इंडियन लेडीज़ क्लब: अंतिम भाग

आखिर वो रात आ ही गयी थी जब इंडियन लेडीज़ क्लब की औरतों का जीवन एक बार फिर बदलने वाला था. क्या वो आगे भी औरत बनी रहेंगी?


यदि आपको कहानी पसंद आये, तो ऊपर दी हुई स्टार रेटिंग का उपयोग कर रेटिंग ज़रूर दे!

Click here to read in English/ सभी भागो के लिए क्लिक करे

आखिर वो घडी आ ही गयी थी जब उस मेसेज के अनुसार सुमति और इंडियन लेडीज़ क्लब की सहेलियों के साथ कुछ ख़ास होने वाला था. क्या होने वाला था उस रात? सुमति तो अब भी एक खुबसूरत दुल्हन के लिबास में मुस्कुरा रही थी. उसके हाथों और पैरो पर बेहद सुन्दर डिजाईन वाली मेहंदी रचाई गयी थी. उसके आसपास उसकी बहाने, भाभियाँ और बहुत सी औरतों ने उसे घेर रखा था. हर जगह ख़ुशी और औरतों की हँसी की गूंज थी. हर कोई तो खुश था, फिर भी उस ख़ुशी के पीछे सुमति, अंजलि और मधुरिम चिंतित भी थी कि आज रात उनके साथ कौनसी नयी मुसीबत आने वाली है. इस वक़्त सभी औरतें सुमति की मेहंदी और उसकी खूबसूरती की तारीफ़ करने में लगी हुई थी. पर उसके बाद क्या हुआ वो किसी को अच्छी तरह से ध्यान नहीं आ रहा था. जैसे सभी शायद किसी नशीली नींद में चले गए थे. और सुमति को भी याद न रहा कि उसके बाद क्या हुआ था.

z10
सुमति को पिछली रात इतना ही याद रहा कि वो औरतों से घिरी हुई थी. पर उसके बाद क्या हुआ था?

अगली सुबह

सुमति अपने बिस्तर से सोकर उठी पर उसने अब तक अपनी आँखें नहीं खोली थी. वो बाहर से कुछ औरतों की आपस में बातें करने की आवाजें सुन सकती थी.

“क्या दूल्हा अब भी सो रहा है?” किसी ने पूछा. “हाँ, कल इतनी रात तक जगा हुआ जो था. पर आज तो उसकी शादी है. कोई जाकर जगाओ उसे”, दूसरी औरत ने कहा.

तभी सुमति को अपने सर पर के प्यार भरा स्पर्श महसूस हुआ. “बेटा सुमित, अब उठ भी जाओ. आज शादी है तुम्हारी!”, सुमति ने अपनी माँ की आवाज़ सुनी और अपनी आँखें धीरे से खोली. उसकी माँ उसके सामने मुस्कुराती हुई खड़ी थी.

सुमति को मुश्किल से बस एक सेकंड लगा होगा समझने के लिए कि वो एक बार फिर से आदमी बन चुकी थी. वो एक बार फिर से सुमित थी. वो अपनी माँ के चेहरे को देख मुस्कुराया. एक बार फिर से माँ का बेटा बनकर सुमित खुश था.

उसने उठकर अपना फ़ोन देखा. उसमे एक मेसेज उसका इंतज़ार कर रहा था. +GOD नंबर से आया मेसेज. “सुमति तुमने बिलकुल सही निर्णय लिया. तुमने पिछले कुछ दिनों एक औरत के कर्त्तव्य का बखूबी निर्वाह किया. इसलिए मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है कि तुम्हारी हर इच्छा पूरी हो. इसलिए मैं तुम्हे तुम्हारा पुराना शरीर लौटा रहा हूँ. तुम्हारी दुनिया अब फिर से वैसी ही होगी जैसे १४ दिन पहले थी. तुम्हारा दाम्पत्य जीवन सुखी हो. अपनी पत्नी चैताली को हमेशा खुश रखना.”

सुमित उस मेसेज को पढ़कर तुरंत उठ खड़ा हुआ. और जल्दी ही नहाकर उसने चैताली से मिलने की सोची. उसकी माँ ने उससे कहा, “बेटा शादी के दिन शादी से पहले दुल्हन से मिलना ठीक नहीं होता है.” तो सुमित ने जवाब दिया, “यकीन मानो माँ. आज अब कुछ बुरा नहीं हो सकता. मुझे चैताली से बहुत ज़रूरी बात करनी है”

चैताली का घर बस कुछ १०० मीटर की दूरी पर ही था और सुमित दौड़ा दौड़ा चैताली से मिलने गया जो वहां अपने घर के मेहमानों के साथ व्यस्त थी. उसे दरवाज़े से देखते हुए चैताली खुश हो गयी. चैताली की माँ ने सुमित का स्वागत किया और उसकी इच्छा अनुसार, सुमित और चैताली को मिलने के लिए एकांत में एक कमरा दिलाया जहाँ सुमित चैताली से बात करने के लिए बेचैन था..

चैताली भी जल्दी ही वहां आ गयी. अपनी सिल्क साड़ी में वो परी लग रही थी. “क्या बात है सुमित? सब ठीक है न?”, उसने पूछा.

“चैताली. मैं तो सिर्फ ये कहने आया था कि आज मैं अपने आप को दुनिया का सबसे किस्मत वाला आदमी मानता हूँ जो मुझे तुम्हारी जैसी पत्नी मिल रही है. तुम हमेशा से मेरी अच्छी दोस्त रही हो. और मैं भी कहना चाहता हूँ कि मैं हमेशा तुम्हे प्यार करने वाला पति बन कर दिखाऊँगा. तुम्हारी ख़ुशी के लिए मैं कुछ भी करूंगा. और तुम चाहो तो मैं क्रॉसड्रेसिंग भी छोड़ दूंगा.”

“ओहो सुमित! मैंने तुमसे कभी कहा है क्रॉसड्रेसिंग छोड़ने को? तुम्हे पता है ये राज़ सिर्फ हम दोनों के बीच है. मैंने तुम्हे हमेशा सपोर्ट किया है, और आगे भी करूंगी. वैसे भी जब तुम औरत बनते हो, तो मुझे भी तो एक अच्छी सहेली मिल जाती है बात करने के लिए! मैं हम दोनों के बीच और कुछ भी नहीं बदलना चाहती. मैं तुम्हे प्यार करती हूँ और करती रहूंगी. तुम्हे क्रॉसड्रेसिंग छोड़ने की ज़रुरत नहीं है क्योंकि उसके बगैर तुम अधूरे रहोगे. सुमति को मैं अपने जीवन का हिस्सा बनाऊँगी. ये मेरा प्रॉमिस है”, चैताली ने कहा.

18033886_138057923399669_5105859512156221405_n
सुमित जल्दी ही चैताली से मिला. चैताली के साथ सुमति का राज़ सुरक्षित था.

चैताली की बात सुन सुमित का दिल भर आया. उसने उसे गले तो नहीं लगाया पर आँखों से उसने उसे धन्यवाद् किया. दोनों एक दुसरे की ओर देख कर मुस्कुराने लगे. उन दोनों के बीच काफी अच्छी आपसी समझ थी. उन्हें एक दुसरे से कुछ कहने के लिए शब्दों की ज़रुरत नहीं थी. वो जानते थे कि उन दोनों का जीवन बहुत खुबसूरत होगा.

जब अंजलि सुमति के घर में सोकर उठी तो उसे पता चला कि वो भी आदमी बन चुकी थी. उसने अपनी बेटी सपना और अपनी पत्नी को अपने बगल में सोता हुआ पाया. फिर उसने अपनी पत्नी को जगाकर कहा, “मेरी प्यारी धरम पत्नी. मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ. मैं जानता हूँ कि तुम सोचती हो कि तुम्हे मेरे हर निर्णय में साथ देना चाहिए. पर मैं तुम्हे बताना चाहता हूँ कि तुम मेरे बराबर हो और हर निर्णय में तुम्हारा उतना ही हक़ है जितना मेरा. तुम अपने विचार से मुझे अवगत करा सकती हो. और एक बात, मैं अपनी बेटी को बढ़ा कर एक स्वाभिमानी औरत बनाना चाहता हूँ. मेरे माता-पिता तुम्हारे साथ भले ठीक से व्यवहार न करते हो क्योंकि तुम्हे पोता नहीं मिला, पर सपना हमारे लिए किसी बेटे से कम नहीं होगी. मैं उसके हर सपने को पूरा करूंगा. और एक माँ होने के नाते तुम भी वैसा ही करना” ये शब्द सुनकर अंजलि की पत्नी दिल ही दिल में अपने पति की ओर शुक्रगुज़ार थी. उसे ख़ुशी थी कि उसकी बेटी बड़ी होकर स्वाभिमानी और इंडिपेंडेंट लड़की बनेगी.

और वहीँ जब मधुरिमा सोकर उठ, तो वो भी अब आदमी बन चुकी थी पहले की तरह. मधुरिमा के लिए तो पुरुष हो या स्त्री, उसका जीवन वैसे ही अच्छा था. उसने अपनी पत्नी अजंता को देखा और कहा, “अजंता, मैंने शायद तुमसे कई बार कहा नहीं है पर तुम्हे पत्नी पाकर मेरा जीवन सचमुच धन्य रहा है. तुम मेरा हर कदम साथ देती रही हो. पता है यदि संभव हुआ तो अगले जनम में मैं तुम्हारी पत्नी बनना चाहूँगा ताकि मैं तुम्हारी सेवा कर सकू!” अजंता के पास कुछ कहने को नहीं था… क्योंकि उसका पति तो हमेशा से ही उसे बेहद प्यार करता था. और फिर अजंता का स्वभाव भी सिर्फ देने वाला था पर उसे बदले में हमेशा बहुत सारा प्यार भी मिलता था.

इन सब से दूर शहर में जहाँ साशा रहती थी, उसकी रात भी चिंता में बीती थी. उसे याद आ रहा था कि कैसे उसने नौरीन के साथ दिल खोलकर बातें की थी. पर जब वो सोकर उठी तो वो एक बार फिर से आदमी बन चुकी थी. और जिस घर में वो थी, वो उसका पहले के घर था जहाँ उसके लड़के रूममेट थे. नौरीन आसपास कहीं भी नहीं थी. वो नौरीन को देखने को बेचैन हो उठी और जल्दी से ऑफिस जाने को तैयार हुई, अब एक आदमी के रूप में. उसे आज एक ज़रूरी काम था.

“नौरीन”, साशा अब लड़के के रुप में दौड़कर नौरीन के पास ओफ्फिए में पहुंचा. “हाँ सुशिल. तुम इतना हांफ क्यों रहे हो? दौड़ कर आये हो क्या?” नौरीन ने साशा के पुरुष रूप सुशील से कहा. नौरीन को पिछले दिनों के बारे में कुछ भी याद नहीं था जब साशा उसके साथ उसकी रूममेट बन कर रही थी.

“नौरीन मुझे तुमसे कुछ कहना है. अर्जेंट!”, साशा यानी सुशील ने कहा. और फिर दोनों एक मीटिंग रूम में चले आये जहाँ सुशील ने दोनों के बीच की चुप्पी को तोड़ते हुए कहा, “नौरीन, तुम ने दुनिया की सबसे अच्छी लड़की हो. तुम सबका सम्मान करती हो और सभी की बिना मांगे मदद भी करती हो, और बदले में किसी से कुछ भी नहीं चाहती. तुम्हे अंदाजा नहीं है कि तुमने मेरे सबसे मुश्किल समय में कैसे मदद की थी. पर मैं वो बात जानता हूँ. इसलिए मैं तुम्हे दिल से धन्यवाद देना चाहता हूँ. उस हर बात के लिए उस हर पल के लिए जिसमे तुमने मेरे साथ दिया था.”

फिर सुशील थोड़ी देर चुप रहने के बाद आगे बोला, “नौरीन, तुम मुझे बेहद पसंद हो. क्या तुम मुझसे शादी करके मेरी पत्नी बनना चाहोगी?”

नौरीन तो सुशील की बात सुनकर हैरान सी रह गयी. वो कुछ कह न सकी. “तुम मेरे सवाल का जवाब दो, उसके पहले मैं तुम्हे कुछ और बताना चाहता हूँ अपने बारे में”, सुशील ने कहा.

और फिर सुशील ने नौरीन को अपनी क्रॉसड्रेसिंग और साशा वाले रूप के बारे में बताया. वो नौरीन को बताना चाहता था पिछले दिनों के बारे में जब साशा और वो साथ रही थी, पर उसे पता था कि नौरीन उस बात का कभी यकीन नहीं करेगी. और उसके पास कोई सबूत भी तो नहीं था. यहाँ तक कि वो फ़ोन में आये sms भी अब उसके फ़ोन से गायब हो चुके थे. सुशील की बात सुनकर कुछ देर सोचने के बाद नौरीन ने सुशील की ओर देखा और बोली, “हाँ. मेरा जवाब हाँ है.” नौरीन मुस्कुरा दी. सच तो ये था कि नौरीन हमेशा से सुशील को चाहती थी और सुशील को ये पता भी नहीं था. पर पिछले कुछ दिनों में सुशील को उसका सच्चा प्यार पाने का मौका मिला था.

z2
नौरीन को ज़रा भी याद नहीं था कि पिछले कुछ दिन साशा उसकी रूममेट बनकर उसके साथ रही थी.

एक बार फिर इंडियन लेडीज़ क्लब की औरतों का जीवन बदल गया था पर इस बार अच्छे के लिए. सुमति यानी सुमित की शादी भी निपट गयी थी जिसमे अंजलि और मधुरिमा उसके पुरुष मित्र बन कर शामिल हुए थे. सभी का जीवन आज ख़ुशी से भरा हुआ था. अब क्रॉसड्रेसर होना किसी के लिए अभिशाप नहीं था.

कुछ दिन बाद

आज इंडियन लेडीज़ क्लब में खुशियाँ ही खुशियाँ थी. और खूब भीड़-भाड थी. न जाने कितने ही आदमी आज यहाँ इकट्ठा हुए थे और खुद को खुबसूरत साड़ियों और लहंगो में सजा रहे थे. क्योंकि आज एक ख़ास दिन था. कुछ दिनों के ब्रेक के बाद इंडियन लेडीज़ क्लब फिर से खुल रहा था. पर इस बार के बदलाव था इस क्लब में. अब ये क्लब न सिर्फ क्रॉसड्रेसर “महिलाओं” के लिए था बल्कि अब उनकी पत्नियों, गर्ल फ्रेंड के लिए भी खुल गया था. बहुत सी क्लब की औरतों की मदद आज उनकी पत्नियां या गर्ल फ्रेंड कर रही थी. उन्हें सजाते हुए वो सब भी खुश थी. और जो क्लब की सदस्य अकेली थी, उनकी मदद के लिए क्लब की सीनियर लेडीज़ तो थी ही. सबके चेहरे पर ख़ुशी थी आज.

पर एक सदस्य जो सबसे ज्यादा खुश थी, वो थी सुमति. सुमति को आज दुल्हन के रूप में सजाया जा रहा था. अंजलि, मधुरिमा और कई औरतें इस ख़ास अवसर पर सुमति को सजाने में मदद कर रही थी. अंजलि और मधुरिमा का साथ पाकर सुमति भी बहुत खुश थी. इन तीनो सहेलियों ने कठिन समय भी साथ में गुज़ारा था, और इस दौरान उनकी दोस्ती और गहरी हो गयी थी. आज इस क्लब में सुमति और चैताली की शादी हो रही थी जहाँ वो दोनों ही दुल्हनें होंगी. सभी “लेडीज़” आज इस शादी में सुमति की तरफ से सम्मिलित हो रही थी और उनकी पत्नियाँ और गर्ल फ्रेंड चैताली की ओर से. सुमति अब दुल्हन के रूप में सजकर तैयार थी. और क्लब की दूसरी औरतें भी जो रंग बिरंगे परिधानों में निखर रही थी. सुमति आज क्लब के सदस्यों के प्रति शुक्रगुज़ार थी जो इस पल को यादगार बनाने के लिए शामिल हुए थे.

z3
इंडियन लेडीज़ क्लब में आज खुशियाँ ही खुशियाँ थी. आज लेडीज़ सुन्दर साड़ियों और लहंगो में सजी थी, क्योंकि आज सुमति और चैताली की शादी का ख़ास अवसर था. सुमति इस वक़्त एक पारंपरिक दुल्हन बनकर अपनी सहेलियों से घिरी हुई थी. इंडियन लेडीज़ क्लब एक बार फिर जाग उठा था.

इंडियन लेडीज़ क्लब की आखिरी मीटिंग में शामिल सभी औरतें आज इस शादी में भी आई थी, बस एक औरत इस शादी में नहीं थी. वो थी अन्वेषा, जिसने पिछली बार राजकुमारी बनाया गया था. कुछ रात पहले जब सभी वापस आदमी बन गए थे, उस दिन अन्वेषा भी बदल गयी थी. पर आदमी बनने की बजाये या एक खुबसूरत औरत बनी रहने की जगह, जब वो सोकर उठी थी तो वो एक कुरूप औरत बन चुकी थी. वो एक बुरे विचारो वाली औरत थी जो अपने अलावा किसी और के बारे में नहीं सोचती थी. अपने सुन्दर औरत के रूप का उसने बहुत गलत फायदा उठाया था. और उसी कर्मो का फल था कि उसे हमेशा के लिए एक कुरूप औरत बनकर अब जीवन गुजारना था. शायद किसी दिन कोई राजकुमार आकर उसे इस श्राप से मुक्त करेगा पर तब तक उसे अकेले ही ऐसे जीवन गुजारना होगा.

पिछले कुछ हफ्ते, एक औरत के रूप में इंडियन लेडीज़ क्लब की औरतों को एक ख़ास शिक्षा दे गया था. क्रॉसड्रेसर होना श्राप नहीं है. ये हमारे ऊपर है कि हम इसे एक वरदान मान कर अपने अन्दर की स्त्री को अनुभव करे या फिर इसे श्राप मानकर अपने जीवन को दुखी करे. हम अपने अन्दर की खुबसूरत स्त्रियोचित भावनाओं और क्वालिटी का उपयोग अपनी जीवन संगिनियों को अच्छे से समझने में उपयोग कर सकती है. पर इसके लिए हमें खुद को अपने जीवन साथ के समक्ष खोलना होगा और उन्हें समझाना होगा कि हम सभी अच्छे लोग, चाहे हम जो भी कपडे पहने. और साथ ही साथ हमें उनकी ज़रूरतों को भी समझना होगा. हम हर समय औरत बनकर नहीं रह सकती उनकी इच्छाओ का सम्मान किये बगैर. किसी भी रिश्ते में एक बैलेंस ज़रूरी है और यह बात ये सभी औरतें समझ चुकी थी. इसलिए आज वो ये खुशियों भरा जीवन जी सकती थी.

लेखिका का नोट:  इस कहानी को ख़त्म करके मुझे बेहद ख़ुशी है. बहुत लम्बा था इसे लिखना और बहुत समय भी लगा. भले ये काल्पनिक कहानी थी और शायद हम सब भी चाहेंगी कि काश हमारे साथ भी ऐसा हो. पर रातोरात हम सब औरत बन जाए, ये शायद संभव नहीं है. पर यही तो इस कहानी का मुख्य सन्देश है. यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम अपने जीवन को खुशहाल बना सकते है चाहे हमारे पास सब कुछ न हो. और यदि हम ज़रा कोशिश करे, तो खुशियाँ हमसे दूर नहीं रह सकेगी. मैं प्रार्थना करती हूँ कि जितनी भी क्रॉसड्रेसर औरतें ये कहानी पढ़ रही है उन सबके सपने सच हो और उनका जीवन पुरुष और स्त्री दोनों रूप में खुशहाल रहे.
समाप्त

सभी भागो के लिए यहाँ क्लिक करे

< भाग १४

यदि आपको कहानी पसंद आई हो, तो अपनी रेटिंग देना न भूले!

free hit counter

इंडियन लेडीज़ क्लब: भाग १४

सुमति अपनी शादी के लिए घर आ गई थी. क्या वो इस शादी और अपने नए जीवन के लिए तैयार थी?


यदि आपको कहानी पसंद आये, तो ऊपर दी हुई स्टार रेटिंग का उपयोग कर रेटिंग ज़रूर दे!

Click here to read in English/ सभी भागो के लिए क्लिक करे

सुमति की शादी

“माँ, सुमति दीदी आ गयी. जल्दी आओ न”, रोहित ने ख़ुशी से अपनी बहन को रिक्शे से आते देख अपनी माँ को आवाज़ दी. सुमति अब अपनी माँ के घर आ गयी थी जहाँ उसकी शादी की तैयारियां जोर शोर से चल रही थी. अब चैतन्य और सुमति की शादी में सिर्फ ८ दिन रह गए थे. अभी भी सुमति को यकीन नहीं हो रहा था पर कुछ ही दिनों में वो एक पत्नी बनने वाली थी. फिर भी, अपने घर में अपनी माँ के पास वापस आकर वो खुश थी.

रोहित भी अब दौड़े दौड़े सुमति के बैग उठाने आ गया था. शिक्षा भाभी जो पड़ोस के घर में रहती थी वो भी दौड़ी चली आई. “सुमति आ गयी! अरे वाह सुमति तो और भी खुबसूरत होकर आई है शहर से”, सर को अपने पल्लू से धक्के शिक्षा भाभी ने उत्साह से कहा. गाँव की रहने वाली शिक्षा भाभी को बड़ा उत्साह होता जब भी कोई शहर से आता. लगता है कि उन्हें सुमति बहुत पसंद थी तभी तो सुमति और रोहित को चलकर आते देखकर इतनी खुश थी वो.

अब तक सुमति की माँ भी दरवाजे पर आ गयी थी. वो हाथ में एक पूजा की थाली लिए खड़ी थी जिसमे एक दिया जल रहा था. अपनी बेटी सुमति को बेहद ख़ुशी के साथ उन्होंने घर में प्रवेश कराया. माँ को पूजा की थाली के साथ देख सुमति ने भी अपना सर अपने सलवार सूट के दुपट्टे से ढँक लिया और माँ उसकी नज़र उतारने लगी. माँ को देखते ही सुमति के चेहरे की ख़ुशी बढ़ गयी थी. पिछली बार जब वो यहाँ आई थी, तब वो घर का बड़ा बेटा थी. आज स्थिति बदल गयी थी पर फिर भी माँ का प्यार बिलकुल वैसा ही था. सुमति ने अपनी माँ के पैर छूने चाहे तो उन्होंने उसे रोक लिया. “अरे बेटी की जगह तो दिल में होती है पैरो पे नहीं”, ऐसा कहकर उन्होंने अपनी प्यारी बेटी के चेहरे को छुआ. माँ बेटी गले मिल अपनी अनकही ख़ुशी एक दुसरे के साथ बांटने लगी.

“अरे शिक्षा. वहां खड़ी खड़ी क्या कर रही है. तेरी ननद आई है, तू भी ज़रा नज़र उतार दे इसकी. स्वागत नहीं करेगी अपनी ननद का?”, सुमति की माँ ने शिक्षा भाभी से कहा जो एक जगह खड़ी होकर यह सब देख रही थी. शिखा सामने आई, और पूजा करके सुमति को गले लगा ली. “कैसी हो भाभी? और आपके शरारती बच्चे कैसे है?”, सुमति ने पूछा. “बच्चे ठीक है सुमति. थोड़ी ही देर में स्कूल से आते ही होंगे. “, भाभी ने जवाब दिया.

“लड़कियों! अभी बहुत समय है बात करने के लिए. पहले सुमति को घर के अन्दर आकर थोडा आराम तो करने दो”, सुमति की माँ ने दोनों से कहा.

अन्दर आकर सुमति अपने कमरे में चली गयी. कितना कुछ बदल गया था उस कमरे में. पहले वो एक लड़के का कमरा हुआ करता था. पर अब तो देख कर ही पता चल रहा था कि वो एक लड़की का कमरा था. और सब कुछ बिलकुल सुमति की एक औरत के रूप में पसंद के अनुसार ही था वहां. जब बचपन में वो सोचती थी कि यदि वो लड़की होती तो अपने कमरे को कैसे सजाती, बिलकुल वैसे ही सब सजा था उस कमरे में. सुमति की बनायीं हुई पेंटिंग भी थी उस कमरे में.

Sumati
नहाने के बाद सुमति ने एक हरे रंग का सलवार सूट पहन लिया.

सुमति कुछ देर अपने बिस्तर पर बैठी जिस पर फूलो के प्रिंट वाली चादर बीछी थी. उसने कमरे की खिड़की से बाहर की ओर देखा तो, वहां से कुछ १०० मीटर की दूरी पे चैताली का घर दिखा जो अब चैतन्य थी, सुमति का होने वाला पति! दूर से ही उस घर में मेहमानों के चहल पहल दिख रही थी. कुछ ही दिन में सुमति उस घर की बहु बनने वाली थी. इस बारे में सोचना भी सुमति के लिए भारी था. पर फिर भी उन विचारो को अनदेखा करती हुई वो नहाने चली गयी. और नहाने के बाद उसने एक हरे रंग का सलवार सूट पहना. एक क्रॉसड्रेसर के रूप में तो सुमति हमेशा साड़ी पहनना पसंद करती थी. पर अब जब वो औरत बन चुकी थी, वो अब सलवार सूट पहनना ज्यादा पसंद करने लगी थी. साड़ी के मुकाबले शायद उसे मैनेज करना ज्यादा आसान था. उसने कुछ देर अपनी माँ के साथ समय बीताया क्योंकि इतने दिनों बाद अपनी माँ से मिल रही थी सुमति. माँ-बेटी ने साथ में लंच किया और फिर सुमति की माँ ने उसे कुछ घंटे सोने के लिए जाने कहा. वैसे भी लम्बी ट्रेन की यात्रा के बाद सुमति थक भी गयी थी. पर वो सोना नहीं चाहती थी. वो अपनी माँ से कुछ बातें करना चाहती थी. न जाने क्यों वो अपनी माँ को बताना चाहती थी कि सुमति उनकी बेटी नहीं बल्कि बेटा हुआ करती थी. पर कैसे समझाएगी वो ये सब अपनी माँ को जिनकी नजरो में आज वो हमेशा से ही उनकी बेटी रही है. इस स्थिति से सुमति अन्दर ही अन्दर थोडा कुढ़ सी गयी थी. पर क्या कर सकती थी वो. अंत में मन की उधेड़-बून के बाद उसने सोना ही उचित समझा.

कुछ घंटे बाद सुमति की माँ ने आकर उसके सर पे हाथ फेर कर सुमति को दुलार से जगाया. “बेटी शाम हो गयी है. अब उठ जाओ.”, माँ ने कहा और माँ की बात सुनकर सुमति उठ गयी. “ओह्ह मुझे तो पता भी नहीं चला इतनी देर हो गयी. शायद ट्रेन की थकान कुछ ज्यादा ही थी.”, सुमति बोली.

“कोई बात नहीं बेटा. वैसे भी घर में मेहमान कल से आना शुरू होंगे. उसके पहले मैं तुझसे कुछ बातें करना चाहती थी.”, सुमति की माँ ने कहा. “क्या बात है माँ?”, सुमति ने पूछा.

“बेटा तू जल्दी ही अब नए घर में चली जाएगी. मुझे तो बहुत ख़ुशी है कि तेरी शादी चैतन्य से हो रही है. बचपन से मैंने अपनी प्यारी गुडिया को चैतन्य के साथ खेलते देखा है और अब तू दुल्हन भी बनने जा रही है.”, माँ ने कहना शुरू किया.

“नहीं माँ, वो गुडिया चैताली थी मैं नहीं. मैं तो लड़का थी.”, सुमति ने मन ही मन सोचा. ये इंसान का दिल भी बड़ा अजीब होता है. जब सुमति लड़का थी तब वो चाहती थी कि उसकी माँ उसे लड़की के रुप में स्वीकार करे. अब जब वो औरत है तो वो माँ को अपने लड़के वाले रूप के बारे में याद दिलाना चाहती है. पर चाहते हुए भी वो माँ से कुछ कह न सकी.

“सुमति, अपने नए घर में सब तुझसे उम्मीद करेंगे कि तू सीधा पल्लू स्टाइल में साड़ी पहने और अपना सर ढँक कर रहे. तुझे कई सारे मेहमानों के लिए खाना भी बनाना पड़ेगा. और किसी भी माँ की तरह, मुझे भी अपनी बेटी की फ़िक्र है. मुझे पता है कि तूने शहर में अकेले रहते हुए खाना बनाना तो सिख लिया है. फिर भी मैं तुझे सीधा-पल्ला साड़ी पहनना और कुछ ख़ास डिश सीखाना चाहती हूँ. तू सीखेगी मुझसे?”

z3
सुमति की माँ ने उसे सीधा पल्ला साड़ी पहनना सीखाया. किसी और माँ बेटी की तरह, उन दोनों का समय भी अच्छा बीत रहा था.

“ज़रूर माँ. मैं तुम्हारी रेसिपी ज़रूर सीखना चाहूंगी”, सुमति ने उत्साह के साथ कहा. वैसे भी लड़के के रूप में वो हमेशा सपने देखती थी कि उसकी माँ उसे बेटी की तरह ट्रीट करेगी और एक दिन अपनी एक साड़ी उसे पहनने को देगी. शायद एक माँ बेटी के बीच का सबसे प्यारा पल होता है ये जब माँ उसे पहली बार अपनी साड़ी गिफ्ट करती है. सुमति अब खुश थी कि आज वो बेटी बन रही है जो वो हमेशा से सोचा करती थी. थोड़ी देर में ही सुमति की माँ उसके लिए एक मेहंदी रंग की साड़ी लेकर आ गयी. तब तक सुमति भी अपना ब्लाउज और पेटीकोट बदल चुकी थी. उसके बाद उसकी माँ ने उसे सीधे पल्ले स्टाइल में साड़ी पहनना सिखाया. सुमति सचमुच बहुत खुश थी अपनी माँ से साड़ी पहनना सिख कर. वैसे सच तो यह था कि सुमति को पहले से ही कई तरह से साड़ी पहनना आता था पर वो यह ख़ुशी महसूस करना चाहती थी जिसमे उसकी माँ उसे बेटी के रूप में स्वीकार कर रही थी. बहुत सुन्दर पल थे वो माँ बेटी के बीच के. इसके बाद दोनों किचन गयी जहाँ सुमति की माँ ने अपनी ख़ास रेसिपी सुमति को सिखाई. दोनों को खाना बनाते वक्त बहुत मज़ा आया. तभी इस बीच सुमति के फ़ोन में एक sms आया. उसने देखा की उसके फ़ोन की लाइट टिमटिमा रही थी. उसने सोचा थोड़ी देर बाद sms देख लेगी पर न जाने क्यों वो उस sms को अनदेखा नहीं कर सकी. “मैं एक मिनट में फ़ोन देखकर आती हूँ माँ”, सुमति ने अपनी माँ से कहा. और फिर अपने हाथ धोकर अपनी साड़ी के पल्लू से पोंछकर वो फ़ोन में मेसेज पढने लगी.

“हेल्लो सुमति! औरत के रूप में नया जीवन कैसा बीत रहा है? क्या तुम्हे अपने पुरुष रूप के जीवन की याद आ रही है? पर तुम तो हमेशा से औरत बनना चाहती थी न? अब तक तो तुम्हे एहसास हो गया होगा कि चाहे पुरुष का जीवन हो या स्त्री का, जीवन में मुश्किलें और उतार-चढ़ाव तो बने ही रहते है. यदि तुम्हारी क़िस्मत में मुश्किलें लिखी है तो वो तुम्हारे कर्मो की वजह से होती है, न कि इस वजह से की तुम्हारा जन्म पुरुष या स्त्री रूप में हुआ है. औरत बनने के बाद भी तुम अपने कर्मो से आज़ाद नहीं हुई हो. तुमने जीवन का ये पाठ अब तक तो सिख ही लिया होगा. पर तुम्हारे पास अब भी मौका है. अच्छे कर्मो से तुम अपने भविष्य को अब भी संवार सकती हो. तो तुम बताओ, क्या अब भी तुम औरत बनी रहना चाहोगी या तुम्हे फिर से पुरुष बनना है? तुम्हारे पास सोचने के लिए एक हफ्ते का समय है. फिर समय का ये चक्र तुम्हारा भविष्य निर्धारित करेगी. हमेशा सुखी रहो यही मेरा आशीर्वाद है.”

बड़ा ही अजीब सा मेसेज था यह. कौन भेज सकता था ये? इंडियन लेडीज क्लब की औरतों के अलावा तो दुनिया में कोई भी सुमति के पुरुष रूप में जीवन को नहीं जानता था. “कौन हो तुम?”, सुमति ने उत्सुकतावश उस sms के जवाब में सवाल पूछा.

“मैं कौन हूँ, इससे क्या फर्क पड़ता है सुमति? कुछ लोग मुझे मोहन के नाम से जानते है और कुछ ने मुझे मोहिनी रूप में भी देखा है. तुम बस इस एक हफ्ते अपने भविष्य की सोचो. एक अच्छी औरत होने का कर्त्तव्य अदा करो, और सब ठीक ही होगा. गुड लक”

उस जवाब के बाद सुमति ने उस नंबर पर कॉल करने की कोशिश की. पर वो नंबर भी अधूरा दिख रहा था. +४६३. उसने ध्यान से देखा तो वो नंबर +GOD था. कोई उसके साथ खेल खेल रहा था. पर इस मेसेज ने उसे अन्दर से हिला कर रख दिया था.

ऐसा मेसेज पाने वाली सिर्फ सुमति नहीं थी. करीब उसी समय, साशा को भी ऐसा ही मेसेज ऑफिस में आया. अंजलि को भी जब वो अपनी बेटी सपना को खाना खिला रही थी. मधु के पास भी ऐसा ही मेसेज आया और अन्वेषा के पास भी. और इंडियन लेडीज़ क्लब की सभी सदस्यों को जो अब सभी उस एक रात के बाद औरतें बन गयी थी. कोई भी उस मेसेज को समझ नहीं सकी. क्या होगा एक हफ्ते में? सुमति के लिए तो वो दिन उसकी शादी के एक दिन पहले का दिन होगा.

अगले ७ दिन

z6
सांतवे दिन सुमति जब उठी तो उसे पता नहीं था कि उस रात उसके साथ क्या होने वाला था.

अगले ७ दिन, सुमति का जीवन चलता रहा. उसके घर में कई मेहमान भी आ गए थे. उसने अपना नया जीवन अब तक स्वीकार कर लिया था और वो पूरी कोशिश करती की उसके आसपास सभी खुश रहे. उसके अन्दर चल रहे द्वन्द को वो अपने तक ही सीमित रखती. और फिर सांतवे दिन जब वो सोकर उठी, तो उसे एक हफ्ते पुराना वो मेसेज याद आया. पर उसे पता नहीं था कि उस रात उसके साथ क्या होगा. वो कुछ देर बिस्तर पर ही लेटी रही, वो अभी किसी से तुरंत बात नहीं करना चाहती थी. उसने बस भगवान से प्रार्थना की कि सब ठीक हो. और फिर बिस्तर से उठकर घर में अभी अभी आये दो मेहमानों से मिलने बाहर निकल आई. उन्हें देख कर वो बहुत खुश हुई, आखिर वो दोनों अंजलि और मधुरिमा थी. वो दोनों अपने परिवार समेत सुमति की शादी में सम्मिलित होने आये थे. अंजलि, अपने पति और सास-ससुर के साथ थी वही मधु अपने पति जयंत के साथ. उन्हें देखते ही सुमति को पता चल गया था कि उन दोनों को भी सुमति की ही तरह एक मेसेज आया था. उसे एक दिलासा हुआ कि चलो आज हम तीनो उस पल में साथ रहेंगी.

उस मेसेज के बाद का एक हफ्ता अंजलि के लिए भी कुछ बदलाव लेकर नहीं आया था. उसे एक पत्नी, एक माँ और एक बहु के रूप में अपने कर्त्तव्य हमेशा की तरह निभाने थे. वो भी सब की ख़ुशी के लिए दिन रात काम करती रहती थी, बिना कोई शिकायत. वो अब ऐसी औरत बन गयी थी जो सिर्फ देना जानती है बिना कुछ किसी से मांगे. असीमित प्यार से भरी औरत बन गयी थी अंजलि. वो तब भी उतने ही प्यार से रहती जब उसका पति देर रात काम से आता और उससे शारीरिक प्रेम करने लगता चाहे वो कितनी ही थकी होती. उसने खुद को अपने पति के प्रति समर्पित कर दिया था.

शादी के घर में, उन सहेलियों के लिए प्राइवेट में समय निकाल कर उस मेसेज के बारे में बात करना थोडा मुश्किल था पर उनकी आँखें एक दुसरे से सब कुछ कह दे रही थी. दिन अपनी गति से बीत रहा था. और दोपहर में सुमति को हल्दी लगाये जाने वाली थी. हल्दी के लिए मधु ने सुमति को उसकी माँ के साथ पीले रंग की लहंगा चोली पहनाने में मदद भी की. और फिर मधु और सुमति की माँ ने मिलकर सुमति को स्टेज पर लेकर आई जहाँ उसे बैठा कर ५ सुहागन औरतें उसे हल्दी लगाने की रस्म पूरा करने वाली थी. मधु तो एक माँ की तरह ही खुबसूरत सुमति को देख गर्व से फूली नहीं समा रही थी. अंजलि पहली सुहागन थी जो सुमति को हल्दी लगाने वाली थी. सुमति जो अब एक खुबसूरत दुल्हन थी, उसने अंजलि की आँखों में देखा. दोनों सहेलियां इस मीठे खुबसूरत पल का आनंद ले रही थी. वो इस पल को हमेशा याद रखेंगी.

z9
अंजलि पहली सुहागन थी जो खुबसूरत दुल्हन को हल्दी लगाने वाली थी. दोनों सहेलियां इस पल को हमेशा याद रखेंगी.

हल्दी के बाद अब दिन जल्दी ही ख़त्म होने को आ रहा था. अब घर में मेहंदी की रस्म निभायी जा रही थी. सुमति के हाथो और पैरो पर खुबसूरत मेहंदी सजाई जा रही थी. और अंजलि और मधु उसके बगल में बैठ कर सुमति की खूबसूरती निहार रही थी. तभी अंजलि को एहसास हुआ कि उसके फ़ोन में कोई मेसेज आया है. बहुत सीधा सा मेसेज था. “क्या तुम तैयार हो आज रात के लिए अंजलि?” ये मेसेज उसी अनजान नंबर से आया था. मधु ने भी अपना फ़ोन देखा और उसमे भी वैसा ही मेसेज था. दोनों ने थोड़ी चिंता के साथ सुमति की ओर देखा जो इस वक़्त अपनी बहनों और भाभियों के संग ख़ुशी से खिलखिला रही थी. वो रात भी शान्ति से बढ़ रही थी. तब तक जब तक सब सो नहीं गए. अब वो समय आ गया था. समय का चक्र चल रहा था. पर अब कुछ होने वाला था.

अगला भाग इस कहानी का अंतिम भाग होगा. उस रात को क्या हुआ जानने के लिए ज़रूर पढ़े.

क्रमश: …

सभी भागो के लिए यहाँ क्लिक करे

< भाग १३ अंतिम भाग >

यदि आपको कहानी पसंद आई हो, तो अपनी रेटिंग देना न भूले!

free hit counter

इंडियन लेडीज़ क्लब: भाग १३

सुमति और अंजलि आज मधुरिमा से मिलने जा रही थी. क्या मधुरिमा के पास सुमति के सवालो का जवाब होगा?


यदि आपको कहानी पसंद आये, तो ऊपर दी हुई स्टार रेटिंग का उपयोग कर रेटिंग ज़रूर दे!

Click here to read in English/ सभी भागो के लिए क्लिक करे

मधुरिमा का स्वर्ग

बाथरूम से फ्लश चलने की आवाज़ हुई, और दरवाज़ा खोल कर सुमति अपनी साड़ी ठीक करती हुई बाहर निकली. “उफ़.. ये इंडियन स्टाइल के टॉयलेट में साड़ी पहनकर जाना ज़रा भी आसान नहीं होता!”, सुमति ने शिकायत भरे लहजे में कहा. वो अपनी कमर के निचे की प्लेट को हिलाकर सुधार रही थी ताकि वो अपने पहले के रूप में आ जाए. वैसे भी टॉयलेट चाहे इंडियन हो या वेस्टर्न, हमेशा से आदमी के रूप में जाने की आदत के बाद औरत के रूप में जाना तो मुश्किल ही था सुमति के लिए.

सुमति की परेशानी देखकर अंजलि जोर जोर से हँसने लगी. उसने अपने बालो का जुड़ा खोला और फिर अपने बालों को पीछे एक रबर बैंड से बाँधने लगी. “तेरी साड़ी पीछे ऊपर अटक गयी है कमर पर. ठीक कर ले वरना ऐसे ही बाहर जायेगी तो दुनिया हँसेगी हम पर!”, अंजलि ने सुमति को चेताया.

सुमति ने पीछे पलट कर देखा तब उसे पता चला कि बाथरूम के बाद पेंटी ऊपर चढाते वक़्त उसकी साड़ी और पेटीकोट उसकी पेंटी में अटक गयी थी. बड़ी ही हास्यास्पद स्थिति थी और अंजलि का हँसना रुक ही नहीं रहा था. सुमति को थोड़ी शर्म सी महसूस हो रही थी. भले ही हँसने वाली स्थिति थी, पर एक औरत के रूप में सुमति को सावधान रहना होगा भविष्य में. “आई हेट दिस!”, सुमति गुस्से में बोली, “… देख, मेरी प्लेट भी अब सही से नहीं बन रही है. मुझे खोल कर फिर से ठीक करना होगा” सुमति थोड़ी सी उदास दिख रही थी. शायद वो ड्रामा क्वीन बन रही थी पर उसकी मुसीबत असली थी.

“अब शांत भी हो जाओ मैडम. मैंने तुझे पहले भी कितनी बार समझाया है कि प्लेट की लम्बाई में दो सेफ्टी पिन का उपयोग किया कर. एक सबसे ऊपर कमर के पास और दूसरी कुछ इंच निचे. अब याद रखेगी न? इधर आ मैं ठीक कर देती हूँ प्लेट”, अंजलि बोली. अंजलि अब भी पहले की ही तरह थी, सहायता करने वाली, प्यार से भरी हुई औरत. जब वो आदमी थी तब भी उसके अन्दर एक अच्छी औरत के सारे गुण मौजूद थे. उसने सुमति की साड़ी सुधारने में मदद की और फिर उसके बाद बोली, “अब ठीक है?” वो मुस्कुरायी और सुमति की आँखों में देखने लगी. सुमति अब ठीक मूड में थी. उसने हाँ में सर हिलाया और अपनी सहेली की तरह देख कर मुस्कुराने लगी.

इसके बाद अंजलि भी खुद तैयार होने लगी. वो एक पुराने से लम्बे आईने के सामने खड़े होकर अपने बालों पर कंघी कर सुलझाने लगी, और फिर से एक रबर बैंड से उन्हें बाँध ली. “कितनी प्यारी है अंजलि!”, सुमति मन ही मन सोचने लगी. वो भगवान को शुक्रिया अदा कर रही थी कि उसे अंजलि जैसी सहेली मिली.

“तो सुमति मैडम? हम चले? मैं तो तैयार हूँ अब”, अंजलि सुमति की ओर पलट कर बोली. “तू ऐसे चलेगी? तुझे मेकअप नहीं करना है तो कम से कम साड़ी तो बदल ले. सुबह से घर के काम करते वक़्त से यही साड़ी पहनी हुई है”, सुमति ने अंजलि को लगभाग डांट ही दिया.

sb23
अंजलि ने अपने बालो का जुड़ा खोला और अपने बालो को एक रबर बैंड से बाँध कर कुछ ही मिनट में जाने को तैयार हो गयी. पर सुमति चाहती थी कि अंजलि साड़ी बदल ले..

“जैसी आपकी आज्ञा सुमति मैडम! मैं बदलती हूँ साड़ी. मुझे ५ मिनट लगेंगे बस”, अंजलि ने सुमति के गुस्से को शांत करना चाहा.

“अंजलि, तुझे याद है कि कैसे लेडीज़ क्लब में सबसे अच्छा मेकअप करना तुझे ही आता था. और आज तू नेल पोलिश तक नहीं लगायी है.”, सुमति बोली.

“मेरी प्यारी सुमति. तब मैं हाउसवाइफ नहीं थी न.. दिन में दर्जनों बर्तन धोने के बाद कोई नेल पोलिश नहीं टिकती है. समय बदल गया है. अब मेकअप के अलावा कई बातें है जो एक औरत के रूप में मुझे आनंद देती है. तो मेकअप के लिए समय निकालना अब मेरे लिए ज़रूरी नहीं है. समझ रही तू?”, अंजलि अपनी अलमारी में साड़ी ढूंढते हुए बोली. सुमति कुछ कह न सकी. अंजलि की प्राथमिकताएं अब बदल गयी थी. अब वो एक खाली समय में सजने वाली क्रॉसड्रेसर नहीं थी, अब वो एक माँ और एक गृहिणी थी जिसके लिए कपडे पहनना टाइम पास नहीं था. तब तक अंजलि ने एक नीली और ग्रे रंग की साड़ी निकाल ली. उसने सुमति को इशारा किया कि उसे साड़ी बदलने के लिए थोड़ी प्राइवेसी चाहिए.

“क्या यार…. जब तू आदमी थी तब तो नहीं शरमाई तू मेरे सामने कपडे बदलने से.”, सुमति ने चुटकी लेते हुए कहा. “हाँ तू सही कह रही है”, अंजलि ने धीमी आवाज़ में कहा. फिर थोड़ी देर बाद बोली, “तब मेरे पास बूब्स नहीं थे न छुपाने के लिए!” सुमति भी थोडा हँस दी उसकी बात सुनकर. “तब तो मेरे पास भी बूब्स नहीं थे. पर अब… हम्म… तू देखना चाहेगी मेरे बूब्स?”, सुमति बोली.

“चल हट बड़ी नटखट हो गयी है तू. मुझे तेरे बूब्स देखने की ज़रुरत नहीं है. मेरे अपने बूब्स को देख कर ही खुश हूँ मैं. ३४DD साइज़ है मेरा… पता है तुझे?”, अंजलि ने ब्लाउज पर से ही अपने बूब्स को छूते हुए कहा. “चल अब मैं ब्लाउज बदल रही हूँ. झाँकने की कोशिश मत करना”, अंजलि ने मज़ाक में कहा और अपना ब्लाउज उतारने लगी. अन्दर उसने एक बेहद ही साधारण सी सफ़ेद रंग की ब्रा पहनी हुई थी. उसके स्तन तो बेहद सुन्दर आकार के थे, पर उसकी ब्रा थोड़ी बदसूरत सी थी. अंजलि के लिए समय सचमुच बदल गया था. एक क्रॉसड्रेसर के रूप में उसके पास कई महँगी और फैंसी ब्रा हुआ करती थी. तब तो ऐसे ब्रा वो कभी न पहनती. पर अब की आर्थिक स्थिति में शायद वो यही मैनेज कर पाती हो किसी तरह. “शायद मुझे अंजलि को अच्छी ब्रा गिफ्ट करनी चाहिए.”, सुमति सोच में पड़ गयी. जहाँ तक सुमति अंजलि को समझती थी, अंजलि सुन्दर ब्रा पाकर ज़रूर खुश होगी.

अंजलि खुद इस वक़्त सोच रही थी कि अपनी सहेली के सामने कपडे बदलने में वो इतना शर्मा क्यों रही थी. सुमति के साथ तो उसने कितने बार कपडे बदले थे. शायद उसे थोड़ी सी शर्म आ रही थी कि अब उसके अन्तःवस्त्र इतने सुन्दर न थे. उसने झट से अपना पेटीकोट उतारकर दूसरा पेटीकोट पहन लिया. और फिर उसने अपनी नीली रंग की साड़ी पहनी जिस पर काले पोल्का डॉट बने हुए थे. उसका ब्लाउज उसके स्तनों पर बहुत बढ़िया फिट आ रहा था और आस्तीन भी उसकी मांसल बांहों पर बिलकुल सही फिट आ रही थी. सेक्सी दिख रही थी अंजलि. अब जब इस औरत के नए जीवन में अंजलि और सुमति लेस्बियन थी, तो अंजलि की तरह सुमति का आकर्षित होना स्वाभाविक था. पर फिर भी इस आकर्षण को काबू में रखना है, यह दोनों ने थोड़ी देर पहले ही तय किया था. सुमति इस वक़्त सिर्फ अपनी सहेली को देखकर एडमायर करती रही.

अपने कहे अनुसार, अंजलि ५ मिनट में तैयार भी हो गयी. “ओह राजकुमारी सुमति जी, मैं तैयार हूँ. मधुरिमा आंटी का घर यहाँ से १० मिनट की दूरी पर है. तो चलते है अब. मुझे फिर १ बजे के पहले वापस भी आना है. सास ससुर को खाना खिलाने.”

अपनी सहेली को तैयार देख सुमति उसके पास चल कर आई और उसके एक हाथ को पकड़ कर बोली, “किसी की नज़र न लगे तुझे”

अंजलि ने फिर अपना घर लॉक किया और दोनों सहेलियां गेट की ओर बढ़ने लगी. “अंजलि प्लीज़ एक बार मेरी साड़ी देख ले पीछे से. कहीं और अटकी तो नहीं है? बाहर सड़क पर शर्मिंदगी नहीं झेल सकूंगी मैं” सुमति अब भी चिंतित थी. “सब ठीक है. अब चल इस रास्ते जाना है”, अंजलि ने कहा और दोनों चल पड़ी.

sf04
अंजलि ने जल्दी से साड़ी बदल ली. अपने नीले ब्लाउज और काले पोल्का डॉट की साड़ी में सेक्सी लग रही थी वो. उसने घर पे ताला लगाया और दोनों सहेलियां निकल गयी मधुरिमा से मिलने के लिए.

“अंजलि तुझे याद है करीब २ साल पहले हम दोनों दोपहर में घर से बाहर औरत बनकर निकली थी?”, सुमति ने पूछा. “कैसे भूल सकती हूँ वो दिन? कितना पीछे पड़ना पड़ा था मुझे तेरे. तू तो भीगी बिल्ली की तरह घबरायी हुई थी. मेकअप में पसीने छूटे हुए थे तेरे. और ५ मिनट में तू घर वापस भी हो गयी थी.”, अंजलि ने सुमति की ओर देख कर कहा.

“अब बात को इतना भी बढ़ा चढ़ा के मत बोल. पूरे १५ मिनट बाहर थे हम!”, सुमति ने शिकायती लहजे में नखरे भरे हावभाव करते हुए कहा. “चल ठीक है. फिर भी ५ मिनट न सही पर तू १० मिनट भी बाहर नहीं थी. और डर के मारे वापस घर की ओर दौड़ कर भागते हुए तू बार बार अपनी ही साड़ी पर पैर रख रही थी. और वैसे भी ३ इंच की सैंडल पहन कर कौनसी औरत दौड़ती है भला?”, अंजलि सुमति को छेड़ रही थी.

“हाँ मैं मान लेती हूँ कि मैं एक मुर्ख औरत थी तब. पर अब देखो… हम अब दो खुबसूरत औरतें है और खुले आसमान के निचे अब हम बेफिक्र होकर घूम सकती है. मैं तो मधुरिमा माँ से मिलने को लेकर बहुत उत्साहित हूँ. कैसी है वो? तेरी बात हुई थी उनसे?”, सुमति ने पूछा. (सुमति एक क्रॉसड्रेसर के रूप में मधुरिमाँ को अपनी माँ मानती थी)

सुमति सही कह रही थी. खुली हवा में दोनों औरतें आज बेफिक्र थी. और अचानक से बहती तेज़ हवा जैसे उनसे सहमत थी. उन दोनों की साड़ी और पल्लू उस तेज़ हवा के झोंके में आज़ादी की ख़ुशी में लहराने लगे थे. उन दोनों ने जल्दी से अपने पल्लू और साड़ी को अपने हांथो से पकड़ कर संभालने की कोशिश की. वो हवा का झोंका भी जल्दी ही चला गया. उस वक़्त सड़क किनारे कुछ आदमी भी थे जो इन खुबसूरत औरतों को देख रहे थे जो उन नजरो से बेफिक्र होकर अपनी ही दुनिया में मग्न थी.

“तुझे तो पता ही है की मधुरिमा आंटी की तबियत ठीक नहीं रहा करती थी. अब भी वैसी ही है. उनकी पत्नी अजंता आंटी अब उनके पति जयंत है! तो सरप्राइज मत होना यदि जयंत अंकल मिले आज घर पर. तुझे याद है न अजंता आंटी कितनी प्यारी थी? (भाग ३ में अजंता के बारे में पढ़े) वो हमेशा हमें कितने प्यार से घर में बुलाती थी. कभी हमारी क्रॉसड्रेसिंग को लेकर हमें बुरा नहीं महसूस कराया उन्होंने. अब वो आदमी है पर पहले की ही तरह उतने ही स्वीट है वो. मधु आंटी का बेहद प्यार से ध्यान रखते है”, अंजलि ने सुमति को बताया.

सुमति को जवाब सुनकर अच्छा लगा. और फिर दोनों सहेलियां बातें करती चलती रही. और जल्दी ही मधु आंटी के घर के बाहर पहुच गयी. दरवाज़े पर अंजलि घंटी बजाने वाली ही थी कि सुमति ने उसका हाथ झटककर अंजलि को रोक लिया. “रुक न ज़रा…. एक बार देख कर बता मैं ठीक लग रही हूँ न? मेरे बाल सही है?”

“हे भगवान! तू न एक विचित्र औरत बन गयी है! महारानी सुमति आप बहुत सुन्दर लग रही है. अपने हुस्न की चिंता करना बंद करे!”, अंजलि बोली. “ऐसे भी न बोल यार… मुझे तो बस लगा कि उस तेज़ हवा में मेरे बाल बिखर गए होंगे.”, सुमति ने उदास स्वर में कहा. अंजलि ने फिर दरवाज़े पर घंटी बजायी.

और थोड़ी देर में जयंत अंकल ने दरवाज़ा खोला. और जैसे ही सुमति ने उन्हें देखा, उसे ध्यान आया की उसकी साड़ी का आँचल थोडा ज्यादा उठा हुआ है इसलिए उसकी बांयी ओर से उसका ब्लाउज और उसका उभार दिख रहा है. उसने तुरंत अपने आँचल को अपने बांये हाथ से निचे खिंचा और ब्लाउज को ढँक कर जयंत अंकल के पैर छूने को झुक गयी. “नमस्ते अंकल”, दोनों औरतों ने अंकल को प्रणाम किया. “आओ आओ बेटी. पहले अन्दर तो आओ. तुम्हारी आंटी तो तुम्हारा कब से इंतज़ार कर रही है!”, अंकल ने कहा.

और अंकल के पीछे पीछे दोनों चल दी. चलते चलते सुमति ने कुहनी से अंजलि की कमर पर वार करते हुए फुसफुसा कर बोली, “मेरा ब्लाउज बाहर दिख रहा था तूने बताई क्यों नहीं थी पहले?” अंजलि बस देख कर हँस दी. सुमति को थोडा सा अजीब लग रहा था कि उसकी प्यारी अजंता आंटी अब जयंत अंकल बन चुकी थी. और जयंत अंकल को तो कोई अंदाजा भी नहीं था कि वो कभी इतनी प्यारी ममता भरी औरत हुआ करते थे. सुमति और इंडियन लेडीज़ क्लब की औरतों की दुनिया में आया हुआ ये बदलाव हुए अब २ दिन हो गए थे, फिर भी सब कुछ किसी सपने सा ही मालूम होता था. अभी भी सुमति को यकीन नहीं होता था. भले ही इस जीवन के कुछ हिस्से उसे अच्छे लगे थे पर शायद अन्दर ही अन्दर वो चाह रही थी कि ये यदि सपना है तो जल्दी ख़त्म हो और वो अपने पहले वाले जीवन में जा सके.

“अच्छा अब तुम दोनों अन्दर जाकर आंटी से मिल लो. मैं चाय पानी लेकर आता हूँ.”, अंकल ने कहा. “अंकल जी कोई ज़रुरत नहीं है चाय पानी की. हम तो बस १० मिनट चल कर आये है. अभी तो प्यास भी नहीं लगी है.”, अंजलि बोली.

और फिर दोनों घर के अन्दर बढ़ चले उस कमरे में जहाँ मधुरिमा आंटी थी. ऐसा लग रहा था कि जैसे बस अभी अभी तैयार हुई है वो. शायद दरवाज़े की घंटी बजने पर वो जल्दी जल्दी में तैयार हुई होंगी. मधुरिमा ने पलट कर सुमति और अंजलि को देखा. उनके चेहरे पर पहले की ही तरह एक बड़ी सी प्यार भरी और शरारती मुस्कान थी.

“तो मेरी प्यारी बेटियाँ आ गई है! आओ मुझसे गले नहीं मिलोगी”, मधु ने उन दोनों को देखते ही कहा. और दोनों दौड़कर आंटी को गले लगाने आ गयी. मधु आंटी अपने आकर में इतनी बड़ी तो थी कि दोनों को एक साथ गले लगा सके. उन्होंने दोनों को माथे पे प्यार से चूम लिया जैसे एक माँ करती हो. मधु जी एक बड़ी औरत थी जिनका सीना भी बेहद बड़ा था. जब वो एक आदमी थी तब भी उनके पास बड़े स्तन थे. ये सब उनकी तबियत खराब होने की वजह से था… दवाइयों का साइड इफ़ेक्ट जिसकी वजह से उनका वजन बढ़ गया था. पर उनके मोटापे की वजह से उनका जो रूप था बड़ा मातृत्व भरा रूप लगता था. हमेशा हंसती रहती और शरारत करती रहती. सभी को उनसे गले मिलकर अच्छा लगता था क्योंकि उनके पास तब भी ममता से भरे असली स्तन थे. और फिर वो सबको अपनी हरकतों और बातों से हंसाती भी तो रहती थी.

6139190507_e4b0fa0536_o
मधुरिमा अंजलि और सुमति के लिए माँ की तरह थी.

“चलो लड़कियों, अब बैठ भी जाओ. और अपनी आंटी को अपनी पूरी जीवन कहानी सुनाओ. तुम दोनों को अपनी बूढी आंटी की याद आई, मैं तो बस इसी बात से बहुत खुश हूँ”, मधु बोली.

“बूढी आंटी? अरे आप तो अभी हॉट जवान औरत हो माँ”, सुमति ने छेड़ते हुए कहा. “जानती हूँ जानती हूँ. तुम दोनों से भी ज्यादा सुन्दर हूँ मैं. पर तुम दोनों को हीन भावना न हो जाए इसलिए कह रही थी मैं.”, मधु ने नैन मटकाते हुए कहा. ऐसे ही मसखरी करती थी वो हमेशा.

“अच्छा बताओ, कुछ कहोगी? जयंत अंकल बना देंगे तुम्हारे लिए कुछ”, मधु ने पूछा. “आंटी चिंता मत करो. हम बस अभी अभी घर से पोहा खाकर ही निकली है”, अंजलि बोली. वो अंकल आंटी को परेशान नहीं करना चाहती थी. पर तब तक अंकल चाय बिस्कुट लेकर आ गए थे. “लेडीज़, अब मैं तुम सभी को अपनी बातें करने के लिए छोड़ कर जा रहा हूँ. मुझे बाहर पौधों को पानी देना है. कोई भी ज़रुरत हो तो आवाज़ दे देना मुझे.”, अंकल न कहा. “थैंक यू अंकल”, सुमति बोली.

अब जब अंकल जा चुके थे तो मधु सुमति की ओर देख कर बोली, “सुमति बेटी, सब ठीक है नए जीवन में?” वो जानती थी कि ये अचानक आया हुआ बदलाव किसी के लिए आसान नहीं था.

“सब कुछ अच्छा है माँ! अब तो मेरे शादी भी होने वाली है. तुम्हारे बेटी दुल्हन बनने वाली है. और तुम्हे मेरी शादी में ज़रूर आना है. अपनी बेटी को सुन्दर लहंगे में देखने तो आना ही पड़ेगा तुम्हे. कोई बहाना नहीं चलेगा!”, सुमति ने ख़ुशी से मधु से कहा. वो मधु को शायद दिलासा देना चाहती थी कि सुमति अब ठीक है.

“अरे क्यों नहीं… ज़रूर आऊंगी मैं. अपनी प्यारी बेटी को खुबसूरत दुल्हन के जोड़े में देखने ऐसे कैसे नहीं आऊंगी मैं. भले मुझे अपने भारी भरकम शरीर के साथ पैदल भी चलना पड़े तो भी मैं आऊंगी.”, मधु बोली. तीनो औरतें बातें करती हुई हँस दी. पर कोई भी नए जीवन की वजह से आई हुई परेशानियों के बारे में बात नहीं कर रहा था. कुछ देर और हँसी-ठिठोली करने के बाद मधु गंभीर हो गयी.

madhu2
मधुरिमा ने सुमति और अंजलि से बैठने को कहा. वो उन दोनों से कुछ गंभीर बात करना चाहती थी.

“अंजलि, सुमति. मेरी बात ध्यान से सुनना. शायद तुम दोनों अपने दिल की बात कहने को अभी तैयार नहीं हो. पर तुम भी जानती हो कि औरत बनने के बाद से नयी कठिनाइयां आई होंगी. पर तुम दोनों हमेशा मुझ पर भरोसा कर सकती हो. मैं तुम दोनों के लिए पहले भी माँ समान थी, और आगे भी रहूंगी. तुम दोनों यदि अभी कुछ कहना नहीं चाहती हो तो न सही. पर मैं तुमसे कुछ कहना चाहती हूँ जो शायद तुम दोनों की मदद करे. ठीक है?”, मधु बोली. अंजलि और सुमति ने हाँ में सर हिला दिया. कितनी किस्मत वाली थी दोनों जो उन्हें मधु के रूप में एक माँ मिली थी जो उनकी असली माँ से ज्यादा उन दोनों के बारे में जानती थी.

“मुझे नहीं पता कि हम सब रातोरात औरतें कैसे बन गयी. और तुमने भी ये महसूस किया होगा कि हमारे आसपास की दुनिया भी कुछ बदल गयी है. हमारे अलावा किसी को याद तक नहीं कि हम कभी आदमी भी थे. सबके दिमाग में अब नयी यादें है जिसमे हम उनकी नजरो में हमेशा से औरतें थी. मुझे तो बहुत अच्छी लग रही है ये लाइफ, पर मैं पहले भी इतनी ही खुश थी अपनी लाइफ से. पर एक बात ज़रूर कहूँगी मैं. तुम्हारे आसपास के लोगो से तुम कैसे बर्ताव करती हो इस बात का ख़ास ध्यान रखना है तुम लोगो को. एक तरह से अपना भविष्य और अपना अतीत दोनों तैयार कर रहे है हम लोग. लोगो से अच्छा बर्ताव करोगी तो बदले में तुम्हारे साथ अच्छा ही होगा. और फिर बुरे बर्ताव का फल भी भुगतना पड़ेगा. यदि तुम अपने नए रूप को ख़ुशी से जीना चाहती हो तो सबके साथ अच्छे से रहो बस. बाकी सब ठीक होगा. सभी को प्यार करो और वो तुम्हे प्यार करेंगे. जो हो गया सो हो गया. वो क्यों हुआ यह हमारे हाथ में नहीं है. पर अपने भविष्य और रिश्तो को संभालना अब तुम्हारा काम है.”

सुमति ने मधु की बात ध्यानपूर्वक सुनी और फिर बोली, “माँ मुझे पूछने में थोडा संकोच हो रहा है क्योंकि ऐसी बात हमने पहले कभी नहीं की. पर आप अपने पति के साथ सम्बन्ध कैसे संभाल रही है? मेरा मतलब है… शारीरिक”, सुमति ने हिचकिचाते हुए पूछा.

सुमति का सवाल सुन मधु मुस्कुरा दी. “सुमति, अब हम उस उम्र में पहुच चुके है जहाँ शारीरिक सम्बन्ध अब बहुत कम बार बनाये जाते है. पर मेरे पति चाहे तो मैं ख़ुशी से उनकी इच्छा पूरी करूंगी. पता है क्यों? तुम्हे अजंता आंटी याद है? कितना ध्यान रखती थी वो मेरा? मेरी सेहत हो या मेरी क्रॉसड्रेसिंग… हर चीज़ में मेरा साथ दिया था उसने. और तुम दोनों को भी तो कितना प्यार करती थी वो. अब जब वो मेरे पति जयंत बन गए है, तो अब भी वो मेरा उतना ही ध्यान रखते है. पति होते हुए भी मेरी सेहत की वजह से घर का सारा काम देखते है. मैं भूल नहीं सकती कि पूरे जीवन में अजंता हो या जयंत, उन्होंने मेरा कितना ख्याल रखा है. और इसलिए कभी कभी मुझे अपना तन उन्हें समर्पित करना हो तो मेरे लिए ये कोई बड़ी बात नहीं है.”

sumati
सुमति उठ कर किचन जाकर सबके लिए पकोड़े तलने लगी. उसके दिल में इस घर से जुडी बहुत सुन्दर यादें थी.

सुमति को उसका जवाब मिल गया था. उसे याद था कि चैताली किस तरह सुमति की क्रॉसड्रेसिंग को जानते हुए भी दुनिया के लिए उसे राज़ ही रहने दिया था. यहाँ तक की सुमति को इसमें कई बार उसने सपोर्ट भी किया था. इसलिए जब चैताली से शादी की बात होने लगी थी तो सुमति ख़ुशी से मान गयी थी. और अब जब वो चैतन्य बन गयी है तो सुमति को एहसास होने लगा कि उसके दिल में अभी भी चैताली और चैतन्य के लिए प्यार है. सुमति भले इस नए जीवन में लेस्बियन बन गयी हो, पर फिर भी वो अपने होने वाले पति के प्रति प्यार और निष्ठा रखने वाली पतिव्रता स्त्री तो बन ही सकती है. क्योंकि उसके दिल में चैताली/चैतन्य के लिए प्यार जो है. कभी कभी बदलाव दिल पर भारी लग सकते है. दिमाग सब कुछ समझ रहा हो तब भी दिल के लिए भावनाओं को काबू करना आसान नहीं होता. ऐसे ही विचार अंजलि के दिल में उमड़ रहे थे. मधु की बातों ने उनकी थोड़ी तो मदद की थी ये समझने में कि वो अपने पतियों के साथ रिश्ता कैसे बनाये रखे. दोनों ही मधु की गोद में सर रखकर कुछ देर ख़ामोशी में रही. और मधु का ममता भरा प्यार जैसे उन्हें नयी उर्जा दे रहा था.

अंजलि और सुमति का मन अब कुछ हल्का हो गया था. सुमति ने कहा कि अब वो सभी के लिए पकोड़े तलेगी. इस घर से तो वो पहले से परिचित थी, इसलिए किचन में जाकर पकोड़े बनाना शुरू करने में उसे समय नहीं लगा. जब जयंत अंकल ने किचन में खटपट सुनी तो वो अन्दर आकर बोले, “अरे बेटा, ये सब तुम्हे करने की क्या ज़रुरत है. मैं हूँ न. मैं बना देता हूँ. तुम्हारे बूढ़े अंकल भी पकोड़े अच्छे बना लेते है” सुमति ने अंकल को देखा और उनके पास आकर बोली, “अंकल आपने वैसे भी मेरे लिए कितना कुछ किया है. मुझे कम से कम पकोड़े बना लेने दीजिये. आप जाकर अंजलि और आंटी के साथ बातें करिए” सुमति को वो दिन याद आ रहे थे जब अजंता आंटी ने उन्हें प्यार से बेटी के रूप में अपने दिल और घर में जगह दी थी.

सुमति जल्दी ही पकोड़े लेकर बाहर आ गयी जहाँ सभी आपस में बातें कर रहे थे. सुमति ने अंजलि की आँखों में देखा. दोनों सोच रही थी कि अब सब ठीक ही होगा. उनका दिल कह रहा था. आखिर सामने मधु और जयंत का प्यार उनके मन में एक नयी उम्मीद जगा रहा था. मधु के अन्दर जयंत के लिए शारीरिक आकर्षण न रहा हो पर उन दोनों के बीच का प्यार असीमित था. अंजलि और सुमति को उन्हें देख लगा कि उनका भी उनके पतियों के साथ ऐसा प्यार भरा रिश्ता हो सकता है. सब ठीक ही होगा.

क्रमश: …

Image Credits: Lasi_Beauty on Flickr (a beautiful crossdresser) and xossip.com

सभी भागो के लिए यहाँ क्लिक करे

< भाग १२ भाग १४ >

यदि आपको कहानी पसंद आई हो, तो अपनी रेटिंग देना न भूले!

free hit counter

Caption: The New Wife

When a man explored what it means to be a newly-wed woman …


Please use the star rating option above to rate this caption!

z2

 

English हिंदी

English

We were on our honeymoon. I don’t need to say that we both were really happy and enjoying our time as a couple. But I was really curious about one thing about my wife. You might have noticed that about other newly married women too. For some reason, it is so easy to identify a newly married woman in a crowd. I wonder what it is about them that makes them appear different from any other regular women, married or single.

May be it has to do with the way newly married women smile shyly. But why do they feel so shy? While thinking about that, I asked my wife, “Hey. Can I ask you something? Why do you feel so shy when we go out? And why do you keep blushing?” I was really curious because my wife was not a typical homely, shy or an old-fashioned girl. She used to work for an MNC and was quite an outgoing girl who wouldn’t otherwise be made to feel shy so easily. She smiled listening to my question and said, “Hmm… I can’t really explain that to you. I guess you need to experience being a newly wed woman in order to truly understand it.”

“So, help me understand. I can be a new wife for a day, and you can pretend to be a husband or whatever you want to be today”, I joked with a hope that she will let me be a woman for a day. “OK. Let’s do that!”, she said excitingly. I could not believe that she agreed! I told you she was not a typical shy woman. She saw this opportunity as some kind of a challenge that she gladly agreed to take on.

Being a cross-dresser myself who had gone out en femme before, it didn’t take me long to find a shop to buy a wig for me. And by the time I came back to our hotel room with a long hair wig in my hand, my wife had already selected a saree and a jewelry set that I would be wearing today. It was a purple saree with golden border, a very heavy designer saree to say the least. I loved it the very instant I laid my eyes on it. Deep inside, I was just waiting for the opportunity to wear it myself. But it was my wife who actually helped me wear it. So far, I hadn’t told her about my cross-dressing or the fact that I actually know how to drape a saree myself! After getting me ready, she herself wore a jeans and a t-shirt without much jewelry like she would on her regular days at work.

Soon after we both were ready, we left our hotel room and were in the city. So far, I didn’t find any reason to blush or feel shy, except for the fact that it is always thrilling for any crossdresser to go out en femme. We both were very casual as if there was nothing special about us going out as two women. We loved walking together. And after walking for a little while, my wife found a spot and said to me, “Why don’t you stand their and pose for a picture?” I really didn’t mind posing for a picture and I was ready to gladly oblige to her request. But just when I was about to walk towards the place to pose, she whispered something in my ears. She said, “You know you look really sexy in that saree. I can’t wait to get back to our hotel room and unwrap that saree from your body, and make love to you today.”

And suddenly, her words made me really conscious of my looks and my body. I began to blush, and subconsciously I folded my hands and began to smile shyly. Now, I understood why newly wed women stand out blushing! It is not just that a newly wed woman has to wear gaudy clothes and jewelry which regular women don’t wear in their daily lives, but also words like these which their husbands tell them that make them blush. After that incident, I kept blushing the whole day while we were out, whenever she looked at me with her desire-filled eyes.

And when we got back to our hotel room after a lovely day, my wife came up to me and asked, “So, did you get the answer to your question? Did you enjoy your experience as a newly-wed woman?” I looked at her with a smile on my face and said, “Yes, I got my answer. And yes!!! I loved the experience.” She smiled at me and said, “I too loved the experience of seeing you blush today.” And she hugged me.

Click here for all the captions

हिंदी

हम पति-पत्नी अपने हनीमून के लिए आये हुए थे. और कहने की ज़रुरत नहीं है कि हम दोनों कितने खुश थे. पर मेरे मन में एक सवाल था मेरी पत्नी के बारे में. आपने भी देखा होगा अपने आस पास कि कोई भी नव-विवाहिता स्त्री कैसे दूसरी औरतों से बिलकुल अलग दिखाई देती है और भरी भीड़ में भी उन्हें देख कर ही अंदाजा हो जाता है कि इनकी नयी नयी शादी हुई है. आखिर नवविवाहिता के बारे में ऐसा क्या अलग होता है?

शायद वो जिस तरह से शर्माते हुए मुस्कुराती है, उससे पता चल जाता है. पर ऐसा क्यों होता है? तो मैंने यही सोचते हुए अपनी पत्नी से पूछा, “सुनो. एक बात बताओगी? जब हम बाहर होते है तो तुम ऐसे शर्माती क्यों हो?” मैं जानने को बड़ा उत्सुक था क्योंकि मेरी पत्नी कोई ऐसी शर्मीली लड़की न थी जो कभी घर से बाहर कम ही गयी हो. एक MNC में काम करती थी वो और कितने ही बार बाहर अकेले काम पर कॉन्फिडेंस के साथ जाती रही है. फिर वो क्यों इस तरह शर्माती है? मेरा सवाल सुनकर वो मुस्कुरा दी और बोली, “हम्म… मैं तुम्हे बता नहीं सकती. तुम वैसे भी नहीं समझोगे. शायद तुम्हे एक नवविवाहिता औरत होना अनुभव करना पड़ेगा तभी तुम समझ सकोगे ये बात.”

“तो ठीक है. क्यों न इस बात को समझने के लिए मैं एक दिन नयी पत्नी बन कर गुज़ार कर देख लू. और तुम मेरे पति बन कर रह लेना या जैसे भी तुम रहना चाहो.”, मैंने मज़ाक मज़ाक में पत्नी से कहा. पर दिल में कहीं एक उम्मीद भी थी कि शायद वो इस बात के लिए तैयार हो जाए कि मैं एक दिन के लिए औरत बनकर रह सकूं. “ठीक है. तो तुम आज के लिए नयी नवेली पत्नी बनोगे.”, उसने उत्साह के साथ कहा. मुझे यकीन ही नहीं हुआ कि वो मान गयी! मैंने कहा था न कि वो कोई शर्मीली स्वभाव की लड़की नहीं थी. उसे तो इस बात में एक चैलेंज नजर आ रहा था.

क्योंकि मैं एक क्रॉस-ड्रेसर हूँ जो पहले भी घर से बाहर एक औरत के रूप में जा चूका हूँ, मुझे ज्यादा समय नहीं लगा उस शहर में विग की दूकान ढूँढने में. और जल्दी ही मैं एक लम्बे बालो को विग लेकर होटल के कमरे में वापस आ गया. और जब मैं वापस आया तो मेरी पत्नी ने मेरे लिए एक जामुनी रंग की भारी सी डिज़ाइनर साड़ी निकाल कर रखी थी जिसमें एक सुन्दर सी सुनहरी बॉर्डर थी. साथ ही साथ उसने मेरे लिए गहने भी चुनकर रखे थे. और फिर उसने मुझे साड़ी पहनाने में मदद की. उसे मैंने अब तक बताया नहीं था कि मुझे खुद को साड़ी पहनना आता है. मुझे तैयार करने के बाद वो खुद एक जीन्स और टी-शर्ट पहन कर तैयार हो गयी जैसे वो आम तौर पर अपने काम पर जाने के लिए तैयार होती. उसने आज कोई गहने भी नहीं पहने थे… बल्कि मैं ऊपर से निचे तक गहनों से लदा हुआ था.

जल्दी ही हम दोनों होटल से बाहर शहर घुमने के लिए आ गए. अब तक मुझे शर्माने या लजाने का कोई कारण महसूस नहीं हुआ. हाँ, एक क्रॉसड्रेसर के लिए महिला रूप में बाहर जाना वैसे भी रोमांचक अनुभव होता है तो वो तो था ही. और हम दोनों यूँ ही किसी भी सामान्य इंसान की तरह बाहर टहल रहे थे. कुछ देर चलने के बाद मेरी पत्नी ने एक जगह रूककर कहा, “क्यों न तुम यहाँ खड़े हो जाओ और मैं तुम्हारी तस्वीर लेती हूँ?” मैं तो ख़ुशी से फोटो के लिए पोस करने को तैयार था तभी उसने मेरे कानो में कहा, “जानू पता है तुम साड़ी में कितनी खुबसूरत और सेक्सी लग रही हो! मैं तो बस इंतज़ार में हूँ कि कब होटल वापस जाऊं और तुम्हारी साड़ी उतार कर तुम्हे प्यार करूं!” और ऐसा कहकर झट से मुझसे दूर होकर वो कैमरा लेकर मेरी फोटो खींचने लगी.

और अचानक ही, उसके शब्दों को सुनकर मैं अपने रूप और तन को लेकर ज्यादा सोचने लगी. और जाने अनजाने मन ही मन शर्माने लगी और मेरे दोनों हाथ शर्माते हुए फोटो खिंचाते वक़्त फोल्ड हो गए और मैं मुस्कुराने लगी! अब मैं समझ रही थी कि एक नवविवाहिता यूँ अलग से क्यों पहचान आ जाती है. न सिर्फ एक नयी पत्नी के कपडे एक सामान्य औरत से ज्यादा दमकिले होते है, बल्कि उनके नए पति की ऐसी बातें सुनकर वो शर्माने भी लगती है. उस पल के बाद, मैं पूरे दिन शर्म से लाल हो जाती जब भी मेरी पत्नी की हसरत भरी निगाहें मुझ पर पड़ती.

वो ख़ुशी भरा दिन बीतने के बाद जब हम दोनों वापस अपने होटल के कमरे में आये तो मेरी पत्नी ने मुझसे पूछा, “तो तुम्हे तुम्हारे सवाल का जवाब मिल गया डार्लिंग? और कैसा लगा आज तुम्हे?” मैंने मुस्कुरा कर उसकी आँखों में देखा और कहा, “हाँ मुझे मेरा जवाब मिल गया. और आज का अनुभव बहुत ही सुन्दर था.” वो भी मेरी ओर मुस्कुरा कर देखने लगी और बोली, “तुम्हे शर्म से लाल होते देखने का अनुभव मुझे भी बहुत अच्छा लगा.” और फिर हम दोनों ने एक दुसरे को गले लगा लिया.

सभी कैप्शन पढने के लिए यहाँ क्लिक करे

If you liked this caption, please don’t forget to give your ratings!

free hit counter

इंडियन लेडीज़ क्लब: भाग १२

सुमति और अंजलि की प्यार भरी कहानी. दो सहेलियां जो औरत बनने के बाद पहली बार मिल रही थी. क्या एक दुसरे के अनुभव से उनका ये नया जीवन कुछ सरल हो सकेगा?


यदि आपको कहानी पसंद आये, तो ऊपर दी हुई स्टार रेटिंग का उपयोग कर रेटिंग ज़रूर दे!

Click here to read in English/ सभी भागो के लिए क्लिक करे

अंजलि की कहानी

सुमति अगली सुबह जल्दी ही उठ गयी. उसे सुबह ८ बजे अंजलि से मिलने जो जाना था. जब से सुमति औरत बन गयी है, अंजलि ही बस एक औरत थी इंडियन लेडीज़ क्लब की जिससे सुमति संपर्क कर सकी थी, और अंजलि भी अब एक औरत बन चुकी थी. न जाने कितनी ही बातें करनी थी दोनों को. तैयार होते वक़्त सुमति सोच रही थी कि अंजलि ने उसे पारंपरिक कपडे पहन कर क्यों आने कहा है. कोई और समय होता तो सुमति ख़ुशी से साड़ी पहन कर जाती. पर कल ऑफिस में बुरे अनुभव के बाद जब ऑफिस के आदमी उसकी कमर को बुरी नजरो से देख रहे थे, इस वजह से सुमति का आज साड़ी पहनने का मन नहीं था.

सुमति ने जब अपनी अलमारी देखी तो उसमे सभी सलवार सूट में डीप कट थे जिससे उसका क्लीवेज साफ़ झलकता. अब उसके पास साड़ी पहनने के अलावा कोई चारा नहीं था. साड़ी में वो वैसे भी बहुत शालीन प्रतीत होती है, ये वो अच्छी तरह जानती थी. उसने अपनी अलमारी से बेबी पिंक और सफ़ेद रंग की साड़ी निकाली और झटपट पहनने लगी. आखिर उसे देर जो हो रही थी. उसने साथ में एक मध्यम आस्तीन का ब्लाउज पहना. और फिर खुद को आईने में देखने लगी. सब कुछ ठीक ही तो दिख रहा था. साड़ी उस पर अच्छी लग रही थी. उसने पल्लू से अपने सर को ढंका और सोचने लगी कि वो पारंपरिक दिख रही है या नहीं. वो खुद को ऐसे देख मुस्कुराने लगी. चाहे जो भी हो, अंजलि से मिलने को लेकर वो बेहद उत्साहित थी. आखिर एक अंजलि ही तो थी इस दुनिया में जो उसकी प्रॉब्लम समझ सकती थी… आखिर वो भी सुमति की तरह रातोरात औरत बन गयी थी. उसने फ़ोन देखा और अंजलि का पता नोट किया. अंजलि का घर का पता अब बदल गया था. उसे थोडा सा अचम्भा हुआ क्योंकि सुमति तो अब भी उसी घर में थी जहाँ वो आदमी के रूप में पहले थी. सुमति ने फिर भगवन से प्रार्थना की कि अंजलि सकुशल हो.

सुमति ने फिर ऑटो किया और अंजलि के घर समय पर पहुच गयी. सुबह सुबह दुनिया अब सुमति को अच्छी लग रही थी. एक नयी शुरुआत जो थी. उसने ऑटो से उतर कर ऑटो वाले को पैसे दिए और फिर कमर के निचे अपनी साड़ी की प्लेट को एक हाथ से पकड़ कर अंजलि के घर की ओर बढ़ने लगी. साड़ी को हाथ से थोडा ऊपर उठाना ज़रूरी था क्योंकि सड़क पर पानी और कीचड़ था. वो अपनी साड़ी ख़राब नहीं करना चाहती थी. घर के बाहर से ही पता चल रहा था कि अंजलि का घर किसी सामान्य घर की तरह था जहाँ बच्चे रहते हो. सुबह की गहमा-गहमी उस घर में बाहर से ही पता चल रही थी. देखने में घर काफी पुराना लग रहा था.. ऐसे मानो जैसे उस घर ने भव्य दिन देखे है पुराने समय में पर अब उसे रिपेयर की सख्त ज़रुरत थी.

sb13
सपना की प्यार भरी माँ उसके पीछे टिफ़िन लिए दौड़ी चली आई. अंजलि अब एक माँ बन चुकी थी.

“सपना, अपनी होमवर्क की कॉपी रख ली तुमने?”, सुमति ने एक चिंतित माँ की प्यार भरी आवाज़ सुनी जो अपनी छोटी सी बेटी के पीछे दौड़ी आ रही थी. “हाँ मम्मी. सब पैक कर चुकी हूँ”, उस प्यारी सी बेटी सपना ने कहा जो अपने छोटे नाज़ुक कंधो पर एक बड़ा सा बस्ता टाँगे हुई थी. “अपना लंच मत भूलना”, माँ ने कहा और सपना के पास आकर उसे उसका टिफ़िन दिया. वो माँ कोई और नहीं अंजलि थी. अंजलि अब एक ६ साल की बेटी की माँ थी! उसे देख कर अंजलि एक मध्यम उम्र की हाउसवाइफ लग रही थी. अंजलि के बिखरे हुए बालो से साफ़ पता चल रहा था कि उसकी सुबह बहुत व्यस्त रही होगी अपने परिवार का ध्यान रखने में. सुमति यह सब मुस्कुराते हुए देख रही थी. न जाने क्यों पर कई क्रॉसड्रेसर का एक हाउसवाइफ बनने का सपना होता है, और अंजलि अब वो सपना जी रही थी. पर हाउसवाइफ की ज़िन्दगी इतनी आसान भी तो नहीं होती है.

“हेल्लो सुमति आंटी”, सपना ने कहा जब उसका ध्यान घर के गेट पर खड़ी सुमति पर गया. सपना अपने स्कूल यूनिफार्म में बड़ी प्यारी लग रही थी. उसकी आवाज़ सुन कर तो सुमति के कानो में जैसे शहद घुल गया. सुमति ने झुककर प्यारी सपना को एक आंटी की तरह गले लगाया. “कैसे है मेरी प्यारी सपना?”, सुमति ने अपनी पर्स से एक चॉकलेट निकाल कर देते हुए कहा. “थैंक यु आंटी”, सपना ने ख़ुशी से कहा.

“सपना चलो अब जाने का समय हो गया है. नहीं तो बस छुट जायेगी.”, चिंतित माँ अंजलि ने कहा. साथ ही साथ अंजलि के चेहरे पर ख़ुशी का भाव भी था जब उसने सपना को सुमति आंटी को गले लगाते देखा. सुमति तो पहले भी अंजलि के यहाँ आती थी. पर तब एक आदमी के रूप में. सुमति को पता था कि अंजलि की बेटी थी, इसलिए वो हमेशा चॉकलेट लेकर ही आती थी. पर तब अंजलि एक पिता थी, माँ नहीं जिसे अब सुमति देख रही थी. और सुमति भी अंकल हुआ करती थी आंटी नहीं. पर अब दुनिया बदल चुकी थी, अच्छे या बुरे के लिए यह तो भगवान ही जाने. सपना घर से निकलकर अपनी उम्र की और लड़कियों के साथ बस स्टॉप की ओर चल दी जहाँ उसकी स्कूल बस आती थी. सुमति और अंजलि दोनों ने प्यारी सपना को विदा किया.

अंजलि सुमति को देख कर सचमुच बहुत खुश थी. आखिर उसके सबसे पक्की सहेली थी वो. उसने सुमति को गले लगाया और बोली, “वाह सुमति तुम तो और खुबसूरत हो गयी हो! तुम्हे देख कर बहुत अच्छा लगा सुमति.” इस छोटे से समय में जबसे वो औरतें बन गई थी, दोनों ये सिख चुकी थी कि औरतें एक दुसरे को गले कैसे लगाती है… बिना एक दुसरे के स्तनों को दबाये! शुरू शुरू में थोडा अजीब सा लगता है जब कोई दूसरी औरत आपकी पीठ पर गले लगाते वक़्त अपना हाथ रखती है. पर दोनों तो अपने इंडियन लेडीज़ क्लब के दिनों से इसकी आदि थी.

“तुझे पता नहीं है मैं कितनी खुश हूँ तुझे देख कर अंजलि”, सुमति ने अंजलि से अलग होते हुआ कहा. वो अब भी अपनी सहेली का हाथ पकडे हुए थी. और दोनों एक दुसरे को एक टक देखने लगी.

“बहु हम मन्दिर जाने को तैयार है. हम लोग दोपहर तक वापस आयेंगे. तब तक खाना तैयार रखना.”, अन्दर से एक बुज़ुर्ग औरत की आवाज़ आई. “मेरी सास होगी वो. वो आज मंदिर जा रही है ससुर जी के साथ प्रवचन सुनने के लिए.”, अंजलि ने कहा.

और फिर एक बुज़ुर्ग दंपत्ति घर से बाहर आये… अंजलि के सास ससुर. सुमति उनसे पहले कभी नहीं मिली थी. क्योंकि अंजलि पहले एक आदमी थी और उसके साथ उसके माता-पिता रहते थे. पर अब अंजलि अपने सास-ससुर के साथ रहने वाली औरत थी. उन्हें देखते ही सुमति ने सर पर पल्लू ओढा और उनके पैर छुए. “जूग जुग जियो बेटी”, ससुर ने कहा. “तुम्हारी शादी की तैयारी ठीक तो चल रही है न?”, उन्होंने पूछा. “जी अंकल. अब तो २ दिन में मैं घर भी जा रही हूँ तयारी के लिए.”, सुमति ने जवाब दिया. “हम भी तुम्हारी शादी में ज़रूर आयेंगे बेटी. अभी तो हमें मंदिर जाने के लिए देर हो रही है. फिर मिलते है.”, अंजलि के ससुर ने मुस्कुरा कर कहा और दोनों घर से बाहर चल दिए.

सुमति को थोडा आश्चर्य हुआ कि अंजलि की सास ने उससे एक शब्द तक नहीं कहा. पर उसे उसकी परवाह नहीं थी. “चल, मुझे अपना घर तो दिखाओ मिसेज़ अंजलि!”, सुमति ने अंजलि को छेड़ते हुए कहा. “हां हाँ क्यों नहीं. पर एक बात बता तुझे एहसास हुआ कि नहीं कि मेरी सास तुझे पसंद नहीं करती है?”, अंजलि बोली. सुमति ने अपने सर से पल्लू को फेंकते हुए और अब केयर-फ्री होकर बोली, “हाँ लगा तो सही. पर ऐसा क्यों है? वो मुझे पसंद क्यों नहीं करती है?”

“तो ऐसा है कि हमारी नयी ज़िन्दगी में तुम यहाँ पहले भी एक औरत की तरह आ चुकी हो. पर पहले तुम यहाँ जीन्स टॉप पहन कर आई थी. और मेरी सास ठहरी पुराने ख़यालात की. उन्हें बिलकुल पसंद नहीं आया. उन्हें लगता है कि तुम सपना पर बुरा असर डालोगी.”, अंजलि बोली. “ओह तभी तूने मुझे पारंपरिक कपडे पहन कर बुलाई थी. वैसे तूने ये क्या तुम तुम लगा रखा है. तू बोल! खैर अब सास को छोड़… अपनी लाइफ की सब मसाला स्टोरी सुना मुझे”, सुमति में अब एक नयी जान थी.

सुमति घर के अन्दर जाते ही सोफे पर कूद कर बैठ गयी. वो बड़ी खुश थी अब. क्योंकि पहले उन्हें औरतों के रूप में छिप छिप कर मिलना पड़ता था. पहले वो एक दुसरे के साथ देवरानी जेठानी होने का नाटक किया करती थी. पर अब असल में औरतें थी वो, तो अब छुपने की ज़रुरत नहीं थी.

“ठीक है ठीक है. जल्दी ही होने वाली मिसेज़ सुमति. मैं सब बताती हूँ. पर ज़रा मुझे घर के काम भी करने है मेरे सास-ससुर के आने के पहले. तो तू मुझे काम करते देख और मैं तुझे कहानी सुनाती हूँ. तू चाहे तो मेरी मदद कर देना.”, अंजलि ने भी मुस्कुराते हुए कहा.

“ना ! मैं तेरी इन कामो में कोई मदद नहीं करूंगी. मैं ऑफिस जाने वाली औरत हूँ… हाउसवाइफ नहीं!”, सुमति ने मज़ाक करते हुआ कहा. पर वो अंजलि की मदद करेगी, यह तो अंजलि भी जानती थी.

“तो ठीक है पहले बेडरूम से शुरू करते है”, अंजलि बोली. “वाह! बेडरूम की कहानियाँ तो मेरी फेवरेट है! अपनी हॉट रातों के बारे में डिटेल से बता मुझे!”, सुमति हँसते हुए बोली. “चुप कर पगली. मेरे कहने का मतलब है कि पहले बेडरूम की सफाई करते है.”, अंजलि ने घूरते हुए सुमति से कहा.

अंजलि का घर सचमुच बेहद पुराना था और उसमे ढेरो पुराना फर्नीचर था. कोई भी देख कर कह सकता था कि इस परिवार की आर्थिक स्थिति अब सही नहीं थी. और इतने बड़े घर की देखभाल करने वाली बस अंजलि अकेली थी. पर फिर भी अंजलि एक प्यारी हाउसवाइफ लग रही थी. सुमति ने उसे थोड़ी देर ही अपनी बेटी और सास-ससुर के साथ देखा था, पर वो समझ गयी थी कि अंजलि अब एक आदर्श बहु है. उसके चेहरे पर मोहक मुस्कान थी. अंजलि ने एक पुरानी सैटिन की साड़ी पहनी हुई थी. शायद वो घर के काम करते वक़्त ऐसी साड़ी पहनती हो, सुमति ने सोचा. इसके पहले तो सुमति ने अंजलि को सिर्फ फैंसी साड़ियों में ही देखा था.

अंजलि ने फिर झाड़ू निकाली और एक हाथ से अपने को उठाकर अपने कंधे पर ले लिया. और पल्लू के दुसरे छोर को अपनी कमर में फंसा कर काम शुरू कर दी. अंजलि के सैटिन ब्लाउज में उसके मुलायम स्तन अब साड़ी के बाहर दिख रहे थे. आम तौर पर औरतें काम करते वक़्त साड़ी को यूँ ही करती है ताकि वो काम करते वक़्त उनके बीच न आये. अंजलि बिना मेकअप और गहनों के बिलकुल घरेलु गृहिणी लग रही थी. और साथ ही एक आकर्षक महिला भी. उसके रूप में इतनी सादगी के बात भी आकर्षण था. अंजलि फिर कमरे में झाड़ू लगाने लगी. पर अंजलि को इस तरह काम करते देख सुमति को थोडा दुख हो रहा था. क्योंकि एक आदमी के रूप में, अंजलि की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी थी. और अब? सुमति अंजलि से घर की आर्थिक स्थिति के बारे में बात करना नहीं चाहती थी क्योंकि अपनी सहेली से अभी तो मिली थी वो. “अच्छा मिसेज़ अंजलि. ये तो बताओ कि माँ बनकर कैसा लग रहा है? मैं देख रही थी कि सपना कितना ज्यादा प्यार करती है तुझे.”, सुमति ने ये सवाल जान बुझकर किया था क्योंकि वो जानती थी कि इस सवाल से अंजलि बहुत खुश होगी. कोई भी माँ अपने बच्चो के बारे में बातें करके खुश होती है, और अंजलि तो अभी अभी माँ बनी थी.

अंजलि ने झाड़ू निकाल कर बेडरूम की सफाई शुरू कर दी. उसने साड़ी को इस तरह पहनी थी कि वो एक मिडिल ऐज हाउसवाइफ लग रही थी.

“सुमति तुझे पता नहीं है कि माँ बनना कितना सुखद होता है! क्रॉसड्रेसिंग से बहुत बढ़कर है माँ बनना. मैं तो चाहती हूँ कि तू भी एक दिन माँ बने! पता है तुझे कि सपना तो हमेशा से ही प्यारी बेटी थी. पर जब से मैं उसकी माँ बनी हूँ, हम दोनों के बीच का रिश्ता पहले से भी ज्यादा गहरा हो गया है. मुझे उसके लिए कुछ भी करना बहुत अच्छा लगता है… चाहे उसका लंच बनाना, उसकी चोटी बनाना, उसे तैयार करना, उसके साथ खेलना, सब कुछ. मेरी ही तरह उसे साड़ी का भी बहुत शौक है. जब तब वो मुझे साड़ी पहनाने को कहती है. पर अभी तो साड़ी के लिए वो बहुत छोटी है. तुझे पता नहीं कि न जाने कितने घंटे हम दोनों बातें करती है. वो अपनी माँ को सचमुच बहुत प्यार करती है और मैं भी उसे. वो कहती है कि बड़ी होकर मेरी ही तरह बनेगी. और पता है सबसे खुबसूरत बात क्या है इस अनुभव की? मेरा उसके लिए प्यार अब जैसे अंतहीन हो गया. माँ-बेटी का रिश्ता सचमुच बहुत प्यार भरा होता है सुमति. तू समझ रही है? अभी नहीं समझी तो माँ बनकर तू भी समझ जायेगी.”, गर्व से एक माँ अंजलि ने कहा. और साथ ही वो झाड़ू भी लगाती रही.

sj04
सुमति ने अंजलि की फर्श पर पड़े खिलोनो को समेटने में मदद की. वो सोच में पड़ गयी कि क्या वो भी कभी माँ बनना चाहेगी?

“हाँ, ये सब तो तेरी आँखों की चमक देख कर ही पता चल रहा है कि तुझे माँ बनकर कितना अच्छा लग रहा है.”, सुमति ने मुस्कुराकर कहा. और फिर उस कमरे में फर्श में बिखरे खिलौनों को उठाकर सुमति ने अंजलि की कमरे को साफ़ करने में मदद की. सपना की एक गुडिया को हाथ में पकडे सुमति उसे एक टक देखते हुए सोचने लगी क्या वो कभी चैतन्य के बच्चे की माँ बनना चाहेगी? चाहे माँ बनने का अनुभव कितना भी अच्छा हो, पर उसके लिए उसे चैतन्य के साथ वो करना पड़ेगा जिसे सोच कर ही उसे मन ही मन ख़राब लग रहा था. उसके लिए माँ बनना इतना आसान नहीं होगा. अंजलि की बात और थी, वो तो पहले से ही माँ बन चुकी थी. “तू ये बता तूने अपने होने वाले पति से बच्चो के बारें में बात की या नहीं?”, अंजलि ने बिस्तर ठीक करते हुए सुमति से पूछा. सुमति जो उस वक़्त अपने मन की उधेड़ बून में खोयी थी, अचानक अंजलि के सवाल से बाहर निकली. “नहीं, अभी तक तो हमने इस बारे में बात नहीं की है.”, सुमति ने किसी तरह जवाब दिया.

“यदि मेरा अंदाजा सही है तो जिस आदमी से तेरी शादी हो रही है वो चैताली ही है न?”, अंजलि ने अपने जीवन में आये बदलाव से सुमति के बारे में अंदाज़ लगाया. “हाँ, चैताली ही अब चैतन्य है! दिल का बहुत साफ़ है वो. और उसके माता पिता भी मुझे बहुत प्यार करते है. वो दोनों परसों आये थे मुझे दुल्हन के कपडे खरीदवाने. मुझे बहुत मज़ा आया था उनके साथ. पता है बहुत महँगी साड़ियाँ और लहंगा ख़रीदा है मैंने. तू मेरी शादी में आएगी न? शादी के दिन स्टेज में मेरी बगल में खड़ी रहना तू. समझी? यकीन नहीं होता कि मैं दुल्हन बनने के सपने जो देखती थी वो ऐसे सच होंगे”, सुमति ने कहा. जब वो अंजलि से शादी में आने को कह रही थी, उसमे कहीं एक दर्द भरी रिक्वेस्ट थी… क्योंकि सच तो यही था कि उस शादी को लेकर वो संशय में थी.

शायद दोनों सहेलियां इस बात को जानती थी इसलिए दोनों के लबो पे अब एक चुप्पी थी. “ये सब कितना अजीब लग रहा है न अंजलि. ये औरत का जीवन. मुझे पता नहीं मैं खुश रह पाऊंगी या नहीं.”, सुमति ने अंजलि से अब दिल की बात कह ही दी थी. “मैं जानती हूँ तुझ पर क्या गुज़र रही है सुमति.”, अंजलि ने प्यार से कहा.

“अच्छा मेरी छोड़.. तू बता .. हाउसवाइफ बनकर कैसा लग रहा है? हम सभी क्रॉसड्रेसर का तो सपना था हाउसवाइफ जैसे जीना. तू तो वो सपना जी रही है. बता न तुझे अच्छा लग रहा है?”, सुमति ने उचकते हुए अंजलि से पूछा. शायद अंजलि खुश हो अपने जीवन में तो वो भी सुमति को कुछ सीख देती, ऐसी सोच थी सुमति की उस सवाल के पीछे. उसका सवाल सुनकर अंजलि हँस दी.

“यार तेरा घर कितना ठंडा है.”, सुमति कहते हुए उस कमरे में बिस्तर में बैठ गयी. उसने फिर सावधानी से अपने पैरो को अपनी साड़ी से ढँक लिया. ये दोनों औरतें शुरू से ही साड़ी को हर सिचुएशन में संभालने में एक्सपर्ट थी. क्रॉसड्रेसर होते हुए भी किसी औरत से ज्यादा सहज थी ये दोनों साड़ी में. सुमति की अदाएं तो बेहद मोहक और स्त्रियोचित थी. उसने अपने बांये हाथ से अपने पल्लू को खिंच कर सामने कर अपनी गोद में रख दिया ताकि वो अपने पल्लू पर न बैठे. अंजलि तो शुरू से ही कहती थी कि सुमति एक परफेक्ट औरत है. और आज उसकी बात कितनी सही साबित हो रही थी. सुमति की नर्म सैटिन की साड़ी उसे ठन्डे कमरे में एक गर्माहट दे रही थी.

“तूने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया अंजलि”, सुमति ने फिर कहा.

“कौनसा सवाल? हाउसवाइफ के सपने वाला? इतना भी ग्लेमर भरा काम नहीं है सुमति ये. एक पत्नी के रूप में सजने सँवारने का समय नहीं होता है. ऊपर से दिन में ३ बार खाना नाश्ता बनाओ, घर की दिन भर सफाई करो, बच्चे को तैयार करो और वो भी रोज़ रोज़. और फिर सास-ससुर की सेवा सो अलग. और इतना करने पर भी किसी की तरफ से कभी कोई प्यार नहीं, सिवाय मेरी बेटी के. सच कहूं तो हाउसवाइफ होना बड़ा कठिन काम है. मैं तो ये सब ख़ुशी से इसलिए करती हूँ क्योंकि फिर मुझे मेरी प्यारी बेटी सपना के साथ समय बीताने मिलता है. मुझे गृहिणी बन कर अच्छा लग रहा है पर उस कारण से नहीं, जिस कारण से क्रॉसड्रेसर हाउसवाइफ बनना चाहते है. इस काम में ग्लैमर कम और मेहनत ज्यादा है.”, अंजलि ने कह. वो बात करते करते घर भर में बिखरी हुई चीजें समेट कर उनकी सही जगह पर रखने में व्यस्त थी. अंजलि का जीवन सचमुच में बड़ा व्यस्त था फिर भी उसके चेहरे पर एक संतुष्टि थी. उसका जीवन इतने तेज़ी से एक काम करने वाले अच्छी खासी कमाई वाले आदमी से एक थोड़ी गरीब परिस्थिति वाली औरत में बदल गया था. फिर भी एक चीज़ थी जो उसके लिए सबसे बड़ा सुख लेकर आई थी… वो था अपनी बेटी की माँ बनना.

sb11
अंजलि सचमुच एक हाउसवाइफ के जीवन में ढल गयी थी. उसने बिस्तर जमाया ताकि सुमति उस पर बैठ सके. सुमति को कमरे में ठण्ड लग रही थी तो उसने अपने पैरो को साड़ी से अच्छी तरह ढँक लिया. दोनों सहेलियां साड़ी संभालने में शुरू से ही एक्सपर्ट थी.

“तुझे भूख लगी होगी सुमति. मैं तेरे लिए नाश्ता लेकर आती हूँ. मैंने पोहा बनाया है. तुझे पसंद है ?”, अंजलि ने सुमति से कहा. “चिंता मत कर अंजलि … नाश्ता इंतज़ार कर सकता है. मैं तो तुझसे मिलने आई हूँ नाश्ता करने नहीं.”, सुमति बोली.

“चल पगली. मैं भूल नहीं सकती कि तू किस तरह इंडियन लेडीज़ क्लब की सभी औरतों के लिए खाना बनाया करती थी. मैं तो तुझे पोहा खिला ही सकती हूँ. वैसे भी तैयार है बस लेकर आना है. फिर हम दोनों बैठ कर बातें करेंगी. मैं साफ़ सफाई बाद में कर लूंगी. दोपहर का खाना मैंने पहले ही तैयार कर लिया है तो मुझे और कोई काम भी नहीं है. बस अब अपनी सहेली के साथ गप्पे मारूंगी”, अंजलि मुस्कुराते हुए बोली.

“सुबह के ८:३० बजे लंच भी तैयार? तू मज़ाक कर रही है? बेटी को तैयार करने के बाद तुझे इतना समय कैसे मिल गया?”, सुमति आश्चर्यचकित थी.

अंजलि तभी एक प्लेट पोहा लेकर आई. “मैं सुबह ४ बजे उठ गयी थी.”, अंजलि मुस्कुराकर बोली. “वैसे भी सपना और उसके पापा के लिए टिफ़िन बनाना था. वो भी सुबह जल्दी काम पर जाते है न”

“सपना के पापा! अब तुम उनका नाम भी नहीं लेती.. हा हा”, सुमति हँस दी. “वैसे मुझे अच्छी पत्नी बनने के लिए तुझसे हफ्ते भर की ट्रेनिंग लेनी पड़ेगी. मेरी शादी के बाद काम आएगी.”

सुमति को जैसे यकीन नहीं हो रहा था कि अंजलि कैसे अपने नए जीवन में ढल गयी थी. सुमति को तो फिर भी थोडा समय मिला था सब चीज़ से परिचित होने में. पर अंजलि को तो सोचने समझने का मौका भी नहीं मिला होगा. उस दिन सुबह उठते ही औरत बनते ही उसके सर पर सुबह से ही माँ, पत्नी और बहु होने की ज़िम्मेदारी आ गयी होगी. पोहा खाते हुए सुमति बोली, “हम्म ये हुआ न टेस्टी पोहा!” अंजलि सुमति को देख खुश हो गयी कि उसकी सहेली को नाश्ता पसंद आया.

sb26
अंजलि सुमति के सामने एक बेंच पर बैठ गयी और अपनी साड़ी से अपने स्तनों को ढंकने लगी. वो थकी हुई ज़रूर लग रही थी पर इस जीवन से वो संतुष्ट थी.

अंजलि सुमति के सामने एक बेंच में बैठ गयी. वो अपनी साड़ी में दमक रही थी. एक परफेक्ट हाउसवाइफ के लिए उसकी साड़ी उसकी हर चीज़ में सहायक होती है. घर की पुरानी फींकी रंग की दीवार से टिक कर अंजलि ने अपने घुटने को ज़रा ऊपर उठाया और उस पर अपना हाथ रखकर जैसे एक पल आराम करना चाहती थी वो. साड़ी ज़रा उठने को आई तो तुरंत आदतनुसार उसने उसे खिंच कर अपने पैरो को ढँक लिया. थोड़ी थकी ज़रूर दिख रही थी वो पर सन्तुष्ट भी थी. “क्रॉसड्रेसर का हाउसवाइफ का सपना”, मन ही मन सोचकर ही उसे हँसी आ गई.

“अंजलि तू बुरा न माने तो एक बात पूछू?”, सुमति ने पूछा. “अरे अब परमिशन लेगी क्या? मुझे पता है कि कल से तुझे कुछ परेशान कर रहा है. और मुझे तेरी परेशानी का कारण भी पता है. फिर भी तू ही पूछ”, अंजलि बोली. आखिर अंजलि भी तो उसी परिस्थिति से गुज़र रही थी जिससे सुमति.

“जहाँ तक मेरा अंदाजा है, जो मेरी भाभी थी पहले, वही अब तेरा पति भी है. है न? उनके साथ तेरे सम्बन्ध कैसे है?”, सुमति ने अपना सवाल पूछा. इस सवाल के बहाने वो शादी के बाद का अपना भविष्य समझना चाहती थी.

“तो मेरा अंदाजा सही था कि कौनसी बात तुझे परेशान कर रही है.”, अंजलि हँसते हुए बोली और फिर एक मिनट के लिए चुप भी हो गयी. उसने एक लम्बी गहरी सांस ली जैसे उसे समझ न आ रहा था कि इस सवाल का जवाब कैसे दे. “सुमति, तू मेरी सहेली है इसलिए तुझे बता रही हूँ. मैं कबसे किसी से इस बारे में बात करना चाहती थी पर किसी से नहीं कर सकती मैं. शुक्र है कि तू है मेरे साथ”, अंजलि बोली. उसने अपनी साड़ी का पल्लू खिंच कर अपने स्तनों को ढँक लिया. उसकी सैटिन साड़ी बेहद ही स्मूथ थी जो बार बार उसके ब्लाउज पर फिसल जाती और उसके ब्लाउज का उभार बाहर दिखने लगता. एक औरत के सामने उसके स्तनों का उभार ब्लाउज में दिखना, उसे इस बात से कोई परेशानी तो नहीं थी. वैसे भी सुमति से क्या शर्माना. पर फिर भी फिसलती हुई साड़ी संभालना तो आदत थी उसकी.

“तुझे याद है कि तेरी भाभी पहले कैसे हुआ करती थी? एक छोटे से गाँव से आई हुई डरी सहमी और बहुत ही पारंपरिक. सास-ससुर की हर एक बात माने वाली और पति को परमेश्वर मानने वाली. मैं एक पति के रूप में जो भी करती थी, वो हमेशा बिना सवाल किये मुझे सहारा देती थी. उसने मुझसे कभी नहीं पूछा कि मैं एक आदमी होते हुए साड़ी क्यों पहनती थी. मुझे लगता था कि वो मुझे समझती थी. पर सच तो ये था कि उसकी परवरिश ऐसी हुई थी कि कभी पति या सास-ससुर से कोई सवाल नहीं करना है उसे. वो तो बस अपना कर्त्तव्य मान कर मेरी हर बात मान लेती थी. इसलिए मेरे क्रॉसड्रेसर होने पर भी उसने कभी शिकायत नहीं की थी. मुझे कभी पता भी नहीं चला था कि उसके दिल में मेरे औरत बनने पर उसे कैसा लगता था. और ऊपर से ज्यादा पढ़ी लिखी भी नहीं थी वो.”, अंजलि पुरानी बातों में खो गयी थी.

सुमति को अब लगा कि उसकी सहेली अब दिल से बात कह रही है तो वो भी अब रिलैक्स हो गयी थी. और वो
अंजलि की बातें सुनती हुई बिस्तर पर लेट गयी. अपनी सहेली की उपस्थिति में अब उसकी साड़ी बिखर भी रही थी तो उसे उसकी फ़िक्र नहीं थी. इस वक़्त उसे पता था कि अंजलि अब कुछ गंभीर बात उससे कहने वाली है.

“पता है. अब तेरी भाभी मेरे पति परमेश्वर बन चुके है. और वो बिलकुल भी नहीं बदले है. पहले की ही तरह है अब बस वो एक आदमी है.” अंजलि बोली.

sj09
सुमति अब बेफिक्र होकर अपनी सहेली की बात सुनते हुए बिस्तर पर लेट गयी. उसका एक स्तन उसकी ब्रा से बाहर आ रहा था.

“मतलब?”, सुमति ने पूछा. लेटने पर सुमति का एक स्तन उसकी ब्रा से बाहर आ रहा था जिसे उसने अपने हाथो से वापस अन्दर कर दिया. सुमति को यूँ अपने स्तनों को संभालते देख अंजलि मुस्कुरा दी पर फिर जल्दी ही गंभीर होकर बोली, “मेरे पति पहले की ही तरह सोचते है. वो मानते है कि पत्नी को हर हाल में अपने पति की हर बात मानना चाहिए. पत्नी का काम बस घर, बच्चे और परिवार संभालना है उनके अनुसार. मैं जिस तरह की पति थी उसके बिलकुल विपरीत है वो. मैं तो अपनी पत्नी की जितनी हो सके मदद करती थी, पर ये बिलकुल भी नहीं करते. और हमारी घर में आर्थिक स्थिति भी थोड़ी ठीक नहीं है कि घर में कोई मदद के लिए नौकर चाकर रख ले. हम दोनों में मैं ज्यादा पढ़ी लिखी हूँ नौकरी करने लायक… पर ये और इनके माता पिता भले गरीबी में रह लेंगे पर बहु को घर से बाहर काम पर जाने नहीं देंगे. उनके हिसाब से मुझे घर साफ़ रखना और खाना बनाना ही देखना चाहिए.”, कहते कहते अंजलि की आँखों में आंसू आ गए.

“ये घर कितनी मुश्किल से चल रहा है कैसे बताऊँ मैं. मेरे ससुर की थोड़ी सी पेंशन और मेरे घर से मेरे माता-पिता जो समय समय पर पैसे भेजते है, उसके सहारे किसी तरह जीवन कट रहा है. मैं तो अपनी बेटी की छोटी छोटी छोटी इच्छाएं भी पूरी नहीं कर पाती”, अंजलि की आवाज़ अब टूट रही थी. “दिन भर काम करने के बाद फिर रात को… “, कहते कहते वो रुक गयी. उसकी बातें सुन सुमति उठ कर अंजलि की बगल में आकर बैठ गई. उसके हाथो को अपने हाथ में लेकर अंजलि के सर को अपने कंधे पर रख कर उसे सांत्वना देने लगी. बेहद भावुक पल था वो जब दो सहेलियां दिल से अपनी ज़िन्दगी बयान कर रही थी. इस वक़्त वो सिर्फ औरतें नहीं थी … वो दो दोस्त थी. सुमति अंजलि की पीठ पर हाथ फेर कर उसे सहारा दे रही थी.

“… और फिर रात को… रात को… मुझे अपना तन अपने पति को समर्पित करना पड़ता है. चाहे मैं कितनी भी थकी हुई क्यों न हो. मुझे वो अच्छा नहीं लगता है सुमति… एक आदमी का स्पर्श. मुझे बिलकुल पसंद नहीं पर उन १०-१५ मिनटों के लिए मैं बिस्तर पर लेटी रहती हूँ जब वो मेरे जिस्म का …”, अंजलि का दुख अब बाहर आ चूका था. सुमति और वो दोनों एक ही परेशानी से गुज़र रही थी.

सुमति को पता न था कि वो क्या कहे अंजलि से. ये दोनों सहेलियां बस एक दुसरे को गले लगाए एक दुसरे का हाथ थामे वहां बैठी रही. कुछ देर बाद, सुमति ने अंजलि के चेहरे को उठाकर अपनी प्यारी सहेली के चेहरे को देखा. और फिर उसने अपनी सहेली के होंठो को चूम लिया. अंजलि ने भी उसे रोका नहीं और उसने भी सुमति के होंठो को चूम लिया. उन दोनों के अन्दर की भावनाए उमड़ कर उस चुम्बन में आ रही थी. उन दोनों के नर्म होंठ एक दुसरे को चूम रहे थे. उन दोनों के गर्म और मुलायम जिस्म एक दुसरे के करीब आ रहे थे. अंजलि की सॉफ्ट सैटिन साड़ी अब सुमति की साड़ी से मिल रही थी. उन दोनों के कोमल स्तन एक दुसरे को दबा रहे थे. और सुमति के हाथ अंजलि की जांघो और उसकी कमर पर फिसल रहे थे. सुमति के स्पर्श से जैसे अंजलि के तन में आग लग गयी थी. दोनों सहेलियां एक दुसरे को चूमती रही. सुमति अब थोड़ी उत्तेजित हो रही थी. उसने अपने हाथ अंजलि के साड़ी के अन्दर से उसके ब्लाउज के ऊपर पहुँच गए और अंजलि से स्तनों को दबाने लगे. अंजलि भी जवाब में और जोरो से सुमति के होंठो को चूमने लगी. सुमति अंजलि के और करीब आकर अपने स्तनों को उसके स्तनों से दबाने लगी और अपने हाथ अंजलि के ब्लाउज के अन्दर डाल उसके स्तनों को मसलने लगी. दो स्त्रियों के कोमल जिस्म का यह मिलन बेहद उत्तेजित था. दोनों को वो चुम्बन मदहोश कर रहा था. ऐसा चुम्बन जो उन्होंने पहले कभी महसूस नहीं किया था. पर फिर भी सब कुछ कितना स्वाभाविक लग रहा था. जैसे दोनों सहेलियां एक दुसरे के लिए ही बनी थी… और दोनों के जिसमे एक दुसरे के पूरक थे. पर अचानक अंजलि ने अपने होंठो को वापस खिंच लिया और वो चुम्बन वहीँ रुक गया.

“नहीं मैं ये नहीं कर सकती सुमति”, अंजलि बोली. “क्यों नहीं कर सकती अंजलि? मैं भी शादी नहीं करना चाहती हूँ चैतन्य के साथ. अभी भी देर नहीं हुई है. हम दोनों एक नया जीवन साथ में शुरू कर सकती है. सपना भी हमारे साथ रहेगी. मैं जॉब करूंगी और सपना को हम एक बेहतर जीवन दे सकते है. सब कुछ ठीक होगा अंजलि. बस तुम मेरे साथ आकर मेरी जीवन संगिनी बन जाओ”, सुमति ने अंजलि से याचना की. पर मन ही मन वो जानती थी कि अंजलि नहीं मानेगी.

“सुमति… मुझे तुम पसंद हो. और ये सब अभी ठीक लग रहा है, पर हम आगे नहीं बढ़ सकती इस रास्ते पर. ये ठीक नहीं होगा”, अंजलि ने कहा. “क्या ठीक नहीं है अंजलि? क्या हमें एक खुबसूरत जीवन का हक़ नहीं है?”, सुमति बोली पर वो जानती थी कि अंजलि क्या सोच रही है.

“सुमति इतनी स्वार्थी न बनो. तुम्हे चैताली याद है? उसने तुम्हारा साथ तब दिया था जब तुम एक क्रॉसड्रेसर थी. तुम्हारी बचपन की सबसे अच्छी दोस्त थी वो. वो भले आज चैतन्य बन गयी होगी पर वो वही इंसान है जिसने तुम्हे स्वीकार किया था क्रॉसड्रेसर के रूप में. क्या तुम इन कामुक भावनाओं के लिए वो सब भुला कर उसे छोड़ दोगी? और सपना के बारे में सोचो… माँ बाप अलग रहेंगे तो उस पर क्या बीतेगी. मैं अपने पति को नहीं छोड़ सकती. भले आज वो जैसे भी हो पर उन्होंने मेरा साथ तब दिया था जब वो औरत थे.”, अंजलि की बात में सच था.

सुमति भी अंजलि की बात समझ रही थी. पर मनमें चल रही भावनाओं को काबू करना आसान कहाँ होता है. औरत बनना ही अपने आप में एक कठिन अनुभव रहा है अब तक. ऐसा लगने लगा था जैसे कि एक क्रॉसड्रेसर का जीवन ही बेहतर था औरत होने से तो. उसकी आँखों से आंसू बह निकले. तो अंजलि ने अपनी साड़ी के पल्लू से अपनी सहेली के आंसू पोंछने लगी.

sj03
सुमति ने उठ कर अपनी साड़ी ठीक की.

“मुझे गलत न समझना सुमति. काश मैं तुम्हारे साथ जीवन जी सकती. पर ये मेरे लिए गलत होगा कि मैं अपने परिवार को छोड़ दूं. और मुझे अपनी बेटी के भविष्य के बारे में सोचना है. मैं उसे एक परिपक्व और आज़ाद विचारों की औरत बनाना चाहती हूँ. उसे मेरे अनुभव से सीखना होगा कि औरत की जगह सिर्फ ४ दीवारों के अन्दर नहीं है. तुम समझ रही हो?”, अंजलि बोली. सुमति का चेहरा अब भी उदास था. तो अंजलि ने उसकी आँखों में देख कर कहा, “मैं चाहती हूँ कि मेरी बेटी अपनी सुमति आंटी की तरह कॉंफिडेंट औरत बने.” और सुमति मुस्कुरा दी.

दोनों सहेलियों ने एक दुसरे को एक बार फिर गले लगाया, इस वादे के साथ कि वो दोनों एक दुसरे का सहारा बन कर रहेंगे. और फिर दोनों औरतें उठ खड़ी हुई और अपनी साड़ी की प्लेट सुधारने लगी.

“सुमति.. सुन. मैंने कल मधुरिमा आंटी को बताया था कि हम दोनों आज उनसे मिलने १० बजे आयेंगे उनके घर पर. हमें जाने के लिए तैयार होना चाहिए.”, अंजलि ने कहा.

सुमति का दिल अब कुछ हल्का था. शायद ये अपनी भावनाएं व्यक्त करने का नतीजा था कि दोनों सहेलियां अब कुछ अच्छा महसूस कर रही थी. अंजलि ने सुमति को ये एहसास दिलाया था कि कभी कभी सही रास्ते पर चलने के लिए कुछ सैक्रिफाइस करना पड़ता है. अंजलि सही भी थी कि चैताली ने हमेशा सुमति की क्रॉसड्रेसिंग में साथ दिया था बचपन से, और आज तक किसी को इस बारे में बताया नहीं था. सुमति अब भला कैसे चैताली को छोड़ सकती थी सिर्फ इसलिए कि वो अब चैतन्य नाम का एक आदमी है. वो भी तो आखिर चैताली के सामने औरत बन जाया करती थी.

“अच्छा सुन अंजलि, मैं तेरा बाथरूम यूज़ करती हूँ अपना मेकअप सुधारने. मेरे आंसू से मेरा काजल फ़ैल गया होगा.” , सुमति बोली.

अंजलि सुमति की तरफ देख कर मुस्कुरा दी. और खुद तैयार होने में मगन हो गयी.

क्रमश: …

सभी भागो के लिए यहाँ क्लिक करे

< भाग ११ भाग १३ >

यदि आपको कहानी पसंद आई हो, तो अपनी रेटिंग देना न भूले!

free hit counter

इंडियन लेडीज़ क्लब: भाग १०

एक औरत और एक बहु बनकर अब तक दिन बीताने में सुमति को कोई भी कठिनाई न महसूस हुई. बल्कि वो तो बहुत खुश थी. पर बहु के साथ साथ वो पत्नी भी बनने वाली थी. क्या वो आगे भी खुश रहेगी?


यदि आपको कहानी पसंद आये, तो ऊपर दी हुई स्टार रेटिंग का उपयोग कर रेटिंग ज़रूर दे!

Click here to read in English/ सभी भागो के लिए क्लिक करे

चैतन्य के माता-पिता और सुमति के भाई रोहित को ट्रेन से विदा कर, एक दुसरे का हाथ पकडे चैतन्य और सुमति पार्किंग लॉट में खाड़ी कार की ओर बढ़ चले थे. कार के पास पहुँचने पर सुमति बड़ी सावधानी से अपनी साड़ी को उठाकर पैसेंजर सीट पर बैठ गयी. एक औरत को भी न बहुत संभल कर चलना होता है और ख़ास तौर पर जब इतने प्यार से साड़ी पहनी हो तो उसकी प्लेट तीतर-बीतर हो जाए तो किसी को भी अच्छा न लगेगा. सुमति मन ही मन आज बड़ा गर्व महसूस कर रही थी कि आज वो दिन भर साड़ी और हील वाली सैंडल पहन कर बिना किसी परेशानी के बीता सकी थी. मानो या न मानो सैंडल पहन कर इतने घंटो रहना बड़ी बात होती है. अपने सास-ससुर के साथ आज अपनी दुल्हन के लिबास की शौपिंग करके वो बड़ी खुश थी, जो उसके चेहरे से साफ़ झलक रही थी. और सुमति को खुश देख, चैतन्य भी बड़ा खुश था.

“हम्म … अब बस हम दोनों अकेले रह गए है. अब क्या करना है?”, चैतन्य ने थोडा शरारती अंदाज़ में कहा. जैसे उसके शब्दों में एक हसरत छुपी हुई थी.

“करना क्या है? अब ये भी मैं बताऊँ तुम्हे? मुझे घर ले चलो और क्या.”, सुमति ने थोड़े रूखे स्वर में कहा. जैसे कुछ देर के अन्दर उसके अन्दर का पुरुष जाग उठा था. पर बात वो नहीं थी. चैतन्य के साथ खुद को अकेला पाकर थोड़ी सी सहम गयी थी वो. चैतन्य की हसरत भरी निगाहों को देख कर उसे एहसास हो चला था कि अब वो एक औरत के तन में है जिसे पुरुष कुछ ख़ास नजरो से भी देख सकते है. और फिर चैतन्य की तो होने वाली बीवी थी वो… तो वो ऐसे देखे तो अचरज नहीं होना चाहिए था सुमति को. पर सुमति को औरत बने अभी एक दिन तक न हुआ था. कैसे समझ पाती वो यह सब? बेचारी बस थोडा असहज होते हुए अपने साड़ी के पल्ले को खोल कर अपने बदन के चारो ओर लपेट कर बैठ गयी. अपने सीने को ढँक कर रखना उसे उचित लगा.

“अच्छा राजकुमारी जी. जैसे आप कहें!”, चैतन्य ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया. जैसे उसे सुमति के रूखेपन वाले व्यवहार का अनुभव था. सुमति के लिए ये बड़ी अजीब सी स्थिति थी. चैतन्य जो कल तक चैताली नाम की लड़की था, वो उसके साथ ऐसे बर्ताव कर रहा था जैसे वो हमेशा से ही सुमति का होने वाला पति था. सुमति सोचती रह गयी कि यदि उसे याद है कि वो कल तक एक आदमी थी तो चैतन्य को क्यों याद नहीं है कि वो लड़की था? शायद ये सब एक सपना था पर चलती हुई कार से जब खिड़की से बहती हुई हवा उसके आँचल से छन कर उसके ब्लाउज में उसके स्तनों पर पड़ कर एक सिहरन पैदा करती, सुमति इस वास्तविकता को सपने के नाम पर नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती थी.

फिर भी सुमति मन ही मन उत्साहित थी. दुल्हन बनने की ख़ुशी जो थी. किस क्रॉसड्रेसर को अच्छा नहीं लगेगा ये? “एक बहु बनना इतना कठिन भी नहीं था. मेरी सास कितनी प्यारी है और मेरा कितना ख्याल रख रही थी वो मेरा आज”, सुमति कलावती के साथ बिठाये पलो को याद कर मुस्कुराने लगी. और मुस्कुराती भी क्यों नहीं आखिर इतना बढ़िया दिन जो बीता था. पर फिर भी उसे एहसास न था कि एक बहु बनने का मतलब सास के साथ सिर्फ शौपिंग करना नहीं होता है. और भी बहुत कुछ करना होता है. खैर अपनी सास के साथ उसने किचन में भी समय बिताया था. वो भी तो अच्छा ही था. पर वो एक बात भूल रही थी. किसी की बहु बनने के लिए किसी आदमी की पत्नी भी बनना पड़ता है. और वो इस बात को नज़रंदाज़ कर रही थी कि वो एक पत्नी बनने वाली है.

कार के चलने पर बहती हुई हवा में लहराती सुमति की रेशमी जुल्फें मानो उसके चेहरे पर खिलखिला रही थी. और सुमति बार बार अपनी जुल्फों को पीछे करती. उसे ऐसा करते देखना बहुत ही सुखद था चैतन्य के लिए जो चुप-चाप इस सुन्दर औरत को देख रहा था, जो कुछ दिनों में उसकी पत्नी बनने वाली थी. पर पूरे रास्ते में चैतन्य और सुमति ने एक दुसरे से ज्यादा बातें नहीं की.

जल्दी ही सुमति का घर आ गया था. सुमति ने घर का दरवाज़ा खोला और दोनों अन्दर आ गए. सुमति सोच कर चल रही थी कि चैतन्य कुछ मिनट घर में रूककर पानी वगेरह पीकर अपने रास्ते निकल जाएगा. उसे चैतन्य की उपस्थिति से ज्यादा परेशानी न थी. वो मन ही मन चैतन्य में अपनी बचपन की दोस्त चैताली को देखने की कोशिश करती पर उसके जेहन में बन रही नयी यादें उसे हमेशा चैतन्य को एक लड़के के रूप में ही दिखा रही थी.

“ओफ्फ्फ मैं तो शौपिंग करके थक गयी हूँ चैतन्य. मैं जाकर कपडे बदलती हूँ … अब और ज्यादा देर ये हील पहन कर नहीं रह सकूंगी मैं. तुम यहाँ बैठ कर पानी या सोडा लेकर पी लेना.”, सुमति ऐसा कहकर अपने कमरे चली गयी और चैतन्य बाहर के कमरे में सोफे में बैठ गया.

अपने बेडरूम में पहुँचते ही सुमति ने अपनी हील वाली सैंडल निकाल फेकी. उसके अन्दर उर्जा का नया संचार हो गया था. उसके अन्दर एक नया उतावलापन था खुद को आईने में देखने का… अपने नए बदन को निहारने का. सुमति तो आदमी के तन में भी औरत के कपडे पहनकर बहुत खुबसूरत लगती थी और अब तो उसके पास एक औरत का तन था. दिखने में सुमति लगभग पहले की ही तरह थी पर अब वो ज्यादा पतली थी, उसकी कमर और फिगर बेहद लचीला हो गया था, और अब उसका कद पहले से थोडा कम था. और तो और अब उसके बड़े और मुलायम स्तन थे और साथ ही अब उसके पास स्त्री योनी भी थी. किसी हुस्न्परी से कम नहीं लग रही थी वो आईने में और खुद को देखकर सुमति ख़ुशी से न फूली समा पायी.

सुमति ने फिर धीरे से अपना नेकलेस उतारा जो उसके नाज़ुक से गले पर बेहद जंच रहा था. और फिर कानो में पहनी भारी सी ईअर-रिंग भी उतारनी थी. उसके लिए उसने अपने बालो को पहले एक ओर कर अपने सर को एक ओर झुकाकर अपनी दुबली सुन्दर उँगलियों से उन झुमको के पीछे का स्क्रू खोलने लगी. एक क्रोसड्रेसर के रूप में तो उसे क्लिप-ऑन ईअररिंग पहनना पड़ता था जो कुछ घंटो में कानो में दर्द करने लगते थे. पर एक औरत के रूप में कानो में झुमके पहनने का अनुभव ही अलग था. सिर्फ झुमके उतारने में उसे स्त्रीत्व की अनोखी अनुभूति हो रही थी. और फिर उसने अपनी दूसरी ईअररिंग भी बड़े प्यार से निकाल ली.

ac03
सुमति ने बड़े ही नजाकत से अपने नेकलेस और झुमको को उतारा. और फिर अपनी साड़ी के पल्लू का पिन जो ब्लाउज में लगी थी उसे खोल कर खुद को आईने में देखने लगी. कितनी ही खुबसूरत लग रही थी सुमति!

अब सुमति ने अपनी ब्लाउज में लगी पिन को खोल कर अपने पल्लू को आज़ाद कर दिया क्योंकि उसे अब साड़ी जो उतारनी थी. उसे महसूस हुआ कि अब नाज़ुक दुबली उँगलियों से यह सब करना कितना आसान हो गया था उसके लिए. सचमुच की औरत होना तो सुमति को बेहद लुभा रहा था. अभी तो एक दिन भी नहीं हुआ था औरत के तन में उसे और उसे इतना सुख मिल चूका था जो एक क्रॉस ड्रेसर के रूप में इतने समय में कभी नहीं मिला. वो अपने पल्लू को पकडे खुद को आईने में देखने लगी. “बिना गहनों के भी मैं कितनी सेक्सी लग रही हूँ. मेरे स्तन भी कितने परफेक्ट है. काश अंजलि और मधुरिमा माँ यहाँ होती तो कितना मज़ा आता. पता नहीं उनके साथ क्या हो रहा होगा?”, सुमति अपनी ख़ुशी जल्द से जल्द अपनी क्रॉसड्रेसर सहेलियों के साथ साझा करना चाहती थी.

ac05
सुमति अब सिर्फ पेटीकोट और ब्लाउज पहन कर आईने के सामने खड़ी थी.

सुमति अब धीरे धीरे अपनी साड़ी को उतारने लगी. उसकी साड़ी तो मानो जैसे उसके तन से लिपट कर थी
और उसे उतारना एक खुबसूरत से गिफ्ट को खोलने के समान था जिस पर कई लेयर के गिफ्ट पेपर लपेटे हुए हो. और सुमति का तन उस पैकिंग में छुपा हुआ गिफ्ट था जो परत दर परत खुल कर दिखने को उतावला था. आज तो सुबह से ही बेचारी सुमति इतनी व्यस्त रही कि वो अपने इस औरत के तन को निहार तक न सकी थी. अब उसके पास समय था जब वो खुद को अच्छी तरह से देख सके. साड़ी को उतारने के बाद उसने अपनी साड़ी को अपनी बगल में बिस्तर में रख दी और खुद को पहली बार देखने लगी.

सुमति अब सिर्फ पेटीकोट और ब्लाउज पहने आईने के सामने खड़ी थी. “यकीन नहीं होता कि ये मेरा फिगर है! मेरी बाँहें कितनी पतली है और मेरी कमर भी पहले से पतली और लचीली हो गयी है. मेरे कुल्हे तो कितने बढ़ गए है! इतना बड़ा तो कभी हिप पैड पहन कर भी नहीं कर पायी थी मैं! और मेरे स्तन! हाय! मेरे ब्लाउज में कितने अच्छे लग रहे है. न जाने मेरा ब्रा साइज़ क्या है? मुझे अपनी ब्रा में देखना पड़ेगा”, सुमति अपने तन को देखते हुए सोचने लगी. सब कुछ सपने सा था. “यदि ये सपना है तो मुझे कभी इस सपने से न जगाना”, उसने खुद से कहा. उसे पता नहीं था कि जाने अनजाने कितनी बड़ी गलती कर रही थी वो ऐसा सोचकर.

खुद की ब्रा के बारे में सोचते हुए उसके मन में अब अपने स्तनों को देखने की इच्छा जागृत हुई. होती भी क्यों न? हम सभी क्रॉस-ड्रेसर को तो नकली स्तनों के साथ भी पूर्ण स्त्री का एहसास हो जाता है, और फिर सुमति के पास तो अब असली स्तन थे. अब वो एक बार अपने स्तनों को दबाकर देखना चाहती थी कि क्या वाकई में उसमे वो सुख है जैसे हम सभी सोचते है. सुबह कपडे बदलते वक़्त उसके पास यह करने का समय नहीं था, पर अब तो उसके पास बहुत समय है. आज तो दिन में जब वो साड़ी की दूकान में लहंगा चोली ट्राई करने गयी थी, उसके दिन में तो उसी वक़्त अपनी ब्रा उतारने के बाद यह करने की इच्छा थी पर उसे पता नहीं था कि क्या पता क्या नतीजा होता ऐसा करने पर. इसलिए उसने अपनी इच्छाओं पर उस वक़्त काबू रखना ही मुनासिब समझा था. वैसे भी उस वक़्त लहंगा और साड़ी की खरीददारी में ही इतना मज़ा आ रहा था कि स्तनों की तरफ ध्यान देने की ज़रुरत भी नहीं तो थी सुमति को. यही सब सोचते हुए उसे अचानक कुछ ध्यान आया. ट्रायल रूम में जब वो लहंगा चोली उतारकर फिर से साड़ी पहनने गयी थी, तब वो वापस से ब्रा पहनना भूल गयी थी! उसकी ब्रा अब तक उसकी पर्स में रखी हुई थी. “ओह माय गॉड! मैं अपने सास-ससुर के सामने बिना ब्रा के ही घूम रही थी! मैं भी कितनी बेवकूफ हूँ.”, वो सोचने लगी. अच्छा हुआ था कि उसका साड़ी ब्लाउज काफी सही फिट वाला था जो उसके स्तन उसके ब्लाउज के अन्दर झूल नहीं रहे थे. वरना बाहर किसी और के सामने स्तनों का ऐसा झुलना उचित नहीं माना जाता है. सुमति भी अब एक औरत की तरह ही सोचने लगी थी.

ac06
सुमति ने सामने झुककर आईने में अपने क्लीवेज को देखा. और फिर उसने धीरे से अपने ब्लाउज के हुक खोलने शुरू किये. उसके स्तन तो मानो उसके टाइट ब्लाउज से बाहर निकलने को बेताब दे.

सुमति ने फिर अपने ब्लाउज में अपने क्लीवेज को देखा. वो मन ही मन मुस्कुराने लगी अपने उन दिनों को याद करके जब से टेप का उपयोग करके दर्द के साथ क्लीवेज बनाना पड़ता था. उस टेप को वापस त्वचा से उखाड़ने में जो दर्द होता था सो अलग. और अब देखो, उसके पास इतना गहरा क्लीवेज है. वो झुककर पास से अपने क्लीवेज की गहराई को देखने लगी. और फिर अपनी उँगलियों से क्लीवेज के बीच अपनी ब्लाउज की नैक को थोडा निचे खींचते हुए और अच्छे से देखने की कोशिश करने लगी. “हाय दैया! कितने बड़े और मुलायम स्तन मालुम होते है मेरे.”, खुद ही के स्तनों को अपने हाथो से छूते हुए सुमति शर्मा भी रही थी, इतने बड़े स्तन थे कि उसकी हथेली में न समा सकते थे वो. और फिर ऐसे लग रहे थे जैसे उसके टाइट ब्लाउज से बस वो खुद ब खुद बाहर निकल आयेंगे. खुद को दिल और दिमाग दोनों से खुबसूरत और सेक्सी महसूस करते हुए, सुमति अपने ब्लाउज के हुक धीरे धीरे खोलने लगी. “मेरे निप्पल कौनसे रंग के होंगे, हलके भूरे, गहरे भूरे या गुलाबी?”, मन भी न कैसे कैसे सवाल जगाता है. बेचारी सुमति सुबह इतनी जल्दी में थी कि अपने निप्पल के रंग तक को ठीक तरह से नोटिस नहीं कर सकी थी. सुबह सुबह उसके जीवन में इतना बड़ा परिवर्तन जो आ गया था. पर अब उसके पास खुद के स्तनों को देखने का भरपूर समय था.

वो धीरे धीरे अपने नए तन का आनंद ले रही थी. उसे अब कोई जल्दी नहीं थी. और अब वो वक़्त आ गया था जब वो खुद को पूरी तरह से देख सकेगी. उसने अपने ब्लाउज को उतारा और उसकी आँखों के सामने सुन्दर सुडौल उसके स्तन थे. देखने से ही प्रतीत होता था कि कितने मुलायम होंगे वे. हाय! कितना सुन्दर आकार था उनका और साइज़ भी ऐसा कि दिल करे कि उन्हें तुरंत पकड़ कर कुछ करने लगे. इतने नशीले झूमते स्तनों को चूम कर तो कोई भी लकी बन जाता. पर सुमति के पास अब बस यही तो कमी थी… उसके स्तनों को कोई प्यार से छूने वाला या चूमने वाला न था. पर किसी और की क्या ज़रुरत है? क्या सुमति खुद अपने स्तनों के साथ नहीं प्यार से खेल सकती?

ब्लाउज के उतारते ही सुमति के नर्म, मुलायम, बड़े, सुन्दर और सुडौल स्तन अब उसकी आँखों के सामने थे.

खुद के इतने सुन्दर स्तनों को देखकर सुमति को बड़ा गर्व महसूस हुआ और वो सोचने लगी, “अब यही क्यों रुकना? अब मुझे पेटीकोट उतारकर अपनी पूरी फिगर देखनी चाहिए!”, सुमति ने सोचा और फिर अपने पेटीकोट का नाडा खोलने लगी. पर अब आईने से मुंह फेरकर ऐसा करने लगी. शायद खुद को पहली बार नग्न देख कर सुमति लजा रही थी. और फिर धीरे धीरे अपने पेटीकोट को निचे सरकाने लगी. सुमति हर चीज़ धीरे धीरे कर रही थी क्योंकि अपने तन और स्त्रीत्व का आनंद लेना है तो वो धीरे धीरे कर कर लेने में ही सबसे ज्यादा सुख देता है. यह तो वो आदमी के तन में जब थी, तबसे जानती थी. और फिर आज तो उसकी टाँगे और जंघा इतनी चिकनी थी जैसे रेशम. दिन में जब भी वो अपने पैरो को क्रॉस करके एक के ऊपर एक करके बैठती थी… उसे तुरंत एहसास होता था कि कितनी चिकनी टाँगे है उसकी. और इन्ही चिकनी स्मूथ टांगो पर उसका पेटीकोट भी इतने प्यार से धीरे धीरे खुद ब खुद फिसलने लगा. वो मन ही मन शर्माने लगी… पर खुद को निहारने में मशगुल सुमति कुछ भूल रही थी. उस घर में उसके अलावा भी एक और शख्स था. चैतन्य बाहर के कमरे में सब्र के साथ सुमति का इंतज़ार कर रहा था, पर सुमति आधे घंटे से अब तक बाहर नहीं आई थी.

और फिर सुमति का इंतज़ार करते हुए थक जाने के बाद चैतन्य सुमति के कमरे में दरवाज़ा खोल कर दाखिल हुआ. और चैतन्य से बिलकुल बेखबर हो सुमति उस वक़्त लगभग नग्न अवस्था में थी. उसका पेटीकोट अब उसके घुटनों तक नीचे आ चूका था और ऊपर ब्लाउज तो वो पहले ही उतार चुकी थी. और क्योंकि वो आईने के विपरीत दिशा में देख रही थी, उसके खुले स्तनों के साथ वो चैतन्य की आँखों के सामने थी. और फिर चैतन्य को कमरे में देख कर वो गुस्से से आग बबूला हो उठी. “चैतन्य… तुम्हे शर्म हया है या नहीं? तुम्हे सुबह भी कहा था मैंने कि किसी के कमरे में आने के पहले दरवाज़े पर दस्तक देनी चाहिए.” सुमति चीख उठी. किसी तरह अपने पेटीकोट को जल्द से जल्द ऊपर उठा कर वो नाडा बाँध रही थी. और तब तक चैतन्य को सुमति के सुन्दर स्तनों का खुबसूरत नज़ारा देखने मिल रहा था. “कितने बेशर्म हो तुम. कम से कम अपनी आँखें तो बंद कर लो.”, सुमति लगभग रो पड़ी थी … उसकी आवाज़ काँप रही थी पर उसका गुस्सा बहुत बढ़ चूका था. गुस्से में उसके हाथ भी काँप रहे थे. शायद उसकी आँखों में एक-दो बूँद आंसूओं के भी थे.

सुमति ने फिर झट से अपनी बिस्तर पर पड़ी अपनी बेतरतीब साड़ी को उठाकर किसी तरह अपने सीने के सामने रख कर अपने स्तनों को छुपाने लगी. “निकल जाओ इस कमरे से तुरंत अभी. अब जाओ भी!”, सुमति एक बार फिर गुस्से से चैतन्य पर बरस पड़ी. पर चैतन्य मुस्कुरा रहा था.

“कम ऑन सुमति. ऐसा तो है नहीं कि मैं पहली बार तुम्हे बिना कपड़ो के देख रहा हूँ”, चैतन्य ने मुस्कुराते हुए कहा. “तुमने… तुमने मुझे बगैर कपड़ो के कब देखा?”, सुमति को यकीन नहीं हुआ. पर इस नयी दुनिया में कुछ भी यकीन करने लायक नहीं था वैसे भी.

चैतन्य उसके करीब आया और उसकी दोनों कलाइयों को पकड़ कर उसके और पास आ गया. सुमति अब चैतन्य की साँसे अपने तन पर महसूस कर सकती थी. और चैतन्य की मजबूत पकड़ के साथ उसके हाथ से उसकी साड़ी छुट गयी. और चैतन्य उसके और करीब आ गया. सुमति के स्तन अब चैतन्य के शरीर को छू रहे थे. “तुम भूल गयी उन पलों को जब हमने कई बार एक दुसरे के साथ प्यार किया था?”, चैतन्य ने कहा और आगे बढ़कर सुमति की कमर पर हाथ रख कर उसे अपने और करीब खिंच लाया. “नहीं… ये सच नहीं है.”, सुमति ने चैतन्य की बात को झुठलाना चाहा पर उसकी आवाज़ अब बेहद धीमी थी. ये स्थिति ही कुछ असहज थी सुमति के लिए… वो तो सपने में भी एक पुरुष के साथ शारीरिक सम्बन्ध के बारे में नहीं सोच सकती थी.

“क्या हो गया है तुम्हे सुमति? तुम कैसे इस बात को झुठला सकती हो? तुम ही तो थी जिसने सेक्स के लिए पहला कदम आगे बढ़ाया था. याद है जब कॉलेज के पहले साल के बाद तुम जब छुट्टियों में घर आई थी और…”, कहते कहते चैतन्य के होंठ सुमति के होंठो के काफी करीब आ गए थे. और सुमति उसकी आँखों में देखते रह गयी. जिस तरह से चैतन्य कह रहा था वो झूठ तो नहीं लग रहा था.

फिर भी सुमति कैसे मान लेती इस बात को. “नहीं ये सच नहीं हो सकता”, सुमति ने कहा और अपनी आँखें बंद कर ली. एक बार फिर उसके सर में चुभने वाला एक तेज़ दर्द हुआ. एक बार फिर उसके दिमाग में नयी यादों का जन्म हो रहा था. उस दर्द के साथ उसे याद आ रहा था वो गर्मी का मौसम जब उसने चैतन्य के साथ सेक्स के लिए खुद पहला कदम बढाया था. उस वक़्त उसके घर में कोई नहीं था. उसे सब कुछ ऐसे याद आ रहा था जैसे सब कुछ सचमुच उसके साथ ऐसा हुआ था. पर कल तक तो वो आदमी थी… फिर भी ये नयी यादें तो इस नयी दुनिया का सच थी. उसे याद आ रहा था कि कैसे सेक्स के वक़्त वो चैतन्य पर हावी थी और चैतन्य बस सुमति का साथ दे रहा था. पर सुमति ने ऐसा क्यों किया था?

अब तक चैतन्य के होंठ सुमति के होंठो को चूमने लगे थे. सुमति के कोमल चेहरे चैतन्य की हलकी हलकी दाढ़ी के बाल उसे चुभ रहे थे. सुमति ने अपनी कलाई चैतन्य के हाथो से छुडानी चाही पर उसकी मजबूत गिरफ्त से वो आज़ाद न हो सकी. वो महसूस कर सकती थी कि चैतन्य के शरीर का निचला हिस्सा अब उसके तन से और करीब आ रहा है. कुछ होता देख कर सुमति ने अपनी पूरी जान लगाकर चैतन्य को एक बार धक्का देकर अपने से दूर किया.

पर चैतन्य इतने सब के बाद अब रुकने के मूड में न था. उसने सुमति को पलटकर उसकी दोनों कलाइयों को पकड़ लिया और फिर सुमति की पीठ पर चूमने लगा. फिर उसने सुमति की कमर को अपने हाथो से लपेट लिया और उसे फिर अपनी बांहों में खिंच लिया. मदहोशी में ही उसने सुमति से कहा, “तुम कैसे भूल सकती हो हमने न जाने कितनी बार प्यार किया था? मैं तो हमारी शादी तक रुकना चाहता था पर तुम ही तो थी जो मुझे बार बार अपने करीब खिंच लाती थी. और अब तुम्हे ऐसे देखकर मैं खुद को कैसे रोकूंगा सुमति?” चैतन्य अब जोरो से सुमति की गर्दन पर चूमने लगा.

“प्लीज़ रुक जाओ चैतन्य.”, सुमति ने उससे भीख मांगी. पर चैतन्य तो सुमति के शरीर पर हाथ फेरते हुए और बेताब हुए जा रहा था. और फिर उसके हाथ सुमति के स्तनों को पकड़ कर जोरो से मसलने लगे और वो खुद सुमति की गर्दन को चूमता रहा. और अपने निचले तन से सुमति के कुलहो पर जोर देने लगा. अबसे कुछ मिनट पहले की ही तो बात थी जब सुमति खुद अपने स्तनों को दबवाना चाहती थी पर ऐसे तो नहीं? चैतन्य का लिंग सुमति को अब अपने कुलहो में पीछे महसूस होने लगा था. वो बस किसी तरह चैतन्य की गिरफ्त से निकलना चाहती थी. अन्दर ही अन्दर रोती हुई सुमति के लिए यह सब इतना तेज़ी से हो रहा था कि वो सोच भी नहीं पा रही थी. उसे पता भी नहीं था कि जो हो रहा है उसके साथ उसे पसंद भी आ रहा है या नहीं… या उसकी नयी यादो में उसे कभी ये पसंद भी रहा होगा?

ac10
जब सुमति अपना पेटीकोट उतार रही थी, तभी चैतन्य उसके कमरे में आ गया था.

सुमति को पता चल गया था कि चैतन्य अब अपनी बेल्ट खोल रहा था. वो जानती थी कि अब उसके साथ क्या होने वाला है. क्या वो उसे रोक पाएगी? वो सोचती ही रही कि चैतन्य अपनी पेंट निचे कर अपने लिंग को सुमति के कुलहो के बीच की दरार में जोर से दबाने लगा. उसने एक बार फिर सुमति के स्तनों को अपने हाथो से जोर से मसला. और फिर सुमति को निचे झुकाकर उसने सुमति के पेटीकोट को उतार दिया. आज चैतन्य सुमति पर हावी हो रहा था… अपनी वासना में एक पल के लिए भी उसने नहीं सोचा कि सुमति क्या चाहती है. उसने अपने जोश में सुमति की पेंटी निचे उतार दी और फिर उसने वही किया जो हर आदमी इसके आगे करता है. “आआआ..आ.हहह”, ये आवाज़ सुमति के उन्माद की न थी बल्कि दर्द में निकली एक कराह थी. चैतन्य का लिंग सुमति की योनी के लिए काफी बड़ा मालूम हो रहा था. औरतों को तो अपने अन्दर पुरुष लिंग को लेना अच्छा लगना चाहिए न? पर सुमति को तो ऐसा नहीं लग रहा था. वो दर्द में थी और अन्दर ही अन्दर रो रही थी और चैतन्य उसकी भावनाओं को समझे बगैर एक वहशी की तरह सुमति के स्तनों को दबा रहा था.

पर अचानक ही जैसे चैतन्य को होश आया. उसे समझ आ रहा था कि कुछ गलत हो रहा है. सुमति आज वैसी नहीं थी जैसे वो उसे जानता था. प्यार करते वक़्त सुमति कभी इस तरह से नहीं रहती थी. उसने झट से अपने लिंग को खिंच लिया. “आई ऍम सॉरी सुमति यदि मैंने तुम्हे दर्द दिया हो तो. मुझे तुम्हारे साथ ज़बरदस्ती नहीं करनी चाहिए थी. मैं कभी तुम्हारे साथ ज़बरदस्ती नहीं करूंगा. मुझे माफ़ कर दो सुमति. मैं दुबारा कभी ऐसा नहीं करूंगा.” न जाने चैतन्य को क्या हुआ और वो बदहवासी में सुमति से माफ़ी मांगने लगा. अभी जो हुआ ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था उन दोनों के बीच. वो अन्दर ही अन्दर परेशान हो उठा. आज न जाने कैसे सुमति को अपनी आँखों के सामने नग्न देख कर वो बेकाबू हो गया था. उसे अपने किये पर शर्म आने लगी और बस तुरंत सुमति के बेडरूम से बाहर जाने लगा.

और सुमति? सुमति तो बिस्तर पर अपना चेहरा गडाए अपने पेट के बल लेटी रह गयी. उसका पेटीकोट अब भी उसके घुटनों निचे था और उसकी पेंटी भी निचे सरकी हुई थी. और उसकी आँखों में आंसूओं की मोटी मोटी बूँदें थी. अब उसे सब कुछ याद आ गया था. उसकी नयी यादों में जिसमे वो हमेशा से औरत थी, वो कभी भी पुरुषो की तरफ आकर्षित नहीं थी… उसे कभी भी पुरुष के साथ सेक्स करने की इच्छा नहीं हुई थी. और वो पल जब उसने चैतन्य के साथ प्यार किया था, वो सिर्फ इसलिए था क्योंकि वो जानना चाहती थी कि क्या वाकई में वो पुरुष को पसंद नहीं करती है. अपने नए जीवन में भी सुमति पहले की तरह सिर्फ और सिर्फ औरतों की तरफ आकर्षित होती थी. शायद इसलिए वो चैतन्य पर हावी होकर सेक्स करती थी ताकि वो हर तरह से देख ले कि उसे कोई आदमी सुख दे सकेगा या नहीं. भले अपने नए सच को जानने के लिए उसने चैतन्य का इस्तेमाल किया था पर उन पलों में चैतन्य सुमति के साथ भावुक रूप से जुड़ गया था.

एक औरत के रूप में नयी ज़िन्दगी इतनी सुन्दर भी नहीं होगी जितना सुमति ने सोची थी. आज दुनिया में हर कोई सुमति को सिर्फ और सिर्फ एक औरत के रूप में ही जानता है. पर सिर्फ सुमति ये सच जानती है कि वो एक पुरुष के रूप में जन्मी थी और कल तक एक आदमी थी. वो असली जीवन में एक क्रोस-ड्रेसर थी. पर अब इस नयी दुनिया में तो उस आदमी के अस्तित्व के बारे में भी किसी को नहीं पता. न जाने ये कैसी माया कैसा जादू था… सुमति अब तक नहीं समझ सकी थी इस बात को. पर एक बात वो समझ गयी थी. भले ही तन से वो आज एक पूरी औरत थी पर दिल-दिमाग से वो आज भी कल तक वाली आदमी थी जो एक क्रॉसड्रेसर था. उसका दिमाग भले स्त्रियों की हर चीज़ की तरफ आकर्षित था, वो सब कुछ औरतों की तरह करना चाहती थी पर शारीरिक रूप से भी वो सिर्फ औरतों के तरफ आकर्षित थी…. पुरुष की तरफ नहीं. अब इस नयी दुनिया में वो एक अच्छी बहु तो बन सकती थी पर कभी एक अच्छी पत्नी नहीं बन सकती थी. वो जानती थी कि भले वो घर एक कुशल गृहिणी की तरह संभाल सकती थी पर वो कभी अपने पति को तन का सुख नहीं दे सकती थी. ये औरत का शरीर जो एक घंटे पहले तक एक वरदान लग रहा था … अब सुमति को वही तन एक श्राप लग रहा था. इस नए सच को जानकर सुमति की आँखों से अश्रुधरा बह निकली. क्या एक क्रॉसड्रेसर के रूप में उसकी ज़िन्दगी इस औरत की ज़िन्दगी से बेहतर थी? ये सवाल रोती हुई सुमति के मन में घूम रहा था.

क्रमश: …

सभी भागो के लिए यहाँ क्लिक करे

< भाग ९ भाग ११ >

यदि आपको कहानी पसंद आई हो, तो अपनी रेटिंग देना न भूले!

free hit counter

इंडियन लेडीज़ क्लब: भाग ९

हर क्रोसड्रेसर का एक सपना होता है कि वो एक दिन दूल्हन की तरह सजे. जितना मज़ेदार दुल्हन बनना होता है, उतना ही मज़ा दुल्हन की शौपिंग करने में आता है. और सुमति वो सुख पाने वाली थी. आज वो उन दुकानों में जायेगी जहाँ रंग बिरंगी साड़ियाँ उसे दिखाई जाएँगी.


यदि आपको कहानी पसंद आये, तो ऊपर दी हुई स्टार रेटिंग का उपयोग कर रेटिंग ज़रूर दे!

Click here to read in English/ सभी भागो के लिए क्लिक करे

किसी दिन दुल्हन बनने का हर क्रॉस-ड्रेसर का सपना होता है. और उसके लिए साड़ी खरीदने जाना तो होने वाली दुल्हन के लिए सबसे यादगार पलो में एक होता है!

हर क्रॉस-ड्रेसर का एक सपना होता है कि किसी दिन वो भी सोलह श्रृंगार करके दुल्हन बनेगी. जहाँ दुल्हन बनना अपने आप में एक अप्रतिम सपना है, उतना ही यादगार होता है एक दुल्हन के कपड़ो के लिए शौपिंग करना. वो ख़ुशी जो उन दुकानों में मिलती है जहाँ रंग-बिरंगी चमचमाती महँगी साड़ियाँ और लहंगे सजे होते है, जहाँ औरतें अपने जीवन के सबसे यादगार दिन के लिए कपडे खरीद रही होती है, वो ख़ुशी भी अलग ही होती है. वहां होने वाली दुल्हन को सबसे महँगी साड़ियों को छूने मिलता है जो वो अपने जीवन में फिर कभी नहीं पहनती. उन साड़ियों को छूकर पकड़ कर, और फिर दूसरी औरतों से बातें करते हुए उनकी शादी के दिन के किस्से सुनती हुई होने वाली दुल्हन सबके ध्यान का केंद्र होती है. आखिर कैसे भूल सकती है कोई वो अनुभव? शादी के दिन के लिए होने वाली दुल्हन सबसे भारी, सबसे सुन्दर, सबसे चमकीली, और सबसे महँगी साड़ी और लहंगा ट्राई करके देखती है उन दुकानों में. और आसपास की सभी औरतें होने वाली दुल्हन को सब करते निहारती है.. उसकी सुन्दरता को देख आन्हें भरती है. हर बार जब दुल्हन नया लिबास पहनती है तो सभी औरतों की आँखें चमक उठती है. फिर कोई तारीफ़ करती है या कोई नुख्स निकालती है पर दुल्हन सबकी बातें सुनकर बड़ी सी मुस्कान के साथ शर्माती भी है. उसका चेहरा ख़ुशी से दमक रहा होता है, और सभी औरतें उस दुल्हन की तरह अपने दिनों को भी याद करती है. दुर्भाग्य से ऐसा मौका सभी क्रॉसड्रेसर को नहीं मिलता. पर सुमति, वो ये सब कुछ अनुभव करने वाली थी जो उसके जान पहचान की किसी भी क्रॉसड्रेसर को अनुभव करने नहीं मिला था.

ऐसा नहीं था कि सुमति कभी साड़ी की दूकान नहीं गयी थी. पर हर बार वो वहां उस आदमी के रूप में गयी थी जो अपनी पत्नी, गर्लफ्रेंड या माँ के लिए साड़ी लेने का बहाना बनाता था. कई बार मुश्किल होता था सेल्स गर्ल को समझाना कि क्यों वो साड़ी चुनने में इतने नखरे दिखा रही है… कि आखिर उसे कौनसी और कैसी साड़ी चाहिए उसके बारे में उसे इतने अच्छे से पता है. सेल्स गर्ल जहाँ सोचती थी कि इस आदमी को साड़ी बेचना आसान होगा, वहीँ सुमति आदमी के रूप में भी किसी औरत से कम समय नहीं लेती थी. घंटो साड़ियाँ देखने के बाद ही एक साड़ी चुनती थी वो भी. पर आज उसे कोई बहाना करने की ज़रुरत नहीं है. क्योंकि आज वो ख़ुशी से कह सकती थी कि वो अपने लिए साड़ी खरीदने आई है. सोच कर ही वो इतना खुश थी कि वो तो भूल ही गयी थी कि वो दुल्हन एक मर्द के लिए बनेगी.

सुमति अब मार्किट की उस गली में थी जो शादी-ब्याह की साड़ियों की दूकान के लिए प्रसिद्ध थी. वो अपने सास-ससुर कलावती और प्रशांत के साथ चल रही थी. रोहित और चैतन्य उनके पीछे पीछे थे. वो इस गली में पहले भी आ चुकी थी. और हर बार वो दुकानों में सजे खुबसूरत लहंगे और साड़ियों को देख कर मोहित हो जाती थी. उसी की तरह उस वक़्त उस गली में न जाने कितनी होने वाली दुल्हने इकठ्ठा थी जो अपने परिवार के साथ खरीददारी करने आई थी. हवा में ही वो ख़ुशी साफ़ महसूस की जा सकती थी. सबके चेहरे पर वही ख़ुशी थी जो इस वक़्त सुमति और कलावती के चेहरे पर थी.

एक सेल्समेन खुद पर साड़ी चढ़ा कर औरतों को दिखा रहा था. एक आदमी के रूप में सुमति भी कई बार सोचा करती थी कि ये सेल्समेन कितना भाग्यशाली है!

चलते चलते सुमति ने वहां एक छोटी सी दूकान में झाँक कर देखि तो वहां एक सेल्समेन कुछ औरतो को साड़ियाँ दिखा रहा था. वो साड़ी में प्लेट बनाकर अपनी कमर पर लगाकर उन औरतों को दिखा रहा था कि पहनने पर वो साड़ी कैसी दिखेगी. और औरतें ख़ुशी से उस साड़ी को छूकर देख रही थी कि आखिर वो साड़ी उनकी पसंद की है या नहीं. सुमति यह सब देखकर मुस्कुराने लगी. उसे याद आ रहा था कि कैसे कई बार वो सोचा करती थी कि काश वो भी इस तरह की सेल्समेन होती तो वह भी दिन भर उन खुबसूरत साड़ियों के बीच रहती. और फिर ख़ुशी से उन साड़ियों को अपने तन पर लपेट कर दिखाती.

बढ़ते बढ़ते वो सभी कई दुकानों के सामने से गुज़रे और वो सोच रही थी कि आखिर कहाँ से शुरुआत की जाए.
इतनी सारी दुकानें जो थी और सभी के पास एक से एक दुल्हन के लिए कपडे थे. यदि मैं हर दूकान में जाकर वहां की साड़ियों को देख कर अपनी चॉइस तय करने जाऊ तो मुझे तो कई दिन लग जायेंगे! मुझे तो लगता था कि मुझे पता है मुझे कौनसी साड़ी पसंद आएगी पर इतनी सारी सुन्दर साड़ियों को देख कर तो मेरा सभी को ट्राई करने का मन कर रहा है. मुझे साड़ी लेना चाहिए या लहंगा? मैं तो यह भी तय नहीं कर पा रही हूँ. क्या मुझे दोनों ट्राई करना चाहिए कुछ तय करने के पहले? नहीं नहीं… वैसे तो और भी समय लग जाएगा. मुझे तो साड़ी पर ही ध्यान लगाना चाहिए. ऐसे ही विचार सुमति के मन में चल रहे थे.

“सुनो जी, मैं तुमसे कहे देती हूँ कि आज मैं खर्चे में कोई समझौता नहीं करूंगी. आखिर एक ही बहु है मेरी और उसे जो पसंद होगा वो वोही खरीदेगी. चाहे कितनी भी कीमत हो. समझ रहे हो न?”, कलावती, सुमति की सास, ने अपने पति प्रशांत से कहा.

“अरे कलावती जी. तुम्हारी तरह मेरी भी एक ही बहु है. मैंने तुमसे कब कहा कि मैं इस ख़ास अवसर पर कंजूसी करूंगा? तुम भी न हद ही कर देती हो अपनी बातों से”, प्रशांत ने कहा. उन दोनों की बातें सुनकर रोहित और चैतन्य मुस्कुराने लगे.

“ठीक है जी. पर ये तो बताओ कि हम वहां जा रहे है या नहीं?”, कलावती ने पूछा. “हाँ मेरी पत्नी. हम उसी दूकान में जा रहे है जो तुम्हे सबसे ज्यादा पसंद है.”, प्रशांत ने जवाब दिया.

उस गली में एक से बढ़कर एक दुकानें थी होने वाली दुल्हनो के लिए पर एक दूकान थी जो सबसे अलग थी. और जब सुमति उस दूकान के सामने पहुची तो वहां सजी हुई डिज़ाइनर साड़ियों को निहारने से वो खुद को रोक न सकी. वो सोचने लगी कि काश कलावती ने यही दूकान पसंद की हो. उसकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा जब प्रशांत ने कहा, “तो अब चले अन्दर? या यूँ ही बाहर से ही दूकान को देखती रहोगी?” सुमति की आँखों में ख़ुशी के आंसू आ रहे थे और वो मानो प्रशांत से कहना चाहती थी, “धन्यवाद् पिताजी”. पर जो शब्द ज़बान पर न आ सके वो उसकी आँखों ने कह दिया था.

z003
उस गली की अनगिनत दुकानों में एक दूकान थी जो सबसे अलग और सबसे अद्भुत थी. सुमति को तो यकीन ही नहीं हुआ कि उसके सास-ससुर उसे यहाँ खरीददारी के लिए ले जा रहे थे.

एक बार दूकान के अन्दर जाने के बाद, उन सबको वहां एक महिला ने अपने साथ अन्दर ले गयी जहाँ निचे कुछ गद्दे बिछे हुए थे और कई सारे कपडे दिखाने वाले लोग बैठे हुए थे. सुमति कलावती के साथ अपने पैर पीछे की ओर मोड़ कर बैठ गयी, उसकी कमर बिलकुल सीधी थी और उसके हाथ उसकी जांघो पर थे. उसे हमेशा से पता था कि एक औरत की तरह कैसे बैठा जाता है, और फिर इस नए शरीर में तो यह और भी आसान लग रहा था. आदमी और औरत के तन में कुछ तो फर्क होता है. लचीली कमर और बड़े कुल्हो के साथ एक औरत के लिए निचे बैठना ज्यादा आसान होता है. अब जब शौपिंग का काम शुरू हो गया था, सुमति थोडा शर्माने लगी थी. कलावती बस एक मात्र औरत थी जो उसके साथ थी ताकि सुमति को ३ आदमियों के बीचे अकेलापन न महसूस हो. वैसे भी साड़ी खरीदने में बहुत समय लगता है और आदमी ऐसे में काफी अधीर हो जाते है. पर जब कलावती साथ थी तो अब सुमति चैन से साड़ी देखने में समय लगा सकती थी. आखिर उसकी शादी की साड़ी जो खरीदनी थी… उसमे तो समय लगाना ही था.

“कुछ दुल्हन की साड़ियाँ दिखाइये प्लीज़. रंग नारंगी से मैरून के बीच होना चाहिए, लाल हो तो बेहतर होगा.”, कलावती ने दुकानदार से कहा. “ज़रूर मैडम. साड़ी दिखाऊँ उसके पहले कुछ ठंडा ले लीजिये. मैं आपको हमारे यहाँ की सबसे बेहतरीन साड़ियाँ दिखाऊँगा. वैसे आपने कुछ कीमत सोच रखी है?”, दुकानदार ने पूछा.

“आप कीमत की मत सोचिये, बस बेहिसाब महँगी साड़ियाँ भी मत दिखियेगा”, कलावती ने गर्व के साथ कहा.

“जी मैडम”, दुकानदार बोला और अन्दर जाकर कुछ साड़ियाँ लेकर वापस आया और फिर शुरू हुआ साड़ी दिखाना. “मैडम ये कांचीपुरम सिल्क साड़ी है. ये दक्षिण भारत में काफी प्रसिद्ध है शादियों के लिए.” सुमति की आँखों के सामने मैजंटा रंग की रिच सिल्क साड़ी थी जिस पर फुल और मंदिर के डिजाईन थे जो सुनहरे धागों से बुने गए थे. और उसके साथ एक भारी सा ब्लाउज पीस भी था जिसमे बड़ी सुन्दर एम्ब्रायडरी की गयी थी. कोई भी औरत उस साड़ी को पहन कर किसी महारानी से कम न समझती खुदको. दक्षिण भारतीय साड़ी होती ही क्लासिक है. छूते ही एक लक्ज़री का एहसास होता है. उस साड़ी के सामने तो सुमति की अभी की पहनी हुई साड़ी बहुत फीकी मालूम पड़ रही थी.

“मैडम, ये दूसरा सैंपल गोटा पट्टी वाली साड़ी है जो जोर्जेट के कपडे पर बनी है. ये हमारे एरिया में बहुत पोपुलर है शादियों के लिए.”, दुकानदार ने दूसरी साड़ी दिखाई. दो रंग वाली… एक नारंगी और एक चमकीला गुलाबी. ज़री, सेक्विन, पत्थर और एम्ब्रायडरी से सजी हुई भारी साड़ी… भले वो सिल्क न हो पर वो भी एक राजसी साड़ी थी. “क्या मैं इसे छूकर देख सकती हूँ?”, सुमति ने थोडा संकोच करते हुए पूछा. “ज़रूर मैडम. आप छूकर नहीं देखेंगी तो पसंद कैसे करेंगी?”, दुकानदार बोला.

“वाह… ये तो बहुत भारी है.”, सुमति के नाज़ुक हाथ जैसे उस साड़ी के वजन को संभाल न सके. “हम्म.. कल तक तो ऐसी भारी साड़ी मैं बखूबी संभाल सकती थी”, सुमति सोच रही थी. अब उसे समझ आ रहा था कि औरतें क्यों कई बार साड़ी के भारी होने की शिकायत करती है.

“हाँ बेटा. ये गोटा पट्टी वाली साड़ियाँ ऐसे ही भारी होती है. पर किसी महल की महारानी से कम नहीं लगोगी यदि तुम इसे पहनो तो.”, कलावती ने कहा.

सुमति को ये सब तो पहले से ही पता था. आखिर इन्टरनेट पर दुल्हन की साड़ी ढूंढ कर देखना उसका फेवरेट शौक था. जब समय मिलता वो देखती रहती कि क्या फैशन में चल रहा है. वो साड़ी सच मच अद्भुत थी, पर उसे दो टोन के रंग वाली साड़ियाँ ज्यादा पसंद नहीं थी. उसे तो एक रंग की ही साड़ी चाहिए थी.

फिर दुकानदार ने अगला सैंपल दिखाया और बोला, “मैडम ये ज़र्दोसी स्टाइल है. ये …”

“नहीं नहीं… मुझे ज़रदोज़ी साड़ी नहीं चाहिए. क्या आप गोटा पत्ती वाली ही साड़ियाँ दिखा सकते है जो ऐसे दो टोन वाली न हो?”, सुमति बोली.

“सुमति को तो पहले ही पता है उसे क्या चाहिए.”, चैतन्य हस दिया.

“ऑफ़ कोर्स, मेरे होने वाले पतिदेव”, सुमति भी चैतन्य के साथ हँस दी.. आखिर चैतन्य उसका बचपन का दोस्त था. “अच्छा तुमको पता है तुम्हे क्या चाहिए तो ये तो अच्छी बात है. शौपिंग जल्दी निपट जायेगी.”, चैतन्य ने कहा.

पर भला शादी की खरीददारी इतने जल्दी पूरी होती है भला. सुमति और कलावती करीब करीब ३.५ घंटे तक साड़ियाँ देखती रही. दोनों औरतों ने कई साड़ियाँ ट्राई भी की और फिर उसके बारे में विस्तार से बात भी की. कुछ नहीं तो ५०-६० साड़ियाँ तो उन्होंने देख ही ली होंगी. पर हर साड़ी में कोई एक कमी रह जाती थी जो किसी और साड़ी में पूरी हो जाती. पर फिर दूसरी साड़ी में कुछ और कमी रहती. ऐसा नहीं था कि वो साड़ियाँ खुबसूरत नहीं थी… सभी अच्छी थी पर शादी की बात है! और शादी की साड़ी परफेक्ट होनी चाहिए आखिर इतने पैसे जो खर्च करती है औरतें उस पर. तो उस साड़ी में कोई भी कमी उन्हें बर्दाश्त नहीं होती. बेचारे आदमी वहां बैठे बैठे अब बस उंह रहे थे. इस इंतज़ार में कि कब एक साड़ी फाइनल हो और वो दूकान से बाहर निकले.

आखिर वो पल आ ही गया जब सुमति ने कहा, “मैं कैसी लग रही हूँ इस साड़ी में?” सुमति ने सभी से पूछा और उसकी आँखों में एक आशा की किरण थी. उसने हॉट पिंक रंग की एक साड़ी पहनी थी. औरतों की आँखें भी न रंगों में भेद करना बखूबी जानती है. जैसे फूचसिया पिंक, हॉट पिंक, बेबी पिंक, नीऑन पिंक, और न जाने कितने ही गुलाबी के शेड. जबकि आदमी के लिए ये सभी रंग सिर्फ गुलाबी होते है. “माइंड ब्लोविंग लग रही हो सुमति दीदी. ज़बरदस्त है ये साड़ी”, रोहित ने कहा. उसकी बहन सचमुच खिल रही थी उस साड़ी में.

“अब तो पक्का है मेरी सुन्दर बहु यही साड़ी पहनेगी अपनी शादी में!”, कलावती बोली. “इससे बेहतर तो और कोई नहीं हो सकती बेटी.”, प्रशांत ने भी अपनी मुहर लगा दी.

“मैं तो अब बस इंतज़ार करूंगा उस दिन का जब तुम इसे पहनकर सजोगी!”, चैतन्य ने कहा.

z005
एक औरत को उसकी शादी के दिन कई बार कपडे बदलने होते है. उस दिन न सिर्फ एक साड़ी बल्कि एक लहंगा भी चाहिए होता है.

सुमति सबके मुंह से तारीफ़ सुनकर फिर शर्माने लगी. पर आखिर में साड़ी तय हो ही गयी.

“अब जब साड़ी चुन ली है तो अब लहंगा चोली देखा जाए?”, कलावती ने कहा.

“क्या? अब भी और खरीददारी बाकी है?”, चैतन्य ने चौंक कर कहा. “हाँ बेटा! शादी के पूरे दिन वो सिर्फ एक साड़ी पहन कर थोड़ी रहेगी. हर कार्यक्रम में एक अलग चीज़ पहननी होती है. आज तो हम लोग सिर्फ एक लहंगा चोली और खरीदेंगे, रिसेप्शन के अवसर के लिए. बाकी अवसर के कपडे सुमति खुद खरीद लेना तुम बाद में.”, कलावती ने लगभग चैतन्य को डांट ही दी थी उसकी अधीरता के लिए.

“ज़रा धीरज रखो चैतन्य जी. माँ, मुझे पता है मुझे कौनसा लहंगा चाहिए. साड़ियाँ देखते वक़्त मेरी नज़र वहां टंगे लहंगो पर थी, और उसमे से एक ही है जो मुझे पसंद आया है. मैं उसे लेकर पहनकर बस अभी आई.”, सुमति ने कहा.

और थोड़ी ही देर में सुमति चेंजिंग रूम से एक लाल रंग की लहंगा चोली पहन कर वापस आई. स्लीवलेस चोली और उस लहंगे में उसकी हलकी गोरी त्वचा दमक रही थी. इतनी सुन्दर लग रही थी वो कि देखते देखते आन्हें निकलने लग जाए.

z004
सुमति ने अपनी सैंडल पहन कर लहंगे की लम्बाई चेक की..

“नज़र न लगे मेरी बहु को.”, कलावती ने सुमति के आते ही उसे गले से लगा ली. “सुमति बेटा, ज़रा अपनी हील वाली सैंडल भी पहनकर देख लो कि लहंगे की लम्बाई सही है या नहीं”, कलावती ने फिर कहा. और सुमति ने वही किया. “हम्म.. बस अब चोली तुम्हारे साइज़ से सिलवानी पड़ेगी. वैसे सच कहूं बेटा तो अब तो पूरे शहर की औरतों के बीच मैं अब सबको ख़ुशी से बता सकूंगी कि सबसे सुन्दर बहु मेरी है”, और कलावती की बात सुनकर सब हँस पड़े.

और सबको हँसते हुए देख सुमति सोच रही थी, “यकीन नहीं होता कि मैं दुल्हन बनने वाली हूँ!” पर इस ख़ुशी में वो एहसास नहीं कर पा रही थी कि एक औरत के रूप में शादी करने के क्या मायने होते है. और उसे आगे क्या क्या नया देखना होगा इस नए जीवन में. उसके पास यह सब सोचने का समय ही कहाँ था. और वैसे भी अभी तो बस अपनी शादी के दिन सज-संवर कर दुल्हन बनने के बारे में ही सोच सोच कर खुश हो रही थी वो. एक तरह से वो भगवन को भी धन्यवाद दे रही थी कि उसे इतने अच्छे सास-ससुर मिले. ऐसी सास जो सुमति को बेटी की तरह चाहती थी. पर एक बात जो सुमति इस वक़्त नहीं सोच रही थी, या फिर वो जिस बारे में सोचना नहीं चाह रही थी, वो यह थी कि वो एक आदमी से शादी करने जा रही थी. एक आदमी से! क्या वो पत्नी बनने को तैयार थी? क्या वो अपना तन-मन सब कुछ एक आदमी को समर्पित कर देगी? क्या वो अब तक सिर्फ महिलाओं के प्रति आकर्षित नहीं हुआ करती थी? तो फिर कैसे एक आदमी से शादी करेगी वो? इन सब सवालों के बारे में सोचने के लिए उसे एकांत चाहिए था जो अब तक उसे मिला नहीं था.

खरीददारी के बाद प्रशांत और कलावती ने सुमति को बताया कि वो लगभग २ घंटे में आज ही अपने छोटे से शहर वापस जा रहे है. रोहित, जो उसी शहर में रहता था, वो भी उन्ही के साथ वापस जाने को तैयार हो गया था. समय कम था और सभी को भूख लग रही थी तो सबने तुरंत खाना खाने के लिए एक पास ही के भोजनालय को चुना. उस दिन सभी बेहद खुश थे. सुमति भी. और चैतन्य भी इस बात से खुश था कि सुमति बेहद खुश है. वो तो खुद को दुनिया का सबसे भाग्यवान आदमी समझता था जो उसे सुमति जैसी पत्नी मिल रही थी. वैसे किसी भी लड़के को ख़ुशी मिलती है जब उसकी होने वाली पत्नी उसके माता पिता के साथ इस तरह से घुल-मिल जाए जैसे सुमति मिल गयी थी. सुमति ज़रूर अच्छी बहु बनेगी. पर क्या वो अच्छी पत्नी बन सकेगी? ये तो समय ही बताएगा.

खाना खाने के बाद, सुमति और चैतन्य सभी के साथ रेलवे स्टेशन आ गए थे जहाँ से रोहित, प्रशांत और कलावती ट्रेन लेकर जाने वाले थे. सुमति ने अपने भाई को गले लगाकर विदा दी. सुबह के मुकाबले अब उसके और रोहित के बीच उसे कुछ भी अजीब न लगा. उसे ख़ुशी थी कि आज रोहित उसके साथ था वरना नए परिवार के बीच वो अकेले रह जाती. सुबह से अब तक कुछ घंटे ही बीते थे पर इतनी देर में ही सुमति अब कुछ अलग तरह से सोचने लगी थी. वो बहुत भावुक हो रही थी आज. और भाई को विदा करते हुए उसकी आँखों में आंसू थे. “जल्दी आना रोहित”, उसने रोहित से कहा. और फिर उसके गालों को खींचते हुए बोली, “घर में माँ-पिताजी की मदद करना और माँ से कहना कि मैं जल्दी ही आऊंगी शादी की तैयारियों में हाथ बंटाने” सुमति शायद एक अच्छी बेटी भी थी.

रोहित से अलग होकर अब सुमति ने अपने सर पर पल्लू किया और फिर चैतन्य के साथ ही झुककर अपने सास-ससुर के पैर छुए. “जीती रहो. भगवान तुम दोनों के बीच का प्यार और भी बढाए.”, प्रशांत ने सुमति को आशीर्वाद देते हुए कहा. और कलावती ने तो एक बार फिर प्यार से अपनी बहु को गले लगा ली.

जल्दी ही प्रशांत, कलावती और रोहित ट्रेन में चढ़ गए और ट्रेन रेलवे प्लेटफार्म छोड़ कर जा चुकी थी. अब बस रह गए थे सुमति और चैतन्य. दोनों ने एक दुसरे की आँखों में देखा और मुस्कुरा दिया. चैतन्य ने सुमति के सर से पल्लू को निचे उतारा और अपने हाथो में पकड़ लिया. सुमति ने उससे कुछ कहा नहीं और बस मुस्कुरा दी. चैतन्य के साथ उसे बहुत सहज लग रहा था. चैतन्य वोही तो था जिसे वो न जानते हुए भी जानती थी… उसके बचपन का बेस्ट फ्रेंड… वो दोनों साथ में एक दुसरे का हाथ थामे बाहर पार्किंग लॉट में चैतन्य की कार की ओर बढ़ चले.

क्रमश: …

सभी भागो के लिए यहाँ क्लिक करे

< भाग ८ भाग १० >

यदि आपको कहानी पसंद आई हो, तो अपनी रेटिंग देना न भूले!

free hit counter