इंडियन लेडीज़ क्लब: भाग ८

औरत का बदन भी एक पहेली की तरह होता है. सुमति अपने नए बदन को छूकर उसे अनुभव करना चाहती थी. उसके नाज़ुक कोमल स्तन, उसका फिगर, उसकी नाभि और जांघें, वो सबको छूकर महसूस करना चाहती थी.


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औरत का बदन भी एक पहेली की तरह होता है जिसे सुलझाना होता है. हर एक अंग पर स्पर्श एक बिलकुल अलग अहसास उस औरत में जगाता है. तभी तो आदमी औरत को हर जगह छूना चाहते है क्योंकि हर स्पर्श से वो औरत कुछ नए अंदाज़ में लचकती है, मचलती है. और सुमति के लिए तो ये स्पर्श का आनंद कुछ अधिक ही था. अब तो वो खुद एक औरत के जिस्म में थी. अपने खुद के स्पर्श से ही उसे आनंद मिल रहा था जैसा उसने पहले कभी अनुभव नहीं की थी. और इसलिए उसके अन्दर खुद को छूकर देखने की जिज्ञासा बढती जा रही थी. वो धीरे धीरे अपने तन पर अपनी उँगलियों को सहलाते हुए अपने हर अंग में छुपे हुए आनंद को भोगना चाहती थी. उसकी नजाकत भरी लचीली कमर, उसे संवेदनशील स्तन और जांघे, सब जगह वो छूना चाहती थी. पर किसी तरह वो खुद को संभाले हुई थी. अभी तो फिलहाल वो तैयार होकर खुद को आईने के सामने निहार रही थी. हलकी हरी रंग की साड़ी में बहुत खिल रही थी वो आज. एक तरह से उसका सपना सच हो गया था. वो हमेशा से ही इस दुनिया में एक औरत की तरह स्वच्छंद तरीके से विचरण करना चाहती थी, और आज वो एक असली औरत थी. आज वो अपने इस रूप को , इस जिस्म को घंटो आईने में निहार सकती थी और एक पल को भी बोर न होती. आज उसकी बस एक ख्वाहिश थी कि समय कुछ पलो के लिए थम जाए और वो अपने बदन और इस नए वरदान का सुख भोग सके.

सुमति अपनी साड़ी में बहुत सुन्दर लग रही थी. वो आज अपने तन को छूकर महसूस करना चाहती थी. यदि आप भी सुमति की तरह खुबसूरत औरत होती, तो आप क्या करती?

सुमति ने अपनी खुली कमर को एक बार अपनी नर्म ऊँगली से छुआ. “उफ़… खुद की ऊँगली से ही मुझे एक गुदगुदी सी हो रही है.”, उसने सोचा. सुमति खुद अपने ही तन के रोम रोम में छुपे आनंद से अब तक अनजान थी. उसके खुद के स्पर्श से एक ऐसा एहसास हो रहा था उसे जो उसे मचलने को मजबूर कर रहा था. वो अपनी मखमली त्वचा पर धीरे धीरे अपनी उँगलियों को फेरने लगे. अपने पेट पर, अपनी नाभि पर और फिर धीरे धीरे अपने स्तनों के बीच के गहरे क्लीवेज की ओर. उसने अपनी आँखें बंद कर ली ताकि वो हर एक एहसास को और अच्छी तरह से महसूस कर सके. “क्या मैं खुद अपने स्तनों को छूकर देखूं? न जाने क्या होगा उन्हें छूकर , उन्हें दबाकर?”, वो सोचने लगी. बाहरी दुनिया से खुद को दूर करके सुमति सिर्फ और सिर्फ अपने अन्दर होने वाली हलचल को अनुभव करने में मग्न हो रही थी. और फिर उसने अपनी कुछ उंगलियाँ अपनी साड़ी के निचे से अपने स्तनों पर हौले से फेरी. स्पर्शमात्र से ही उसके जिस्म में मानो बिजली दौड़ गयी और वो उन्माद में सिहर उठी. और उस उन्माद में खुद को काबू करने के लिए वो अपने ही होंठो को जोरो से कांटना चाहती थी.. क्योंकि अपने एक स्तन को अपने ही हाथ से धीरे से मसलते हुए वो बेकाबू हो रही थी. उसके तन में मानो आग लग रही थी. वो रुकना चाहते हुए भी खुद को रोक नहीं पा रही थी. मारे आनंद के वो चीखना चाहती थी. उसकी बेताबी बढती ही जा रही थी. उसकी उंगलियाँ उसके स्तन और निप्पल को छेड़ रही थी… और फिर उसकी उंगलियाँ उसके निप्पल के चारो ओर गोल गोल घुमाकर छूने लगी. “आह्ह्ह…”, वो आन्हें भरना चाहती थी पर उसे अपनी आन्हें दबाना होगा. उसकी उंगलियाँ अब जैसे बेकाबू हो गयी थी और उसके निप्पल को लगातार छेड़ रही थी. अब उसकी उंगलियाँ उसके निप्पल को पकड़ कर मसलने को तैयार थी. निप्पल दबाकर न जाने कितना सुख मिलेगा, यह सोचकर ही अब बस वो अपने होंठो को दबाते हुए अपने निप्पल को मसलने को तैयार थी.

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सुमति खुद को संभाल न सकी, और वो अपने ही नर्म मुलायम सुडौल स्तनों को दबाने को बेताब थी. सिर्फ सोच कर ही वो मचल उठी थी..

“डिंग डोंग”, दरवाज़े पर घंटी बजी. आज सुबह से ही घंटी बार बार बज रही थी और हर बार वो घंटी उसके लिए एक नया अनचाहा सरप्राइज लाती थी. पर इस बार इससे सही वक़्त पर घंटी नहीं बज सकती थी. घंटी न बजती तो वो बेकाबू होकर अपने निप्पल को निचोड़ कर मचल उठती और आन्हें भरने लगती, अपने ही होंठो को जोर से कांटने लगती. अपने ही होंठो को कांटना एक पुरुष के रूप में उसे कभी सेक्सी नहीं लगा… पर औरत के रूप में वो बात ही अलग थी. शुक्र था उस घंटी का जिसने उसे अपने ही बदन के जादू से बाहर निकाला.

सुमति सुन सकती थी कि किसी ने दरवाज़ा खोल दिया था तब तक. “नमस्ते अंकल| नमते आंटी! आइये आइये आप ही का इंतज़ार था”, सुमति अपने भाई रोहित की आवाज़ सुन रही थी. आखिर सुमति के सास-ससुर आ ही गए थे. उसने झट से अपने बालो को पीछे बाँधा और उनसे मिलने के लिए बाहर जाने को तैयार हो गयी. “मुझे जल्दी करनी होगी. वरना उन्हें अच्छा नहीं लगेगा कि उनकी होने वाली बहु उनके स्वागत के लिए बाहर तक नहीं आई. पर क्या मुझे यह फिक्र करनी चाहिए? एक औरत को तैयार होने में हमेशा से ज्यादा समय लगता है.. ये तो वो भी जानते होंगे.”, सुमति यह सब सोचते हुए अपने पल्लू और अपनी साड़ी को एक बार ठीक करते हुए पल्लू को हाथ में पकडे बाहर के कमरे की ओर जाने लगी. उसने अपने हाथों से पल्लू को पीठ पर से अपने दांये कंधे पर से सामने खिंच कर ले आई ताकि उसके स्तन और ब्लाउज को छुपा सके. सुमति एक पारंपरिक स्त्री की तरह महसूस कर रही थी इस वक़्त. उसने एक बार चलते हुए खुद को आईने में देखा. “साड़ी तो ठीक लग रही है. शायद रोहित और चैतन्य की तरह मेरे सास-ससुर को भी याद न होगा कि मैं कभी लड़का थी. बहुत संभव है कि मैं उन्हें पहले से जानती हूँ. शायद वो चैताली के माता पिता होंगे. (सुमति की शादी चैताली नाम की लड़की से होने वाली थी. पर इस नए परिवर्तन के बाद चैताली चैतन्य बन चुकी थी.)”, सुमति खुद से बातें करने लगी. सुमति को साड़ी पहन कर शालीनता से चलना पहले से ही आता था. आखिर वो इंडियन लेडीज़ क्लब की फाउंडर थी. उसने न जाने कितने ही आदमियों को सुन्दर औरत बनाया था. इन सबके बाव्जूद, अब वो खुद एक पूरी औरत है, इस बात का उसे यकीन नहीं हो रहा था, और फिर चैताली, उसकी होने वाली पत्नी, अब आदमी बन चुकी थी. किसे यकीन होगा ऐसी बातों का?

सुमति अपने कमरे से बाहर आई. उसके सास-ससुर सोफे के बगल में अब तक खड़े खड़े रोहित और चैतन्य से बातें कर रहे थे. सुमति सही थी… उसके सास-ससुर चैताली के ही माता पिता थे. कम से कम ये नहीं बदला. उसने उन्हें देखा और तुरंत ही अपने सर को अपने पल्लू से ढंकती हुई उनके पैर छूने के लिए झुक गयी. जैसे कोई भी आदर्श बहु करती. एक तरफ तो सुमति चैतन्य से शादी नहीं करना चाहती थी पर फिर भी उसे बहु बनने में जैसे कोई संकोच न था.

“जुग जुग जियो बेटी!”, उसके ससुर प्रशांत ने उसे आशीर्वाद दिया. “बेटी तुम्हारी जगह मेरे कदमो में नहीं मेरे दिल में है.”, उसकी सास कलावती ने नज़र उतारते हुए सुमति को फिर गले से लगा लिया. गले लगाते ही सुमति को माँ का प्यार महसूस हुआ. सुमति के चेहरे पर एक ख़ुशी भरी मुस्कान थी. उसे ऐसा अनुभव तो मधुरिमा के साथ भी होता था जो उसकी क्रॉस-ड्रेसर माँ थी. मधुरिमा की पत्नी अजंता भी तो सुमति को अपनी बेटी की तरह रखते थे. सुमति को आज भी याद आता है कि कैसे अजंता आंटी कहती थी कि उन्हें तो सुमति की तरह बहु चाहिए. शायद मधु और अजंता के साथ का अनुभव था जो आज सुमति सहज रूप से अपने सास-ससुर के सामने थी.

“माँ, बाबूजी, आप लोग बैठ कर थोड़ी देर आरम करिए. आप यात्रा करके थक गए होंगे. मैं तुरंत ही आप लोगो के लिए नाश्ता बनाकर लाती हूँ.”, सुमति ने प्रशांत और कलावती से कहा. पर मन ही मन वो सोच रही थी कि उसने ये सब क्यों कह दिया. उसका इस वक़्त कुछ भी पकाने का मन नहीं था. “रोहित, ज़रा माँ-बाबूजी का ध्यान रखना. मैं किचन में नाश्ता बनाती हूँ. तब तक तुम उन्हें पीने के लिए पानी तो लाकर दो.”, सुमति ने अपने भाई से कहा. और भाई ने सर हिलाकर हामी भर दी.

जब सुमति किचन की ओर बढ़ रही थी तो उसकी नज़रे चैतन्य की नजरो से मिली, उसका होने वाला पति, उसका मंगेतर! चैतन्य अपनी होने वाली खुबसूरत पत्नी को देख मुस्कुरा रहा था. सुमति भी उसे देख मुस्कुरा दी. “हम्म… इस आदमी के साथ मुझे अपनी पूरी ज़िन्दगी गुजारनी है.”, वो सोचने लगी. एक आदमी से शादी करने की बात सोच कर ही उसका मन विद्रोह करने लगता. उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसे इस बात से खुश होना चाहिए या रोना चाहिए. फिलहाल तो मन रोने को तैयार था, पर अब उसके पास एक खुबसूरत औरत का तन भी तो था. एक मौका जिसके लिए लिए वो सारी ज़िन्दगी प्रार्थना करती रहती थी कि उसे औरत की तरह जीवन जीने का मौका मिल जाए. पर ये समय यह सब सोचने का न था. उसे अपने सास-ससुर के लिए नाश्ता बनाना था.. शादी के बारे में वो बाद में शान्ति से सोच लेगी.

किचन में पहुँचते ही उसने अपना पल्लू सर से उतार कर अपनी कमर पर लपेट लिया. उसकी नाज़ुक कमर सच में बेहद सेक्सी थी. उसके बड़े से नितम्ब पर लिपटी हुई साड़ी और पल्लू उसे वो एहसास दे रही थी जैसे उसने पहले कभी नहीं किया था. और फिर उसने अपने बालो को लपेटकर जुड़ा बनाया और नाश्ता बनाने में जुट गयी. सालों से इंडियन लेडीज़ क्लब की मीटिंग की तैयारी करने के अनुभव से उसे भली-भाँती पता था कि साड़ी पहन कर एक एक्सपर्ट हाउसवाइफ की तरह घरेलु काम कैसे किये जाते है. “पहले तो मैं चाय बनाने लगा देती हूँ और फिर पोहा बनती हूँ. वो जल्दी बन जाएगा.”, उसने खुद से कहा. सुमति सब कुछ एक परफेक्ट गृहिणी की तरह कर रही थी. उसने गैस पर चाय का बर्तन चढ़ाया और फिर प्याज और आलू काटने लगी पोहा बनाने के लिए.

“तो.. मेरी प्यारी बहु क्या नाश्ता बना रही है?”, कलावती सुमति की सास ने अन्दर आते हुए कहा.

“ओह कुछ ख़ास नहीं माँ जी. मैं तो बस पोहा बना रही थी आप लोगो के लिए. आशा है कि आप लोगो को पोहा पसंद है.”, सुमति ने प्यार से जवाब दिया. उसने तुरंत अपने पल्लू को कमर से निकाला और फिर अपने सर को ढकने लगी.. अपने सास के सम्मान के लिए. “लो… अब मुझे सर ढँक कर किचन में काम करना पड़ेगा..”, सुमति मुस्कुराते हुए सोच रही थी. उसने कभी इस तरह से तो खाना नहीं बनाया था.

“अरे पगली… रहने दे तुझे सर ढंकने की ज़रुरत नहीं. है. मैं भी औरत हूँ. क्या मैं नहीं जानती सर पे पल्लू करके खाना बनाना कितना कठिन है? न तो ढंग से कुछ दिखाई देता है और फिर हाथ भी अच्छी तरह पल्लू के साथ हिल नहीं पाते. तू तो मेरी बेटी है. बचपन से तुझे अपनी आँखों के सामने बड़ी होते देखा है… जबसे तू फ्रॉक पहना करती थी. तब से सलवार सूट तक तुझे बढ़ते देखा है. और अब तू साड़ी भी पहन रही है. मैं नहीं चाहती कि शादी के बाद तुझे बदलना पड़े.”, कलावती ने प्यार से सुमति के सर पर हाथ फेरते हुए कहा.

कलावती ने फिर सुमति के चेहरे को छूते हुए बोली, “मैं तो बहुत खुश हूँ कि मेरे मोहल्ले की सबसे प्यारी गुडिया सुमति जो मेरे बेटे के साथ खेला करती थी, मेरे घर की बहु बनने वाली है. मैं तो सिर्फ इस बारे में सोचा करती थी, मुझे पता नहीं था कि चैतन्य सच में तुझे बहु बनाकर लाएगा..”

सुमति की शर्म से आँखें झुक गयी. इतना प्यार जो उसे मिल रहा था. पर मन ही मन वो सोच रही थी कि कैसे उसके आस पास की दुनिया बदल गयी है. उसके सामने खड़ी औरत उससे कह रही है कि उसने सुमति को छोटी बच्ची से जवान युवती बनते देखा है. किसी को भी याद नहीं कि वो कभी लड़का भी थी. हर किसी की नज़र में वो हमेशा से ही लड़की थी. ऐसा कैसे हो सकता है? कैसा मायाजाल है ये? क्या इस दुनिया में कोई भी नहीं जो पुरानी सुमति को जानता हो? सुमति के मन में हलचल बढती जा रही थी.

कलावती फिर सुमति की पोहा बनाने में मदद करने लगी. दोनों औरतें आपस में खूब बातें करती हुई हँसने लगी. सुमति को औरत बनने का यह पहलु बहुत अच्छा लग रहा था. अपनी सास के साथ वो जीवन की छोटी छोटी खुशियों के बारे में बात कर सकती थी. ऐसी बातें जो आदमी हो कर वो कभी नहीं कर सकती थी. आदमी के रूप में सिर्फ करियर और ज़िम्मेदारी की बातें होती थी. ऐसा नहीं था कि औरतों को ज़िम्मेदारी नहीं संभालनी होती पर उसके साथ ही साथ वो अपनी नयी नेल पोलिश या साड़ी के बारे में भी उतनी ही आसानी से बात कर सकती थी. जॉब में प्रमोशन की बात हो तो उसके साथ वो फिर ये भी बात कर सकती थी कि प्रमोशन के बाद वो कैसी पर्स लेकर ऑफिस जाया करेंगी या कैसे कपडे पहनेंगी. जहाँ तक करियर की बात है, सुमति को कोई अंदाजा नहीं था कि इस नए जीवन में उसका क्या करियर है या क्या जॉब है. शादी के बाद वो काम कर सकेगी या नहीं? भले ही घर की छोटी छोटी चीजें वो संभालना चाहती थी पर वो अपनी जॉब नहीं छोड़ना चाहती थी… चाहे जैसी भी जॉब हों. और फिर क्या वो शादी के बाद माँ बनना पसंद करेगी? बड़ा भारी सवाल था जिसका जवाब अभी वो सोचना नहीं चाहती थी.

अभी तो सुमति बस खुश थी अपनी सास के साथ किचन संभालते हुए. वो वैसे भी घर संभालने में एक्सपर्ट थी. उसने जल्दी ही सबके लिए चाय नाश्ता तैयार कर ली थी. बाहर नाश्ता ले जाने के पहले सुमति एक बार फिर अपना सर ढंकने वाली थी कि कलावती ने उसे रोक लिया और बोली, “अरे सुमति तू हमारी बेटी है न? अपने माँ बाप के सामने भी कोई पल्लू करता है भला? समझी?” सुमति मुस्कुरायी. अपनी सास के प्यार से वो मंत्र-मुग्ध थी. “थैंक यू माँ! मैं हमेशा आपकी बात याद रखूंगी.” सुमति सचमुच कलावती के प्यार की शुक्र-गुज़ार थी.

सभी अब नाश्ता करने में व्यस्त थे, पर चैतन्य की नज़रे तो बस अपनी होने वाली खुबसूरत नाज़ुक सी पत्नी पर थी. जब भी सुमति उसकी ओर देखती, वो तुरंत मुस्कुरा देता. वो खुश था आखिर उसकी शादी उसकी बेस्ट फ्रेंड के साथ हो रही थी. कम से कम, उसकी नयी यादों में वो सच था. चैतन्य खुद चैताली नाम की लड़की हुआ करता था पर उसे वो बिलकुल भी याद नहीं था. सुमति के अन्दर थोड़ी सी झिझक थी चैतन्य की मुस्कान का जवाब देने के लिए. आखिर सास ससुर उसके सामने थे. कोई अच्छी बहु ऐसे कर सकती थी भला?

“सुमति… भाई मेरा तो पेट भर गया लज़ीज़ नाश्ता कर के. अब हमें शादी की शौपिंग के लिए निकलना चाहिए. मुझे पता है कि औरतों को कपडे खरीदने में बड़ा समय लगता है और ख़ास कर शादी के कपडे”, ससुर प्रशांत ने कहा. “अब तुम शुरू मत हो जाना जी औरतों के कपडे के बारे में… तुम्हे कुछ तो पता नहीं होता कि दुल्हन को कितनी बातों का ध्यान रखना पड़ता है. बड़े आये बातें करने वाले.”, कलावती ने प्रशांत को टोका और सभी हँस पड़े.

अब सभी निकलने को तैयार थे. चैतन्य ने अपनी कार घर के दरवाज़े पर ले आया. उसके पिताजी उसके साथ सामने बैठ गए. और कलावती, सुमति और रोहित एक साथ पीछे. सुमति बीच की सीट में बैठी थी. अब तो उसकी हाइट कम थी तो उसके पैर बीच की सीट में आराम से आ गए. औरत होने का एक फायदा और!, सुमति सोच कर मुस्कुरा दी. वैसे भी वो अपनी शादी की खरीददारी के बारे में सोच कर ही खुश थी.

“सुमति बेटा, तुम्हे पता तो है न कि तुम शादी के दिन क्या पहनना चाहोगी?”, कलावती ने सुमति से पूछा. “हाँ माँ! मैं जानती हूँ मुझे क्या चाहिए.”, सुमति ने मुस्कुरा कर जवाब दिया. किसी और क्रॉस-ड्रेसर की तरह, सुमति को भी पता था कि दुल्हन के रूप में वो किस तरह से सजना चाहेंगी. इंडियन लेडीज़ क्लब में तो उसने कितनो के यह सपने सच भी किये थे. ये कितना ख़ुशी भरा दिन होने वाला था सुमति के लिए ! दुल्हन बनेगी वो सोच कर के ही वो बड़ी ख़ुश हो रही थी. और कुछ देर के लिए वो ये भूल गयी कि जब वो दुल्हन बनेगी तो उसके साथ एक आदमी दूल्हा भी बनेगा.

क्रमश: …

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इंडियन लेडीज़ क्लब: भाग ७

तैयार हो रही सुमति ने झट से अपनी साड़ी पकड़ी और अपने ब्लाउज को ढकने लगी. कोई भी औरत ऐसा करेगी जब कोई आदमी अचानक ही उसके कमरे में चला आये.


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सुमति की कहानी

“डिंग डोंग”, दरवाज़े की घंटी एक बार फिर से बजी.

सुमति जो अपने नए स्त्री वाले तन को निहारने में लगी हुई थी, अपने होंठ और अपने सुन्दर घने लम्बे बालो को सहला रही थी, उसे यह सब छोड़ अब दरवाज़ा खोलना था. पर फिर भी एक बात उसे सता रही थी. कल तक वो एक आदमी थी, पर आज पूरी दुनिया उसे सिर्फ और सिर्फ औरत के रूप में जानती है. अब तो सुमति की माँ भी सुमति को बेटी के रूप में याद करती है. उसे तो याद तक नहीं कि सुमति उसका बड़ा बेटा थी. क्या ये सब सुमति के सपने सच करने के लिए हुआ है? या फिर इसके कुछ बुरे परिणाम भी होंगे? अब तो समय ही बताएगा.

सुमति अब और कोई नए सरप्राइज के लिए तैयार नहीं थी. पर फिर भी दरवाज़ा तो खोलना ही था. चलते हुए उसे एहसास हुआ कि अब उसके स्तन झूल नहीं रहे है, ब्रा पहनना आखिर काम आया. आज के पहले उसने इस कारण से तो कभी ब्रा नहीं पहनी थी. सुमति ने आखिर दरवाज़ा खोला और उसके सामने उसका छोटा भाई रोहित था.

“रोहित!!”, सुमति ख़ुशी के मारे उछल पड़ी. आखिर, अपने भाई को देख कर खुश कैसे न हो. बड़े भाई के रूप में भी सुमति अपने छोटे भाई रोहित को हमेशा से ही प्यार करती थी और उसका ध्यान रखती थी.

“दीदी!”, रोहित भी ख़ुशी से बोल पड़ा. दूसरो की तरह रोहित को भी याद नहीं था कि उसका बड़ा भाई भी था कभी जो आज उसके सामने उसकी बड़ी दीदी बनकर खड़ा है. उसने अपनी दीदी को गले लगाने के लिए बाँहें खोल दी.

भाई को गले लगाना कोई बड़ी बात थोड़ी है. सुमति भी तो एक लड़के के रूप में हमेशा अपने भाई से मिलने पर गले लगाती थी. पर अब कुछ बदल गया था. अब उसके बड़े स्तन भी थे जो गले लगाने के बीच में आते थे. सुमति को पता नहीं था कि इस नए रूप में भाई को गले लगाना किस तरह ठीक रहेगा. किसी तरह फिर भी उसने आगे बढ़ भाई को सीने से लगा लिया.

“वाह दीदी! आप तो बड़े शहर आकर बिलकुल बदल गयी हो. देखो तो! मैंने तो कभी आपको जीन्स और टॉप में देखा ही नहीं था. आप तो कमाल लग रही हो.”, रोहित को अपनी बहन की सुन्दरता पर गर्व महसूस हुआ.

“मेरे भाई… शहर की ज़िन्दगी के हिसाब से सभी को ढलना पड़ता है. चल अब अन्दर आ जा.”, सुमति ने कहा. उसे और कुछ जवाब देने को न सुझा. पर इसके पहले वो कुछ और कह पाती, उसके सर में फिर वही तीव्र चुभने वाला दर्द हुआ. “ओह्ह मेरा सर तो आज फट कर ही रहेगा”, सुमति सर पकड़ कर सोचने लगी.

“क्या बात है दीदी? तुम्हारी तबियत कुछ सही नहीं लग रही? चलो अन्दर हम साथ में बैठते है.”, रोहित एक अच्छे भाई के नाते अपनी बहन को साथ पकड़ अन्दर ले चला. सुमति ने उसकी ओर देखा और सोचने लगी, “रोहित मुझसे कितना ऊँचा लग रहा है. लगता है औरत बनकर मेरी हाइट भी कम हो गयी है.”

z002 सुमति को वो यादें आने लगी जब वो रक्षाबंधन के त्यौहार पर रोहित को राखी बांधती थी. पर वो तो कभी रोहित की बहन थी ही नहीं.

अचानक ही सुमति के दिमाग में पुरानी यादें आने लगी जब वो रक्षाबंधन के त्यौहार पे अपने भाई के हाथो पे राखी बाँधा करती थी. यह सच नहीं हो सकता, आखिर मैं कभी बहन थी ही नहीं. मेरा दिमाग मेरे साथ क्या खेल खेल रहा है? सुमति खुद से ही बाते करने लगी. उसे एहसास नहीं था कि जब जब उसे तेज़ सर दर्द हो रहा था तब तब उसके दिमाग में नयी यादें बन रही थी जिसमे वो एक औरत हुआ करती थी. ताकि उसके इस औरत के रूप में नए जीवन की नींव डल सके.

“थैंक यू रोहित. पर अब मैं ठीक हूँ.”, सुमति ने कहा. “अच्छा तेरे हाल चाल कैसे है यह तो बता? अपनी दीदी से तो तू कितनी कम बातें करता है. कभी कभी फोन भी लगा लिया कर” सुमति ने जो अभी रोहित से कहा उसे तो खुद यकीन नहीं हुआ कि वो ये सब कह सकती थी.

“दीदी क्या बताऊँ आपकी शादी को लेकर कितना उत्साहित हूँ मैं. अब घर का अकेला बेटा हूँ तो आपकी शादी की तैयारी में व्यस्त रहता हूँ, और मुझे अच्छा भी लग रहा है.”, रोहित ने कहा.

“घर का अकेला बेटा”, ये शब्द सुमति के दिमाग में ठनकने लगे. उसे अब तक यकीन नहीं हो रहा था कि यही उसके जीवन का नया सच है. वो मुस्कुरायी और बोली, “इसलिए तो भाई होते है! अपनी बहन की सेवा करने के लिए.. हा हा” सुमति सचमुच एक अच्छी बहन का रोल अदा कर रही थी अब. बिलकुल वैसी ही जैसी उसके नयी यादों में वो थी.

रोहित ने तब एक बॉक्स निकाला और सुमति को देते हुए कहा, “दीदी माँ ने ये साड़ी भेजी है. आज जब अपने सास-ससुर के साथ शौपिंग पे जाओगी, तो यही पहनना. माँ ने कहा है कि तुम्हे ज़रूर पसंद आएगी और तुम इसमें बेहद खुबसूरत लगोगी.”

सुमति की तो उस साड़ी को देख कर आँखें चमक उठी. बचपन से ही माँ की इस साड़ी के लिए उसके मन में ख़ास लगाव था. जब भी माँ ये साड़ी पहनती, वो अपनी माँ के आसपास ही उनके पल्लू से खेलते रहती थी. उस साड़ी का फैब्रिक रेशमी और सॉफ्ट था. वो उसके स्पर्श को कभी भूली नहीं थी. उसके मन में वही पुरानी प्यारी यादें फिर से आ रही रही थी. वो हमेशा सपने देखा करती थी कि काश वो कभी ये साड़ी पहन सके. पर लड़का होने की वजह से, वो केवल सपना ही देख सकती थी. पर आज, वोही साड़ी उसके हाथ में थी… जो उसके तन से लिपटने को तैयार थी. आज उसके सपने सच होने वाले थे. और उसके अन्दर की बचपन वाली सुमति जाग उठी. ख़ुशी से उसने अपने भाई को गले लगाकर उसके गालो पर चूमा और बोली, “सच में रोहित! तुझे पता नहीं है ये साड़ी मेरे लिए क्या मायने रखती है!”

उसने एक बार फिर अपनी माँ के खुबसूरत तोहफे को देखा और रोहित से बोली, “ये साड़ी मेरे लिए बहुत स्पेशल है रोहित. माँ ने पहली बार मुझे अपनी साड़ी गिफ्ट की है. मैं तो इसे ख़ास दिन पर ही पहनूंगी. पर आज वो ख़ास दिन नहीं है. आज मैं कुछ और पहन लूंगी”

रोहित अपनी बहन की भावना को समझने की कोशिश कर रहा था पर लड़के क्या जाने कि माँ की साड़ी बेटी के लिए क्या मायने रखती है! “पर दीदी अब आपके सास-ससुर और चैतन्य जीजाजी आने वाले ही होंगे.. तुम तैयार हो जाओ जल्द से जल्द”, रोहित ने कहा.

“ठीक है. मैं जल्दी तैयार होती हूँ.”, सुमति ने बड़े उत्साह से कहा और अपने बेडरूम की ओर बढ़ गयी.

सुमति की अलमारी में अब तो उस की साइज़ और फिटिंग के कपड़ो से भरी पड़ी थी. उसके कपड़ो का कलेक्शन बहुत ही सुन्दर दिख रहा था, पर उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या पहने? इतने कपड़ो में ढूंढते हुए उसे बड़ा समय लग जाएगा. आज का मौका ऐसा था कि साड़ी पहनना ही बेस्ट होगा, सो वो अपनी साड़ियों के कलेक्शन में साड़ी देखने लगी. अब शौपिंग में उसे धुप में खूब चलना तो पड़ेगा ही, आखिर दुल्हन की शौपिंग है, एक दूकान में थोड़ी ही हो जायेगी? इसलिए उसे कोई ऐसी साड़ी चाहिए जो हलकी रंग की हो और जिसे पहन कर आसानी से चला जा सके. अंत में उसे एक हलकी हरे रंग की साड़ी मिल ही गयी जो इस अवसर पर परफेक्ट होगी. पहले तो वो सोच रही थी कि क्योंकि सास ससुर आ रहे है तो उसे भारी या सिल्क साड़ी पहननी चाहिए. पर उसे अपने अनुभव से पता था कि वैसे साड़ियों को दिन भर पहन कर चलना आसान नहीं होगा. और अब तो उसका बदन पहले से कहीं अधिक नाज़ुक भी हो चूका है… साड़ी का वजन अब उसे ज्यादा महसूस हुआ करेगा.

पहले तो सुमति ने साड़ी के ब्लाउज को पहन कर देखा कि उसकी फिटिंग सही आ रही है या नहीं. एक औरत जानती है कि एक सही और चुस्त फिटिंग का ब्लाउज आपको अत्यधिक आकर्षक बना सकता है. लूज़ फिटिंग के ब्लाउज तो कभी नहीं पहनना चाहिए! “सुमति! ये ब्लाउज तो बहुत सेक्सी लग रहा है तुझ पर. देख, तेरे बूब्स पर कितने अच्छे से शेप में फिट आया है.”, सुमति खुद को आईने में देखते हुए खुद से बातें कर रही थी. फिर उसने एक सफ़ेद पेटीकोट पहना. वो उम्मीद कर रही थी कि शायद सफ़ेद रंग उसकी साड़ी के रंग के निचे छिप जाएगा. उसके पास और कोई मैचिंग पेटीकोट नहीं मिल रहा था. वो एक बार फिर पलटी और खुद को आईने में देखने लगी. “हम्म… नाईस फिगर सुमति!”, उसे अपने नए बदन पर गर्व हो रहा था. और फिर उसने अपने साड़ी के एक छोर को पकड़ कर अपने पेटीकोट पर पीछे की ओर से चढ़ा कर देखा. वो देखना चाहती थी कि उसका सफ़ेद पेटीकोट उस साड़ी के रंग के निचे छिपेगा या नहीं. साड़ी से बेमेल रंग का दीखता हुआ पेटीकोट कभी अच्छा नहीं लगता. “हम्म… चल जाएगा ये पेटीकोट. थैंक गॉड!”, सुमति ने सोचा. “वैसे मेरी नाभि और कमर भी बड़ी सेक्सी लग रही है. बाहर तो इस सुन्दरता के साथ मेरे पीछे कई लड़के पड़ जायेंगे.”, सुमति अन्दर ही अन्दर मुस्कुरा रही थी अपनी सुन्दरता पर.

साड़ी का ब्लाउज सुमति के सुडौल स्तनों पर अच्छी तरह फिट आ गया था. उसे अपना लुक अच्छा लग रहा था. पर वो अपने सफ़ेद पेटीकोट को लेकर डाउट में थी. उसने अपने कुलहो पर पेटीकोट को साड़ी से ढककर देखा, पेटीकोट का रंग साड़ी के पीछे आसानी से छिप गया था. शुक्र है!

“डिंग डोंग”, दरवाज़े की घंटी एक बार और बजी. “उफ़ ये घंटी तो मेरी जान ही लेकर रहेगी आज. मेरे सास-ससुर इतने जल्दी न आ गए हो. मैं तो अब तक तैयार भी नहीं हुई हूँ.”, सुमति ने सोचा. “रोहित, ज़रा देखना तो कौन आया है… मैं तैयार हो रही हूँ.”, उसने बेडरूम से ही आवाज़ लगायी. अब सुमति आदमी नहीं है कि आधे अधूरे कपडे पहन कर बाहर आ जाए. अब उसे पूरे समय शालीन बनी रहना होगा. “हाँ दीदी”, रोहित की बाहर से आवाज़ आई.

सुमति वापस अपनी तैयारी में ध्यान देने लगी. पर उसका दिमाग उसे बेचैन किये जा रहा था. एक तरफ तो उसे अपने नए जिस्म में साड़ी पहनकर तैयार होते बड़ा अच्छा लग रहा था वहीँ दूसरी ओर, वो नाराज़ भी हो रही थी कि उसे अपने सास-ससुर के लिए तैयार होना पड़ रहा है, वो लोग जिनको वो जानती तक नहीं. एक आदमी से शादी करने की सोचते ही उसके मन में खीझ उठती थी. पर उसे ये शादी और बहु होने के किरदार में कम से कम कुछ दिन रहना पड़ेगा जब तक उसे समझ नहीं आ जाता कि ये सब हो क्या रहा है. एक बार माजरा समझ आ जाए तो इस शादी से बाहर निकलने की कोई न कोई तरकीब निकाल लेगी वो.

“स्वागत है चैतन्य जिजाजी! आपके माता-पिता कहा रह गए? साथ नहीं दिख रहे” रोहित की बातें सुमति सुन सकती थी. तो घर पे सुमति के होने वाले “वो” आ ही गए. पता नहीं क्यों सुमति के मन में एक उत्सुकता हुई उनको एक झलक देखने की. ये विचार आते ही उसे अपने ऊपर थोड़ी शर्म भी महसूस हुई. क्या उसका चेहरा शर्म से लाल हो रहा था? “माँ-पिताजी लगभग आधे घंटे में यहाँ आयेंगे. तुम्हारी दीदी तैयार हुई या नहीं?”, चैतन्य ने रोहित से कहा.

सुमति को सब कुछ साफ़ तो नहीं समझ आ रहा था कि बाहर के कमरे में वो दोनों व्यक्ति क्या बातें कर रहे है. वो एक बार फिर खुद को आईने में देखते हुए तैयार होने में मगन हो गयी. आज वो बहुत खुबसूरत दिखना चाहती थी. पता नहीं क्यों. पर एक औरत को सुन्दर दिखने के लिए कोई बहाने की ज़रुरत थोड़ी होती है भला… पर ये बात सुमति अब तक समझी नहीं थी. एक औरत खुद को खुबसूरत बना कर अपने बारे में अच्छा महसूस कर ले.. यही कारण काफी है सजने संवरने के लिए. “हेल्लो… ब्यूटीफुल!”, सुमति के कानो में एक मर्दानी आवाज़ सुनाई पड़ी.

सुमति को ज़रा भी अंदाजा नहीं था कि कोई उसके कमरे में यूँ चल कर आ सकता है जब वो तैयार हो रही हो. आखिर तमीज़ भी कोई चीज़ होती है. उसने तो अपने ब्लाउज को भी अपनी साड़ी के आँचल से अब तक ढंका नहीं था. वो तो अब तक अपनी कमर के निचे प्लेट ही बना रही थी. उसने झट से अपनी साड़ी को दोनों हाथों से पकड़ा और तुरंत उससे अपने सीने को छुपाने लगी. ठीक वैसे ही जैसे कोई भी औरत करेगी यदि कोई अनजान आदमी उसके कमरे में घुसा चला आये. कोई ऐसे ही कैसे उसके कमरे में आ सकता था? बदतमीज़. सुमति सोच ही रही थी. पर उसे इस आदमी को देखते ही गुस्सा आ गया और वो चीख पड़ी. “मेरे कमरे में ऐसे कैसे आ गए तुम? तुम्हे इतना भी पता नहीं कि किसी के कमरे में जाने से पहले दरवाज़े पर दस्तक देते है? तुम्हे कोई शर्म लिहाज है या नहीं? बदतमीज़” सुमति सचमुच गुस्से में थी.

सुमति खुद को बार बार आईने में निहार रही थी. इतनी सेक्सी नाभि और कमर पे कौन अपनी साड़ी की प्लेट नहीं पहनना चाहेगी भला?

सुमति का गुस्सा तो बढ़ता ही जा रहा था. उसके हाथ काँप रहे थे जब वो अपने स्तनों को अपनी साड़ी से छुपाने की कोशिश कर रही थी. आज से पहले उसके लिए ये परिस्थिति कभी आई नहीं थी. पर एक अनजान आदमी की अनुपस्थिति में शायद वो थोड़ी डरी हुई थी. “क्या हुआ, सुमति? ये मैं हूँ. चैतन्य! मुझसे क्या शर्माना. अब तो एक महिना भी नहीं बचा है जब हम दोनों के बीच की सारी दीवारे ढह जाएँगी. और ऐसा भी दिन आएगा जब तुम दुसरे कमरों को छोड़कर उस कमरे में आकर कपडे बदला करोगी जहाँ सिर्फ मैं रहूँगा… ताकि तुम्हे कोई और डिस्टर्ब न करे. और तुम मुझसे शर्मा रही हो?”, उस अनजान आदमी, जिसका नाम चैतन्य था, ने कहा. वो मुस्कुरा रहा था. उसके लिए तो वो अपनी होने वाली पत्नी के कमरे में था. उसे कोई शर्म न थी.

सुमति अब भी घबरायी हुई थी. उसकी दिल की धड़कने बहुत तेज़ चल रही थी. और सांसें बहुत गहरी. उसने गौर से अपनी आँखों के सामने खड़े इस आदमी को देखा. और उसे जल्द ही समझ आ गया कि चैतन्य कोई और नहीं… बल्कि वही लड़की है जिससे सुमति की शादी होने वाली थी. कम से कम चेहरा तो मेल खाता था. जब सुमति अचानक ही औरत बन सकती है तो वो लड़की भी अचानक ही आदमी बन सकती है. अब तो इस दुनिया में कुछ भी हो सकता था. “हे प्रभु… ये तो चैताली है जो अब आदमी बन चुकी है. ये सब कैसे हो सकता है? मुझे कुछ यकीन क्यों नहीं हो रहा है.”, सुमति अन्दर ही अन्दर रो पड़ी. और अचानक एक बार फिर उसके सर में तेज़ चुभने वाला दर्द हुआ. अब उसका दिमाग उसके लिए एक बार फिर नयी यादें बना रहा था जिसमे चैतन्य हमेशा से लड़का था और सुमति लड़की. उनका नया बचपन गढा जा रहा था जिसमे चैतन्य और सुमति अच्छे दोस्त हुआ करते थे.

सुमति का सर दर्द अब और बढ़ता ही जा रहा था. न जाने कितने नयी यादें उसकी आँखों के सामने दौड़ने लगी थी. उसका सर चकरा रहा था. और उस वक़्त उसके हाथों से उसकी साड़ी छुट कर निचे गिर गयी. उसने अपने सर को एक हाथ से पकड़ कर संभालने की कोशिश की. पर सुमति अब खुद को संभाल न सकी और वो बस निचे गिरने ही वाली थी. कि तभी चैतन्य ने दौड़कर उसे सही समय पर पकड़ लिया. सुमति अब चैतन्य की मजबूत बांहों में थी. उसके खुले लम्बे बाल अभी फर्श को छू रहे थे. और सुमति की आँखों के सामने उसके होने वाले पति का चेहरा था. चैतन्य की बड़ी बड़ी आँखें, उसके मोटे डार्क होंठ और हलकी सी दाढ़ी.. सुमति अपने होने वाले पति की बांहों में उसे इतने करीब से देख रही थी. और चैतन्य मुस्कुराते हुए सुमति को बेहद प्यार से सुमति की कमर पर एक हाथ रखे पकडे हुए थे, वहीँ उसका दूसरा हाथ सुमति की पीठ को छू रहा था. जो शायद किसी भी नए कपल के लिए सबसे रोमांटिक पल होता, वो पल सुमति के लिए उसके उलट था. एक आदमी की बांहों में उसे बिलकुल अच्छा नहीं लग रहा था. उसने चैतन्य को धक्का देते हुए बोली, “छोडो! जाने दो मुझे!” सुमति का इस वक्त का व्यवहार ठीक नहीं था. आखिर चैतन्य उसकी मदद कर रहा था. पर सुमति भी क्या करती. वो तन से भले इस वक़्त औरत थी पर उसका मन तो वोही पहले वाली सुमति का था. वो कभी किसी आदमी की तरफ आकर्षित नहीं महसूस करती थी भले वो एक औरत की तरह कपडे पहनना पसंद करती थी. सुमति औरत होने के इस पहलु को स्वीकार नहीं कर पा रही थी. और इस वक़्त इस नाजुक तन में चैतन्य के सामने वो कितनी असहाय महसूस कर रही थी. और उसके पास सिर्फ उसकी जुबां थी स्थिति को संभालने के लिए.

सुमति की बातें सुनकर चैतन्य चुप चाप पीछे हो लिया और सुमति से बोला, “सुमति मैं जानता हूँ की हम दोनों बचपन से अच्छे दोस्त रहे है. और हमारा रिश्ता बहुत तेज़ी से बदल रहा है. जल्दी ही हम पति-पत्नी बन जायेंगे. पर मैं कभी यह नहीं भूलूंगा कि तुम मेरी दोस्त पहले हो और पत्नी बाद में.”

चैतन्य की बातें सुनकर सुमति नयी दुविधा में पड़ गयी. उसकी नयी यादें उसे बता रही थी कि सचमुच वो और चैतन्य अच्छे दोस्त थे. और वो उसकी आँखों में देखते रह गयी.

चैतन्य भी उसकी आँखों में देख कर बोला, “मुझे एक बात बताओ सुमति. तुम्हारा स्वभाव हमेशा से थोडा उद्दंड और लडको सा था… हमारे गाँव की किसी भी लड़की के मुकाबले तुम कुछ ज्यादा मुंह-फट थी. तुम तो मुझसे कुश्ती भी लड़ा करती थी और मुझे हमेशा हराने की कोशिश भी करती थी. क्या तुम आगे भी ऐसा ही करोगी? मुझे लगता है कि मेरी पत्नी मेरी पिटाई करेगी तो अच्छा नहीं लगेगा दुनिया के सामने.” चैतन्य अब हँस रहा था.

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सुमति के पास अब खुबसूरत दिखने का एक कारण था. उसने एक बार फिर आईने में खुद को देखा “कैसी लग रही हूँ” पोस में!

“मैं ये वादा तो नहीं कर सकती चैतन्य.. क्या पता मैं आगे भी तुम्हे पिटती रहूँ”, सुमति ने शांत होते हुए मुस्कुरा कर चैतन्य को जवाब दिया. वो अब थोड़ी पिघल रही थी आखिर ये चैतन्य की गलती नही थी. “सुनो, तुम कुछ देर मेरा बाहर इंतज़ार करो. मुझे तुम्हारे माता-पिता के आने के पहले तैयार होना है.”, सुमति ने कहा. चैतन्य चुपचाप बाहर चला गया. वो तो खुश था कि उसकी शादी उसकी बेस्ट फ्रेंड से हो रही है.

सुमति भी जल्द तैयार हो गयी. उसके पास अब सुन्दर दिखने का एक कारण था. उसे नहीं पता था कि वो चैतन्य से शादी करेगी या नहीं. पर वो आज अपने बेस्ट फ्रेंड के लिए उसके माता-पिता के सामने खुबसूरत दिखना चाहती थी. आखिर में उसने तैयार होकर खुद को आईने में देखा… “कैसी लग रही हूँ मैं?”, खुद से ही ये सवाल पूछा. वो सचमुच बहुत खुबसूरत लग रही थी.

क्रमश: …

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इंडियन लेडीज़ क्लब: भाग १

एक अनूठा क्लब जहाँ भारतीय क्रॉस-ड्रेसर अपने सपनो को पूरा करते थे. और आज का दिन तो इस क्लब में ख़ास भी था. जानने के लिए पढ़े!


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नाम का क्या है? नाम तो कभी कभी धोखा भी  दे सकते है. इंडियन लेडीज़ क्लब नाम भी कुछ ऐसा ही था. नाम के विपरीत इस क्लब में एक भी महिला सदस्य नहीं थी अपितु यह क्लब तो था उन आदमियों के लिए जिनका औरतों से इतना लगाव था कि वो खुद एक खुबसूरत औरत बनने का सपना संजोये हुए थे. जी हाँ! इंडियन लेडीज़ क्लब या फिर संक्षिप्त में ILC एक क्लब है क्रॉसड्रेसर पुरुषो के लिए! पर इस क्लब को शुरू करने वाले सुमीत के नजरिये से ILC एक ऐसा क्लब है जहाँ एक मुक्त वातावरण में सभी आदमी अपना स्त्री-भाव और रूप अपना सकते है. सुमीत अक्सर कहता था, “एक खुबसूरत औरत बनकर हम इस दुनिया की खूबसूरती में इजाफा ही कर रहे है! एक स्त्री और पुरुष में बराबरी करने का इससे अच्छा तरीका क्या हो सकता है कि एक पुरुष सुन्दर सा सलवार पहन कंधे पर दुपट्टा डाले थोडा तो समझ सके कि एक औरत होना कितना सुखद अनुभव हो सकता है!”

पेशे से सॉफ्टवेर इंजिनियर, २८ वर्षीया सुमीत की सगाई तो हो चुकी है पर अब तक शादी नहीं हुई है. उसने यह क्लब आज से करीब ३ साल पहले अपनी गिनी चुनी क्रॉसड्रेसर सहेलियों के साथ बनाया था. और आज इस क्लब में ५० से ज्यादा सदस्य है! अपने अन्दर की औरत को अपनाते हुए सुमीत अपना रूप बदल कर सुमति बन, अपने किराये के घर में लगभग हर हफ्ते क्लब की एक मीटिंग रखता(ती?) है जहाँ सभी सदस्या इस स्वर्ग में आकर अपनी दबी हुई हसरतो को उन ३-४ घंटो में पूरी करती है.

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सुमति को आज बहुत काम करने थे इसलिए उसने एक हलकी क्रेप साड़ी पहनना तय किया.

आज तो इस क्लब के लिए ख़ास दिन है. और आज इस क्लब में बहुत भीड़ भी होने वाली है. बेचारी सुमति को भी न आज न जाने कितने काम करने है. अगले एक घंटे में आदमियों का झूंड जो इकट्ठा हो जाएगा और फिर शुरू होगा उनका ट्रांसफॉर्मेशन सुन्दर औरतों में! कोई अनारकली पहन इठलायेगी, तो कोई बड़े से घेरे वाली लहंगा चोली पहन कर बलखाएगी, कोई छोटी छोटी वेस्टर्न ड्रेस पहन कर इतराएगी तो कोई फूल के प्रिंट वाली साड़ी पहन कर शर्माएगी या फिर साउथ इंडिया की सिल्क साड़ी पहन कर मुस्कुराएगी. जल्दी ही सुमति का घर उस घर में बदल जायेगा जहां मानो शादी की तैयारियां हो रही होगी और कहीं दुल्हन और उसकी सखियाँ सज संवर कर तैयार हो रही होगी. और ऐसे ख़ास दिन के लिए सुमीत या हमारी प्यारी सुमति, जो की इस क्लब की प्रेसिडेंट है, उसे तो कुछ फैंसी सी भारी जोर्जेट की भारी साड़ी पहननी ही चाहिए! पर वो बेचारी तो देर होने के चक्कर में अपनी सुध-बुध खोयी हुई है. उसे न जाने कितने काम करने बाकी है अभी भी. इसलिए उसने एक साधारण सी लाल रंग की साड़ी पहनने की सोची, हलकी फॉक्स क्रेप कपडे की साड़ी, संभालने में आसान और झटपट प्लेट बनाकर पहनने के लिए सबसे बढ़िया.  आखिर आज के दिन बेचारी को इतनी दौड़-भाग करनी होगी… कहाँ वो जोर्जेट की भारी साड़ी पहन कर ये सब करेगी. उसने जल्दी से साड़ी पहनना शुरू की, एक्सपर्ट थी वो इस मामले में..

ilc30“डिंग डोंग”, दरवाज़े की घंटी बजी.  “लो लोग आना शुरू भी हो गए. मैं तो अब तक तैयार भी नहीं हुई हूँ”, सुमति ने खुद से कहा. वो तुरंत दरवाज़े की ओर दौड़ पड़ी और साथ ही साथ अपने पल्लू को अपने कंधे पर पिन लगाने लगी. उसने दरवाज़ा खोला तो उसकी जान में जान आई. सामने उसकी सबसे अच्छी सहेली अंजलि थी. अंजलि को देखते ही उसकी आँखों में ख़ुशी थी.

“ओह अंजलि! अच्छा हुआ तुम आ गयी. मेरी प्यारी सहेली की मुझे आज बहुत ज़रुरत है इस घर को ठीक करने के लिए. १ घंटे से भी कम समय बचा है.”, सुमति ने अंजलि को गले लगाते हुए कहा. अंजलि ने भी उसे बड़े प्यार से गले लगाया और मुस्कुरा कर सुमति की ओर देखने लगी. उसने सुमति के बालो और पीठ पर प्यार से अपना हाथ फेरा और बोली, “मुझे पता था कि आज तुझे मदद की ज़रुरत होगी. कितनी बार मैंने तुझसे कहा है कि कुछ औरतों को मदद के लिए पहले से ही घर में बुला लिया कर, पर तू मानती ही नहीं है. सब कुछ कब तक अकेले अकेले करेगी?” अंजलि हमेशा की तरह बड़ी प्यारी थी. सुमति का तब ध्यान अपनी साड़ी की प्लेट पर गया. दौड़ते हुए आते वक़्त उसने अपना एक पैर प्लेट पर रख दिया था. उसकी साड़ी की प्लेट एक बार फिर बिखर गयी थी. उसे फिर से ठीक करना होगा अपनी साड़ी को.

“हे भगवान! आज तो काम पर काम बढ़ते जा रहे है. अब इस प्लेट को भी ठीक करना होगा.”, सुमति ने कहा. पर फिर वो एक पल को रुक कर अंजलि को देखने लगी और बोली, “अंजलि, आज तो तू  … कमाल दिख रही है यार. हाय, कितने सुन्दर फूलों का प्रिंट है तेरी साड़ी पे. गुलाबी और पीला रंग तुझ पर बहुत फबता है. तेरी ही तरह सुन्दर है तेरी साड़ी भी. पर तू आज पहले से साड़ी पहन कर कैसे आ गई?”, सुमति ज़रा आश्चर्य में थी क्योंकि अंजलि हमेशा यहाँ आने के बाद ही तैयार होती थी. पर आज वो पहले से ही औरत बनकर आई थी.

“ओहो, मेरे पेरेंट्स, पत्नी और बेटी घर से बाहर गए हुए थे आज. तो मैंने सोचा की थोडा एडवेंचर हो जाए. इसलिए मैं घर से ही साड़ी पहनकर निकल आई. सोची इस तरह यहाँ आकर तुरंत तेरी मदद कर सकूंगी. जितने जल्दी हो सके कार भगाते हुए लायी हूँ. मैं पहली बार औरत बनकर अकेले घर से बाहर निकली थी…. बहुत मज़ा भी आया और थोडा डर भी लगा!”, अंजलि हँसने लगी. “पता है? जब भी सिग्नल पर रूकती थी मैं तो लोगो की नज़रे जब मुझ पर पड़ती तो बड़ा अच्छा भी लग रहा था”

“मैं जानती हूँ कि मेरी सहेली है ही इतनी खुबसूरत कि हर कोई उसे देखना चाह रहा होगा. पर आज शायद इस लाल रंग की ब्रा का भी कमाल होगा जिसका स्ट्रेप तेरे ब्लाउज से निकल कर दिख रहा है”, सुमति भी हँसने लगी.  “ऑफ़ कोर्स, डार्लिंग! मैंने जान बुझकर निकाल रखी थी! और मैंने अपनी साड़ी का आँचल भी ऐसे सरकाया था कि मेरा क्लीवेज भी दिखाई पड़े!”, अंजलि बोली.

“अंजलि!! तू भी न!!! कितनी शरारती है… लोग भी कितनी हसरत भरी निगाहों से तेरी ओर देखते रहे होंगे”, सुमति बोली. “हाँ हाँ ठीक है. पर पहले तो तेरी साड़ी बदलते है. आज के ख़ास मौके पर तुझे इतनी साधारण साड़ी पहनने नहीं दूँगी मैं.” अंजलि ने सुमति का हाथ पकड़ा और उसे अन्दर के कमरे में ले जाने लगी. “पर अंजू, हमारे पास समय नहीं है इतना कि  अब मै साड़ी बदल सकूं.”, सुमति ने कहा पर उसे पता था कि अंजलि ने अब मन बना लिया है. वो मानेगी नहीं.

 

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अंजलि ने सुमति की साड़ी पहनने में मदद की.

वैसे भी सुमति और अंजलि दोनों साड़ी पहनने में एक्सपर्ट थी. अंजलि ने जल्दी से एक हलकी हरी रंग की साड़ी पसंद की जो थोड़ी अधिक फैंसी थी पर फिर भी सुमति के लिए आसान रहेगी सँभालने को. अंजलि ने सुमति के तन पर जल्दी से उस सुन्दर सी साड़ी को लपेटना शुरू की, और सुमति अपना ब्लाउज बदल रही थी. फिर अंजलि ने सुमति की प्लेट बनाने में मदद की और पिन लगाने लगी ताकि साड़ी खुलने का डर ही न रहे! वो दोनों जानती थी कि किसे क्या करना है ताकि जल्द से जल्द सुमति तैयार हो सके. दोनों को देख ऐसा लगता था जैसे दोनों का जनम सहेलियां बनने के लिए हुआ था. दोनों एक दुसरे को कितने अच्छी तरह से समझती थी. वैसे तो दोनों कितने अलग अलग परिवेश से आई थी पर फिर भी दोनों इतनी घुल मिल गयी थी.

वैसे तो सुमति थोड़ी अधिक जवान थी, और नए कदम लेने से कभी घबराती नहीं थी, वो सही मायने में इंडियन लेडीज क्लब की लीडर थी. जबकि अंजलि सबको प्यार देने वाली औरत थी जो एक छोटे गाँव में पली बढ़ी थी. अभी वो अपने रुढ़िवादी माता-पिता के साथ रहती है. उसके माता पिता ने उसकी शादी एक नीता नाम की लड़की से की थी जो कि उसीकी तरह एक गाँव में पली बढ़ी थी. नीता को बचपन से सिखाया गया था कि उसे बस घर परिवार को संभालना है और अपने पति को भगवन मान कर उसकी सेवा करनी है. नीता अपने सास-ससुर की सेवा में कोई कमी नहीं होने देती थी. पर जबसे उसने बेटी को जनम दिया है, अंजलि के माता पिता ने नीता का जीना मुश्किल कर रखा था. उन्हें तो बेटा चाहिए था. पर अंजलि एक अच्छे पति का कर्त्तव्य निर्वाह करते हुए हमेशा नीता का बचाव करती थी. नीता के लिए, अंजलि एक पुरुष के रूप में सबसे अच्छा पति था… उससे अच्छा कुछ नीता जैसी लड़की के लिए नहीं हो सकता था. अंजलि को भी अपनी बेटी से बहुत प्यार था. आखिर जब एक इंसान के अन्दर खुद एक औरत छुपी हो, वो भला स्त्री से कैसे प्यार न करता. अंजलि के माता पिता को पसंद नहीं था फिर भी अंजलि, एक पति के रूप में, अपनी पत्नी नीता की हर तरह से मदद करती थी फिर चाहे वो खाना बनाना हो या कपडे धोना या बेटी की परवरिश करना. हर काम में वो साथ देती थी. जितनी स्वीट वो एक आदमी के रूप में थी, उतनी ही स्वीट वो एक औरत के रूप में भी थी.देख कर लगता है जैसे सुमति हमेशा से ही एक लीडर थी, पर पुरुष यानी सुमित के रूप में वो हमेशा से ऐसे कॉंफिडेंट नहीं थी. यह सब बदलने लगा था जब सुमति की मुलाक़ात अंजलि से ५ साल पहले हुई. उनकी दोस्ती बढ़ने लगी और वो खुद अंजलि के साथ सुमति के रूप में खिलने लगी. सुमति क्या बढ़ी, सुमित भी अपने काम में और ज्यादा कॉंफिडेंट इंसान बन कर उभरने लगा. और आज सुमति, एक पुरुष या स्त्री, किसी भी रूप में एक लीडर है. और सुमति इस बात का क्रेडिट अंजलि को देना नहीं भूलती.

सुमति अब अपनी तोता हरी रंग की साड़ी पहनकर तैयार थी. अंजलि ने उसकी ओर देख कर कहा, “मैंने तुझसे कहा था न कि बस ५ मिनट लगेंगे तैयार होने! अब बस ज़रा थोड़ी और डार्क लिपस्टिक लगा लो मेरी जान. और फिर हम दोनों मिलकर घर को ठीक करती है.”

“हाँ हाँ मैडम. मैं जानती थी अब जब तुम आ गयी हो तो सब कुछ हो जाएगा.”, सुमति बोली और एक बार फिर अपनी प्यारी सहेली को गले से लगा लिया. उन दोनों को एक बार फिर उन दोनों के बीच की प्यारी दोस्ती का एहसास हुआ. अंजलि फिर किचन जाकर अपने एक हाथ में झाड़ू लेकर वापस आई. “अच्छा मैं ज़रा पार्टी रूम की सफाई करती हूँ, फिर ड्रेसिंग रूम और किचन की करूंगी. तू तब तक ज़रा सजावट का काम देख ले इन कमरों की. फिर हम दोनों खाना भी टेबल पर लगा देंगी”, अंजलि ने अपना प्लान सुमति को बताया.

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अंजलि पार्टी के लिए कमरा और ड्रेसिंग रूम साफ़ करने लगी.  घर में अपनी पत्नी नीता की मदद करने के अनुभव से  अंजलि पार्टी की तैयारी करना बखूबी सीख चुकी थी.

अंजलि अपने घर में हमेशा से ही अपनी पत्नी की मदद करती रही थी इसलिए उसे पता था कि ऐसे समय पर कैसे प्लानिंग करनी चाहिए. अंजलि की पत्नी नीता हमेशा भगवान को धन्यवाद करती थी कि उसे इतना अच्छा पति मिला था. पर अपने पति के इस स्त्री रूप से वो हमेशा सहज नहीं रह पाती थी. अंजलि ने कभी नीता को मजबूर नहीं किया कि नीता उसकी क्रॉस-ड्रेसिंग को स्वीकार करे. पर नीता ऐसे माहौल में पली बढ़ी थी जहाँ उसे सिखाया गया था कि वो कभी अपने पति को किसी भी चीज़ के लिए मना न करे. वो चुप चाप स्वीकार कर लेती जब कभी अंजलि घर में अपने कमरे में अकेले साड़ी पहन कर तैयार होती. अंजलि इंडियन लेडीज क्लब में अक्सर कहती थी कि वो कितनी भाग्यशाली है जो उसे ऐसी पत्नी मिली जिसने उसके इस रूप को भी स्वीकार किया है. पर अंजलि को पता नहीं था कि नीता ये सिर्फ मजबूरी में ही स्वीकार करती है. नीता के मन की बात न कभी उसने अंजलि से की और न ही अंजलि को इस बात का अंदाजा था.

फिलहाल इंडियन लेडीज क्लब में यह दो औरतें, अंजलि और सुमति, काम में जुटी हुई थी. अंजलि ने हर कमरे को साफ़ कर दिया था, और सुमति ने हर कमरे की सजावट कर ली थी. अब बस १५ मिनट ही और बचे थे जब सभी उस घर में आना शुरू कर देंगे. अब बस उन्हें वो मेज सजानी थी जहाँ सभी के डिनर का इन्तेजाम होगा. वे दोनों खाना और एपेटाइज़र लोगो के तैयार होने के बाद गरम करेंगी, ऐसा उन्होंने तय किया.

 

मधुरिमा, एक भरी पूरी काय वाली मदमस्त औरत थी, जो अपने नखरो से लोगो को हंसा हंसा कर पागल कर देती. किसी भी पार्टी में जान डालना हो तो मधुरिमा से अच्छा कोई नहीं.

एक बार फिर दरवाज़े की घंटी बजी और इस बार दरवाज़ा अंजलि ने खोला. दरवाज़े पर इस वक़्त इस क्लब की तीसरी संस्थापक मधुरिमा थी. कोई भी मधुरिमा को देख ले, तो सबसे पहली नज़र उनके भरे पुरे दिखने में मुलायम स्तनों पर जाती थी. एक क्रॉस-ड्रेसर के पास असली स्तन हो, इससे बड़ा उपहार भगवान उसे और क्या दे सकते है? ऐसा उस क्लब की दूसरी औरतें सोचा करती थी. पर सच तो ये था कि मधुरिमा के स्तन उसकी बीमारी और कुछ दवाइयों की वजह से थे. पर हंसमुख मधुरिमा ने उसे हँसते हुए स्वीकार कर लिया था. एक पुरुष के रूप में तो उसके पीठ पीछे उसके स्तनों के उभार को देखकर हँसते थे, पर वो खुद ही वो ऐसे जोक करती थी जैसे “उसे अपनी पत्नी से बड़ी ब्रा की ज़रुरत होती है”. जब वो खुद पर हँस लेती थी तो दुसरे लोग उसके साथ ही हँस लेते थे. जो पीठ पीछे हँसने वाले होते थे, उन्हें खुद शर्मिंदगी महसूस होने लगी थी. पर सच में देखा जाए, तो मधुरिमा जैसे हंसमुख इंसान बहुत ही कम होते है दुनिया में. वो खुद भी खुश रहती और अपनी बातों और हरकतों से सभी को खुश कर देती. और उसका यही स्वाभाव उसे जवान बनाये रखता जबकि वो ५० से अधिक की थी उम्र में. सुमति के इस क्लब को बनाने के पहले, मधुरिमा ही थी जिसने अपने घर के दरवाज़े दुसरे क्रॉस-ड्रेसर के लिए खुले रखे थे. मधुरिमा की एक बेहद प्यारी पत्नी भी थी, जो न सिर्फ मधुरिमा का सहारा थी, बल्कि उसने अपने घर में बहुत से क्रॉस-ड्रेसर का खुले दिल से स्वागत किया था. मधुरिमा की पत्नी ही कारण थी कि मधुरिमा को कभी एक औरत के रुप में घर से बाहर निकलने में कभी सकोच नहीं हुआ. मधुरिमा का जितना अच्छा स्वभाव था, उसी की वजह से कई लडकियां मधुरिमा को अपनी माँ मानती थी.

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मधु को देखते ही सुमति की आँखें ख़ुशी से चमक उठी. वो दोनों न सिर्फ दोस्त थी बल्कि रिश्ते में माँ-बेटी भी थी.

“अच्छा लड़कियों… अब तुम्हारी महारानी आ चुकी है. सुमति कहाँ है? मेरी आज्ञा है कि वो तुरंत मेरे सामने पेश हो और आकर मुझे गले लगाए”, मधुरिमा ने आते ही अपनी हँसने खेलने वाली नौटंकी शुरू कर दी थी.”माँ!!!”, मधु की आवाज़ सुनकर सुमति भी ख़ुशी से दौड़ी चली आई. सबसे पहले मिलते ही सुमति ने झुककर मधु के पैर छुए.

“देख रही हों अंजलि तुम? मैंने इसे गले लगाने कहा और यह मेरी आज्ञा की अवहेलना कर मेरे पैर छू रही है. मुझे तुरंत एक हग चाहिए! वरना इस बात की सजा मैं इसे चूमकर दूँगी”, मधु की नौटंकी जारी रही और उसने झुकी हुई सुमति के कुलहो पर एक प्यार भरी चपत मारी.

“आउच! माँ!! क्या कर रही हो? कितना इंतज़ार करायी तुम. क्या अपनी बेटी की पार्टी को सक्सेस नहीं बनाओगी आज तुम? तुम्हे अच्छा लगेगा कि तुम्हारी बेटी की पार्टी फ्लॉप हो? बोलो?”, सुमति ने भी नाटक करते हुए गुस्सा दिखाया.

“दोनों ही माँ-बेटी ड्रामा क्वीन हो! चलो, अब काम पर लग जाओ.. लोग आते ही होंगे.”, अंजलि ने हँसते हुए कहा.

मधुरिमा ने सलाद बनाना शुरू किया और साथ ही साथ अपने नखरे भी दिखाती रही.

“हां माँ! तुम ज़रा अपनी फेमस सलाद तैयार कर दोगी?”, सुमति ने मधु से कहा. “ओह, तो मैं सिर्फ सलाद बनाने के लिए याद आ रही थी तुम्हे? अच्छा तुम दोनों इतना कहती हूँ तो मैं मना कहाँ कर सकती हूँ. हाय ये माँ होना भी न आसान नहीं होता. बेटी कितनी भी बड़ी हो जाए अपनी माँ से काम करवाती ही रहती है”, मधुरिमा हमेशा की तरह एक मजबूर माँ का ड्रामा करती रही. पर सच में वो सिर्फ प्यार से सुमति को छेड़ रही थी. मधु ने फ्रिज से सलाद का सामान निकाला और धम-धम करती अपने पैरो की पायल को बजाती हुई सोफे पर धम्म से जाकर बैठ गयी. चेहरे से मधु भले बहुत ही खुबसूरत औरत न हो, पर उसकी बड़ी भरी हुई काया उसके पूरी तरह औरत होने का आभास दिलाती थी. कभी कभी मस्ती में वो एक औरत के रूप में भी थोड़ी आदमियों की तरह हरकत करती तो वो और भी मजेदार लगती. यदि आपने उसे उस वक़्त सलाद के लिए फल-सब्जी कांटते हुए देखा होता तो आपको समझ आता कि कोई भी औरत अपनी साड़ी को यूँ घुटनों तक तो कभी न उठा कर करती यह सब… पर मधु ऐसा कर सकती थी. और उसके बाद भी वो किसी भी औरत से कम नहीं लगती. मधु सचमुच एक ख़ास औरत थी.

“तुम्हे पता है अंजलि? काश मेरी बेटी सुमति भी अपनी माँ की तरह मेहनती होती. देखो कितनी आलसी हो गयी है. ससुराल जाकर एक दिन मेरी नाक कटाएगी ये! पर मुझे ज्यादा चिंता इस बात की रहती है कि कितनी दुबली हो गयी है ये! एक माँ के लिए सबसे ख़ुशी की बात होती है कि उसकी बेटी अच्छे से खाए और सेहतमंद रहे पर यह है की जब तब डाइटिंग ही करती रहती है. मुझे देखो, मैं यहाँ ९० किलो की हो रही हूँ और यह ६० किलो की भी नहीं है. काश ये अपनी माँ की तरह होती! कौन करेगी इस सुखी दुबली लड़की से शादी? सोच सोच कर ही अब तो मेरा भी वजन कम होने लगा है”, मधुरिमा एक असली माँ की तरह सुमति को छेड़ना नहीं भूलती.

मधु की बात सुनकर अंजलि जोर जोर से हँसने लगी. तो सुमति भी अपनी जगह से उठकर मधु के पीछे आकर सोफे पर बैठ गयी और मधु को पीछे से गले लगाती हुए बोली, “माँ, यदि मैं तुमसे तुम्हारी तरह एक चीज़ पाना चाहूंगी तो वो है तुम्हारे बड़े बड़े बूब्स!” सुमति की बात सुनकर मधु छत की ओर देख कर बोली, “हे भगवान! कैसे बेशर्म बेटी दी है मुझे!”

सुमति और मधु के बीच की छेड़-छाड़ और कुछ देर चलती रही, और अब इंडियन लेडीज क्लब के और सदस्य भी आने लग गए थे. घर में अब चहल पहल थी. आने वाले लगभग सभी सदस्य एक आदमी के रूप में आये थे, पर अब सभी अपने सपनो की औरत बनने में मशगुल हो गए थे. इंडियन लेडीज क्लब अब जाग गया था और वातावरण में खुशियाँ अब बस बढती ही जा रही थी. और खुबसूरत औरतों की हँसी और खुबसूरत बातें अब माहौल को और खुशनुमा बना रही थी. सचमुच दुनिया कितनी सुन्दर होती यदि हर किसी के पास आज़ादी होती कि वो बिना दूसरो को परेशान किये अपनी मर्ज़ी से अपना जीवन जी सकता. सुमति ने अपने आसपास हंसती-खेलती सजती संवरती औरतों को देखा, और उसे मन में एक सुखद अनुभूति हुई यह सोचकर कि उसने ये इंडियन लेडीज क्लब इन औरतों के लिए बनाया है.

क्रमश: … 

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प्रतिभा: एक अजनबी से मुलाकात

When I found that my wife was cheating on me with another man, I was furious. But that man caught me wearing my wife’s saree. What would he do to me?


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संपादक के विचार: हम नहीं चाहते कि इस कहानी को पढ़कर पाठक समझे कि क्रॉसड्रेसर कहीं से भी किसी पुरुष या स्त्री से कमतर है. इस कहानी का विषय आपके लिए ज़रुरत से कहीं अधिक हॉट और सेक्सी हो सकता है. आपको चेतावनी दी जा चुकी है.

लेखिका: प्रतिभा मेहरा

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जीवन के उतार चढाव से गुज़रते वक़्त परिवर्तन हमारे जीवन में चलता रहता है. और इस परिवर्तन की यात्रा में हम कुछ नया ढूंढ पाते है कुछ नया सिख पाते है

हर किसी की तरह, मेरी ज़िन्दगी में उतार चढ़ाव थे जिसने मुझे अपने बारे में कुछ जानने का अवसर दिया कि मैं वाकई में कौन हूँ और क्या चाहता हूँ. मेरा नाम रोहित है, ३२ साल का शादी शुदा इंसान और मुंबई में रहने वाला, एक MNC में काम करता हूँ. यह मेरी आत्मा-साक्षात्कार की कहानी है, एक कहानी उस दिन की जब मेरी दुनिया हमेशा हमेशा के लिए बदल गयी. Continue reading “प्रतिभा: एक अजनबी से मुलाकात”

Pratibha: A wild encounter

When I found that my wife was cheating on me with another man, I was furious. But that man caught me wearing my wife’s saree. What would he do to me?


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Editor’s note: We do not want our readers to feel that crossdressers are lesser than man/woman in any way. The subject matter of this story may be too hot for you to handle. You have been warned!

Author: Pratibha Mehra

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Transformation is a process, and as life happens there are tons of ups and downs. It’s a journey of discovery – there are moments on mountaintops and moments in deep valleys of despair.

Like everyone else in this world, my life had its ups and downs, and that led me to discover who I really was. I am Rohit, 32 yr old married guy from Mumbai, working for an MNC and with a great taste for finer things in life. And this is my story of self-discovery, a story about an incident when my world and my life turned upside down completely. Continue reading “Pratibha: A wild encounter”

Scent of a woman

Were you ever mesmerized by the scent of a woman that they leave in their clothes after wearing?


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Note: We are thankful to lovely Alisha Sista for contributing her story. Not just that, she also gave her sexy pics to go with the story! Please say thanks to this hot girl on facebook!

This story started with me being obsessed with the scent of a woman’s dress. I was just about 10 years old when I started noticing the difference between how a woman and a man smelled. I was so attracted to the woman’s scent that I wanted to smell like her. The fascination drove me to rummaging through my mother’s washed clothes but the scent was just not there. I used to get that heavenly scent from my aunt who used to stay out of my town and used to visit us once in every 3 months. I used to wait for her to come & used to find multiple reasons to stay around her so that I can experience her scent. My first thoughts were that my aunt must using some imported perfume to get this heavenly scent. Her husband was after all working abroad & he must be sending her this imported stuff for her to smell so angelic. Oh how wrong was I !!! Continue reading “Scent of a woman”

Chandi Chowk

Sometimes living alone can be a blessing for a crossdresser!


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Our note: This story has been contributed by lovely Amita Sikka in response to Expression Challenge #2. If you like this story or if you know her, don’t forget to send her a message on Facebook! And please do write comments on our facebook page.

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Being transferred out of your home town, away from you family, is not exactly a time to rejoice. But for me , though I had separation pangs, I also had a sense of exhilaration and being presented with a chance to live alone and be release my inner beautiful self.

So here I was , in a bigger city, in a land full of opportunities. Surely the kind of opportunity I was desperate for. After a few days , needed to find a rental accommodation and settle down, I set out on my quest. The preparations and the research had been on for quite a while. In fact ever since I learnt of my transfer to a new city, my excitement was palpable. Continue reading “Chandi Chowk”