर दोनों तो अपने इंडियन लेडीज़ क्लब के दिनों से इसकी आदि थी.

“तुझे पता नहीं है मैं कितनी खुश हूँ तुझे देख कर अंजलि”, सुमति ने अंजलि से अलग होते हुआ कहा. वो अब भी अपनी सहेली का हाथ पकडे हुए थी. और दोनों एक दुसरे को एक टक देखने लगी.

“बहु हम मन्दिर जाने को तैयार है. हम लोग दोपहर तक वापस आयेंगे. तब तक खाना तैयार रखना.”, अन्दर से एक बुज़ुर्ग औरत की आवाज़ आई. “मेरी सास होगी वो. वो आज मंदिर जा रही है ससुर जी के साथ प्रवचन सुनने के लिए.”, अंजलि ने कहा.

और फिर एक बुज़ुर्ग दंपत्ति घर से बाहर आये… अंजलि के सास ससुर. सुमति उनसे पहले कभी नहीं मिली थी. क्योंकि अंजलि पहले एक आदमी थी और उसके साथ उसके माता-पिता रहते थे. पर अब अंजलि अपने सास-ससुर के साथ रहने वाली औरत थी. उन्हें देखते ही सुमति ने सर पर पल्लू ओढा और उनके पैर छुए. “जूग जुग जियो बेटी”, ससुर ने कहा. “तुम्हारी शादी की तैयारी ठीक तो चल रही है न?”, उन्होंने पूछा. “जी अंकल. अब तो २ दिन में मैं घर भी जा रही हूँ तयारी के लिए.”, सुमति ने जवाब दिया. “हम भी तुम्हारी शादी में ज़रूर आयेंगे बेटी. अभी तो हमें मंदिर जाने के लिए देर हो रही है. फिर मिलते है.”, अंजलि के ससुर ने मुस्कुरा कर कहा और दोनों घर से बाहर चल दिए.

सुमति को थोडा आश्चर्य हुआ कि अंजलि की सास ने उससे एक शब्द तक नहीं कहा. पर उसे उसकी परवाह नहीं थी. “चल, मुझे अपना घर तो दिखाओ मिसेज़ अंजलि!”, सुमति ने अंजलि को छेड़ते हुए कहा. “हां हाँ क्यों नहीं. पर एक बात बता तुझे एहसास हुआ कि नहीं कि मेरी सास तुझे पसंद नहीं करती है?”, अंजलि बोली. सुमति ने अपने सर से पल्लू को फेंकते हुए और अब केयर-फ्री होकर बोली, “हाँ लगा तो सही. पर ऐसा क्यों है? वो मुझे पसंद क्यों नहीं करती है?”

“तो ऐसा है कि हमारी नयी ज़िन्दगी में तुम यहाँ पहले भी एक औरत की तरह आ चुकी हो. पर पहले तुम यहाँ जीन्स टॉप पहन कर आई थी. और मेरी सास ठहरी पुराने ख़यालात की. उन्हें बिलकुल पसंद नहीं आया. उन्हें लगता है कि तुम सपना पर बुरा असर डालोगी.”, अंजलि बोली. “ओह तभी तूने मुझे पारंपरिक कपडे पहन कर बुलाई थी. वैसे तूने ये क्या तुम तुम लगा रखा है. तू बोल! खैर अब सास को छोड़… अपनी लाइफ की सब मसाला स्टोरी सुना मुझे”, सुमति में अब एक नयी जान थी.

सुमति घर के अन्दर जाते ही सोफे पर कूद कर बैठ गयी. वो बड़ी खुश थी अब. क्योंकि पहले उन्हें औरतों के रूप में छिप छिप कर मिलना पड़ता था. पहले वो एक दुसरे के साथ देवरानी जेठानी होने का नाटक किया करती थी. पर अब असल में औरतें थी वो, तो अब छुपने की ज़रुरत नहीं थी.

“ठीक है ठीक है. जल्दी ही होने वाली मिसेज़ सुमति. मैं सब बताती हूँ. पर ज़रा मुझे घर के काम भी करने है मेरे सास-ससुर के आने के पहले. तो तू मुझे काम करते देख और मैं तुझे कहानी सुनाती हूँ. तू चाहे तो मेरी मदद कर देना.”, अंजलि ने भी मुस्कुराते हुए कहा.

“ना ! मैं तेरी इन कामो में कोई मदद नहीं करूंगी. मैं ऑफिस जाने वाली औरत हूँ… हाउसवाइफ नहीं!”, सुमति ने मज़ाक करते हुआ कहा. पर वो अंजलि की मदद करेगी, यह तो अंजलि भी जानती थी.

“तो ठीक है पहले बेडरूम से शुरू करते है”, अंजलि बोली. “वाह! बेडरूम की कहानियाँ तो मेरी फेवरेट है! अपनी हॉट रातों के बारे में डिटेल से बता मुझे!”, सुमति हँसते हुए बोली. “चुप कर पगली. मेरे कहने का मतलब है कि पहले बेडरूम की सफाई करते है.”, अंजलि ने घूरते हुए सुमति से कहा.

अंजलि का घर सचमुच बेहद पुराना था और उसमे ढेरो पुराना फर्नीचर था. कोई भी देख कर कह सकता था कि इस परिवार की आर्थिक स्थिति अब सही नहीं थी. और इतने बड़े घर की देखभाल करने वाली बस अंजलि अकेली थी. पर फिर भी अंजलि एक प्यारी हाउसवाइफ लग रही थी. सुमति ने उसे थोड़ी देर ही अपनी बेटी और सास-ससुर के साथ देखा था, पर वो समझ गयी थी कि अंजलि अब एक आदर्श बहु है. उसके चेहरे पर मोहक मुस्कान थी. अंजलि ने एक पुरानी सैटिन की साड़ी पहनी हुई थी. शायद वो घर के काम करते वक़्त ऐसी साड़ी पहनती हो, सुमति ने सोचा. इसके पहले तो सुमति ने अंजलि को सिर्फ फैंसी साड़ियों में ही देखा था.

अंजलि ने फिर झाड़ू निकाली और एक हाथ से अपने को उठाकर अपने कंधे पर ले लिया. और पल्लू के दुसरे छोर को अपनी कमर में फंसा कर काम शुरू कर दी. अंजलि के सैटिन ब्लाउज में उसके मुलायम स्तन अब साड़ी के बाहर दिख रहे थे. आम तौर पर औरतें काम करते वक़्त साड़ी को यूँ ही करती है ताकि वो काम करते वक़्त उनके बीच न आये. अंजलि बिना मेकअप और गहनों के बिलकुल घरेलु गृहिणी लग रही थी. और साथ ही एक आकर्षक महिला भी. उसके रूप में इतनी सादगी के बात भी आकर्षण था. अंजलि फिर कमरे में झाड़ू लगाने लगी. पर अंजलि को इस तरह काम करते देख सुमति को थोडा दुख हो रहा था. क्योंकि एक आदमी के रूप में, अंजलि की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी थी. और अब? सुमति अंजलि से घर की आर्थिक स्थिति के बारे में बात करना नहीं चाहती थी क्योंकि अपनी सहेली से अभी तो मिली थी वो. “अच्छा मिसेज़ अंजलि. ये तो बताओ कि माँ बनकर कैसा लग रहा है? मैं देख रही थी कि सपना कितना ज्यादा प्यार करती है तुझे.”, सुमति ने ये सवाल जान बुझकर किया था क्योंकि वो जानती थी कि इस सवाल से अंजलि बहुत खुश होगी. कोई भी माँ अपने बच्चो के बारे में बातें करके खुश होती है, और अंजलि तो अभी अभी माँ बनी थी.

अंजलि ने झाड़ू निकाल कर बेडरूम की सफाई शुरू कर दी. उसने साड़ी को इस तरह पहनी थी कि वो एक मिडिल ऐज हाउसवाइफ लग रही थी.

“सुमति तुझे पता नहीं है कि माँ बनना कितना सुखद होता है! क्रॉसड्रेसिंग से बहुत बढ़कर है माँ बनना. मैं तो चाहती हूँ कि तू भी एक दिन माँ बने! पता है तुझे कि सपना तो हमेशा से ही प्यारी बेटी थी. पर जब से मैं उसकी माँ बनी हूँ, हम दोनों के बीच का रिश्ता पहले से भी ज्यादा गहरा हो गया है. मुझे उसके लिए कुछ भी करना बहुत अच्छा लगता है… चाहे उसका लंच बनाना, उसकी चोटी बनाना, उसे तैयार करना, उसके साथ खेलना, सब कुछ. मेरी ही तरह उसे साड़ी का भी बहुत शौक है. जब तब वो मुझे साड़ी पहनाने को कहती है. पर अभी तो साड़ी के लिए वो बहुत छोटी है. तुझे पता नहीं कि न जाने कितने घंटे हम दोनों बातें करती है. वो अपनी माँ को सचमुच बहुत प्यार करती है और मैं भी उसे. वो कहती है कि बड़ी होकर मेरी ही तरह बनेगी. और पता है सबसे खुबसूरत बात क्या है इस अनुभव की? मेरा उसके लिए प्यार अब जैसे अंतहीन हो गया. माँ-बेटी का रिश्ता सचमुच बहुत प्यार भरा होता है सुमति. तू समझ रही है? अभी नहीं समझी तो माँ बनकर तू भी समझ जायेगी.”, गर्व से एक माँ अंजलि ने कहा. और साथ ही वो झाड़ू भी लगाती रही.

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सुमति ने अंजलि की फर्श पर पड़े खिलोनो को समेटने में मदद की. वो सोच में पड़ गयी कि क्या वो भी कभी माँ बनना चाहेगी?

“हाँ, ये सब तो तेरी आँखों की चमक देख कर ही पता चल रहा है कि तुझे माँ बनकर कितना अच्छा लग रहा है.”, सुमति ने मुस्कुराकर कहा. और फिर उस कमरे में फर्श में बिखरे खिलौनों को उठाकर सुमति ने अंजलि की कमरे को साफ़ करने में मदद की. सपना की एक गुडिया को हाथ में पकडे सुमति उसे एक टक देखते हुए सोचने लगी क्या वो कभी चैतन्य के बच्चे की माँ बनना चाहेगी? चाहे माँ बनने का अनुभव कितना भी अच्छा हो, पर उसके लिए उसे चैतन्य के साथ वो करना पड़ेगा जिसे सोच कर ही उसे मन ही मन ख़राब लग रहा था. उसके लिए माँ बनना इतना आसान नहीं होगा. अंजलि की बात और थी, वो तो पहले से ही माँ बन चुकी थी. “तू ये बता तूने अपने होने वाले पति से बच्चो के बारें में बात की या नहीं?”, अंजलि ने बिस्तर ठीक करते हुए सुमति से पूछा. सुमति जो उस वक़्त अपने मन की उधेड़ बून में खोयी थी, अचानक अंजलि के सवाल से बाहर निकली. “नहीं, अभी तक तो हमने इस बारे में बात नहीं की है.”, सुमति ने किसी तरह जवाब दिया.

“यदि मेरा अंदाजा सही है तो जिस आदमी से तेरी शादी हो रही है वो चैताली ही है न?”, अंजलि ने अपने जीवन में आये बदलाव से सुमति के बारे में अंदाज़ लगाया. “हाँ, चैताली ही अब चैतन्य है! दिल का बहुत साफ़ है वो. और उसके माता पिता भी मुझे बहुत प्यार करते है. वो दोनों परसों आये थे मुझे दुल्हन के कपडे खरीदवाने. मुझे बहुत मज़ा आया था उनके साथ. पता है बहुत महँगी साड़ियाँ और लहंगा ख़रीदा है मैंने. तू मेरी शादी में आएगी न? शादी के दिन स्टेज में मेरी बगल में खड़ी रहना तू. समझी? यकीन नहीं होता कि मैं दुल्हन बनने के सपने जो देखती थी वो ऐसे सच होंगे”, सुमति ने कहा. जब वो अंजलि से शादी में आने को कह रही थी, उसमे कहीं एक दर्द भरी रिक्वेस्ट थी… क्योंकि सच तो यही था कि उस शादी को लेकर वो संशय में थी.

शायद दोनों सहेलियां इस बात को जानती थी इसलिए दोनों के लबो पे अब एक चुप्पी थी. “ये सब कितना अजीब लग रहा है न अंजलि. ये औरत का जीवन. मुझे पता नहीं मैं खुश रह पाऊंगी या नहीं.”, सुमति ने अंजलि से अब दिल की बात कह ही दी थी. “मैं जानती हूँ तुझ पर क्या गुज़र रही है सुमति.”, अंजलि ने प्यार से कहा.

“अच्छा मेरी छोड़.. तू बता .. हाउसवाइफ बनकर कैसा लग रहा है? हम सभी क्रॉसड्रेसर का तो सपना था हाउसवाइफ जैसे जीना. तू तो वो सपना जी रही है. बता न तुझे अच्छा लग रहा है?”, सुमति ने उचकते हुए अंजलि से पूछा. शायद अंजलि खुश हो अपने जीवन में तो वो भी सुमति को कुछ सीख देती, ऐसी सोच थी सुमति की उस सवाल के पीछे. उसका सवाल सुनकर अंजलि हँस दी.

“यार तेरा घर कितना ठंडा है.”, सुमति कहते हुए उस कमरे में बिस्तर में बैठ गयी. उसने फिर सावधानी से अपने पैरो को अपनी साड़ी से ढँक लिया. ये दोनों औरतें शुरू से ही साड़ी को हर सिचुएशन में संभालने में एक्सपर्ट थी. क्रॉसड्रेसर होते हुए भी किसी औरत से ज्यादा सहज थी ये दोनों साड़ी में. सुमति की अदाएं तो बेहद मोहक और स्त्रियोचित थी. उसने अपने बांये हाथ से अपने पल्लू को खिंच कर सामने कर अपनी गोद में रख दिया ताकि वो अपने पल्लू पर न बैठे. अंजलि तो शुरू से ही कहती थी कि सुमति एक परफेक्ट औरत है. और आज उसकी बात कितनी सही साबित हो रही थी. सुमति की नर्म सैटिन की साड़ी उसे ठन्डे कमरे में एक गर्माहट दे रही थी.

“तूने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया अंजलि”, सुमति ने फिर कहा.

“कौनसा सवाल? हाउसवाइफ के सपने वाला? इतना भी ग्लेमर भरा काम नहीं है सुमति ये. एक पत्नी के रूप में सजने सँवारने का समय नहीं होता है. ऊपर से दिन में ३ बार खाना नाश्ता बनाओ, घर की दिन भर सफाई करो, बच्चे को तैयार करो और वो भी रोज़ रोज़. और फिर सास-ससुर की सेवा सो अलग. और इतना करने पर भी किसी की तरफ से कभी कोई प्यार नहीं, सिवाय मेरी बेटी के. सच कहूं तो हाउसवाइफ होना बड़ा कठिन काम है. मैं तो ये सब ख़ुशी से इसलिए करती हूँ क्योंकि फिर मुझे मेरी प्यारी बेटी सपना के साथ समय बीताने मिलता है. मुझे गृहिणी बन कर अच्छा लग रहा है पर उस कारण से नहीं, जिस कारण से क्रॉसड्रेसर हाउसवाइफ बनना चाहते है. इस काम में ग्लैमर कम और मेहनत ज्यादा है.”, अंजलि ने कह. वो बात करते करते घर भर में बिखरी हुई चीजें समेट कर उनकी सही जगह पर रखने में व्यस्त थी. अंजलि का जीवन सचमुच में बड़ा व्यस्त था फिर भी उसके चेहरे पर एक संतुष्टि थी. उसका जीवन इतने तेज़ी से एक काम करने वाले अच्छी खासी कमाई वाले आदमी से एक थोड़ी गरीब परिस्थिति वाली औरत में बदल गया था. फिर भी एक चीज़ थी जो उसके लिए सबसे बड़ा सुख लेकर आई थी… वो था अपनी बेटी की माँ बनना.

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अंजलि सचमुच एक हाउसवाइफ के जीवन में ढल गयी थी. उसने बिस्तर जमाया ताकि सुमति उस पर बैठ सके. सुमति को कमरे में ठण्ड लग रही थी तो उसने अपने पैरो को साड़ी से अच्छी तरह ढँक लिया. दोनों सहेलियां साड़ी संभालने में शुरू से ही एक्सपर्ट थी.

“तुझे भूख लगी होगी सुमति. मैं तेरे लिए नाश्ता लेकर आती हूँ. मैंने पोहा बनाया है. तुझे पसंद है ?”, अंजलि ने सुमति से कहा. “चिंता मत कर अंजलि … नाश्ता इंतज़ार कर सकता है. मैं तो तुझसे मिलने आई हूँ नाश्ता करने नहीं.”, सुमति बोली.

“चल पगली. मैं भूल नहीं सकती कि तू किस तरह इंडियन लेडीज़ क्लब की सभी औरतों के लिए खाना बनाया करती थी. मैं तो तुझे पोहा खिला ही सकती हूँ. वैसे भी तैयार है बस लेकर आना है. फिर हम दोनों बैठ कर बातें करेंगी. मैं साफ़ सफाई बाद में कर लूंगी. दोपहर का खाना मैंने पहले ही तैयार कर लिया है तो मुझे और कोई काम भी नहीं है. बस अब अपनी सहेली के साथ गप्पे मारूंगी”, अंजलि मुस्कुराते हुए बोली.

“सुबह के ८:३० बजे लंच भी तैयार? तू मज़ाक कर रही है? बेटी को तैयार करने के बाद तुझे इतना समय कैसे मिल गया?”, सुमति आश्चर्यचकित थी.

अंजलि तभी एक प्लेट पोहा लेकर आई. “मैं सुबह ४ बजे उठ गयी थी.”, अंजलि मुस्कुराकर बोली. “वैसे भी सपना और उसके पापा के लिए टिफ़िन बनाना था. वो भी सुबह जल्दी काम पर जाते है न”

“सपना के पापा! अब तुम उनका नाम भी नहीं लेती.. हा हा”, सुमति हँस दी. “वैसे मुझे अच्छी पत्नी बनने के लिए तुझसे हफ्ते भर की ट्रेनिंग लेनी पड़ेगी. मेरी शादी के बाद काम आएगी.”

सुमति को जैसे यकीन नहीं हो रहा था कि अंजलि कैसे अपने नए जीवन में ढल गयी थी. सुमति को तो फिर भी थोडा समय मिला था सब चीज़ से परिचित होने में. पर अंजलि को तो सोचने समझने का मौका भी नहीं मिला होगा. उस दिन सुबह उठते ही औरत बनते ही उसके सर पर सुबह से ही माँ, पत्नी और बहु होने की ज़िम्मेदारी आ गयी होगी. पोहा खाते हुए सुमति बोली, “हम्म ये हुआ न टेस्टी पोहा!” अंजलि सुमति को देख खुश हो गयी कि उसकी सहेली को नाश्ता पसंद आया.

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अंजलि सुमति के सामने एक बेंच पर बैठ गयी और अपनी साड़ी से अपने स्तनों को ढंकने लगी. वो थकी हुई ज़रूर लग रही थी पर इस जीवन से वो संतुष्ट थी.

अंजलि सुमति के सामने एक बेंच में बैठ गयी. वो अपनी साड़ी में दमक रही थी. एक परफेक्ट हाउसवाइफ के लिए उसकी साड़ी उसकी हर चीज़ में सहायक होती है. घर की पुरानी फींकी रंग की दीवार से टिक कर अंजलि ने अपने घुटने को ज़रा ऊपर उठाया और उस पर अपना हाथ रखकर जैसे एक पल आराम करना चाहती थी वो. साड़ी ज़रा उठने को आई तो तुरंत आदतनुसार उसने उसे खिंच कर अपने पैरो को ढँक लिया. थोड़ी थकी ज़रूर दिख रही थी वो पर सन्तुष्ट भी थी. “क्रॉसड्रेसर का हाउसवाइफ का सपना”, मन ही मन सोचकर ही उसे हँसी आ गई.

“अंजलि तू बुरा न माने तो एक बात पूछू?”, सुमति ने पूछा. “अरे अब परमिशन लेगी क्या? मुझे पता है कि कल से तुझे कुछ परेशान कर रहा है. और मुझे तेरी परेशानी का कारण भी पता है. फिर भी तू ही पूछ”, अंजलि बोली. आखिर अंजलि भी तो उसी परिस्थिति से गुज़र रही थी जिससे सुमति.

“जहाँ तक मेरा अंदाजा है, जो मेरी भाभी थी पहले, वही अब तेरा पति भी है. है न? उनके साथ तेरे सम्बन्ध कैसे है?”, सुमति ने अपना सवाल पूछा. इस सवाल के बहाने वो शादी के बाद का अपना भविष्य समझना चाहती थी.

“तो मेरा अंदाजा सही था कि कौनसी बात तुझे परेशान कर रही है.”, अंजलि हँसते हुए बोली और फिर एक मिनट के लिए चुप भी हो गयी. उसने एक लम्बी गहरी सांस ली जैसे उसे समझ न आ रहा था कि इस सवाल का जवाब कैसे दे. “सुमति, तू मेरी सहेली है इसलिए तुझे बता रही हूँ. मैं कबसे किसी से इस बारे में बात करना चाहती थी पर किसी से नहीं कर सकती मैं. शुक्र है कि तू है मेरे साथ”, अंजलि बोली. उसने अपनी साड़ी का पल्लू खिंच कर अपने स्तनों को ढँक लिया. उसकी सैटिन साड़ी बेहद ही स्मूथ थी जो बार बार उसके ब्लाउज पर फिसल जाती और उसके ब्लाउज का उभार बाहर दिखने लगता. एक औरत के सामने उसके स्तनों का उभार ब्लाउज में दिखना, उसे इस बात से कोई परेशानी तो नहीं थी. वैसे भी सुमति से क्या शर्माना. पर फिर भी फिसलती हुई साड़ी संभालना तो आदत थी उसकी.

“तुझे याद है कि तेरी भाभी पहले कैसे हुआ करती थी? एक छोटे से गाँव से आई हुई डरी सहमी और बहुत ही पारंपरिक. सास-ससुर की हर एक बात माने वाली और पति को परमेश्वर मानने वाली. मैं एक पति के रूप में जो भी करती थी, वो हमेशा बिना सवाल किये मुझे सहारा देती थी. उसने मुझसे कभी नहीं पूछा कि मैं एक आदमी होते हुए साड़ी क्यों पहनती थी. मुझे लगता था कि वो मुझे समझती थी. पर सच तो ये था कि उसकी परवरिश ऐसी हुई थी कि कभी पति या सास-ससुर से कोई सवाल नहीं करना है उसे. वो तो बस अपना कर्त्तव्य मान कर मेरी हर बात मान लेती थी. इसलिए मेरे क्रॉसड्रेसर होने पर भी उसने कभी शिकायत नहीं की थी. मुझे कभी पता भी नहीं चला था कि उसके दिल में मेरे औरत बनने पर उसे कैसा लगता था. और ऊपर से ज्यादा पढ़ी लिखी भी नहीं थी वो.”, अंजलि पुरानी बातों में खो गयी थी.

सुमति को अब लगा कि उसकी सहेली अब दिल से बात कह रही है तो वो भी अब रिलैक्स हो गयी थी. और वो
अंजलि की बातें सुनती हुई बिस्तर पर लेट गयी. अपनी सहेली की उपस्थिति में अब उसकी साड़ी बिखर भी रही थी तो उसे उसकी फ़िक्र नहीं थी. इस वक़्त उसे पता था कि अंजलि अब कुछ गंभीर बात उससे कहने वाली है.

“पता है. अब तेरी भाभी मेरे पति परमेश्वर बन चुके है. और वो बिलकुल भी नहीं बदले है. पहले की ही तरह है अब बस वो एक आदमी है.” अंजलि बोली.

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सुमति अब बेफिक्र होकर अपनी सहेली की बात सुनते हुए बिस्तर पर लेट गयी. उसका एक स्तन उसकी ब्रा से बाहर आ रहा था.

“मतलब?”, सुमति ने पूछा. लेटने पर सुमति का एक स्तन उसकी ब्रा से बाहर आ रहा था जिसे उसने अपने हाथो से वापस अन्दर कर दिया. सुमति को यूँ अपने स्तनों को संभालते देख अंजलि मुस्कुरा दी पर फिर जल्दी ही गंभीर होकर बोली, “मेरे पति पहले की ही तरह सोचते है. वो मानते है कि पत्नी को हर हाल में अपने पति की हर बात मानना चाहिए. पत्नी का काम बस घर, बच्चे और परिवार संभालना है उनके अनुसार. मैं जिस तरह की पति थी उसके बिलकुल विपरीत है वो. मैं तो अपनी पत्नी की जितनी हो सके मदद करती थी, पर ये बिलकुल भी नहीं करते. और हमारी घर में आर्थिक स्थिति भी थोड़ी ठीक नहीं है कि घर में कोई मदद के लिए नौकर चाकर रख ले. हम दोनों में मैं ज्यादा पढ़ी लिखी हूँ नौकरी करने लायक… पर ये और इनके माता पिता भले गरीबी में रह लेंगे पर बहु को घर से बाहर काम पर जाने नहीं देंगे. उनके हिसाब से मुझे घर साफ़ रखना और खाना बनाना ही देखना चाहिए.”, कहते कहते अंजलि की आँखों में आंसू आ गए.

“ये घर कितनी मुश्किल से चल रहा है कैसे बताऊँ मैं. मेरे ससुर की थोड़ी सी पेंशन और मेरे घर से मेरे माता-पिता जो समय समय पर पैसे भेजते है, उसके सहारे किसी तरह जीवन कट रहा है. मैं तो अपनी बेटी की छोटी छोटी छोटी इच्छाएं भी पूरी नहीं कर पाती”, अंजलि की आवाज़ अब टूट रही थी. “दिन भर काम करने के बाद फिर रात को… “, कहते कहते वो रुक गयी. उसकी बातें सुन सुमति उठ कर अंजलि की बगल में आकर बैठ गई. उसके हाथो को अपने हाथ में लेकर अंजलि के सर को अपने कंधे पर रख कर उसे सांत्वना देने लगी. बेहद भावुक पल था वो जब दो सहेलियां दिल से अपनी ज़िन्दगी बयान कर रही थी. इस वक़्त वो सिर्फ औरतें नहीं थी … वो दो दोस्त थी. सुमति अंजलि की पीठ पर हाथ फेर कर उसे सहारा दे रही थी.

“… और फिर रात को… रात को… मुझे अपना तन अपने पति को समर्पित करना पड़ता है. चाहे मैं कितनी भी थकी हुई क्यों न हो. मुझे वो अच्छा नहीं लगता है सुमति… एक आदमी का स्पर्श. मुझे बिलकुल पसंद नहीं पर उन १०-१५ मिनटों के लिए मैं बिस्तर पर लेटी रहती हूँ जब वो मेरे जिस्म का …”, अंजलि का दुख अब बाहर आ चूका था. सुमति और वो दोनों एक ही परेशानी से गुज़र रही थी.

सुमति को पता न था कि वो क्या कहे अंजलि से. ये दोनों सहेलियां बस एक दुसरे को गले लगाए एक दुसरे का हाथ थामे वहां बैठी रही. कुछ देर बाद, सुमति ने अंजलि के चेहरे को उठाकर अपनी प्यारी सहेली के चेहरे को देखा. और फिर उसने अपनी सहेली के होंठो को चूम लिया. अंजलि ने भी उसे रोका नहीं और उसने भी सुमति के होंठो को चूम लिया. उन दोनों के अन्दर की भावनाए उमड़ कर उस चुम्बन में आ रही थी. उन दोनों के नर्म होंठ एक दुसरे को चूम रहे थे. उन दोनों के गर्म और मुलायम जिस्म एक दुसरे के करीब आ रहे थे. अंजलि की सॉफ्ट सैटिन साड़ी अब सुमति की साड़ी से मिल रही थी. उन दोनों के कोमल स्तन एक दुसरे को दबा रहे थे. और सुमति के हाथ अंजलि की जांघो और उसकी कमर पर फिसल रहे थे. सुमति के स्पर्श से जैसे अंजलि के तन में आग लग गयी थी. दोनों सहेलियां एक दुसरे को चूमती रही. सुमति अब थोड़ी उत्तेजित हो रही थी. उसने अपने हाथ अंजलि के साड़ी के अन्दर से उसके ब्लाउज के ऊपर पहुँच गए और अंजलि से स्तनों को दबाने लगे. अंजलि भी जवाब में और जोरो से सुमति के होंठो को चूमने लगी. सुमति अंजलि के और करीब आकर अपने स्तनों को उसके स्तनों से दबाने लगी और अपने हाथ अंजलि के ब्लाउज के अन्दर डाल उसके स्तनों को मसलने लगी. दो स्त्रियों के कोमल जिस्म का यह मिलन बेहद उत्तेजित था. दोनों को वो चुम्बन मदहोश कर रहा था. ऐसा चुम्बन जो उन्होंने पहले कभी महसूस नहीं किया था. पर फिर भी सब कुछ कितना स्वाभाविक लग रहा था. जैसे दोनों सहेलियां एक दुसरे के लिए ही बनी थी… और दोनों के जिसमे एक दुसरे के पूरक थे. पर अचानक अंजलि ने अपने होंठो को वापस खिंच लिया और वो चुम्बन वहीँ रुक गया.

“नहीं मैं ये नहीं कर सकती सुमति”, अंजलि बोली. “क्यों नहीं कर सकती अंजलि? मैं भी शादी नहीं करना चाहती हूँ चैतन्य के साथ. अभी भी देर नहीं हुई है. हम दोनों एक नया जीवन साथ में शुरू कर सकती है. सपना भी हमारे साथ रहेगी. मैं जॉब करूंगी और सपना को हम एक बेहतर जीवन दे सकते है. सब कुछ ठीक होगा अंजलि. बस तुम मेरे साथ आकर मेरी जीवन संगिनी बन जाओ”, सुमति ने अंजलि से याचना की. पर मन ही मन वो जानती थी कि अंजलि नहीं मानेगी.

“सुमति… मुझे तुम पसंद हो. और ये सब अभी ठीक लग रहा है, पर हम आगे नहीं बढ़ सकती इस रास्ते पर. ये ठीक नहीं होगा”, अंजलि ने कहा. “क्या ठीक नहीं है अंजलि? क्या हमें एक खुबसूरत जीवन का हक़ नहीं है?”, सुमति बोली पर वो जानती थी कि अंजलि क्या सोच रही है.

“सुमति इतनी स्वार्थी न बनो. तुम्हे चैताली याद है? उसने तुम्हारा साथ तब दिया था जब तुम एक क्रॉसड्रेसर थी. तुम्हारी बचपन की सबसे अच्छी दोस्त थी वो. वो भले आज चैतन्य बन गयी होगी पर वो वही इंसान है जिसने तुम्हे स्वीकार किया था क्रॉसड्रेसर के रूप में. क्या तुम इन कामुक भावनाओं के लिए वो सब भुला कर उसे छोड़ दोगी? और सपना के बारे में सोचो… माँ बाप अलग रहेंगे तो उस पर क्या बीतेगी. मैं अपने पति को नहीं छोड़ सकती. भले आज वो जैसे भी हो पर उन्होंने मेरा साथ तब दिया था जब वो औरत थे.”, अंजलि की बात में सच था.

सुमति भी अंजलि की बात समझ रही थी. पर मनमें चल रही भावनाओं को काबू करना आसान कहाँ होता है. औरत बनना ही अपने आप में एक कठिन अनुभव रहा है अब तक. ऐसा लगने लगा था जैसे कि एक क्रॉसड्रेसर का जीवन ही बेहतर था औरत होने से तो. उसकी आँखों से आंसू बह निकले. तो अंजलि ने अपनी साड़ी के पल्लू से अपनी सहेली के आंसू पोंछने लगी.

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सुमति ने उठ कर अपनी साड़ी ठीक की.

“मुझे गलत न समझना सुमति. काश मैं तुम्हारे साथ जीवन जी सकती. पर ये मेरे लिए गलत होगा कि मैं अपने परिवार को छोड़ दूं. और मुझे अपनी बेटी के भविष्य के बारे में सोचना है. मैं उसे एक परिपक्व और आज़ाद विचारों की औरत बनाना चाहती हूँ. उसे मेरे अनुभव से सीखना होगा कि औरत की जगह सिर्फ ४ दीवारों के अन्दर नहीं है. तुम समझ रही हो?”, अंजलि बोली. सुमति का चेहरा अब भी उदास था. तो अंजलि ने उसकी आँखों में देख कर कहा, “मैं चाहती हूँ कि मेरी बेटी अपनी सुमति आंटी की तरह कॉंफिडेंट औरत बने.” और सुमति मुस्कुरा दी.

दोनों सहेलियों ने एक दुसरे को एक बार फिर गले लगाया, इस वादे के साथ कि वो दोनों एक दुसरे का सहारा बन कर रहेंगे. और फिर दोनों औरतें उठ खड़ी हुई और अपनी साड़ी की प्लेट सुधारने लगी.

“सुमति.. सुन. मैंने कल मधुरिमा आंटी को बताया था कि हम दोनों आज उनसे मिलने १० बजे आयेंगे उनके घर पर. हमें जाने के लिए तैयार होना चाहिए.”, अंजलि ने कहा.

सुमति का दिल अब कुछ हल्का था. शायद ये अपनी भावनाएं व्यक्त करने का नतीजा था कि दोनों सहेलियां अब कुछ अच्छा महसूस कर रही थी. अंजलि ने सुमति को ये एहसास दिलाया था कि कभी कभी सही रास्ते पर चलने के लिए कुछ सैक्रिफाइस करना पड़ता है. अंजलि सही भी थी कि चैताली ने हमेशा सुमति की क्रॉसड्रेसिंग में साथ दिया था बचपन से, और आज तक किसी को इस बारे में बताया नहीं था. सुमति अब भला कैसे चैताली को छोड़ सकती थी सिर्फ इसलिए कि वो अब चैतन्य नाम का एक आदमी है. वो भी तो आखिर चैताली के सामने औरत बन जाया करती थी.

“अच्छा सुन अंजलि, मैं तेरा बाथरूम यूज़ करती हूँ अपना मेकअप सुधारने. मेरे आंसू से मेरा काजल फ़ैल गया होगा.” , सुमति बोली.

अंजलि सुमति की तरफ देख कर मुस्कुरा दी. और खुद तैयार होने में मगन हो गयी.

क्रमश: …

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< भाग ११ भाग १३ >

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इंडियन लेडीज़ क्लब: भाग ११

उस विचित्र रात के बाद साशा अब अन्वेषा के साथ घबराई हुई सी थी. पर अन्वेषा के मन में कुछ चल रहा था जो साशा के लिए ठीक न था.


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साशा का डर

साशा अपने इस नए रूप और जीवन से अब तक घबरायी हुई थी. उसे अब तक समझ नहीं आ रहा था कि वो रातो-रात पूरी तरह से औरत कैसे बन गयी और उसका असर अब उसके जीवन पर कैसे पड़ेगा. और फिर अन्वेषा के साथ उसका वो किस?? क्या मतलब था उस किस का? सचमुच तो मन ही मन उसे वो चुम्बन बेहद अच्छा लगा था फिर भी उस चुम्बन के बारे में कुछ था जो उसे असहज कर रहा था.

“मुझे कुछ समय चाहिए अन्वेषा. इतने जल्दी इतने सारे बदलाव हो रहे है. मुझे सोचने के लिए कुछ वक़्त चाहिए.”, साशा ने कहा और फिर खुद को अपनी साड़ी के आँचल में लपेट कर सोफे पर बैठ गयी. शायद अपनी ही साड़ी के आँचल में वो सुरक्षा ढूंढ रही थी जो एक औरत को अपने तन को परायी नजरो से बचाते हुए ढँककर उसकी साड़ी उसे देती है. साशा को इस वक़्त अपनी नर्म साड़ी की गर्माहट और सुरक्षित होने की भावना की ज़रुरत थी.

“जितना चाहे समय ले लो साशा. पर मैं तो इस औरत के रूप में अपने जीवन का खूब मज़ा लेने वाली हूँ. और मुझे यकीन है कि तुम भी लोगी. सोचो लडकियां अपनी सेक्सी बॉडी का कितना फायदा उठाती है… अब हम भी वो सब कर सकते है!”, अन्वेषा बड़ी उत्साहित थी सोच कर ही. पर कहीं न कहीं उसकी सोच गलत थी. कुछ तो था उसकी सोच में और उसकी उस कुटिल मुस्कान में जो साशा के लिए ठीक नहीं थी.

“अन्वेषा शायद किसी दिन मैं भी इस परिवर्तन में कुछ अच्छा ढूंढ सकूंगी. पर इस वक़्त मुझे अपनी इस नयी ज़िन्दगी को समझने के लिए वक़्त चाहिए. मुझे ३ घंटे में अपने ऑफिस में जाना है और मुझे तो ये तक पता नहीं कि मैं अब भी उसी घर में रहती हूँ जहाँ पहले रहती थी. पर कैसे हो सकता है यह? मैं तो कई रूममेट के साथ रहती थी.”, साशा ने कुछ सोचकर कहा.

“क्या हुआ तुम्हारे रूममेट को?”, अन्वेषा ने साशा से पूछा.

“मेरे साथ के सभी रूममेट तो लड़के थे अन्वेषा…और वो हमारी तरह क्रॉसड्रेसर नहीं थे. और अब मैं लड़की. मैं उनके साथ कैसे रहूंगी?”,साशा ने अपनी नज़रे झुकाकर अपने बदन को देखा और कहा. उसकी बात सही थी. एक खुबसूरत लड़की के लिए जवान लडको के साथ रहना … सोच कर ही उसे डर लग रहा था.

“कम ऑन साशा. तुम जल्दी ही सब पता कर लोगी. सब ठीक होगा. यदि तुम्हारे रूममेट अब भी लड़के है तो भी इतना क्या बुरा होगा? तुम उन सबके साथ सेक्स कर सकती हो. हा हा…”, अन्वेषा हँस पड़ी. पर साशा को उसकी बात ज़रा भी ठीक न लगी. साशा को यकीन नहीं हो रहा था कि ये वही अन्वेषा है जो कल रात को इतना शर्मा रही थी. क्या ये वोही अन्वेषा है जिसे कल रात इंडियन लेडीज़ क्लब की औरतों ने इतने प्यार से एक खुबसूरत राजकुमारी में तब्दील किया था?

“ओह मेरी साशा! मैं तो बस मज़ाक कर रही थी. ऐसे घुर कर न देखो मुझे.”, अन्वेषा बोली, “वैसे भी मैं नहीं चाहती कि कोई लड़का तुम्हारे पास भी आये. क्योंकि मैं चाहती हूँ कि तुम सिर्फ मेरी और मेरी बन कर रहो.”, अन्वेषा ने साशा की तरह हसरत भरी नजरो से देखा.

“अन्वेषा.. तुम समझ नहीं रही हो. मुझे तो अपने घर के बारे में कुछ पता भी नहीं है. मैं ऑफिस जाने के लिए कपडे कैसे और कहाँ बदलूंगी? मैं ऑफिस में यूँ साड़ी पहन कर तो नहीं जा सकती? और न मुझे और न तुम्हे साड़ी पहनना आता है.”, साशा की चिंता वाजिब थी.

“चिंता क्यों करती हो डार्लिंग? मेरे क्लोसेट में तुम्हारे पहनने के लिए कुछ न कुछ मिल ही जाएगा.”, अन्वेषा कहते कहते साशा के करीब आ कर बैठ गयी. “और तुम्हे कुछ सेक्सी कपडे पहनाकर मुझे भी मज़ा आएगा.”, अन्वेषा ने साशा की जांघो पर अपना हाथ रख उस पर फेरने लगी जैसे वो कुछ करना चाहती हो साशा के साथ.

साशा को अन्वेषा की हरकत पर यकीन नहीं हुआ. “साशा क्या तुम्हे याद नहीं कि कल रात से ही मेरा तुम में इंटरेस्ट आ गया था?”, अन्वेषा आगे बोली. और साशा बस अचम्भे से उसकी ओर देखती रह गयी.

“पर तुम्हारा मुझमे इंटरेस्ट कैसे हो सकता था अन्वेषा? कल रात तक तो मैं साड़ी के अन्दर एक आदमी थी. एक आदमी! और तुम खुद एक आदमी थी.”, साशा ने अन्वेषा से दूर होने की कोशिश की.

पर अन्वेषा यूँ पीछे नहीं हटने वाली थी. वो अब भी साशा की स्मूथ सैटिन साड़ी पर अपना हाथ फेर रही थी. “हाँ मैं जानती थी कि तुम एक आदमी हो. पर फिर भी मैं तुम्हारे अन्दर की औरत को पाकर ही रहती. मेरी जब तुम पर पहली नज़र पड़ी थी तभी से तुम्हे छूकर अपनी बांहों में भर लेने की मेरी इच्छा जाग गयी थी.”, अन्वेषा बोली.

“बस करो अन्वेषा. मैं एक क्रॉसड्रेसर थी… पर मेरा इंटरेस्ट हमेशा से लड़कियों में था… आदमी में नहीं. मैं तुम्हारी कभी नहीं हो सकती थी.”, साशा ने कांपती आवाज़ में कहा. भले अन्वेषा के हाथो का स्पर्श उसके कोमल तन को उकसा रहा था फिर भी वो उसे नकारना चाह रही थी.

“कितनी भोली हो तुम साशा. तुम चाहे जो सोचो… पर मैं जो चाहती हूँ वो पाकर रहती हूँ.”, अन्वेषा के चेहरे की मुस्कान और कुटिल होती जा रही थी.

“क्या मतलब है तुम्हारा?”, साशा ने घबरायी आवाज में अन्वेषा से पूछा.

“डार्लिंग… चाहे जो भी हो क्रॉसड्रेसर की एक कमजोरी होती है. वो औरत की तरह पूरी तरह महसूस करना चाहते है. थोड़ी सी ड्रिंक्स और उन्हें थोडा सा औरत की तरह ट्रीट करो.. और फिर वो सब करने को तैयार हो जाते है जो होश में न करते. मैं तुम्हे एक बेहद खुबसूरत औरत की तरह कॉम्प्लीमेंट करती और कुछ ड्रिंक्स के बाद तुम अपने घुटनों पर मेरी बन जाती. तुम समझ रही हो? हा हा हा..”, अन्वेषा ने अपने हाथो को साशा के जांघो के बीच उसकी योनी के बीच ले जाकर उसे उकसाने लगी. पर साशा ने उसका हाथ तुरंत हटा दिया.

“तुम्हे क्यों लगता है कि मैं तुम्हे इतने ड्रिंक्स दे रही थी कल रात? क्यों मैं पूरी रात तुम्हारे आस पास थी? क्योंकि मैं तुम्हे तैयार कर रही थी डार्लिंग कि तुम कल रात मेरी बन सको. भले तुम्हे सुबह होश आने पर अफ़सोस होता मगर मुझे वो सब कुछ मिल गया होता जो मैं चाहती थी.”, अन्वेषा सच मच बेहद बुरी थी.

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अन्वेषा ने कल रात साशा को उसकी सहेली सोहा से दूर कर दिया था ताकि वो साशा पर अपना जादू चला सके.

“कल रात मैंने देख लिया था कि तुम्हारी सहेली सोहा मेरे मोटिव समझ चुकी थी. वो हम दोनों के बीच आकर तुम्हे मुझसे बचाना चाहती थी. इसलिए मैंने तुम दोनों को अलग कर दिया था ताकि मैं तुम्हारे करीब आ सकू”, अन्वेषा ने आगे कहा. अब वो साशा के स्तनों को धीरे धीरे छू रही थी जो साशा के तन में आग लगा रहा था. “पर कल जो हुआ अब मायने नहीं रखता. अब तो मुझे वो सब करने की ज़रुरत भी नहीं है. अब हम दोनों खुबसूरत औरतें है. मुझे भी औरतें पसंद है और तुम्हे भी. हम अब एक दुसरे के साथ जो चाहे कर सकते है. क्यों सही कह रही हूँ न मैं?”, अन्वेषा एक बार फिर हँस दी.

साशा को अन्वेषा के कुटिल इरादों पर यकीन नहीं हुआ. भले अन्वेषा को उसमे कुछ गलत नहीं लग रहा था पर साशा जानती थी कि वो इतनी बुरी औरत की बांहों में नहीं जा सकती थी.

“छोडो मुझे. मुझे बाथरूम जाना है.”, साशा अब अन्वेषा के साथ एक मिनट भी और नहीं ठहरना चाहती थी.

“जरूर डार्लिंग. पर मैंने जो कहा उसे भूलना मत. बस मैं ही हूँ इस वक़्त जो तुम्हारी मदद कर सकती हूँ.”, अन्वेषा ने कहा. वो साशा की मजबूरी का फायदा उठा रही थी.

साशा उठकर बाथरूम चली गयी और रोने लगी.


एक ऑटो एक बिल्डिंग के सामने रुका जिसमे से एक औरत उतर कर बाहर आई. वो औरत कोई और नहीं साशा थी. उसने अब भी वही साड़ी पहनी हुई थी. पर अब वो फ्रेश लग रही थी. अन्वेषा के घर में बाथरूम में अकेले अकेले रोने के बाद वह मुंह हाथ धोकर फ्रेश हो गयी थी. वहां वो अन्वेषा से और बात नहीं करना चाहती थी, इसलिए उसने चुप चाप खुद ही youtube में साड़ी पहनने से सम्बंधित विडियो देखकर खुद ही साड़ी पहन ली थी. परफेक्ट तो नहीं थी पर फिर भी वो इस तरह से तो तैयार हो गई थी कि घर से बाहर जा सके. उसने खुद को एक बार बाथरूम के आईने में देखा और अपने बालों को अपनी पसंद के अनुसार बाँध लिया. भगवान या जिसने भी उसे औरत बनाया था, उसे सचमुच खुबसुरत बनाया था. यदि साड़ी पहनने में कोई कमी रह भी गयी हो तो किसी की उसकी खूबसूरती के आगे नज़र नहीं जाती.”सब कुछ ठीक होगा साशा”, उसने खुद को संभालते हुए कहा था ऑफिस के लिए निकलने के पहले. “साशा डार्लिंग तो आज शाम को मिलोगी न मुझसे?”, अन्वेषा ने साशा से कहा था. पर अन्वेषा से दोबारा मिलने की सोच कर ही साशा को बुरा लग रहा था. चाहे जो हो जाए वो यहाँ वापस नहीं आएगी. पर फिर वो जायेगी भी कहाँ? उसे पता नहीं था पर किसी तरह वो देख लेगी.

ऑटो से उतारकर जैसे ही साशा अपनी ऑफिस की बिल्डिंग की तरफ बढ़ने लगी, उसे पीछे से एक आवाज़ सुनाई दी. “साशा! साशा!”, कोई लड़की उसे पुकार रही थी. जब उसने पलट कर पीछे देखा तो वही लड़की उसकी तरफ दौड़ी चली आ रही थी. आवाज़ से ही साशा को अंदाजा हो गया था कि ये नौरीन थी. नौरीन, उसके साथ ही ऑफिस में काम करती थी. शायद दुनिया में सबसे स्वीट लड़की होगी जिसे साशा जानती थी. एक साधारण रूप रंग वाली नौरीन हमेशा सादे से सलवार सूट में हुआ करती थी और उसके चेहरे पर हमेशा एक बड़ी सी मुस्कान होती थी. इतनी प्यारी होने के बाद भी, किसी लड़के ने उसमे इंटरेस्ट नहीं दिखाया. शायद उसकी सादगी और पुराना फैशन वजह थी. हर लड़का उसे सिर्फ “दोस्त” मानता था, उससे ज्यादा कुछ नहीं. नौरीन को इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता था. शायद उसे इस बात की आदत हो गयी थी या फिर वो इतनी सीधी थी कि प्यार इश्क के चक्कर के बारे में उसने कभी सोचा ही नहीं. ऐसा तो नहीं था कि उसे प्यार में पड़ने की इच्छा नहीं थी. हर लड़की की तरह उसके दिल में भी एक राजकुमार की हसरत तो थी, पर शहर के कॉस्मोपॉलिटन कल्चर में उसके जैसी साधारण लड़की के लिए प्यार पाना मुश्किल था. पर फिर भी वो सभी के साथ बड़े अच्छे से व्यवहार करती थी.

“नौरीन!”, साशा के चेहरे पर एक बड़ी मुस्कान थी. आज सुबह से उठने के बाद पहली बार मुस्कुरा रही थी. शायद साशा को थोड़ी राहत मिली थी कि उसे इस दुनिया में साशा के रूप में जानने वाली नौरीन तो है जो उसकी मदद ज़रूर करेगी. नौरीन अब साशा के पास आ गयी थी. दौड़ते दौड़ते उसकी सांस फुल गयी थी. “साशा, कहाँ थी यार तू कल पूरी रात? मैं कितनी बार तुझे कॉल करने की कोशिश करती रही पर तूने जवाब तक नहीं दी”, नौरीन ने चिंता के साथ कहा. वो अब भी मुश्किल से सांस ले पा रही थी.

साशा ने नौरीन की ओर देखा पर इसके पहले कि वो कुछ कह पाती, उसके सर में तीव्र दर्द हुआ. उसका दिमाग भी उसकी नयी यादें बना रहा था एक औरत के रूप में. और इस औरत के रूप में उसके नए जीवन में नौरीन उसकी रूममेट थी. उस दर्द के साथ ही साशा के दिल में ख़ुशी भी जाग गयी. नौरीन से अच्छी रूममेट कोई और नहीं हो सकती थी इस वक़्त उसके लिए. अन्वेषा से पीछा छुटा! और फिर उसने तुरंत ही नौरीन को जोर से गले लगा लिया और उसकी आँखों में ख़ुशी के आंसू आ गए. नौरीन को तो कुछ पता न था कि साशा के साथ क्या हो रहा है पर उसने उसे प्यार से गले लगा लिया और उसकी पीठ पर हाथ सहला कर जैसे साशा को संभाल रही थी वो.

“क्या हुआ साशा? सब ठीक तो है? और तू साड़ी पहन कर कैसे आ गयी आज? तुझे तो मैंने कभी जीन्स या सलवार के अलावा किसी और कपड़ो में ऑफिस में तो नहीं देखा पहले”, नौरीन ने साशा से पूछा. “सब ठीक है नौरीन. अब तू आ गयी है यहाँ तो सब ठीक ही होगा.”, साशा ने आँखें बंद रखकर ही नौरीन से कहा और उसे अपनी बांहों से बाहर जाने न दिया.

“सुन मैंने तुझे कल कम से कम १० बार कॉल किया था. मुझे चिंता हो गयी थी. पर तू ठीक है इस बात से मुझे बहुत ख़ुशी मिल रही है”, नौरीन बोली.

तभी साशा का फ़ोन बज्ज करने लगा. और उसके फ़ोन पर एक मेसेज दिखाई दिया. “You have 15 missed calls from Naureen” “लो तुम्हारे मिस्ड कॉल अब दिखाई दे रहे है!”, साशा ने मुस्कुराते हुए कहा.

“चल मैं तेरे लिए नाश्ता लेकर आई हूँ. तुझे भूख लगी होगी.”, नौरीन बोली. “हाँ तुझे कैसे पता चला कि मुझे भूख लगी होगी?”, साशा ने मुस्कुरा कर कहा. उसने फिर नौरीन का एक हाथ पकड़ा और अपनी रूममेट और नयी दोस्त नौरीन के साथ चलने लगी. नौरीन इस वक़्त साशा के जीवन में एक फ़रिश्ता बन कर आई थी और साशा इस बात के लिए बेहद शुक्रगुज़ार थी. और फिर दोनों सहेलियां ऐसे बातें करने लगी जैसे सालो से एक दुसरे को जानती हो. कम से कम नौरीन की नजरो में तो ये सच था. पर साशा के लिए ये एक नया सच था.


सुमति की दुविधा

ऑफिस का काम निपटा कर सुमति अब घर जा रही थी. कल तक तो एक आदमी के रूप में सुमति हमेशा बस से घर वापस जाती थी. पर आज जो ऑफिस में हुआ, उसके बाद उसे बस में जाना ठीक नहीं लगा. वो कुछ पल एकांत के चाहती थी. इसलिए आज वो ऑटो से घर जा रही थी. उसका शहर तो ट्रैफिक और हॉर्न के शोर में व्यस्त था पर सुमति उन सबसे दूर अपने विचारो में खोयी हुई थी. चलते हुए ऑटो में हवा से उसके बाल बिखर कर उसके चेहरे पर आ रहे थे. पर सुमति तो बस अपनी साड़ी को लपेटे अपनी ही दुनिया में थी. आज ऑफिस में एक औरत के रूप में उसका पहला दिन था. और आज जो उसने अनुभव किया, लाखो करोडो औरतें रोज़ ही यह अनुभव करती है.

आज सुबह जब वो सुबह उठी थी तो उसे अच्छी तरह याद था कि पिछले दिन चैतन्य और उसके बीच क्या हुआ था. एक पुरुष का स्पर्श उसे बिलकुल अच्छा नहीं लगा था पर अब तो उसकी चैतन्य के साथ शादी भी होने वाली थी. अब क्या कर सकती थी वो. इन सब विचारो की उन्हापोह से अपना मन भटकाने के लिए ऑफिस जाने से अच्छा क्या हो सकता था. पर ऑफिस में भी तो आदमी होते है. वहां दुसरे आदमियों की नज़र से बचने के लिए सुमति ने सोचा कि ऑफिस में एक सिंपल सी सिल्क साड़ी पहन कर जायेगी. कम से कम मेकअप के साथ ताकि लोगो के बीच वो आकर्षण का केंद्र न बन जाए. पर क्या किसी खुबसूरत औरत के लिए इतना आसान होता है आदमियों की नजरो से बच निकलना?

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आज ऑफिस में सुमति एक सिंपल प्लेन सिल्क साड़ी पहन कर गयी थी.

सुमति को तो मानो सदमा लग गया जब उसके ऑफिस के आदमी उसकी कमर और उसकी ब्लाउज पर नज़रे गडाए घुर कर उसे देखने लगे. कोई इस तरह उसे खुले आम तो नहीं घूर रहा था पर उसे पता था कि कब लोगो की बुरी नज़र उस पर पड़ रही है. उसे यकीन नहीं हुआ कि ये सब वही आदमी है जिनके साथ वो रोज़ काम करती थी. आज उनके बारे में उसे जो पता चला वो मान ही नहीं पा रही थी. उसे लगता था कि उसके साथ काम करने वाले सभ्य आदमी थे. पर कितनी गलत थी वो! पर सबसे ज्यादा उसे परेशान इस बात ने किया कि उसका सहायक रवि, जो सुमति के पुरुष रूप में उसका सबसे अच्छा दोस्त हुआ करता था, वो भी ऐसा निकला! आज उसके साथ मीटिंग के वक़्त वह पूरे समय सुमति की तरफ मुस्कुरा कर देख रहा था और सीधे सीधे न सही पर सुमति के साथ फ़्लर्ट करने की कोशिश कर रहा था. उसका बर्ताव तो ऐसा था जैसे किसी औरत से पहली बार मिल रहा हो. क्या उसे इतना भी पता नहीं था कि सुमति की एक महीने के अन्दर शादी होने वाली थी? जिस औरत की शादी हो रही हो क्या उसके साथ इस तरह का बर्ताव एक सभ्य आदमी को शोभा देता है? सुमति ने रवि की पर्सनालिटी का यह पहलु पहले कभी नहीं देखा था. एक औरत बनने के बाद वो उसके आस पास के लोगो को नए तरीके से जान रही थी.

औरत बनते ही जैसे सुमति के लिए एक नयी दुनिया खुल गई थी. शुक्र है कि कम से कम इस पूरे दिन में उसे २ सभ्य आदमी मिले. एक तो था वाचमैन जिसने सुमति को पूरे सम्मान के साथ सुबह नमस्ते कहा था… उस इज्ज़त के साथ जो एक औरत का हक़ है. और दूसरा आदमी था उसका मेनेजर सुदिप्तो. किसी भी एम्प्लोयी की तरह, सुमति को भी कल तक उसके मेनेजर से कोई ख़ास लगाव नहीं था.. बल्कि मन में शिकायतें ही थी. पर आज दोपहर में सुदिप्तो सुमति से मिलने आये थे और उन्होंने कहा, “सुमति बेटी, तुम्हारी आज तबियत ठीक नहीं लग रही है. तुम घर जाकर आज आराम क्यों नहीं कर लेती? वैसे भी कुछ दिनों में तुम्हारी शादी है और फिर तुम्हे आराम करने का मौका नहीं मिलेगा” सुमति मन ही मन शुक्रगुजार थी सुदिप्तो की. “और हाँ… मैं और मेरी पत्नी आने वाले है तुम्हारी शादी में आशीर्वाद देने. मैंने सोचा कि तुम्हे बता दूं”, सुदिप्तो ने बड़े प्यार से एक पिता की तरह कहा था सुमति से.

पर ऐसे एक दो अनुभव को छोड़ कर सुमति को किसी और आदमी से मिलकर ज़रा भी अच्छा नहीं लगा. आज उसे खुद शर्म महसूस हो रही थी अपने पहले वाले बर्ताव पर जब वो आदमी के रूप में औरतों को ऐसे देखा करती थी, और फिर मन ही मन उस औरत की खूबसूरती का स्कोर भी दिया करती थी. पर पिछले २ दिनों में औरत बनने के बाद से, सुमति के अनुभव जैसे उसकी आँखें खोल रहे थे और वो इन सब के बारे में किसी से बात भी नहीं कर पा रही थी. कितना अकेला महसूस कर रही थी वो आज.

पर सुमति के पास तो एक सहेली हमेशा हुआ करती थी. अंजलि, उसकी सबसे अच्छी सहेली, जो हमेशा उसका साथ देती थी. सुमति को तो आज ये भी नहीं पता था कि अंजलि अब भी एक क्रॉसड्रेसर पुरुष है या फिर वो भी औरत बन गयी है. अंजलि का ख्याल आते ही सुमति ने अपने फ़ोन में अंजलि का नंबर ढूँढा. उसे पता नहीं था कि इस नयी दुनिया में क्या अंजलि का वही नंबर होगा. फ़ोन में अंजलि का नाम देख कर उसे एक ख़ुशी महसूस हुई. अब उसे अपनी किस्मत आजमाना था शायद अंजलि जवाब दे दे.

“हाय अंजलि”, सुमति ने अंजलि को एक sms भेजा. “सुमति.. कैसी है यार तू?”, सुमति को तुरंत जवाब भी मिल गया. जिसे देख कर सुमति ख़ुशी से फूली न समायी.

“हमें तुरंत बात करने की ज़रुरत है अंजलि. मुझे तुम्हारी सख्त ज़रुरत है”, सुमति ने मेसेज लिखा. “हम्म… तो शायद तुम्हारे साथ भी वही हुआ है जो मेरे साथ?”, अंजलि का जवाब आया. अंजलि ने सीधे सीधे कहा तो नहीं पर दोनों जानती थी कि वो किस बारे में कह रही है. “हाँ. मेरी दुनिया बदल गयी है अंजलि. मुझे तुमसे मिलना है. कब मिल सकती हो?”, सुमति ने लिखा.

“रिलैक्स सुमति. कल सुबह मेरे घर ८ बजे के बाद आ जाना. मैं अब दुसरे पते पर रहती हूँ. मैं तुम्हे एड्रेस भेजती हूँ जल्दी.”, अंजलि का जवाब आया. “थैंक यू अंजलि. मुझे तुम्हारी सच मच बहुत याद आ रही है”, सुमति ने लिखा.

“सुमति. यदि तुम बुरा न मानो तो कुछ ट्रेडिशनल कंज़रवेटिव कपडे पहन कर आना. जब तुम आओगी मैं तुम्हे सब समझा दूँगी. पर चिंता मत करो, सब ठीक होगा.”, अंजलि ने एक अजीब सी रिक्वेस्ट भेजी थी सुमति को. आखिर क्यों ट्रेडिशनल कपडे पहनने को कह रही थी वो? “ठीक है. मैं कल मिलती हूँ.”

सुमति की जान में अब थोड़ी जान आई थी. अब उसे पता चल गया था कि वो अकेली नहीं है जो यूँ अचानक ही औरत बन गयी. उसकी सहेली अंजलि भी अब औरत बन चुकी है. अंजलि हमेशा से ही मुसीबत के समय में भी शांत रहती थी और हमेशा सुमति की मदद करती थी. “सब ठीक ही होगा”, सुमति ने सोचा. और फिर वो बाहर डूबते हुए सूरज की ओर देखने लगी. कुछ अजीब सी संतुष्टि थी इस वक़्त उसके मन में. शायद ये बदली हुई दुनिया उसे जल्दी ही समझ आएगी.

आने वाले भागो में हम देखेंगे कि अंजलि का जीवन अब कैसा है. और फिर सुमति की क्रॉसड्रेसर के रूप में माँ मधुरिमा से मुलाक़ात कैसी होती है. और फिर कहानी में एक और ट्विस्ट भी है. बस कुछ भाग और है इस कहानी में. तो इंतज़ार करियेगा!

क्रमश: …

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< भाग १० भाग १२ >

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इंडियन लेडीज़ क्लब: भाग ६

एक रात में सुमति और इंडियन लेडीज़ क्लब की औरतों का जीवन पूरी तरह बदल गया था. आखिर क्या हुआ था उनके साथ? सब क्यों इतनी विचलित थी?


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सुमति को तो यकीन नहीं हो रहा था जो उसके साथ हुआ था. होता भी कैसे? खुद अपने हाथो से अपने स्तनों को छुते हुए वो समझ नहीं पा रही थी कि रातो रात वो औरत कैसे बन गयी? कितने नर्म और मुलायम थे उसके स्तन. “क्या मैं सचमुच औरत बन गयी हूँ?”, यह सवाल उसके मन में चलता रहा. अपने स्तनों को छूकर जो महसूस हो रहा था उसे यकीन नहीं हुआ उसे कितना अच्छा लग रहा था… पर फिर भी मन तो दुविधा में था. फिर उसने अपने लम्बे बालो को सामने एक ओर कंधे पर लाकर उन्हें महसूस किया. “यह सब इतना असली कैसे लग रहा है मुझे? मैं कैसा सपना देख रही हूँ यह. ये सचमुच के बाल है विग नहीं. इस सपने से मैं बाहर नहीं निकलना चाहती हूँ पर कोई तो मुझे बताये की ये सपना है.” पर वहां कोई भी नहीं था जो उसे ये कहता. उसके मन में खलबली मच चुकी थी.

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सुमति ने अपने बिस्तर में रखे सिल्क गाउन को पहन लिया. वो अपने तन को देखना नहीं चाहती थी.

सुमति के बगल में बिस्तर में ही एक सिल्क गाउन रखा हुआ था. वो वहां कैसे आया? संभव ही नहीं था. अब तो उसे यकीन हो जाना चाहिए था कि ये सपना है. उसने झट से उस गाउन को अपने तन पर लपेटा. वो अपने तन को और नहीं देखना चाहती थी. उसका मन असमंजस में था और डरा हुआ भी था. उसे पता था कि वो एक क्रॉसड्रेसर है जिसे औरतों की तरह फैंसी शिफोन साड़ियाँ और चूड़ीदार पहनना पसंद था. फिर भी औरत बन कर तो उसका जीवन पूरी तरह उलट पुलट जाएगा, सब कुछ बदल जाएगा. इसलिए उसका घबराना उचित था.

डिंग डोंग! दरवाज़े पर घंटी बजी. “कौन हो सकता है इतनी सुबह सुबह?” इस हालत में सुमति किसी से भी मिलना नहीं चाहती थी. उसने सोची की जल्दी से वो अपने लडको वाले नाईट ड्रेस पहन लेगी. वो अपनी अलमारी तक चल कर गयी जहाँ उसके सारे नाईट ड्रेस और पैजामे रखे हुए थे. जब उसने अपनी अलमारी खोली, तो उसकी आँखें खुली की खुली रह गयी. वहां से उसके लडको वाले सारे कपडे गायब थे. ये सपना ख़त्म ही नहीं हो रहा था. अब उसकी अलमारी में सिर्फ औरतों के कपडे थे.. नाइटी, गाउन, सैटिन के पैजामे, सेक्सी लाऊंजरी, और न जाने क्या क्या. डिंग डोंग ! दरवाज़े की घंटी फिर से बजी. और अचानक ही सुमति को सर में एक चुभता हुआ सा दर्द महसूस हुआ. क्या यह सपना था? या किसी ने उसे कोई ऐसा ड्रग दिया है कि वो जागते हुए भी सपना देख रही है?


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अन्वेषा जब उठी तो उसे तेज़ हैंगओवर था. वो केवल टॉप पहनी हुई थी और निचे केवल पेंटी. उसकी स्कर्ट गायब थी.

जब अन्वेषा सोकर उठी तो उसे रात की शराब के बाद का हैंगओवर था. उसे तुरंत एहसास हो गया कि उसके तन में कुछ बदलाव हुआ है. उसके हाथ किसी और शरीर पर थे. पीछे से देखने पर उस शरीर पर हाल्टर ब्लाउज और पेटीकोट दिख रहा था. “हाँ… ये तो साशा है. और कौन होगी भला. पर उसकी साड़ी कहाँ है?”, अन्वेषा सोच में पड़ गयी. और उसने खुद को निचे की ओर देखा. “हे भगवान, मेरी स्कर्ट कहाँ गयी?” अन्वेषा नग्न अवस्था में निचे केवल पेंटी पहने हुई थी. वही पेंटी जो कल इंडियन लेडीज़ क्लब में उसे तोहफे में मिली थी. कम से कम वो टॉप तो पहनी हुई थी.

उसे कुछ सेकंड ही लगे होंगे ये एहसास होने के लिए कि उसका हाथ साशा के ब्लाउज के अन्दर उसके सीने पे है. वो दोनों स्पून पोजीशन में सोयी थी रात को. पर उसके हाथ में कुछ नर्म सा महसूस हुआ. वो नरमी स्तन की तरह थी. “बूब्स? साशा के बूब्स है? ये कैसे हो सकता है?”, अन्वेषा भी दुविधा में थी. और फिर उसके सर में भी चुभता हुआ दर्द हुआ जैसे सुमति को हो रहा था. ये ज़रूर ज्यादा शराब का असर है. अन्वेषा ने खुद को समझाने की कोशिश की.


जब तक सुमति का सर दर्द कम हुआ, उसे याद आया कि यह तो दूधवाले के आने का समय है. ज़रूर वही होगा. रोज़ सुबह ६:३० बजे वो दूध का पैकेट देने आता है. कुछ और पहनने को नहीं मिला तो उसने सैटिन के पैजामे और कुरता पहनने की सोची. देखने से ही पता चल रहा था कि वो लड़कियों का है. पर उसके पास फिलहाल वोही चीज़ थी जो लडको के कपडे के सबसे करीब थी क्योंकि उसमे पैजामा था. बाहर दूधवाला इंतज़ार में उतावला हो रहा था.

सुमति ने सोचा कि वो दरवाज़ा इतना ही खोलेगी कि वो दूध का पैकेट ले सके. इससे दूधवाला उसे देख नहीं सकेगा. वो दरवाजे तक गयी. उसके दिल की धड़कने बढ़ चुक्की थी. किसी तरह हिम्मत करके उसने थोडा सा दरवाज़ा खोला और अपने हाथ बाहर निकाली. इस उम्मीद में कि दूधवाला उसे हाथ में पैकेट थमा देगा. पर सुमति के हाथो पर सैटिन कुर्ते की लम्बी बाँहें बेहद ही फेमिनिन थी और उसके किनारे पर बहुत सुन्दर सी लेस की डिजाईन थी. सुमति ने अपने हाथो को आज सुबह से पहली बार देखा था. वो बेहद ही नाज़ुक और फेमिनिन प्रतीत हो रहे थे. “अच्छा हुआ मैडम जो आप जाग गयी. मैं पैकेट ऐसे ही दरवाज़े पर छोड़ कर नहीं जाना चाहता था. पता नहीं कब कौन चोरी कर ले जाता. खैर मैडम, आपकी शादी की तयारी कैसे चल रही है? कब जा रही है आप अपने गाँव शादी के लिए?”, दूधवाला सुमति से यों बातें कर रहा था जैसे वो हमेशा से ही सुमति को मैडम के रूप में जानता हो.

सुमति को कुछ तो जवाब देना था. “हाँ, शादी की तैयारी अच्छी चल रही है.”, सुमति का गला रुंधा हुआ था. उसके गले से आवाज़ साफ़ नहीं आ रही थी.. न तो वो आवाज़ औरत की तरह थी और न ही मर्दों की तरह. “अच्छा मैडम, आपको देख कर लग रहा है कि आपका गला ख़राब हो गया. ठण्ड में ज़रा तबियत का ख्याल रखियेगा. आप अपनी शादी के दिन बीमार न पड़ जाए जब पूरी दुनिया आपको सुन्दर दुल्हन के रूप में देखने आएगी.”, दूधवाले ने कहा.

सुमति को लगा कि ये दूधवाला कुछ ज्यादा ही मेरी ज़िन्दगी में इंटरेस्ट ले रहा है. “पर ये मुझे मैडम क्यों कह रहा है? वो ये क्यों कह रहा है कि दुनिया मुझे दुल्हन के रूप में देखने आएगी? मैं एक आदमी हूँ और मेरी शादी लड़की से हो रही है.”, सुमति मन ही मन पागल हो रही थी. उसने झट से दरवाज़ा बंद किया और एक बार फिर उसके सर में तेज़ चुभता हुआ दर्द हुआ जो कुछ सेकंड के लिए रहा. उसका दिमाग उसके साथ खेल खेल रहा था.


अन्वेषा के सर का दर्द करीब ५ मिनट रहा और आखिर में कम हो गया. उसे आखिर अब समझ आ रहा था कि उसके आस पास क्या हो रहा है. उसने धीरे से साशा के स्तनों को मसल कर देखा जो उसे हाथ में थे. वो अपनी थ्योरी चेक करना चाहती थी जो ये समझा सकेगी कि उसके आस पास ये हो क्या रहा है. साशा के स्तन सचमुच में असली थे. साशा ने बड़ी ही कामुक सी आवाज़ निकाली जब अन्वेषा ने उसके स्तनों को दबाया. “सोने दो न मुझे..”, साशा ने बंद आँखों से कहा. “नहीं… यह नहीं हो सकता. पर यह सब सच है.”, अन्वेषा का अंदाजा सही निकला. उसने अपना फ़ोन दुसरे खाली हाथ से निकाला और उस पर कुछ देखने लगी.


इधर सुमति का दिमाग उसे विचित्र तसवीरें दिखा रहा था. उसे ऐसा याद आ रहा था कि वो रोज़ सुबह दूधवाले से एक औरत के रूप में ही दूध लेती रही है. पर ये सच नहीं था क्योंकि उसे याद है कि वो हमेशा आदमी के रूप में ही दूधवाले के सामने जाती थी. पर उसका दिमाग उसे ये बता रहा था कि उसने दूधवाले से सुमति के रूप में अपनी शादी की बात की थी. वो तसवीरें ज़रा धुंधली थी पर उसके दिमाग को बेचैन कर रही थी. “क्या दूधवाले को पता है कि मैं क्रॉसड्रेसर हूँ? क्या उसने सचमुच मुझे सुमति के रूप में देखा है?” सुमति के दिमाग में ऐसे अनगिनत सवाल उठ खड़े हुए. क्या सुमति पागल हो रही थी? ट्रिंग ट्रिंग… उसका मोबाइल फ़ोन तभी उसके बेडरूम में बज उठा. “अब क्या? कौन इतनी सुबह कॉल कर रहा होगा? भगवान.. मुझे पागल न बनाओ!”, सुमति सोच में पड़ गयी.


अन्वेषा ने साशा के ब्लाउज से हाथ निकालने की कोशिश की. वो बहुत धीरे धीरे हाथ हटाने लगी. और न चाहते हुए भी उसके हाथ साशा के स्तनों को छूने लगे. और उसके स्पर्श से साशा की नींद खुल गयी. वो थोड़ी सी झुंझला गयी थी क्योंकि उसे उसकी नींद से जगा दिया गया. शायद खूब सारी शराब का भी असर था कि वो और भी सोना चाहती थी. वो तुरंत पलट कर अन्वेषा पर चीख कर गुस्सा निकालने को तैयार थी. पर उस १ सेकंड में पलटते वक़्त उसे कुछ एहसास हुआ जो उसे एक सदमे की तरह लगा. पलटते हुए उसे सीने पर अपने स्तनों का भार महसूस हुआ. उसने निचे देखा तो उसके ब्लाउज के अन्दर उसके बड़े स्तन थे. उसका मुंह खुला का खुला रह गया. वो शॉक में चीखने ही वाली थी, पर अन्वेषा ने तुरंत ही उसके मुंह पर हाथ जोर से रख कर उसे रोक लिया. अन्वेषा जानती थी कि वहां क्या हो रहा है.

अन्वेषा ने अपने होंठो पर एक ऊँगली रख कर साशा को शांत होने का इशारा किया. “प्लीज़ शांत रहो और जल्दी से तैयार हो जाओ. हमें यहाँ से तुरंत निकलना होगा. मैंने एक ओला कैब मंगवा ली है.”, अन्वेषा ने धीरे से साशा से कहा. साशा न जाने कहीं खो गयी थी. “पर… पर मेरी साड़ी कहाँ है? और मेरे … मेरे.. सीने पे ये..”

“शश्श्… मैं सब समझा दूँगी. बस तुम धीमी आवाज़ में बात करो.” पर साशा का चेहरा शॉक से सफ़ेद सा हो गया था. ऐसा लगने लगा जैसे वो बस रोने ही वाली है. पर अन्वेषा ने उसे रोने न दिया. उसने तुरंत साशा की साड़ी ढूंढी और उसे धीरे से कहा, “अब जल्दी से इसे पहन लो.”. “मगर… मैंने तुम्हे बताया था मुझे साड़ी पहननी नहीं आती.”, साशा ने लगभग रोते हुआ कहा. उसकी आवाज़ काँप रही थी. “हमारे पास और कोई रास्ता नहीं है साशा. तुम्हे किसी तरह साड़ी पहननी होगी.”, अन्वेषा ने कहा.

साशा को अब किसी तरह खुद से साड़ी पहननी पड़ी. उसकी मदद के लिए वहां कोई नहीं था.

साशा ने इधर उधर देखा. सोहा, साशा की सहेली, उस रूम के दुसरे कोने में एक सोफे पर सोयी पड़ी थी. वो स्कर्ट तो पहनी हुई थी पर वो टॉपलेस थी. उसके स्तन खुले दिख रहे थे और उनमे बड़े डार्क निप्पल भी साफ़ दिख रहे थे. “चलो सोहा को जगाये.”, साशा ने अन्वेषा से कहा. साशा की आँखों में अब आंसू भर चुके थे. “नहीं!!! रुको!”, अन्वेषा ने साशा को रोका. “ये तुम्हारे लिए ही अच्छा होगा साशा. हम दोनों को तुरंत यहाँ से निकलना होगा बिना किसी को जगाये. अब समय व्यर्थ मत करो. जल्दी से अपनी साड़ी पहन लो इसके पहले की कोई जाग जाए.” अन्वेषा की बात सुनकर साशा चुपचाप कांपते हुए साड़ी पहनने लगी. उसे सचमुच साड़ी पहनना नहीं आता था… और फिर सैटिन की साड़ी भी तो फिसलती जा रही थी कि उसकी प्लेट बनाना और मुश्किल था. किसी तरह अपनी चूड़ियों में लगी हुई सेफ्टी पिन का उपयोग कर उसने साड़ी को किसी तरह पहनी. अन्वेषा उसकी मदद कर रही थी पर उसे भी साड़ी पहनने का कोई अनुभव नहीं था.


सुमति ने अपने पैजामे को उतारा. अब वो वापस अपनी नाइटी में थी. जीवन में पहली बार आज उसे औरतों वाले कपड़ो पे गुस्सा आ रहा था. बहुत नर्वस थी वो. उसका फ़ोन अब भी बज रहा था पर वो जवाब नहीं देना चाहती थी. फ़ोन की घंटी कुछ देर बाद रुक गयी. सुमति अब भी समझने की कोशिश कर रही थी कि ये सब क्या हो रहा है. बिना ये समझे वो किसी से मिलना या बात करना नहीं चाहती थी.

वो न जाने कबसे बाथरूम जाना चाहता थी. पर वो उसे रोके हुई थी क्योंकि वो घबरायी हुई थी कि कहीं उसका अपना निचला शरीर भी तो बदल न गया हो. पर अब जब उससे रहा न गया तो वो बाथरूम चली ही गयी. पहुचते ही उसने अपनी नाइटी उठायी ताकि वो अपनी पेंटी उतार सके. उसने अपनी पेंटी की ओर देखा तो उसकी सतह बिलकुल सपाट लग रही थी जैसे वहां कुछ न हो. उसका पुरुष अंग भी जा चूका था. उसने आँखें बंद की, और पेंटी उतार कर टॉयलेट सीट पर बैठ गयी… और वो करने लगी जो उसे करना था. वो रोने लगी. वो अब पूरी तरह औरत बन चुकी थी.


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साशा कल सचमुच बहुत सुन्दर लग रही थी. पर इस सुबह ने उसे झकझोर के रख दिया था.

अन्वेषा और साशा अब ओला कैब में बैठ चुकी थी. वो दोनों अन्वेषा के घर की ओर बढ़ रहे थे. साशा को अभी अभी सर में वही चुभता दर्द हुआ था जो अन्वेषा और सुमति सुबह से महसूस कर रही थी. साशा बेहद कंफ्यूज लग रही थी. उसके आँखों में आंसू थे. उसने अन्वेषा की ओर देखी और बोली, “मेरे दिमाग में कल रात की पार्टी की अजीब अजीब सी यादें आ रही है. पर मैं कुछ समझ नहीं पा रही हूँ. कल रात को क्या हुआ था?” अन्वेषा ने साशा की ओर देखा और उसके आँखों से आंसू पोंछते हुए बोली, “एक बार हम मेरे घर पहुच जाए मैं तुम्हे सब समझा दूँगी.” साशा ने अपना सर अन्वेषा के कंधो पर रख दिया और उसकी बांहों में धीरे धीरे सिसकने लगी.


सुमति का फ़ोन एक बार फिर से बजने लगा. उसने फ़ोन चेक किया तो दिखा कि उसकी माँ का कॉल था. उसने अपने आंसू पोंछे और हिम्मत करके जवाब देने के लिए तैयार हुई. “हेल्लो माँ”, सुमति ने कहा.

“हेल्लो, बेटा. कब से तेरी आवाज़ सुनने को तरस गयी थी मैं. तेरी आवाज़ सुनकर इस माँ के दिल को ठंडक मिल गयी अब.”, सुमति की माँ ने कहा. सुमति भी ये सुनकर थोड़ी भावुक और खुश हो गयी. क्योंकि सुमति की माँ ने उसे बेटा कहकर पुकारी. बेटा जो न जाने कैसे अब औरत के तन में था. “हाँ माँ. मुझे भी तुम्हारी आवाज़ सुनकर बहुत अच्छा लग रहा है.”, सुमति बोली. उसका गला अब भी रुंधा हुआ था. शायद उसका गला बैठ गया था.

“बेटा, तुम्हारा गला ख़राब है? शादी के कुछ दिन पहले गला खराब होना अच्छा लक्षण नहीं है. पता है न तुझे?”, सुमति की माँ ने कहा.

“हां माँ. चिंता न करो मुझे अपना ध्यान रखना आता है.”, सुमति बोली.

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सुमति ने आखिर हिम्मत करके अपनी माँ के फोन का जवाब दिया. वो आज किसी से भी बात नहीं करना चाहती थी.

“चल हट पगली. इतना काम करती है और फिर अपना ध्यान कहाँ रख सकेगी तू. तू जल्दी से अपने ऑफिस से छुट्टी ले ले और शादी के कम से कम १५ दिन पहले घर आजा बेटा. मेरी आखिर १ ही तो बेटी है. उसकी शादी की तैयारी तो उसी के साथ मिलकर करूंगी न?” सुमति की माँ ने ऐसे कहा जैसे वो अपनी बेटी से बात कर रही हो.

“बेटी?” सुमति अब और दुविधा में थी. उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था. क्या पूरी दुनिया के लिए अब वो औरत बन गयी है?

“ये क्या कह …”, सुमति ने जवाब देना चाहा पर उसके गले ने साथ न दिया. वो और खराश महसूस कर रही थी. “ये क्या कह रही हो माँ?”, सुमति की आवाज़ खूब कोशिश के बाद आखिर वापस आ ही गयी. पर अब आवाज़ न तो रुंधी हुई थी, न गले में कोई खराश थी… बल्कि यह आवाज़ बेहद सुरीली एक लड़की की आवाज़ थी. सुमति तो अब उसकी माँ की नजरो में भी बेटी थी!



अन्वेषा और साशा अब अन्वेषा के छोटे से अपार्टमेंट में थे. अन्वेषा जानती थी कि ये वही घर है जहाँ वो कल तक रहती थी पर अन्दर से आज उस घर में सब कुछ बदला हुआ था. अब यह घर किसी कुंवारे लड़के के घर के समान नहीं था. बल्कि ये ऐसा घर था जिसे देखते ही एहसास हो जाता था कि यहाँ कोई लड़की रहती है जिसने घर की साज सज्जा करके इसे बेहद सुन्दर और साफ़ रखा था. स्त्री का असर इस घर में साफ़ था. अन्वेषा खुद अपने घर में एक अजनबी की तरह महसूस कर रही थी.

“अन्वेषा, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है. ३ घंटे में मुझे ऑफिस भी जाना है. ये औरत बनकर वहां कैसे जाऊंगी मैं? मेरे ऑफिस वाले तो मुझे आदमी के रूप में जानते है.”, साशा अपना पल्लू पकड़ कर अपने होंठो पे रख कर लगभग रोते हुए बोली. अपने पल्लू से अपने आंसू वो खुद ही पोंछ रही थी. “साशा… तुम भी सब कुछ समझ रही हो पर तुम मानने को तैयार नहीं हो इस सच को. तुम्हे अब अभी समझ नहीं आया तो अपने फ़ोन को चेक करो. ज़रा अपनी ऑफिस की ईमेल पढ़ कर देखो एक बार.” अन्वेषा बोली.

साशा ने अपना फ़ोन खोल कर देखी तो उसे अपनी आँखों पे यकीन नहीं हुआ. उसके फ़ोन पर हर ईमेल साशा को संबोधित थे. उसका पुरुष नाम कहीं भी नहीं था. पर वो तो कल तक आदमी थी? ऑफिस में तो कोई साशा को जानता तक नहीं था. सभी उस आदमी को जानते थे जिसके अन्दर साशा रहती थी.

अन्वेषा साशा को देख सब समझ चुकी थी. “तुम्हारी सभी ईमेल साशा के नाम है. सही कह रही हूँ न मैं? मतलब तुम्हे चिंता करने की कोई ज़रुरत नहीं है. तुम वहां एक औरत के रूप में काम करने जा सकती हो साशा.”, अन्वेषा ने बेफिक्री से कहा. “सुबह आज जब मैं उठी तो मैं भी तुम्हारी तरह शॉक थी. पर अब मैं जान गयी हूँ कि न सिर्फ मैं एक औरत बन चुकी हूँ बल्कि मेरे आस पास की दुनिया भी मुझे औरत के रूप में ही याद करती है. उनके लिए मैं कभी आदमी थी ही नहीं. सभी के लिए मैं हमेशा से अन्वेषा नाम की औरत हूँ. सच साशा. मैं बहुत खुश हूँ इस परिवर्तन से. अब हम औरतों की ज़िन्दगी असली औरत की तरह जियेंगे. यही तो हम सबका सपना था न? एक औरत बनकर जीने का.. जहाँ हमें सभी औरत की तरह देखे. देखो हमारा सपना सच हो गया!”, अन्वेषा बहुत खुश थी इस नए जीवन से.

पर साशा अब तक चुप थी. “कम ऑन साशा! तुम खुद अपने स्तनों को एक बार छू कर तो देखो. मैंने तो तुम्हारे स्तनों को छूकर सुबह ही देख लिया था. अब तुम भी देख लो. भाग्यशाली हो तुम जो तुम्हे इतने बड़े बूब्स मिले!”, अन्वेषा चलकर हँसते हुए साशा के पास आई और एक बार फिर उसके स्तनों को मसलने लगी. साशा खुद को इस स्थिति में सहज नहीं महसूस कर सकी. यह सच था, साशा के इतने बड़े बूब्स थे कि कई लड़कियों को उनसे जलन हो जाए. “अन्वेषा, रुक जाओ. प्लीज़ मत दबाव.”, साशा ने अन्वेषा को रोकने की कोशिश की.

“अन्वेषा. मेरे दिमाग में कल की अजीब सी तसवीरें आ रही है. क्या वो सब सच है?”, साशा ने पूछा. “तुम हमारे बीच हुए किस की बात कर रही हो?”, अन्वेषा ने एक मादक मुस्कान के साथ साशा की ओर देख कर कहा. उसने आगे बढ़कर साशा की कमर पर हाथ रखा. अन्वेषा का स्पर्श पाकर साशा के बदन में कंपकंपी छुट गयी. वो बहुत असहज थी इस वक्त.


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सुमति की आवाज़ सुनकर उसकी माँ सुमति की सेहत को लेकर चिंतित हो गयी थी.

सुमति अब भी अपनी माँ के साथ फोन पर थी. “सुमति बेटा. तुम्हारे सास ससुर आज तुमसे मिलने वहां आ रहे है. तुम्हे शादी की शौपिंग कराने ले जाने वाले है. याद है न तुझे? मैं और तेरे पापा साथ में आना चाहते थे पर यहाँ भी तो बहुत काम करने है. इसलिए मैंने रोहित से कह दिया है कि आज पूरा दिन तेरे साथ रहे. ताकि तुझे सास ससुर के साथ अकेला न लगे.”, सुमति की माँ ने कहा. रोहित सुमति का छोटा भाई था.

सुमति को समझ नहीं आया कि वो क्या कहे. उसका जीवन इतने जल्दी कैसे बदल सकता था कि उसे सोचने समझने की फुर्सत भी न मिले? और अब सास-ससुर भी आ रहे थे? कौन थे वो भला? किस घर की बहु बनने जा रही है सुमति … उसे ये तक न मालूम था.

“अच्छा सुन बेटी. मैंने तेरे भाई के हाथो एक सिल्क साड़ी भिजवाई है आज. मैं जानती हूँ कि बचपन से तुझे वो कितनी पसंद थी. जब देखो तब तू उसे पहनाने की जिद किया करती थी मुझसे. अब तू बड़ी हो गयी है, और अब तू साड़ी को संभाल सकती है तो मैं चाहती हूँ कि आज सास-ससुर के साथ तू वोही साड़ी पहन कर जाना. मैंने तेरे लिए थोडा नए स्टाइल का ब्लाउज भी सिल्वा दिया. तू इतनी दुबली है… तुझे तो मेरे सारे ब्लाउज ढीले आते है. इसलिए तेरे लिए ख़ास सिलवाई हूँ.”

“अच्छा माँ”, सुमति ने कांपती आवाज़ में कहा. सुमति जानती थी कि उसकी माँ किस साड़ी की बात कर रही है. वो हमेशा से उस साड़ी को बहुत पसंद करती थी. पर जितना उसे याद है उसने कभी माँ से उस साड़ी की जिद नहीं की. करती भी कैसे? आखिर कल तक तो वो उस माँ का बेटा थी, बेटी नहीं. पर एक रात में दुनिया बदल गयी थी. हर कोई अब सुमति को औरत के रूप में ही जानता था.

“वैसे बेटा, मुझे लगता है कि चैतन्य भी अपने माता पिता के साथ ही आयेंगे तुझसे मिलने. मुझे इतनी ख़ुशी होती है न कि हमें चैतन्य जैसा दामाद मिला है. तुम दोनों बचपन से साथ में खेले और पढ़े हो. और अब तुम दोनों विवाह में बंधने वाले हो. मैं सचमुच बहुत खुश हूँ.”, सुमति की माँ तो एक के बाद एक जैसे नए नए सरप्राइज सुमति के लिए खोले जा रही थी. अब ये चैतन्य कौन था?

“माँ. सुनो. लगता है दरवाजे पर कोई आया है. मुझे जाकर देखना होगा. हम फिर बात करते है माँ. ठीक है?” सुमति ने कहकर फ़ोन काट दिया. अब वो और नहीं सुन सकती थी. ये कुछ ज्यादा ही बड़ा बदलाव था उसके जीवन में. न सिर्फ उसकी शादी एक आदमी से होने वाली थी, उसके होने वाले सास-ससुर उससे मिलने भी आज ही आ रहे थे. और फिर सुमति की माँ चाहती है कि वो उनके लिए साड़ी पहने! इसके पहले तो हमेशा सुमति साड़ी पहनने को उतावली रहती पर आज नहीं… क्योंकि वो पहले अपने लिए पहना करती थी किसी और के लिए नहीं. ” एक आदमी से शादी… उहह”, सुमति को सोच कर ही बुरा लग रहा था. कौन ही ये चैतन्य? उसने तो ये नाम तक नहीं सुना था कभी.


अन्वेषा अब साशा के बेहद करीब थी. वो दोनों एक दुसरे की गर्म सांसें महसूस कर सकती थी. अन्वेषा के स्तन अब साशा के स्तनों को छूकर दबा रहे थे. अन्वेषा ने साशा की आँखों में देखा और बोली, “हाँ कल रात हम दोनों ने आपस में किस किया था साशा… और नहीं भी किया था.” साशा कंफ्यूज थी. “ये दोनों बातें कैसे सच हो सकती है अन्वेषा?”

“हमारे आसपास की दुनिया बदल रही है साशा. हमारे इस नए औरत के रुप के हिसाब से हमारी पुरानी यादें भी बदल रही है. हम दोनों जानती है कि कल रात तक हम दोनों के बीच कुछ नहीं हुआ था क्योंकि हम दोनों औरत के रूप में आदमी थी. पर हमारी नयी यादों और दुनिया की यादों में सबको यही याद रहेगा कि हम दोनों ने कल किस किया था. ये न होते हुए भी दुनिया के लिए यही सच है साशा.”, अन्वेषा ने साशा को समझाया.

अन्वेषा अब और भी करिब थी साशा के. उन दोनों के स्तन अब एक दुसरे से दबे जा रहे थे. उफ़… इतने पास कि साशा के होंठ काँप रहे थे. उसे अब भी समझ नहीं आ रहा था. पर अन्वेषा ने साशा के सर को अपने हाथो में पकड़ा और उसके चेहरे को देखती हुई बोली, “कल भले कुछ न हुआ हो… पर ये सच है.” और अन्वेषा साशा के होंठो को बेहताशा चूमने लगी. साशा को न जाने क्यों वो चुम्बन अच्छा भी लग रहा था और नहीं भी. उन दोनों के होंठ इतने नर्म थे, भरे हुए थे, बिलकुल जैसे औरतों के होते है. अब वो औरतें ही तो थी. साशा के होंठ भी अन्वेषा के चुम्बन का जवाब देने लगे. दोनों एक दुसरे में खोने लगी.

और फिर अन्वेषा मुस्कुराने लगी. इन दोनों की नयी यादें लिखी जा रही थी. इस नयी याद में अन्वेषा कल की एक ड्रिंक पार्टी में पहली बार आई हुई लड़की थी जहाँ उसकी मुलाक़ात साशा से हुई. एक दुसरे को देखते ही उन दोनों के बीच मानो तुरंत ही एक कनेक्शन बन गया था. इस नए सच में अन्वेषा और साशा एक लेस्बियन मीटिंग में मिल रहे थे, और उस रात उन्होंने शराब पीने के बाद एक दुसरे को आगोश में लेकर चुम्बन किया था. और सुबह से जो कुछ हुआ है उससे तो यही पता चल रहा था कि दोनों का एक दुसरे के लिए प्यार भरा आकर्षण है.

पर साशा अब तक अन्वेषा की तरह सब कुछ आसानी से स्वीकार नहीं कर पा रही थी. “मुझे थोडा समय चाहिए अन्वेषा. ये सब कुछ बहुत तेज़ी से हो रहा है.”, साशा ने कहा. साशा ने अपनी साड़ी के आँचल को फैलाया और अपने हाथो से उसे आगे लाते हुए अपनी पीठ, अपने स्तनों और अपनी बांहों को उस आँचल में पूरी तरह ढँक लिया. मानो जैसे वो उस साड़ी से अपने तन को लपेट कर छिपाते हुए कुछ सुरक्षा का एहसास चाहती थी एक पारंपरिक स्त्री की तरह. और उसकी साड़ी उसे वो सुरक्षा महसूस करा रही थी. उसे आज उसकी ज़रुरत थी. शुक्र था कि उसने साड़ी पहनी हुई थी.


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सुमति ने हलकी लिपस्टिक लगायी. अब वो अपने नए स्त्रीत्व को स्वीकार करने के लिए तैयार हो रही थी.

सुमति को अब एहसास हो चूका था कि अब वो एक औरत है और उसे एक औरत की तरह ही रहना होगा. कितना अजीब था ये कि जब वो आदमी थी, उसे घंटो मेकअप करके तैयार होने में बड़ा अच्छा लगता था. पर अब जब वो औरत है तब वो सिर्फ जीन्स और टी-शर्ट पहनना चाहती थी. पर उसके पहले उसे नहाना था.

रोज़ रोज़ अपने लम्बे बालो का ख्याल रखना आसान नहीं होगा, सुमति को अपने बालो को सुखाते वक़्त समझ आ गया था. उसे स्तन भी किसी भी तरह के स्पर्श को लेकर काफी सेंसिटिव थे. वो अपने जिस्म के दुसरे अंगो को अभी देखना नहीं चाहती थी. क्योंकि जल्दी ही उसके घर में उसका भाई, उसका मंगेतर और सास-ससुर आने वाले होंगे. वो नहाकर निकल कर किसी तरह अपने बालो को अच्छी तरह सुखाने लगी. पता नहीं क्यों उसका समय लगाकर तैयार होने का मन न किया और उसने अपनी अलमारी में रखी हुई कई लेडीज़ जीन्स में से एक जीन्स निकाली और पहन ली. अब उसकी अलमारी में सिर्फ और सिर्फ लड़कियों वाली टॉप्स और शर्ट्स थी कई रंगों में. उसने उसे से एक टॉप निकाली और पहन ली. वो टॉप काफी चुस्त फिटिंग वाली थी जिसमे उसका फिगर साफ़ झलक रहा था, और उसके स्तन उभर कर बाहर दिख रहे थे.

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सुमति ने अपनी अलमारी में रखी दर्जनों ब्रा में से एक ब्रा निकाली.

सुमति के इस टॉप में उसके बड़े बड़े निप्पल साफ़ दिख रहे थे. और उसके चलने पर उसके स्तन हिलकर झूलते थे. घर के बड़े बुजुर्गो के सामने वो इस तरह उभरे हुए निप्पल और झूलते हुए स्तनों के साथ नहीं जा सकती थी. वो ठीक नहीं लगता. उसके पास और कोई चारा नहीं था, उसे ब्रा पहननी ही पड़ेगी. उसने एक बार फिर अपनी अलमारी खोली जिसमे एक खांचे में दर्जनों रंग बिरंगी ब्रा रखी हुई थी. चाहे जो भी हो, एक क्रॉस-ड्रेसर को सुन्दर ब्रा देखना अच्छा लगता है. और सुमति भी वैसे ही थी. उसने कुछ देर उन ब्रा को छूकर देखा. अंत में उसने एक ब्रा निकाली और जल्दी ही पहन ली. ब्रा पहनना तो उसे कबसे आता था. और फिर उसने बेहद हलकी रंग की लिपस्टिक अपने होंठो पर लगायी. “wow! एक औरत के नर्म होंठो पर यह लिपस्टिक तो और भी अच्छी लगती है.”, वो लिपस्टिक लगाते हुए सोचने लगी. आखिर में वो अपने इस नए तन और नए स्त्रीत्व को स्वीकार करने लगी.

डिंग डोंग! फिर से दरवाजे की घंटी बजी. “अब ये कौन होगा?” सुमति की धड़कने एक बार फिर तेज़ थी.


क्रमश: …

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इंडियन लेडीज़ क्लब: भाग ५

दोस्ती, यारी, सहेलियों का प्यार और औरतों की आपस में जलन, हर तरह के जज्बातों से भरी वो लेडीज़ क्लब की रात जल्दी ही इस दिशा में बढ़ने वाली थी जिसका वहां किसी को अंदेशा तक नहीं था.


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“लहंगे में कितनी सुन्दर लग रही है वो. हैं न?”, ईशा के इस सवाल से सुमति का ध्यान टुटा. न जाने कहाँ खोयी हुई थी वो. अब तक तो वो चुपचाप अन्वेषा को अपने नए रूप में बलखाते देख रही थी. अन्वेषा एक दुल्हन की तरह शालीनता से चल रही थी, धीरे से अपने लहंगे को ज़रा ऊपर उठा कर, थोड़ी घबरायी हुई कि कहीं खुद अपने लहंगे पर ही कदम न रख दे. पर इतने बड़े घेर वाले उस महंगे सुन्दर लहंगे में तो वो अपने पैर तक नहीं देख पा रही थी. आज के पहले तो वो कभी हील वाली सैंडल तक नहीं पहनी थी, इसलिए अंजलि उसका एक हाथ थाम कर साथ दे रही थी ताकि गलती से वो गिर न जाए. “उसका मेकअप भी अच्छा हुआ है. क्या कहती हो सुमति?”, ईशा ने फिर पूछा. “हाँ. वो तो होना ही था. आखिर तुम जो थी मेकअप के लिए!”, सुमति ने एक छोटी सी मुस्कान के साथ ईशा की ओर देखा.

“चल झूठी कहीं की. दिल से तारीफ़ करो तो मानू मैं”, ईशा ने कहा. “मैं देख रही हूँ कि कोई तो बात है जो तुझे परेशान कर रही है. क्या ये उसी खबर को लेकर है? सब ठीक होगा… तू यूँ ही चिंता कर रही है.”, ईशा की बात सुन सुमति थोड़ी आश्चर्य में थी कि उसे कैसे पता चला उस खबर के बारे में. उसने निचे थोड़ी उदासी के साथ देखा. नर्वस होकर वो अपने साड़ी के आँचल को अपनी उँगलियों में गोल गोल लपेट रही थी. पर ईशा ने सुमति का चेहरा उठाया और उससे कहा, “पगली. यह तो ख़ुशी की खबर है फिर चिंता कैसे?” सुमति थोड़ी भावुक हो गयी थी. उसने ईशा को गले लगा लिया और ईशा के कंधे पर सर रख कर बोली, “सब ठीक होगा न?” तो ईशा ने अपने हाथो से सुमति के बालों पर फेरते हुआ कहा, “हाँ. ज़रूर.”

अन्वेषा, अपने नए रूप में बेहद खुश थी और ख़ुशी के मारे वो नाच रही थी. और उसका लहँगा किसी फुल की भाँती खिल उठा था. जब आसपास आपके सभी औरतें हो और आप उनके बीच सबसे सुन्दर औरत हो, तो कौन खुश नहीं होगी?

कमरे के दुसरे कोने में अन्वेषा अब अपनी ऊँची हील की सैंडल पहनकर चलने में थोडा ज्यादा सहज महसूस कर रही थी. “छम छम”, उसकी पायल की मधुर आवाज़ पूरे कमरे में गूंज रही थी. ख़ुशी के मारे अब वो थोडा तेज़ भी चल रही थी, हँस रही थी और अपने आसपास की औरतों से भी ख़ुशी से बात कर रही थी जो उसे उसकी खूबसूरती पे कॉम्प्लीमेंट कर रही थी. सबसे मिलकर वो भी इस क्लब का हिस्सा बन रही थी, जान रही थी कि कौन उसकी सहेली बन सकती है. और इन सब के बीच अंजलि भी अन्वेषा का साथ देते हुए उसके साथ चल रही थी. पता नहीं कौन औरत थी वो जिसने अन्वेषा को चैलेंज किया कि वो अपनी इस खुबसूरत सी लहँगा चोली में नाच कर दिखाए और अन्वेषा भी जोश में आकर मान गयी. और अंजलि से हाथ छुड़ाकर वो अपनी राजकुमारी से लिबास में गोल गोल घुमने लगी. पहले तो अपने हाथो से अपने लहंगे को पकड़ और थोडा ऊपर उठाकर धीरे धीरे, आखिर उस फूलों सी लगने वाली अन्वेषा के नाज़ुक हांथो के लिए लहंगा बहुत भारी जो था. पर फिर जल्दी ही उसने ख़ुशी से अपनी बाँहें खो फैला ली और अपने सर को ऊपर उठाकर तेज़ी से गोल गोल घुमने लगी. उसका लहंगा धीरे धीरे ऊपर उठता गया, और उसका घेर बढ़ता गया मानो जैसे एक कलि खिल कर फुल बन रही हो. उसके चेहरे की ख़ुशी सभी को खुश कर रही थी. अन्वेषा अब फुल बन चुकी थी.

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ईशा ने अन्वेषा को अपने साथ सोफे पर ले जाकर बैठाया और वो देखने लगी की कहीं अन्वेषा को मोच तो नहीं आ गयी.

पर आप में चाहे जितना भी जोश हो, यदि आपके पास हील पहनकर चलने का अनुभव न हो तो आपको सावधानी बरतनी ही चाहिए. और अचानक ही उस राजकुमारी की एडी मुड़ गयी और वो लचक खाकर निचे गिर पड़ी. “सत्यानाश! यह आजकल की कॉलेज की लडकिया भी न… ज़रा सा इंतज़ार नहीं कर सकती!”, ईशा ने कहा और तुरंत अन्वेषा की ओर दौड़ पड़ी उसे उठाने के लिए. अंजलि तो थोड़ी चिंतित थी कि कहीं अन्वेषा को मोच न आ गयी हो. एक बड़ी बहन की तरह वो भी दौड़ पड़ी और कहने लगी, “इसलिए मैं कह रही थी कि मेरे साथ धीरे धीरे चलो. अब लग गयी न चोट.. पैरो में मोच तो नहीं आई?” पर अन्वेषा कहाँ सुनने वाली थी? वो तो अब भी हँस रही थी. ईशा और अंजलि ने उसे तुरंत उठाया और एक सोफे पर ले जाकर बिठाया और दोनों औरतें अन्वेषा के पैरो को पकड़ देखने लगी कि कहीं चोट तो नहीं आई है. दोनों औरतें भी कितनी ख्याल रखने वाली थी. पुरुष के रूप में वो चाहे जैसे भी रही हो, पर एक बार साड़ी पहन ले, तो उन औरतों से ज्यादा ख्याल रखने वाली कोई न हो इस दुनिया में. साड़ी का भी कितना प्यारा असर होता है पहनने वाली के मन पर! फिर भी कुछ औरतें ऐसी भी थी जिन्हें अन्वेषा के गिरने से कुछ फर्क न पड़ा… उन्हें तो जैसे अपने अन्दर की जलन निकालने का मौका मिल गया था. इंडियन लेडीज़ क्लब में आखिर सभी तरह की औरतें थी, जिनमे से कुछ ईर्ष्यालु औरतें भी थी.

मधु, जो की इस क्लब में माँ की तरह थी, वो आगे आई और बोली, “लेडीज़! क्या यार कब तक मुझ बेचारी को भूखा रखोगी. चलो जल्दी से आगे का प्रोग्राम करते है… मेरे पेट में तो चूहे कूद रहे है. अन्वेषा चलो आओ इधर.” मधु ने अन्वेषा को बुलाया जो अब मन ही मन थोडा शर्मा रही थी अपनी नाचने की बेवकूफी को लेकर. किसी तरह अपने पैरो पर खड़ी होकर अंजलि के सहयोग से वो चलकर मधु के पास आई.

“देखो अन्वेषा. अब इस रात की बस एक चीज़ और रह गयी है. तुम्हारे पास ये मौका है कि तुम्हारी कोई ख्वाहिश हो जो हम औरतें आज पूरी कर सके तो बेझिझक बोल दो. हम लोग पूरी कोशिश करेंगे तुम्हारी इच्छा पूरी करने की.”, मधु ने अन्वेषा से कहा. अन्वेषा को कुछ समझ न आया. आखिर इतना सब कुछ तो उसके लिए क्लब ने पहले ही किया है… जो उसने कभी सपनो में भी नहीं सोचा था. अब आखिर वो और क्या मांग सकती थी भला? थोड़ी नर्वस होकर उसने लडखडाती जबान से कहा, “मेरी इच्छा…. मैं चाहती हूँ की सभी औरतें…” बेचारी मधु जैसी मुखर और बड़ी सी औरत के सामने कुछ बोल न पा रही थी.”मैं चाहती हूँ की सभी औरतें एक बड़ा सा गोल घेरा बनाकर ज़मीन पर बैठ जाए” यह कैसी ख्वाहिश है, मधु तो सोच में पड़ गई. पर अब यह ख्वाहिश पूरी तो करनी थी. “लेडीज़ तुम सबने सुन लिया अन्वेषा क्या चाहती है… तो चलो सब गोला बनाकर बैठ जाओ.”, मधु ने जोर से सभी से कहा.

वैसे तो वो कमरा बड़ा था फिर भी इतनी सारी औरतों के लिए गोल घेरा बनाना थोडा मुश्किल काम था. और फिर निचे बैठना… इतने फैंसी कपडे पहनकर? मज़ाक थोड़ी है. यदि आपने कभी साड़ी पहनी हो तो आपको तो पता होगा कि कैसे आपको पहले जगह बनानी पड़ती है कि आप अपने पैरो को पेटीकोट के अन्दर मोड़ कर ऐसे बैठ सके कि आपकी साड़ी ख़राब न हो और उसकी प्लेट अच्छी तरह बनी रहे… और फिर पल्लू को भी तो संभाल कर फैलाना होता है. कभी कोशिश करियेगा… आसान नहीं होता है साड़ी पहन कर निचे बैठना.. और वो भी भारी साड़ियाँ! और यदि आपने टाइट चूड़ीदार पहना हो तो फिर आपके पास एक ही तरीका है कि दोनों पैरो को एक ओर मोड़ कर ही आप बैठ सकती है. पालती मारने की कोशिश भी न करना टाइट चूड़ीदार में! और फिर जो भी पहनी हो आप, एक औरत को बैठ कर अच्छी दिखने के लिए अपनी कमर सीधी रखनी होती है… वो और भी कठिन होता है. इसके अलावा छोटी स्कर्ट पहनकर बैठना थोडा आसान है पर वो भी तब जब आपने टाइट स्कर्ट न पहनी हो. और फिर इन सबके अलावा आपको अपनी बड़ी सी पर्स और सैंडल के लिए भी जगह बनानी होती है! इस क्लब के लेडीज़ असली औरतों की तरफ फ्लेक्सिबल तो थी नहीं कि जैसे चाहे आराम से मुड़ जाए. उन सब औरतों को निचे बैठने देना का सीन भी बड़ा मजेदार हो गया था. “उई… माँ! मेरी कमर.. कोई ज़रा सहारा तो दो!”, मधु ने सबसे पहले कहा जब वो धम्म से अपने बड़े से कुलहो पर निचे गिर पड़ी. अंजलि और सुमति तो देखकर ही हँस हँस कर लोटपोट हो रही थी. फिर भी किसी तरह सब निचे बैठ पायी. “अब आगे क्या करना है?”, अंजलि ने अन्वेषा से पूछा.

“अब मैं चाहती हूँ कि आप सब अपनी आँखें बंद करे और अपनी अगल बगल की औरतों का हाथ पकड़ कर चेन बनाये.. और अपने मन को शांत करे”, अन्वेषा ने कहा. पर जब कोई कहता है कि अपने मन को शांत करे तो इस क्लब की औरतों के मन में ये सब चल रहा था… “यार यह ब्रा स्ट्रेप बाहर निकल कर चुभ रहा है. मुझे ब्रा को थोड़ी ढीली पहनना चाहिए था.”, “हाय… मेरे बूब्स फिसल रहे है. आगे से कभी भारी बूब्स नहीं पहनूंगी. मेरी तो कमर में दर्द हो गया.”, “मुझे मेरे पैर फैलाने को जगह चाहिए. यह बगल वाली मोटी ने सारी जगह घेर ली.”, “आज कितनी सुन्दर लग रही हूँ मैं? शायद इस कमरे में आज मुझसे खुबसूरत कोई नहीं होगा.”, “यह क्या नाटक कर रहे है हम लोग?”, “एक दिन मैं भी अन्वेषा का लहंगा ट्राई करूंगी.”, “क्या आज मैं अपने दिल की बात उससे कह दू. क्या कहेगी वो?”, “अंजलि उस साड़ी में कितनी सेक्सी लग रही है. काश वो मेरी बीवी होती.”, “क्या कोई मेरी पीठ में चिकोटी कांट रहा है?”, “हे भगवान मुझे तो बड़ी हँसी आ रही है और यहाँ सबको चुप रहना है.”, “मुझे भूख लगी है.”, और न जाने क्या क्या सोच रही थी वो सब औरतें. जितनी औरतें उससे कहीं ज्यादा विचार!

जब सभी औरतें किसी तरह बैठ गयी तो अन्वेषा ने कहा, “इस क्लब की सभी औरतों को सबसे पहले मैं धन्यवाद् देना चाहती हूँ. क्योंकि आपकी वजह से मुझे इस ख़ास रात को अनुभव करने का मौका मिला. मैं आपमें से अधिक लोगो को तो नहीं जानती पर आप सबने मिलकर मुझे यह यादगार अनुभव दिया. मैं आप सभी के लिए कुछ कर तो नहीं सकती पर आज मैं आप सभी के लिए भगवान से ख़ास प्रार्थना करूंगी.” उसने अपनी बातों से सबका ध्यान अपनी तरफ खिंच लिया. “मैं भगवान और दुर्गा माँ से प्रार्थना करती हूँ कि वो यहाँ सभी के औरत का जीवन जीने के सपने को साकार करे. हमें ऐसा जीवन दे कि हमें किसी से छुप कर यूँ तैयार न होना पड़े. मैं प्रार्थना करती हूँ कि ये सोसाइटी हमें इसी जीवन में हमें हमारे रूप में स्वीकार करे. मैं चाहती हूँ कि हम ऐसे समाज में रहे जहाँ हम जब चाहे औरत बन सके और यह समाज हमें औरत के रूप में स्वीकार करे. मैं प्रार्थना करती हूँ कि हम सभी को ऐसे जीवनसाथी मिले जो हमारे अन्दर की औरत को भी स्वीकार करे.”

बहुत ही सोची समझी प्रार्थना थी अन्वेषा की. काश कि यह सच हो जाए तो कितना अच्छा होगा. इस प्रार्थना को सुनकर सब शान्ति से एक दुसरे का हाथ पकडे बैठी रही. कुछ सोच रही थी कि प्रार्थना तो अच्छी है पर ऐसी प्रार्थना का क्या फायदा. हमारे आसपास के लोगो की सोच एक रात में तो बदल नहीं जायेगी. पर फिर भी इस प्रार्थना ने सुमति और वहां बैठी बहुत सी औरतों के दिल को छू लिया. फिर थोड़ी देर बाद सभी औरतें अपनी जगह से उठ गयी. अब खाने का समय हो गया था. और सबकी सब दावत के मज़े लेने के लिए तैयार थी.

खाते वक़्त अन्वेषा ने मौके का फायदा उठा कर नयी जान पहचान और सहेलियां बनाना शुरू कर दी थी. वो दो लड़कियों के पास गयी जो देखने में उसकी हम-उम्र लगती थी. “हेल्लो अन्वेषा! कैसा लग रहा है राजकुमारी बन कर?”, उनमे से एक ने अन्वेषा से पूछा. “हम्म… बता नहीं सकती. ये सब सपने की तरह लग रहा है. थोड़ी सी तकलीफ हो रही है इस भारी से लहंगे को उठाकर चलने में… पर फिर भी बड़ा मज़ा आ रहा है.”, अन्वेषा ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया. “मैं समझ सकती हूँ तुम्हारे दिल की बात. मुझे भी अपनी यहाँ की पहली रात अच्छी तरह से याद है. वैसे इनसे मिलो… ये मेरी अच्छी सहेली सोहा है. और मेरा नाम तो बताना ही भूल गयी मैं! मैं साशा हूँ.”, हलकी गुलाबी रंग की सैटिन की साड़ी पहनी उस लड़की ने अपना और अपनी सहेली का परिचय अन्वेषा को दिया.

अन्वेषा बढ़ कर साशा और सोहा के पास गयी जो देखने में उसकी हम-उम्र मालूम पड़ती थी. साशा एक मॉडर्न तरीके से हलकी गुलाबी साड़ी पहनी हुई थी, जबकि सोहा सफ़ेद स्कर्ट और ऊँची हील में थी.

“तुम दोनों से मिलकर बहुत अच्छा लगा. वैसे साशा कितनी सुन्दर साड़ी है तुम्हारी यार. इतनी सेक्सी ब्लाउज के साथ इसको पहनने का तरीका भी बड़ा सेक्सी और मॉडर्न है. लगता है कि तुम साड़ी पहनने में एक्सपर्ट हो!”, अन्वेषा ने साशा की साड़ी के पल्लू को छूते हुए कहा. साशा सचमुच बहुत सुन्दर लग रही थी. फैंसी सैटिन की साड़ी और साथ में हाल्टर नैक ब्लाउज… उस पर खूब फब रहा था. “अरे कहाँ यार? मुझे तो साड़ी पहनना बिलकुल भी नहीं आता. वो तो यहाँ शर्मीला आंटी ने मेरी मदद की थी. वोही आंटी जिन्होंने तुम्हारा दुपट्टा तुम्हे पहनाया आज. देखना आगे से तुम भी उनकी मदद लोगी. बहुत प्यारी है वो. एक दिन वो मुझे खुद टेलर के पास ले जाकर मेरे लिए हाल्टर टॉप स्टाइल का ब्लाउज सिलवाई थी. मुझसे कहती है वो कि मेरी जैसी जवान लड़कियों की उम्र है अभी कि हम मॉडर्न ब्लाउज पहने. पुराने स्टाइल के ब्लाउज पहनने को तो पूरी उम्र बाकी है!”, साशा कहते कहते खिलखिलाने लगी. इस क्लब की लेडीज़ भी कितनी मिलनसार थी. सब एक दुसरे की मदद करते हुए एक औरत के रूप में परिपक्व हो रही थी.

“हा हा.. सच ही तो कहा है आंटी ने. जो भी तुम माल लग रही हो! मुझे तो तुम्हारी बम पे पिंच करने का जी चाह रहा है!”, अन्वेषा ने साशा को छेड़ते हुए कहा. और फिर वो सोहा की ओर पलट कर मुस्कुराने लगी. सोहा ने लम्बी स्लीव का नीले रंग का टॉप पहना था और साथ में एक सफ़ेद रंग की स्कर्ट… और मैच करती हुई सैंडल. “वाओ सोहा… ४ इंच की हील्स! मैं तो ऐसा कुछ पहनने का सोच भी नहीं सकती. आज तो १ इंच की हील में ही गिर गयी मैं. बड़ी शर्म आ रही थी उस वक़्त मुझे.”, अन्वेषा ने फिर सोहा से कहा.

“अरे इतनी जल्दी क्या है अन्वेषा. तुम भी सिख जाओगी.. ज्यादा समय नहीं लगता. बस थोड़ी सी प्रैक्टिस और फिर तुम भी हील्स में दौड़ने लगोगी..”, सोहा ने कहा. “दौड़ना..? न बाबा न … मैं तो थोडा तेज़ चल लूं उतना ही काफी है.”, अन्वेषा बोली. “वैसे अन्वेषा… तुमने लहंगा चुनकर बहुत अच्छा की. तुम पर बहुत जंच रहा है ये रंग. तुमको आज लहंगा पहनकर गोल गोल घूमते नाचते देख कर बहुत अच्छा लगा. तुम्हे न किसी गाने पे प्रैक्टिस करके यहाँ हम सबके सामने कभी डांस करना चाहिए!”, सोहा ने फिर कहा. “आईडिया तो अच्छा है.. पर पता नहीं मैं लहंगा दुबारा कब पहनूंगी. सच बताऊँ तो मैं स्कर्ट पहनने वाली लड़की हूँ. टाइट सेक्सी छोटी स्कर्ट… जो सबका ध्यान खींचे!!!”, अन्वेषा हँसते हुए बोली. उसके कंगन और चूड़ियों की खनक और उसकी हँसी सचमुच बड़ी मोहक थी.

“ओहो… क्या बात है. किसका ध्यान खींचना चाहती हो मैडम? यहाँ पर तो सब औरतें है! कोई आदमी नहीं है..”, साशा ने कहा और तीनो जोर जोर से हँसने लगी. तीनो लड़कियों के बीच जल्दी ही दोस्ती की शुरुआत हो चुकी थी. सोहा ने फिर दोनों से कहा कि कुछ खाना खा लिया जाए. और तीनो खाने की तरफ एक साथ चल पड़ी… एक नयी दोस्ती की शुरुआत थी यह. उसी तरह जैसे अंजलि, सुमति और मधु की दोस्ती थी.

रात आगे बढती रही. अन्वेषा के पास बहुत सी औरतें आई और उसका क्लब में स्वागत किया. सभी ने उसके रूप की तारीफ़ की. समय तेज़ी से गुज़र रहा था… और इन औरतों के पास कहने को बहुत कुछ था पर समय कम था. वो एक दुसरे की साड़ियाँ, मेकअप और ड्रेसेज की तारीफ़ करते करते थक नहीं रही थी. कोई किसी के सुन्दर हार के बारे में बात कर रही थी.. तो कोई इस बारे में कि कैसे मंगलसूत्र हम भारतीय औरतों की खूबसूरती बढ़ा देता है. कोई अपनी नयी पायल दिखा रही थी.. तो कोई अपनी सहेलियों के साथ बातें कर रही थी. कोई अपनी नयी हेयर स्टाइल दिखा रही थी. कोई बता रही थी कि ब्रेस्टफॉर्म पहनकर कैसे उनका जीवन ही बदल गया.. नर्म मुलायम.. उम्म्म… कोई बता रही थी कि उसने कैसे अपनी cd के बारे में अपनी गर्लफ्रेंड को बताया और उसने उसे स्वीकार कर लिया. कुछ औरतें पक्की औरतों की तरह रेसिपी डीसकस कर रही थी तो कोई अपनी फिगर की चिंता. कोई उन्हें उपाय दे रही थी कि कैसे पेट पतला किया जाए. तो कुछ औरतें इस क्लब के प्रोग्राम के बाद रात को कहाँ पार्टी करना है इसकी प्लानिंग कर रही थी. इस क्लब में करने को कितना कुछ था. कोई भी औरत वहां बोर नहीं हो सकती थी!

पर अब क्लब के प्रोग्राम के ख़त्म होने का समय आ गया था. ऐसा लग रहा था जैसे रात तो अभी ही शुरू हुई थी. अभी भी इन औरतों को कितनी बातें करना बाकी थी. एक बार फिर मधु जी सेण्टर में आकर हाथो से ताली बजाकर सबका ध्यान अपनी ओर खींचने लगी. वो कुछ कहने वाली थी. मधु ने अपने लम्बे पल्लू को सामने लाकर अपनी कमर में लपेटा और फिर कहने लगी, “लेडीज़! मुझे उम्मीद है कि आप सबको बहुत मज़ा आया होगा आज. पर अब रात को ख़त्म करने का समय आ गया है. पर मुझे आप सबसे एक ख़ुशी की खबर शेयर करनी है.” मधुरिमा ने फिर मुस्कुराते हुए सुमति की ओर देखा और बोली, “तुम सबको तो पता ही है कि मेरी सबसे प्यारी बेटी सुमति इतने सालो से अपने इस घर में इंडियन लेडीज़ क्लब चला रही है. तो सबसे पहले सुमति को धन्यवाद देने के लिए जोर से तालियाँ. आखिर वो इतने सालो से इतनी मेहनत करती आ रही है ताकि हम सभी को ऐसी जगह मिल सके जहाँ हम सब अपने सपने पूरे कर सके. और साथ ही अंजलि को भी थैंक यू जो जल्दी आकर आज की तैयारियों में सुमति का हाथ बंटा रही थी. और फिर ईशा, शर्मीला, और अनीता को भी धन्यवाद जिन्होंने आज अन्वेषा का रूपांतरण किया.” यह हर बार की तरह क्लब की तैयारी करने वाली औरतों को धन्यवाद देने वाला मेसेज था. और हमेशा की तरह सबने ख़ुशी से जोर से तालियाँ बजाई.

“और अब सबसे बड़ी खबर! मेरी बेटी, सुमति की शादी हो रही है! एक माँ होने के नाते मुझे कितनी ख़ुशी है मैं बता नहीं सकती. पर साथ ही मैं बहुत भावुक भी हूँ आज. मेरी बेटी का घर बसने जा रहा है और एक महीने में वो एक सुहागन होगी. काश मेरे पास और समय होता जो मैं उसको अच्छी पत्नी और अच्छी बहु होने के बारे में कुछ सिखा पाती ताकि वो ससुराल में मेरा नाम न डूबा दे! पर अब क्या कर सकती हूँ मैं…. जितना सिखा सकती थी सिखा दी… “, मधु का अपना ड्रामा फिर शुरू हो गया था. उसने एक बार फिर सुमति की ओर देखा. मधु चाहे जो भी कहे पर अन्दर ही अन्दर वो सुमति के लिए बहुत खुश थी. मधु ने फिर आगे कहा, “सुमति मैं और इस क्लब की सभी औरतें तुम्हारे लिए बहुत खुश है”

“अच्छा, लेडीज़ तो अब अगली खबर. तुम सब तो जानती हो कि हम सभी यहाँ सुमति के घर में मिलती आ रही थी. पर अब हमें पता नहीं कि सुमति की होने वाली पत्नी सुमति के इस रूप को स्वीकारेगी या नहीं. मुझे यकीन है कि वो सुमति को ज़रूर अपनाएगी. कौन नहीं अपनाएगी इतनी प्यारी सुमति को? पर फिर भी.. चाहे जो भी हो… एक नयी नवेली पत्नी भले सुमति को अपना ले पर हर हफ्ते ३०-४० लोगो को अपने घर में बुलाये, इसकी सम्भावना कम है. तो जब तक हम मिलने की नयी जगह नहीं ढूंढ लेती, इंडियन लेडीज़ क्लब की मीटिंग नहीं होगी.”

ये खबर सुनते ही मानो वहां की सभी औरतों का दिल टूट गया. यही तो उनकी सबसे सेफ जगह थी. खबर सुनते ही कमरे में सभी आपस में इस बारे में बात करने लगी. किसी भी ग्रुप की तरह, इस ग्रुप में भी कुछ औरतें थी जो इस क्लब का सारा फायदा तो उठाती थी पर फिर भी शिकायत करती रहती थी. ऐसी ही औरतों की एक लीडर थी.. गरिमा. खबर सुनते ही गरिमा ने आगे आकर कहा. “यह बात हमें स्वीकार्य नहीं है.. इंडियन लेडीज़ क्लब सिर्फ सुमति का नहीं है. उसकी शादी हो रही है तो हम सब औरतें क्यों भुगते?”

मधुरिमा को अपने जीवन में ऐसी औरतों को संभालने का काफी अनुभव था. तो मधुरिमा ने गरिमा से कहा, “ठीक है गरिमा. तुम सच कहती हो. तो फिर पक्का रहा. अगले हफ्ते भी इंडियन लेडीज़ क्लब की मीटिंग होगी और आगे भी होती रहेगी. लेडीज़ सभी ध्यान दो… अगले हफ्ते से हम सभी गरिमा के घर में मिला करेंगी.”

मधु की बात सुनकर गरिमा सकपका गयी. वो पीछे हो ली और बोली, “पर मैं तो अपने पेरेंट्स और पत्नी के साथ रहती हूँ. मैं कैसे करूंगी यह सब?”

“अच्छा… तुम्हारी यह बात भी ठीक है गरिमा.”, मधु बोली, “…. तो फिर मुझे यकीन है कि तुम्हे इस क्लब के लिए कुछ करने में कोई प्रॉब्लम नहीं होगी. तो तुम एक अलग घर इस क्लूब के लिए किराए पर ले लो. वो तो और भी बढ़िया होगा. हम सब वहां अपनी साप्ताहिक मीटिंग के अलावा भी जब चाहे वहां जा सकेगी.”

गरिमा और कुछ बोल न सकी. मधु ने उसकी बोलती बंद करा दी थी. गरिमा हमेशा से ही ऐसी परेशानी खड़ी करने वाली औरत थी. वो कुछ भी मदद तो नहीं करती थी पर क्लब के बारे में हमेशा सभी औरतों से चुगली करती रहती थी.

“अच्छा लेडीज़. अब और कुछ कहने को तो रहा नहीं. चलो प्लीज़ आप सब मिलकर घर को साफ़ करने में मदद कर दो. कल सुबह ही सुमति का छोटा भाई और उसकी मंगेतर यहाँ आने वाले है. और आप लोग जो भी अपना सामान लेकर आई थी, प्लीज़ अपने साथ ले जाना. यहाँ कुछ भी मेकअप या कपडे नहीं रहने चाहिए” और फिर सभी औरतें मधुरिमा की देख रेख में साफ़ सफाई में जुट गयी.

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मधु ने अब घर की सफाई की ज़िम्मेदारी उठा ली थी. हर कोई सुमति का घर साफ़ करने में मदद कर रही थी.

साफ़ सफाई होने के बाद, अब वक़्त आ गया था कि वो औरतें अब वापस अपने कपडे बदल कर आदमी बन जाए. बहुत सी औरतों के लिए यह उनके दिन का सबसे दुखदायी समय होता था. पर वो अपने साथ बहुत ही खुबसूरत यादें संजोये जा रही होती थी. कई बार कुछ औरतें रात को अपने औरत वाले रूप में ही वहां से निकल जाती थी. कुछ लोग किसी के घर जाकर फिर ड्रिंक्स और लेट पार्टी के लिए मिलते थे. अन्वेषा ने ऐसी ही एक पार्टी में जाना तय किया. उस पार्टी में करीब ९ औरतें थी और साथ में साशा और सोहा भी थी. पर वहां जाने के पहले अन्वेषा को कपडे बदलने थे. ऐसी राजकुमारी की तरह वो रात गए बाहर नहीं जा सकती थी. क्लब की कुछ औरतों ने उसे लहंगा चोली उतारने में मदद की. अब अन्वेषा ने एक छोटी ड्रेस पहन ली थी जो वो अपने साथ घर से लेकर आई थी. न जाने उसमे इतनी हिम्मत कैसे आ गयी थी कि वो यहाँ से बाहर लड़की बन कर ही जाने वाली थी. साशा, सोहा और दूसरी औरतें भी औरत की तरह ही उस पार्टी में जा रही थी. वैसे भी पार्टी किसी के घर में थी.. सौभाग्य से जिसका घर था उसके घरवाले कुछ दिनों के लिए बाहर गए हुए थे. भले ही पार्टी के लिए उन सबके पास जगह थी… पर वहां तक जाने के लिए इंडियन लेडीज़ क्लब से बाहर निकलना पड़ता. और चारदीवारी के बाहर जाने में सब उत्साहित रहती थी… पर बाहर जाने में डर भी रहता है कि यदि पुलिस वालो ने रोक लिया तो? या किसी पहचान वाले ने देख लिया? पर ग्रुप में बाहर जाने में डर थोडा कम हो जाता था. धीरे धीरे अन्वेषा, साशा, सोहा और लगभग सभी औरतें वहां से अब जा चुकी थी. और रह गयी थी सिर्फ सुमति, मधु, अंजलि और ईशा.

ईशा एक कोने में सुमति का हाथ पकड़ी हुई थी, और उसे विश्वास दिला रही थी कि शादी के बाद भी हम सब साथ मिलने का बहाना बना ही लेंगे. पर शादी के बाद क्या होगा सोचकर सुमति थोड़ी चिंतित ही रही. उसे देख अंजलि भी वहां आ गयी. और फिर अंजलि और ईशा ने एक एक कर उसे गले लगाकर प्यार से ढांढस बंधाया.

“क्यों न हम सबकी एक फोटो हो जाए? आखिर हम सहेलियों को ये रात यादगार बना लेनी चाहिए. क्योंकि अगली बार तो सुमति जी मिस से मिसेज़ हो चुकी होंगी.”, अंजलि कहकर हँसने लगी. तभी मधु वहां आ गयी और बोली, “फोटो खींचनी है तो तुम तीनो साथ में खड़ी हो जाओ. मैं खिंच देती हूँ.” और मधु ने अपनी ब्लाउज के अन्दर से फ़ोन निकाली. “मधु जी, फ़ोन भी ब्रा में? तो यह राज़ है आपके बड़े बूब्स का”, ईशा ने मधु से पूछा. अंजलि हँस रही थी. “मैडम ईशा, इस ब्रा में और भी बहुत कुछ है. मुझे पता है कि तुम भी मेरी तरह 40DD कप चाहती हो! चल अब छोडो बूब्स की बातें… मुस्कुराओ तुम तीनो” और फिर मधु के कहने पर तीनो सहेलियों ने एक दुसरे की कमर पर हाथ रखा, मुस्कुरायी और क्लिक! कितना यादगार पल था वो.. उन सहेलियों के लिए. हमेशा की तरह आज भी बेहद खुबसूरत लग रही थी तीनो.

फोटो के तुरंत बाद ही अंजलि और ईशा ने भी कपडे बदले और सुमति से विदा ली. मधु कुछ देर और वहां रुकी थी. उसने सुमति से कहा कि वो भी कपडे बदल कर नाइटी पहन ले. सुमति बाथरूम से कपडे बदलकर जल्दी ही वापस आ गयी. मधु और सुमति अब सुमति के बिस्तर पर ही बैठे हुए थे. वहां मधु ने सुमति को माँ के प्यार के साथ गले लगायी और बोली, “मैं जानती हूँ कि तुम कैसा महसूस कर रही हो सुमति. मैं भी कई सालो पहले ऐसे समय से गुज़र चुकी हूँ. पर शादी कोई सज़ा नहीं है.. वो भी तुम्हारे जीवन में खुशियाँ लेकर आएँगी. और कभी कभी, वो ख़ुशी इतनी ज्यादा होती है कि हम अपने अन्दर की औरत को भी भूल जाते है. कम से कम शुरु के कुछ साल तक तो ऐसा ही रहता है. फिर क्या पता तुम्हारी पत्नी भी सुमति को खुले दिल से स्वीकार कर ले? और यदि न करे, तब भी अंजलि, ईशा और मैं तो है न तेरे साथ हमेशा? हम किसी न किसी तरह समय और जगह ढूंढ लेंगे सुमति से मिलने के लिए. तुम समझ रही हो न?” मधु की बातों में सचमुच ममता भरी हुई थी.

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लम्बे व्यस्त दिन के बाद, सुमति अपनी नाइटी पहन कर जल्दी ही सो गयी.

“पर माँ! मैं तुम्हे भी तो कितना याद करूंगी. तुम मुझसे इतनी आसानी से मिल न पाओगी. और फिर अपनी बहु – मेरी पत्नी से नहीं मिलोगी तुम?”, सुमति ने कहा. “बेटी, मैं तो हमेशा इसी शहर में रहूंगी न? तो हम किसी न किसी तरह मिल लेंगे. अपनी माँ पे भरोसा नहीं है ? अब चुपचाप बिस्तर में सो जाओ.” मधु ने प्यार से सुमति के सर पर हाथ फेरा. वो भी जानती थी कि अपनी इस प्यारी सी बेटी से न मिल पाना उसे भी दुख देगा. उसने सुमति को लेटाकर एक माँ की भाँती चादर उढ़ाकर उसके माथे पर एक किस दिया. “गुड नाईट, सुमति बेटी. अपना विग जल्दी निकाल लेना वरना नींद नहीं आएगी अच्छे से.”, मधु बोली और फिर वो भी अपने घर के लिए निकल गयी. सुमति को भी जल्दी ही नींद आ गयी. इस व्यस्त रात के बाद, आरामदायक नाइटी पहनकर किसी को भी नींद आ जाए. आखिर एक अच्छी नाइटी एक औरत के तन को प्यार से छूती है, लपेटती है और अपने स्पर्श से उसे पहनने वाली औरत को अच्छी तरह से समझती भी है.

हैरानी भरी सुबह

सुमति के घर में : कभी आपने एक आरामदायक नाइटी में सोने का आनंद लिया है? यदि हाँ, तो आप जानती ही होंगी की सुबह सुबह नींद खुलने पर नाइटी का स्पर्श आपकी कोमल त्वचा पर कितना सुख देता है. सुमति ने भी वही अनुभव किया. उसकी आँखें बंद थी पर उसके चेहरे पर एक मुस्कान थी. उस वक़्त उसकी बांहों में कोई होता तो वो बंद आँखों के साथ ही उसे जोर से सीने से लगा लेती. पर फिर भी वो अपनी आँखें मींचे मींचे ही उठ बैठी. उफ़… उसकी स्मूथ त्वचा पर उसकी मखमली सी नाइटी तो आज मानो फिसल रही थी. सुबह सुबह इस तरह से औरत होना महसूस करते हुए उठने का मौका बार बार कहाँ मिलता है. सुमति अब सीधी होकर बैठ गयी थी. और बैठते ही उसने अपनी उँगलियों को अपने लम्बे बालो पर फेरा और फिर उन्हें अपने चेहरे के पीछे कर दी. पर उसके लम्बे बाल? सुबह सुबह सूरज की रौशनी में अब सुमति अंगडाई ले रही थी, मानो अपने अन्दर की सारी नींद को उस उजाले में उड़ा देना चाहती हो. नए दिन का स्वागत करती हुई सुमति का सीना उसके स्तनों के साथ अंगडाई लेते हुए किसी मादक सौंदर्य की धनी लड़की की तरह आगे निकल आया था. पर सुबह सुबह की हलकी सी ठण्ड जब महसूस हुई तो उसने अपने हाथ मोड़ लिए. अपने ही हाथो पर अपने ही नर्म मुलायम स्तनों का दबना उसे सुख दे रहा था. उसने फिर अपने स्तनों को अपनी बांहों के बीच थोडा और दबाया. और उस दबाव के साथ उसके स्तन थोड़े ऊपर उठ गए. पर उसके स्तन? कैसे?

अन्वेषा पार्टी वाले घर में: वो घर जहाँ कल रात अन्वेषा और औरतों के साथ ड्रिंक्स और डांस पार्टी के लिए गयी थी, आज वहाँ सब बिखरा पड़ा था. फर्श पर हर जगह बियर की बोतलें और कैन बेतरतीब तरह से बिखरी हुई थी. कहीं रंगीन ब्रा, कहीं सेक्सी पेंटीयाँ तो कहीं किसी लड़की के टॉप सब कुछ अस्त-व्यस्त पड़ी हुई थी. उस घर में कई लडकियां एक दुसरे के ऊपर सोयी पड़ी थी जैसे रात भर खूब पार्टी हुई हो. कुछ लडकियां तो टॉपलेस थी और उनके नग्न स्तन खुले दिख रहे थे. और कुछ लडकियां अपने टॉप पहनी हुई थी पर उनके स्तन टॉप से लापरवाह तरीके से बाहर दिख रहे थे. और कुछ तो केवल पेंटी पहनी हुई थी. दो लडकियां सिर्फ ब्लाउज और पेटीकोट पहनी हुई थी और उनकी साड़ियाँ बिस्तर पर फैली हुई थी. सभी लड़कियों को शायद शराब पीने के बाद का हैंगओवर था और सब एक दुसरे की बांहों में सोयी पड़ी थी. अन्वेषा कमरे के एक कोने में बिस्तर पर थी. ऐसा लग रहा था जैसे वो साशा के बगल में लेटी थी. साशा पेटीकोट पहनी हुई थी और अन्वेषा के हाथ उसके हाल्टर टॉप ब्लाउज के अन्दर थे. इन लड़कियों ने कुछ ज्यादा ही पार्टी कर ली थी कल रात को जहाँ कोई रोक टोक नहीं थी.

सुमति के घर में: सुमति तो अब शॉक में थी. उसके पास असली स्तन थे! यह कैसे हो सकता है? वो पागल तो नहीं हो रही? वो सोचने लगी. वो ज़रूर सपना देख रही होगी. क्या कल रात उसने कोई ड्रग तो नहीं ली. अपने असली स्तनों को महसूस करने के बाद वो अपनी कमर के निचले हिस्से की तरफ तो देखना ही नहीं चाहती थी. कहीं उसका लिंग तो नहीं बदल गया? वो सचमुच पागल हो रही थी, उसने खुद से कहा. पर हैरानी भरा समय जो उसे पागल करने वाला था, वो तो अब बस शुरू ही हुआ था.

प्रिय पाठिकाओं, धन्यवाद जो आपने अब तक इस कहानी को पढ़ा. अब आगे की कहानी बहुत ही क्रेजी होने वाली है. तो पढ़ते रहिये… जानने के लिए कि आगे क्या हुआ!

क्रमश: …

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< भाग ४ भाग ६ >

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चांदी की पायल

हर क्रॉसड्रेसर की इच्छा होती है कि वो दुल्हन की तरह सजे और हाउसवाइफ बने. पर जब बात आती है किसी आदमी की पत्नी बनने की, तब मन में एक दुविधा होती है. इसी दुविधा पर आधारित एक कहानी.


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संपादक के विचार: हम नहीं चाहते कि इस कहानी को पढ़कर पाठक समझे कि क्रॉसड्रेसर कहीं से भी किसी भी पुरुष या स्त्री से कमतर है.

नोट: हम क्रॉसड्रेसर की ज़िन्दगी भी बड़ी अजीब होती है. एक तरफ तो हम एक औरत के रूप में दुल्हन की तरह सजने और एक हाउसवाइफ की तरह ज़िन्दगी बिताने के सपने देखती है, और दूसरी तरफ जब सचमुच किसी की पत्नी बनने का सवाल आता है, तो मन में एक झिझक होती है. मन में कई सवाल आते है. ये दुविधा न होती यदि हम तन से औरतें होती, काश…! इसी दुविधा को उकेरने के लिए कई पाठको ने हमें मेसेज भेजे. संयोग से Minal Minu जो कि खुद एक cd admirer है, उन्होंने हमें यह कहानी लिख भेजी जो इन्ही भावनाओं पर आधारित है. तो पढ़ कर हमें बताये क्या आप भी इस कहानी की कोयल की तरह महसूस करती है?

अनुपमा त्रिवेदी

दोस्तों ये दास्तान उस मज़बूरी में छुपी हुई एक औरत की है जो पूरी तरह से औरत तो बनना नहीं चाहती पर उस एहसास को सिर्फ औरत के कपडे पहनने तक सीमित नहीं रखना चाहती! उसको हर उस एहसास से गुजरने का मन होता है जिससे एक स्त्री रोजमर्रा की जिंदगी में गुजरती है। उसे गर्लफ्रेंड भी बनना है…स्कूल गर्ल भी। उसे नर्स भी बनना है और दुल्हन भी। उसे सजते समय कोई कमी भी नही चाहिए। उसे दुल्हन भी बनना है और प्रेग्नेंट होने का एहसास भी चाहिए। उसे भाभी भी बनना है और एक बच्चे को गोद में दूध भी पिलाने का मन है…… ये जो यहाँ वहा घूमता हुआ एक पुरुष के अंदर बैठी नारी का मन है उसी की किस्सा गोई है। काश कि जितना मन करता है उस औरत का, उसका दशांश भी संभव हो पाता! आशा है कि कोयल और मानस की कहानी आपको अच्छी लगेगी|

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